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  • Gareeb Mahilayen Udhar Evam Rozgaar
    Indira Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-37

    Availability: In stock

    भारत में गरीबी की समस्या प्रबल है और गरीबी की मार महिलाओं पर अधिक सीधी और तीखी होती है, क्योंकि महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती हैं। वे मातृत्व का भार वहन करते हुए शरीर से दुर्बल होती हैं, यद्यपि उनमें भावनात्मक इच्छाशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। गरीबी को दूर करने के लिए केंद्रीय तथा प्रदेश सरकारें, स्वायत्त संस्थाएं तथा अन्य कई प्रकार की एजेंसियां कटिबद्ध हैं, किंतु यह समस्या अभी तक कारगर ढंग से सुलझाई नहीं जा सकी। गरीब तथा ग्रामीण महिलाएं अक्सर अचल संपत्ति-विहीन और शिक्षा के लाभ से वंचित होती हैं। फिर भी उनके अंदर रचनात्मकता तो होती ही है तथा अपनी मदद स्वयं करने के लिए भी वे सतत उत्सुक होती हैं।
    ऐसी महिलाओं की, जो स्वयं की छोटी सी दूकान खोलना या कोई अन्य छोटा-मोटा रोजगार करना चाहती हैं, कर्जे की आवश्यकता बहुत ज्यादा नहीं होती। दूसरी आजमाई हुई बात यह है कि महिला उतना ही ऋण लेना पसंद करती है जितने को किस्तों में लौटा भी सके। किंतु इस सबके बावजूद कोई भी वित्तीय संस्था एकाएक उसे कोई ऋण देने की स्थिति में नहीं होती।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे विषय सामान्य नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा बैंककर्मियों आदि के समक्ष स्पष्ट किए गए हैं।
  • Vichaar-Yaatra : Lal Krishna Advani
    Lal Krishna Advani
    245 203

    Item Code: #KGP-860

    Availability: In stock


  • Gujrat : Sahakarita, Samaj Seva
    Neelam Kulshreshtha
    420 357

    Item Code: #KGP-599

    Availability: In stock

    गुजरात गांधी जी, सरदार पटेल, विक्रम साराभाई परिवार, अमूल डेरी, अपनी सहकारिता व औद्योगिक प्रगति के कारण जाना जाता है लेकिन ये बड़े-बड़े नाम हैं । समाज के उत्थान के लिए अनेक लोग अपनी आत्मा में नन्हे-नन्हे दीप संजोए बैठे हैं, गांधी जी के व साहित्यिक मूल्यों को अपने जीवन में जीते हुए । यदि अन्य प्रदेश प्रगति करना चाहते हैं तो इस समृद्धतम प्रदेश गुजरात से संबंधित निम्न बिंदुओं का विश्लेषण करें जिनसे समाज के भौतिक ही नहीं ,मानवता के विकास के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
    ० वडोदरा के महाराजा सयाजीराव तृतीय के शासनकाल की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की जा सकती है। उनकी दी हुई परंपरा के कारण ये शहर 'कलाकारों का मक्का' कहलाता है। लेखिका इसे 'सिटी ऑफ इंटरनेशनल 'सोल्स' कहती हैं ।
    ० गांधी जी की प्रेरणा से भारत  द्वितीय महिला संगठन  'ज्योति संग' की स्थापना हुई व सन् 1920 में एक स्त्री अनुसूइया साराभाई ने टेक्सटाइल मिल की भारत की सर्वप्रथम सबसे वृहद ट्रेड यूनियन संगठित की ।
    ० विश्व भर में लोकप्रिय होती जा रही लोक अदालत को  श्री हरिवल्लभ पारिख ने रंगपुर (क्वांट) स्थित आनंद  निकेतन आश्रम में जन्म दिया  ।
    ० मैग्सेसे पुरस्कार विजेता इला भट्ट की 'सेवा' संस्था सेल्फ एम्प्लॉयड वीमन एसोसिएशन आज़ भी अपनी तरह की विश्व की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है । 
    ० विश्व में संभवतः एकमात्र उदाहरण है यहाँ के शहरों व गांवों में फैला पुस्तकालयों के नेटवर्क का संगठन 'गुजरात पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल' ।
    ० एशिया में सहकारी बैंक अन्योन्य बैंक, महिला सहकारी बैंक व उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करने वाली जागृत ग्राहक संस्था सर्वप्रथम यहीं संगठित हुई ।
    ० डॉ. जी. एम. ओझा ने भारत ही नहीं, एशिया में भी पर्यावरण संरक्षण की संस्था 'इनसोना' सन् 1975 में यहीं स्थापित की ।
    ० श्री सूर्यकांत पटेल का चालीस एकड़ जमीन में बनाया विश्वविख्यात फार्महाउस वडोदरा में है। 
    ० भारत में महाराष्ट्र में दो, सिर्फ गुजरात में ही तीन स्टॉक एक्सचेंज हैं जहाँ सभी राज्यों से अधिक पैसे का निवेश होता है ।
    ० विकलांगों द्वारा संस्था बनाकर विकलांगों की सहायता के उदाहरण अन्य प्रदेशों में दुर्लभ हैं । 
    ०  'गुजराती नी गजी नो तडियो भा तो नथी' इस कहावत का अर्थ जानिए इस पुस्तक से ।
    ० अस्मिता : गुजरात से एक साहित्यिक आंदोलन' इस पुस्तक से जानिए क्यों 'एक्सेल गुप्त इंडस्ट्रीज' में  प्रबंधन व मज़दूरों का कभी झगड़ा नहीं हुआ ।
    ० विश्यविख्वात आर्कीटेक्ट कर्ण ग्रोवर, जिनके हैदराबाद में बनाए सोहराबजी ग्रीन बिजनेस सेंटर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ग्रीन बिल्डिंग घोषित किया गया है, व उनके साथियों द्वारा स्थापित हेरिटेज ट्रस्ट के प्रयासों से चांपानेर को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है । ग्रोवर जी की नई उपलब्धि है कि उनकी बनाई बी एन एमरो बैंक को भी विश्व की पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ इमारत घोषित किया गया है । 
    ० यदि किसी शहर का उत्थान करना है तो वडोदरा की स्वयंसेवी  संस्थाओं ‘बड़ौदा सिटिजंस काउंसिल' व 'यूनाइटेड वे ऑफ बड़ौदा' को समझना होगा ।
  • Gorakhdhandha
    Jaivardhan
    160

    Item Code: #Kgp-gd

    Availability: In stock


  • Jansampark : Avadharana Evam Badalata Svaroop
    Kri. Shi. Mehta
    250 225

    Item Code: #KGP-297

    Availability: In stock

    जनसंपर्क, जनसंचार का एक ऐसा घटक है जो एक ओर तो जनसंचार को जीवंत रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्रभाव अथवा परिणाम के संबंध में विषय विशेषज्ञ भी कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते। उसके इस अनिश्चित चरित्र का प्रमुख कारण जनसंपर्क के भागीदार त्रिमूर्ति के बीच विचित्र संगम, समन्वय एवं संप्रेक्षण के अभाव में निहित है। जनसंपर्क वह सूत्र है जो इस त्रिमूर्ति-यानी संदेश, माध्यम तथा हितग्राही को सक्रिय करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता है। आज तक किसी ऐसे नियम या मंत्र की खोज नहीं हो पाई है जो जनसंपर्क के प्रभाव ओर उसके परिणाम की सफलता अथवा असफलता का पूर्वानुमान लगा सके।
    जनसंपर्क निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उस देश की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक परंपरा, संस्कृति, स्थानीय बोलियां एवं भाषा, सामाजिक एवं धार्मिक आचार-विचार, स्थानीय मान्यताओं इत्यादि अनेक बातों तथा घटनाओं का प्रभाव उस परिवेश की त्रिमूर्ति पर निरंतर प्रतिबिंबित होता रहता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से यह जनसंपर्क के अनिश्चित चरित्र के कारण हो सकते हैं।
    आज एक ओर मीडिया के आधुनिक उपकरणों ने अनायास ही जनसंपर्क के सर्वथा नए द्वार खोल दिए हैं और भविष्य में भी ऐसे अनेक द्वार खुलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर भारत की तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के साथ शैक्षणिक विकास ने हितग्राहियों की रुचि, सामाजिक जीवन एवं संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचा रखी है।
  • Hindi Natya-Kavya : Punarmoolyankan
    Hukum Chand Rajpal
    250 225

    Item Code: #KGP-856

    Availability: In stock

    हिन्दी नाट्य-काव्य: पुनर्मूल्यांकन
    प्रस्तुत आलोचना-ग्रंथ में लेखक ने ‘अंधायुग’, ‘संशय की एक रात’, ‘एक कण्ठ विषपायी’ तथा ‘एक प्रश्न मृत्यु’ सरीखी कृतियों के रूपाकार-विधा की चर्चा सविस्तार की है। ऐसी रचनाओं को एक साथ प्रबंध-काव्य, नाटक, गीति नाट्य, पद्य नाटक, काव्य नाटक तथा नाट्य-काव्य आदि नामों से विवेचित-विश्लेषित करना विचित्र प्रतीत होता है। लेखक ने नाट्य-काव्य विधा की सैद्धान्तिक चर्चा करते हुए कविता और नाटक दोनों विधाओं के सुमेल पर आधारित इस नवीन एवं सार्थक विधा की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि ऐसी रचनाएँ कोई स्थापित कवि ही कर सकता है, जिसे नाटकीय विधान की सही समझ हो। इसमें दोनों साहित्य-विधाओं की सम्यक् एवं सहज प्रस्तुति अपेक्षित है। यही कारण है कि धर्मवीर भारती को इस विशिष्ट विधा का प्रथम सफल रचनाकार स्वीकार किया गया है। लेखक की स्पष्ट धारणा है कि ऐसी कृतियाँ एक विशिष्ट मानसिकता पर आधारित होती हैं—इनकी रचना-प्रक्रिया के अनेक सोपान एवं पड़ाव होते हैं—काव्यात्मकता इसका मूलाधार है तथा नाटकीयता इसका बाह्य विधान। ये इसे अधिक ग्राह्य एवं प्रभावोत्पादक बनाते हैं। इस ग्रंथ में पहली बार नाट्य-काव्य, संश्लिष्ट नाट्य-काव्य (लम्बी कविता) और रंग-काव्य सरीखी रचनाओं के अन्तर्सम्बन्धों को सोदाहरण रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। अपनी धारणाओं-स्थापनाओं को प्रामाणिक-तार्किक आधार प्रदान करने हेतु शोध-प्रविधि के नियमों की सटीक प्रस्तुति के साथ ही इस विधा के सभी विद्वानों की चर्चा यथास्थान की गई है। लेखक की विशिष्टता इस बात में है कि वे स्थापित समीक्षकों के साथ ही नवोदित रचनाधर्मियों का उल्लेख एवं उन्हें महत्त्व प्रदान करने में उदार रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथ से इस विवादास्पद विधा को सही धरातल पर समझने का मार्ग प्रशस्त होगा। 
  • Pustak Ki Niyati
    Dr. Pravesh Saxena
    400 320

    Item Code: #KGP-PKN

    Availability: In stock

    इक्कीसवीं सदी के इस साइबर युग में जबकि इंटरनेट, किंडल, ई-बुक आदि का प्रचलन बढ़ता जा रहा है तो पुस्तक के भविष्य को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है। क्या होगा मुद्रित पुस्तक का भविष्य? क्या वह अज़ायबघर की एक वस्तु बनकर रह जाने वाली है? फिर पुस्तक की नियति के बारे में और भी प्रश्न मन में घुमड़ने लगते हैं? कैसे वह अस्तित्व में आई, कैसे मनुष्य ने लिखना सीखा, प्रथम पुस्तक प्रस्तर पर लिखी गई या भोजपत्र पर, काग़ज़   कब, कहाँ से आया? आदि-आदि। प्रथम मुद्रित पुस्तक किस भाषा में थी, क्या नाम था  उसका? अर्थात् ‘पुस्तक की नियति’ को लेकर उसके ‘कल, आज और कल’ से संबंधित प्रश्न अगणित हैं। पुस्तक के जन्म और विकास की गाथा के सूत्र जहाँ एक साथ मिल सकें-ऐसी कोई ‘पुस्तक’ पुस्तक पर नहीं मिलती है। डॉ. प्रवेश सक्सेना ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक शोधकार्य करके इन सूत्रों को एकत्रित करने का प्रयास किया है। उनका यह कार्य भारतीय और वैश्विक दोनों संदर्भों में ‘पुस्तक की नियति’ को जानने-समझने की कोशिश है।
    पुस्तक के मूल, उसके लेखक, पाठक और यहाँ तक कि लेखन सामग्री और पुस्तकालयों तक पर विस्तार से चर्चा इस  पुस्तक   में की गई है। ई-बुक का चमत्कारपूर्ण संसार यहाँ वर्णित है तो समय-समय पर विद्वानों द्वारा पुस्तक के महत्त्व के विषय में टिप्पणियाँ भी यहाँ संगृहीत हैं। पुस्तक को लेकर संस्कृत और हिंदी की कुछ कविताएँ भी संकलित की गई हैं। बहुत ही रोचक अंदाज़ में लिखी गई इस पुस्तक में पुस्तक से संबद्ध कुछ रोचक तथ्य भी मौजूद हैं। कुल मिलकर कहें तो यह ‘पुस्तक’ इस क्षेत्र में एक बड़े शून्य को भरती है। लेखिका पूर्णतः आशावादी हैं ‘पुस्तक की नियति’ के बारे में। पुस्तक थी, है और हमेशा रहेगी।
  • Bhartiya Vangmay Per Divyadrishti
    Kashiram Sharma
    400 300

    Item Code: #KGP-9137

    Availability: In stock

    भारतीय वाड्मय का एक बहुत बड़ा भाग चार महास्तंभों पर आरित है। वे हैं: रामायण, पुराण और बड्ढकहा (बुहत्कथा)। सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकारों ने आदिकाव्य रामायण, जयकाव्य महाभारत और पुराणों को अपना उपजीव्य बनाया है। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पर्याप्त वाड्मय ‘बड्ढ कहा’ पर भी आश्रित है। अतः इन चार महास्तंभों का सम्यक् परिचय प्राप्त किए बिना भारतीय वाड्मय का सुचारु अध्ययन संभव नहीं है। इस बात को तो लोग प्रायः स्वीकृत कर लेते हैं कि भारतीय वाड्मय भवन का बहुत बड़ा भाग इन चार स्तंभों पर टिका है पर ये महास्तंभ किस ‘घातु’ के बने हैं, यह जानारी बहुत ही कम लोगों को है। इस पुस्तका में उस धातु का परिचय कराने का विनम्र प्रयास है। वह धातु क्या है और उसका उद्गम स्थान कहा हैं, यह भी बताने का प्रयास किया गया है।
  • Mannu Bhandari : Srijan Ke Shikhar
    Sudha Arora
    550 440

    Item Code: #KGP-801

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
    हिन्दी साहित्य का समृद्ध करने में जिन कथा-लेखिकाओं  का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी उनमें एक अग्रणी नाम हैं । पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय मन्नू भंडारी हिंदी भाषा के साथ-साथ अनेक देशी-विदेश भाषाओं में एक से आदर-सम्मान के साथ पढी जाने वाली रचनाकार हैं ।
    मन्नू भंडारी के दो उपन्यास 'आपका बंटी' और  'महाभोज' हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर और सृजनात्मकता शिखर पर प्रतिष्ठित हैं । ये दोनों  उपन्यास अपने समय से आगे की कहानी कहत्ते और एक लंबे कालखंड का सच होने के कारण कालजयी उपन्यास, की श्रेणी में आते हैं ।
    मीडिया लेखन में भी मन्नू जी की पटकथाओं ने और  धारावाहिकों में 'रजनी' ने अपनी धाक जमाई । मन्नू  जी  व्यक्तित्व व रचनात्मक पक्ष  सभी कोणों का इस  पुस्तक में विश्लेषण है।
    एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी मन्नू जी का जीवन एक दृढ़ और जिजीविषा की अद्भुत  मिसाल हैं । हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में पहले एक पग्म स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं. जो पहली  ही मुलाकात में आपका बनावट आया दिखावट से पर अपने आत्मीय घेरे में  ले लेता है   ।
    बंगाल की सर्वाधिक लोकप्रिय लेखिका और  सामाजिक कार्यकर्ता महास्वेता देवी से लेकर ? वरिष्ट चिंतक-समीक्षक नामवर सिंह, निर्मला जैन, राजेद्र यादव, गिरिराज किशोर, विश्वनाथ त्रिपाटी, विजयमोहन सिंह, अजितकुमार, देवेंद्रराज अंकुर, स्वयं प्रकाश, राजी सेठ, अर्चना वर्मा तथा मन्नू जी का करीब से जानने वाले उनके अध्याय स्वजनों ने अपने वक्तव्यों, आलेखों और  विश्लेषण से इम पुस्तक को समृद्ध बनाया है । आशा है  पाठकों की कसौटी पर भी यह पुस्तक खरी उतरेगी ।
    -सुधा अरोड़ा
  • Zane Ajeeb : Nasera Sharma
    Prem Kumar
    275 248

    Item Code: #KGP-281

    Availability: In stock

    ज़ने अजीब : नासिरा शर्मा
    अपनी मनबसी नामी-गिरामी शख़्सियतों के बारे में बहुत कुछ—ख़ूब-ख़ूब जान लेने की चाहत सबमें होती है। पसंदीदा के प्रभाव के बढ़ते-गहराते जाने के क्रम में एक बिंदु वह भी आता है, जब यह चाहत कसकता-सा एक जुनून तक बन जाती है। उस अपने मनभावन के अंदर- बाहर-आसपास से जुड़ी हर छोटी-छिपी बात जानने-सुनने के लिए हम उत्कर्ण-उत्कंठ हो उठते हैं। अगर वह मनभावन कोई कलाकार-साहित्यकार है तो स्थिति और भी विकट एवं दिलचस्प हो जाती है। उसकी रचनाओं के पात्रों, घटनाओं, चित्रों, कथनों के आधार पर हम अपनी- अपनी तरह से उसके निज—नितांत निज की दुनिया की अजब-ग़ज़ब तस्वीरें बनाने लगते हैं—बनाते रहते हैं।
    लेकिन जब कोई बड़ी शख़्सियत—नासिरा शर्मा जैसी लेखिका—अपने स्वभाव, अनुभवों, संवेदनाओं, संबंधों, मान्यताओं, विचारों, अभावों, आघातों, संघर्षों, प्राप्तियों...उससे भी अहम यह कि अपने पात्रों, सरोकारों, इरादों एवं रचित-संभावित रचनाओं के बारे में सहज, स्पष्ट, उत्सुक भाव से रचना करने की तरह कहे-बताए...तो...तो यह पाठक, रचना और साहित्य की दृष्टि से विशिष्ट, उपयोगी और मूल्यवान हो जाता है। तब और भी अधिक—जब हम नासिरा जी के पास-साथ होने के उन क़रीबी क्षणों में यह जानें-महसूस करें कि इस लेखिका के जीने-लिखने-सोचने का अंदाज़ और सोच का आसमान एकदम अलग भी है एवं व्यापक व विराट् भी।
    किसी कलाकार की सृष्टि व कलाकारिता की वीथियों-अमराइयों में उसके साथ चल, गुज़र, देख, सुन, जान पाना अपने आप में भिन्न, सुखद, अधिकतम प्रामाणिक और बेहतरीन क़िस्म का अनुभव होता है। ऐसे इस अनुभव का अहसास-भर पाठक को कराने की मुन्नी-सी एक ख़्वाहिश और कोशिश है यह—ज़ने अजीब: नासिरा शर्मा।
  • Jangal Ke Jeev Jantu
    Ramesh Bedi
    450 360

    Item Code: #Kgp-jkjj

    Availability: In stock


  • Premchand : Jeevan, Kala Aur Krittwa
    Hansraj Rehbar
    400 320

    Item Code: #KGP-9288

    Availability: In stock

    प्रेमचंद का सारा जीवन संघर्षो में व्यतीत हुआ। वे डाकखाने के एक मामूली क्लर्क के बेटे थे। अर्थाभाव के कारण मैट्रिक बड़ी मुश्किल से पास किया। इसके उपरांत उन्हें जीविकोपार्जन में जुट जाना पड़ा। लेकिन उनमें विकास और उन्नति की जो एक भावना थी, ओ बढ़ने की जो एक उत्कृट अभिलाषा थी, उसने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया। वे जीवन-पर्यन्त परिस्थितियों से लड़ते और उनसे ऊपर उइने का सतत् प्रयत्न करते रहे। उन्हें आर्थिक और भौतिक सुख भोगना भले ही नसीब न हुआ, लेकिन अपने इस प्रयत्न से वे महान् लेखक बन गए। उन्होंने जनता के दुःख दर्द को स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी और बारीकी से उसका वर्णन किया। 
    निस्संदेह प्रेमचंद आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी साहित्यकार है, जिनकी प्रतयेक रचना भारतीय जन-जीवन का आइना है तथा हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।
    —इसी पुस्तक से...
  • Sahitya : Vividh Vidhayen
    Shashi Sahgal
    240 216

    Item Code: #KGP-755

    Availability: In stock

    साहित्य: विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    1200 996

    Item Code: #KGP-607

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खण्डों में)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है।
  • Shivani Ke Kathetar Sahitya Ka Saanskritik Adhyayan
    Sushil Bala
    700 490

    Item Code: #KGP-773

    Availability: In stock

    जिन कुछ लेखकों ने गद्य की विविध् विधओं में अपनी रचनाशीलता से हिंदी को समृद्ध व गौरवान्वित किया है उनमें शिवानी का नाम अग्रगण्य है। कहानीकार व उपन्यासकार के रूप में तो उन्होंने असंख्य पाठकों का मन मोहा ही; निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोकसाहित्य के द्वारा अनेक अनछुए-अनकहे व्यक्तियों-प्रसंगों-स्थानों की आंतरिकता व्यक्त की। स्वाभाविक है ऐसे रचनाकार के मूल्यांकन हेतु धैर्य, लगन और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। कहना न होगा कि सुशील बाला ने ‘शिवानी के कथेतर साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन’ पुस्तक में इन गुणों का परिचय देते हुए विषय का भलीभांति प्रतिपादन किया है। वे भूमिका में लिखती हैं, ‘शिवानी के कथेतर साहित्य में सामाजिक चेतना, नैतिक मान्यताएं, राजनीतिक परिदृश्य इत्यादि सभी बिंदुओं में परंपरागत और नवागत तत्त्वों का रेखांकन किया गया है। आधुनिक, राजनीतिक एवं आर्थिक यथार्थ कथेतर साहित्य का तीव्र स्वर है।’ पुस्तक छह अध्यायों में विभक्त है। इनमें क्रमशः शिवानी के निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोक साहित्य का विवेचन है। पुस्तक के प्रारंभ में शिवानी के कथेतर साहित्य का भलीभांति परिचय दिया गया है।
    पुस्तक की विशेषता यह है कि लेखिका ने उन उज्ज्वल पक्षों को खोज लिया है जो शिवानी के लेखन का आलोक हैं। पाठक सुपरिचित हैं कि वैसे तो शिवानी की रचनाशीलता का अनिवार्य चरित्र है सूक्तिप्रियता। वे वाक्यों का गठन इस तरह करती हैं कि वे सुभाषित में ढल जाते हैं। सुशील बाला ने इस तथ्य को समझते हुए शिवानी के कथेतर साहित्य का अवगाहन किया है। जैसे महाबलिपुरम की मूर्तिकला पर शिवानी लिखती हैं, ‘कौन कह सकता है कि ये सातवीं शताब्दी की बनी मूर्तियां हैं। लगता है अभी-अभी मूर्तिकार यहां से छेनी-हथौड़ी उठाकर विदा हुआ है।’ यह पुस्तक पढ़कर सहजरूपेण समझा जा सकता है कि कथेतर विधाओं में शिवानी का प्रदेय कितना महत्त्वपूर्ण है। अपनी अनूठी भाषा शैली से उन्होंने जो रचना-संसार निर्मित किया, उसका सांगोपांग विवेचन सुशील बाला ने यहां किया है। सामान्य पाठकों और अनुसंधनकर्ताओं के लिए समान रूप से उपयोगी पुस्तक।
  • Jotiparva
    Nag Nath Kottoplle
    350 315

    Item Code: #KGP-780

    Availability: In stock


  • Saundarya-Meemansa
    V.K. Gokak
    90

    Item Code: #KGP-9126

    Availability: In stock

    "सौंदर्य-मीमांसा" कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक डॉ० वी० के० गोकाक की कन्नड़ कृति 'काव्य-मीमांसे' का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में सौंदर्यशास्त्र पर यह अपने ढंग की पुस्तक होगी ओर निश्चय ही मोंदृवंशद्रस्व के अध्येताओं को इस पुस्तक से काफी सहायता मिलेगी । गोकाक ने विशेष भाषण-माला के अन्तर्गत सौंदर्यशास्त्र पर भाषण दिए थे । 'कला-स्वरूप', 'ध्वनि तथा प्रतिध्वनि', 'रस या जीवन-दृष्टि'–इन लेखों में लेखक ने भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना त्तत्वों के आधार पर विचार करके अपने मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । डॉ. गोकाक स्वयं कन्नड़ और अंग्रेजी के कवि, उपन्यासकार और श्रेष्ठ आलोचक हैं। गोकाक के पास जीवन का व्यापक अनुभव और अंग्रेजी साहित्य का अपार पांडित्य है । दार्शनिक मनोवृति से वस्तु को तटस्थ दृष्टि से देखकर उसके सत्य को परखने की जिज्ञासा उनमें है । इन लेखों में उन्होंने साहित्या, कला, धर्म के  तत्यों के आराधक होकर सौंदर्य के तत्तवों का साक्षात्कार किया है। नि:संदेह यह कृति भारतीय काव्यशास्त्र को लेखक की अमूल्य देन है। इस अनुवाद में यदि त्रुटियाँ मिल जाएँ तो समझिए यह मेरी कमजोरी है ।
    डॉ. टी. आर० भट्ट

  • Aadarsh Ghar-Parivaar Aur Mahilayen
    Sudha Gautam
    180

    Item Code: #KGP-187

    Availability: In stock

    'आदर्श घर-परिवार और महिलाएँ' पुस्तक में सुधा गौतम ने अपने अनुभवों के आधार पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी है, उनमें से कुछ शीर्षकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है, यह पुस्तक महिलाओं के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होगी :
    ० जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
    ० छोटी-छोटी बातों से न हो परेशान
    ० बाँधे रखें पति को
    ० कड़वी यादे भुला दें
    ० जब आप फोटो खिंचवाने जाएं
    ० आप और आपकी शारीरिक गठन
    ० आप और आपका परिधान
    ० आप और आपकी नींद
    ० वर्तमान में जीना सीखें
    ० यदि आपके घर में नौकर है
    ० आप और आपकी खरीदारी
    ० आप और आपके घर के कीड़े-मकोड़े
    ० आपकी बढती उम्र और आप
    ० बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए
    ० जब आप सफर पर जाएं
    ० जब आपके मेहमान आपके घर आएं
    ० आप और आपकी सेहत
    ० बच्चों के लिए नाश्ता 
    ० चमकदार त्वचा के लिए
    ० खूबसूरत होंठों के लिए
    ० त्वचा में निखार के लिए
    ० गर्मियों में आपका मेकअप
    ० मुँहासों से छुटकारा
    ० खूबसूरत बालों के लिए
    ० आपकी गर्दन रहे सुंदर
    ० धूप का चश्मा
    ० आप और आपके गहने
    ० आपके घर का फर्श
    ० महिलाएँ और रसोई
    ० आपके गरम कपडे
    ० कैसे छुड़ाएँ कपडों के दाग
    ० अपने बच्चों के मित्र बनिए
    ० जब बच्चा स्कूल जाने लगे
    ० जिद्दी बच्चा
    ० माँ-बेटी का रिश्ता
    ० बच्चे कैसे बनाएं अपनी अलग पहचान
    ० बच्चे अपना काम स्वयं करें
    ० बच्चे भोजन बेकार न करें
    ० शरारती बच्चों को कैसे सुधारें
    ० बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए
    ० जब आपका बच्चा आपसे दूर रहे
    ० छात्र और परीक्षा
    ० बच्चे कैसे रहें परीक्षा के दिनों में  तनावमुक्त
    ० कैसे लिखे प्रश्नों के उत्तर
    ० कैसे मिले परीक्षा में सफलता
    ० आपका कंप्यूटर
    ० आप और आपके छोटे बच्चे
    ० बच्चों की छोटी-मोटी तकलीफें
    ० घरेलू दवाइयाँ
    ० छोटी-छोटी काम की बातें

  • Shivani Ka Katha Sahitya Yug-Parivesh-Sanskriti Ka Sandarbh
    Sushil Bala
    1100 770

    Item Code: #KGP-743

    Availability: In stock

    कोई भी सक्षम रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से युग-परिवेश-संस्कृति की विभिन्न व विशिष्ट छवियां निर्मित करता है। इन छवियों में उसकी वैचारिकी तथा भावसंपदा समाहित होती है। शिवानी के प्रचुर कथा साहित्य को पढ़ते हुए इस तथ्य का अनुभव शब्द-शब्द में किया जा सकता है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘शिवानी का कथा साहित्य: युग-परिवेश- संस्कृति का संदर्भ’ में सुशील बाला ने अत्यंत लोकप्रिय लेखिका शिवानी के कथा-संदर्भ रेखांकित किए हैं। शिवानी अपनी परिनिष्ठित अभिरुचियों के लिए जानी जाती हैं। विशद वैदुष्य की गरिमा से आलोकित उनकी रचना-शैली एक अलग मार्ग का अन्वेषण करती रही। वे भारतीयता को समझकर उसे व्यापक मानवता के हित में व्याख्यायित करती रहीं। सुशील बाला ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही लिखा है कि ‘वे क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, जातिवाद, भाषावाद, सांप्रदायिकता जैसी देश को खंडित करने वाली नकारात्मक वृत्तियों का प्रबल विरोध कर सौहार्दपूर्ण वातावरण को उद्घाटित करती हैं।’ यह सच है कि शिवानी के कथा साहित्य में मानव मनोविज्ञान की उपस्थिति का विश्लेषण करते हुए उसमें सकारात्मक सोच के अनेक आयाम तलाशे जा सकते हैं। 
    चैदह अध्यायों में विभाजित प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने व्यवस्थित ढंग से शिवानी के व्यक्तित्व के नियामक तत्त्वों को रेखांकित करते हुए उनके रचना-परिवेश को उद्घाटित किया है। इसके पश्चात् उन्होंने शिवानी के कथा साहित्य (कहानी व उपन्यास) में पारिवारिक स्थिति, सामाजिक चेतना, नारी की स्थिति, राजनीतिक परिदृश्य, आर्थिक पक्ष, धर्मिक मान्यताएं और जीवन-दृष्टि, नैतिक मान्यताएं, कला साहित्य और ज्ञान-विज्ञान, प्राकृतिक परिवेश एवं भाषा का आलोचनात्मक अनुसंधन किया है। सुशील बाला के पास उपयुक्त भाषा है, जिस कारण पाठक तक उनका मंतव्य पहुंच जाता है। यह पुस्तक शिवानी पर केंद्रित आलोचनात्मक लेखन की नई संभावनाएं खोलती है। आज जब नए-नए संदर्भों में साहित्य का मूल्यांकन किया जा रहा है तब इस पुस्तक का विशेष महत्त्व है। यह निश्चित रूप से एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Ved Kya Hain ?
    Vishv Nath Gupta
    120

    Item Code: #KGP-8002

    Availability: In stock

    पुस्तक के प्रारम्भ में यह बताने की कोशिश की गई है कि वेद का अर्थ क्या है तथा वेदों का निर्माण कब हुआ । फिर चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के बारे में अलग-अलग बताया है कि उनमें से प्रत्येक में क्या-क्या है। इसके साथ ही यह भी बताया है की प्रत्येक वेद के चार भाग हैं —संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद । फिर इन चारों भागों के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है।
    इसके उपरांत वेदांगों के बारे में जानकारी दी गयी है । वेदांग छह हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र । इन छह वेदांगों के बारे में पुस्तक में सविस्तार चर्चा की गयी है । 
    चारों वेदों के आलावा चार उपवेद भी हैं । ये हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व वेद तथा स्थापत्य वेद । इनके बारे में भी आवश्यक जानकारी पुस्तक में दी गयी है ।
  • Vyavsayik Hindi
    A.W.I.C.
    150

    Item Code: #Kgp-vh

    Availability: In stock


  • Patron Ke Aaeene Mein Swami Dayanand Saraswati
    Raj Budhiraja
    225

    Item Code: #KGP-121

    Availability: In stock

    पत्रों के आईने में : स्वामी दयानंद सरस्वती
    स्वामी दयानंद अपने व्यस्त जीवन में से कुछ पल निकालकर पत्र लिखा करते थे । वे एक साथ कई काम किया करते थे-विभिन्न धर्मों में फैली कुरीतियों का खंडन, गंभीर दार्शनिक ग्रंथों की रचना, शास्त्रार्थ की तैयारी । भ्रमण और यात्रा के दौरान नाना प्रकार की पीडाओं को झेलने के बाद वे पत्र लिखने बैठ जाया करते थे। पत्रों के आईने मेँ स्वामीजी के कई रूपों को देखा जा सकता है ।
    स्वामीजी ने देश के विभिन्न प्रांतों के अपने सहयोगियों से पत्र-व्यवहार किया है । उन्होंने लाहौर, रावलपिंडी, अमृतसर, दिल्ली, लखनऊ, सहारनपुर, मेरठ, जोधपुर, बरेली, पुष्कर, अजमेर, जयपुर, कानपुर, उदयपुर, लुधियाना से पत्र लिखे । उन पत्रों का उद्देश्य वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करना था । उन दिनों स्वामीजी दो-तीन दिनों के अंतराल से पत्र लिखा करते थे । पत्र प्राप्त होने पर उनका उत्तर भी तत्काल दे दिया करते थे ।
    इस पुस्तक में उनका एक व्याख्यान सम्मिलित किया गया है, जो उन्होंने यज्ञ की संपूर्ण प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए दिया था । यज्ञ-वेदी, पात्र, साकल्य, घृत व अन्य द्रव्यों को प्रात:काल विशिष्ट प्रकार की समिधाग्नि में दहन करने से व्यक्ति स्वस्थ, दीर्घायु होता है। उन्होंने निर्देश दिया है कि व्यक्ति को प्रात: - सायं नित्यप्रत्ति यज्ञ करना चाहिए ।
    इस पुस्तक में उन स्थानो, तिथियों और व्यक्तियों का भी उल्लेख है, जिनसे स्वामीजी ने शास्त्रार्थ किया था । इसके अतिरिक्त उन छापेखानों, स्थानो का भी उल्लेख हैं, जहाँ से स्वामीजी का संपूर्ण वाङ्ग्मय प्रकाशित हुआ था ।
  • Kya, Kab, Kahan?
    Mahendra Raja Jain
    1100 825

    Item Code: #KGP-702

    Availability: In stock

    ‘क्या, कब, कहाँ?’ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ-ग्रन्थ है। यह राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित ‘हंस’ पत्रिका के समस्त अंकों (अगस्त 1986-अक्टूबर 2013) की विषय सूची है। लेखक, शीर्षक, विषयानुक्रमणिका के रूप में इसे तैयार किया है ‘सन्दर्भिका निर्माण’ के विशेषज्ञ महेन्द्र राजा जैन ने। उन्होंने सर्जनात्मक रुचि के साथ अत्यन्त परिश्रमपूर्वक ‘क्या, कब, कहाँ?’ को आकार दिया है। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के शब्दों में, ‘मैं सचमुच महेन्द्र राजा जैन को हृदय से धन्यवाद देना चाहूँगा—एक पाठक के नाते, एक लेखक के नाते कि वे अपनी भाषा और साहित्य के लिए इतना महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं।’
    कई वर्षों के अथक परिश्रम से ‘हंस’ के इन अंकों की विषय सूची तैयार की गई है। लेखक, शीर्षक और विषयों के अकारादि क्रम से संयोजित इस सूची से तत्काल पता चलेगा कि ‘हंस’ में—
    ० किसी लेखक की, किसी शीर्षक की कोई रचना छपी या नहीं या कब छपी?
    ० किसी विषय की कौन-कौन सी रचनाएँ छपीं या वे किसकी लिखी हुई हैं?
    ० किसी पुस्तक की समीक्षा छपी या नहीं या कब छपी या वह किसकी लिखी हुई है?
    ० ‘हंस’ में छपी किसी रचना पर किसकी क्या प्रतिक्रिया कब छपी?
    ० ‘मेरी-तेरी उसकी बात’ में कब किस विषय पर चर्चा की गई है या किसी विषय पर कुछ लिखा गया है या नहीं?
    ० ‘काँटे की बात’ में कब किस-किस विषय पर लिखा गया है?
    ० ‘हंस’ में किसी महत्त्वपूर्ण गोष्ठी, सेमिनार आदि की रिपोर्ट छपी या नहीं या कब छपी?
    ० ‘बात बोलेगी’ और ‘समकालीन सृजन-सन्दर्भ’ में कब किस विषय पर लिखा गया है?
    इसके साथ और भी बहुत कुछ जानने योग्य।
    राजेन्द्र यादव की कीर्ति के स्थायी स्मारक ‘हंस’ के प्रत्येक पृष्ठ का अवगाहन करता यह ग्रन्थ समस्त हिन्दी प्रेमियों, पाठकों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और बौद्धिकों के लिए पठनीय व संग्रहणीय है।
  • Antyakshari Kosh
    Laxmi Narayan Garg
    700 525

    Item Code: #KGP-233

    Availability: In stock


  • KOSHVIGYAN
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    250 200

    Item Code: #Kgp-kv

    Availability: In stock


  • Rajendra Yadav Ne Jyoti Kumari Ko Bataye Swastha Vyakti Ke Beemar Vichar
    Rajendra Yadav
    290 261

    Item Code: #KGP-838

    Availability: In stock

    राजेन्द्र यादव ने ज्योति कुमारी को बताए स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार 
    लेखक के अनुसार यह पुस्तक इस अर्थ में विलक्षण है कि न तो यह आत्मकथा है, न आत्मवृत्त और न ही संस्मरणों का संकलन । तीन महीने बिस्तर पर निष्क्रिय पड़े रहने के दौरान जो कुछ उल-जलूल असंबद्ध तरीके से दिमाग में आता गया उसे ही कागज पर उतारने की कोशिश है । कोई भूला हुआ क्षण, गूंजता हुआ अनुभव या संपर्क में आए किसी का व्यक्तित्व । अंग्रेजी में ऐसे लेखन को रैम्बलिंग कहते हैं । हिंदी में शायद इसे भटकाव कहेंगे । बिना किसी सूत्र का सहारा लिए जहाँ मन हुआ वहां टहल आना । इस तरह की किसी और किताब का ध्यान सहसा नहीं आता । सब कुछ जो लिखा गया है बहुत तार्किक, सुसंबद्ध और विचारपक्व है ।
  • Hindi Vyakaran : Paaribhaasik Shabdkosh
    Ramraj Pal Dwivedi
    600 480

    Item Code: #KGP-2056

    Availability: In stock

    हिन्दी-व्याकरण : पारिभाषिक शब्दकोश
    हिन्दी की मानकता पर विचार बहुत विलम्ब से शुरू हुआ। दशकों तक एकाधिक हिन्दियाँ चलती रहीं। व्याकरण किस ‘हिन्दी’ के आधार पर बने, किसका नियमन करे, किससे उदाहरण ले, किस रूप की संस्तुति करे—यह तनाव उसे बरसों सालता रहा। छिटपुट अपवादों को छोड़ आज हिन्दी की मानकता प्रायः थिर हो चुकी है। हिन्दी-व्याकरण की पारिभाषिक शब्दावली भी एकरूपता एवं स्थैर्य की प्रक्रिया में है। शोधों एवं अन्तरभाषीय सम्बन्धों के परिणामस्वरूप नये-नये तथ्य एवं शब्द आ रहे हैं, पुराने छीज रहे हैं। शब्दशास्त्र का नियम ही है यह। प्रस्तुत ग्रंथ में स्थिर हो चुके एवं नवागत सभी शब्द दिए गए हैं। विवेचन में, यथासम्भव, बहुमान्य शब्द लिया गया है। मूल शब्द के साथ ही भेदोपभेद भी गिना दिए गए हैं; अन्यत्र उन भेदों-प्रभेदों को भी मूल शब्द की भाँति ही विवेचित किया गया है।
    प्रस्तुत कोश को अद्यतन बनाने के लिए हिन्दी-व्याकरण की परिधि के इधर-उधर मँडराते अनेकानेक पारिभाषिक शब्दों को प्रथम बार समेटने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार निर्धारक, भाषाभेद, मात्रा, रंजक क्रिया, विरामचिन्ह (मुख्यतः योजक चिन्ह), व्याकरणिक कोटियाँ, शून्य प्रत्यय, हिन्दी अक्षर, हिन्दी ध्वनियाँ आदि हिन्दी-व्याकरण के अनिवार्य अंग, जो अब तक दूर-दूर छिटके पड़े थे, कोश की सीमा का आदर करते हुए, एक ही जगह विवेचित किए गए हैं। हिन्दी में यह पहली बार हुआ है जो इस ‘कोश’ का वैशेष्य है।
  • Nasera Sharma : Shabd Aur Samvedana Ki Manobhoomi
    Lalit Shukla
    595 476

    Item Code: #KGP-894

    Availability: In stock

    नासिरा शर्मा : शब्द और संवेदना की मनोभूमि
    प्रस्तुत कृति सुप्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व का विवेचन है। उनका स्थान साहित्य में अब निश्चित हो चुका है। भिन्न-भिन्न मानसिकता के लेखकों के विचार यहाँ एक साथ देखने को मिल जाएँगे। संपादन के इस प्रयास से एक तो लेखिका के विपुल अनुभवों का संसार सामने आता है; दूसरे, अनुभूति की बारीकियों से पाठकों का परिचय होता है। 
    नासिरा शर्मा की लेखनी ज़मीन-ज़मीन का फ़क़ऱ् भली-भाँति पहचानती है। संकलित लेखों से लेखिका की सूझबूझ, विवेक, पात्रोचित भाषा एवं कथा- साहित्य की सरसता की पूरी-पूरी जानकारी मिलती है। पाठक इस तथ्य से बख़ूबी परिचित हो जाता है कि साहित्य का उद्देश्य क्या है। वह इंसानियत की वास्तविक तस्वीर बनाने में कहाँ तक सहायक है। 
    अपने लेखन में लेखिका ने परंपरा से प्राप्त ख़ूबियों, जनजीवन से मिली संघर्ष-गाथाओं एवं जिंदगी की तकलीफ़ों का वास्तविक बयान प्रस्तुत किया है। इस प्रस्तुति से नासिरा शर्मा को जानने-समझने एवं परखने में मदद मिलेगी, विश्वास है।
  • Hindi Vyangya Ki Dharmik Pustak : Harishankar Parsai
    Prem Janmejai
    480 360

    Item Code: #KGP-9358

    Availability: In stock

    डाॅ. प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित पुस्तक हिंदी व्यंग्य की धर्मिक पुस्तक: हरिशंकर परसाई अत्यंत मूल्यवान है।
    प्रेम जनमेजय हिंदी व्यंग्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार और इस विध के सबसे बड़े संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो चुके हैं। उनके लेखन में साहित्य अपनी गरिमा के साथ विकसित होता है। अध्ययन और अनुभव के सहमेल से उनका रचनात्मक व आलोचनात्मक लेखन विशिष्ट बन गया है। प्रेम जनमेजय की एक बहुत बड़ी और अनुकरणीय विशेषता है—अपनी परंपरा के श्रेष्ठ रचनाकारों के कृतित्व को संजोना; उन रचनाकारों पर आलोचना पुस्तक संपादित करना। ...यह काम वे लगातार करते रहे हैं। उनसे अपेक्षाएं बहुत रहती हैं। हर बार की तरह इस किताब में भी वे अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं।
    यह किताब प्रेम जनमेजय के संपादकीय विवेक का परिचय देती है। इसमें परसाई का महत्त्व है, मूल्यांकन है। उनके व्यक्तित्व पर आलेख हैं। इसमें शामिल मुख्य लेखक हैं—राजेन्द्र यादव, सूर्यबाला, नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, नरेन्द्र कोहली, शिव शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, अतुल चतुर्वेदी आदि। पुस्तक इन खंडों में संयोजित है—संपादकीय, चिंतन, स्मृतियों में, परसाई से बातचीत। परसाई पर पहले भी अच्छी सामग्री प्रकाशित हो चुकी है। यह पुस्तक उसमें गुणात्मक वृद्धि है। शीर्षक ही बताता है कि प्रेम जनमेजय किसी भी रचनाकार को धार्मिक पुस्तक की तरह अनालोचनीय, अन्यतम, मानवेतर और आसमानी नहीं मानते। शीर्षक में गहरा व्यंग्य है। जिन लोगों ने परसाई को पठनीय के स्थान पर पूजनीय बना रखा है, यह वाक्य उन पर तंज करता है।
    पुस्तक में शामिल साक्षात्कार में परसाई और प्रेम जनमेजय की बातचीत है। इसमें कुछ प्रश्नकर्ता और भी हैं। परसाई कहते हैं, ‘व्यंग्य का प्रयोजन एक चेतना जागृत करता है कि जो गलत है उसे बदलना है। बदलने के लिए साहित्य के अलावा बहुत सी चीजें हैं। राजनीतिक दल हैं, ट्रेंड  यूनियन हैं। परंतु व्यंग्य उनकी तरफ संकेत तो करेगा ही। व्यंग्य सिर्फ पोलिटिकल ही नहीं, रचनात्मक भी है।’ परसाई के मूल्यांकन के लिए यह एक अनिवार्य किताब है।
  • Yeh Dilli Hai
    Raj Budhiraja
    125

    Item Code: #KGP-1961

    Availability: In stock

    मैं इतना कहना चाहुँगी कि मैंने दिल्ली में रहकर सुखद-दुखद और त्रासद अनुभव किए हैं लेकिन मैंने सुखद अनुभवों को ही अभिव्यक्ति प्रदान की है । अभी तक मैंने दिल्ली पर तीन पुस्तके लिखी हैं-'दिल्ली अतीत के झरोखे से, 'हाशिये पर' और 'हाशिये पर दिल्ली' । ऐसी दिल्ली की चारों दिशाओं से सुख व्यापता रहे । इन्हीं शब्दों के साथ मैं ये पुस्तक (जिसका नामकरण मैंने खुद किया है) अपने दिल्लीवासियों को सौंपने का प्रयास करती हूँ। सस्नेह आपकी
    --राज बुद्धिराजा

  • Hansbalaka
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    675 506

    Item Code: #KGP-882

    Availability: In stock

    हंसबलाका
    ‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य को आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की अन्यतम देन है। इसका प्रथम प्रकाशन 1982 ई. में हुआ था। प्रकाशित होने पर हिंदी समाज में इसका व्यापक स्वागत हुआ। प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय आदि महान् लेखकों के जीवन और साहित्य को तथा स्वयं अपने जीवन को नए ढंग से देखने का यह प्रयास अपने तरह का अकेला है। यह मात्र संस्मरण की पुस्तक भर नहीं है। यहाँ हिंदी के सांस्कृतिक गद्य का ऐसा रूप है, जिसमें हमारी परंपरा और समय दोनों अपने सबसे उदात्त रूप में प्रस्तुत हुए हैं। इन संस्मरणों में प्राचीन भारत की गूँज-अनुगूँज तो है ही, आधुनिक सांस्कृतिक जगत् की यथार्थ चेतना भी है। ‘हंसबलाका’ के संस्मरणों से गुजरते हुए हम आलोच्य व्यक्ति को तो नए रूप में देखते ही हैं, अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सर्वथा नए रूप में पाते हैं। बिना किसी दुविधा के कहा जा सकता है कि ‘हंसबलाका’ के प्रकाशन से हिंदी संस्मरण साहित्य का सबसे पुष्ट और प्रखर रूप सामने आता है। ‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य का सर्वोच्च शिखर है।
  • Vyavaharik Shailivigyan (Hindi)
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    400 320

    Item Code: #Kgp-vs

    Availability: In stock


  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Aakhyaan Mahila Vivashata Ka
    Harish Chandra Vyas
    140

    Item Code: #KGP-112

    Availability: In stock

    विगत हजारों वर्षों के इतिहास में किसी भी काल में पुरुष ने नारी की आर्थिक अवस्था की ओर कभी भी ध्यान नहीं दिया और इसी अर्थ-विवशता के कारण नारी की दशा समाज में सदैव हीन बनी रही।
    पाषाण काल से लेकर वर्तमान काल तक नारी की सामाजिक यात्रा अत्यंत दुर्गम, सामाजिक बंधनों, बर्बर अत्याचारों, मर्यादाओं और समाजशास्त्रियों द्वारा खोदी गई विशाल गहरी खाई व बिछाए गए कंटीले झाड़-झंखाड़ों में से होकर 21वीं सदी तक पहुंची है। आज उसी नारी-देह का विज्ञापन और व्यवसायीकरण धड़लले से हो रहा है। नाचने, अंग-अंग की भंगिमाएं दिखाने, मुद्राओं से, स्पर्श से, यौवन से उभार से, जरूरी हो तो सहवास से समाज में कई भयंकर विकृतियां दु्रतगति से उभरकर सामने आ रही है।
    प्रस्तुत पुस्तक के सृजन के पीछे प्रमुख उद्देश्य यह रहा है कि इस विषय पर उत्कंठा रखने वाले नागरिक तथा सामान्य जन वस्तुस्थिति का अवलोकन करें और समाज में फैल रही व्यभिचार की विभीषिका से निजात दिलवाने में अभिरुचि एवं अभिवृत्ति का विकास करें।
    —हरिश्चन्द्र व्यास
  • Jal Jo Jeevan Hai
    Harish Chandra Vyas
    300 249

    Item Code: #KGP-520

    Availability: In stock

    जल, जो जीवन है 
    विश्व-स्टार पर गहराते जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्षा 2003 को 'अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ जल वर्ष' घोषित किया है । यही भारत सहित दुनिया के देशों ने अपना रवैया नहीं बदला तो जल विभिन्न देशों में तनाव और जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता का विषय बने बगैर नहीं रह सकता। अतः जल-संसाधनों के प्रति सचेत होने की परम आवश्यकता है । 'जल, जो जीवन है' का सर्जन लेखक ने दो प्रतिमानों को सामने रखकर किया है— प्रथम, जल-संकट की गंभीरता के बारे में जागरूकता में वृद्धि करना और द्वितीय इस समस्या के निदान व समाधान हेतु सर्जनात्मक सुझाव पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना। 
    प्रस्तुत पुस्तक में जल से संबंधित उभरते समस्त संकटों तथा उनके समाधान हेरु सरल भाषा में जानकारी प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया गया है। 
  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    365 292

    Item Code: #KGP-9112

    Availability: In stock

    यजुर्वेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक ‘यजुर्वेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ- धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है। यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है। यह ‘कर्म’ यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है। पारम्परिक दृष्टि से ‘यज्ञ’ का सीमित अर्थ होता है—अग्नि में आहुति देना। परन्तु ‘यज्ञ’ का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण-भाव मुख्य रहता है। अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यज्ञ के अन्तर्गत आ जाते हैं।
    इन मन्त्रों में ज्ञान, दीर्घायु व धन-सम्पत्ति तथा सुरक्षादि पाने के लिए प्रार्थनाएँ हैं। क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है। यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिलता है। इसी के कारण एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण-प्रदूषण होता है। आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है। शान्ति, विश्रान्ति और आनन्द की चाह है सबको। वह कैसे मिले? यही मन्त्र निर्देश करते हैं। ‘विश्व-शान्ति’ के लिए किया जाने वाला ‘शान्तिपाठ’ इसी वेद की देन है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो ‘मन से युवा हैं’ तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Mool Chanakya Niti
    Vigyan Bhushan
    280 238

    Item Code: #KGP-192

    Availability: In stock

    आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान् विभूति थे, जिन्होंने  अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री होने के साथ ही नीतिशास्त्रज्ञ के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवनानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह निःस्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।
    वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारु ढंग से संचालित करने के लिए चाणक्य द्वारा बताई गई नीतियाँ और सूत्रा अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। उनके सिद्धांतों में निहित अर्थों की महत्ता समझते हुए ही कई विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों में भी ‘चाणक्य नीति’ पर शोध और अध्ययन किया जा रहा है। ऐसे विलक्षण व्यक्ति के अमूल्य वचनों को सार-रूप में प्रस्तुत करती इस पुस्तक में ‘चाणक्य नीति’ और ‘चाणक्य सूत्र’ के साथ ही ‘अर्थशास्त्र’ को भी सम्मिलित किया गया है।


  • Sahitya-Darshan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    400 300

    Item Code: #KGP-756

    Availability: In stock


  • Anuvad-Kala
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    300 240

    Item Code: #Kgp-ak

    Availability: In stock


  • Sahitya Ka Naya Soundaryashastra
    Devendra Chaubey
    600 480

    Item Code: #KGP-527

    Availability: In stock


  • Hindi Kahaniyon Mein Hans Patrika Ka Yogdan
    Meera Ramrav Nichale
    450 360

    Item Code: #KGP-758

    Availability: In stock

    हिंदी कहानियों में ‘हंस’ पत्रिका का योगदान
    सौ०  मीरा निचळे से मेरा परिचय इस शोध-प्रबंध के दौरान ही हुआ। साधना शाह का पत्र लेकर वह मुझसे मिलने औरंगाबाद से आई थी और शीघ्र ही इतनी खुल गई कि जब तक अपने प्रश्नों के सही जवाब नहीं पा लेती थी तब तक पूछती ही रहती थी। वह सीधे-सरल स्वभाव की अध्ययनशील लड़की है।
    मैंने उसका शोध-प्रबंध देखा है और मुझे लगा कि काफी परिश्रम और सूझबूझ के साथ मीरा ने यह अध्ययन प्रस्तुत किया है। मैं उसे इसके लिए बधाई देता हूं। यह प्रबंध अपने आप में तो महत्त्वपूर्ण है ही, आगे काम करने वालों के लिए भी इसकी जरूरत बनी रहेगी। मीरा अपना अध्ययन और लिखना आगे भी चलाए रखे इसके लिए मेरी शुभकामनाएं...
    —राजेन्द्र यादव
  • Bindu-Bindu Vichar
    Atal Bihari Vajpayee
    400 300

    Item Code: #KGP-9022

    Availability: In stock

    बिन्दु-बिन्दु विचार
    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की] पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है । -इसी पुस्तक से

  • Manav Adhikar Aur Hum
    Urmila Jain
    200

    Item Code: #KGP-564

    Availability: In stock

    मानव अधिकार और हम
    हिंदी में प्रति वर्ष एक हज़ार से अधिक पुस्तकें छपती  हैं, पर अभी तक कोई ऐसी पुस्तक देखने में नहीं आई है जिससे जन-सामान्य को सहज-सरल भाषा में मानव अधिकार संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके। हिंदी की इस कमी का ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में मानव अधिकार की धारणा सहित अन्य विषयों के संबंध में भी चर्चा की गई है । 
    मानव अधिकार का उल्लंघन कब, कैसे और क्यों  होता है और हो सकना है—इसके कुछ उदाहरण देते हुए यह भी बतलाया गया है कि अधिकांश देश किस प्रकार सैद्धांतिक रूप से तो मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा का समर्थन करते हैं और इसी के आधार पर उन्होंने अपने-अपने देश में तरह-तरह के कानून भी बनाए हैं, पर जहाँ नक उन पर अमल  करने की बात है-इस संबंध में अधिकांश, देशों का रिकॉर्ड बहुत ही निराशाजनक है ।
    प्रस्तूत पुस्तक में बाल अधिकार उल्लंघन और बालकों के यौन शोषण का उल्लेख करते हुए बतलाया गया है कि किस प्रकार अपराधियों का दोष सिद्ध होने के बावजूद उनके विरुद्ध कोई ऐसी कार्यवाई नहीं की जाती, उन्हें ऐसा दंड नहीं दिया जाता कि इस प्रकार के अपराधों पर रोक लगे ।
  • Soochana Ka Adhikaar
    Vishv Nath Gupta
    140

    Item Code: #KGP-494

    Availability: In stock


  • Desh Prem Ki Kahaniyan
    Zaheer Niyazi
    150

    Item Code: #Kgp-dpkk

    Availability: In stock


  • Hamaaraa Lakshy : Laaney Hain Leelakamal
    Dr. Ramesh Kuntal Megh
    750 525

    Item Code: #KGP-683

    Availability: In stock

    हमारा लक्ष्य: लाने हैं लीलाकमल
    चैबीसेक लेखों-आलेखों-मोनोग्राफों वाली इस किताब में समग्र ‘संस्कृति पैटर्न’ के समावेश के संग-संग सौंदर्यबोधशास्त्र, मिथक-आलेखकारी एवं (यत्र-तत्र) देहभाषा का भी मिलयन हुआ है। इसमें दोनों सरोकार शामिल हैं–क्या (लक्ष्य) हैं तथा (कला-साहित्य, समाजविज्ञान-संस्कृति के लीलाकमल) कैसे होने चाहिए! आप भी उन्हें लें तथा स्वीकारें-परखें।
    इसीलिए इसमें विभिन्न ज्ञानानुशासनों के पारिभाषिकों तथा विविधआयामी संप्रेषणों का सहारा लिया गया है, जिससे ज्ञान तथा पद्धति की नई दिशाएँ भी परिलक्षित 
    हुई हैं।
    पढ़ते हुए हम-आप मरुतों के वाक् अक्षरों के साथ ऊँचे दूर तक उड़ें, मिथक के ‘स्वप्न समय’ से आधुनिक रिनासाँ के यात्रिक बनें, प्रसाद के ‘आँसू’ की नामलुकी प्रिया-रमणियों का साक्षात्कार करें, चंपा के ‘आकाशदीप’ के साथ कथासागर में यात्राएँ करें, वागीश्वर चित्रानुरागी आचार्य शुक्ल के कई सृजन-रहस्य पहचानें, मल्लिका साराभाई के नृत्य, त्रिलोचन के व्यक्तित्व तथा तालास्थल की अजीब प्रतिभा की शिनाख्त करें, मामल्लपुरम् से लेकर मेगासिटी चंडीगढ़ के वास्तुशिल्प और नगर-निवेश का आकल्प जाँचे तथा साहित्य की समसामयिक समाजशास्त्रीय चुनौतियों का भी आगाज करें।
    इस तरह ऐसे सही प्रश्नों के सही उत्तरों का निर्णय तो आपको ही करना है—असहमति अथवा समर्थन द्वारा।
  • Naath Siddhon Ki Rachnayen
    Hazari Prasad Dwivedi
    320 266

    Item Code: #KGP-209

    Availability: In stock


  • Bharat Main Panchayti Raaj
    Vishv Nath Gupta
    160

    Item Code: #KGP-321

    Availability: In stock

    हमारे देश में पंचायती राज व्यवस्था किसी न किसी रूप में वैदिक काल में भी विद्यमान थी, लेकिन वर्तमान स्थिति तक पहुंचने में इसे एक बहुत लंबी यात्रा तय करनी पड़ी। संविधान 73वां संशोधन अधिनियम, 1992 लागू होने के बाद इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।
    प्रस्तुत पुस्तक में पंचायती राज का संक्षिप्त इतिहास देते हुए, 1992 में बने कानून के प्रावधनों पर विस्तार से चर्चा की गई है। वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था का जो त्रि-स्तरीय ढांचा है, उसके बारे में यथासंभव संपूर्ण जानकारी दी गई है। त्रि-स्तरीय ढांचे के बाहर होने पर भी महत्त्वपूर्ण होने के कारण ‘ग्राम-सभा’ पर भी अलग से चर्चा की गई है। साथ ही पंचायती राज संस्थाओं को मीडिया का समर्थन, ई-पंचायत तथा पंचायती राज संस्थाओं को समर्थन देने वाली संस्थाओं के बारे में भी उपयोगी जानकारी दी गई है।
    पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित की गई है और महिलाएं पंचायती राज व्यवस्था में अच्छा काम कर रही हैं। इसलिए महिलाओं की भागीदारी पर एक विशेष अध्याय पुस्तक में जोड़ा गया है। महिलाओं के समक्ष क्या-क्या चुनौतियां हैं—इस बात की चर्चा भी की गई है। इसके साथ ही एक अध्याय पंचायत महिला एवं युवा शक्ति अभियान पर भी है।
    इस पुस्तक से संबंधित सामग्री जुटाने में मुझे मेरे पुत्र अरविंद कुमार, दामाद कमल अग्रवाल, अजय कुमार रूंगटा, पुत्री कुसुम और सुमन के अलावा पड़ोसी मित्र श्री रामकृष्ण से सहयोग प्राप्त हुआ है। सामग्री अधिकांशतः इंटरनेट तथा पंचायती राज मंत्रालय के कार्यालय से प्राप्त हुई है।
    पर्याप्त ध्यान रखने के बावजूद कुछ त्रुटियां पुस्तक में रह सकती हैं, जिनके लिए मैं स्वयं क्षमाप्रार्थी हूं।
  • Patrakarita Mein Anuvad Ki Samasyayen
    Vishv Nath Gupta
    400 300

    Item Code: #KGP-239

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में सामान्य समाचारों का अनुवाद, खेलकूद के समाचारों का अनुवाद, बाजार-भाव के समाचारों का अनुवाद, विज्ञापनों का अनुवाद तथा संपादकीय का अनुवाद आदि उन सभी विषयों को दिया गया है जिनसे समाचारपत्रों के संपादकीय विभाग को जूझना पड़ता है। व्यक्तिवाचक नामों तथा वर्तनी की समस्या भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अतः उन्हें भी ले लिया गया है। अंत में आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचारों पर भी अनुवाद की दृष्टि से विचार किया गया है। अंत में कुछ पारिभाषिक शब्दों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है जो इस प्रसंग में काम के हैं।
    विश्वास है कि यह पुस्तक अनुवाद में सामान्य रूप से रुचि रखने वालों तथा विशेष रूप से समाचारपत्रों और आकाशवाणी-दूरदर्शन के अनुवादकों के लिए उपयोगी होगी।
  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    300 249

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Maitreyi Pushpa : Stri Hone Ki Katha
    Vijay Bahadur Singh
    495 386

    Item Code: #KGP-9041

    Availability: In stock


  • Natyachintan Aur Rangdarshan Antarsambandh
    Girish Rastogi
    475 356

    Item Code: #KGP-707

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में व्यापक, आधुनिकतम और गहन विश्वदृष्टि उल्लेखनीय है। इस अर्थ में बर्तोल्त ब्रेख्त का नाट्यचिंतन और रंगदर्शन बहुत गंभीर है। पश्चिमी नाट्यचिंतन के साथ-साथ यह भारतीय नाटककार और रंगमंच को भी परखती चलती है। लेखिका प्राचीन नाटककारों को नई दृष्टि से देखती है तो साहित्य और रंगमंच के साथ ही आलोचना को भी नए ढंग से देखती है।
    कई मानों में नाटक का साहित्य और रंगमंच से जो रिश्मा टूटता-बनता रहा और प्रश्न पर प्रश्न उठते रहे चिंतन और रंगदर्शन के अंतर्संबंध बनते-बदलते रहे। यह पुस्तक उन सबसे साक्षात्कार कराती है-चाहे संस्मरणों के जरिए, चाहे पत्र के जरिए या द्वंद्वात्मकत संवेदना के जरिए। कुछ महत्वपूर्ण नाटककारों का विशद अध्ययन-चिंतन भी यह स्थापित करता है कि मंचनां से ही नाट्यचिंतन और रंगदर्शन की अंतरंगता विकसित होती जाती है, क्योंकि नाटक और रंगमंच एक जीवित माध्यम हैं, अन्यथा वह कुंठित हो जाती है। दर्शक, पाठक, आलोचक सभी को उत्सुक करने वाली है यह पुस्तक।
  • Suraj Men Lage Dhabba
    Ramesh Bakshi
    65 59

    Item Code: #KGP-9092

    Availability: In stock


  • 1857 : Samar Gaatha
    Sudrashan Kumar Chetan
    100

    Item Code: #Kgp-sg

    Availability: In stock


  • Sahitya Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    100

    Item Code: #KGP-1266

    Availability: In stock


  • Rigveda Yuvaon Ke Liye
    A.W.I.C.
    400 320

    Item Code: #Kgp-rykl

    Availability: In stock


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