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books in hindi

  • grid
  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    300 270

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Ek Nirvasit Maharaja
    Navtej Sarna
    425 383

    Item Code: #KGP-642

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Shiksha Ki Gatisheelta : Avrodh, Navachar Evam Sambhavnayen
    Jagmohan Singh Rajput
    520 468

    Item Code: #KGP-426

    Availability: In stock

    शिक्षा की गतिशीलता : अवरोध, नवाचार एवं संभावनाएं 
    हमारा समाज शिक्षा से अनेक प्रकार की अपेक्षाएं रखता है, मुख्य रूप से यह की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता बढ़ा सकेगी - ऐसी इच्छा प्रत्येक व्यक्ति के मानल में सदा बनती है । आज यह सर्वमान्य है कि शिक्षा को सभी तक पहुंचना है, उसके लिए समाज तथा सरकार दोनों को लगातार प्रयास करना है और 21वीं सदी में कोई भी व्यक्ति शिक्षा के प्रभाव-क्षेत्र बाहर रहकर सामान्य जीवनयापन नहीं कर सकता । अब सामान्य परिवार भी यह समझने लगे हैं की शिक्षा व्यक्ति के मानवीय गुणों व मूल्यों के विकास में सबसे अधिक योगदान कर सकती है । 
    प्रस्तुत पुस्तक में सारे लेख सामान्यजन को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं । ये लेखन के सरे देश में शिक्षाविदों से लेकर अध्यापकों, पालकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बच्चों के साथ लगातार जारी रहे संवाद के आधार पर लिखे गए हैं । यह प्रयास लगातार रहा है कि शिक्षा में रुचि लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति उन्हें पढ़कर चिन्तन-मनन कर सके और अपना विचार परिपक्व कर सके । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Davendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    70 63

    Item Code: #KGP-9052

    Availability: In stock


  • Prayojanmoolak Vyavhaarik Hindi
    Om Prakash Singhal
    350 315

    Item Code: #KGP-9240

    Availability: In stock

    किसी भी भाषा की समृद्धि की पहचान उसके विभिन्न संदर्भों एवं प्रयोजनों में प्रयुक्त होने की क्षमता से की जाती है। आज हिंदी का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों के लिए किया जा रहा है। इससे उसकी अंतर्निहित शक्ति तथा क्षमता का परिचय मिलता है। इसके बावजूद उसकी सामथ्र्य पर प्रश्नचिह्न लगाने वालों की कमी नहीं है। इसका कारण यह है कि विश्वविद्यालय से स्नातक या स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद जब कोई व्यक्ति व्यावहारिक जीवन में प्रवेश करता है तब विभिन्न स्थितियों में हिंदी का प्रयोग करते समय वह प्रायः प्रयुक्ति एवं संप्रेषणीयता का ध्यान नहीं रखता। परिणामतः वह अपने साथ-साथ हिंदी को भी टीका-टिप्पणी एवं उपहास का निशाना बनने का अवसर जुटा देता है। ऐसी स्थितियों में ही प्रायः यह कह दिया जाता कि अभी हिंदी में विभिन्न संदर्भों में प्रयुक्त होने की क्षमता नहीं है। लोग यह भूल जाते है कि यह अक्षमता भाषा की न होकर व्यक्ति विशेष की है। लेकिन इसमें व्यक्ति विशेष का भी कोई दोष नहीं है। दोष उस व्यवस्था का है जिसमें शिक्षित होने के बाद भी वह यह नहीं जान पाया कि विभिन्न कार्यक्षेत्रों की अपनी-अपनी प्रयुक्तियां हैं और उनका प्रयोग करने के बाद ही संप्रेषण प्रभावी बन पाता है। उदाहरण के लिए औपचारिक पत्र लिखते समय सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थानों में एक जैसी भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता। इसी प्रकार से किसी विषय पर टिप्पण कार्य करते समय किए गए संक्षेपण अथवा पल्लवन की प्रविधि सामान्य संक्षेपण तथा पल्लवन से भिन्न होती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक में इन सभी विषयों से संबद्ध प्रामाणिक जानकारी जुटाई गई है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hridayesh
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-90

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार हृदयेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'खेत', 'जो भटक रहे हैं', 'कोई एक दूसरा', 'मृगया', 'जीवन राग', 'उसकी कहानी', 'जहर', 'मनु', 'पूँजी'  तथा 'सत्तर पार का वह बूढ़ा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक हृदयेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Naani Ki Khichadi
    Manju Kapoor
    60

    Item Code: #KGP-936

    Availability: In stock


  • Ardhavritt
    Mudra Rakshes
    795 557

    Item Code: #KGP-883

    Availability: In stock


  • Nayi Kahani Ki Sanrachana
    Hemlata
    600 540

    Item Code: #KGP-876

    Availability: In stock

    नई कहानी की संरचना
    इतिहास के वे क्षण अति महत्त्वपूर्ण होते है जो संकट और परिवर्तनों के क्षण होते है । ऐसे समय में ही पुरानी व्यवस्था को पीछे ढकेलकर नई व्यवस्था आगे आती है और परंपरागत अनेक रूढ तथा गतिहीन तत्त्व पीछे छुट जाते हैं और उनके स्थान पर नए यथार्थ से उदूभूत नए तत्त्व परंपरा का जीवंत अंश वन जाते हैं । इनसे मानव संबंधों के लिए नई भूमिका बनती है, नए मानव का जन्म होता है । इस संधिकाल में वहीं साहित्यकार सफल होता है जो तत्कालीन जीवन यथार्थ को अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करता है ।
    साहित्य में निहित 'समय सत्य' को पहचानना और उदघाटित करना आलोचक का धर्म है । आलोचक यदि कृति मेँ निहित जीवन सत्य की उपेक्षा करके अपने दृष्टिकोण के संदर्भ में कृति का विश्लेषण करता है तो कृति के साथ न्याय नहीं कर पाता ।
    स्वातंत्र्योत्तर युग से जिस समय यथार्थ का दर्शन तत्कालीन कथा साहित्य में हुआ, वह रचनाकार ने स्वयं  होता था और यहीं कारण है कि उसकी अभिव्यक्ति भी उससे प्रभावित हुई । तत्कालीन साहित्यकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति की भिन्नता का विश्लेषण भी प्राचीन मानद्रडों के आधार पर संभव नहीं था, विशेष रूप से कथा साहित्य का, जिसे 'नई कहानी' नाम से जाना गया ।
    'नई कहानी' के माध्यम से व्यक्त भावबोध ने उसकी अभिव्यक्ति शैली को प्रभावित किया । भाव और शैली ने सम्मानित रूप से समय यथार्थ का चित्रण किया । यहीं कारण है कि कहानी विश्लेषण के परंपरागत मानदंड इन कहानियों के विश्लेषण के लिए सक्षम नहीं थे । 'नई कहानी' के विश्लेषण के भिन्न मानदंडों का आश्रय लिया गया जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए थे । इस पुस्तक में उन्हें मानदंडों को खोज करने का प्यास है जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए हैं और 'नई कहानी की संरचना' से जिनका विशेष महत्त्व रहा है ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200 180

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dropadi Ka Cheer Haran Aur Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    65 59

    Item Code: #KGP-949

    Availability: In stock

    मूल महाभारत का कलेवर वर्तमान में उपलब्ध महाभारत का दशांश रहा होगा। उसके पश्चात् जो मौखिक प्रक्षेप होता रहा है और अब भी होता रहता है, उसका अंत नहीं हैं ऐसे ही कुछ अधिक महत्वपूर्ण विषयों पर इस छोटी-सी पुस्तक में विचार किया गया है। उन्हें अन्तिमेत्थम् के रूप में स्वीकार किए जाने का लेखक का आग्रह नहीं है। सुधीजनो के विचारार्थ प्रस्तुत है।
    —विद्यानन्द सरस्वती
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    365 329

    Item Code: #KGP-9112

    Availability: In stock

    यजुर्वेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक ‘यजुर्वेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ- धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है। यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है। यह ‘कर्म’ यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है। पारम्परिक दृष्टि से ‘यज्ञ’ का सीमित अर्थ होता है—अग्नि में आहुति देना। परन्तु ‘यज्ञ’ का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण-भाव मुख्य रहता है। अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यज्ञ के अन्तर्गत आ जाते हैं।
    इन मन्त्रों में ज्ञान, दीर्घायु व धन-सम्पत्ति तथा सुरक्षादि पाने के लिए प्रार्थनाएँ हैं। क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है। यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिलता है। इसी के कारण एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण-प्रदूषण होता है। आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है। शान्ति, विश्रान्ति और आनन्द की चाह है सबको। वह कैसे मिले? यही मन्त्र निर्देश करते हैं। ‘विश्व-शान्ति’ के लिए किया जाने वाला ‘शान्तिपाठ’ इसी वेद की देन है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो ‘मन से युवा हैं’ तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Kartavya
    Samual Smiles
    240 216

    Item Code: #KGP-280

    Availability: In stock

    कर्तव्य
    चौबीस वर्ष पूर्व मैंने ‘आत्मनिर्भरता’ (Self Help)  पुस्तक लिखी थी। तीन वर्ष उपरांत सन् 1853 में वह प्रकाशित हुई। वह पुस्तक संयोग से ही लिखी गई थी। मैंने ‘लीडस’ स्थान पर नवयुवकों के सम्मुख कुछ भाषण दिए थे। उन भाषणों में मैंने इस बात पर जोर दिया था कि उनके जीवन की प्रसन्नता व सफलता मुख्यतः उनके निरंतर आत्मसंस्कार, अनुशासन, संयम और सबसे अधिक ईमानदारी व साहस से कर्तव्यपालन करने पर निर्भर करती है। मेरे इन भाषणों का आशा से अधिक प्रभाव हुआ।
    अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने के बाद सायंकाल का समय मैं अपनी पुस्तक के लेखन में लगाता था। पुस्तक जब पूरी हो गई, तो मैंने उसे लंदन के एक प्रकाशक के पास भेजा। क्रीमिया के युद्ध के कारण उन दिनों पुस्तकें प्रायः बहुत कम बिकती थीं। इसलिए प्रकाशक ने धन्यवाद सहित मेरी पुस्तक लौटा दी। ‘जार्ज स्टीफेंसन का जीवन-चरित्र’ छपने के बाद ही श्री मूरे की कृपा से ‘आत्मनिर्भरता’ प्रकाशित हो सकी। 
    इसके तेरह वर्ष पश्चात् मेरी पुस्तक ‘चरित्र’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में मैंने महापुरुषों के चरित्रों को चित्रित करने का प्रयत्न किया, क्योंकि नवयुवकों को संस्कार देने का यह सर्वोत्तम ढंग है। इसके पाँच वर्ष बाद मेरी पुस्तक ‘बचत’ (Thrift) प्रकाशित हुई। इसमें मैंने श्रम के महत्त्व और बचत के लाभों पर जोर दिया था। 
    इनके पाँच वर्ष उपरांत इसी क्रम की अंतिम पुस्तक ‘कर्तव्य’ प्रकाशित हो रही है। मुझे आशा है कि पिछली पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी। इस पुस्तक में मैंने सर्वोत्तम और साहसी स्त्री-पुरुषों के उदाहरण दिए हैं। महापुरुषों के जीवन हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह कार्य कर सकते हैं। जो व्यक्ति कर्तव्य की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह महान् बन जाता है।  
    —सैमुअल स्माइल्स
  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Huzoor Darbar
    Govind Mishra
    375 338

    Item Code: #KGP-315

    Availability: In stock


  • Naani
    Dronvir Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-522

    Availability: In stock


  • Seedhi Qalam Sadhe Na
    Sunita Jain
    75 68

    Item Code: #KGP-9285

    Availability: In stock

    सुपरिचित कवयित्री सुनीता जैन की नव्यतम कविताओं के प्रस्तुत संकलन सीधी कलम सधे न की कविताओं का स्वभाव और स्वाद समकालीन हिंदी कविता की सामान्य छवि से थोड़ा अलग है। इन कविताओं में असंभव को संभव कर डालने का न तो बड़बोलापन है और न ही जीवनगत यथार्थ को चुनौती देती काव्य-पंक्तियों का बरबस ‘उत्पादन’ हैं कवयित्री ने समग्र प्रकृति और मन को स्वविवेक के अभिव्यक्त किया है। साथ ही जीवन की विराट अवधारणा को इन कविताओं में संबोधित भी किया गया है। कवयित्री जीवनपरक महाप्रश्नों से व्यक्तिगत स्तर पर जूझते हुए इन कविताओं को सरल, सहज, सुगम्य, पारदर्शी, तथा एक सीमा तक गेय बनाये रखती हैं। यहां ऐसी निजता है जो सार्वजनिकता भी है। इसीलिए इन कविताओं की खुशबू, समकालीन कविताओं की तत्सम खुशबू से थोड़ा अलग हे।
    इन कविताओं की एक काव्य-विशेषता और है-इनमें छिपा आत्मीय राग। संकलन की अनेक कविताएं ऐसी हैं जिनमें असंबोधित रागों की लय मिलती है। समकालीन हिंदी कविता का पाठक उत्कृष्ट काव्य के लिए मानो तरसा हुआ है। कविता में मनःभूमि की प्रतिच्छवियों के ऐसे समर्थ संकलन का प्रकाशन एक सुखद काव्य-घटना है।
  • Mahan Vibhutiyon Ka Adhura Bachpan
    Vinod Kumar Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-247

    Availability: In stock

    महान् विभूतियों का अधूरा बचपन
    विश्व की अनेक महान् विभूतियाँ बचपन में ही गंभीर विकलांगता का शिकार हो गई थीं। विकलांगता अपने साथ शारीरिक कष्ट के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक व सामाजिक दुःख भी लाती है। इन विभूतियों ने विकलांगता का सामना एक सामान्य चुनौती की भाँति किया और समस्त संसार उनकी उपलब्धियों व योगदानों के समक्ष नतमस्तक हो गया।
    दूसरी ओर एक आम अच्छा-भला व्यक्ति मामूली समस्याओं से झुँझला जाता है और लक्ष्य पूरा न हो पाने  के लिए परिस्थितियों को अधिक दोष देने का प्रयास करता है।
    प्रस्तुत पुस्तक न केवल इन महान् व्यक्तियों का उदाहरण देते हुए आम बच्चों को चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है वरन् यह भी बताती है कि किस प्रकार आम बच्चों व विकलांग बच्चों के बीच सम्मानजनक समन्वय होना चाहिए।
    वास्तव में विकलांगता बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करती है और यदि परिस्थितियाँ अनुकूल बना दी जाएँ तो विकलांगता का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है। अतः यह आवश्यक है कि भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी अनुकूल बनाया जाए ताकि विकलांगजनों व शेष समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो और उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • Doobte Waqt
    Dixit Dankauri
    150 135

    Item Code: #KGP-1901

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।

  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    425 383

    Item Code: #KGP-248

    Availability: In stock

    अथर्ववेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की अन्तिम कड़ी ‘अथर्ववेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें अथर्ववेद के 120 मन्त्रों को दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। अथर्ववेद की विषयवस्तु अत्यन्त रोचक तथा विविधता लिए हुए है। यही नहीं--ज्ञान, शिक्षा तथा गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर भी यहाँ प्रकाश डाला गया है। परिवार में अतिथि की महत्ता का उल्लेख हुआ है तो अन्य पारिवारिक सम्बन्धों की समरसता का महत्त्व बताया गया है। शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य दोनों ही जीवन में रहते हैं। अथर्ववेद का यथार्थवाद दोनों का वर्णन भी करता है तथा अशुभ से, पाप से मुक्ति की राह बताता है, प्रायश्चित्त का विधान भी करता है।
    यद्यपि व्यक्तिगत सौख्य के लिए यहाँ शत्रुनाशविषयक मन्त्र भी हैं तथा कुछ जादू-टोने जैसी क्रियाएँ भी वर्णित हैं परन्तु तब भी समष्टिगत कल्याण की उपेक्षा नहीं हुई है। आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ होने के नाते यहाँ रोगों के नाम, लक्षण तथा उपचार विधियाँ वर्णित हैं। इन विधियों की विविधता व्यक्त करती है कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद के ऋषि कितना सजग थे। वनस्पतियों, औषधियों के नाम, उनके गुण तथा रोग-विशेष में उनके उपचारात्मक प्रयोग भी बहुधा वर्णित हुए हैं।
    राजनीति पर यहाँ विशिष्ट सामग्री उपलब्ध है। राजा, उसकी सेना, अस्त्र-शस्त्र, युद्धनीति और शत्रुनाशपरक प्रार्थनाओं का अपना महत्त्व है। विभिन्न वृक्ष, लताओं, वनादि के वर्णन तथा जल, वायु को सम्बोधित सूक्तों से पर्यावरण- विषयक चिन्तन झलकता है। ‘भूमिसूक्त’ में प्रथम बार ‘धरती माँ’ का उल्लेख है--‘माता भूमिः पुत्रोअह पृथिव्याः’--‘भूमि माता है मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।’ यह माता-पुत्र के गहन सम्बन्ध धरती का पर्यावरण संरक्षण करता है तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए सन्नद्ध भी करता है। सबके भीतर दिव्यता है, सब प्रेमभाव से जुड़े हैं, जुड़े रहें। विश्व संरक्षण, विश्व कल्याण के तत्त्व सत्य, ऋत, दीक्षा, ज्ञान, तप, यज्ञादि हैं। आतंक हिंसा से जूझते विश्व में अभयता का साम्राज्य हो--यही कामना व्यक्त हुई है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो ‘मन से युवा’ हैं तथा प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को आधुनिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Dr. K.B. Hedgewar : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    190 171

    Item Code: #KGP-487

    Availability: In stock

    निडर और साहस के धनी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भारत की उन महान् विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के पथ पर चलते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। अपनी जीवनशैली में सदैव अनुशासन और राष्ट्रप्रेम को अधिक महत्त्व देने वाले डॉ. केशवराव ने बाल्यावस्था में ही अपने अंग्रेजविरोधी तेवर दिखाने आरंभ कर दिए थे।
    डॉ. केशवराव उन विलक्षण व्यक्तियों में से थे, जो युवाओं की मानसिकता को भलीभांति जानते थे और उनकी क्षमताओं को विकसित करने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
    देश की युवा पीढ़ी को भारत की सनातन संस्कृति और आदर्शों से जोड़े रखने के लिए 28 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पर्व पर ‘संघ’ नामक नए राष्ट्रीय हिंदूवादी संगठन की स्थापना की गई। साहस और अनुशासन पर आधारित इस संगठन को खड़ा करने का पूरा श्रेय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार को जाता है। इस स्थापना-समूह के अन्य सदस्यों में डॉ. वी. एस. मुंजे, बापूजी सोनी तथा डॉ. परांजपे आदि वरिष्ठ नेता शामिल थे।
  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    245 221

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Jangli-Mangli
    Chang Tain-Pi
    180 162

    Item Code: #KGP-409

    Availability: In stock

    1963 में मैंने चांग तइन-यी के बाल-उपन्यास ‘करामाती कद्दू’ का रूपांतर किया था, जो धारावाहिक रूप से ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुआ।
    चांग तइन-यी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बहुत ही सरल और रोचक ढंग से कहानी कहते हैं, जो मनोरंजक होने के साथ उपदेशपरक ही नहीं, कलात्मक ढंग से अच्छा रास्ता दिखाती है।
    ‘करामाती कद्दू’ की लोकप्रियता देखकर ही मैंने 1967 में लेखक की एक और रचना ‘जंगली-मंगली’ शीर्षक से रूपांतकर किया है। पाठकों की सुविधा के लिए मैंने कहानी के पात्रों और वातावरण को भारतीय रूप देना उचित समझा।
    चांग तइन-यी का जन्म 1906 में हुआ था। पच्चीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने यह कहानी लिखी थी। निर्धनता के कारण उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। निर्वाह के लिए उन्होंने तरह-तरह की नौकरियां कीं। कभी-कभी दफ्तर में क्लर्की तो कभी अध्यापन। संघर्ष करते हुए भी उन्होंने लिखना सारी रखा और कई पुस्तकों की रचना की। चांग तइन-यी की बालोपयोगी और किशोरापेयोगी रचनाएं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Teen Tare
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1103

    Availability: In stock

    किशोर मन की उड़ानों के लिए सारा आकाश ही छोटा पड़ जाता है। किशारों की इस दुनिया में जड़ और जंगल, पशु और पक्षी सभी कुछ तो मनुष्यों के मित्र और सहायक होते हैं। इस मनोरंजक कहानी में गधे के दो नन्हे-मुन्ने बच्चे एक मानव किशोर के परम मित्र बनकर बड़ी ही रोमांचक और साहसपूर्ण यात्रा पर निकल पड़े हैं। पग-पग पर आपदाएं आती हैं। चोर-लुटेरे हैं, हिंसक जंतु और उनसे भी डरावने डाकू हैं। पर तीनों मित्र अपनी सूझ-बूण् और हिम्मत से सबको छकाते हुए अपना उद्धार करते हैं और दूसरे कई बालकों का उद्धार भी करते हैं। और इस बहुत बड़ी दुनिया में घूम-भटक कर घर लौट आते हैं। जिस शान से वे घर लौटे, अपनी यात्रा में जो ज्ञान और साहस उन्होंने संचित किया, आपदाओं की भट्ठी में मैत्री के सोने को उन्होंने कंचन बनाया, वह सभी किशोर पाठकों को भी प्राप्त हो।
  • Aacharya Ram Chandra Shukla Ka Chintan Jagat
    Krishna Dutt Paliwal
    695 626

    Item Code: #KGP-9007

    Availability: In stock


  • Dhoop Dhalne Ke Baad
    Mahip Singh
    225 203

    Item Code: #KGP-627

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • Media Aur Hindi Sahitya
    Raj Kishore
    250 225

    Item Code: #KGP-303

    Availability: In stock

    मीडिया और हिंदी साहित्य
    मीडिया और साहित्य का रिश्ता बिगड़ चुका है। इसमें संदेह नहीं कि आदर्श या लक्ष्य की दृष्टि से दोनों की मूल संवेदना एक है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को शिक्षित करना और सभ्यता के स्तर को ऊँचा उठाना है। दोनों भाषा में ही काम करते हैं, जो एक सामाजिक घटना है। इसके बावजूद आज मीडिया और साहित्य के बीच गहरी होती हुई खाई दिखाई देती है। यह खाई चिंताजनक इसलिए है कि मीडिया की पैठ और लोकप्रियता अधिक होने के कारण जनसाधारण के संस्कारों और रुचियों का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। दूसरी तरफ, साहित्य की दुनिया संकुचित होती जाती है और उसकी संवेदना का सामाजिक विस्तार नहीं हो पाता। इस तरह, संस्कृति की दुहरी क्षति होती है।...
    जहाँ तक साहित्य और मीडिया के रिश्ते का सवाल है, हिंदी का मामला न केवल कुछ ज्यादा निराशाजनक है, बल्कि ज्यादा पेचीदा भी है। साधारण जनता से सीधे जुडे़ होने के कारण हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की सामाजिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। संस्कृति की दृष्टि से हिंदी का संसार एक विकासमान संसार है। हिंदी प्रदेशों में साक्षरता का स्तर हाल ही में बढ़ा है और पढ़ने तथा जानने की भूख जगी है। मीडिया का काम इस भूख को सुरुचि-संपन्नता के साथ तृप्त करना है और व्यक्ति के सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकारों को मजबूत करना है। कुछ समय पहले तक स्थिति जैसी भी थी, बहुत अधिक असंतोषजनक नहीं थी। मीडिया में लेखकों का मान था और साहित्य के लिए कुछ सम्मानजनक स्थान हमेशा सुरक्षित रहता था, लेकिन आज नौबत यह है कि दोनों के बीच अलंघ्य दूरी पैदा हो चुकी है। ऐसे में सामाजिक दबाव का रास्ता ही असरदार हो सकता है। 
  • Malyalam Ke Mahaan Kathakaar : Srijan-Samvaad
    Dr. Arsu
    200 180

    Item Code: #KGP-902

    Availability: In stock

    मलयालम के महान कथाकार : सृजन-संवाद
    अन्तर्सबंधों की मजबूती से ही संस्कृति टिकाऊ बनेगी । कला और संस्कृति के माध्यम से ही यह प्रक्रिया संभव  होगी । भाषायी अजनबीपन के कोहरे को मिटाने पर ही मानवीय सोच-संस्कार का क्षितिज विशाल बनेगा ।
    बहरहाल भाषायी कठमुल्लेपन को हटाकर हम हिंदी को सर्वभारतीयता का प्रतीक बनाना चाहते हैं । उसके लिए भाषायी भाईचारा पहले मज़बूत बने । उत्तर-दक्षिण का खुला संवाद इसका एक रास्ता है ।
    यह कृति मलयालमभाषी हिंदी लेखक डॉ० आरसु की साहित्यिक तीर्थयात्रा का परिणाम है । इसके पीछे एक विराट लक्ष्य है । यह भाषायी समन्वय का कार्यक्षेत्र है । सुदूर दक्षिण के प्रांत केरल में रहकर कई साहित्यकारों ने अमर कृतियाँ लिखी हैं । उनकी कृतियां भी राष्ट्र भारती की संपदा हैं ।
    तकषी शिवशंकर पिल्लै, एस०के० पोटटेक्काटट और एम०टी० वासुदेवन नायर को इस भाषा में कृतियां लिखकर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था । उनके समानधर्मी और भी कई कथाकार हैं ।
    सृजन-क्षण की ऊर्जा, उन्मेष और उलझन पर उनके विचारों से अवगत होने के लिए अब हिंदी पाठकों को एक अवसर मिल रहा है । दक्षिण भारत की एक भाषा के साहित्यकारों के साक्षात्कार पहली बार एक अलग पुस्तक के रूप में हिंदी पाठकों को अब मिल रहे हैं ।
    मलयालम के बीस कथाकारों के हृदय की नक्षत्रद्युति यहाँ हिंदी पाठकों को मिलेगी । कुछ विचारबिंदु वे अवश्य आत्मसात् भी कर सकेंगे। हिंदी भेंटवार्ता के शताब्दी प्रसंग में प्रकाशित यह कृति एक कीर्तिमान है । इस कृति के माध्यम से मलयालम और हिंदी हाथ मिलाती हैं । दक्षिण के हृदय को उत्तर समझ रहा है । यह सांस्कृतिक साहित्यिक समन्वय की एक फुलझड़ी है ।
  • Kanhaiyalal Nandan : Rachna-Sanchayan
    Krishna Dutt Paliwal
    595 536

    Item Code: #KGP-9047

    Availability: In stock


  • Vrinda
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-91

    Availability: In stock

    वृन्दा
    "मैं वृन्दा के बिना अपने होने की कल्पना भी नहीं करता । अब कैसे जिऊँगा और क्यों जिऊँगा ? अब मुझे भी कोई रोक नहीं सकता---पर हाँ वृन्दा, जाने से पहले तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ--काना चाहता हूँ... "  शास्त्री जी कुछ संभलकर खडे हो गए ।
    सब उत्सुकता से उनकी और देखने लगे ।
    वृन्दा की ओर देखकर शास्त्री जी बोले--“मुझे जीवन के अंतिम क्षण तक एक दु:ख कचोटता रहेगा कि तुमने 'गीता' पढी तो सही, पर केवल शब्द ही पढे तुम 'गीता' को जीवन में जी न सकी । तुम हमेँ छोड़कर जा रही हो, यह आघात तो है ही; पर उससे भी बड़ा आघात मेरे लिए यह है कि मेरी वृन्दा 'गीता' पढ़ने का ढ़ोंग करती रही । जब युद्ध का सामना हुआ तो टिक न सकी । मुझें दु:ख है कि तुमने 'गीता' पढ़कर भी न पढी। वृन्दा ! 'गीता' सुनकर तो अर्जुन ने गांडीव उठा लिया था और तुम हमें छोड़कर, उस विद्यालय के उन नन्हे-मुन्ने बच्चों को छोड़कर यों भाग रहीं हो मुझे तुम पर इतना प्रबल विश्वास था ।  आज सारा चकनाचूर हो गया । ठीक है, तुम जाओ... जहाँ भी रहो, सुखी रहो...  सोच लूँगा, एक सपना था जो टूट गया ।"

    (इसी उपन्यास से)
  • Namaskar Bharat Mera Mahan
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-314

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • Paisa Aapka Bhavishya Aapka
    Ajay Shukla
    240 216

    Item Code: #KGP-9362

    Availability: In stock

    ‘अर्थ’ (धन) इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसे ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ में शामिल किया गया है। कोई भी युग हो, कोई भी देश, कोई भी सभ्यता हो या कोई भी संस्कृति—रुपयों के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन रहा है। आज तो चारों ओर पैसे का बोलबाला है। उसकी चमक और खनक के सामने सब फीका है। ...और यह जरूरी भी है कि सुखपूर्वक जीवन की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास यथेष्ट पैसा हो।
    प्रश्न है कि पैसा किस तरह बचाया और बढ़ाया जाए। सीमित आय वालों को ‘मनी मैनेजमेंट’ सिखाने के लिए ही अजय शुक्ला ने पैसा आपका भविष्य आपका नामक पुस्तक लिखी। आसान भाषा और दिलचस्प शैली में यह पुस्तक पाठकों को बताती है कि छोटी-छोटी बचतों और कुछ सावधानियों से भविष्य के लिए पैसा बचाया जा सकता है। बुढ़ापे में जब कमाने की शक्ति नहीं रहती, अनेक तरह की हारी-बीमारी घेर लेती हैं और कई बार जब अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं तब बचाया हुआ पैसा ही काम आता है। किसी ने कहा है कि पैसा भगवान् तो नहीं है, पर भगवान् से कम भी नहीं है।
    प्रस्तुत पुस्तक को जिन अध्यायों में संयोजित किया गया, वे हैं—बचत प्रबंधन, बीमा, इंटरनेट का प्रयोग, मुद्रास्फीति, आयकर, निवेश के मूल सिद्धान्त, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, निवेश के साधन, स्वर्ण में निवेश, घर/प्राॅपर्टी में निवेश, पोर्टफोलियो बनाना, वसीयतनामा, रिटायरमेंट प्रबंधन। इन अध्यायों को पढ़कर सुखी, निश्चिंत  व धन संपन्न भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Meri Pratinidhi Kahaniyan
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1949

    Availability: In stock

    मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ
    राकेश के घर पर जैसे आँसुओं का समंदर ही उमड़ आया था। सुदर्शना को उस समुद्र में डूबते जहाज-सा वह ताबूत दिखाई दिया, जिसमें उसका ‘सब कुछ’ था। आज उसे न माँ-बाप की ममता बाँध सकी, न ही सास-ससुर की लाज रोक सकी। आँधी की तरह वह आगे बढ़ी और ससुर के साथ खड़ी हो गई, "मैं भी कंधा दूँगी।"
    दुल्हन-सी सजी सुदर्शना को देख सैनिक भी हक्के-बक्के रह गए। सब चौंक उठे, "क्या कहती है लाड़ी ? पगला गई है ? ऐसा भी कभी हुआ है आज तक ?"
    जवाब में सुदर्शना ने और कसकर अरथी को पकड़ लिया। उसकी चुप्पी जैसे बोल उठी, ‘आज तक ऐसा शहीद भी न हुआ था कभी। मैंने बचपन से हर पल जिसका साथ दिया, आज उसकी अंतिम यात्रा में साथ कैसे छोड़ दूँ ?’
    अरथी उठाकर लोग चल पडे़। ‘कारगिल का शहीद राकेश अमर रहे!’ के घोष से गूँज उठा धरती-आकाश।
    तभी वह रुक गई, "ठहरो, जरा...स्वेटर...स्वेटर..."
    उसने माँ की ओर देखते हुए पुकारा। माँ तीर की तरह आगे आई और एक नया बुना स्वेटर लाकर उसे दे दिया। उसने उसे खोला और बड़े प्यार से अपने पति की छाती पर सजा दिया। बोली, "तुमने चिट्ठी में लिखा था। मैंने तैयार कर रखा है। इसे पहनकर जाओ। अब ठंड न लगेगी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी ‘स्वेटर’ से]
  • Mera Sangharsh : Hitler Ki Aatmakatha
    Ramchandra Verma Shastri
    580 522

    Item Code: #KGP-2016

    Availability: In stock

    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा)
    हिटलर की आत्मकथा को हिन्दी में प्रकाशित करने का उद्देश्य उसके उन दोषों को प्रकाशित करना नहीं है, जिनके कारण वह काफी बदनाम हुआ ।  उसकी बदनामी के तीन मुख्य कारण थे--फासिस्टवादी विचारधारा, जातीयतावाद और युद्ध की मानसिकता । इन्हें तीन कारणों से उसे विश्व-मानवता का शत्रु समझा जाता है । किन्तु उसकी राष्ट्रवादी मनोवृति एक ऐसा तत्त्व या, जिसने उसके चरित्र को काफी ऊँचा उठाया।  इसी उम्र राष्ट्रवादी प्रवाह की लपेट में वह दूसरे दोषों का भी शिकार हो गया । यह आत्मकथा उसकी राष्ट्रवाद की इसी भावना को उजागर करती है।  राष्ट्रवाद से अभिप्राय जातीय संकीर्णता नहीं है, बल्कि मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा और असीम गौरव का नाम ही सच्चा राष्ट्रवाद है ।
    अपने देश से प्रेम, उसके प्रति निष्ठा, देशवासी होने का स्वाभिमान, देश के लिए बलिदान की भावना तथा राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की चाह जैसे गुणों की हमारे देश को आज कितनी जरूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं । इसका जीता-जागता उदाहरण हमें हिटलर की प्रस्तुत आत्मकथा में पढ़ने को मिलता है ।
    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा) को हिन्दी में प्रकाशित करने के पीछे हमारा परम उद्देश्य यही है कि इसके अध्ययन-मनन से देशवासियों में सच्चे राष्ट्रवाद की भावना का जन्म हो ।
    हिटलर की इस पुस्तक 'मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्पकथा)' में ऐसे अनेक सन्दर्भ मिलते हैं, जिनसे राजनीति के स्वरूप, राजनीतिज्ञों के आचरण, संसद की भूमिका, शिक्षा के महत्त्व, श्रमिकों एवं साधारण जनमानस की मानसिकता, नौकरशाही, भाग्य एवं प्रकृति, मानवीय मूल्यों और सबसे बढ़कर राष्ट्रीय भावना की महानता आदि का बोध होता है ।
    इस पुस्तक का एक उद्देश्य 'चेतना' है तो उसके साथ-साथ इसका दूसरा उद्देश्य 'चेतावनी' भी है । स्वतन्त्र भारत के युवा वर्ग में राष्ट्रप्रेम की चेतना पैदा करना है । भारतीय समाज में बढ़ रही राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक बुराइयों, राजनीतिक दलों की बढती संख्या, क्रुछ राजनीतिज्ञों में बढ़ता निहित स्वार्थ देश-सेवा के नाम पर परिवार सेवा की प्रवृत्ति, सार्वजनिक जीवन में फैलता भ्रष्टाचार, जैसे-तैसे धन बटोरने की निरन्तर बढती लालसा, धर्म, जाति और भाषा के नाम पर होने वाली व्यापक हिंसा और काम से जी चुराने की मानसिकता आदि कुछ ऐसी बुराइयाँ है, जो समकालीन भारतीय समाज को खोखला कर रहीं हैं। इन्हें रोकने चेतावनी देना इस पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य है । यदि समय रहते इन बुराइयों को न रोका जाता तो 'हिटलर' के पैदा होने की संभावनाएँ बढ़ जाती है । ऐसा हिटलर, जो सम्पूर्ण प्रजातंत्रीय व्यवस्था को उखाड़ फेंके । बुराई को बताना भी बुराई से बचने की प्रेरणा देने का एक माध्यम है । इस रूप में यह पुस्तक हमारे विशाल टेश को चेतावनी देकर उसमें चेतना लाने का प्रयास है।
  • Lekhak Ki Chherchhar
    Kashi Nath Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-434

    Availability: In stock

    लेखक की छेड़छाड़ 
    आलोचना की भाषा और रचना की भाषा एक नहीं हो सकती–इस मानने वाले लोग हैं लेकिन काशीनाथ सिंह ऐसे लेखक हैं जिनका प्रबल विश्वास है कि आलोचना भी रचना है । 'लेखक की छेड़छाड़' में उनके इस विश्वास के आधार देखे जा सकते हैं । काशीनाथ सिंह के मूल स्वभाव यहाँ भी देखा जा सकता है–बतकही, चुहल और मजे-मजे में जमाने भर की बात कह देना । वे अपने साथ चलने वाले समकालीनों के काम पर नजर डालते हैं तो अग्रजों को अघर्य  भी देते हैं । उनके अपने कहानी लेखन के अंतरसूत्रों को जानना हो या अभी-अभी के नए कथा परिदृश्य का सिंघावलोकन, यहाँ सब मौजूद है । 'अपना मोर्चा' और 'कशी एक अस्सी' जैसे कालजयी उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया में केवल शोधार्थियों की ही दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही लेखक की सामाजिक भूमिका पर बहस पर किन्हीं ख़ास पाठकों की। यह एक अनुपम गद्य सर्जक के ही बुते की बात है कि वह धूमिल जैसे कवि पर आलेख लिखता है तो गोदान का नए जमाने में महत्त्व भी खोज पाता है । यहां भी काशीनाथ सिंह की पहले दर्जे की गद्य सर्जन का आस्वाद लिया जा सकता  है जो आलोचना, लेख, मूल्यांकन, समीक्षा या स्मृति लेख के रूप में आए हैं । यह लेखक की छेड़छाड़ तो है लेकिन इस छेड़छाड़ की व्यंजन गहरी है और मार दूर तक जाने वाली है । 
  • Sangharsh Ki Pratimurti : Aang Saan Su Ki
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-1564

    Availability: In stock

    आंग सान सू की यह नाम एक ऐसी महिला का है, जिसने अपने असाधारण धैर्य और असीमित देशप्रेम की भावना से अपने देश बर्मा को 70 वर्ष की तानाशाही सैन्य सरकार से मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र की स्थापना करके विश्च भर को नारी-शक्ति से परिचित कराया हैं। इस महान् महिला सू की का जीवन कठिन संघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहने के गुण और तानाशाहों की कुटिल प्रताड़नाओँ से भरा रहा है।
    प्रस्तुत पुस्तक 'संघर्ष की प्रतिमूर्ति -- आंग सान सू की : जीवन दर्शन' में आंग सान सू की के जीवन से जुडी घटनाओँ व तथ्यों को सरस, सरल और रोचक भाषाशैली में कलमबद्ध करने का प्रयास किया गया है। अहिंसा को अपना प्रमुख अस्त्र मानने वाली आंग  सान सू की के जीवन पर आधारित यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठक को अवश्य रुचिकर लगेगी।

  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Delhi
    Khushwant Singh
    400 340

    Item Code: #KGP-818

    Availability: In stock


  • Angrezi Ki Rangrezi
    Raj Kumar Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-2091

    Availability: In stock

    राजकुमार गौतम में लेखन की जो पकड़ है, वह द्वार अपेक्षाकृत मुश्किल विधा (व्यंग्य) में भी एक हद तक उनका साथ निभा जाती हैं । यही वजह है कि संग्रह के कुछ व्यंग्य, गौतम के व्यंग्यकार की संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं । रचनाएँ प्राय: निबंध-शैली में हैं ।  भाषा व्यंग्यकार का सबसे प्रभावी औजार है; यत्र-तत्र उसकी चमक यहां भी दिखाई पड़ती है ।
  • Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-595

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
    रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
    रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
    रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
    विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।
  • Sampurna Baal Kavitayen : Balswaroop Rahi
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    300 270

    Item Code: #KGP-470

    Availability: In stock

    बालस्वरूप राही हिंदी के अत्यंत सम्मानित और दिग्गज बालकवि हैं, जिनकी कविताएँ कई पीढ़ियों से बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी रिझाती आई हैं। कथ्य के अनूठेपन और नदी सरीखी लय के साथ बहती उनकी कविताओं ने बाल कविता का समूचा परिदृश्य ही बदल दिया। सच तो यह है कि राही जी बच्चों के लिए लिखने वाले उन बड़े कवियों में से हैं जिनकी कविताएँ पढ़-पढ़कर एक पीढ़ी जवान हो गई, पर इन कविताओं का जादुई सम्मोहन आज भी वैसा ही है। इन कविताओं में बच्चों के मन, सपनों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को बोलचाल की बड़ी ही सीधी-सहज भाषा में ऐसी नायाब अभिव्यक्ति मिली कि आज भी हजारों बच्चे राही जी की बाल कविताओं के मुरीद हैं और उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं। खासकर ‘चाँद’ पर लिखा गया उनका एक बालगीत तो इतना प्रसिद्ध हुआ कि बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए लिखने वाले साहित्यिकों में भी उसकी धूम रही और आज भी इसे बाल कविता में एक ‘युगांतकारी’ मोड़ के रूप में याद किया जाता है। चंदा मामा की पुरानी शान और ठाट-बाट यहाँ गायब है और बच्चा कुछ-कुछ ढिठाई से उसकी ‘उधार की चमक-दमक’ पर व्यंग्य करता है। यह नए जमाने के बदले हुए बच्चे का गीत है, जो चंदा मामा पर पारंपरिक ढंग से लिखे गए सैकड़ों बालगीतों से अलग और शायद सबसे मूल्यवान भी है।
    राही जी ने एक ओर बच्चों के कोमल मनोभावों और शरारतीपन पर खूबसूरत कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर ऐसी कविताएँ भी जिनमें खेल-खेल में बड़ी बातें कही गई हैं। उनकी कविताएँ एक अच्छे दोस्त की तरह बच्चों को हाथ पकड़कर एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जिसमें बड़ों की डाँट-डपट और ‘यह करो, वह न करो’ से मुक्त एक ऐसा मनोरम संसार है, जिसमें प्रकृति के एक से एक सुंदर नजारे हैं और आनंद के सोते बहते हैं। पर इसके साथ ही राही जी अपनी कविताओं में अनायास ही एक ऐसा प्रीतिकर संदेश भी गूँथ देते हैं, जो बच्चों के दिल में उतर जाता है और उन्हें सुंदर भावनाओं और संकल्पों वाला एक बेहतर इनसान बनाता है। 
    राही जी के शिशुगीतों में भी बड़े मनोहर रंगों के साथ कुछ नई और मोहक भंगिमाएँ हैं। कार पर लिखा गया उनका एक चुटीला शिशुगीत तो बार-बार याद आता है जिसमें बच्चे का गर्व देखने लायक है, ‘पापा जी की कार बड़ी है / नन्ही-मुन्नी मेरी कार / टाँय-टाँय फिस्स उनकी गाड़ी / मेरी कार धमाकेदार।’ जो कवि बच्चे का मन पढ़ना जानता हो, वही ऐसे शिशुगीत लिख पाएगा जो खेल-खेल में बच्चे की जबान पर चढ़ जाएँ। और राही जी इस मामले में उस्ताद कवि हैं, जिनकी दर्जनों कविताएँ न सिर्फ बच्चे झूम-झूमकर गाते-गुनगुनाते हैं, बल्कि वे बाल कवियों के लिए भी नजीर बन चुकी हैं।
    बाल साहित्य के शिखर कवि बालस्वरूप राही की बच्चों के लिए लिखी गई चुस्त-दुरुस्त और मस्ती की लय में ढली कविताएँ एक साथ, एक ही पुस्तक में बच्चों को पढ़ने को मिलें, यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं। हिंदी बाल साहित्य की यह ऐतिहासिक घटना है, इसलिए भी कि बाल कविता के इतिहास के सर्वोच्च नायकों में राही का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उम्मीद है, राही जी की संपूर्ण बाल कविताओं का यह संचयन बच्चों के साथ-साथ सहृदयजनों और हिंदी के साहित्यिकों को भी हिंदी बाल कविता के सबसे सशक्त और सतेज स्वर से रू-ब-रू होने का अवसर देगा।
  • Paanch Absord Upanyas
    Narendra Kohli
    80 72

    Item Code: #KGP-2084

    Availability: In stock

    पाँच एब्सर्ड उपन्यास
    जब एक उपन्यासकार की कलम, कार्टूनिस्ट की दृष्टि पा जाती है तो एब्सर्ड उपन्यासों की रचना होती है । नरेन्द्र कोहली की इन पाँच रचनाओं में आपको उपन्यास का गठन, व्यंग्य-चित्रकार की पैनी दृष्टि, एक अनोखा अप्रस्तुत विधान, तीखा-करारा व्यंग्य तथा समकालीन जीवन की कुतर्कशीलता अपनी समग्रता में उपलब्ध होगी । सर्वथा नवीन कथ्य, शिल्प, शैली और विधा ! व्यंग्य-लेखन का एक सर्वथा नवीन आयाम ! इन रचनाओं में आपको व्यंग्य अपनी संपूर्ण गंभीरता में मिलेगा और आप समझ पाएँगे कि व्यंग्य हँसाने के साथ-साथ रुला भी सकता है, घावों को कुरेद भी सकता है और व्यक्ति को उसके आक्रोश का जीवन्त साक्षात्कार भी करा सकता है ।
  • Dust Pratinidhi Kahaniyan Ramakant
    Ramakant
    300 270

    Item Code: #KGP-9348

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां  रमाकान्त
    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार रमाकान्त की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘तेवर’, ‘उसकी लड़ाई’, ‘जिंदगी भर का झूठ’, ‘व्यतिक्रम’, ‘क्रेमलिन टाइम’, ‘पेड़ के साथ’, ‘कार्लो हब्शी का संदूक’, ‘भागमनी आएगी’, ‘सड़क, शहीद और नाम’ तथा ‘एक विपरीत कथा’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार रमाकान्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Kavi Ne Kaha : Vijendra
    Vijendra
    150 135

    Item Code: #KGP-1874

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विजेन्द्र
    विजेन्द्र हमारे समय के विशिष्ट और बडे समर्थ कवि हैं । उनमें नवीनता के साथ अपनी जातीय स्मृतियों को कविता से कलात्मक ढंग से गूँथने का विरल कौशल है । अतः वे कविता अपने समय की लिखकर अपनी महान् काव्य-परंपरा को भी अपने अंदर सहेजे-समेटे रहते हैं । निराला और त्रिलोचन की परंपरा में उन्हें देखने के पीछे एक तर्क यह भी है कि वे सृजन और व्यवहार को अलग-अलग नहीं मानते । उनका काव्य उनकी जीवनचर्या से अलग नहीं है ।
    विजेन्द्र की काव्य भाषा सदा नए विवाद उठाती रही है, क्योंकि यह लोक-चेतन कवि सदा भाषा के बने-बनाए ढाँचों को तोड़ता रहा है। उनकी भाषा लोक और जनपदों की और सहज भ्रमण करती है । इसलिए उनकी कविता में लोक संस्कृति की विकासोन्मुख छवियों और बिंब बराबर दिखाई पडते हैं । इससे विजेन्द्र की कविता का संसार व्यापक और विस्तृत ही नहीं हुआ, बल्कि उसमें अपने समय के बहुआयामी यथार्थ को कहने की शाक्ति भी पैदा हुई है ।
    विजेन्द्र जैसे कवि की अनन्य सहजता अलग से पहचानी जाती है । इस कवि ने एक लंबी तनाव-भरी संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है । उनके अब तक छपे दस संकलनों की कविताओं को मिलाकर पढ़ने से एक ऐसी रचना-प्रक्रिया से हमारा सामना होता है जो एक साथ बहुआयामी और विकसनशील है । ज्यों-ज्यों कवि उग्र और अनुभव में परिपक्व होता गया है उसकी संवेदना भी त्यों-त्यों अधिक सघन और समृद्ध होती गई है ।
  • Vipathgami
    Mastram Kapoor
    80 72

    Item Code: #KGP-2044

    Availability: In stock

    विपथगामी
    विपथगामी उस युवा पीढ़ी की कहानी है जिसे डॉ० राममनोहर लोहिया कुजात पीढ़ी  कहते थे । यह ऐसी पीढ़ी है जो अतीत की जकड़नों से मुक्त होकर भविष्य की तलाश करना चाहती है । जो समाज की वर्तमान नैतिकता का संदेह की नजर से देखती है और उस नैतिकता की खोज में भटकती है जो मानय की जन्मजात आकांक्षाओं  स्वतंत्रता, समता और बंधुता को न कुचले । 
    पचास के दशक के प्रारंभिक वर्षों में महानगर बंबई के क्रूर वातावरण से अपने लिए जमीन तलाशती यह पीढी सद्य:प्राप्त स्वतन्त्रता से मोह-भंग की स्थिति से गुजरती है जब वह यह देखती है कि कही कुछ नहीं बदला है । वह पाती है कि कानून की नजर में हर आदमी अपराधी है जब तक यह अपने को निर्दोष सिद्ध नहीं करता न कि (जैसा कि कानून दावा करता है) हर आदमी निर्दोष है जब तक कि वह अपराधी सिद्ध नहीं होता ।
  • Main Aur Meri Shrimati
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7813

    Availability: In stock


  • Kharra Aur Anya Kahaniyan
    Subhash Sharma
    460 414

    Item Code: #KGP-9366

    Availability: In stock

    ‘आजादी! वह भी औरतों की! क्या होती है यह आजादी? इसका रंग क्या होता है? बू क्या होती है? स्वाद क्या होता है? काश, एक बार मिल जाती तो मैं उसे छूकर, सूंघकर, चखकर देखती। फिर उसे पकड़कर कलेजे से भींचकर रोती...।’—प्रस्तुत कहानी संग्रह खर्रा और अन्य कहानियां की कहानी ‘कुहुकि कुहुकि जिया जाय’ की इन पंक्तियों में जो प्रश्नाकुलता है, वह बहुत मूल्यवान है। कोई भी रचना यदि सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की सभी कहानियां समकालीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को बड़े परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के लेखक सुभाष शर्मा यथार्थवादी लेखक हैं। कहानी में कथानक, सामाजिक सरोकार, विवरणधर्मिता और युक्तिसंगत समापन में उनका भरोसा है। यही कारण है कि सुभाष की कहानियां बेहद पठनीय हैं और पाठक की चेतना को झकझोरती हैं।
    इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां व्यवस्था और सत्ता के भीतरी सच को बयान करती हैं। अनेक कहानियां शिक्षा तंत्र के तहखानों को रोशनी में लाती हैं। योग्यता, अवसर और दायित्व का उपहास करती स्थितियों व मनोवृत्तियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ कहानीकार ने उजागर किया है। इस संग्रह में स्त्री के  संघर्षमय संसार को चित्रित किया गया है। बिना किसी विमर्श के जाल में उलझे हुए लेखक ने स्मरणीय कहानियां लिखी हैं।
    ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि बिना लाउड हुए या बिना प्रचारात्मक हुए सुभाष शर्मा ने वर्तमान राजनीति के बहुलांश चरित्र को कहानियों में उतार दिया है। इस चरित्र को चित्रित करने में लेखक की अर्थगर्भित भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘दास्तान-ए-सुबूत’ में लेखक कहता है, ‘पहले कार्यकाल में वह जान गए थे कि खजाना कहां-कहां है। चुनाव, मुकदमा, राजनीतिक षड्यंत्र आदि में जितना खर्च हुआ था, उसकी भरपाई उन्होंने सुपरसोनिक गति से करना शुरू कर दिया।’ ऐसी व्यंजक भाषा में रची गईं ये कहानियां यथार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ निश्चित रूप से एक पठनीय और उल्लेखनीय कहानी संग्रह है।
  • Suraj Se Puchhen
    Neelam Kanvdia
    60 54

    Item Code: #KGP-9035

    Availability: In stock

    सूरज से पूछे
    रचना कब, क्यों, कहां, कैसे, कैसी जन्म लेती है,
    यह रचनाकार स्वयं भी नहीं जानता, न बता
    सकता है । लेकिन जीवन में कभी ऐसा पल, अवसर
    या प्रसंग आ जुटता है जो रचनारत करता है, तो
    कभी रचनाकर्म को एक नया आयाम,
    नए क्षितिज दे जाता है ।
    श्रीमती नीलम कावडिया के जीवन में ऐसा एक
    अवसर आया, रक्षाबंधन के दिन भानुजी के
    राखी बंधवाने के लिए घर आने पर ।
    राखी बाँधकर नीलमजी ने अपनी एक कविता
    भानुजी को सुनाई। उस पुरस्कृत कविता
    को सुनकर भानुजी गंभीर हो आए ।
    बाद को एक दिन वह प्रसंग उठाने पर भानुजी ने
    जो उत्तर दिया उसे सुनकर नीलमजी तत्काल
    तो मौन रह गई लेकिन वह मौन कहीं
    अंतरतम में बार-बार, लगातार गुंजित होता रहा,
    मथता रहा रचनाकार को,
    उनकी सोच, समझ और दृष्टि को ।
    अनंतर जब अंतरतम की वह गुँज बाहर मुखरित हुई
    तब सामने आई ये कविताएँ, जिन्होंने न केवल
    नीलमजी की दिशा ही बदल दी,
    साहित्य-जगत को मिली एक अनूठी काव्यकृति
    'सूरज से पूछें'। 
  • Dushyant Kumar Rachanavali (Four Vols.)
    Vijay Bahadur Singh
    2250 2025

    Item Code: #KGP-834

    Availability: In stock

    Complete Set of 4 Volumes.
  • Pracheen Bharat Ki Kathayen
    Mangal Dev Upadhyaya
    60 54

    Item Code: #KGP-9108

    Availability: In stock

    ऋषि ने अश्विनी कुमार की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कहिये, आपको क्या चाहिए?’’
    अश्विनीकुमार ने निवेदन किया, ‘‘मधु-विद्या का रहस्य।’’
    ऋषि विस्मय-चकित हो उठे। उनके मुख से विस्मय भरे स्वर में अपने आप निकल पड़ा ‘‘मधु-विद्या का रहस्य!’’
    अश्विनीकुमार ने कहा, ‘‘हां ऋषिश्रेष्ठ, मधु-विद्या का रहस्य। मधु-विद्या के रहस्य से ही हमारा दैन्य दूर हो सकता है, हमारी व्यथाग्नि शान्त हो सकती है।’’
    ऋषि विचारों में डूब गए। उन्होंने सोचते हुए कहा, ‘‘पर मैं मधु-विद्या का रहस्य किसी अन्य पर प्रकट नहीं कर सकता। यदि मै। प्रकट करूंगा तो...।’’
    अश्विनी कुमार बीच में ही बोल उठे, ‘जानते हैं ऋषिश्रेष्इ! यदि आप प्रकट करेंगे, तो देवराज के द्वारा आपको शिरोच्छेद कर दिया जाएगा।’’
    ऋषि ने सोचते हुए कहा, ‘‘हां, यही बात है इस बात को जानते हुए भी आप मुझससे मधु-विद्या का रहस्य प्रकट करने के लिए कह रहे हैं?’’
    -इसी पुस्तक से
  • Baapu Qaid Mein
    Rajendra Tyagi
    120 108

    Item Code: #KGP-1824

    Availability: In stock

    बापू कैद में
    आवाज : ठीक, बहुत ठीक । वैसे भी तुम लोग अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, क्योंकि अब मैं आजाद हूँ देहमुक्त हूँ। (विराम) तुन्हीं ने तो अपनी गोली से मुझे आजाद किया था । हाँ-हाँ, मुझे आजाद किया था और बापू को कैद !
    (कुछ देर रुकने के बाद) हाँ, मैं ठीक कह रहा हूँ बापू तुम्हारी ही कैद में है । तुन्हीं ने उन्हें कैद कर रखा है और तुम्ही बापू की समाधि पर… ! (बल देते हुए) हाँ-हाँ-हाँ! आत्मविहीन समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित का रहे हो । है ना मजाक ! "तुम नेता ही नहीं, अव्वल दर्जे के अभिनेता भी हो । जाओ, पहले बापू को आजाद करो और फिर आना उन्हें  श्रद्धांजलि अर्पित करने ।
    (क्षण-भर रुकने के बाद, अटटहास का स्थान सिसकियाँ ले लेती हैं और रुंधे गले से वही आवाज पुन: आती है) 'नहीं-नहीँ, तुम बापू को अभी आजाद नहीं करोगे, क्योकि तुममें इतना साहस ही नहीं है। तुम डरपोक हो। तुम जानते हो, बापू यदि आजाद हो गए तो देश में क्रांति आ जाएगी और तुम्हारी दुकानदारी बंद हो जाएगी ।
    (रुदन बंद और पुन: अटटहास) जाओ अपने-अपने घर लौट जाओ। नाटक बंद करो। सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा में है। बापू जब तक कैद हैं, तब तक तुम्हारा सिंहासन अटल है । क्यों गृहमंत्री जी, ठीक कहा ना मैंने ? मैं भी जा रहा के तुम भी लौट जाओं ।
    बापू आज भी प्रासंगिक है । आम जन के हदय से उनके प्रति श्रद्धा है, उनके आदर्शों व सिद्धांतों के प्रति आस्था; किंतु बापू की इस लोकप्रियता का नेता अनुचित लाभ उठा रहे हैं । उनके लिए बापू एक ब्रांड हैं । ऐसा ब्रांड, मार्केट में जिसकी साख हैं । क्योकि साख है, इसलिए उसे कैश करना वे अपना धर्म समझते है । निहित स्वार्थ व दूषित राजनीति के अनुरूप वे बापू के आदर्शों व सिद्धांतों को जैसा चाहे उसी रूप में परिभाषित कर रहे हैं । केवल आम जन को सम्मोहित करने के लिए वे बापू की दुहाई देते हैं, उनके आदर्श व सिद्धांतों की दुहाई देते है । उनके लिए बापू की बस यही उपयोगिता है। यथार्थ में बापू की हत्या किसी गोड़से ने नहीं की थी । इसी दूषित राजनीति ने की थी और अब स्वार्थ-पूर्ति के लिए इसी राजनीति ने बापू की आत्मा को कैद कर रखा है ।
  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 225

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Sant Tiruvalluvar
    Hari Krishna Devsare
    120 108

    Item Code: #KGP-9325

    Availability: In stock

    संत वळ्ळूवर
    हे दरिद्रता के आराधक-
    सहज पुजारी
    दिव्य तुम्हारा, बंधा नहीं है उन शब्दों में
    कोई वाणी तुमको व्यक्त नहीं कर पाई अब तक-
    यह संसार, परिवर्तनशील हे, सभी मत्य हैं
    किंतु तुम्हारी सुकीर्ति अमर है
    क्योंकि तुम हो विश्व मानव के चारण
    वन प्रांतर के ताड़-पत्र सी
    निःसृत ध्वनि से
    भरा हुआ है जिसका अंतर, हे वळ्ळुवर
    इन कुरलों में भरा हुआ है
    आदि सत्य, पूरा भविष्य, पूरा आगत ही
    सुख का स्वप्नातीत सत्य सब
    जन्म जन्मांतर के रहस्य-क्रम बंदी है
    यह चिंतन को क्षेत्र
    तुम विराट हो, तुम व्यापक हो
    जो शाश्वत स्वर प्रतिगुंजित है
    सहज पदों में,
    वे उज्ज्वत हें, परिच्छेद सब
    सदा रहेंगे शाश्वत
    अनुगायक होकर मनुष्य के;
    जो रहस्य है, भरा कुरल में
    शब्द-रंध्र में भाव संधि में
    सागर का उद्वेलन जिसमें
    नभ में छाए श्यामल घन में (भी दिखते तुम)
    दूर-दूर तक तुम प्रतिगुंजित
    दूर-दूर तक, अणु-अणु क्रम में
    व्याप्त तुम्हारे गीतों के स्वर
    विश्व की मानवता के तुम पथबंधु,
    निष्कलंक आत्म-द्रष्टा!

    -डाॅ जी. यू. पोप (हिंदी अनुवाद: एन. सुंदरम)
  • Teen Taal
    Sanjay Kundan
    335 302

    Item Code: #KGP-9340

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध कथाकार संजय कुंदन का नवीनतम उपन्यास तीन ताल समकालीन यथार्थ को उसके समुचित कद में चित्रित करती रचना है। संजय अपने लेखन में जनप्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। व्यवस्था और सत्ता के अंतर्विरोध वे कलात्मक कुशलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं।
    ‘तीन ताल’ के केंद्र में तीन चरित्रा हैं—सुमित, पारुल और अभिषेक। उनमें मित्राता की अद्भुत लय है। सुमित पत्रकारिता के संकटों का सामना कर रहा है, पारुल अपनी सार्थकता हासिल करने के लिए छटपटा रही है और अभिषेक एक बड़ी कंपनी में काम करते हुए पाखंड का नग्न रूप देख रहा है। इन व्यक्तियों, संघर्षों के साथ देश-समाज की ज्वलंत समस्याएं गुंथी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार। इसने राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति को पंगु-सा कर दिया है। संजय एक स्थान पर लिखते हैं—‘लड़ाइयां चल रही थीं। छोटी-बड़ी कितनी लड़ाइयां। हो सकता है ये सब मिलकर एक दिन बड़ी लड़ाई का रूप ले लें। इसलिए संघर्ष रुकना नहीं चाहिए।’ क्योंकि तभी ‘नीला निरभ्र आकाश’ और ‘एक महीन चंपई-सी रेखा’ दिखने की संभावना निर्मित हो सकती है।
    यह उपन्यास रोचक कथानक के साथ कई जरूरी सवालों से भी गुजरता है। ध्वस्त होती पत्रकारिता, इंटेलेक्चुअल दलाल, भीषण बेरोजगारी, एनजीओ की लूटपाट, जनजागरूकता और काॅमर्स के बीच मारक संघर्ष, स्त्राी-पुरुष संबंधों का तनाव, योग्यता की उपेक्षा...आदि-इत्यादि। सवालों के साथ समाधन के लिए उठ खड़ा एक जन आंदोलन भी है, जिसकी अगुआई ‘छोटे गांधी’ ने की। एक हालिया इतिहास भी इस रचना में दर्ज है।
    संजय कुंदन सच को सूक्तियों में बयान करते हैं। जैसे—‘अब नौकरी का अर्थ है व्यक्ति का अनुकूलन बाजार के प्रति।’ ऐसे ही यथार्थ का मुकाबला करने के लिए ‘तीन ताल’ नाट्यदल का गठन होता है। उद्देश्य है जनजागरण। क्योंकि भविष्य संकटों से घिरा है। उपन्यासकार लिखता है—‘मुझे तो डर है कि एक दिन सब कुछ काॅरपोरेट के हाथ में हो जाएगा।’ इसलिए चेतना में ‘नवगति नवलय ताल छंद नव’ की आवश्यकता है। यानी, एक नया स्वप्न!
    ‘तीन ताल’ एक नए स्वप्न की शुरुआत है।
  • Yaksha Prashn
    Shivji Shrivastva
    110 99

    Item Code: #KGP-1946

    Availability: In stock

    यक्ष-प्रश्न
    शिवजी श्रीवास्तव नवें दशक के चर्चित कथाकारों में से हैं। 'वर्तमान साहित्य' द्वारा आयोजित कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानियों 'जाल', 'माँद' एवं 'अजगर' ने क्रमश: 1988, 1989 एवं 1990 में लगातार तीन वर्षों तक पुरस्कार जीतकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया । उनके एक रेडियो नाटक 'ऐसे तो घर नहीं बनता मम्मी' को आकाशवाणी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय रेडियो नाटय-लेखन प्रतियोगिता--1992-1993 में हिंदी वर्ग में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ । यह उस वर्ष का सर्वोच्च पुरस्कार था ।
    'यक्ष-प्रश्न' में युग की विसंगतियों से जूझते ईमानदार आदमी की कहानियाँ हैं । वस्तुत: हर युग की अपनी समस्याएं होती हैं; अपने यक्ष-प्रश्न होते हैं, जो पिछले युग से भिन्न होते है । इस युग में उपभोक्तावादी संस्कृति के विस्तार, सर्वग्रासी भ्रष्टाचार, परंपराओं की जकडन, सांप्रदायिकता इत्यादि ने आदमी को नितांत अकेला कर दिया है । इस संग्रह में आदमी के इसी अकेलेपन की व्यथा-कथा की कहानियां हैं । सामाजिक सरोकारों से जुडी इन कहानियों के विषय जिंदगी के बीच से उठाए गए है इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति कहीं न कहीँ अपने को इन कहानियों में पाता है। वस्तुत: इस संग्रह की प्रत्येक कहानी अपने में एक यक्ष-प्रश्न है, जो संवेदनशील पाठक के लिए चिंतन के नए आयाम उपस्थित करती है ।
  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-771

    Availability: In stock


  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Shailesh Matyani (Paperback)
    Shailesh Matiyani
    120

    Item Code: #KGP-7213

    Availability: In stock

    अब वह सड़क पर था और उसकी आंखें रामचन्दर हलवाई के कारीगर के जलेबी बनाते हाथ के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थीं और भूख इतनी तीखी हो चुकी थी कि वह बदहवासी अनुभव कर रहा था। अपनी इस तरह की बदहवासी से रामखिलावन को डर लगता है। ऐसे में अक्सर उसे-चोरी सूझती है और इसी में वह कई बार बुरी तरह पिट भी चुका है।
    इस बार खाट पकड़ लेने से पहले तक उसकी मां कई घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने की नौकरी करती रही थी। कभी-कभार उसे भी साथ ले जाती वह। मौका ताड़कर घर के बच्चों की रंगीन किताबें पलटने लगता और अपनी पूर्व-स्मृति से काम लेता, जोर से पढ़ता-लौ-औ-ट-पौ-औ-ट-तो वह कैसे चोंककर देखती थी? खिलावन का यह अक्षरज्ञान उसमें एक आलोक उत्पन्न करता मालूम पड़ता था।
    फटे-पुराने कपड़ों के अलावा, बचा-खुचा खाना और त्योहारों पर कभी पूरी-मिठाई। लगभग डेढ़ महीने से मां काम पर नहीं जा पाई, ए.जी. आफिस वाले शुक्ला साहब के यहां। अकेले गया था वह। किसी बड़ीह चीज के लिए गुंजाइश नहीं रहती। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त शुक्लाइन उसके पूरे जिस्म पर अपनी भैंगों आंखों को उंगलियों की तरह फिराती रहती हैं। बरतन धोते में सिर्फ दो छोअी चम्मचें उसने जांघिये की जेब में डाल ली थीं, हालांकि खुद उसके दिमाग में ही कुछ तय नहीं था कि उनका वह क्या उपयोग कर पाएगा। जाने की उतावली में वह ‘बहूजी, हम जाइत हैं’, की आवाज लगाने के साथ-साथ, तेजी से दरवाजे तक पहुंच गया था। तभी शुक्लाइन का चटख लाल चूड़ियों से भरा पंजा उसके जांघिये की जेब पर पड़ा था और बदहवासी में उसके मुंह से चीख निकल गई थी।
    -इस पुस्तक की ‘चील’ कहानी से
  • Hirni Ke Liye
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1906

    Availability: In stock

    हिरनी के लिए
    अजितकुमार का यह पांचवां कविता-संग्रह 'हिरनी के लिए' इस अर्थ में पिछले संग्रहों से भिन्न है कि जहाँ उनमें किसिम-किसिम की कविताएँ थीं, यहाँ केवल प्रेम- कविताएँ है । पर जितने अंशों में प्रेम 'विशुद्ध' से कुछ कम या अधिक एक 'मिश्रित' अनुभव है, ये कविताएँ दुख-तकलीफ, आशा-आकांक्षा-उदासी-मजबूरी आदि के भी अनुभव से जुडी नजर आएँगी ।
    वैसे तो, मैकबेथ की भाँति, कइयों के लिए, समूचा जीवन ही 'सन्निपातग्रस्त ज्वर' होता है; यहाँ, इस संग्रह की संक्षिप्त भूमिका में कवि ने जिसे अपनी 'कांजेनिटल' अर्थात 'जन्मजात' मुसीबत बताया है, उससे छुटकारा जब मिलेगा, तब मिलेगा' ...  'कड़ुवे घूंट से कि मीठी गोली से, ज्वर, देर या सबेर, कभी-न-कभी टूटेगा । रहा सन्निपात, उसके थमने या बढने का ग्राफ सामने रहे, इस लिहाज से, कवि ने पिछले संग्रहों की भी एक-एक कविता पुस्तक के अंत में नत्थी कर दी है ।
    हमें आशा है कि जिन्हें उपचार या पथ्य की आवश्यकता न हो, ऐसे पाठक भी इन कविताओं में निहित सजीवता से प्रमाणित होंगे और स्फूर्ति पाएँगे ।
  • Aadhunik Bharat Main Shaikshik Chintan
    Hari Ram Jasta
    100 90

    Item Code: #KGP-9003

    Availability: In stock

    इस सत्य पर कोई सन्देह नहीं हो सकता, कि "शिक्षा सम्बन्धी समस्त प्रश्न  अन्तत: जीवन-दर्शन से सम्बन्धित प्रश्न है । अन्य विधाओं की भाँति शैक्षिक दर्शन का मूल उद्देश्य भी शिक्षा-समस्या के विषय में ज्ञान-प्रसार है और उसे सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना है , शैक्षिक समस्याओं पर मत सब प्रकट करते हैं, पर उन्हें समझते बहुत कम लोग है । शैक्षिक चिन्तन को हम यदि एक ऐसा प्रयास कहें जिसके द्वारा मानव अनुभूतियों के सम्बन्ध में समग्र रूप से बोधगम्य बनने में समर्थ है, तो अत्युक्ति न होगी । शिक्षा दर्शन का क्रियात्मक रूप जीवन के आदर्शों को यथार्थ के धरातल पर खडा करना है ।
    मानव इतिहास में शिक्षा मानव समाज के विकास के लिए सतत क्रिया और प्रेरणा रही है । मनोवृत्तियों, मूल्यों और ज्ञान और कौशल दोनों ही क्षमताओं के विकास के माध्यम से शिक्षा लोगों की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप बनने के लिए उन्हें शक्ति का लचीलापन प्रदान करती है, सामाजिक विकास के लिए प्रेरित करती है और उसमें योगदान देने के योग्य बनाती है ।
    भारतीय संविधान में ऐसे समाज की परिकल्पना की गई है, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, प्रतिष्ठा और अवसर की समता पर आधारित है । इसमें समाजवाद, धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र के लिए देश की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया गया है ।
    दीर्घ संघर्ष के बाद भारत स्वतन्त्र हुआ । इस दौरान स्वतंत्रता आन्दोलन के नेताओं, शिक्षाशास्त्रियों और भारतीय दार्शनिको ने दूरदर्शिता से, स्वतन्त्रता के लिए, उसके बाद उसे सुदृढ़ बनाने के लिए तथा भारत में इच्छित सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए शैक्षिक चिंतन ही नहीं किया, उसे व्यावहारिक रूप देने के लिए अपने ढंग से प्रयत्न भी किए । इस शैक्षिक चिन्तन में भारतीय नागरिकों के लिए मानव एवं भौतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करके राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने और समाजवादी और सहनशील समाज स्थापित करने की परिकल्पना को व्यावहारिक रूप देने के लिए दिशा-संकेत उपलब्ध है ।
  • Sikhavan (Paperback)
    Jagdish Pandey
    40

    Item Code: #KGP-1445

    Availability: In stock

    प्रार्थना

    सुन लो भगवन विनय हमारी।
    हम सब आये शरण तुम्हारी।।

    सारे जग के रक्षक -पालक,
    हम हैं नाथ तुम्हारे बालक।
    तेरे दर के सभी भिखारी।।

    गुरु, पितु, मात, चरण अनुरागी, 
    बनें सभी ऐसे बड़भागी।
    आशीषों के हों अधिकारी।।

    विद्या पढ़ें विवेक बढ़ाएं,
    अपना जीवन श्रेष्ठ बनाएं।
    हरो ईश बाधाएं सारी।।

    शुभ कर्मों में ध्यान लगाएं,
    पर - सेवा कर नाम कमाएं।
    मातृ - भूमि के हों हितकारी।।

    हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
    रहें सदा बन भाई-भाई।
    शान तिरंगे की हो प्यारी।।
    -इस पुस्तक की ‘प्रार्थना’ कविता
  • Bankon Mein Dvibhashi Computerikaran : Dasha Aur Disha
    Jayanti Prasad Nautiyal
    245 221

    Item Code: #KGP-675

    Availability: In stock

    बैकों में द्विभाषी कंप्यूटरीकरण
    दशा और दिशा
    हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर पर कार्य करने हेतु उपलब्ध सुबिधाओं की अद्यतन जानकारी से युक्त यह पुस्तक विद्वान् लेखक के गत तीस वर्षों के भाषा प्रौद्योगिकी के अनुभव पर आधारित है।
    कंप्यूटर विज्ञान पर अंग्रेजी भाषा में बहुत-सी पुस्तकें है, परंतु हिंदी में कंप्यूटर जैसे विषय पर प्रामाणिक पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। इस अभाव की पूर्ति करने का विनम्र प्रयास है या पुस्तक। 
    यह पुस्तक कंप्यूटर जगत विशेषज्ञों द्वारा सामग्री को जाँच के बाद भारतीय रिजर्व बैंक, कृषि बैंकिंग महाविद्यालय की हिन्दी में मौलिक पुस्तक लेखन योजना के अंतर्गत प्रकाशित है। इसकी प्रामाणिकता और उपयोगिता का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है।
    इस पुस्तक में कंप्यूटर के माध्यम से हिंदी में तथा भारतीय भाषाओं में काम करने संबंधी उपलब्ध सुविधाओं, विभिन्न सॉफ्टवेयरों, पैकजों, उपकरणों पर प्रामाणिक एवं अद्यतन जानकारी दी गई है । इसमें नवंबर, 2007 तक हुए कंप्यूटर संबंधी समस्त विकास एवं सूचनाएँ और शोधपरक सामग्री समाहित हैं। माथ ही कंप्यूटर के भाषायी अनुप्रयोग संबंधी विभिन्न विषयों पर गभीर विवेचन है ।
    यह पुस्तक सभी बैकों के कर्मचारियों तथा अधिकारियो, उनके राजभाषा विभागो के कर्मचारियों व अधिकारियों, सभी विश्वविद्यालयों के बैंकिंग वाणिज्य व हिंदी में अध्ययनरत विद्यार्थियों व प्राध्यापकों, भारत सरकार के सभी कार्यालयों, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, भाषाविदों, भाषा प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों, अनुवाद विज्ञान व अनुवाद में हर स्तर के पाठयक्रम में अध्ययन-अध्यापन में कार्यरत अध्यापको एवं विद्यार्थियों कंप्यूटर निर्माण में लगे सभी सॉफ्टवेयर निर्माताओं, कंप्यूटर में नीति निर्माताओं व निरीक्षण से जुडे कार्मिकों और भाषा तथा कंप्यूटर से सरोकार रखने वाले आम पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है ।

  • Shabdon Mein Rahti Hai Vah
    Pushpita Awasthi
    390 351

    Item Code: #KGP-438

    Availability: In stock

    वेद ने प्रकृति को देवता का काव्य कहा है--पश्य देवस्य काव्यम्। इस काव्य के प्रति सबसे ज्यादा लगाव कवियों में होता है। पुष्पिता के इस काव्य-परिसर में अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति है जिसमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमो झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर तथा जाने क्या-क्या एक साथ उपस्थित है। विविध् देशों के प्राकृतिक परिवेश और कलात्मक उत्कर्ष के साथ कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व भी हैं जैसे कवि वालकट या अलेक्सजेंडर महेंद्र आदि। पुष्पिता के मन में भारत की याद भी साथ-साथ चलती है जैसे नाउदर की गायों को देखकर मथुरा, वृंदावन, गोप, गोपी और श्रीकृष्ण की याद या लांगडाईक की नहरों को देखकर बनारस की गलियों की या भारतीय पर्वों, त्योहारों और तिथियों की याद। उसकी व्यापक संवेदनशीलता उसे अनंतरूपात्मक जगत से जोड़े हुए है। इसीलिए वह विश्वव्यापी हिंसा के विरुद्ध  है।
    स्त्रिायां और बच्चे पुष्पिता के खास सरोकार हैं। कवयित्री होने के नाते स्वाभाविक भी है कि वह सैनिकों की गर्भस्थ स्त्रियों की व्यथा तथा अजन्मे शिशुओं के प्रति मां के विछोह और वात्सल्य के मर्म को अधिक तीव्रता से महसूस कर सके। एक ओर स्त्री को नाखून की तरह कुतरते और जोंक की तरह चूसते पुरुष का क्रूर बिंब उसके मन में है तो दूसरी ओर देह ढलने के बाद स्वयं ही अपना ताबूत बनती स्त्री का मार्मिक चित्रा भी। लेकिन इसके साथ ही उसकी प्रेम संबंधी कविताओं में देह का सुगंधित स्वाद और उसका बखान भी है। समय की अपराजेयता में विश्वास करते हुए भी पुष्पिता शब्द की अमरता में भरोसा रखती हैं, जो कभी मरते नहीं, जो मनुष्य की अस्मिता को बचाए रखते हैं। कहना न होगा कि यही कवि में कविता को भी जिंदा रखते हैं। मुझे विश्वास है, काव्यप्रेमी इस संग्रह की कविताओं का स्वागत करेंगे।
  • Doordarshan Evam Media Vividh Aayam
    Amar Nath 'Amar'
    260 234

    Item Code: #KGP-190

    Availability: In stock

    क्या टेलीविजन माध्यम आज अपनी राह से भटक चुका है? क्या यह अपना बुनियादी स्वरूप खोने लगा है? क्या साहित्य, कला, संगीत, नृत्य और लोकपरंपराओं की सांस्कृतिक धरोहर धुंधली होने लगी है? नहीं, ऐसा भी नहीं है। आज आम जनता इस सशक्त इलेक्ट्राॅनिक माध्यम को पब्लिक ब्राॅडकास्टर के रूप में ही देखना पसंद करती है। उनके मन में आज भी उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर दूरदर्शन पर ऐसे कौन-कौन से कार्यक्रम हैं, जिन्हें देखकर हम मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानवर्द्धन भी करना पसंद करेंगे।
    इस पुस्तक में विविध पक्षों पर लेख के रूप में विद्वानों के विचार हैं जो दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों और अन्य माध्यमों की न केवल चर्चा करते हैं बल्कि उनकी समीक्षा भी करते हैं। ये लेख कई वर्षों से धीरे-धीरे एकत्र हुए और आज एक किताब के रूप में आपके समक्ष हैं।

  • Yogkshem
    Rajendra Tyagi
    540 432

    Item Code: #KGP-286

    Availability: In stock

    योगक्षेम
    काफी विचार करने के उपरान्त मैंने गीता को उपन्यास के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया । इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों के साथ विचार-विमर्श किया । कुछ ने मेरे विचार की सराहना की तो कुछ ने यह कहते हुए कि गीता स्वयं ही एक उपन्यास है, मेरे विचार को नकार दिया । कुछ का मत था कि विचार तो उचित है, किन्तु रचना में मौलिकता का अभाव रहने का खतरा है। समझाया उनका आशय गीता के मूलपाठ की सुरक्षा से था । गीता के मूलपाठ के साथ यदि छेड़छाड़ की गई तो उसका मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा और यदि मूलपाठ के साथ छेड़छाड़ नहीं की तो उपन्यास में मौलिकता का अभाव रहने की पूरी सम्भावना है । इस प्रकार यह मौलिक कृति नहीं कहलाएगी । उनकी आशंका अपने स्थान पर उचित थी किन्तु मेरे लिए चुनौती । चुनौती स्वीकारते हुए मैंने गीता पर आधारित उपन्यास ही लिखने का अन्तिम निर्णय लिया ।
    लक्ष्यप्राप्ति के लिए मैं चिन्तन-मनन में व्यस्त हो गया और महत्त्वपूर्ण दो विचार मेरे चिन्तन में अवतरित हुए । प्रथम-गीता के विभिन्न श्लोकों के सम्बन्ध में व्याप्त भ्रान्तियों का निराकरण ।  द्वितीय—गीता में निहित शिक्षा का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या । इसके अतिरिक्त एक प्रमुख विचार यह था कि जब तक कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप चलता रहा, तब तक कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तत्पर सेनानायक व सैनिक क्या करते रहे ! मुझे यह अनुभव हुआ कि प्रथम दो विचार तो गीता को सरल व सर्वग्रासी बनाने में सहायक सिद्ध होंगे और अन्तिम विचार गीता की रोचक प्रस्तुति में सहायक सिद्ध होगा ।
    इस प्रकार गीता के मूलपाठ से खिलवाड़ न करते हुए अर्जुन व धृतराष्ट्र के माध्यम से गीता को सर्वग्राही व उपन्यास का रूप और विस्तार प्रदान करने का प्रयास किया गया है । -लेखक
  • Sampurna Baal Kavitayen : Sherjung Garg
    Sher Jung Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-469

    Availability: In stock

    हिंदी में सबसे चटख, चुटीली और नटखटपन से भरपूर बाल कविताएँ लिखने वाले डॉ. शेरजंग गर्ग उन उस्ताद बाल कवियों में से हैं, जो उचित ही आज बाल कविता के पर्याय बन चुके हैं। समूची हिंदी बाल कविता के ग्राफ को बदलकर उसके मिजाज में बड़ी तबदीली लाने वाले बाल कवियों की छोटी से छोटी सूची बनाएँ, तो भी उसमें डॉ. शेरजंग गर्ग का नाम जरूर होगा। वे हिंदी बाल कविता में पहली बार वह नटखटपन, चुस्ती और शरारती अंदाज लेकर आए, जिसने हजारों बाल पाठकों को रिझा लिया। उनके ‘गाय’, ‘दादी अम्माँ’, ‘गुड़िया’, ‘ईंट’, ‘चिड़िया’, ‘पवनचक्की’, ‘चूहा-बिल्ली’, ‘उल्लू मियाँ’ और ‘टीचर गुड़िया’ सरीखे खिलंदड़े और चुस्त-दुरुस्त शिशुगीत इस कदर चर्चित हुए कि बच्चों के साथ-साथ बड़े भी उनकी नटखटपन से भरी कोमल भावनाओं के साथ बहे और उनके जरिए फिर से अपने बचपन को जिया। खासकर गाय पर भी ऐसा नटखटपन से भरपूर शिशुगीत लिखा जा सकता है, यह डॉ. शेरजंग गर्ग को पढ़ने के बाद ही समझ में आ सकता है। 
    हिंदी में डॉ. गर्ग के अलबेले शिशुगीतों ने ही पहले-पहल यह करिश्मा किया कि वे बदलते समय और बच्चे के मन, सपने और इच्छाओं से जुड़े और वे हर बच्चे के होंठों पर थिरकते नजर आए। और यही बात उनकी गूँजदार लय वाली अपेक्षाकृत लंबी बाल कविताओं के बारे में कही जा सकती है। ‘खिड़की’, ‘नए साल का गीत’, ‘शरारत का मौसम’, ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’ तथा ‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ डॉ. गर्ग की बिलकुल नए शिल्प में ढली अद्भुत कविताएँ हैं, जिनका कोई जोड़ नहीं है। उनके यहाँ बात कहने का जो उस्तादाना अंदाज और सफाई है, वह देखते ही बनती है। 
    सच तो यह है कि हिंदी में भी विश्वस्तरीय बाल साहित्य मौजूद है, यह डॉ. गर्ग की कविताओं से गुजरते हुए ही पहले-पहल समझ में आता है, और यह भी कि हिंदी में मानक शिशुगीत और बाल कविताएँ कौन सी हैं, जिन्हें सामने रखकर बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। 
    डॉ. शेरजंग गर्ग की बेहद तराशी हुई बाल कविताओं की जादुई लय ही नहीं, उनकी कविताओं में हास्य और व्यंग्य की मीठी गुदगुदी भी बाल पाठकों को रिझाती है और वे एक बार पढ़ने के बाद, कभी उन्हें भूल नहीं पाते। उनके गीतों में जैसी पूर्णता है, वैसी कम-बहुत कम नजर आती है। इस लिहाज से वे अपनी नजीर खुद हैं और उन थोड़े से बाल कवियों में से हैं जिनका कविता पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते हैं कि यह कविता इन्हीं की है।
    डॉ. गर्ग की कविताओं का यह जादुई असर ही है कि एक पूरी पीढ़ी उन्हें गाते-गुनगुनाते हुए बड़ी हुई, तो उनके बच्चे---यानी अगली पीढ़ी भी उनकी जादुई कविताओं की उसी तरह मुरीद है। देश के किसी भी हिस्से में हम जाएँ, डॉ. शेरजंग गर्ग की कविताएँ सबसे ज्यादा बच्चों के होंठों पर नाचती नजर आती हैं। बच्चों के वे सर्वाधिक चहेते और दोस्त कवि हैं।
    डॉ. शेरजंग गर्ग सिर्फ एक बालकवि नहीं, वे बाल कविता का इतिहास रचने वाले दिग्गजों में से हैं। लिहाजा उनकी समूची बाल कविताएँ एक जिल्द में सामने आएँ, यह बरसों से बच्चों की ही नहीं, बाल साहित्य के गंभीर अध्येताओं और शोधार्थियों की भी इच्छा थी। इस पुस्तक के जरिए यह सपना पूरा हो रहा है, यह बाल साहित्य के लिए एक यादगार और ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। आशा है, बच्चे और बाल साहित्यकार ही नहीं, हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक और सहृदय पाठक भी बाल कविता की शिखर उपलब्धियों और कलात्मक लाघव से पूर्ण इस संचयन को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और खूब सराहेंगे।
  • Himalaya Ki Sanskritik Sampada
    Sudarshan Vashishath
    600 480

    Item Code: #KGP-371

    Availability: In stock

    आज भी हिमालय अपने में आदि संस्कृति छिपाए हुए है। आज के युग में तमाम प्रदूषण, मिश्रण और संकरण के बावजूद पर्वत कंदराओं में पुरातन संस्कृति के दर्शन हो सकते हैं। जैसे हिम ग्लेशियरों में सदियों से पानी छिपा रहता है, ठीक वैसे ही पर्वतों की गुफाओं में वे संस्कार छिपे हैं जिन्हें आधुनिकतावादी मृतप्राय समझ बैठे हैं। यह एक तथ्य है कि संस्कृति किसी भी बाहरी आक्रमण से एकदम नहीं मरा करती। वह जीवित रहती है चिरकाल तक, चाहे आक्रमणकारी यह समझें कि इसे मिटा दिया गया है। संस्कार अपने भीतर का एक अनुशासन है जो भीतर ही भीतर छिपा रहता है और चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने प्रकट होता है। बाहरी हाव-भाव, क्रियाकलाप से लेकर मन की गहराइयों तक संस्कार अपना घर बनाए रहते हैं जिन्हें जड़ से समाप्त करना किसी के लिए भी संभव नहीं।
    हिमाचल प्रदेश में किन्नौर तथा लाहौल-स्पीति, दो जिले पूर्ण रूप से जनजातीय घोषित हैं। जिला चंबा में भरमौर तथा पांगी क्षेत्र जनजातीय हैं। यहाँ संस्कृतियों का संगम भी एक विलक्षणता लिए हुए है। किन्नौर में बुशहर का राजवंश पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाणासुर, उषा-अनिरुद्ध उपाख्यान से जुड़ा हुआ है। यहाँ उषा देवी का मंदिर है तो दूसरी ओर बौद्ध परंपरा भी विद्यमान है। किन्नौर में हिंदू मंदिर तथा गोम्पा यानी बौद्ध मठ एक ही प्रांगण में स्थापित हैं। यही संगम लाहौल से होता हुआ भरमौर तक चला गया।
    हिमालय का साक्षात्कार कराती प्रस्तुत पुस्तक संस्कृति- प्रेमियों, अनुसंधानकर्ताओं तथा पाठकों के लिए उपयोगी एवं रोचक सिद्ध होगी।
    अस्तर में: बुद्ध प्रतिमा (8वीं शताब्दी)
    परशुराम मंदिर निरमंड से ये प्रतिमाएँ 1981 में हुए ‘भुंडा उत्सव’ के अवसर पर बाहर निकाली गई थीं। ये मूर्तियाँ उत्सव के कुछ समय बाद चोरी हो गईं। पुलिस द्वारा इन प्रतिमाओं को अन्य चोरी हुई मूर्तियों सहित बरामद कर लिया गया। अब ये रामपुर के सरकारी खजाने में जमा हैं।
  • Keral Ka Krantikari
    Vishnu Prabhakar
    120 108

    Item Code: #KGP-1195

    Availability: In stock


  • Bhagn Seemayen
    Balshauri Reddy
    120 108

    Item Code: #KGP-2047

    Availability: In stock

    भग्न सीमाएँ
    "मेरे देवता, आप प्रेम के अवतार हैं । आप मेरे जीवन में प्रेम के देवता बनकर आए । इस प्रेम-मूर्ति की मैं सदा आराधना करती रहूंगी ।
    मैँ जानती हूँ कि आप मुझे अपनी शरण में लेने को तैयार हैँ। कहावत है न, भगवान् भले ही वर दे, लेकिन पुजारी वर नहीं देता । आपके चतुर्दिक जो पुजारी बने हुए हैं, वे चाहते हैं कि मैं आपसे दूर रहूँ। वे यह नहीं चाहते कि मैं आपकी उपासना करूं । मैं उनकी दृष्टि में अस्पृश्य हूँ अयोग्य हूँ। पर आपकी करुणा और कृपा सब पर समान होती है ।
    मैं अपना प्यार रूपी दीपक जला, स्नेह रूपी बत्ती जगा अपने हृदय को आलोकित करना चाहती थी, लेकिन क्या करूँ । परिस्थिति रूपी प्रभंजन का वेग अधिक हो चला है, शायद मैं निकट रहूँ तो वह बुझ जाए । मैं दूर से ही निरंतर अलख जगाए रखना चाहती हूँ।
    आपसे दूर होने के पहले मैंने अपने गत जीवन का एक बार सिंहावलोकन दिया । आपके जीवन में मैंने एक रोगी के रूप में प्रवेश क्रिया । आपने मेरे शरीर को स्वास्थ्य प्रदान किया, जीवन के प्रति आशा और विश्वास पैदा किया, प्रेम दिया आज मैं उसके पुरस्कारस्वरूप आपके हृदय को अस्वस्थ बनाकर जा रही हूँ, मलिन और दुखी बनाकर जा रही हूँ ।
    -[इसी पुस्तक से]
  • Abhi Shesh Hai
    Mahip Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-746

    Availability: In stock


  • Shivaji Banaam Sewak
    Indresen Sharma
    100

    Item Code: #KGP-1259

    Availability: In stock

    शिवाजी बनाम सेवक

    पिता की मुक्ति
    दादा कोंडदेव शिवाजी के साथ उनकी हर विजय में थे, मानो उनका आशीर्वाद ही विजय के रूप में रंग ला रहा था। पर वह समय भी आया, जब शिवाजी को स्वराज्य-प्राप्ति तक मार्गदर्शन करने का वचन देकर भी दादा कोंडदेव बीच में ही चले गए। उनका शरीर पंचतत्त्वों में मिल गया। उनके बालराजे शिवाजी को लगा, नौका का खेवनहार चला गया, नौका बीच नदी में छोड़कर। अब खेवनहार उन्हें स्वयं बनना था और दादा कोंडदेव के इस अरमान को पूरा करना था, जो वह अंतिम समय उनसे कह गए थे ‘दासता की बेड़ियां तुम्हें ही तोड़नी हैं बालराजे और सिंहगढ़ को किसी तरह अपने ही अधिकार में रखना है।’
    शिवाजी के कंधों पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी थी, सिंहगढ़ को बचाने की। इससे पहले कि सिंहगढ़ का नया सूबेदार रहीम मुहम्मद अपनी सुबेदारी को ठीक से हाथ में लेता, शिवाजी ने सिंहगढ़ को अपने अधिकार में ले लिया। एक ओर शिवाजी इस विजय के उल्लास में थे तो दूसरी ओर एक और बड़ी विपत्ति उनके सामने आ गई। उनके पिता शाहजी को आदिलशाह द्वारा बंदी बना लिया गया था।
    शिवाजी का मस्तिष्क! चालों का खजाना। पिता को मुक्त कराने के लिए भी वह चाल सोचने लगे। एक चाल हाथ लगी। दिल्ली दरबार में एक संदेशवाहक भेजा ‘हम और हमारे पिता शाहजी दिल्ली सम्राट् की सेवा के इच्छुक हैं, पर पिता बंदी हैं बीजापुर शाह के। उन्हें मुक्ति मिल तो आपकी सेवा में हाजिर हों।’
    चाल ने असर दिखाया। शाहजी तुरंत मुक्त कर दिए गए। इस प्रकार अपनी चाल से पिता को मुक्त कराकर शिवाजी ने एक और किला जीत लिया।
    —इस पुस्तक की ‘पिता की मुक्ति’ कहानी
  • Hamara Kshitij
    Sudhakar Adib
    180 162

    Item Code: #KGP-7841

    Availability: In stock


  • Bhartiya Naitik Shiksha : 3
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-265

    Availability: In stock

    पिछले कुछ वर्षों से शैक्षिक पाठ्यचर्या में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता को अनुभव करते हुए कुछ शासकीय/अशासकीय संस्थाओं में इसके शिक्षण हेतु प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु इसके प्रभावी परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैँ। देश तथा विश्व के महान् शिक्षकों-अरस्तू विवेकानन्द, अरविन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर , महात्मा गांधी आदि ने शिक्षा के इस पक्ष को व्यावहारिक आचरण के रूप से प्रस्तुत करने पर बल दिया है क्योकि किसी पर थोपे गए आचरण अथवा इस विषय की लिखित परीक्षा में पाए गए अधिकतम अड्डों से नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का पाठ नहीं पढाया जा सकता।
    अत: शिक्षक को ही शिक्षा की धुरी होने के नाते अपने शिक्षण विषय के साथ-साथ इस विषय को उपदेशात्मक शैली में न पढाकर व्यावहारिक रूप से प्रस्तुत करना चाहिए ताकि बालकों को जीवन के विभिन्न सन्दभों में उपस्थित समस्याओं को हल करने में यह प्रभावी सिद्ध हो सके। शिक्षकगण यह भी ध्यान रखें कि आज के युवक में समस्याओं का क्षेत्र उतना ही व्यापक होता जा रहा है, जितना जीवन का मापदण्ड। 
    प्राचीन भारतीय साहित्य में नैतिकता तथा आध्यात्मिकता सम्बन्धित ज्ञान का भण्डार भरा पडा है । यदि हम बालकों के उस साहित्य को पढने के प्रति रुचि भी उत्पन्न कर दें, तो उन्हें इतनी समझ आ जाएगी कि अनैतिक एवं असंयमी व्यवहार करके हम मानवता को सुख और शान्ति का संदेश नहीं दे सकते।
    प्रस्तुत पुस्तक इसी दृष्टि से तैयार की गई है । आशा है, नैतिक शिक्षा के विभिन्न पहलुओं क्रो विविध संदभों में समझकर बालकों में निश्चित परिवर्तन होगा।
  • Shankhnaad
    Raj Budhiraja
    140 126

    Item Code: #KGP-118

    Availability: In stock

    शंखनाद
    "गांधी जी अगर राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे । महर्षि जी हमारी राष्ट्रीय  प्रवृत्ति और स्वाधीनता आंदोलन के आद्य-प्रवर्तक थे। गांधी जी उन्हीं के पदचिन्हों  पर चले । यदि महर्षि हमें मार्ग न दिखाते तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान हो जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता।" —अनंतशायनम् आयंगर
    "महर्षि दयानंद भारतमाता के उन प्रसिद्ध और उच्च आत्माओं में से थे, जिनका नाम संसार के इतिहास से सदैव चमकते हुए सितारों की तरह प्रकाशित रहेगा । वे भारतमाता के उन सपूतों में से हैं, जिनके व्यक्तित्व पर जितना भी अभिमान किया जाए थोड़ा है ।  नेपोलियन और सिकंदर जैसे अनेक सम्राट एवं विजेता संसार में हो चूके है, परंतु स्वामी जी उन सबसे बढ़कर थे ।" —खदीजा बेगम
    “बहुत-से लोग महर्षि दयानंद को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं, परंतु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेश प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान और स्वराज्य की घोषणा—यह सब बहुत पहले से देश को दिया है ।" —विट्ठलभाई पटेल
  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal
    Indira Mishra
    390 351

    Item Code: #KGP-734

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
  • Aadi Jagadguru Shankaracharya
    Chandrika Prasad Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9009

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Devendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    200 180

    Item Code: #KGP-548

    Availability: In stock


  • Akkhar Kund
    Padma Sachdev
    125 113

    Item Code: #KGP-1989

    Availability: In stock

    अक्खर कुंड 
    यूँ तो पद्मा सचदेव डोगरी की कवयित्री हैं, पर अनुवाद के माध्यम से जब वह प्रकट होती हैं , तो उनकी कविता में पूरे हिंदुस्तान की महक आती है । इससे सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि वह संपूर्ण भारतीय समाज और संस्कृति को शब्द देने वाली कुशल कवियत्री हैं ।
    पद्मा जी की कविता प्रकृति की कविता है और मनुष्य की संवेदना और करुणा की भी...। इनकी कविता में मिथकों की बानगी अदभुत और अलग पहचान से समृद्ध है । यहाँ वह सूक्ष्म में जाती हैं और उसे रूहानी भावों से जोड़ते हुए जो चित्रांकन करती है, वह जीवंत तो है ही, बल्कि अपनी जड़ों से जोडने का वास्तविक अहसास कराती हैं । इसलिए इनमें आत्मिक आनंद की अनुभूति भी है ।
    पद्मा जी की कविताओं में कश्मीर का बेमिसाल सौंदर्य  तो है ही, वहाँ की जातीय संस्कृति का सबल रेखांकन  भी है, यानी इनमें कश्मीरियत समूचे आकार में यहीं होती है । इन्हें शब्द-चित्रों को बनाते हुए उन्हें घाटी में बारूद की गंध भी आती है । इससे उनका संवेदनशील मन विचलित होता है, लेकिन वह इसे यूँ ही नहीं छोड़ देतीं, पीड़ितों-वंचितों को आशा और विश्वास भेंटती है । उनमें 'एक दिन लौटने का अहसास' जगाती हैं ।
  • Parnaam Kapila
    Devendra Deepak
    400 360

    Item Code: #KGP-1894

    Availability: In stock


  • Vaya Pandepur Chauraha
    A.M. Nayar
    350 315

    Item Code: #KGP-249

    Availability: In stock

    डा. नीरजा माधव हिंदी कथा-साहित्य का एक जाना- पहचाना नाम है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तथा छोटी कक्षाओं में भी उनकी कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़ाए जा रहे हैं। नित नई और अनछुई भूमि पर अपना कथानक रचने वाली डा. नीरजा माधव ‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’ के माध्यम से ‘इम्पोटेंट इन्टेलीजेंसिया’ का एक भीतरी चेहरा बेनकाब करती हैं। किस तरह आज का बुद्धिजीवी मुखौटा लगाए सामाजिक सरोकारों की बात करता है, किस प्रकार शस्त्र बने शब्दों का मुंह स्वयं अपनी ओर घूम जाता है और हम तिलमिला उठते हैं अपना ही असली चेहरा देख। मानव मन की कृत्रिमता और विवशता को परत दर परत उधेड़ने वाली अलग ढंग की कहानियों का अनूठा संग्रह है--‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maitreyi Pushpa
    Maitreyi Pushpa
    280 252

    Item Code: #KGP-2073

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फैसला', 'तुम किसकी हो बिन्नी', 'उज्रदारी', 'छुटकारा', 'गोमा हँसती है', 'बिछुड़े हुए', 'पगला गई है भागवती', 'ताला खुला है पापा', 'रिजक' तथा 'राय प्रवीण' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ushakaal
    Hari Narayan Aapte
    150 135

    Item Code: #KGP-2000

    Availability: In stock

    उषाकाल
    जिस वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा मन से है वह मिले नहीं, बल्कि उसका महत्त्व दिन-प्रतिदिन और अधिक बढ़ता नजर आए तो ऐसी स्थिति में उस वस्तु को प्राप्त करने की कितनी उत्सुक्ता बढ़ जाती है, इसका अनुभव हर मनुष्य को है ही । राजा की भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी । उसके मन में स्वामी रामदास के दर्शनों की उत्कट इच्छा थी । इधर बीजापुर से कोई समाचार न आया देखकर राजा का मन काफी उद्विग्न था । यह देखकर एक बार समर्थ के यहाँ परली जाने की चर्चा छेडी । राजा को स्वामी की बात पसंद आई और वे दोनों परली के पर्वतों की और चल पड़े ।
    चलते-चलते स्वामी जी ने अपना अनेक वर्षों का अनुभव राजा को बताया । दोनों एक गाँव के पास पहुंचे । गर्मी के दिन थे। धूप काफी थी, इसलिए दोनों ने मालदेव जी के मंदिर में अपना डेरा डाला । पिछली रात राजा को ज्वर काफी था । अत: डेरा डालते ही वे आराम करने लगे । मंदिर के पास ही एक नदी थी और उसके पार भी एक मंदिर था । राजा की वृष्टि उस मंदिर और उस नदी के तट की ओर गई। उन्हें एक विचित्र दृश्य देखने को मिला । यह देखते ही राजा के  क्रोध की सीमा न रही। वे एकदम अपनी जगह से उठे, मानो उनको इस बात का ज्ञान ही नहीं रहा कि पिछली रात को उन्हें ज्वर आया था । अपने कपडे उतारे और अपनी तलवार मुँह से पकड़कर पानी में कूद पड़े । [इसी उपन्यास से]

  • Katha Kaho Kunti Mai
    Madhukar Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2021

    Availability: In stock

    कथा कहो कुंती माई
    "कितना खतरनाक होता है माई, मनुष्य के सपनों का मर जाना ?" सुमति ठाकुर ने सवाल की तरह पूछ लिया । "बहुत खतरनाक मेरे बेटे," छाती माई बोली, "सपने हैं तभी तो हमतुम जिंदा हैं, मनुष्य हैं। हम तभी तक जीवित है, जब तक सपने हैं । बेटे, हमारे सपने बहुत बड़े हैं, जो तुम बराबर कहते हो, या तो हम सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन । श्रमिक-किसानों का राज होगा । लडाई बहुत लंबी है सुमति, और चौतरफा भी । हमारे सपनों के हत्यारे हमारे संग-संग जिंदा हैं। इन्हें भी नहीं छोडना है ।"
    कुन्ती माई ऊपर की और दोनो बाँहें फैलाए दिखाती हैं, "अभी भी क्यों नहीं जागते तुम लोग ? पुश्तैनी पीपल-गाछ पर गाज गिरने वाली है ।" "क्या बात है माई ?" एक साथ कई पंख फस्कढाते है । "मेरे गाँव के लोग मुर्दा हैं । सभी मरे हुए हैं । बाप-दादे की पुश्तैनी गाछ को कटवाने के लिए मुदई लोग कलक्टर को बुलवाए हैं। इन्हें किस प्रकार ज़गाऊँ ?" माई का कंठ अवरुद्ध होने लगता है ।
    पीपल के निकट आते ही जेली-साथी नारे लगाते हैं, "कुन्ती माई को, लाल सलाम, लाल सलाम । इंकलाब जिदाबाद । जिदाबाद !" 
    कुन्ती माई अपनी दोनों बाँहें फैलाए उनकी ओर दौड़ पड़ती है, जैसे ममता के समुद्र में डुबो लेना चाहती है । यह डबडबाई आँखें पोंछती हुई कहने लगती हैं, "मेरे बाल-गोपालो । जुल्म बढ़ता है तो प्रतिरोध भी तेज होता है । पुलिस-प्रशासन आपका नहीं है, उन्हीं की रक्षा के लिए है । पन्द्रह मार्च को पटना गांधी मैदान को संकल्प के साथ दस लाख जनता चाहिए । मरने का संकल्प लो, तभी जिंदा रहोगे। मठ की जमीन पर हम फिर चढ़ेंगे । इस बार हम रहेंगे या मठ रहेगा ।"
    [इसी उपन्यास से]

  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • Sun Mutiyare
    Santosh Shelja
    450 405

    Item Code: #KGP-133

    Availability: In stock

    सुन मुटियारे
    ‘सुन मुटियारे’ उपन्यास उस तरुणी (मुटियार) की कहानी है, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी ‘बंटवारे’ से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे...जब खेतों में भरपूर अनाज था और दिलों में भरपूर प्यार था...जब ‘पंज दरिया’ की धरती गाती-नाचती रहती थी।
    कथानक की धुरी तो है ‘मुटियार’, लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक भरा-पूरा परिवार है, समाज है, जिसमें विविध पात्र हैं—गाँव के भी, शहर के भी। उनकी हँसी और आँसू, समस्याएँ और समाधन, सुख और दुःख—सब कुछ ऐसे साथ जुड़ा चला आता है, जैसे कवि के शब्दों में—‘जस केले के पात में छुपे पात दर पात।’ इस प्रकार कथानक का मुख्य पात्र एक नहीं रहता, बल्कि अनके पात्रों के रूप में प्रकट होता हैं अतएव यह कहानी जीवन के विराट् पट पर रंग-बिरंगे धगों से बुनी रंगीन चादर ‘फुलकारी’ की तरह उभरती है। इसका एक सिरा पंजाब के गाँव से जुड़ा है तो दूसरा राजधानी के महानगर से। इसीलिए कहानी में गाँव के लोकगीत और पंजाबी भाषा के शब्द स्वयमेव ही आ गए हैं, जैसे सावन की घटाओं के साथ मोर का नृत्य और कोयल की कुहुक आ जाती है।
  • Teri Roshanai Hona Chahati Hoon
    Alka Sinha
    140 126

    Item Code: #KGP-524

    Availability: In stock

    तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ
    प्रतिष्ठित कवयित्री अलका सिन्हा की नवीनतम काव्यकृति 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' की पेम कविताएँ उस कोमल और अमूल्य अहसास की पावन कराती हैं, जिसका अभाव किसी को वहशी बना देता है तो किसी को संन्यासी । इन कविताओं में महानगरीय जीवन की आपाधापी के बीच एक भावात्मक विस्तार की अनुभूति होती है और यह विस्तार कहीं-कहीं तो दार्शनिकता पर जा टिकता है । इसीलिए पूरी कृति में बिखेरे प्रेम-प्रसंगो के वावजूद नितात निजी और आत्मीय क्षणों का यह अहसास कहीं भी छिछला या बेपर्दा नहीं होता । कवयित्री आम जिंदगी की मामूली घटनाओं को सरल और सधी भाषा में अपनी कविताओं में इस प्रकार गुंफित करती है मानो कविता की गलबहियां डाले कोई कहानी साथ-साथ चलती हो ।
    ये कविताएं एक ओर प्रकृति में जीवन की अनंत संभावनाओं की तलाश करती हैं तो दूसरी ओर युगीन विषमताओं पर व्यंग्य भी कसती हैं । सामाजिक चेतना से संबद्ध एक स्वस्थ विमर्श इन कविताओं को लोकमंगल की भावना से जोड़ता है ।
    हर किसी को अपनी-सी लगती ये कविताएं तमाम तनावों, परेशानियों और नाकामियों के बीच जीवन के प्रति आस्था और विश्वास जगाती है और आश्वस्त करती है कि सचमुच कीमती है हमारे बीच बची प्रेम की तरलता !
  • Bachcho Achchhe Bano
    Prakash Narayan Natani
    200 180

    Item Code: #KGP-317

    Availability: In stock


  • Apna Raag
    Pushpa Mehra
    140 126

    Item Code: #KGP-176

    Availability: In stock

    अपना राग
    जिस युग में सब अपना-अपना राग आलापना चाह रहे हों, श्रीमती पुष्पा मेहरा का ‘अपना राग’ जितना उनका, उतना ही मेरा-आपका, बल्कि हम सबका राग है। उसके इस लक्षण की ओर आपका ध्यान अवश्य जाएगा कि भले ही वह रग-रग में समाया प्रतीत न हो, पर वह घुन की तरह भीतर पैठा रोग कदापि नहीं। 
    पुष्पा मेहरा ने हिंदी कविता के समसामयिक मुहावरे को अपनाने या आधुनिकता की होड़ में शामिल होने की जगह अपने आसपास की दुनिया को ऐसी सीधी, सरल शैली में चित्रित किया है कि उनकी अनुभूति सहृदय पाठक को अपनी वह अनुभूति मालूम होगी, जिसे हम-आप व्यस्तता या लापरवाही के कारण भले लिपिबद्ध न कर पाएँ, किंतु पुष्पा मेहरा ने सँजोकर हमारे लिए सुलभ कर दिया है। यह कुछ-कुछ वैसा है, जैसे तड़क- भड़क-भरे माहौल में किसी का बिलकुल सीधे-सादे परिधान में प्रकट हो, कइयों को इस पछतावे से भर देना कि वे नाहक ही इतना सजे-सँवरे।
    वैसे तो कविता के बहुतेरे प्रयोजन होते हैं–उनमें से एक यह भी कि वह जहाँ उपजे, उससे कहीं अन्यत्र उसकी शोभा झलके। आशा करनी चाहिए कि पुष्पा मेहरा की कविताएँ अंधी दीवार से टकराकर लौट आने वाली बंद कविताएँ होने के बजाय विभिन्न हृदयों में खुलने-खिलने वाली कविताएँ सिद्ध होंगी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Phanishwar Nath Renu
    Phanishwarnath Renu
    225 203

    Item Code: #KGP-556

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रसप्रिया', 'नैना जोगिन', 'तीर्थोदक', 'तॉबे एकता चलो रे', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'पुरानी कहानी : नया पाठ', 'भित्तिचित्र की मयूरि, 'आत्म-साक्षी', 'एक आदिम रात्रि की महक' तथा 'तीसरी कसम, अर्थात् मारे गए गुलफाम'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ghane Kertarutale
    N.E. Vishwanath Iyyer
    140 126

    Item Code: #KGP-9118

    Availability: In stock

    निबंधकार के रूप में लेखक का राष्ट्रीय व्यक्तित्व हर रचना में अपनी छाप छोड़ता है। यह उस सृजनधर्मी राष्ट्रीय व्यकिततव के अनुरंजक छाप की गुणवता होती है कि मोटे रूप में शुष्क समझा जाने वाला यात्रा-वर्णन सरल ललित निबंध की कलाभंगिमा में प्रस्तुत मिलता हैं
    यात्रा-वर्णन के अतिरिक्त इन निबंधों में संस्करण, स्मृति-तर्पण, वर्णन, पत्र, रिपोर्ताज और संवाद-शिल्प प्रयुक्त हुआ है। विधा कोई भी हो, लेखक का लक्षित विधेयक मूलतः एक है और वह है राष्ट्रीय समन्वयात्मक विशालता। इसके लिए व्यष्टि के छोर से समष्टि की खोज-खबर ली जाती है और साहित्य चिंतन अथवा आत्म-चिंतन से राष्ट्रीय चिंतन को संपृक्त करते हुए लेखक प्रादेशिक छवियों, रंगारंग सभ्यताओं और नए अभ्युत्थान के प्रतिष्ठानी आकर्षणों को संवेदनीय शिल्प में विस्तार के साथ रेखांकित-चित्रित करता है।
    —डाॅ. विवेकीराय
  • Koi To
    Vishnu Prabhakar
    125 113

    Item Code: #KGP-9096

    Availability: In stock


  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand
    Shanta Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-1865

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापक विवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Aacharya
    Indira Dangi
    180 162

    Item Code: #KGP-1573

    Availability: In stock


  • Shiksha Mein Moolyon Ke Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    340 306

    Item Code: #KGP-896

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं तथा संबंधों में हो रहे बदलाव को देखने और परखने के लिए आवश्यक दृष्टिकोण परिवर्तन क्यों और कैसे संभव है, इसे समझने का प्रयास किया गया है । इसके बाद शैक्षिक पाठ्यक्रम पर समग्रता से निगाह डालते हुए पाठ्यक्रम परिवर्तन की आवश्यकता तथा उसके मूल तत्त्वों पर चर्चा की गयी है । इसमें उस प्रकार की पाठ्यसामग्री के सम्बन्ध में भी चर्चा हैं, जो पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध है तथा जिसमें अन्य मूल्यों के साथ परिवार तथा पीढ़ियों के संबंधों के विभिन्न पक्षों पर विवेचना की जा सकती है – केवल उसे पहचानने तथा विद्यार्थियों को उचित समय पर तथा उचित विधि से इंगित करने की आवश्यकता होती है । यदि वह नहीं है या काम है तो अध्यापक कैसे तथा किन स्रोतों से उसे ढूंढ़ सकता है तथा शिक्षण में शामिल कर सकता है । 
  • Hindi Shikshan : Sankalpana Aur Prayog
    Hiralal Bachhotia
    150 135

    Item Code: #KGP-1105

    Availability: In stock

    हिंदी शिक्षण: संकल्पना और प्रयोग
    प्रायः हिंदी भाषा और हिंदी की साहित्यिक शैली को एक माना जाता रहा है। इसमें भेद कर तदनुसार शिक्षण की आवश्यकता के संदर्भ में साहित्येतर अभिव्यक्तियों और शैलियों के सक्षम प्रयोग की निपुणता प्राप्त करना अपेक्षित है। इस दृष्टि से ‘हिंदी-शिक्षण: संकलपना और प्रयोग’ में विधियों आदि की अवधारणा के साथ उसके प्रायोगिक रूपों को प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। प्रारंभिक स्तर पर विशेष रूप से हिंदीतर भाषी शिक्षार्थी के लिए शैक्षिक-भाषायी कार्यकलापों (भूमिका-निर्वाह आदि) के माध्यम से भिन्न-भिन्न संदर्भों में बोलने का अभ्यास, कैसे पढ़ाएं के अंतर्गत परिवेश निर्माण, वाचन, कथ्य या विषयवस्तु का विश्लेषण, रूपांतरण, स्थानात्ति, बोध प्रश्न आदि पर विचार तथा उनके अभ्यासपरक उदाहरणों के माध्यम से अध्यापन हेतु विविध आयाम प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। 
  • Vishwa Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-3
    Shuk Deo Prasad
    545 491

    Item Code: #KGP-699

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं को कथा की एक विधा के रूप में मान्यता मिले, ह्यूगो गन्र्सबैक ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई और उन्होंने ही इसे ‘साइंटीफिक्शन’ नाम से अभिहित किए जाने का परामर्श दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने इस विधा को अपनी तरह से परिभाषित भी किया। ‘अमेजिंग स्टोरीज’ के प्रथमांक में संपादकीय टिप्पणी में गन्र्सबैक ने लिखा-‘साइंटीफिक्शन’ से मेरा अभिप्राय जूल्स वर्न, एच.जी. वेलस और एडगर एलन पो द्वारा लिखी गई ऐसी कहानियों से है, जिसमें आकर्षक रोमांच के साथ वैज्ञानिक तथ्य और युगद्रष्टा की दूरदर्शिता का सम्मिश्रण हो। ....आज विज्ञान कथा-साहित्य में चित्रित किए गए किसी आविष्कार के कल सत्य हो जाने में असंभव जैसा कुछ नहीं है।’
    गन्र्सबैक की इसी परिभाषा के कारण विज्ञान-गल्पों को ‘भविष्यद्रष्टा साहित्य’ भी कहा जाने लगा और लेखकों से ऐसी अपेक्षाएं की जाने लगीं जो निंतात अव्यावहारिक थीं।
    तो क्या विज्ञान कथाओं में आज के कल्पित आविष्कार कल के सच हैं? जी नहीं! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। किसी भी गल्प में परिकल्पित कोई भी आविष्कार तदनुरूप कभी भी साकार नहीं हुआ। ऐसे सारे दावे मिथ्या हैं। हां, आविष्कारकों ने विज्ञान-गल्पों से प्रेरणाएं अवश्य ली हैं, इसकी स्वीकारोक्तियां हैं।
    ऐसा इसलिए असंभव है कि गल्पकार आविष्कारक नहीं है और आविष्कारक की गल्प-लेखन में मति-गति नहीं है। विज्ञान-गल्प-लेखन एक विरल विधा है, जिसमें विज्ञानसिद्धि और रससिद्धि दोनों वांछनीय हैं। और ऐसा संयोग विरल ही है।
  • Vikalp
    Sukhdev Prasad Dubey
    1100 990

    Item Code: #KGP-653

    Availability: In stock


  • Rassakashi
    Nisha Bhargva
    300 270

    Item Code: #KGP-9220

    Availability: In stock

    निशा भार्गव हिन्दी की उल्लेखनीय हास्य व्यंग्य कवयित्रियों में अपना मुकाम रखती हैं। कुछ ही कवयित्रियां है जो मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर हास्य व्यंग्य की सृष्टि करती हैं। मेरा मानना है कि उन्होंने काव्य मंचों के माध्यम से और दूरदर्शन, आकाशवाणी में अपने काव्य पाठ से असंख्य श्रोताओं को आनंदित, उल्लसित किया है। इधर उनका नया काव्य संकलन 'रस्साकशी’ के शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है जिसमें उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज और गहन गम्भीर शैली में आज के जीवन में व्याप्त विसंगतियों द्वंद्व को रेखांकित किया है।  जीवन में न्याय और अन्याय के बिच, सत्य और असत्य के बीच सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच जो द्वंद्व चल रहा है उसके बीच रस्साकशी जैसा माहौल बना हुआ है । रस्साकशी के इस माहोल में उत्पन्न तनाव से बचते हुए निशा भार्गव ने सरस, सारगर्भित और जनप्रिय रचनाएं लिखने का उद्यम जिया है उनके इस प्रयास से सदैव सकारात्मक प्रवृतियों की विजय के संकेत मिलते हैं। कविता का उद्देश्य भी लगभग यही है। तमाम निराशाओं-दुराशाओं के बीच आशा की किरण खोज लेना कवि कर्म का सबसे बडा उद्देश्य माना गया है । निशा भार्गव अपने इस प्रयत्न में पूर्णत: सफल हैं। उनमें एक संवेदनशील मन को सकारात्मक भाव से पेश करने का जज्बा हर कोण से दिखाई देता है। मैं उनक लेखन की सफ़लता की कानना करता हू ।
  • Kaalchiti
    Shekhar Mallik
    350 315

    Item Code: #KGP-9320

    Availability: In stock

    यह उपन्यास है...
    उस हौसले और हिम्मत के लिए, 
    जो अपने हक के लिए लड़ती है...
    उस आदिम, जीवट, 
    अथक संघर्षशीलता के लिए...
    उस इनकलाबी भावना के लिए, 
    जो हर दौर में जिंदा होती है...
    सत्ता पोषित हिंसा के खिलाफ...
    जन-विमुख, भ्रष्ट सत्ता और 
    काॅरपोरेट गठबंधन के खिलाफ...
    उस आततायी सत्ता के खिलाफ...
    जो सोनी सोरी जैसों के खिलाफ 
    घृणित षड्यंत्र रचती है!
    निर्धन, निहत्थे, शांतिप्रिय आदिम 
    मनुष्यों का संहार करने वाली
    राजनीति के खिलाफ...!

    प्रस्तुत उपन्यास अर्ध गल्प और अर्ध समकालीन यथार्थ! क्योंकि चाहे कथा और पात्रा काल्पनिक हों, कुछ घटनाएँ वास्तविकता पर आधारित हैं। पहाड़-पानी और वन एवं भूमि सहित सामान्य मनुष्यों पर बलपूर्वक अधिकार करना अनैतिक है। केवल आम जन के समसामयिक उत्पीड़न को व्यक्त करना और ऐसे हिंड्ड कृत्यों की निंदा करना ही इस रचना का एकमात्र ध्येय है। जनजातीय समुदायों, मूलवासियों और आदिम संस्कृतियों पर इस दौर में हो रहे सत्ता-पोषित दमन का प्रतिवाद करना प्रत्येक विवेकशील नागरिक का कर्तव्य है। यह गद्य-पुस्तक सर्वमान्य मानवाधिकारों, सच्चे लोकतंत्र के पक्ष में और मनुष्य की स्वतंत्रता के हनन के सभी प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध है।
  • Manushkhor
    Ganga Prasad Vimal
    595 506

    Item Code: #KGP-405

    Availability: In stock


  • Maila Darpan
    Moti Bhuvania
    125 113

    Item Code: #KGP-1851

    Availability: In stock

    मैला दर्पण
    'मैला दर्पण’ कलापारखी मोती भुवानिया का क्या संचयन  है । उनकी कविताओँ में कलाकृतियों जैसे वर्णबिम्बों को भरमार को वजह शायद यही है कि एक लंबे अर्से तक कला की दुनिया से संबद्ध होने के कारण वे कविता में या कहें शब्दों में एक मुकम्मल चित्र की रचना कर डालते है ।  कविता के लिए शब्द चुनते वक्त जैसे वे आकृतियों के रूप चुनते है ।
    'मैला दर्पण’ स्मृति का पुनरख्यान नहीं है । वह एक लंबे 'कैनवस' पर जीवन को संपूर्णता में उकेरने की एक व्यवस्थित कोशिश है । व्यवस्थित इसलिए कि मोती भुवानिया का विचार जगत अनिर्णय से ग्रस्त किसी मोह से लिपटा हुआ नहीं है । वे भरसक खुद को भी तोड़कर-फिर से नए रूप में छोड़ने की ललक से भरे हुए है । नई कविता के उत्कर्ष काल में जिस विविधता का भव्यतापूर्ण रचनात्मक रूप कविताओं में चित्रित हुआ है उसका सौष्ठव अपनै चरम रूप में भुवानिया जी की कविताओं में मिलेगा । यह तो मात्र संयोग है कि 'मैला दर्पण' के उस सौष्ठव में काव्य-भाषा के अब तक प्रचलित रूपों के साथ अद्यतन रूपों की झलक भी मिलेगी । और कहना पडेगा कि एक प्रासंगिक कविता में परंपरा और भविष्य दोनों एकमेक होकर कविता को अगली दस्तक की पहचान मिलती है ।
    सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण 'मैला दर्पण' की भाषा है, जिसमें एक साथ प्राज्जलता का प्रदर्शनकारी रूप है तो लोक का विलुप्त-सा वह संस्पर्श भी जो हलके से हमें अपनी 'लोकस्मृति' से जोड़ देता हैं ।
    कुल मिलाकर भुवानिया जी की वे कविताएँ हमें हमारे  वैभव में परिचित कराती है तो साथ ही साथ हमें बहुत कूर रूप से हमारे वर्तमान से भी जोड़ती है। भाषा के स्तर पर भुवानिया जी की कविताएँ न केवल अपने समकालीनों से अलग है अपितु अपने परवर्तियों से भी कुछ आगे का अनुभव देतीं है । 

  • Bhartiya Sahitya Siddhant
    Dr. Tarak Nath Bali
    250 225

    Item Code: #KGP-9120

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य सिद्धांत
    हिंदी समीक्षा का आरंभ दो धाराओं के रूप में हुआ। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भारतीय साहित्य सिद्धांतों में से सहृदय की अनुभूति रस को केंद्रीय प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया और उसी के अंतर्गत कुछ पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को समाविष्ट करने का प्रयास किया। दूसरी ओर बाबू श्यामसुन्दर दास ने पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को ही हिंदी साहित्य में आवश्यकतानुसार प्रस्तुत किया। सैद्धांतिक स्तर पर ये दोनों धाराएं आज तक हिंदी आलोचना में लक्षित होती हैं। आश्चर्य की बात है कि विविध सिद्धांतों के बीच के अंतःसंबंधों के विश्लेषण की ओर हिंदी आलोचकों का विशेष ध्यान नहीं गया। एक ओर तो भारतीय साहित्य सिद्धांतों मं से चार सिद्धांतों-अलंकार, सिद्धांत, रीति सिद्धांत, ध्वनि सिद्धांत और वक्रोक्ति सिद्धांत का संबंध प्रधान रूप से काव्य-भाषा तथा गौण रूप से काव्यवस्तु के गंभीर विश्लेषण से है तथा इन सिद्धांतों के अंतःसंबंधों के विवेचन की अपेक्षा आज भी बनी हुई है। दार्शनिक व्याख्या के कारण रस सिद्धांत प्रधान रूप से सहृदय की अनुभूति में ही केंद्रित हो गया जब कि वह वस्तुतः विभावादि के रूप में काव्य वस्तु, काव्य भाषा तथा अभिनय को अपने में समेटे हुए हैं। उधर पश्चिम में भाषा केंद्रित सिद्धांतों-शैली विज्ञान, नई समीक्षा तथा विखंडनवाद आदि को हिंदी समीक्षकों ने स्वीकार किया किंतु संभवतः संस्कृत के काव्यभाषा के सिद्धांतों के गंभीर ज्ञान के अभावत के कारण भारतीय तथा इन नवीन पाश्चात्य सिद्धांतों की तुलनात्मक समीक्षा और मूल्यांकन की ओर उनका ध्यान नहीं गया जबकि पंडितराज जगन्नाथ ने सत्राहवीं शती में ही काव्य को शाब्दिक रचना कहा था। प्रस्तुत पुस्तक इन विविध काव्य सिद्धांतों के अंतःसंबंधों और भारतीय काव्य सिद्धांतों की आधुनिक प्रासंगिकता के विश्लेषण की दृष्टि से प्रथम व्यापक प्रयास है जिसमें भारतीय साहित्य सिद्धांतों के विविध पक्षों का विवेचन है जिसके अंतर्गत प्रसंगानुसार उनकी आधुनिक प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया गया है। इस सैद्धांतिक एंव व्यापक विवेचन को आधुनिक हिंदी कविता के उदाहरणों से स्पष्ट करने की कोशिश भी की गई है। आशा है इस प्रथम प्रयास में व्यक्त विविध स्थापनाओं एवं संकेतों को आगे विकसित करने के कार्य की ओर विद्वानों का ध्यान जाएगा। 
  • Door Van Mein Nikat Man Mein
    Ajit Kumar
    360 324

    Item Code: #KGP-868

    Availability: In stock

    दूर वन में निकट मन में
    मनुष्य एक-दूसरे को सुख-दुःख देते किन नातों के जाल में बँधते-जुड़ते रहते हैं? उनके संबंधों की आधारभूमि क्या है? एक-दूसरे के सारे मीठे-कड़वे अनुभव कालांतर में एक भाव, एक स्मृति, एक टीस बनकर रह जाते हैं! उस भाव का महत्त्व क्या है?
    ‘दूर वन में’ अजितकुमार द्वारा रचित कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणों का संग्रह है। इसमें कुछ प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध विशेषकर ऐसे लोग हैं जो अब भूले से जा रहे हैं, पर अपने ज़माने के विशिष्ट व्यक्तित्व रहे हैं। अधिकांश संस्मरण पारिवारिक दायरे में आने वाले लोगों के हैं। 
    ‘निकट मन में’ भी अजितकुमार के संस्मरणों का संग्रह है।  इन पुस्तकों के शीर्षकों में तुक तो अनायास मिल गया है, उनकी तान, लय और समझ में भी पाठकगण उस निरंतरता का, तारतम्य का आभास पाएँगे, जो अजितकुमार की कविता और गद्य-रचना का स्वाभाविक गुण है।
    संस्मरणों के माध्यम से अजितकुमार अतीत को नहीं पगुराते, हिसाब-किताब भी बराबर नहीं करते, वे अनुभव तथा संवेदना का पथ प्रशस्त करते हैं। इस नाते, ये संस्मरण जितने उनके हैं, लगभग उतने ही या उससे भी अधिक औरों के अपने हो सकेंगे।
    अजितकुमार के संस्मरणों की ये दो पुस्तकें एक ही जिल्द में प्रस्तुत हैं। प्रसिद्ध कवि अजितकुमार एक समर्थ और सशक्त गद्यकार भी हैं। इनके गद्य की ताकत का नमूना तो ये संस्मरण हैं ही, उनके संवेदनशील, सजग, जागरूक व्यक्तित्व का भी परिचय देते हैं।
  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Yatra Ke Panne
    Rahul Sankrityayan
    350 315

    Item Code: #KGP-1923

    Availability: In stock

    यात्रा के पन्ने
    कालजयी व्यक्तिव के स्वामी महापंडित राहुल सांकृत्यायन  की प्रस्तुत पुस्तक 'यात्रा के पन्ने' से उनके द्वारा की गई तिब्बत-यात्राओं को शामिल किया गया है । अपनी प्रमुख कर्मस्थली तिब्बत से लेखक का अत्यंत गहरा एवं भावनात्मक लगाव रहा है । तिब्बत की पहली, दूसरी तथा तीसरी यात्राओं का विवरण इस पुस्तक में आने  से राहुल जी के यात्रा-साहित्य की यह एक उल्लखनीय कृति बन गई है । 'यात्रा  के पन्ने' में जहाँ राहुल जी तिब्बत के सर्वस्व को अपनी चेतस दृष्टि से जान और पहचान पाए है, वहीं इन यात्राओं में उनकी जन-प्रतिबद्धता की झलक भी दिखाई पड़ती हैं । इतिहास-दृष्टि के आलोक में आधुनिक जीवन-दृष्टि को वैज्ञानिक विस्तार देती उनकी यात्राएं पाठक को समृद्ध करने में सक्षम है । तिब्बत की शताब्दियों की स्मृति, निर्माण और ध्वंस को यहीं महसूस किया जा सकता है ।
    इस पुस्तक में संकलित लेखक के पत्रों का भी विशिष्ट महत्त्व हैं । पेरिस, जर्मनी, लंका तथा स्वदेश से लिखे उनके पत्रों में न केवल लेखक का 'वर्तमान' रचा-बसा है बल्कि अपन समय तथा समाज का दस्तावेजीकरण भी हुआ है । इन संकलित पत्रों को इतिहास के संभवत: सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज माना जा सकता है ।
    'यात्रा के पन्ने' पुस्तक का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष है स्वदेशी यात्राओं का । राहुल जी की इस प्रस्तुति में राजस्थान तथा बिहार के अनेक ऐतिहासिक नगरों का यात्रा-वर्णन है, जो इन स्थलों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक निधियों को सामने लाता है
  • Safed Parde Par
    Ramesh Chandra Shah
    150 135

    Item Code: #KGP-1244

    Availability: In stock

    सफेद परदे पर
    उफ कैसे भंवर में आ फंसा हूँ मैं, अपनी ही करनी से ! किसने कहा था यह बखेडा मोल लेने को  बहुत शौक चढा था ना अकेले रहने का? फँसावट नग रही थी बेटा-बहू की गिरस्ती और पोते की माया? अच्छा वानप्रस्थ है यह तुम्हारा, जिससे तुम्हें एक ओर दत्ता-दंपति का सहारा चाहिए और दूसरी ओर रामरतिया का । उधर बेटा-बहू परेशान, इधर बेटी अलग परेशान । क्या अधिकार था तुम्हें उन बेचारों को इस तरह सारी दुनिया के सामने अकारण अपराधी बना देने का?
    ० 
    उन्हें पता भी नहीं चला, कब वह योगिनी महामाया अपनी जगह से उठकर उनके पास आकर खडी हो गई और उनके सिर को, सिर के बालों की जडों को हौले-हौले सहलाने लगी ।… उनकी आँखे पूरी तरह मुँद गई । एक अदभुत शीतल करेंट-सी उनके मस्तक को भेदकर बूँद-बूँद रिसती हुई पोर-पोर में पसर रही है... क्या वे सचमुच होश में है? हैं, तभी न ऐसे अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं, जैसा सुख उनकी स्नायुओं ने अब तक कभी नहीं जाना...

    तुमने कहा था आप क्यों पूछ रहे हैं बाबूजी? क्या मेरी कहानी की किताब लिखना चाहते हैं ? मैं बुरी तरह चौक गया था तुम्हारे मुँह से यह सुनकर । तुम्हें कैसे लगा रामरती, कि मैं  तुम्हारी कहानी लिख सकता हूँ? पहली बार मुझे इलहाम जैसा हुआ कि हर आदमी की यह सबसे बड़ी, सबसे गहरी चाहत होती होगी कि कोई उसे सचमुच पूरा-पूरा समझे और न्याय करे ऐसा न्याय, जो और कोई नहीं कर सकता। सिर्फ लेखक नाम का प्राणी कर सकता है । लेखक, जो भगवान् की तरह लंबा इंतजार भी नहीं कराता । इसी जनम में, इसी शरीर और मन से निवास करने वाली जीवात्मा का एक्स-रे निकाल के रख सकता है ।
    (इसी उपन्यास से)

  • Ek Jala Huaa Ghar
    Iqbal Mazeed
    140 126

    Item Code: #KGP-1837

    Availability: In stock

    एक जला हुआ घर
    आज के पाठक को जिन चीज़ों को दुनिया में, अपने आसपास या अपने भीतर भी देखकर जो हैरत-सी होती है, यह उन्हीं हैरतों की कहानियाँ हैं।
    साहित्य को इनसान से, समाज से, जीवन से, संस्कृति और राजनीति से नए संबंध स्थापित करने पर प्रगतिशील आंदोलन ने जो ज़ोर दिया था यह उन्हीं संबंधों द्वारा जीवन के सौंदर्य, उसकी उठान और उभार को समझने का एक प्रयास है।
    कहानी का यथार्थ समाचार-पत्रों और अदालतों में प्रस्तुत किए गए यथार्थ से कैसे अलग होता है उसके लिए यह अंतर जानना, जो फिक्शन से जुड़ाव नहीं रखता, मुश्किल है। इसके अतिरिक्त कोई दावा करना या कहानियों से यह उम्मीद करना कि वह गलत होने वाली चीजों को ठीक कर देंगी, मूर्खता है; क्योंकि हर चीज़ साहित्य से ठीक नहीं की जा सकती। देखना यह होगा कि साहित्य, जिसका आधार Joy of understanding होता है, ये कहानियाँ अपने पाठक को वह आनंद कितना दे पाने में समर्थ हैं और इस काम में लेखक की ओर से डंडी तो नहीं मारी गई है। अगर इन कहानियों में उस सुंदरता और शक्ति की खोज मिल जाए, जिनको नए सांस्कृतिक मूल्यों में स्थान मिल सके तो यह लेखन सफल है।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu
    Ramesh Bedi
    450 405

    Item Code: #KGP-820

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Naav Doobne Se Nahin Darati
    Leena Malhotra
    200 180

    Item Code: #KGP-423

    Availability: In stock

    कभी-कभी तो ऐसा लगता है, प्रगतिशील कवियों ने बात-बात पर तन जाने वाली जो बेटियाँ साहित्य को दीं, बड़ी होकर वे सब लीना-जैसी (मीठी फटकार लगाने और सात्त्विक आक्रोश दिखाने में निपुण) स्त्री-कवि बन गईं। 
    लीना और फटकार? एक झलक में बात बनती नहीं जान पड़ती! इतनी संजीदा लड़की और फटकार? ये तो भरमुँह किसी से बोलतीं भी नहीं। ये नहीं बोलतीं पर इनकी कविताएँ तो बोलती हैं न-आपके मन पर पड़ी सब चट्टानों की आखिरी परत तक से इनका दो-टूक संवाद हो जाता है, और उनकी फॉसिलों में दबके पड़े स्नेह के सोते एकदम से फूट जाते हैं। 
    एक महीन अर्थ में प्रायः सारी कविताएँ राजनीतिक हैं-हर अन्याय को तमाशे की तरह देखते, आपके ही भीतर छुपे उस टुच्चे आदमी को धता बतातीं कविताएँ जिसे एक प्रगतिसिद्ध कवि बरजता रहा था: कभी अभिधा, कभी व्यंजना, कभी लक्षणा में! लीना में व्यंजना का स्वर अधिक प्रबल है और सबसे बड़ी बात ये है कि शायद ही कहीं वे इकहरी होती हैं! लीना-जैसी सांद्र ऐंद्रिकता की प्रेम- कविताएँ भी कम ही स्त्री-कवियों ने लिखी हैं। स्त्री-नागरिकता और स्त्री-फैंटेसी के अनेक रंग आपको इस संग्रह में एक साथ मिलेंगे।  
    -अनामिका
  • Aupacharik Patra-Lekhan
    Om Prakash Singhal
    380 342

    Item Code: #KGP-786

    Availability: In stock

    औपचारिक पत्र-लेखन
    विषय एवं शैली की दृष्टि से पत्रों का एक महत्त्वपूर्ण वर्ग औपचारिक पत्रों का है। औपचारिक पत्र एक प्रकार के दस्तावेज होते हैं। जरूरत पड़ने पर उनका उपयोग साक्ष्य एवं प्रमाण के रूप में किया जाता है। अतएव उन्हें लिखते समय पर्याप्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अब विभिन्न कार्यालयों में नियुक्त हिन्दी पढ़े-लिखे व्यक्तियों से हिन्दी पत्रचार में दक्ष होने की अपेक्षा की जाती है।
    औपचारिक पत्रों के विविध रूपों की  लेखन-शैली का सोदाहरण सैद्धांतिक विवेचन करने वाली पुस्तक का हिन्दी में सर्वथा अभाव है। विषयगत अपेक्षाओं एवं समय की माँग को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक हिन्दी में अपने विषय की पहली पुस्तक है।
    अनुप्रयुक्त हिन्दी के क्षेत्र में एक नया मार्ग प्रशस्त करने के कारण हिन्दी के प्रत्येक जागरूक पाठक और पुस्तकालय के पास इसका होना अनिवार्य है।
  • Do Naatak
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-862

    Availability: In stock


  • Parda Baari
    Kusum Kumar
    190 171

    Item Code: #KGP-39

    Availability: In stock


  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Randa
    Gyan Chaturvedi
    400 360

    Item Code: #KGP-422

    Availability: In stock


  • Natyachintan Aur Rangdarshan Antarsambandh
    Girish Rastogi
    475 356

    Item Code: #KGP-707

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में व्यापक, आधुनिकतम और गहन विश्वदृष्टि उल्लेखनीय है। इस अर्थ में बर्तोल्त ब्रेख्त का नाट्यचिंतन और रंगदर्शन बहुत गंभीर है। पश्चिमी नाट्यचिंतन के साथ-साथ यह भारतीय नाटककार और रंगमंच को भी परखती चलती है। लेखिका प्राचीन नाटककारों को नई दृष्टि से देखती है तो साहित्य और रंगमंच के साथ ही आलोचना को भी नए ढंग से देखती है।
    कई मानों में नाटक का साहित्य और रंगमंच से जो रिश्मा टूटता-बनता रहा और प्रश्न पर प्रश्न उठते रहे चिंतन और रंगदर्शन के अंतर्संबंध बनते-बदलते रहे। यह पुस्तक उन सबसे साक्षात्कार कराती है-चाहे संस्मरणों के जरिए, चाहे पत्र के जरिए या द्वंद्वात्मकत संवेदना के जरिए। कुछ महत्वपूर्ण नाटककारों का विशद अध्ययन-चिंतन भी यह स्थापित करता है कि मंचनां से ही नाट्यचिंतन और रंगदर्शन की अंतरंगता विकसित होती जाती है, क्योंकि नाटक और रंगमंच एक जीवित माध्यम हैं, अन्यथा वह कुंठित हो जाती है। दर्शक, पाठक, आलोचक सभी को उत्सुक करने वाली है यह पुस्तक।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora
    Sudha Arora
    280 238

    Item Code: #KGP-701

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Nashta Mantri Ka Gareeb Ke Ghar
    Prabha Shanker Upadhayaye
    90 81

    Item Code: #KGP-1863

    Availability: In stock

    नाश्ता मंत्री का गरीब के घर
    विषमताओं विसंगतियों और विद्रूपताओं  से अटी है आज के जिंदगी । ऐसे अनुभवों को अनुभूत का, प्रहारात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, व्यंग्य कहा जाता है । साथ ही मानव को कुंठाओं एवं जीवन-मूल्यों में स्खलन के प्रति भी फिक्रमंद होता है व्यंग्यकार । उसकी सोच का पैनापन पाठक के मन को कभी कचोटता है तो कभी उसका फक्कड़ मिजाज पाठक के मन को गुदगुदा जाता है । इसीलिए व्यंग्य के साथ हास्य का जुडाव हो गया है ।
    प्रस्तुत संग्रह में नाना भाँति की महक सहेजे तीस व्यंग्य-पुष्प संकलित हैं, जिन्हें मैंने डेढ़ दशक की अवधि में लिखा है । समाज, व्यवस्था राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, अर्थशास्त्र तथा दफ्तरी जिन्दगी इत्यादि विषयों पर कलम चलाने का प्रयास किया है । मैं अपनी लेखनी का तेवर दिखा पाने में कितना कामयाब हो सका हूँ इसका निर्णय तो प्रबुद्ध पाठक एवं सुधी समीक्षक ही करेंगे  ।
    ---प्रभा शंकर उपाध्याय 'प्रभा'
  • Tumhare Pyar Ki Paati
    Shanta Kumar
    95 86

    Item Code: #KGP-1986

    Availability: In stock

    तुम्हारे प्यार की पाती
    कविता लिखने की सोचकर मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी। शायद सोचकर कविता लिखी भी नहीं जाती। कविता तो भावनाओं की धारा बनकर स्वयं ही प्रवाहित होती है। स्वयं ही लिखी जाती है।
    मैं 1953 में कश्मीर आंदोलन में सत्याग्रह करके हिसार की जेल में गया। हिसार की तपती गर्मी व जेल की यातनाओं से बाल-मन में कुछ भावनाएँ कविता बनकर उतरती रहीं। उसके बाद लंबे 22 वर्ष बीत गए। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता और संघर्ष में मुझसे मेरे कवि का कोई संपर्क न हुआ। फिर 1975 में आपातकाल के समय नाहन जेल में मुझे मेरा कवि मिला। कुछ कविताएँ लिखी गईं।
    श्री जयप्रकाश नारायण मुंबई में अपने जीवन के अंतिम पहर में थे। कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनके अंतिम संस्कार में पटना गया। पटना से दिल्ली लौटा। एक कविता ‘फूल लेकर आए थे’ लिखी गई। ‘धर्मयुग’ के संपादक श्री धर्मवीर भारती जी ने मुझे फोन करके उस कविता पर बधाई भेजी थी।
    मैं दो बार हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा और एक बार केंद्र में मंत्री रहा। विकास की सारी प्रक्रिया में ‘अंत्योदय’ का मंत्र मेरी प्रेरणा रहा। उसी संबंध में मेरी कविता ‘अंत्योदय’ को भी श्री धर्मवीर भारती और अन्य मित्रों ने बहुत सराहा था।
    इन कविताओं के माध्यम से जो कुछ मन में उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया और अब पाठकों को समर्पित है।
    —शान्ता कुमार
  • Datta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-575

    Availability: In stock


  • Gujrati Katha Sanchayan
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7812

    Availability: In stock

    कथा साहित्य ही क्या कोई भी  साहित्य किसी देश, काल और समाज की सीमाओं में आबद्ध नहीं होता, वह तो जीवन-जगत का व्याख्यान होने के नाते सार्वजनीन और सार्वभौमिक होता है । हां, इतना अवश्य होता है कि देशज व् क्षेत्रीय परम्पराएं, संस्कार, मान-मूल्य और रीति-रिवाज उसमें सहज ही अपना स्थान बना लेते है, जो उसे एक निजी पहचान देते हैं, लेकिन उसके वैचारिक या भावनात्मक आंतरिक अनुभव मात्र क्षेत्रीय न होकर भूमंडलीय होते हैं, मानवीय होते हैं । इस संचयन की प्रस्तुत कहानियां गुजरात की निजी संस्कृति की विशिष्ट पहचान बनाये रखती हुईं मानवीय संवेदनाओं की मुखर प्रवक्ता हैं, जो पाठकों से बहुत कुछ कहना चाहती हैं, साथ ही गुजराती कहानी की विकास-यात्रा के पड़ावों को भी रेखांकित करती चलती हैं । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shailesh Matiyani
    Shailesh Matiyani
    180 162

    Item Code: #KGP-9181

    Availability: In stock

    अब वह सड़क पर था और उसकी आंखें रामचन्दर हलवाई के कारीगर के जलेबी बनाते हाथ के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थीं और भूख इतनी तीखी हो चुकी थी कि वह बदहवासी अनुभव कर रहा था। अपनी इस तरह की बदहवासी से रामखिलावन को डर लगता है। ऐसे में अक्सर उसे-चोरी सूझती है और इसी में वह कई बार बुरी तरह पिट भी चुका है।
    इस बार खाट पकड़ लेने से पहले तक उसकी मां कई घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने की नौकरी करती रही थी। कभी-कभार उसे भी साथ ले जाती वह। मौका ताड़कर घर के बच्चों की रंगीन किताबें पलटने लगता और अपनी पूर्व-स्मृति से काम लेता, जोर से पढ़ता-लौ-औ-ट-पौ-औ-ट-तो वह कैसे चोंककर देखती थी? खिलावन का यह अक्षरज्ञान उसमें एक आलोक उत्पन्न करता मालूम पड़ता था।
    फटे-पुराने कपड़ों के अलावा, बचा-खुचा खाना और त्योहारों पर कभी पूरी-मिठाई। लगभग डेढ़ महीने से मां काम पर नहीं जा पाई, ए.जी. आफिस वाले शुक्ला साहब के यहां। अकेले गया था वह। किसी बड़ीह चीज के लिए गुंजाइश नहीं रहती। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त शुक्लाइन उसके पूरे जिस्म पर अपनी भैंगों आंखों को उंगलियों की तरह फिराती रहती हैं। बरतन धोते में सिर्फ दो छोअी चम्मचें उसने जांघिये की जेब में डाल ली थीं, हालांकि खुद उसके दिमाग में ही कुछ तय नहीं था कि उनका वह क्या उपयोग कर पाएगा। जाने की उतावली में वह ‘बहूजी, हम जाइत हैं’, की आवाज लगाने के साथ-साथ, तेजी से दरवाजे तक पहुंच गया था। तभी शुक्लाइन का चटख लाल चूड़ियों से भरा पंजा उसके जांघिये की जेब पर पड़ा था और बदहवासी में उसके मुंह से चीख निकल गई थी।
    -इस पुस्तक की ‘चील’ कहानी से
  • In Sabke Baavajood
    Manohar Bandhopadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-545

    Availability: In stock

    इन सबके बावजूद
    प्राइवेट कॉलेज के असुरक्षित कार्य को छोड़कर अजय एक संपन्न व्यापारी की ‘भानजी’ रति को ट्यूशन पढ़ाता है। यहाँ उसे प्रॉपर्टी डीलिंग का भी काम मिल जाता है। इस व्यापार के दाँव-पेच सीख वह रति को हथियाकर धनवान बनने के स्वप्न देखता है। इस कोशिश में वह बुरी तरह पिटता ही नहीं, अपनी जान भी खतरे में डाल देता है। व्यापारी को उसके शोषण की फिक्र है और लड़की उसे झटककर किसी और की हो जाती है। हताश अजय तब रेनु की ओर मुड़ता है, जिसे वह किसी समय चाहने लगा था। 
    कहानी वर्तमान युग के नवयुवकों की त्रासदी को उजागर करती है, जिसमें वे वैवाहिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर जोखिम-संघर्ष में स्वयं को झोंक देते हैं। यह मर्मस्पर्शी उपन्यास आज की अस्तित्ववादी वास्तविकता को समझने के लिए पाठकों को विवश करता है।
  • Vaigyanik Sahitya Ke Anuvaad Ki Samashyayen Aur Unka Samadhan
    Bholanath Tiwari
    400 360

    Item Code: #KGP-9385

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का है। पूरा विश्व विज्ञान की उपलब्धियों, क्षमताओं, संभावनाओं और आवश्यकताओं से चमत्कृत है। विज्ञान की तमाम शाखाओं-प्रशाखाओं का अध्ययन करने के लिए जो पाठ्य सामग्री तैयार होती है वह मूलतः अनुवाद पर ही निर्भर है।
    जाहिर है कि वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद अत्यंत विशिष्ट होता है। अत्यंत कठिन भी। निश्चित पारिभाषिक शब्दावली, सुनिश्चित अर्थबोध, व्यापक संकेत पद्धति आदि के कारण वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद करते समय किसी को भी सूचना और ज्ञान के साथ सटीक शब्दावली का अभ्यास होना अपेक्षित है। प्रस्तुत पुस्तक ‘वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की समस्याएं और उनका समाधन’ में इसी विषय के अनेक पक्षों पर विचार किया गया है। यह वस्तुतः प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की सामग्री की हिंदी में अनुवाद की समस्याओं का लेखा-जोखा है। प्रस्तुत पुस्तक का संपादन डाॅ. भोलानाथ तिवारी तथा वैश्विक मान्यता प्राप्त विद्वान् डाॅ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने किया है। इसमें विषय वेफ अनेक अधिकारी विद्वानों के लेख शामिल हैं।
    संपादक के शब्दों में, ‘जब भी वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद किया जाता है तो प्रायः हमें कुछ शब्द नए बनाने पड़ते हैं या संस्कृत से या स्रोत भाषा अंग्रेजी से या अन्य भाषाओं, बोलियों से लेने पड़ते हैं। इस तरह हमारी भाषा की वैज्ञानिक शब्दावली में वृद्धि होती है...।’ एक बेहद जरूरी पुस्तक।
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Million Dollar Note Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    125 113

    Item Code: #KGP-283

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात हैं ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Pata Nahin Kal
    Pravesh Chaturvedi
    80 72

    Item Code: #KGP-1850

    Availability: In stock

    पता नहीं कल क्या गाऊँगा
    जैसे-जैसे हम सभ्य होते गए, नए-नए शब्दों से हमारी भाषा का विकास होता गया । हम समझदार होते गए-डॉक्टर-इंजीनियर-एडमिनिस्ट्रेटर, नेता-अभिनेता और पता नहीं क्या-क्या । 
    पहले जो दिल कहलाता था वह हार्ट कहलाने लगा हार्ट एनलार्जमेंट यानी बड़ा दिल । सो बड़े दिल वाला, जिसका हार्ट एनलार्ज हो गया हो।
    उसी भाषा में लाल रंग यानी इमरजेंसी !
    हम दिल की भाषा से दिमाग की भाषा बोलने लगे, लेकिन हमारा दिल तो दिमाग की जगह फिट हो गया है। इसीलिए हम दिल की बात सुनते हैं और दिल की बात कहते हैं ।
    अब नाम तो 'प्रवेश' है सो जहाँ भी अंतरंग प्रदेशों में जाना होगा वहीं मैं तुम्हारे सफल प्रयास का पहला द्वार होऊँगा-
    बिना मुझसे मिले तुम भीतर नहीं जा सकोगे!
    एक प्रयास असफल तो दूसरा 'प्रवेश द्वार' !
    यानी आशा के दीप से उजियारा !
    यह तो मुझे भी पता नहीं के कल क्या गाऊँगा
    लेकिन अपना अंतरंग सखा मैं
    भरी भीड़ में अकेला मिल जाऊँगा
    तब हम दोनों साथ-साथ कहेगे-सुनेंगे-
    कहाँ-कहाँ की लनतरानियाँ
    झुठी-सच्ची कुछ कहानियाँ। 

    -प्रवेश चतुर्वेदी
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    1200 1080

    Item Code: #KGP-607

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खण्डों में)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है।
  • Aranyakaand
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-2012

    Availability: In stock

    अरण्यकाण्ड
    रामकथा के एक अंश पर आधारित आख्यान है अरण्यकाण्ड । आज के संदर्भ में । आज के समय की पूष्ट्रभूमि में जीवन की घटनाओं को जिस आदिकथा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, वह मनुष्य को
    निरंतर कुरेदती रहती । है यह यात्रा का एक पड़ाव मात्र । छोटा-सा । इस पड़ाव  में कई बार विराम तो आता है किंतु अंतत: यह अंत नहीं है ।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय की यह कथाकृति बारंबार पाठक को उद्वेलित करती है । यह कृति प्रस्तुत करती है मनुष्य की तात्कालिक पराजय और मनुष्य की ही जिजीविषा । लेखक की यह कथाकृति समय का एक असमाप्य संबोधन है ।
  • Sahitya-Darshan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    400 360

    Item Code: #KGP-756

    Availability: In stock


  • Ek Koi Aur
    Amrik Singh 'Deep'
    250 225

    Item Code: #KGP-863

    Availability: In stock

    एक कोई और
    सुपरिचित कथाकार अमरीक सिंह दीप के अब तक पांच कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक वाक्य में कहा जाए तो दीप जी मानवीय समाज में पसरती पाशविकता और इंसानी रिश्तों में समाती संवेदनशून्यता के प्रति चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियां अधिकतर मनुष्यता के पक्ष में ही नहीं खड़ी दिखाई देतीं, बल्कि अमानवीय व्यवहार का मुखर विरोध भी करती हैं। उनके छठे कहानी-संग्रह ‘एक कोई और’ की कहानियां भी लेखक के इसी मनोभाव से उपजी हैं। भले ही इन कहानियों के कथानक, देशकाल, पात्र और कथोपकथन एक-दूसरे से भिन्न हैं, लेकिन इन सभी के मूल में आदर्श मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का स्वर सुनाई पड़ता है।
    इस संग्रह की कहानियां कुछ मायनों में दीप जी की पूर्ववर्ती कहानियों से अलग नज़र आती हैं। यानी ये कहानियां, कहानी के बने-बनाए फॉर्मेट से अलग खुद अपना आकार-प्रकार, गति और दिशा तय करती हैं। कुछ कहानियां तो अपने अंतिम सोपान तक पहुंचते-पहुंचते चौंकाती भी हैं। मिसाल के तौर पर कहानी ‘बर्फ़’ में एक मां का अपनी बेटी के प्रेमी के पास जाकर उसे मां बनाने का आग्रह करना, रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ती दिखती है। यहां पर याद आती है लेखक की एक और क्लासिक कहानी ‘देहदान’, जो पारंपरिक इंसानी रिश्तों को परिस्थितिवश नए ढंग से रचती है।
    इस संग्रह का आना इसलिए भी सुखद है, क्योंकि उम्र के सात दशक स्पर्श करने की दहलीज़ पर खड़े अमरीक सिंह पूरी ऊर्जा के साथ रचनारत हैं और धूल-धुएं और मेहनतकशों के शहर कानपुर की साहित्यिक रचनाशीलता में लगातार इज़ाफ़ा भी कर रहे हैं।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-1)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-630

    Availability: In stock


  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Prati Shurti
    Shree Naresh Mehta
    350 315

    Item Code: #KGP-1955

    Availability: In stock

    प्रति श्रुति : श्रीनरेश मेहता की समय कहानियाँ 
    श्रीनरेश मेहता का कथा-गद्य, जैनेंद्र और अज्ञेय की परंपरा मेँ रखकर देखा जाए तो समाज और अध्यात्म, राष्ट्र और राजनीति, जीवन और दर्शन से संपृक्त वाद्य है । वे न तो जैनेंद्र का प्रतिबिंब बने और न ही अज्ञेय की छाया । उन्होंने सर्वथा स्वायत्त और स्वाधीन कथा साहित्य लिखा जिसमें काव्यात्मक रस भी है और जिसका आस्वाद हमारे सामाजिक और संस्कृतिक भाव-बौधों को प्रगल्भ भी बनाता है। श्री मेहता जी की भाव-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और जीवन-दृष्टि उनके कथा-गद्य में जिस प्रकार प्रकट हुई है उससे लगता है कि श्रीनरेश जी ने नई कथा-भाषा रचकर हिंदी को एक सांस्कृतिक शक्ति का लोक संस्करण सौंपा है। भाषा अपनी सर्जनात्मक शक्ति में जब सार्थक होती है तो वह स्वयं ही समाज और संस्कृति को अपने में समा लेती है । श्रीनरेश जी ने अपने कथा-शिल्प से भाषा की संभावनाओं को विराट बनाया, गद्य की एक नई शैली विकसित की और यह सिद्ध किया कि एक जीवंत भाषा और सजीव भाषा किस पवार अपनी सांस्कृतिकता और आंचलिक नास्टिलजिया को एक साथ एकाकार कर सकती है । श्रीनरेश जी का समूचा गद्य-साहित्य और विशेष रूप से कथा-साहित्य अपने ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों ही परिप्रेक्ष्यों में गहन शोध और विमर्श की माँग करता है । एक कवि और सर्जक को मात्र 'वैष्णव' कहकर ब्रांड नाम से सज्जित कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी वैष्णवता के पीडालोक को किसी गांधी की तरह बाहर निकाल नरसिंह मेहता के गीत 'वैष्णव जन' की तरह लोकव्यापी बनाना होगा । श्रीनरेश मेहता जैसा सर्जक अतीत की इतिहास-वस्तु बनकर, वर्तमान की संज्ञा से पृथक नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनकी सर्जन-यात्रा की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हिंदी मानस उनमें निहित समस्त संभावनाओं को समय स्मृति और अवकाश तीनो में रखकर एक ऐसे श्रीनरेश मेहता का अन्वेषण करे जो हिंदी साहित्य की चेतना का नरेश हो, सृजन की उस्कृष्टता का प्रतिमान हो और अपनी सांस्कृतिक सामाजिकता का अद्वितीय उदाहरण हो ।
  • Chunmun Aur Gopa
    Tanu Malkotia
    40

    Item Code: #KGP-1239

    Availability: In stock


  • Tab Aur Ab
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-656

    Availability: In stock

    तब और अब
    अखबार  के बारे  में सामान्यत यह धारणा होती है कि सुबह होने के दो घंटे बाद उसकी उपयोगिता नहीं रहती । खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग से छपे हुए शब्दों के महत्त्व पर भी सवाल उठने लगे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि छपे हुए शब्दों से हर दिन इतिहास का एक नया पन्ना बनता है । राजाओं के दरबार रहे हो या ब्रिटिश शासन अथवा आजादी के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकारों ने पिछले 60 वर्षों से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक बदलाव पर विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करके रखा होगा । फिर भी ऐसी हजारों घटनाएं, तथ्य, अंतर्कथाएँ हैं, जो किसी सरकारी या गैरसरकारी दस्तावेजो से नहीं मिलेगी । इंटरनेट तो हाल के वर्षों में आया है और उसमें हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों या पत्रिकाओं में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण बाते उपलब्ध नहीं होगी। 
    इस पुस्तक की टिप्पणियों तात्कातिक परिस्थितियों से प्रभावित रही हैं और आज के संदर्भ में संभव है, उन पर दूसरे ढंग से सोचने की स्थिति बनती है। तब भी पुरानी घटनाएँ और परिस्थितियाँ नई सुबह के लिए सबक देती हैं । इस पुस्तक की अधिकांश टिप्पणियाँ नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तानम दैनिक भास्कर और आउटलुक साप्ताहिक में रहते हुए लिखी गई हैं और कुछ टिप्पणियाँ संपादकीय रूप में होने के कारण संक्षिप्त हैं । इस दृष्टी से यह अपने पत्रकारीय कास का लेखा- जोखा भी है और पाठको के लिए अधिक उपयोगी संदर्भ सामग्री भी ।
  • Baal Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-4
    Shuk Deo Prasad
    600 540

    Item Code: #KGP-608

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं के अधिष्ठाता वर्न जब अवसान की ओर अग्रसर थे, तभी विज्ञान कथाकाश में एक ब्रितानी नक्षत्र एच. जी. वेल्स उभरा, जिसने इस विधा को त्वरा तो दी ही, वर्न की परंपरा का नैरंतर्य भी भंग न होने दिया । वस्तुतः आधुनिक काल में वर्न  और वेल्स ने  विज्ञान कथाओं की आधारभूमि के लिए जो विचार-सरणियाँ निर्मित कीं, फलस्वरूप दुनिया की तमाम भाषाओं में विज्ञान कथाएं लिखी जाने लगीं। 
    निस्संदेह विज्ञान-गल्प-लेखन एक ऐसी सरस और रोचक विधा है, जो बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ-साथ ज्ञान के नए-नए गवाक्ष खोलने में सक्षम है बशर्त वैज्ञानिक तथ्यों का अतिरेक न हो । विज्ञानं गल्पकारों का दायित्व रंजन-मनोरंजन के साथ अंधकार कारा का निवारण भी है । 
  • Toro Kara Toro-2 (Sadhna)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-763

    Availability: In stock


  • Rang Aakash Mein Shabd
    Narendra Mohan
    1500 1350

    Item Code: #KGP-674

    Availability: In stock

    रंग आकाश में शब्द नरेन्द्र मोहन और शामा की एक ऐसी अपूर्व संस्कृति है जिसमें रंग और शब्द, चित्र और कविता परस्पर जुडे होते हुए भी अपना एक मौलिक उत्कर्ष रचते है । यहीं एक साथ कई सौंदर्य-छवियां, रंग-रेखाएँ और शब्द प्रकाशमान हैं। हिंदी में, भारतीय कविता में इसे अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग माना जा सकता है ।
    कविता और चित्र यहाँ विंब-प्रतिबिंब रूप ने आमने-सामने नहीं हैं, साथ-साथ हैं । उनमें अनुपात बैठाना या अर्थों-आशयों की समांतरता दूँढ़ना दोनों कलाओं को कमतर आँकना होगा, हालाँकि दोनों ने छिपे रचना-सूत्रों की खोज की जा सकती है । दरअसल, कविता और कला संबंधी यह एक बिलकूल नई तरह का अंतरावलंबन है । चित्रों  के रंग-संकेत, छवियां और छायाएँ यहाँ कविता के अंतरंग का हिस्सा बनी हैं।
    चित्र के संवेदन धरातलों और सौंदर्य-रूपों को, अमूर्तन में लिपटी हुई रंग-रेखाओं के शिल्प को अपनी संवेदना में ढाल कवि ने यहाँ अपनी कल्पना शक्ति से कविता के शब्द में रचा है। चित्रों की रंग-गतियों में प्राकृतिक बिंबो और दृश्यावलियों में झाँकने की चित्रकार की ललक को, रंगों की कंपकंपाहट और थरथराहट को, दौड़ते भागते रंगों में लिपटी उदासी, पीड़ा, खामोशी और खोए हुए वजूद को कवि ने कविता की लय, बिंब-विधान और संरचना का हिस्सा बना दिया है । चित्रों के रंग कवि को अँधेरे ने लपटों की तरह उठते दिखे हैं । ऐसा भी लगा जैसे अँधेरे का एक उफनता समुद्र हो जिसकी उत्ताल तरंगें आग से दीप्त हों। ऐसे ही किसी क्षण में उसे महसूस हुआ :
    रंगों के पीछे आग है
    और रेखाएँ चुप नहीं है


  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-4)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-895

    Availability: In stock


  • Vishay Purush
    Mastram Kapoor
    100 90

    Item Code: #KGP-2045

    Availability: In stock

    विषय-पुरुष 
    स्त्री और पुरुष दोनो स्वतंत्रचेता व्यक्ति होने के नाते कभी विषयी के रूप ने काम करते हैं तो कभी विषय बनते हैं । किसी से प्यार करते समय है विषयी होते है और प्यार किए जाने की चाह में वे विषय बनते हैं । किंतु विषयी अथवा विषय बनना उनकी स्वतंत्र चेतना का अधिकार हैं । भय या प्रलोभन से किसी पर यह भूमिका लादना अनैतिक ही नहीं, अश्लील भी है । दुर्भाग्य से मानव-समाज ने स्त्री को हमेशा विषय के रूप ने ही स्वीकार किया, उसे विषयी बनने के अधिकार से वंचित रखा और यह काम पुरुष-समाज ने किया भय और प्रलोभन दिखाकर जिसने धर्म का भय और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रलोभन भी शामिल है ।
    स्त्री-स्वतंत्रता के दमन की पुरुष-प्रवृति की प्रतिक्रिया ने लिखा गया यह उपन्यास सशक्त कहानी के साथ-साथ एक वैचारिक प्रयोग भी है । हमेशा विषयी की भूमिका निभाने वाले को (अथवा इसका वा करने वाले को) जब विषय बनना पाता है तो उसको क्या दशा होती है, यही इस उपन्यास का विषय है ।
  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Paani Kera Budbudaa
    Susham Bedi
    300 270

    Item Code: #KGP-9310

    Availability: In stock

    ‘यही कहानी थी पिया की? यह कथन है या सवाल? नहीं, कथन नहीं हो सकता। ऐसे खत्म नहीं हो सकती यह कहानी! ...शायद जिंदगी का सच यही है। कुछ भी नहीं है वहां पर हम बहुत कुछ भरकर उसी को सच मान बैठते हैं। ...पिया के मन में विरक्ति-सी हुई। सच क्या हस्ती है हमारी? कबीर के ही लफ्जों में पानी के बुलबुले जैसी!’ ये पंक्तियां ‘पानी केरा बुदबुदा’ उपन्यास का सारांश सरीखी हैं। सुप्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी का यह नवीनतम उपन्यास—जीवन, प्रेम, विवाह, सुख, विराग आदि शब्दों को समकालीन संदर्भ देते हुए लिखा गया है। उपन्यास विदेशी पृष्ठभूमि में लिखा गया है, लेकिन इसकी बेचैनियां सार्वदेशिक हैं।
    पिया इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है। उसका वैवाहिक जीवन, विवाह विच्छेद, तलाक के बाद प्रेम को फिर विवाह में बदलने की आकांक्षा, पुत्र और उसका पारिवारिक परिदृश्य—ऐसी अनेक बातों से मिलकर इस उपन्यास की कथावस्तु निर्मित हुई है। इस निर्मिति में निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहन आदि बहुत दिलचस्प तरीके से शामिल हैं। पिया के लिए सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है, पर वह ‘साथ’ चाहती है। विवाह इसीलिए उसे आश्वस्त और आकर्षित करता है। लेकिन नियति या मानव स्वभाव का निर्णय कुछ दूसरा है।
    सुषम बेदी कथानक को गतिशील रखते हुए जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात करती हैं। स्वाभाविक रूप से स्त्री-विमर्श भी आता है। पिया के बारे में लेखिका का कथन है, ‘अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खून के थक्के भी जमे हुए थे।’ ऐसी जाने कितनी विडंबनाएं इस उपन्यास को स्त्री-जीवन का मार्मिक दस्तावेज बना देती हैं। सुषम बेदी का लंबा जीवनानुभव और जनमनोविज्ञान समझने का ढंग भाषा के अनूठे स्वरूप में व्यक्त हुआ है। बेहद पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास। 
  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar
    Laxman Prasad
    595 536

    Item Code: #KGP-726

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Makka, Kauva Aur Kavi Tatha Anya Kavitayen
    Ramesh Chandra Diwedi
    140 126

    Item Code: #KGP-289

    Availability: In stock


  • Shubhada
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    270 243

    Item Code: #KGP-574

    Availability: In stock


  • Hamare Prerna Srot
    Sharan
    170 153

    Item Code: #KGP-955

    Availability: In stock

    हमारे प्रेरणा-स्रोत
    प्रस्तुत पुस्तक उन महापुरुषों के श्रेष्ठ विचारों व उत्तम आचरण का जीता-जागता प्रमाण हैं, जिन्होंने उच्च विचारों के लिए सादा जीवन बिताना परमावश्यक समझा । उनका खान-पान, रहन-सहन तो सादा था, पर विचार बहुत ऊँचे थे । आचरण महान् था । वास्तव में अगर जीवन में सादगी है, छल-कपट, लोभ, मोह, झूठ और रिश्वतखोरी से हम दूर हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क स्थिर होगा, उसमें नए-नए सुंदर व उच्च विचार पैदा होंगे । यदि हम विलासिता की ओर दौड़ेंगे तो हमारा जीवन बनावटी हो जाएगा । हम सदैव हो अनुचित ढंग से धन व पद पाने की लालसा रखेंगे । सहयोग, सहानुभूति और राष्ट्र-प्रेम की भावना का हमारे अंदर अभाव हो जाएगा । आशा है, पाठकों को यह कृति पसंद आएगी और इससे उन्हें अपना जीवन संवारने में सफ़लता मिलेगी ।

  • Satta Ke Aar-paar
    Vishnu Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9106

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    —इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Sahitya : Vividh Vidhayen
    Shashi Sahgal
    240 216

    Item Code: #KGP-755

    Availability: In stock

    साहित्य: विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Saptam Abhiyaan
    Sunil Gangopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-2009

    Availability: In stock

    सप्तम अभियान
    अपनी की आकांक्षाएँ, लिप्साएँ उसे कहाँ से कहाँ तक पहुँचा देती हैं इसका जीवंत चित्रण 'सप्तम अभियान' में सुनील गंगोपाध्याय ने किया है । आपसी द्वंद्व, घृणा, कुंठा, अतृप्ति आदि से भागकर आदमी प्रेम और सहयोग की तलाश करता है, दर-दर भटकता है, परन्तु अन्तत: पाता है कि हर जगह एक-सी ही स्थितियाँ व्यक्ति और समाज को घेरे हुए है । छोटे-छोटे स्वार्थ से लेकर बड़ी-बड़ी महत्त्वकांक्षाओं की पूर्ति तक मनुष्य को क्या-क्या नहीं करना पडता, कैसे-कैसे रूप नहीं धारण करने पडते ? व्यक्ति के अन्तरमन की इन्हीं उलझनों को दर्शाता है यह उपन्यास ।  साथ ही यह भी कि मनुष्य जीवन में असफलताओं का दौर चलता ही रहता है किन्तु व्यक्ति अगर साहस न छोडे, प्रयास-विमुख न हो तो सफलता उसको मिलती ही है, वह अपने अभियान में सफल होता ही है ।
    साहित्य अकादमी से पुरस्कृत बंगला लेखक सुनील गंगोपाध्याय का एक ऐसा रहस्यात्मक और रोमांचक स्थितियों से भरपूर उपन्यास जिसे बीच में छोड पाना किसी भी पाठक के लिए असंभव है ।
  • Vidrohini Shabri
    Hiralal Bachhotia
    100 90

    Item Code: #KGP-1854

    Availability: In stock

    विद्रोहिणी शबरी 
    जन्मजात विद्रोहिणी शबरी का विद्रोह जड़-परंपराओं और रूढियों के खिलाफ था । शबरी ने एक तरह से अतीत को या उस अतीत को जो हिंसा पर टिका था, को ललकारा था । वह आतंक के रावण के खिलाफ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी । शबरी ने नारी के रक्षिता माने जाने पर भी उँगली उठाई तो तरुणी शबरी पर भी जिसने देखा उसी ने उँगली उठाई थी । लेकिन शबरी अपने रास्ते चलती रही और जा पहुंची पंपा सरोवर क्षेत्र में । कठोर यथार्थ की रगड़ से उत्पन्न आदर्श ही शबरी का प्राप्तव्य बना और यह आदर्श शस्य श्यामल राम के रूप में परिकल्पित हुआ। मुग्धमना शबरी उसी राम के लिए प्रतीक्षारत रही । राम उद्धारक नहीं, शबरी के लिए मीत बनकर प्रकट हुए थे। केवट, निषाद के साथ राम के व्यवहार ने शबरी को ऐसा ही आश्वासन दिया था । राम का सबके प्रति समता भाव ही शबरी के लिए वरेण्य था । शबरी की वृष्टि में राम ने मानव-गरिमा की प्रतिष्ठा कर एक नई पहल की धी। शबरी अपनी इसी आस्था पर आरूढ राम के लिए प्रतीक्षारत रही । प्रतीक्षा के क्षणों को काटने के लिए शबरी बेर के पेडों का रोपण और फलो का संचयन करती रही । शबरी अरण्य संस्कृति की प्रतिरूप प्रकृति के संरक्षण में संलग्न रही। शबरी ने शूर्पणखा प्रकरण में अमर्यादित नारी को वरेण्य नहीं माना । इसीलिए राम ने हाथ उठाकर कहा था-शबरी प्रतिरूप है नवधा भक्ति का । इसीलिए शबरी सामान्य से असामान्य या असाधारण बन गई और राम के हृदय में मूर्ति के समान विराजित रही । यही शबरी की आस्था की विजय थी । शबरी ने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर राम को जनकनंदिनी को खोजने के संकेत दिए थे । इसमें सुग्रीव-हनुमान मिलन के पूर्व संकेत भी शामिल थे । भावी आपदाओं की ज्वालाओं को शांत करने हेतु सांत्वना नीर उड़ेलते रहना ही शबरी का प्राप्तव्य बना रहा ।
  • Veerendra Mishra : Geet-Samagra-(4 Vols.)
    Pradeep Pant
    2500 2250

    Item Code: #KGP-816

    Availability: In stock

    वीरेन्द्र मिश्र : गीत-समग्र (4 भागों में)
    नई कविता के आगमन के साथ काव्य-जगत् का पूरा परिदृश्य बदल गया । कारण कि छंदमुक्त कविता ने गीत को सबसे अधिक प्रभावित किया । यद्यपि नई कविता के अनेक कवियों ने स्वयं भी गीतो की रचना की और छंदों का सहारा लिया, किंतु नई कविता के उदय के साथ ही गीत की उपेक्षा भी आरंभ हो गई । गीत के उपेक्षित होने के अपने कारण भी थे । जैसे कि गीत के नाम पर तुकबंदी हावी होती गई, गीत प्रायः रूमानियत तक सिमट गया, उसने अपने को मंच या कवि-सम्मेलनों तक सीमित कर लिया । कालांतर में नई कविता के बाद जो कविता सामने आई, उसके चलते गीत और भी उपेक्षित हुआ, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नई कविता के बाद की छंदमुक्त कविता प्राय: नई कविता की रूढि बनकर रह गई और आज तो ऐसी अधिकांश कविताएँ कवियों के सपाट वक्तव्य सरीखी प्रतीत होती हैं । बहरहाल कविता के रूप-स्वरूप के परिवर्तन के दौर में कुछेक कवि समस्त ऊर्जा और सर्जनात्मकता के साथ गीतों की रचना करते रहे । वीरेन्द्र मिश्र ऐसे ही कवियों में है, बल्कि वे गीतों के प्रमुख और अत्यंत स्मरणीय रचनाकार हैं। इसका मुख्य कारण है उनकी गहरी सामाजिक संलग्नता और प्रगतिशील सोच, जिस वजह से वे किशोर वय से युवावस्था की ओर बढ़ने के दौर में बंगाल के भीषण अकाल पर सशक्त छांदिक रचना प्रस्तुत कर सके । उन्होंने जहाँ एक ओर मछुआरों, कामगारों, मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दु:खों और हर्ष-विषाद पर सार्थक गीत लिखे, वहीं एशिया के नव-स्ततंत्र राष्ट्रों पर मंडराते युद्ध के खतरे, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और विश्व-शांति के प्रश्नों को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया । साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में प्रदूषण आदि भी उनकी चिंत्ता के केंद्र में थे । बडे पैमाने पर उन्होंने गीतों के माध्यम से विसंगतियों पर व्यंग्य किए, जबकि गीत से व्यंग्य का इस्तेमाल अधिकांश कवियों के यहाँ बहिष्कृत-सा  ही रहा है । अदभुत शब्द-संयोजन, असंख्य छांदिक प्रयोग, संगीतात्मकता आदि ऐसे उपकरण है, जिन्होंने उनके गीतों को उजास ही । वीरेन्द्र मिश्र की गीत-यात्रा सही अर्थों से अप्रतिम हैं ।
  • Viklango Ke Liye Rojgar
    Vinod Kumar Mishra
    175 158

    Item Code: #KGP-7845

    Availability: In stock

    आम विकलांग कर्मचारी अत्यंत परिश्रम और अनुशासनप्रिय होते हैं । बढ़ते तकनिकी विकाश ने जहाँ विभिन्न कार्यों में शारीरिक श्रम की आवश्यकता को काम किया है वहीँ विकलांगों की कार्यक्षमता को नए-नए सहायक उपकरणों और बेहतर कृत्रिम उपकरणों के जरिये लगातार बढ़ाया है और आगे इसका और विस्तार होगा । 
    बदलते आर्थिक परिवेश में विकलांगों के लिए नयी रोजगार संभावनाओं की विशेष रूप से निजी क्षेत्र में तलाश आवश्यक है । इसके लिए उद्योग जगत, राष्ट्रीय संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और विकलांग युवक-युवतियों को एक जगह आना होगा और इस तरह प्रयास करना होगा ताकि विकलांग व्यक्ति बड़ी संख्या में रोजगार पा सकें और समाज को अपनी योग्यता का लाभ दें । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala
    Suryabala
    230 207

    Item Code: #KGP-418

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Jeet Ki Raah
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-857

    Availability: In stock

    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्तविक शीर्षक है 'जीत की राह', परंतु इससे
    अधिक आकर्षक है 'स्वेट मार्डन : सूक्तियाँ व प्रेरक विचार'।  इस पुस्तक
    में स्वेट मार्डन की तीन पुस्तकों क्रमश 'The Conquest of Worry', 'He can who think he can', 'To succeed in Life' में से उनकी
    सूक्तियाँ व प्रेरक विचार संगृहीत किए गए हैं।
  • Parvat-Gatha
    Hari Krishna Devsare
    425 383

    Item Code: #KGP-617

    Availability: In stock

    पर्वत गाथा
    पर्वतों और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। पर्वतों पर उगने वाले वन, उनसे प्राप्त होने वाले खनिज, वनोपज आदि मनुष्य के उपयोग की वस्तुएँ रही हैं। आज भी आदिवासी और गाँवों के लोग वनोपजों से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। पर्वतों के जंगलों से लकड़ी मिलती है। पर्वतों से देश की जलवायु अत्यधिक प्रभावित होती है। यदि भारत के उत्तर में हिमालय न होता तो मानसूनी हवाएँ सीधे मध्य तथा उत्तरी एशिया में पहुँचकर पानी बरसातीं और भारत एक रेगिस्तान बन जाता। हिमालय पर्वत सर्दियों में उत्तरी एशिया से आने वाली बेहद ठंडी हवाओं से भी भारत की रक्षा करता है।
    पर्वत मनुष्य के जीवन में विभिन्न रूपों में जुड़े रहे हैं और उनका महत्त्व आज भी है। ‘महानता’ के अर्थ में ‘पर्वत’ के अलावा कोई दूसरी उपमा नहीं दी जाती। आज मनुष्य ने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाने में सफलता पा ली है।
    जीवन में सफलता की ऊँचाइयों की तुलना पर्वत शिखरों से की गई है। हमारे देश में अनेक गौरवशाली पर्वत हैं और उनके प्रति लोगों में अटूट आस्था है। उन पर्वतों पर लोग पूजा करते हैं, मेले लगते हैं और मन की मुराद पूरी करते हैं। भारत के ऐसे ही पूज्य, गौरवशाली, इतिहास- प्रसिद्ध और धार्मिक आस्था के प्रतीक पर्वतों की गाथा है यह पुस्तक।

  • Spandit Pratibimb
    Amar Nath 'Amar'
    150 135

    Item Code: #KGP-1857

    Availability: In stock

    स्पन्दित प्रतिबिम्ब
    संघर्ष का चिराग
    जीवन के अंधेरे पलों में
    रोशनी के लिए
    संघर्ष
    जब बढ़ जाता है
    तब
    सन्नाटों को बुनते हुए
    खुद चिराग़ बन
    जल उठता हूँ मैं!
    हाँ
    यही परिभाषा
    बन गई है जिदंगी की !
    गंगा की धारा में
    मेरी खुशियों, उमंगों 
    और लक्ष्यों का
    प्रतिबिम्ब उभरता है
    अक्सर
    चाँदनी के बीच
    और फिर जीवन
    गीत बन जाता है
    लहरों के संग चलकर
    घुप अँधेरे के
    साए में भी !
    [इसी पुस्तक से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghav
    Rangey Raghav
    225 203

    Item Code: #KGP-92

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Ram Vilas Sharma
    Ram Vilas Sharma
    450 405

    Item Code: #KGP-712

    Availability: In stock


  • Ek Yug Ke Baad
    Pushpa Rahi
    40 36

    Item Code: #KGP-1891

    Availability: In stock

    एक युग के बाद
    पुष्पा राही के गीतों में सुख-दुःख, आशा-निराशा, अन्धकार-प्रकाश, संयोग-वियोग, व्यथा-वेदना, मिथ्या मोह, दम्भ, पाखंड सबका वर्णन मिलता है । कुछ गीत इतने मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं कि उन्हें पढते समय जीवन के अनेक तथ्य नेत्रों के सामने उदघाटित होने लगते है ।
    इन गीतो की एक विशेषता है नूतन बिम्बों का निर्माण । दर्द के मोती, रेशमी सुख, शोर की कालिख, उलझनों का झाड, नींद की कमजोर आँखे, विषमताएं रोग-सी, अंधेरे दर्द के साए, मीठी-मीठी इच्छा आदि प्रयोग गीत को संवेदन के स्तर पर बहुत मार्मिक बना देते हैं । कवयित्री अपनी अनुभूतियों और परिवेश की हलचल को ही लिखना चाहती है । दूसरों से उधार लेकर कुछ भी कहने में उसकी रुचि नहीं है ।
    एक युग के बाद में संकलित गीत उच्चस्तरीय होने के साथ काव्य की भावभूमि पर अपनी छाप छोड़ते है । कोहरेभरे प्रभात से निकालकर चन्दन वन की शीतल छाया में हमें भ्रमण का अवसर देते हैं । प्यार के वृत्त में घुमते हुए हम सन्नाटे के पार पहुँच जाते है ।
  • Bharatratna Dr. A.P.J. Abdul Kalam : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-1570

    Availability: In stock


  • Gyarah Shreshtha Kahaniyan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-804

    Availability: In stock

    ग्यारह श्रेष्ठ कहानियां
    हिंदी कहानी ने अपनी यात्रा में अनेक सुगम और दुर्गम मार्ग तय किए हैं । वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आए अनेक आख्यान हमारी कहानी-परंपरा के आदि स्रोत रहे हैं । सर्जना की सर्वथा लोकप्रिय विधा रहने के कारण कहानी, लेखकों की लेखनी की लाडली विधा भी बनी रही और संभवत: इसीलिए कहानी के अलंकरण और उपयोग निरंतर विकासमान रहे । प्रेमचंद और प्रसाद ने हिंदी कहानी को जिस श्रेष्ठ लोकहित में मर्यादित और निर्धारित किया, उसकी अनुगूँजें आज भी हिंदी के युवा कथाकारों की रचनाओं में प्रवहमान है ।
    जनप्रियता के कारण हिंदी कहानी की गति को खूब-खूब  उतार-चढाव भी देखने पड़े तथा कथा-आंदोलनों के शोर में विशिष्ट कहानियों के प्रभामंडल का पहचान पाना तक एक मुश्किल कार्य हो गया । कहीं अनुभूत यथार्थ के चित्रण  का शोर, तो यहीं कल्पनावृत्ति को तिलांजलि देने की जिद । ऐसे में कहानी की रचनाशीलता को समग्रता में हानि पहुंची। मगर इस गुलगपाड़े के बीच जो अच्छी कहानियाँ लिखी गई, वे ही अंतत: हमारी कथा-धरोहर भी बनती गई हैं।
    प्रस्तुत संकलन से संपादकद्वय ने हिंदी की ऐसी श्रेष्ठ कहानियों को प्रस्तुत किया है जो अपने पाठ के माध्यम से हमें लौकिक बनाती हैं तथा हमारे सामाजिक संज्ञान और सरोकारों को, समय की कसौटी पर कुशलता से स्थापित और उद्वेलित करती हैं। व्यक्ति भले ही न रहे, मगर पात्र का चित्रण उस व्यक्ति का शाश्चता सौंप सके-ऐसी क्षमता जिन कहानियों में समाहित है-उन्हें ही प्रस्तुत संग्रह में संकलित किया गया है । प्रेमचंद, जयशंकर पसार तथा विष्णु प्रभाकर आदि वरिष्ट कथाकारों की कालजयी कहानियों के साथ-साथ, अन्य सुप्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ भी पाठक एवं साहित्य के छात्र इस एक ही जिल्द से पढ़कर लाभान्वित होंगे, इसी आशमा और अपेक्षा के साथ यह संग्रह आपको सौंपा जा रहा है ।
  • Dhoop Ke Beej
    Hemant Kukreti
    225 203

    Item Code: #KGP-649

    Availability: In stock

    ‘धूप के बीज’ हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हेमंत कुकरेती का पाँचवाँ संग्रह है। किसी अच्छे कवि के पाँचवें संग्रह का आना उसके और उसकी भाषा दोनों के लिए उल्लेखनीय होता है। नब्बे के दशक में आए हिंदी कवियों में हेमंत की कविताएँ अलग से पहचानी जाती हैं। उन्होंने अपना मुहावरा पा लिया है। इधर उनकी भाषा की त्वरा ही नहीं बदली है, उसमें निहित चुभन का पारा भी चढ़ा है। ऐसा किसी चमत्कार के कारण संभव नहीं हुआ है। यह तब संभव होता है जब कवि की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि में परिपक्वता और स्पष्टता आती है; जब उसके लगभग सभी भ्रम तिरोहित हो जाते हैं; जब वह 'मनुष्य' और 'छाया मनुष्य' का अंतर करते हुए विषाद से भर जाता है। कवि को पता है कि कुछ लोगों ने कविता को खेल और मजाक बना दिया है। ऐसे कुकवियों के लिए कविता में जीवन की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण नहीं है। हेमंत के इस संग्रह की कविताएँ इस पतनशील प्रवृत्ति का प्रतिवाद करते हुए काली रात के विरुद्ध धूप के बीज रोपने की आकांक्षा रखने और देने वाली कविताएँ हैं।
    ये कविताएँ हमारे अपने समय में संबंधें की ऊष्मा और जीवन के तापमान का पता देती हैं। ये समय के कुचक्र को परिभाषित करती हैं और हर उस ‘चाल’ पर उँगली रखती हैं जो आत्मीयता के लिहाफ के भीतर अनवरत चलती रहती है। आजकल जब कविताएँ बहुत अबूझ होती जा रही हैं तब हेमंत की साफ-सुथरी कविताएँ पढ़ना सुखद अनुभव की तरह है। हेमंत बिना किसी बनावटी गंभीरता के अपनी बात कहते हैं और कविता बनी रहती है। वे कविता में बहस नहीं करते बल्कि बहसों को कविता में लाते हैं और पाठक के मन में उतार देते हैं। उनकी कविताएँ यदि बाजार के चरित्र को बारीकी से पकड़ती हैं तो जीवन के रंग को भी। कहना चाहिए, उनकी कविता दुःख का विलोम रचना जानती है। 
    एक कवि के रूप में हेमंत स्मृतियों का महत्त्व जानते हैं। वे जानते हैं कि स्मृतियाँ मनुष्य की थाती होती हैं। जो जितना जीवंत होता है, उसके पास उतनी ही अधिक स्मृतियाँ होती हैं। 
    हेमंत के पास अपने पहाड़ की, गाँव-जवार की, दिल्ली की, प्रेम की, तमाम साथियों और घटनाओं की अपार स्मृतियाँ हैं जो उनके कवि को मित्र की तरह ऊर्जस्वित करती हैं। उनकी शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो यथास्थिति के विरुद्ध उम्मीद न जगाती हो। कहा जा सकता है कि वे नाउम्मीदी के इस कठिन समय में उम्मीद के कवि हैं।
    यह संग्रह इसका प्रमाण है कि हेमंत की कविताएँ उस ओर तीक्ष्ण निगाहों से देखती हैं, जिधर ठीक से देखा नहीं गया है। वे शहर की निस्पंद हो रही देह में सिहरन जैसी कोई चीज तलाशते हैं और पाते हैं, 'कोई सिहरन पैदा नहीं होती/शहर के जिस्म में/वह थोड़ा और मर जाता है।' इस संग्रह की कविताएँ किंतु, परंतु और लेकिन को पीछे छोड़ती हुई निष्कवच सत्य के साथ खड़ी हैं।
    हेमंत की कई कविताएँ पितृसत्ता का नया मायावी चेहरा दिखाती हैं। 'घर से चली जाती हैं जो औरतें' और 'घरों में काम करने वाली औरतें' जैसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं। हिंदी के समकालीन काव्य परिदृश्य पर ऐसे कितने कवियों की मौजूदगी है जो हेमंत की तरह कह सकें-'साहित्य के आलोचक चुक गए/और बन गए कवियों के निंदक।' इस संग्रह की कविताएँ यथार्थ के कई चेहरे लेकर आई हैं। बुजुर्गों के बारे में उनकी सादगी से कही पंक्तियों में छुपा घाव बहुत गहरा है।
    इसी तेज नजर के कारण हेमंत शहरी जीवन को व्यक्त करने वाले बड़े कवि हैं। इस कविता में दया दिखाने की कोई अपील नहीं है क्योंकि कवि जानता है कि पूँजी के सौंदर्यशास्त्र में दया और करुणा घिनौने शब्द हैं। बुजुर्गों पर बात करते हुए जब हेमंत इस मार्मिक पंक्ति को लिखते हैं कि 'हँसी भी एक तरह का रोना है' तो समकालीन समय का नागरिक होने पर रोना आता है। इस संग्रह की अंतिम कविता हेमंत की बड़ी रेंज का पता देती है। इस संग्रह की सभी कविताएँ कविता की स्वाभाविक जमीन पर खड़ी हैं। इनमें समाई हुई लयात्मकता इनकी ताकत है। लंबे अंतराल के बाद आया हेमंत कुकरेती का यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक सार्थक और जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।
  • Aavaran
    Bhairppa
    600 480

    Item Code: #KGP-873

    Availability: In stock


  • Is Jantantra Mein
    Prabhakar Shrotiya
    980 882

    Item Code: #KGP-645

    Availability: In stock

    यह पुस्तक हमारी दुनिया के लोकतंत्र की अनेक विसंगतियों का बारीक रूपायन करती है। आज जब अनेक देशों में अखबारों का मुंह तक बंद करा दिया जाता है, आंग सान सूकी जैसी बड़ी नेता और कार्यकर्ता जेल की अनावश्यक और थोपी हुई सजा काटने को विवश होती हैं तो श्रोत्रिय जी के ये लेख बड़े प्रासंगिक लगते हैं।
    यह पुस्तक पिछले कुछ वर्षों की नहीं, बल्कि पिछली कुछ शताब्दियों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक लकीरों की पड़ताल करती है...
    –प्रांजल धर 
  • Tatvadarshi (Translation Of 'The Prophet)
    Khalil Jibran
    125

    Item Code: #KGP-153

    Availability: In stock

    तत्वदर्शी
    'The Prophet' के अनुवाद के पीछे मेरी मूल भावना इतनी ही थी कि इसे पढते हुए जो अनुभव और आनंद मैंने पाया, उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाऊँ । 
    यह सच है कि कोई भी व्यक्ति विश्व के किसी कोने का हो या किसी धर्म को मानने वाला हो, अपनी आध्यात्मिक यात्रा में उन्हें सत्यों का उदघाटन करता दीखता है जिन्हें पहले भी कहा जा चुका हैं और आगे भी कहने की कोशिश होगी । प्रकाश का स्वभाव तो एक ही रहता है,  चाहे वह दीये में हो या सूर्य में। हाँ, सत्य तो शाश्वत है, लेकिन उसकी अनुभूति की व्याख्याएँ अलग-अलग शैली अख्तियार करती हैं। और खलील जिब्रान जो एक कवि और चित्रकार भी थे, शायद इसलिए ही  शब्दों में शहद की मधुरता भी थी और तितलियों के परों के रंग भी । उनके शब्द स्थिर नहीं थे, वे उड़ते हुए एक तथ्य से दूसरे तथ्य पर बैठते और उसका सत्य संगृहीत करते जाते ।
    प्रेम में असफलता ने उनके हृदय को इतना खोखला किया कि वह एक कुआँ बन गया और फिर इसमें करुणा भर गई-पूरी मानव जाति नहीं, पूरी सृष्टि के लिए । तभी तो उनके शब्द इतने चमत्कारी और समर्थ लगते हैं, जैसे वे शब्द नहीं, एक-एक आत्मा हों और हमारी ओर निहार रहे हो । इतने प्राणवान शब्द कि हर शब्द अपने अंदर एक ब्रह्मांड समेटे हो जैसे । और वह, जिसकी आत्मा पूर्णत: निष्कलुष एवं निष्पाप हो जाती है, वही समर्थ हो जाता है शरीर के सौंदर्य का देख पाने में, और तब उसके लिए शरीर में छिपाने जैसा न कुछ रह जाता  है, न ही कुछ दिखाने जैसा । मानव शरीर भी उसके लिए सृष्टि के अन्य जीवों के  शरीर की तरह ही हो जाता है- अपने स्वरूप में सुंदर, पवित्र !
    –विजयलक्ष्मी  शर्मा
  • Bhartiya Rajneeti Mein Modi Factor Tatha Anya Prasang
    Bhagwan Singh
    590 531

    Item Code: #KGP-9363

    Availability: In stock

    भगवान सिंह हमारे समय के ऐसे चिंतक हैं जिन्होंने दलगत राजनीति से दूर रहकर संपूर्ण राजनीतिक विवेक के साथ  समकालीन भारतीय सत्ता और व्यवस्था का तार्किक विश्लेषण किया है। उनकी यह नई पुस्तक भारतीय राजनीति में मोदी फैक्टर तथा अन्य प्रसंग एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विमर्श को व्यक्त करती है।
    बिना किसी राजनीतिक व्यक्तित्व का नामोल्लेख किए यह कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति का चरित्र बहुत बदल गया है। सत्तापक्ष और विपक्ष की अनवरत सक्रियताएं कभी देश की आर्थिक स्थिति का विवेचन करती हैं और कभी सांस्कृतिक संदर्भों पर बहस छेड़ती हैं।
    इस विवेचन और बहस को अत्यंत गतिशील बनाने का श्रेय भारतीय राजनीति के नए सत्ता समीकरणों को है। जाहिर है जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व राष्ट्र को मिला है तब से ऐसी बहुत सारी बातें उभरकर सामने आई हैं जो वर्षों से सुप्तावस्था में थीं। वे प्रश्न जो एक ‘मौन मंत्रणा’ के तहत जाने किन तहखानों में छिपा दिए गए थे। भगवान सिंह ने एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति को केंद्रीयता देते हुए राजनीतिक और सामाजिक परिवेश पर बहस छेड़ी है। यह उल्लेखनीय है कि भगवान सिंह कभी भी एकांगी चिंतन नहीं करते। वे तथ्यों और तर्कों के साथ अपनी बात रखते हैं। एक प्रसंग में लिखते हैं, ‘वह अवसर की समानता की नींव डाल रहा है। अपनी भाषा के माध्यम से ही सारे कामकाज के लिए अभियान चला रहा है और तुम समानता की बात करते हुए अंग्रेजी के हिमायती और स्वभाषा शिक्षा और समान अवसर वेफ विरोधी रहे हो।’
    पुस्तक को पढ़ते हुए समकालीन परिवेश में चारों ओर फैले वे सवाल दस्तक देने लगते हैं जिनका उत्तर देना आज एक बुद्धिजीवी का दायित्व है। कहना होगा कि भगवान सिंह ने तुलनात्मक प्रविधि का इस्तेमाल करते हुए संवादधर्मिता के साथ इस दायित्व का निर्वाह किया है। भारत और भारतीयता में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह एक अनिवार्य पुस्तक है।
  • Jotiparva
    Nag Nath Kottoplle
    350 315

    Item Code: #KGP-780

    Availability: In stock