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paperback books

  • grid
  • Ek Vyakti Narendra Kohli (Paperback)
    Narendra Kohli
    80

    Item Code: #KGP-7100

    Availability: In stock


  • Krantikaariyon Ke Geet (Paperback)
    Chandrika Prasad Sharma
    120

    Item Code: #KGP-113

    Availability: In stock


  • Naya Vidhaan (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    120

    Item Code: #KGP-203

    Availability: In stock


  • Saphalata Ka Rahasya (Paperback)
    Jagat Ram Arya
    30

    Item Code: #KGP-7086

    Availability: In stock

    सफलता का रहस्य
    जीवन में सफलता की चाहना सब रखते हैं, लेकिन सफल हो नहीं पाते। ऐसा न होने पर कोई भाग्य को कोसता है, कोई हालात को। जबकि सफलता हमारे अपने व्यवहार पर ज्यादा निर्भर है, न कि किन्हीं और बाह्य कारणों पर।
    सफलता के आधारभूत सूत्र हैं-शुद्ध व्यवहार, सीखने की प्रवृत्ति, आत्मनिर्भरता, संतोष तथा और भी बहुत कुछ।
    आर्य जी ने अपनी इस पुस्तक में सफलता के रहस्यों की सरल-सुबोध भाषा में व्याख्या की है। पुस्तक पठनीय तो है ही, जीवन से लिए गए सच्चे उदाहरणों के चलते संग्रहणीय भी बन पड़ी है।
  • Lauhpurush Sardar Vallabhbhai Patel-Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    100

    Item Code: #KGP-1410

    Availability: In stock

    सरदार वल्लभभाई पटेल
    सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत के इतिहास में लौहपुरुष के रूप में जाना जाता है, जबकि विदेशी इतिहासकारों ने उनकी तुलना बिस्मार्क से की है। वे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे और परिस्थिति फिर चाहे जैसी भी रही हो, अपने कर्तव्य का निर्वाह करने से नहीं चूके। इस संदर्भ में वह घटना याद आती है, जब वे अदालत में अपने मुवक्किल की पैरवी कर रहे थे कि तभी उन्हें उनकी पत्नी की मृत्यु से संबंधित तार मिला। उन्होंने वह तार पढ़ा और उसे अपनी जेब में रख लिया तथा मनोयोग से अपने कर्तव्यपालन में लगे रहे। उनका विचार था कि यदि वे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते तो एक बेगुनाह को सजा हो जाती।
    सरदार पटेल की सहनशक्ति बड़ी अद्भुत थी। जब उनकी आयु केवल 9 वर्ष थी तो उनकी बगल में एक फोड़ा निकल आया था। फोड़ा पक गया था, जिस कारण उसमें मवाद बन गयी था। इस फोड़े के कारण उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी थी। ऐसे में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस फोड़े को लोहे की गर्म सलाख से फोड़ दिया। इस आयु में इस तरह के साहस व सहनशक्ति के उदाहरण बहुत ही कम देखने को मिलते हैं।
    बाल्यावस्था से ही सरदार पटेल में निर्णय लेने की बड़ी अद्भुत क्षमता थी और उन्होंने जीवन में जो भी निर्णय लिए, उनमें सफलता भी प्राप्त की। पराधीन भारत में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें निडर, साहसी तथा वीर बनने का पाठ पढ़ाया, जबकि स्वतंत्रा भारत में उन्होंने देशी रियासतों को एकीकृत करने का जो गौरवशाली कार्य किया, वह हमारे सामने एकीकरण की आदर्श मिसाल है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल: जीवन दर्शन’ में सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी घटनाओं एवं तथ्यों को सरस, सरल एवं रोचक भाषा में समाहित करने का प्रयास किया गया है।
  • Toro Kara Toro-1 (Paperback)
    Narendra Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-7041

    Availability: In stock


  • She (Paperback)
    Dixy Gandhi
    245 221

    Item Code: #KGP-332

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times

    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.
  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Gulaha- E- Parishaan (Paperback)
    Khursheed Nabi Abbasi
    300

    Item Code: #KGP-7113

    Availability: In stock

    गुलहा-ए-परीशाँ 
    एक जमाने में हर पढ़ा-लिखा काव्य-प्रेमी अच्छे-अच्छे और पसंदीदा अशआर को एक बयाज (संग्रह) रखता था, जिसमें दर्ज शेर जिंदगी की कशमकश, प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख और दु:ख  क्षणों में उसे याद आते थे और उनको दोहराकर वह अपना दु:ख घटाता या सुख में वृद्धि कर लेता था ।  आज का जीवन व्यस्ततर है और हर व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में ऐसा गूँथा हुआ है कि जिंदगी की लताफ़त अब उसे आकर्षित नहीं कर पाती । ऐसे में यदि काव्य-सागर के मंथन से निकले कुछ काव्य-रत्न उसे दिए जाएं तो वह अपनी जिंदगी को कटुता और वेदना में कुछ कमी महसूस कर सकता है । इसी विचार से प्रस्तुत संकलन में तीन सौ से अधिक विषयों पर कहे गए शेर एकत्रित किए गए हैं, जिनके साथ हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभव जुड़े हुए हैं और यह कोशिश की गई है कि तवज्जो शाइर के नाम पर नहीं, उसके द्वारा किसी विषय विशेष पर रचे हुए शेर पर ही दी गयी है ।  शेर के चयन में रदीफ-क्राफिया, कल्पना-शक्ति, उपमा-अलंकार पर इतना बल नहीं दिया गया है, जितना शाइर की आत्मा की व्याकुलता या उसकी मनोदशा की तीव्रता को मद्देनजर रखा गया है।
    उर्दू के सभी या अधिकतर शाइरों के प्रतिनिधि शेरों का यह संकलन अपने में एक अनूठा प्रयास है, जिसका हिंदी जगत् में निश्चय ही स्वागत किया जाएगा ।
  • Mahasagar (Paperback)
    Himanshu Joshi
    25

    Item Code: #KGP-1212

    Availability: In stock


  • Thank You Idi Amin (Paperback)
    Mohezin Tejani
    395

    Item Code: #KGP-324

    Availability: In stock

    Through adversity, a new life emerges
    Bouncing back from one of the horrific episodes of world history—Idi Amin’s expulsion of 80,000 Asians from Uganda— Mohezin Tejani presents a collection of true stories about being a global Muslim refugee.
    Liberated from the confines of his own culture by political realities, Tejani sets out to learn how to be rooted in the absence of a place to call home. His writing is a hypnotic bhangra dance through time and space where he deftly explores both geographical and psychological displacement. Yet it is precisely through such disorientation and a host of intercultural encounters that he eventually finds solace in being a ‘global village on two legs.’
    Thank You, Idi Amin portrays the intersecting points of congruence among humans that are neither from the East nor the West, nor the North or South, but are all part of a global compass navigating the new world of tomorrow.
  • Saarth (Paperback)
    Bhairppa
    300 285

    Item Code: #KGP-7042

    Availability: In stock

    सार्थ
    सार्थ अर्थात् व्यापारियों का काफिला । नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है । कथा के वाचक नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । उस समय वैदिक धर्म पतनोन्मुख था, भले ही शकरचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियां उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं। दूसरी ओर बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था । उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे । साथ ही, योग साधना और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था । भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ. भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है । संभवत: साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की उसी स्थिति में था, जिसमें आज अपने को पा रहा है । इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारंभ करके छोड़ नहीं पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले ।
    डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति 'सार्थ' अब आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।

  • Khananbadosh (Paperback)
    Ajeet Kaur
    120

    Item Code: #KGP-7032

    Availability: In stock

    दर्द ही जिंदगी का आखिरी सच है । दर्द और अकेलापन । और आप न दर्द साझा कर सकने हैं, न अकेलापन । अपना-अपना दर्द और अपना-अपना  अकेलापन हमें अकेले ही भोगना होता है । फर्क सिर्फ इतना, कि अपनी सलीब जब अपने कंधों पर उठाकर हम जिंदगी की गलियों में से गुज़रे, तो हम रो रहे थे या मुस्करा रहे थे, कि हम अपने ज़ख्मी कंधों पर उठाए अपनी मौत के ऐलान के साथ, लोगों की भीडों से तरस माँग रहे थे, कि उस हालत में भी उन्हें एक शहंशाह की तरह मेहर और करम के तोहफे बाँट रहे थे । दर्द और अकेलापन अगर अकेले ही जाना होता है, तो फिर यह दास्तान आपको क्यों सुना रही हूँ ?
    मैं तो जख्मी बाज़ की तरह एक बहुत पुराने, नंगे दरख्त की सबसे ऊपर की टहनी पर बैठी थी—अपने जख्मों से शार्मसार, हमेशा  उन्हें छुपाने की कोशिश करती हुई। सुनसान अकेलेपन और भयानक खामोश से घबराकर यह दास्तान कब कहने लग पडी ?
    यसु मसीह तो नहीं हूँ दोस्तों, उनकी तरह आखिरी सफर में भी एक नज़र से लोगों की तकलीफों को पोंछकर सेहत का, रहम का दान नहीं दे सकनी 1 पर लगता है, अपनी दास्तान इस तरह कहना एक छोटा-सा मसीही करिश्मा है जरूर! नहीं ?
    पर अब जब इन लिखे हुए लफ्जों को फिर से पढ़ती हुँ तो लगता है, वीरान बेकिनार रेगिस्तान में मैंने जैसे जबरन लफ्जों को यह नागफनी बोई है । पर हर नागफनी के आसपास बेशुमार खुश्क रेत है तो तप रही है, बेलफ़्ज खामोश।
    -अजीत कौर 
  • Sahitya Vivechan (Paperback)
    Jayanti Prasad Nautiyal
    30

    Item Code: #KGP-914

    Availability: In stock


  • Anandmay Jeevan Kaise Payen (Paperback)
    Swed Marten
    120

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • The Luck Of The Jews (Paperback)
    Michael Benanav
    395

    Item Code: #KGP-323

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Dohra Abhishaap (Paperback)
    Kaushlya Baisntari
    120

    Item Code: #KGP-290

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
    —मस्तराम कपूर 
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    120

    Item Code: #KGP-7215

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Fantasia (Paperback)
    Vaughn Petterson
    245

    Item Code: #KGP-343

    Availability: In stock

    Touching on a wide range of different themes, Fantasia on a Theme of Thomas Tallis is a truly compelling read. Throughout the pages of his thought-provoking novel, the author, Vaughn Petterson, presents readers with a vivid portrait of the best and worst that humanity has to offer, inviting them to form their own conclusions about the respective moral weight of our various social folkways and mores. Written in a deeply lyrical style, Fantasia successfully incorporates the transformative media of art, music, and literature as a figurative backdrop for Joe’s personal metamorphosis—highlighting the significance of the arts in helping to change us in ways we could hardly imagine. Petterson also skillfully invokes higher levels of deeper thought in the reader, chiefly by inviting them to consider the deeper spiritual ramifications of the issues with which his characters are forced to contend—issues that rest at the core of our collective existence.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar (Paperback)
    Kamal Kumar
    130

    Item Code: #KGP-412

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कमल कुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash (Paperback)
    Uday Prakash
    175

    Item Code: #KGP-377

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Repartee (Paperback)
    Khushwant Singh
    225

    Item Code: #KGP-328

    Availability: In stock

    KHUSHWANT SINGH, India's iconic journalist and writer, whose works secured largest readership in the country, remains an enigma beyond his writings. His immense popularity and connectivity with his readers made him the common man's idol but his real persona remained in wraps. The 'dirty old man' ensconced in a bulb with a wicked grin and a fountain pen in hand was a far cry in real life.
    This collection of interviews and articles attempts to bring to light the real Khushwant as his family and close friends knew him. 
    A man who was constantly surrounded by beautiful women but remained faithfully wedded to his wife Kaval for 62 years  till she passed away, a man who wrote about wine, women and sex, but lived a life more simple and austere than a commoner, a man who was more disciplined in his fitness regime than men even half his age, a person  who wrote more books, articles and columns than any other journalist or writer in this country, and in a language, so simple that the common reader could comprehend. 
    Little do his readers know that the man famous for his jokes, his love for wine and women and his fierce agnosticism, was a great scholar in real life who wrote classics like A History of the Sikhs, taught comparative religion at Princeton University, was a passionate nature lover who wrote books like Nature Watch, was an art critic and had dabbled in sitar and painting at Shantiniketan in his youth.
    Khushwant Singh voiced his opinions openly and spoke his mind fearlessly through his column's for which he was honoured in 1998, with 'Honest Man of the Year Award and later in 2007 with Padma Vibhushan award.
    He remained reticent about his personal life while he lived. It is about time his loyal fans knew who the real Khushwant was.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Priyamvada (Paperback)
    Usha Priyamvda
    150

    Item Code: #KGP-7006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषा प्रियंवदा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषा प्रियंवदा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'जिंदगी और गुलाब के फूल', 'वापसी', 'छुट्टी का दिन', 'जाले', 'एक कोई दूसरा', 'झूठा दर्पण', 'सागर पार का संगीत', 'चांदनी में बर्फ पर', 'शून्य' तथा 'आधा शहर' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषा प्रियंवदा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta (Paperback)
    Dr. Kripa Shanker Singh
    240

    Item Code: #KGP-7087

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Shatal (Paperback)
    Narendra Kohli
    40

    Item Code: #KGP-7098

    Availability: In stock


  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh (Paperback)
    Sushil Sidharth
    250 213

    Item Code: #KGP-7191

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : अखिलेश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, श्रृंखला तथा अँधेरा।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अखिलेश   की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bharat Mein Panchayati Raaj (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1405

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Saadat Hasan Manto (Paperback)
    Saadat Hasan Manto
    250

    Item Code: #KGP-7011

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सआदत हसन मंटो
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सआदत हसन मंटो ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'स्वराज्य के लिए', 'हतक' हैं 'मेरा नाम राधा हैं', 'बाबू गोपीनाथ', 'मम्मी', 'मम्मद भाई', 'जानकी', "मोजेल', 'सियाह हाशिए' तथा 'टोबा टेकसिंह'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सआदत हसन मंटो की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maalish Mahapuran (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-514

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    -[इसी पुस्तक से]
  • Dus Baal Naatak (Paperback)
    Pratap Sehgal
    120

    Item Code: #KGP-376

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपनेबाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े  और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar (Paperback)
    Laxman Prasad
    260

    Item Code: #KGP-51

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Delhi (Paperback)
    Khushwant Singh
    290 247

    Item Code: #KGP-518

    Availability: In stock

    उपन्यास का नाम शहर के नाम से ! जी हाँ, यह दिल्ली की कहानी है। छह सौ साल पहले से लेकर आज तक की खुशवंत सिंह की अनुभवी कलम ने इतिहास के ढाँचे को अपनी रसिक कल्पना की शिराओं और मांस-मज्जा से भरा। यह शुरू होती है सन् 1265 के ग़यासुद्दीन बलबन के शासनकाल से तैमूर लंग, नादिरशाह, मीर तक़ी मीर, औरंगज़ेब, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र आदि के प्रसंगों के साथ कहानी आधुनिक काल की दिल्ली तक पहुँचती है कैसे हुआ नयी दिल्ली का निर्माण ! और अंत होता है 1984 के दंगों के अवसानमय परिदृश्य में !

    कहानी का नायकमुख्य वाचक हैदिल्ली को तहेदिल से चाहने वाला एक व्यभिचारी किस्म का चरित्रजिसकी प्रेयसी भागमती कोई रूपगर्विता रईसज़ादी नहींवरन् एक कुरूप हिंजड़ा है।दिल्ली और भागमती दोनों से ही  नायक को समान रूप से प्यार है। देश-विदेश के सैर-सपाटों के बाद जिस तरह वह बार-बार अपनी चहेती दिल्ली के पास लौट-लौट आता हैवैसे ही देशी-विदेशीऔरतों के साथ खाक छानने के बाद वह फिर-फिर अपनी भागमती के लिए बेकरार हो उठता है। तेल चुपड़े बालों वालीचेचक के दागों से भरे चेहरे वालीपान से पीले पड़े दाँतों वाली भागमती केवास्तविक सौंदर्य को उसके साथ बिताए अंतरंग क्षणों में ही देखा-महसूसा जा सकता है। यही बात दिल्ली के साथ भी है। भागमती और दिल्ली दोनों ही ज़ाहिलों के हाथों रौंदी जाती रहीं। भागमतीको उसके गँवार ग्राहकों ने रौंदादिल्ली को बार-बार उजाड़ा विदेशी लुटेरों और आततायियों के आक्रमणों ने। भागमती की तरह दिल्ली भी बाँझ की बाँझ ही रही     
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    100

    Item Code: #KGP-7196

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Andher Nagari : Srijan, Vishleshan Aur Paath (Paperback)
    Ramesh Gautam
    35

    Item Code: #KGP-1035

    Availability: In stock

    शोषक व्यवस्था के अस्त-व्यस्त और ध्वस्त होने की चिरंतन बोध कथा है ‘अंधेर नगरी’, केवल तर्कशून्य मूर्ख राजे-रजवाड़ों का तत्कालीन प्रदर्शन ही नहीं। भारतेन्दु की पैनी नजर बकरी-प्रकरण के माध्यम से विदेशी उपनिवेश में हैरान-परेशान जनता की त्रासदी को समाज की आंखों के सामने रखकर उसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रहारात्मक प्रतिघात के लिए उकसाने पर थी, क्योंकि भारतेन्दु का मानना था कि ‘बिना कोई उत्तम शिक्षा निकले जो नाटक खेला ही गया तो इसका फल क्या?’ इसलिए भारतेन्दु का यह रचनात्मक प्रयास प्रहसन के रूप में केवल परिहास प्रिय रसिकजनों को परितृष्ट करने के लिए ही नहीं था बल्कि इससे भी ज्यादा बहुत कुछ था। सांस्कृतिक मोर्चे और तर्कशून्य औपनिवेशिक धरातल पर साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन-व्यवस्था का संचालन करने वाली खोखली हाकिमी मानसिकता को सूली पर चढ़ाने की जन आकांक्षाओं की भविष्य कल्पना इस प्रहसन में की गई है। कहना न होगा, जो 1947 में जनप्रयत्नों से फलीभूत हुई भी। अतः न्याय व्यवस्था के बौद्धिक दिवालिएपन और राजनीतिक अव्यवस्था के खिलाफ यह भारतेन्दु का ‘एकदिनी घोषणा-पत्र’ है, प्रासंगिकता में जिसकी अनुगूंज आज तक सुनाई दे रही है।µ
  • 23 Lekhikayen Aur Rajendra Yadav (Paperback)
    Geeta Shree
    195

    Item Code: #KGP-262

    Availability: In stock

    23 लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव
    अपने ढंग की अद्भुत पुस्तक है यह '23 लेखिकाएं और  राजेन्द्र यादव' । शायद किसी भी भारतीय भाषा में अकेली । इसे गीताश्री के पत्रकार-जीवन की एक उपलब्धि भी कह सकते  हैं । यहाँ गीता ने समय-समय पर लिखे गए समकालीन महिला-रचनाकारों के इम्प्रैशन (प्रभाव-चित्रों) का संयोजन किया है । कहीं ये साक्षात्कार हैं तो कहीं संस्मरण, कहीं राजेन्द्र जी के रचनाकार को समझने की कोशिश है तो कहीँ 'हंस' के संपादकीय, को लेकर उन पर बाकायदा मुकदमे । यहाँ अगर मन्नू भंडारी, मृदुता गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोडा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका तथा कविता हैं तो निर्मला जैन, जयंती  रंगनाथन, पुष्पा सक्सेना, वीना उनियाल और रचना यादव भी अपने वक्तव्यों के साथ उपस्थित है । राजेन्द्र यादव अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और कथा-समीक्षा के विलक्षण व्याख्याकार हैं । इधर चौबीस वर्षों में तो 'हंस' के तूफानी विचारों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया हैं--राजेन्द्र जी को खलनायक और माफिया डॉन या पता नहीं और क्या-क्या बना दिया । विवादास्पद होना  जैसे उनकी स्थायी नियति है--'हंस' के माध्यम से उन्होंने स्त्री-दलित और अल्पसंख्यकों के पक्ष में जो जेहादी मुहिम चलाई है उसने निश्चय ही हिंदी के यथास्थितिवादी परंपरा-पोषकों की नींद हराम कर दी है । वे तर्क से नहीं, गालियों और आक्षेपों से राजेन्द्र जी के प्रश्नों का उत्तर देते हैं । मठाधीशों के लिए यह सचमुच बैचेन कर देने वाला सत्य है कि उनके देखते-देखते दलित और स्त्री-विमर्श आज साहित्य की केंद्रीय मुख्य धाराएँ हैं ।
    राजेन्द्र यादव के इस विकट और अपने समय के सबसे जटिल व्यक्तित्व के विविध आयामों को समेटने की कोशिश करती हैं ये लेखिकाएँ गीताश्री के मंच से ।
    किताबघर प्रकाशन की एक भव्य प्रस्तुति ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria (Paperback)
    Madhu Kankria
    180

    Item Code: #KGP-414

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मधु कांकरिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghava (Paperback)
    Rangey Raghav
    140

    Item Code: #KGP-461

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रांगेय राघव 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Devdas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    70

    Item Code: #KGP-7026

    Availability: In stock


  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    180

    Item Code: #KGP-7055

    Availability: In stock

    रांगेय राघव रचित  प्राचीन सांस्कृतिक कहानियों के छह बृहत संग्रह 
    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।
    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Khushwant Singh (Paperback)
    Khushwant Singh
    80

    Item Code: #KGP1289

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : खुशवंत सिंह 
    किताबघर प्रकाशन की महत्वाकांक्षी कथा-सीरीज़ 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' को विस्तार देते हुए इसे अब अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया है । अर्थात् इस सीरीज़ में अब सभी भारतीय भाषाओँ के शीर्ष कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियां उपलब्ध कराये जाने की योजना है ।
    सीरीज़ के इस नव्यतम सेट में शामिल कथाकार हैं : अमरकान्त, कृष्ण बलदेव वैद, खुशवंत सिंह, गोविन्द मिश्र, ज्ञानरंजन, देवेन्द्र सत्यार्थी, निर्मल वर्मा, प्रतिभा राय, शनी, शेखर जोशी तथा शैलेश मटियानी । विभिन्न भाषाओँ के इन भारतीय कथाकारों ने अपनी सर्जनात्मकता के बल पर स्वयं को आधुनिक कथा के जिस शीर्षस्थ स्थान पर स्थापित किया है वह अपने आप में एक उपलब्धि है । इसी 'उपलब्धि' को एक सीरीज़ के माध्यम से पाठक तक पहुँचाकर हम गौरवान्वित है ।
    इन कहानियों में आदमी के मनुष्य हो जाने की अनुभूतियों के जिस तरलता और सरलता से पिरोया गया है, वह सचमुच एक अदभुत पाठकानुभव है । 
    कहानीकार के कथाकर्म का प्रतिनिधि एवं केंद्रीय स्वर, गहन आत्मीयता से यहाँ सामने लाया गया है । यह कथाकार की अपनी कथाभूमि तो है ही, लगता है, हम सबकी सगी दुनिया भी यही है । टूटती-ढहती और फिर से बनती-सँवरती दुनिया । मानवताकामी शुभेच्छा की यह आकांक्षा ही इस सीरीज़ की वह शक्ति है जो आज के तमाम चालू कथा- सीरीज़ों से इसे अलग खड़ा करती है ।

    तो, प्रस्तुत हैं खुशवंत सिंह की दस प्रतिनिधि क्लानियाँ ।
  • Kosh Vigyan (Paperback)
    150

    Item Code: #KGP-7076

    Availability: In stock


  • Apni Dharti Apne Log-3 Vols. (Paperback)
    Ram Vilas Sharma
    600

    Item Code: #KGP-7112

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai (Paperback)
    Ubaid Siddqi
    200

    Item Code: #KGP-200

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
    इस संग्रह के प्रकाशन से मैं बहुत ख़ुश हूं और उम्मीद करता हूं कि उबैद की शाइरी के रसास्वादन के बाद आप ख़ुद को भी इस ख़ुशी में मेरा शरीक पाएंगे।
    दशहरयार 
  • Sikhon Ka Itihaas (Paperback) (Two Valumes)
    Khushwant Singh
    745

    Item Code: #KGP-268

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Sapnon Ka Shahar : Dubai
    Manoj Singh
    260

    Item Code: #KGP-7221

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के कई नाम हो सकते हैं...‘दुबई: वंडर वल्र्ड’, ‘कमर्शियल कैपिटल’, ‘भविष्य का शहर’, ‘एक केस स्टडी’, ‘एक सफल राजतंत्र’, ‘एक विश्व मेला’, ‘एक आधुनिक बाजार’, ‘सिटी आॅफ माॅल्स’... लेकिन मैंने नाम दिया था ‘दुबई: एक मानवीय चमत्कार’...रेगिस्तान में सुंदर बाग-बगीचे और आइसफील्ड किसी चमत्कार से कम नहीं...मगर अंत में नाम रखा गया ‘सपनों का शहर: दुबई’...सपने अकल्पनीय होते हैं, अविश्वसनीय, रहस्य रोमांच से भरपूर और अति सुंदर भी...(इसी पुस्तक से)
  • Aavaran (Paperback)
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-525

    Availability: In stock

    यह मेरा दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। आठवीं शताब्दी के संधिकाल के अंतस्सत्त्व को ‘सार्थ’ में, उपन्यास के रूप में, आविष्कृत करने का और अब ‘सार्थ’ के समय के बाद के सत्य को ‘आवरण’ द्धउपन्यासऋ में चित्रित करने का मैंने प्रयास किया है। भारत के इतिहास के अत्यंत संकीर्ण इस अवधि के बारे में विपुल प्रमाण में सामग्री उपलब्ध होती है, लेकिन आवरण की शक्ति इस विपुलता के ऊपर विजृंभित हो रही है। ‘सार्थ’ की अवधि का इतिहास ज्यादातर आवरण-शक्ति के लिए आहुति बन नहीं पाया है। उनके बारे में निर्भीक रूप से सत्य को अंकित किया जा सकता है। लेकिन ‘आवरण’ की अवधि के इतिहास के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। प्रत्येक सोपान में आवरण की शक्ति को बेधते हुए आगे बढ़ने की अपरिहार्यता सामने आती है। इसीलिए इस उपन्यास के स्वरूप और तंत्रें को उसके अनुकूल समायोजित कर लेना पड़ा।
       इस उपन्यास की ऐतिहासिकता के विषय में मेरा अपना कुछ भी नहीं है। प्रत्येक अंश या पग के लिए जो ऐतिहासिक आधार हैं उनको साहित्य की कलात्मकता जहाँ तक सँभाल पाती है वहाँ तक मैंने उपन्यास के अंदर ही शामिल कर लिया है। उपन्यास के तंत्र के विन्यास में यह अंश किस प्रकार प्रधान रूप में कार्यान्वित हुआ है, इसको सर्जनशील लेखक और दर्शनशील पाठक, दोनों पहचान सकते हैं। शेष आधारों को उपन्यास के अंदर के उपन्यास को रच डालने वाले चरित्र ने ही, अपनी क्रिया की आवश्यकता के रूप में, प्रस्तुत कर दिया है, न कि मैंने। इस पूरी वस्तु को जो अद्यतन रूप प्रदान किया है, उसमें ही मेरी मौलिकता है। इतिहास की सच्चाई में कला का भाव यदि चुआ है, तो वहाँ तक साहित्य के रूप में यह सफ़ल हुआ है, ऐसा मैं मानता हूँ।
    -भैरप्पा

  • Vichaar-Bindu (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    200

    Item Code: #KGP-456

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।
    -अटल बिहारी वाजपेयी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh (Paperback)
    Mahip Singh
    80

    Item Code: #KGP-7016

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : महीप सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu (Paperback)
    Ramesh Bedi
    200

    Item Code: #KGP-178

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Sunanda Ki Dairy (Paperback)
    Raj Kishore
    195

    Item Code: #KGP-903

    Availability: In stock

    एक थी सुनंदा  ।
    संपन्न परिवार की लड़की । मित्र से पति बने मलय के  साथ नहीं बनी, तो वह किसी नीहारिका की तरह शून्य में विचरण करने लगी । कभी इस शहर में, कभी  उस शहर में  । उसने कई नौकरियाँ कीं, परंतु स्वतंत्रता की उसकी चेतना ने उसे कहीं भी टिकने नहीं दिया । यह एक अदृश्य बेचैनी का शिकार थी । उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे, पर किसी भी उत्तर से उसे संतोष नहीं होता था । उसकी यह खोज ही उसे नैनीताल ले आई, जहाँ वह कुछ दिनों तक विश्राम करना चाहती थी, ताकि आगे की जिंदगी की कोई रूपरेखा उभर सके ।
    एक था सुमित ।
    मस्त, फक्कड़ और विचारशील । माँ-बाप नहीं रहे, तो पारिवारिक संपत्ति को अपने गाँव के कल्याण के लिए समर्पित कर वह आवारगी करने लगा । उसकी एक अंतरंग मित्र मंडली थी, जिसके आर्थिक सहयोग से वह अपनी मनचाही जिंदगी बिता रहा था । उसकी जिंदगी में किताब, शराब और सिगरेट के अलावा और कुछ नहीं था । घुमते-फिरते वह भी नैनीत्ताल आ गया । संयोग से यह उसी गेस्ट हाउस में ठहरा जहाँ सुनंदा ठहरी हुई थी ।
    दोनों की मुलाकात दोनों  के ही लिए एक अविस्मरणीय घटना बन गई । सुनंदा और सुमित विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे, जैसे ईश्वर, धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, स्त्री, लोकतंत्र, मानव अधिकार आदि । इसके साथ ही, दोनों के हृदय अनुराग की आभा से भरते चले गए । लेकिन परिपाक की ऐश्वर्यमयी रात के तुरंत बाद जुदाई का मुहूर्त आ पहुंचा - दोनों की जिंदगी को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए ।
    'सुनंदा की डायरी' विचार-विमर्श के इन्हें घटनापूर्ण दिनों का दिलचस्प दस्तावेज है ।
  • Parinti (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7101

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena (Paperback)
    Naresh Saxena
    90

    Item Code: #KGP-1241

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब 

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey (Paperback)
    Agyey
    120

    Item Code: #KGP-7014

    Availability: In stock


  • Hum Yahan The (Paperback)
    Madhu Kankria
    300

    Item Code: #KGP-7232

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • The 10-Pound Shred (Paperback)
    Tommy Europe
    295

    Item Code: #KGP-346

    Availability: In stock

    The 10-Pound Shred lets you bring Tommy Europe's tough-love, bootcamp-style workouts home. In just 31 days, Tommy will take you from flab to fit, helping you shed 10 poundsor more in the process. Each day has complete, easy-to- understand exercise instructions with step-by-step photos. There's no complicated flipping around to figure out what you need to be doing–and no free breaks, either! You don't need fancy equipment or even a gym membership–just a good pair of shoes and the willingness to get moving. There's also a nutritious, flexible meal plan designed to help you set a new, lifelong pattern of healthy eating. And through it all, Tommy's there with his signature blend of drill sergeant and inspiring friend, pushing you to reach higher, go faster and shred a little harder.
    Whether you have a wedding coming up, want to look great at the beach or just want to have more energy, Tommy will help you lose those 10 pounds. You're going to sweat, you're going to hurt–but you're going to love the results. So stop making excuses, put down that cupcake and pick up The 10-Pound Shred.
  • Neeraj Ke Prem Geet (Paperback)
    Gopal Das Neeraj
    140 119

    Item Code: #KGP-7063

    Availability: In stock

    नीरज के प्रेमगीत
    लड़खड़ाते हो उमर के पांव,
    जब न कोई दे सफ़र में साथ,
    बुझ गए हो राह के चिराग़
    और सब तरफ़ हो काली रात,
    तब जो चुनता है डगर के खार-वह प्यार है ।
    ० 
    प्यार में गुजर गया जो पल वह
    पूरी एक सदी से कम नहीं है,
    जो विदा के क्षण नयन से छलका
    अश्रु वो नदी से कम नहीं है,
    ताज से न यूँ लजाओ
    आओं मेरे पास आओ
    मांग भरूं फूलों से तुम्हारी
    जितने पल हैं प्यार करो 
    हर तरह सिंगार करो,
    जाने कब हो कूच की तैयारी !
    ० 
    कौन श्रृंगार पूरा यहाँ कर सका ?
    सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
    हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
    बीना जो भी बजी सो अधूरी बजी,
    हम अधुरे, अधूरा हमारा सृजन,
    पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ
    काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
    बिंब का मूक प्रतिबिंब छल जाएगा ।
    [इसी पुस्तक से ]
  • Shakti Se Shanti (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    250

    Item Code: #KGP-459

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति
    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।
    आइये, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।
    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें हुम पर नाज है, हमें हुम पर गर्व है । -[इसी पुस्तक से]
  • Vish Vansh (Paperback)
    Rajesh Jain
    25

    Item Code: #KGP-1503

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।
  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral (Paperback)
    Manglesh Dabral
    100

    Item Code: #KGP-1411

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
  • Ullanghan (Paperback)
    Bhairav Prasad Gupt
    190

    Item Code: #KGP-1544

    Availability: In stock

    डॉ. एस.एल. भैरप्पा
    (जन्म: 1934)
    पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
    ‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। 
    केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
    देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।
  • Manvadhikar Ki Aseemit Sarhadein (Paperback)
    Pushpa Sinha
    150

    Item Code: #KGP-477

    Availability: In stock

    इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म  एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।
    लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थान विशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है। तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें।
    मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है।
    अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है, यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।
  • Khule Gagan Ke Lal Sitare (Paperback)
    Madhu Kankria
    120

    Item Code: #KGP-222

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra (Paperback)
    Ramdarash Mishra
    90

    Item Code: #KGP-1584

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रामदरश मिश्र
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bhrashta Samaaj (Paperback)
    Chandan Mitra
    90

    Item Code: #KGP-7048

    Availability: In stock


  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-1313

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]
  • Dena Paavna (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    140

    Item Code: #KGP-154

    Availability: In stock


  • Kavya Shatabdi (Paperback)
    Anamika
    160

    Item Code: #KGP-7088

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े  संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां  उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके क्राव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते है । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढने की गंभीर कोशिश दिखाई देती हे ।
    --मंगलेश डबराल 
  • 20-Best Stories From Italy (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-1141

    Availability: In stock

    What is an anthology, if aot an amalgamation of words?
    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from lands that are as enigmatic as they are intriguing. Italian folktales are world famous for theirstory-telling flow—natural, simple and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, out beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.
    With stories like Lionbruno and Aurelia, Jatagim—Chief of Robbers, Great Mathilda, Love cannot be Replaced, The Evil-Hearted Right-Hand Squire, The Wizard of Lagotorbido, Romolo and Remolo, this book is a compilation of 20 famous Italian folktales. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Italy.
  • Teesara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-7051

    Availability: In stock

    ग़ज़ल शतकों में सम्मिलित कवि
    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उदयप्रताप सिंह ०  कुमार शिव ०  गोपालदास ‘नीरज’ ०   चिरंजीत ०  ज़हीर कुरैशी ०  ज्ञानप्रकाश विवेक ०  त्रिलोचन ०  दुष्यंत कुमार ०  देवेंद्र माँझी ०  प्रमोद तिवारी ०  बलबीर सिंह ‘रंग’ ०  बालस्वरूप राही ० भवानी शंकर ०  मासूम ग़ाज़ियाबादी ०  मृदुला अरुण ०  राजनारायण बिसारिया ०   रामकुमार कृषक ०  रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’ ०  रामदरश मिश्र ०  रामावतार त्यागी ०  शलभ श्रीराम सिंह ०  शिव ओम ‘अंबर’ ०  शेरजंग गर्ग ०  सुरेंद्र श्लेष ०  सूर्यभानु गुप्त।
    दूसरा ग़ज़ल शतक
    अशोक वर्मा ०  आचार्य सारथी ०  उपेन्द्र कुमार ०  उर्मिलेश ०  ओमप्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ ०  कमल किशोर ‘भावुक’ ०  कमलेश भट्ट ‘कमल’ ०  कुँअर बेचैन ०  ज्योति शेखर ०   नरेन्द्र वसिष्ठ ०  पुरुषोत्तम ‘वज्र’ ०  प्रभात शंकर ०  महेश जोशी ०  योगेन्द्र दत्त शर्मा ०  रंजना अग्रवाल ०  रामनारायण स्वामी ०  रामनिवास ‘मानव’ ०  लक्ष्मण ०   विजय किशोर ‘मानव’ ०  विनीता गुप्ता ०  शिवबहादुर सिंह भदौरिया ०  श्रवण राही ०  सरोज व्यास ०  हरजीत ०   हरिओम।
  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Antarmilan Ki Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    150

    Item Code: #KGP-498

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।
  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh (Paperback)
    Kedarnath Singh
    90

    Item Code: #KGP-1307

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रहीं है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Mahaan Yoddha Prithviraaj Chauhan : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    90

    Item Code: #KGP-1319

    Availability: In stock

    भारतवर्ष के इतिहास में क्षत्रिय राजवंशों की गौरवगाथा इतनी लोमहर्षक है कि उन्हें बारंबार पढ़ने को मन करता है। पौराणिक काल से ही क्षत्रिय वंश ने राष्ट्र और समाज की रक्षा में अपनी तलवार उठाए रखी और अपने कर्तव्य का पालन किया।
    अजमेर चैहान वंश की राजधनी रहा है, जिसके प्रतापी राजा सोमेश्वर चैहान थे। सोमेश्वर चैहान के पुत्र पृथ्वीराज चैहान थे, जिनकी वीरता को आज भारतवर्ष में बड़े गर्व से याद किया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘महान् योद्धा पृथ्वीराज चैहान: जीवन दर्शन’ में पृथ्वीराज चैहान के जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को सरल, सरस व सुबोध् शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  • Pride And Prejudice (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-347

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • BHARATRATNA SE SAMMANIT MAHAN VYAKTITVA (Paperback)
    Dr. Rashmi
    360

    Item Code: #KGP-519

    Availability: In stock

    भारतरत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। अति सम्माननीय एवं विशिष्ट व्यक्तियों को राष्ट्रीय सेवा हेतु प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान संपूर्ण व्यक्तित्व व देश के प्रति समग्र समर्पण भावना का आदर करते हुए समर्पित किया जाता है। इस सम्मान से अलंकृत व्यक्ति ‘भारतीय नागरिकता की वरीयता सूची’ में सातवें स्थान पर सुशोभित होते हैं। यह आवश्यक है कि 2 जनवरी, 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा स्थापित ‘भारतरत्न’ सम्मान के विषय में प्रत्येक नागरिक सुपरिचित हो। कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, विचार, उद्योग, लेखन, सार्वजनिक सेवा एवं खेल आदि के क्षेत्रों में ‘भारतरत्न’ से सम्मानित विभूतियों के जीवन तथा कृतित्व से प्रेरणा पाकर कोई भी अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
    अनेक प्रेरक रचनाओं की लेखिका डॉ. रश्मि ने परिश्रम व निष्ठापूर्वक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पुस्तक का लेखन किया है। सम्मानित व्यक्तित्व के सभी आयामों का परिचय देते हुए उन्होंने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित किया है। प्रथम बार ‘भारतरत्न’ (1954) से अलंकृत चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर 2015 में सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी एवं पं. मदन मोहन मालवीय तक सभी महान् व्यक्तित्वों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी इस पुस्तक में समाहित है।
    राष्ट्रप्रेम, जीवन मूल्य और समर्पित कृतित्व को परिभाषित करती पुस्तक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पठनीय व संग्रहणीय है। सरल-सुगम भाषा तथा प्रवाहपूर्ण शैली इसे अत्यंत रोचक बना देती है।
  • The Story Of My Experiments With Truth (Paperback)
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    199

    Item Code: #KGP-349

    Availability: In stock

    A face we see all around us… everyday, even if we do not visit government offices. Teachings people swear by and entertained to in films. We still see his style being imitated in the political circles—that is Mohandas Karamchand Gandhi. One of the influencers of the millennium, the ‘half naked’ Indian man who shook the mightiest empire of the modern world, has a story to tell—his story. 
    An autobiography of Gandhi, the book starts with his birth, and ends with his experiences till 1921. The original manuscript was written in weekly installments in Gujarati by Gandhi, and was published weekly in his journal Navjivan from 1925 to 1929. It was later translated by Mahadev Desai in English, which too was published in installments in his other journal Young India.
    Unlike most autobiographies or biographies, Gandhi’s autobiography speaks about his fears, regrets, failures, struggles, and all that went through his mind while initiating and going through the experiments he conducted, in his and his immediate family’s lives. Gandhi hides nothing from his readers; he wants his experiences and experiments to reach out to people so that their life becomes worth living.
    Gandhi, through his lucid and simple style of writing, honest opinions, and candid narrations, takes us to the man who was ‘mahatma’ in his thoughts and actions.    
  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7081

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • Triya Hath (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    100

    Item Code: #KGP-7046

    Availability: In stock


  • Yah Ant Naheen (Paperback)
    Mithileshwar
    250

    Item Code: #KGP-36

    Availability: In stock

    यह अंत नहीं

    अंतहीन बनती समस्याओं के खिलाफ मानवीय संघर्ष की विजयगाथा का जीवंत उपन्यास। जीवन की सकारात्मक चेतना और अपराजेय मानवीय जिजीविषा का सार्थक उद्घोष। ग्रामीण जीवन की जमीनी सच्चाई का बेबाक चित्रण। चुनिया और जोखन के रूप में अविस्मरणीय चरित्रों का सृजन। हिंसा, द्वेष और नफरत के विरुद्ध सहज मानवीय संबंधों की स्थापना। गहन मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज। हिंदी उपन्यास के समकालीन दौर में कलावाद और यथार्थवाद के द्वंद्व को पाटने वाला एक मजबूत सेतु। एक तरफ भाषा की रवानगी और खिलंदड़पन तो दूसरी तरफ जमीनी सच्चाइयों का अंकन। भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर एक सशक्त कृति। बीसवीं शताब्दी को एक स्तरीय और यादगार उपन्यास

  • Anmol Vichaar (Paperback)
    Sudha Arora
    150

    Item Code: #KGP-7074

    Availability: In stock

    सुधा गौतम
    प्रस्तुत पुस्तक अनमोल विचार में सुश्री सुधा गौतम ने अनेक महापुरुषों और धार्मिक ग्रंथों से अनमोल विचार संकलित किए हैं । उदाहरण के लिए—
    जिसने अपनी इच्छाओं का दमन करके मन पर विजय और शांति पा ली है, वह राजा हो या रंक, उसे जगत् में सुख ही सुख है । —हितोपदेश 
    इच्छा से दु:ख आता  इच्छा से भय आता है । जो इच्छाओं से मुक्त है, वह न दु:ख जानता है, न भय । -महात्मा बुद्ध 
    यदि तुम सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने के आकाँक्षी हो तो सबसे नीचे से चढ़ना प्रारंभ करों । -साइरल
    अधूरा काम और अपराजित शत्रु—ये दोनों बिना बुझी आग की चिंगारियों की तरह हैं । वे मौका पाकर बैठ जाएँगे और उस लापरवाह आदमी को आ दबाएँगे । -चाणक्य
    कायर लोग अपनी मृत्यु के पहले भी कई बार मरते हैं, परंतु वीर पुरुष मृत्यु का एक बार ही अभिनंदन करते हैं। -शेक्सपियर
    जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है, उसने मानो सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर ली । -वेदव्यास 
    जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने ही ऊपर झेल लेता है, वही दूसरों के क्रोध से बच सकता है । वही अपने जीवन को सुखी बना सकता है। -सुकरात 
    ज्यों-ज्यों मनुष्य बूढा होता जाता है, त्यों-त्यों जीवन से प्रेम और मृत्यु से भयभीत होता जाता है । -जवाहरलाल नेहरू 
    दयालु पुरुष धन्य हैं, क्योंकि वे ही भगवान की दया को प्राप्त कर सकेंगे । -ईसा मसीह
    परोपकार-रहित मनुष्य के जीवन को धिक्कार है, क्योंकि उससे तो पशु ही धन्य हैं, जिनका चमडा भी दूसरों के काम में आता है । -विनोबा भावे 
    किसी के गुणों की प्रशंसा करने में अपना समय मत खोओ, उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करों । -कार्ल मार्क्स 
    जो मनुष्य निश्चित कार्यों को छोडकर अनिश्चित के पीछे दौड़ता है, उसके निश्चित कार्य भी नष्ट हो जाते है, अनिश्चित तो नष्ट ही हुआ रहता है । -चाणक्य 
    मनुष्य को अपने कमाए हुए धन से तब तक कोई तृप्ति नहीं होनी चाहिए, जब तक उनमें से कोई नेक काम करना न शुरु कर दे । -भगवन महावीर 
    वे राजा धन्य हैं जो पुत्रों के समान पुरवासियों को अपने सामने पूर्ण सुखी देखकर रात को चैन से सोते है । -राजतरंगिणी 
    कुटिल मत बनो, किसी भी व्यक्ति के साथ कुटिलता, धोखेबाजी और मक्कारी का व्यवहार मत करो । सभी के साथ सभ्यता, नम्रता, भद्रता और श्रेष्ठता का व्यवहार करो । -यजुर्वेद 
    माता के आँचल और घर के कोने से बड़ा ही अंतर होता है—एक तो शीतल जल का सागर होता है, दूसरा मरुभूमि । -प्रेमचंद 
    यह मानना कि हम कुछ नहीं कर सकते, सबसे बडी कायरता है । इसे त्यागो और पुरुषार्थ को जागृत करों । फिर देखोगे कि तुम्हारी उन्नति तुम्हारे हाथ में है । -मुनि गणेशवर्णी 
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-7110

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Pracheen Brahman Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    150

    Item Code: #KGP-499

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Prachin Kavya Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    60

    Item Code: #KGP-1287

    Availability: In stock


  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan (Paperback)
    Mannu Bhandari
    150

    Item Code: #KGP-1426

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है। 
  • Chintan Karen Chintamukt Rahen (Paperback)
    Swed Marten
    80

    Item Code: #KGP-1248

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं । 
  • Keshavraav Baliram Hedgewar : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    100

    Item Code: #KGP-488

    Availability: In stock

    निडर और साहस के धनी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भारत की उन महान् विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के पथ पर चलते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। अपनी जीवनशैली में सदैव अनुशासन और राष्ट्रप्रेम को अधिक महत्त्व देने वाले डॉ. केशवराव ने बाल्यावस्था में ही अपने अंग्रेजविरोधी तेवर दिखाने आरंभ कर दिए थे।
    डॉ. केशवराव उन विलक्षण व्यक्तियों में से थे, जो युवाओं की मानसिकता को भलीभांति जानते थे और उनकी क्षमताओं को विकसित करने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
    देश की युवा पीढ़ी को भारत की सनातन संस्कृति और आदर्शों से जोड़े रखने के लिए 28 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पर्व पर ‘संघ’ नामक नए राष्ट्रीय हिंदूवादी संगठन की स्थापना की गई। साहस और अनुशासन पर आधारित इस संगठन को खड़ा करने का पूरा श्रेय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार को जाता है। इस स्थापना-समूह के अन्य सदस्यों में डॉ. वी. एस. मुंजे, बापूजी सोनी तथा डॉ. परांजपे आदि वरिष्ठ नेता शामिल थे।
  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-7109

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए
    यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक । 
  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-3 (Paperback)
    Bhagwan Singh
    200

    Item Code: #KGP-7211

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    160

    Item Code: #KGP-490

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Kavi Ne Kaha : Katyayani (Paperback)
    Katyayani
    90

    Item Code: #KGP-1466

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: कात्यायनी
    मेरे लिए, कविता सर्वोपरि तौर पर, बुनियादी तौर पर, बिम्बों का एक पूरा संसार है, उनका विधान है।
    हमें कविता का कच्चा माल लाना होता है--दो खदानों से--स्मृतियों और कल्पना की खदानों से।
    सवाल यह उठता है कि वहाँ तक पहुँचें कैसे? इसके लिए उस खौलते हुए तरल धातु की नदी में उतरना होता है जो हमारे आसपास की ज़िन्दगी है--अपूर्ण कामनाओं-लालसाओं, विद्रोहों, हारों-जीतों, कामयाबियों-नाकाम-याबियों से भरी हुई, कोमल-कठोर, सुन्दर-असुन्दर के द्वन्द्वात्मक संघातों से उत्तप्त, गतिमान। हम इस नदी में उतरते हैं, वे ठोस नहीं होतीं। वे ऊर्जा जैसी होती हैं। उन्हें हम बिम्बों में रूपान्तरित करके कविता में उतारते हैं तो वे ठोस, वस्तुगत यथार्थ बन जाती हैं। यह ऊर्जा को पदार्थ में बदलने का कविता का अपना भौतिकशास्त्रीय विधान है, जिसे सिर्फ़ सच्चे कवि ही समझते हैं।
  • Rang De Basanti Chola (Paperback)
    Bhishm Sahni
    30

    Item Code: #KGP-1027

    Availability: In stock

    रंग दे बसन्ती चोला
    [जलियाँवाला बाघ रतनदेवी आती है । हाथ में पानी का लोटा है ।]
    रतनदेवी : ले मेरे लाल । मैं तेरे लिए पानी लाई हूँ। (किश्ना के होंठों से पानी डालती है ।) तू बोलता क्यों नहीं किश्ना बेटे । (माथे को छुकर) चला गया, यह भी चला गया । इसकी भी प्यास बुझ गई । मैं कर्मजली तेरे होंठों में दो बूँट पानी भी नहीं डाल पाई । तू भगवान् को प्यारा हो गया है। (रो पड़ती है, फिर धीरे से उठकर अपने पति के शव के पास पहुंचती है। ) तू भी भगवान् के पास जा रहा है । मैं रोऊँगी नहीं । मैं तेरा सफर खराब नहीं करूँगी । हँसता-हँसता जा। भगवन् तुझे गले लगाएंगे ।
    तेरे सैकडों संगी-साथी मौत की नींद सोए पडे हैं । वे भी तेरे साथ भगवान् के दरबार में जाएँगे। उनके घरवाले अभी भी उनकी राह देख रहे हैं। 
    तूने अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा । तू अपनी जान निछावर कर गया । मैं पापिन तुझे सारा वक्त उलाहने देती रही । तेरे साथ झगड़ती रही, पर मुझे क्या मालूम था, तू सचमुच चला जाएगा । (उसका माथा सहलाती हुई) मैं कहाँ लुट-पुट गई ? मैं तो चिर सुहागिन हूँ । जिसका घरवाला ऐसा शूरवीर हो । तू तो मेरा सूरमा पति है । तू तो नाचता-गाता हुआ घर आया करता था : मेरा रंग दे, मेरा रंग देबसन्ती चोला ।
  • Vyangya Samay : Shrilal Shukla (Paperback)
    Shree Lal Shukla
    225

    Item Code: #KGP-7217

    Availability: In stock

    कालजयी कृति ‘राग दरबारी’ के महान् रचनाकार श्रीलाल शुक्ल युगांतरकारी व्यंग्यकार हैं। उनका व्यंग्य लेखन ‘सुबुक सुबुक वादी’ भावुकता और जड़ीभूत जीवनदृष्टि के प्रतिरोध से प्रारंभ होता है। साहित्य में ‘प्रतिभा’ क्या होती है, यह श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर जाना जा सकता है। वे पूर्वानुमानित या राजनीति से उत्सर्जित विषयों की ओर कभी नहीं गए। उनके द्वारा रचे गए व्यंग्यों के शीर्षक ही यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि समाज, संस्कृति, साहित्य और साहित्य के धूसर धुंधले इलाकों से होकर वे किस तरह गुजरते हैं। क्लासिक व्यंग्य लेखन के सर्वोत्तम उदाहरण देतीं श्रीलाल शुक्ल की रचनाएं अविस्मरणीय हैं। भाषा के अनेक विस्मयकारी प्रयोग उन्होंने किए हैं। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य रचना में प्रत्युत्पन्नमति, वचनवक्रता, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि के लिए विशेषतः उल्लेखनीय हैं। श्रीलाल शुक्ल विश्व साहित्य में व्यंग्य की परंपरा के अद्भुत ज्ञाता थे। उनके व्यंग्य विश्वस्तरीय व्यंग्य साहित्य में प्रसन्नतापूर्वक शामिल किए जा सकते हैं। मनुष्य मन के अतल में छिपी प्रवृत्तियों को उजागर करते हुए उन्होंने व्यापक सभ्यता समीक्षा की है। 
    ‘व्यंग्य समय’ में श्रीलाल शुक्ल के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और उन्हें पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma (Paperback)
    Tajendra Sharma
    170

    Item Code: #KGP-441

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : तेजेन्द्र शर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jayvardhan Ke Teen Natak (Paperback)
    Jaivardhan
    180

    Item Code: #KGP-7233

    Availability: In stock


  • Virajbahu (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1246

    Availability: In stock


  • Nikka Nimana (Paperback)
    Sushil Kalra
    180

    Item Code: #KGP-427

    Availability: In stock

    ...आजादी के पैरोकार जो जमीन तैयार कर रहे थे उसकी उपजनिक्का निमाणा' के अतिरिक्त और हो ही क्या सकती थी। तिरस्कृत, लांछित, अपमानित चरित्र-एक ऐसा चरित्र जो भ्रष्ट आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रिया का कुल योग है।

    पंजाब का पिण्ड घोपलू उन लाखों गांवों में से एक है जो चीख रहे हैं-हमें पानी दो। खाद दो। बीज और बिजली दो। शिक्षा और संस्कार दो। भूरी, नंबर, मद्दी, वड्डी मां, निक्काया, मेंहदीरत्तो, चाचे कृष्णा, कहां नहीं हैं? भरे पड़े हैं सारे देश में संसद की जड़ों में खाद बनकर जी रहे हैं।

    दरियाई घोड़े की तरह मुंह फाड़े राजतंत्र, देह और दौलत की घोर अमानवीय अराजक परिणति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। मूल्य ह्रास, नैतिक पतन, नारकीय जीवन को गांधी टोपी के नीचे छिपाए, जनता को लगातार रौंदता

    और भटकाता सत्ताधारी वर्ग औरत, शराब और पैसे की त्रिवेणी में सदा सर्वदा पवित्र है! जो इस कला में जितना पारंगत है, उतना ही ऊंचा पद, सत्ता में, उसके लिए सुरक्षित है। निक्का इसी गंगा का शालिग्राम है। लेकिन इस प्रतियोगिता में निक्का एक हद तक ही विजयी होता है। धीरे-धीरे डोर उसके हाथ से छूटती जाती है। वह महज एक मोहरा रह जाता है। उभरता है फिर एक अत्यंत क्रूर, अमानवीय, स्वार्थाध शासक वर्ग। लेकिन साथ-साथ ही एक नियामिका शक्ति भी उभरती है-जनता।

    यथार्थ की तहों तक पहुंचतासृजनात्मक प्रवहमान भाषा का माध्यम और सुस्पष्ट दृष्टि का प्रमाण देने वाला यह उपन्यास निश्चित ही अपने समय का दस्तावेज लगता है।    

  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad (Paperback)
    Jaishankar Prasad
    100

    Item Code: #KGP-7228

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajee Seth (Paperback)
    Raji Seth
    130

    Item Code: #KGP-416

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजी सेठ 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राराजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी...?', 'अपने दायरे', 'ठहरो, इन्तजार हुसैन', 'उतनी दूर' तथा 'यह कहानी नहीं'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजी सेठ की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-241

    Availability: In stock

    यजुर्वेद : युवाओं के लिए 
    'वेद : युवाओं के लिए' ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक 'यजुर्वेद : युवाओं के लिए' प्रस्तुत है । इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अंतर्गत समाहित किया गया है । ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ-धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है । यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है । यह 'कर्म' यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है । पारम्परिक दृष्टि से 'यज्ञ' का सीमित अर्थ होता है — अग्नि में आहुति देना । परन्तु 'यज्ञ' का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण भाव मुख्य रहता है । अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यघ के अंतर्गत आ जाते हैं । 
    इन मन्त्रों ऐसा यघ, दीघार्यु व धन-सम्पति तथा सुरक्षादि पाने  प्रार्थनाएं हैं । क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं । धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है । यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद के बढ़ावा मिलता है । बल्ह के कारन एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदुषण होता है । आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है । शांति, विश्रांति और आनंद की चाह है सबको । वह कैसे मिले ? यही मंत्र निर्देश करते हैं । 'विश्व-शांति' के लिए किया जाने वाला 'शांतिपाठ' इसी वेद की देन है । 
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो 'मन के युवा हैं' तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं । 
  • Chasing Maya (Paperback)
    Rohan Gagoi
    150

    Item Code: #KGP-335

    Availability: In stock

    Better jobs, bigger salaries, expensive cars, exclusive homes, exotic vacations, shopping abroad, admiration and jealousy of peers... What more can you expect from life! Or, may be, you can…! Come; explore your truth with ‘Chasing Maya’!
    ‘Chasing Maya’ is about thirty-two-year old Siddhartha Kumar, who in spite of his evident material success finds himself trapped in the grip of mediocrity – the distress and despair of being no different from millions of others in this world. Bemused, he sets on a quest to rediscover the zeal that once fuelled his dreams and passion and comes across with situations and people that lead him to astounding revelations.
    Share the anxiety, live the excitement and experience the magical transcendence as ‘Chasing Maya’ takes you on an incredible journey that every human soul instinctively seeks to undertake but only a negligible few truly succeed to accomplish!
  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap (Paperback)
    Madan Kashyap
    80

    Item Code: #KGP-1277

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीँ रहते, उसमें पैठत्ते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते है और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते है ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृज़नात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Gopal Krishna Gokhale : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    120

    Item Code: #KGP-482

    Availability: In stock

    जिस समय हमारी यह भारतभूमि अंग्रेजों के अत्याचारों, प्रताड़नाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी उस समय देश के अनेक वीर सपूतों ने या तो अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के मान-प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा की या जीवन भर देश के लोगों को देश की आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहे। उन्हीं वीर सपूतों में से एक वीर सपूत थे—गोपालकृष्ण गोखले। गोखले जी ने उस समय न केवल इस देश के युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया बल्कि अपना संपूर्ण जीवन देश को आजादी दिलाने के प्रयासों में ही न्योछावर कर दिया।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Cour (Paperback)
    Ajeet Kaur
    175

    Item Code: #KGP-7010

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजीत कौर
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरों वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिडिया’ , 'चीख एक उकाब की हैं' तथा 'नया साल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-7039

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    [इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]

  • Sharat Ka Katha Sahitya (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    320 288

    Item Code: #KGP-205

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Upendranath Ashq (Paperback)
    Upender Nath Ashq
    90

    Item Code: #KGP-1505

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उपेन्द्रनाथ अश्क
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' क्या 'अजगर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sant Meeranbai Aur Unki Padaavali (Paperback)
    Baldev Vanshi
    90

    Item Code: #KGP-7071

    Availability: In stock

    संत मीराँबाई और उनकी पदावली
    मीराँबाई  की गति अपने मूल की ओर है । बीज-भाव की ओर है । भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्त्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई । अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है । 
    मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चटूटानें  राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढती चली गई । वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रम-क्रम तोड़ती चली गई । राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान ममाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकीं और मुक्त हो गई । इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया । तभी मीराँ, मीराँ बनी ।
  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat (Paperback)
    Bhagwat Rawat
    90

    Item Code: #KGP-1379

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • Prem Chand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    70

    Item Code: #KGP-7049

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
    -कमलेश पाण्डेय
  • Vipradas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-1404

    Availability: In stock


  • Ghar Nikaasi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    70

    Item Code: #KGP-1316

    Availability: In stock


  • Bachchon Ke Chhah Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1383

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 

  • Satta Ke Aar-Paar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    35

    Item Code: #KGP-932

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    -इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar (Paperback)
    Ramdhari Singh Diwakar
    125

    Item Code: #KGP-7007

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : रामधारी सिंह दिवाकर
    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिल्लेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न अपना है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भा दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।
    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।
    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार','खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानो', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aadarsh Saamaanya Hindi (Paperback)
    Vijay Agarwal
    40

    Item Code: #KGP-7105

    Availability: In stock


  • Antarctica Abhiyan (Paperback)
    Hridya Nath Dutta
    195

    Item Code: #KGP-366

    Availability: In stock

    अंटार्कटिका अभियान
    हमारी पृथ्वी असंख्य रत्नों और अनेक रहस्यों से भरी हुई है । प्रकृति ने भी इसे सजाने-सँवारने के लिए अनुपम सौंदर्य लुटाया है । इंसान हमेशा से ही पृथ्वी के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए प्रयत्नशील रहा है । अपने ज्ञान में वृद्धि के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में अधिक से अधिक दोहन भी इसका मूल कारण है । बरक्स इसके पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग अब भी इंसान के द्वारा पूरी तरह जाना-समझा नहीं गया है । अंटार्कटिका क्षेत्र भी उन्हीं भागों में से एक है ।
    कहने की ज़रूरत नहीं कि अंटार्कटिका एक ऐसा भूभाग है, जो अपने अद्भुत सौंदर्य, स्वच्छ वातावरण, शुद्ध जल के अकूत  भंडार की वजह से हमेशा से वैज्ञानिको और पर्यावरणविदों के आकर्षण का केंद्र रहा है । समय-समय पर पूरे विश्व से वैज्ञानिको के दल वहां जाकर शोध और अध्ययन करते रहते है । कई देशों ने वहाँ अपने स्टेशन भी स्थापित किए हैं । गर्व की बात है कि इस मुहिम से भारत भी किसी से पीछे नहीं है ।
    भारतीय वैज्ञानिकों के अनेक दल कई बार अंटार्कटिका जाकर यहीं के वातावरण पर शोध करते रहे है । ऐसे ही अंटार्कटिका अभियान दलों में तीन बार डॉ० हृदयनाथ दत्ता और दो बार डॉ० जसवंत सिंह भी शामिल होकर कई शोध-कार्यों में हिस्सा ले चुके है । लगभग दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी उन अद्भुत यात्राओं के संस्मरणों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करने की इच्छा जाहिर की; लेकिन उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों और वहाँ की विशेषताओं को उन्होंने लिपिबद्ध तो कर दिया है, लेकिन पुस्तक के रूप में आने से पहले इसके संपादन की आवश्यकता है । फलस्वरूप यह जिम्मेदारी उन्होंने मुझे सोप दी । पुस्तक के संपादन के दौरान मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इसमें वैज्ञानिकता के साथ ही रोचकता भी बनी रहे । इस प्रयत्न में मैं कहाँ तक सफल हुआ यह तो पाठक ही तय करेंगे, लेकिन इतना निश्चित है कि यह पुस्तक अंटार्कटिका को जानने-समझने और उससे जुडे असंख्य रोचक तथ्यों से परिचित कराएगी । साथ ही भविष्य में उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय खतरों के प्रति आगाह भी करेगी ।
    -विज्ञान भूषण
  • Chune Huye Nibandh (Paperback)
    Hazari Prasad Dwivedi
    60

    Item Code: #KGP-7067

    Availability: In stock

    चुने हुए निबंध 
    'चुने हुए निबंध' हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के निबंधों का अद्वितीय संग्रह है। इस संग्रह में द्विवेदी जी के सभी प्रकार के निबंधों को संकलित किया गया है। इस संकलन में शोधपरक निबंध, ललित निबंध दोनों ही हैं। विशेषकर द्विवेदी जी के निबंधकार रूप का एक समग्र चित्र यह संकलन प्रस्तुत करता है। 
    संकलन  में सम्मिलित निबंध इस प्रकार हैं :
    अशोक के फूल / कुटज / देवदारु / आम फिर बौरा गए ! / नाख़ून क्यों बढ़ते हैं ? / मेरा कांचनार / ठाकुर जी की बटोर / व्योमकेश शाश्त्री उर्फ़ हज़ारीप्रसाद द्विवेदी / मेरी जन्मभूमि / घर जोड़ने की माया / हिमालय [1 ] / अंधकार से जूझना है /  भाषा, साहित्य और देश / मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है / साहित्य की संप्रेषणीयता / क्या निराश हुआ जाय / कबीर के मूल वचन / भीष्म को क्षमा नहीं किया गया ! / रामचरितमानस / बरसो भी ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra (Paperback)
    Govind Mishra
    90

    Item Code: #KGP-7229

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गोविन्द मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'जनतंत्र', 'फांस', 'सिर्फ इतनी रोशनी', 'सुनंदो की खोली', 'खुद के खिलाफ', 'युद्ध', 'खाक इतिहास', 'पगला बाबा', 'वरणांजलि' तथा 'मायकल लोबो' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Arvacheen Kavya-Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    30

    Item Code: #KGP-950

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya (Paperback)
    Ravindra Kalia
    120

    Item Code: #KGP-430

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रवीन्द्र कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Vyangya Samay : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    225

    Item Code: #KGP-7227

    Availability: In stock

    हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य के शीर्ष रचनाकार के रूप में व्यापक स्वीकृति प्राप्त कर चुके हैं। कथा साहित्य में जो स्थान मुंशी प्रेमचंद का है, व्यंग्य साहित्य में वही प्रतिष्ठा परसाई की है। व्यंग्य को उन्होंने ‘विधिवत विधा’ के रूप में अंगीकार किया। अन्यान्य विधाओं के  बीच व्यंग्य ने जो अकूत यश प्राप्त किया है उसके मूल में परसाई का बहुविधा लेखन ही है। व्यंग्य लेखन के लिए अनिवार्य विशेषताएं उनके व्यक्तित्व में सहज विद्यमान थीं, अपने अनुभव-अध्ययन और अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने विशेषताओं को क्षमता में रूपांतरित किया। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते हुए उन्होंने तात्कालिक मुद्दों पर भी व्यापक सोच के साथ लिखा। आज यह देखकर किसी को आश्चर्य हो सकता है परसाई ने तत्कालीन राजनीति का कितना सघन व तार्किक विश्लेषण अपने लेखन में किया है। राजनीति, समाज, धर्म, संस्कृति, अर्थ आदि के भीतरी स्याह- सफेद का जितना बोध परसाई को था वह बहुत कम लेखकों में संभव हुआ है। किसी लेखक में ‘साहस’ किस सीमा तक सक्रिय हो सकता है, इसके उदाहरण परसाई हैं। अपने मित्र मुक्तिबोध की बात उनके हृदय में सहज समाई थी कि अभिव्यक्ति वेफ खतरे उठाने ही होंगे। स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज और उसके अंतर्विरोधों की पड़ताल करता परसाई का व्यंग्य लेखन हिंदी गद्य साहित्य की स्थायी निधि है। लेख, स्तंभ, कहानी, लघु उपन्यास आदि के रूप में उनकी रचनाएं एक जीवन दर्शन बनकर हमारे साथ चलती हैं।
  • Thus Spake Lord Krishna (Paperback)
    Shiv K. Kumar
    99

    Item Code: #KGP-1182

    Availability: In stock

    Only he whose hands are steady on the steering wheel of his mind and body and is in full control of his desires, can carry the wisdom's mark on his forehead. To such an enlightened mind, the darkness of the night glows like a sunlit day, dark ignorance yielding to bright knowledge. Nothing can hoodwink his all-perceiving eyes. A genuine saint is such a man blessed by the Gods.
    Like the deep sea, he absorbs an insurgent flood but does not let its shore-line be deflected. It welcomes rivers from all directions but is not overwhelmed by them—its underworld remains undisturbed because its centre can always hold.
    So, O blessed Prince, throw away the yoke of your impulses, their oppressive burden, regaining your suzerainty over them. Disengage yourself from man's prime infirmities—his ego and passion.
    This, O Prince, is the only way to merge into God, the individual soul's union with the Oversoul. Once you are up there on the heights, you will never slide down to the dark valley below. It will then be the same for you—living or dying, waking or dreaming, gaining or losing.
    This is what the sages call Moksha—release from the bondage of birth and death—basking forever in the sunshine of Life Divine, of peace eternal.
  • Isro Ke Rocket Evam Unki Vikas Sanskriti (Paperback)
    Dr. Suresh Chandra Gupta
    250

    Item Code: #KGP-582

    Availability: In stock

    भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जैसी उपलब्धि, देश में अन्य क्षेत्रों में कम ही दिखाई पड़ती है । ऐसा क्यों ?  प्रश्न स्वाभाविक है। वास्तव में, पूर्ण उत्तर लिए एक गंभीर खोज और अध्ययन की आवश्यकता है । लेखक का मानना है कि कार्य-संस्कृति की कमियां इसके प्रमुख कारण हैं । हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम ने इस तथ्य को समझा और उसके निराकरण का भरपूर प्रयत्न किया, और फलस्वरूप एक प्रभावी कार्य संस्कृति का आविर्भाव हुआ । लेखक के अनुसार, इस संस्कृति का विवरण देना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि रॉकेट विज्ञानं की चर्चा करना, क्योंकि, देश की प्रगति के लिए सभी कार्यक्रमों की सफलता अत्यावश्यक है और उसके लिए एक प्रभावशाली कार्य संस्कृति को अपनाना होगा । ऐसी एक कार्य संस्कृति का विवरण देना भी इस पुस्तक का उद्देश्य है । संक्षेप में, मानव संसाधन को संजोना, सामर्थ्य प्रदायक वातावरण निर्माण करना, पुरे देश को भागीदार बनाना तथा गुणता एवं विश्वसनीयता पर पूरा ध्यान देना, इस कार्य संस्कृति के मुख्य अंग हैं । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rabindra Nath Thakur (Paperback)
    Rabindra Nath Thakur
    90

    Item Code: #KGP-7013

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अनधिकार प्रवेश', 'मास्टर साहब', 'पोस्टमास्टर', 'जीवित और मृत', 'काबुलीवाला', 'आधी रात में', 'क्षुधित पाषाण', 'अतिथि', 'दुराशा' तथा 'तोता-कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jeevanopayogi Jari-Bootiyan (Paperback)
    Dr. Rajiv Sharma
    180 144

    Item Code: #KGP-7069

    Availability: In stock

    जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ 
    जड़ी-बूटियाँ शब्द सुनते ही हमें लगना है कि सुदूर जंगल में पहुँचकर कुछ पेड़-पौधों की खोज करनी पडेगी, जबकि हमारे आसपास दैनिक उपयोग की इतनी वनस्पतियां  मौजूद है कि उनके द्वारा सामान्य रोगों का उपनार हम स्वयं घर पर ही आसानी से कर सकते है ।
    तुलसी, लहसुन, अश्वगंधा, अशोक, अर्जुन. हींग, बिल्व (बेल), कनेर, मुलहठी, त्रिफला, सौंठ, कुकरौंदा, शिलाजीत, आँवला नीम, महुआ, हुरहुर, अरण्ड, सर्पगंधा, अमलतास आदि सैकडों जड़ी-बूटियाँ हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी हैं और आसानी ये उपलब्ध भी ।
    प्रस्तुत पुस्तक में प्रख्यात चिकित्साविज्ञ ने लगभग ढाई सौ उपयोगी जड़ी-बूटियों के गुणों, उपयोग तथा उनकी प्रकृति आदि के बारे में विस्तार से बताया है । पुस्तक को संपूर्ण सूचनाप्रद बनाते हुए सैकड़ों जड़ी-बूटियाँ के चित्र भी पुस्तक में ममाहित किए गए है ।
    निस्संदेह, यह पुस्तक आम पाठक के लिए तो स्वास्थ्य-रक्षा व घरेलू नुस्खों को जानने की दृष्टि से उपयोगी है ही, जिज्ञासु पाठकों की ज्ञान-पिपासा को संतुष्ट करने में भी सक्षम है, क्योंकि इसमें ज़डी-बूटियों के बारे में अत्यंत  सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है । कहना न होगा कि निजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए तो यह अनिवार्य ग्रंथ है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen, Kuchh Purush (Paperback)
    Khushwant Singh
    100

    Item Code: #KGP-1458

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 3 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7061

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Vastunishth Hindi (Paperback)
    Pooran Chand Tandon
    180

    Item Code: #KGP-7028

    Availability: In stock

    आज वर्तमान समय दौड़ का समय है जहाँ स्पर्धा है, प्रतियोगिता है जिनके चलते सभी विषयों के रूप-उपरूप उनके ही अनुरूप गढ़ा जाने लगा है । यदि आज की प्रतियोगी परीक्षाओं पर दृष्टपात करे तो हम पाते हैं कि विभिन्न परीक्षा-संस्थाओं द्वारा परीक्षार्थी के ज्ञान को मापने के लिए कुछ नए सूत्र ईजाद किये गए है, जिसके अंतर्गत वे कम से कम समय में प्रतिभागी के सकल ज्ञान की परीक्षा ले लेना चाहते हैं । 'कर्मचारी चयन आयोग' हो अथवा 'संघ लोक सेवा आयोग' सभी आज आधुनिक रीति से ज्ञान की परीक्षा ले रहे हैं जिसमें वस्तुनिष्ठ प्रश्नों द्वारा परीक्षा लेना रामबाण सिद्ध हुआ भी है । इसके माध्यम से परीक्षार्थी के समग्र ज्ञान की परीक्षा कुछ ही समय में हो जाती है । वस्तुनिष्ठ प्रश्न व्यवस्था वास्तव में है क्या ? इस पद्धति के अंतर्गत जो भी प्रश्न पूछा जाता है उस प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर होते हैं । उन चारों उत्तरों में से एक ही उत्तर सही होता है । परीक्षार्थी को उस सही उत्तर का चयन करना पड़ता है । 
    स्तर की गरिमा तथा विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण हिंदी साहित्य, काव्यशास्त्र तथा भाषा-विज्ञान से ऐसे प्रश्नों को चुना है जो की परीक्षा एवं ज्ञान दोनों की दृष्टि से सहायक हों । वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के अतिरिक्त अंत में तथ्यात्मक पक्ष के अंतर्गत विद्यार्थियों की सुविधा हेतु प्रश्नों एवं उत्तर को भी आमने-सामने रख गया है । इससे विद्यार्थी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का ज्ञानार्जन तो कर ही सकेंगे, साथ  ही कुछ अन्य तथ्यात्मक पहलुओं से भी अभिज्ञ हो सकेंगे ।
  • Gazal : Ek Safar (Paperback)
    Noornabi Abbasi
    200

    Item Code: #KGP-465

    Availability: In stock

    ग़ज़ल: एक सफ़र
    उर्दू कविता की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा ग़ज़ल है। भारत में इसकी परंपरा लगभग पाँच सदियों से चली आ रही है। ‘वली’ दकनी इसका जनक माना जाता है। ग़ज़ल की जब शुरुआत हुई तो वह सौंदर्य और प्रेम (हुस्न-ओ-इश्क़) तक ही सीमित थी, लेकिन समय के साथ-साथ इसका दामन भी विस्तृत होता गया। फलस्वरूप, आज जीवन का कोई ऐसा विषय नहीं, जो ग़ज़ल में सफलतापूर्वक पेश न किया जा सकता हो, बल्कि पेश न कर दिया गया हो।
    उर्दू में ग़ज़ल की लोकप्रियता के बावजूद इस विधा का अनेक कवियों और आलोचकों ने विरोध किया। किसी को इसमें ‘संडास की बदबू’ महसूस हुई तो दूसरे ने इसे ‘अर्ध- सभ्य काव्यांग’ की संज्ञा दी और तीसरे ने तो इसकी ‘गर्दन उड़ाए जाने’ का फ़तवा भी सुना दिया। लेकिन इन प्रहारों से ग़ज़ल का पौधा न कुम्हलाया और न ही सूख पाया, बल्कि इसकी महक यथावत् बनी रही और आज भी फैली हुई है।
    कुल मिलाकर प्रस्तुत संकलन का ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व तो है ही। आशा है, उर्दू कविता के प्रेमियों में हमारे इस प्रयास का स्वागत होगा।
    ग़ज़ल की लोकप्रियता का एक कारण इसका विशिष्ट विषय प्रेम या इश्क़ रहा है और प्रेम-भाव वह है, जिससे कोई दिल ख़ाली नहीं। दूसरा यह कि ग़ज़ल के शे’र आसानी से याद हो जाते हैं और समयानुसार उनको पेश किया जा सकता है, ठीक उसी तरह, जैसे हिंदी में दोहे उद्धृत किए जाते हैं। वैसे तो उर्दू में क़सीदा, मर्सिया और मसनवी भी हैं, रुबाइयाँ और नज़्में भी लिखी जाती हैं, लेकिनग़ज़ल का अपना स्थान है।
    प्रस्तुत संकलन में सत्रहवीं सदी से अब तक यानी चार सदियों के लंबे समय में हुए लगभग डेढ़ सौ शायरों की ग़ज़लें प्रस्तुत की गई हैं। आशा है, उर्दू-प्रेमी हिंदी पाठकों में इसका यथेष्ट स्वागत होगा।
  • Jhansi Ki Rani (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7091

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Paperback) (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    600

    Item Code: #KGP-912

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खंड)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है। इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। आशा है, पाठक इस ग्रंथ को तत्काल प्रकाशित देखना चाहेंगे और अपने पुस्तकालय में अग्रणी स्थान देंगे।
    —परमानंद श्रीवास्तव (भूमिका से)
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastva (Paperback)
    Jitendra Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7018

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
  • Naamdev Rachanavali (Paperback)
    Govind Rajnish
    90

    Item Code: #KGP-1493

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar (Paperback)
    Vishnu Nagar
    100

    Item Code: #KGP-1390

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।


  • The Growing Years (Self-Help) (Paperback)
    Ann Delorme
    195

    Item Code: #KGP-340

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maitreyi Pushpa (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    180

    Item Code: #KGP-431

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : मैत्रेयी पुष्पा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फैसला', 'तुम किसकी हो बिन्नी', 'उज्रदारी', 'छुटकारा', 'गोमा हँसती है', 'बिछुड़े हुए', 'पगला गई है भागवती', 'ताला खुला है पापा', 'रिजक' तथा 'राय प्रवीण' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 2 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7060

    Availability: In stock


  • Jeet Ki Raah (Paperback)
    Swed Marten
    100

    Item Code: #KGP-1312

    Availability: In stock