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books in hindi

  • grid
  • Bhartiya Sahitya Siddhant
    Dr. Tarak Nath Bali
    250 225

    Item Code: #KGP-9120

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य सिद्धांत
    हिंदी समीक्षा का आरंभ दो धाराओं के रूप में हुआ। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भारतीय साहित्य सिद्धांतों में से सहृदय की अनुभूति रस को केंद्रीय प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया और उसी के अंतर्गत कुछ पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को समाविष्ट करने का प्रयास किया। दूसरी ओर बाबू श्यामसुन्दर दास ने पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को ही हिंदी साहित्य में आवश्यकतानुसार प्रस्तुत किया। सैद्धांतिक स्तर पर ये दोनों धाराएं आज तक हिंदी आलोचना में लक्षित होती हैं। आश्चर्य की बात है कि विविध सिद्धांतों के बीच के अंतःसंबंधों के विश्लेषण की ओर हिंदी आलोचकों का विशेष ध्यान नहीं गया। एक ओर तो भारतीय साहित्य सिद्धांतों मं से चार सिद्धांतों-अलंकार, सिद्धांत, रीति सिद्धांत, ध्वनि सिद्धांत और वक्रोक्ति सिद्धांत का संबंध प्रधान रूप से काव्य-भाषा तथा गौण रूप से काव्यवस्तु के गंभीर विश्लेषण से है तथा इन सिद्धांतों के अंतःसंबंधों के विवेचन की अपेक्षा आज भी बनी हुई है। दार्शनिक व्याख्या के कारण रस सिद्धांत प्रधान रूप से सहृदय की अनुभूति में ही केंद्रित हो गया जब कि वह वस्तुतः विभावादि के रूप में काव्य वस्तु, काव्य भाषा तथा अभिनय को अपने में समेटे हुए हैं। उधर पश्चिम में भाषा केंद्रित सिद्धांतों-शैली विज्ञान, नई समीक्षा तथा विखंडनवाद आदि को हिंदी समीक्षकों ने स्वीकार किया किंतु संभवतः संस्कृत के काव्यभाषा के सिद्धांतों के गंभीर ज्ञान के अभावत के कारण भारतीय तथा इन नवीन पाश्चात्य सिद्धांतों की तुलनात्मक समीक्षा और मूल्यांकन की ओर उनका ध्यान नहीं गया जबकि पंडितराज जगन्नाथ ने सत्राहवीं शती में ही काव्य को शाब्दिक रचना कहा था। प्रस्तुत पुस्तक इन विविध काव्य सिद्धांतों के अंतःसंबंधों और भारतीय काव्य सिद्धांतों की आधुनिक प्रासंगिकता के विश्लेषण की दृष्टि से प्रथम व्यापक प्रयास है जिसमें भारतीय साहित्य सिद्धांतों के विविध पक्षों का विवेचन है जिसके अंतर्गत प्रसंगानुसार उनकी आधुनिक प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया गया है। इस सैद्धांतिक एंव व्यापक विवेचन को आधुनिक हिंदी कविता के उदाहरणों से स्पष्ट करने की कोशिश भी की गई है। आशा है इस प्रथम प्रयास में व्यक्त विविध स्थापनाओं एवं संकेतों को आगे विकसित करने के कार्य की ओर विद्वानों का ध्यान जाएगा। 
  • Aapki Pratiksha
    Shyam Vimal
    270 243

    Item Code: #KGP-555

    Availability: In stock

    आपकी प्रतीक्षा
    सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
    जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
    उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
    ‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
    परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
    क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
    अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’
  • Path Ke Daavedaar
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-866

    Availability: In stock


  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : ShrInaresh Mehta
    Shree Naresh Mehta
    245 221

    Item Code: #KGP-871

    Availability: In stock


  • Andher Nagari : Srijan-Vishleshan Aur Paath
    Ramesh Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-9131

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastava
    Jitendra Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7818

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
    --कपिलदेव
  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 990

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chitra Mudgal
    Chitra Mudgal
    240 216

    Item Code: #KGP-619

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चित्रा मुद्गल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'गेंद', 'लेन', 'जिनावर', 'जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं', 'भूख', 'प्रेतयोनि', 'बलि', 'दशरथ का वनवास', 'केंचुल' तथा 'बाघ'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चित्रा मुद्गल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Avinashi
    Dr. Vishv Narayan Shastri
    150 135

    Item Code: #KGP-2046

    Availability: In stock

    अविनाशी
    संस्कृत वाड्मय में यद्यपि कथा-साहित्य का प्रचार है, किंतु आधुनिक रीती से लिखित उपन्यास की न्यूनता परिलक्षित होनी है । 'अविनाशी' संस्कृत-साहित्य का सर्वप्रथम ऐतिहासिक उपन्यास है, ऐसा कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । सप्तम शताब्दी के प्राग्ज्योनिष- पुर अर्थात असम राज्य के राजा कुमार भास्कर वर्मा के साथ कनौजाधिपति हर्षवर्धन की मित्रता तथा दोनों का परस्पर मिलकर गौड़ राज्य पर आक्रमण करना मुख्यतया इस उपन्यास का वर्ण्य विश्व है । उक्त ऐतिहासिक आधार पर औपन्यासिक कल्पना करने एवं चरित्र-चित्रण  युक्त सामाजिक, सांस्कृतिक विषयों पर प्रकाश डालने से उपन्यास का कलेवर परिपुष्ट हुआ है । मूल उपन्यास सन 1984 में संस्कृत भाषा में प्रकाशित हुआ था, तत्पश्चात् साहित्य अकादेमी आदि विभिन्न संस्थान- प्रतिष्ठानों ने पुरस्कृत भी किया था । इतिहास एवं कल्पना-संभूत होने पर भी इसका चारित्रिक चित्रण हृदयावर्जक एवं सामाजिकता से ओतप्रोत है । मानवोचित पारस्परिक प्रेम, ईष्यों, द्वेषादि गुणों, अवगुणों का भी सम्यक प्रकाशन हुआ है ।
    इस उपन्यास को सर्वसुलभ और बोधगम्य बनाने के लिए असमिया, बाँग्ला प्रभृति प्रादेशिक भाषाओं में भी इसका अनुवाद हुआ है और प्रकाशित भी किया जा रहा है । यह हिंदी संस्करण हिंदी-प्रेमी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित किया जा रहा है ।
  • Kartavya
    Samual Smiles
    240 216

    Item Code: #KGP-280

    Availability: In stock

    कर्तव्य
    चौबीस वर्ष पूर्व मैंने ‘आत्मनिर्भरता’ (Self Help)  पुस्तक लिखी थी। तीन वर्ष उपरांत सन् 1853 में वह प्रकाशित हुई। वह पुस्तक संयोग से ही लिखी गई थी। मैंने ‘लीडस’ स्थान पर नवयुवकों के सम्मुख कुछ भाषण दिए थे। उन भाषणों में मैंने इस बात पर जोर दिया था कि उनके जीवन की प्रसन्नता व सफलता मुख्यतः उनके निरंतर आत्मसंस्कार, अनुशासन, संयम और सबसे अधिक ईमानदारी व साहस से कर्तव्यपालन करने पर निर्भर करती है। मेरे इन भाषणों का आशा से अधिक प्रभाव हुआ।
    अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने के बाद सायंकाल का समय मैं अपनी पुस्तक के लेखन में लगाता था। पुस्तक जब पूरी हो गई, तो मैंने उसे लंदन के एक प्रकाशक के पास भेजा। क्रीमिया के युद्ध के कारण उन दिनों पुस्तकें प्रायः बहुत कम बिकती थीं। इसलिए प्रकाशक ने धन्यवाद सहित मेरी पुस्तक लौटा दी। ‘जार्ज स्टीफेंसन का जीवन-चरित्र’ छपने के बाद ही श्री मूरे की कृपा से ‘आत्मनिर्भरता’ प्रकाशित हो सकी। 
    इसके तेरह वर्ष पश्चात् मेरी पुस्तक ‘चरित्र’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में मैंने महापुरुषों के चरित्रों को चित्रित करने का प्रयत्न किया, क्योंकि नवयुवकों को संस्कार देने का यह सर्वोत्तम ढंग है। इसके पाँच वर्ष बाद मेरी पुस्तक ‘बचत’ (Thrift) प्रकाशित हुई। इसमें मैंने श्रम के महत्त्व और बचत के लाभों पर जोर दिया था। 
    इनके पाँच वर्ष उपरांत इसी क्रम की अंतिम पुस्तक ‘कर्तव्य’ प्रकाशित हो रही है। मुझे आशा है कि पिछली पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी। इस पुस्तक में मैंने सर्वोत्तम और साहसी स्त्री-पुरुषों के उदाहरण दिए हैं। महापुरुषों के जीवन हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह कार्य कर सकते हैं। जो व्यक्ति कर्तव्य की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह महान् बन जाता है।  
    —सैमुअल स्माइल्स
  • Nayi Kahani Ki Sanrachana
    Hemlata
    600 540

    Item Code: #KGP-876

    Availability: In stock

    नई कहानी की संरचना
    इतिहास के वे क्षण अति महत्त्वपूर्ण होते है जो संकट और परिवर्तनों के क्षण होते है । ऐसे समय में ही पुरानी व्यवस्था को पीछे ढकेलकर नई व्यवस्था आगे आती है और परंपरागत अनेक रूढ तथा गतिहीन तत्त्व पीछे छुट जाते हैं और उनके स्थान पर नए यथार्थ से उदूभूत नए तत्त्व परंपरा का जीवंत अंश वन जाते हैं । इनसे मानव संबंधों के लिए नई भूमिका बनती है, नए मानव का जन्म होता है । इस संधिकाल में वहीं साहित्यकार सफल होता है जो तत्कालीन जीवन यथार्थ को अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करता है ।
    साहित्य में निहित 'समय सत्य' को पहचानना और उदघाटित करना आलोचक का धर्म है । आलोचक यदि कृति मेँ निहित जीवन सत्य की उपेक्षा करके अपने दृष्टिकोण के संदर्भ में कृति का विश्लेषण करता है तो कृति के साथ न्याय नहीं कर पाता ।
    स्वातंत्र्योत्तर युग से जिस समय यथार्थ का दर्शन तत्कालीन कथा साहित्य में हुआ, वह रचनाकार ने स्वयं  होता था और यहीं कारण है कि उसकी अभिव्यक्ति भी उससे प्रभावित हुई । तत्कालीन साहित्यकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति की भिन्नता का विश्लेषण भी प्राचीन मानद्रडों के आधार पर संभव नहीं था, विशेष रूप से कथा साहित्य का, जिसे 'नई कहानी' नाम से जाना गया ।
    'नई कहानी' के माध्यम से व्यक्त भावबोध ने उसकी अभिव्यक्ति शैली को प्रभावित किया । भाव और शैली ने सम्मानित रूप से समय यथार्थ का चित्रण किया । यहीं कारण है कि कहानी विश्लेषण के परंपरागत मानदंड इन कहानियों के विश्लेषण के लिए सक्षम नहीं थे । 'नई कहानी' के विश्लेषण के भिन्न मानदंडों का आश्रय लिया गया जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए थे । इस पुस्तक में उन्हें मानदंडों को खोज करने का प्यास है जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए हैं और 'नई कहानी की संरचना' से जिनका विशेष महत्त्व रहा है ।

  • Ikkisveen Sadi : Kavita Aur Samaj
    Jagdish Narayan Shrivastva
    690 621

    Item Code: #KGP-1550

    Availability: In stock

    ‘आज जैसा कष्ट है, उसमें सबसे बड़ी चुनौती तो कवि की ही है। हर युग के कवि को कोई न कोई चुनौती मिलती रही है, चाहे समाज की परंपरा दे, चाहे दर्शन दे, चाहे राजनीति दे लेकिन सबको मिलाकर इतनी बड़ी चुनौती कभी नहीं मिली, जो आज मिली है। हर देश के कवि को मिली है, हमारे देश के कवि को ही नहीं मिली है। ‘अस्ति-नस्ति’ के बीच में अगर हम रोक सकें ध्वंस को तो जीवन बच जाएगा। न रोक सकेंगे तो जीवन जाता रहेगा।...
    यहां नई पीढ़ी के कवि हैं, पुरानी के भी हैं।...दो पीढ़ियां न सामने हों तो चलता नहीं है।...कवियों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जब मित्र की तरह सामने होती हैं तब शायद बड़ा साहित्य बनता है और अगर दोनों लड़ते हैं तो उनकी लड़ाई ही समाप्त हो जाती है।
    जो आज का कवि है वह आज की परिस्थिति को देखे लेकिन युगबोध के साथ वह युगांतरबोध को भी जाने। कविता लिखना एक सामाजिक कर्म तो है ही। समान गति रखता हो वह समाज है, कवि उसी से आता है और उसकी व्यथा जानता है। सुख-दुःख जानता है। चेतना के अनेक स्तर हैं, उनमें एक सहचेतना है। अपने युग को समझने के लिए और बहुत से कर्म के संस्कार इनमें हैं, जो अब चेतना है। अपने युग को समझने के लिए एक पराचेतना भी है। ये सब चेतनाएं एक साथ कविताओं में मिल जाती हैं, तब हमें एक बड़ा कवि मिलता है। इसलिए युगबोध तो है ही आपका, युगांतरबोध भी होगा आपके पास।...जब ये सब मिलते हैं तो एक महान् कवि आता है।
    चिंतन सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया है पर अनुभूति सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया नहीं है। बड़ा कवि होने के लिए विशाल अनुभूति होती है, भाषा-संवेदना होती है, आंसू भी होंगे, हंसी भी होगी।
    ‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू’--इससे बड़ी परिभाषा नहीं है कवि की क्योंकि वह मनीषी है, सब कालों को मिलाकर देखता है, वह परिभू है, सबमें, सबके हृदय को जानता है और स्वयंभू होता है।...
    भाषा-भाव-अनुभूति विलक्षण हो तो आप पूरी समष्टि को बना सकेंगे। पर उसके पहले आपकी कविता पहले आपको बनाएगी। जो कविता आपको नहीं बना सकती, वह किसी को नहीं बनाएगी।’
    ---महादेवी
  • Ab Bhi Ashesh
    Om Bharti
    175 158

    Item Code: #KGP-390

    Availability: In stock

    अब भी अशेष
    जाने-माने वरिष्ट कवि ओम भारती का यह पाँचवाँ कविता-संग्रह है । आठवें दशक से ही या कवि अपनी पृथक पहचान के लिए सजग रहा है । इस किताब में उसकी रचनात्मकता का बढ़ा हुआ क्षेतिज़ फलक ही नहीं, ऊर्ध्व विस्तार भी सुस्पष्ट है । यह संग्रह दर संग्रह उत्कृर्ष का कवि हैं, हर नयी प्रस्तुति से 'परफेक्शन' की और दृढ़ता से बढ़ता हुआ कवि ।
    ओम भारती जितना हिंदी की जातीय काव्यसरणी में हैं, उतना ही उससे बाहर भी । आधुनिकता एवं विखंडन को नयी अर्थवत्ता देने में वे भावुकता का निषेध करते हैं । यह उस तरह की कविता है, जो अपने अंतिम निष्कर्ष में सारे जीवन को ही कविता के रूप से लेती हैं । इसमें कवि स्वयं ही अपना अन्यीकरण करता चलता है ।
    आज देशकाल में जो अनर्गल, अवांछनीय और अनय चल रहा है, यहाँ उसका सक्षम संयमित प्रतिरोध है । चीजों की एक भली-सी अनायासता है । यूँ भी ओम भारती अपनी कविता के लिए समकालीनों से भिन्न तथा नवीन वस्तु चुनते रहे हैं । 'द्वार घंटी का बटन’, 'थाली', 'रहचूँ झूला', "झाड़फानूस थे वे', 'जूते' इत्यादि कविताएं, जो इस जिल्द में बंधी हैं, पाठकों को इधर की कविता के एक उत्सुक और उत्तरदायी रकबे में ले जाएंगी ।
    'अब भी अशेष' संकलन जीवन-द्रव्य से पुष्ट कविताई लिए है । जीवन-जगत् की छोटी-बड़ी चीजों में, उनकी साधारणता से भी ओम भारती अतिरिक्त एवं बड़ा अर्थ भरते रहे हैं । यह काम वे निजी और नये भाषायी रजिस्टर में करते हैं । हर अगली लिखत में वे जैसे स्वयं को भी नया करते चलते है । पुस्तक की शीर्षक-कविता काव्य-पाठ पर एक दिलचस्प वृष्टि है, जो कविता के संप्रेषित होने पर एक ईमानदार संदेह करती है ।
    पाठक इन रचनाओं से एक गीताभा लक्षित करेंगे, छंदाभास  देखेंगे, जो आज की कविता को शिष्ट प्राण और विशिष्ट रंग से भर देता है । कवि रूमानिया को झटक देता है, एक 'लिरिकल’ धोखे को झटका देता है । 'सांसत घर' छोटी-सी कविता है, जिसमें एक 'सिम्फनी' तत्सम शब्दों की है, एक तदभव पदों की, एक उदात्त विचारों की, ना एक लहुलुहान शब्दों के होने की सिम्फनी भी है । मानों चार तारों पर लरजता स्वर-संगम है । 'बारिश' में जैसे एक 'सिंनेमैटिक ग्लो’ है  ।
  • Katha Kaho Kunti Mai
    Madhukar Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2021

    Availability: In stock

    कथा कहो कुंती माई
    "कितना खतरनाक होता है माई, मनुष्य के सपनों का मर जाना ?" सुमति ठाकुर ने सवाल की तरह पूछ लिया । "बहुत खतरनाक मेरे बेटे," छाती माई बोली, "सपने हैं तभी तो हमतुम जिंदा हैं, मनुष्य हैं। हम तभी तक जीवित है, जब तक सपने हैं । बेटे, हमारे सपने बहुत बड़े हैं, जो तुम बराबर कहते हो, या तो हम सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन । श्रमिक-किसानों का राज होगा । लडाई बहुत लंबी है सुमति, और चौतरफा भी । हमारे सपनों के हत्यारे हमारे संग-संग जिंदा हैं। इन्हें भी नहीं छोडना है ।"
    कुन्ती माई ऊपर की और दोनो बाँहें फैलाए दिखाती हैं, "अभी भी क्यों नहीं जागते तुम लोग ? पुश्तैनी पीपल-गाछ पर गाज गिरने वाली है ।" "क्या बात है माई ?" एक साथ कई पंख फस्कढाते है । "मेरे गाँव के लोग मुर्दा हैं । सभी मरे हुए हैं । बाप-दादे की पुश्तैनी गाछ को कटवाने के लिए मुदई लोग कलक्टर को बुलवाए हैं। इन्हें किस प्रकार ज़गाऊँ ?" माई का कंठ अवरुद्ध होने लगता है ।
    पीपल के निकट आते ही जेली-साथी नारे लगाते हैं, "कुन्ती माई को, लाल सलाम, लाल सलाम । इंकलाब जिदाबाद । जिदाबाद !" 
    कुन्ती माई अपनी दोनों बाँहें फैलाए उनकी ओर दौड़ पड़ती है, जैसे ममता के समुद्र में डुबो लेना चाहती है । यह डबडबाई आँखें पोंछती हुई कहने लगती हैं, "मेरे बाल-गोपालो । जुल्म बढ़ता है तो प्रतिरोध भी तेज होता है । पुलिस-प्रशासन आपका नहीं है, उन्हीं की रक्षा के लिए है । पन्द्रह मार्च को पटना गांधी मैदान को संकल्प के साथ दस लाख जनता चाहिए । मरने का संकल्प लो, तभी जिंदा रहोगे। मठ की जमीन पर हम फिर चढ़ेंगे । इस बार हम रहेंगे या मठ रहेगा ।"
    [इसी उपन्यास से]

  • Thank You! Saddaam Husain
    Kshma Sharma
    75 68

    Item Code: #KGP-9076

    Availability: In stock


  • Dil Ko Mala Kare Hai
    Vishnu Chandra Sharma
    80 72

    Item Code: #KGP-2007

    Availability: In stock

    दिल को मला करें है
    हिंदी  बहुत कम लेखकों ने जीवन के रग-रेशे को इतना करीब से बनते-बनाते, बिगड़ते-सँवरते देखा है, जैसा कि विष्णुचन्द्र शर्मा ने । प्रस्तुत उपन्यास आदि से अंत तक मनुष्य  जीवन-संघर्ष की गाथा है, जिसमें दुख  सुख है, राग है, विराग है, हर्ष है, विषाद है । जीवन  तमाम उतार-चढाव अपनी संपूर्णता में व्यक्त हुए है ।
    'दिल को मला की है' स्मृति-आख्यान है। लेखक ने अपनी पत्नी के अवसान के बाद कलम-कागज से जुगलबंदी की, जिसका सुफल है यह औपन्यासिक कृति । पली की मृत्यु के बाद घर-आँगन, रसोई-बगीचा कैसे बिखरता है, दरो-दीवार कैसे टूटती है, बिलखती है ! उपन्यास का कथाक्रम ठीक मनुष्य के जीवन की तरह है । किसी आत्मीय जन का हँसते-बतियाते 'टुक' चुप हो जाना या ऐसी यात्रा पर निकल जाना, जहाँ से वापसी संभव नहीं, निस्संदेह शोक का कारण बनता है लेकिन बकौल उपन्यासकार इसी शोक से जीवन का राग फूटता है ।
    पत्नी की स्मृतियों को खँगालते तथा डरो-दिवार में उसकी तलाश करने के क्रम में ढेरों पात्रों की जीवंत  उपस्थिति उपन्यास की रोचकता बढाती है । सरि पात्र जस के तस ।  बिना किसी शाब्दिक बुनावट के। मनुष्य मात्र मनुष्य होता है देवता या राक्षस नहीं। जिजीविषा ही उसकी पहचान है । काल भैरव, सादतपुर से लेकर यूरोप तक स्थितियाँ तथा विडंबनाएँ एक हैं, पर कोई भी पात्र निराश या हतोत्साहित नहीं दिखता ।
  • Vaigyanikon Ke Saras Prasang
    Shuk Deo Prasad
    120 108

    Item Code: #KGP-9150

    Availability: In stock

    ये प्रसंग साक्षी हैं कि सत्य की खोज में जीवन होम करने वाले वैज्ञानिक समाज के अंतरंग प्राणी, मानवीय मूल्यों के पोषक और संकल्पनिष्ठ ईमानदार इंसान हैं। 
    विज्ञान-विभूतियों के जीवन से चुने हुए रंग-बिरंगे, खुशबूदार फूलों का यह बेशकीमती गुलदश्ता निश्चय ही अपनी सुरभि से आपके जीवन में नए उत्साह का संचार एवं स्वस्थ दृष्टिकोण का निर्माण करेगा । 
    हमारे चारों ओर प्रेरणा-पुरुष बिखरे पड़े हैं । प्रश्न है इनसे कुछ सीखने का, ग्रहण करने का । विज्ञानं विभूतियों के ये 'सरस प्रसंग' हास-परिहास के साथ पाठकों के जीवन में आशा और नवीन उत्साह का भी संचार करेंगे, ऐसी आशा है । 
  • Us Raat Ki Baat
    Amrendra Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9062

    Availability: In stock


  • Aids : Tathya Evam Bhrantiyan
    Shuk Deo Prasad
    100 90

    Item Code: #KGP-9144

    Availability: In stock

    एड्स कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है कि रोगी का पारिवारिक या कि सामाजिक बहिष्कार किया जाय जैसा कि पहले कुष्ठ रोगियों प्रति किया जाता था। वैसे कुष्ठ भी अब असाध्य नहीं रहा। इस सामाजिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है। एड्स रोगी को घृणा नहीं आपका स्नेह चाहिए। एक साथ रहने, उठने-बैठने, भोजन करने, सामूहिक स्नान गृह/शौचालय में जाने, वस्त्रों के संप्रयोग से एड्स नहीं फैलता और न ही एक दफ्तर में साथ काम करने से या कि भीड़ भरे स्थानों में, रेल-बस में साथ-साथ सफल करने से। अतः आप एच.आई.वी. संक्रमित/एड्स ग्रस्त व्यक्ति के साथ सहभागिता कर सकते हैं। ऐसी सामाजिकता से उसकी अपनी जिंदगी के प्रति रुझान बढ़ जाएगी।
    एड्स के अधिकांश मामले यौन संसर्ग के देखे गए हैं। फिर दूषित रक्ताधान, साझे ब्लेडों, सुइयों/सिरिंजों के इस्तेमाल से भी संक्रमण होता है अर्थात् शारीरिक द्रव, यौनिक द्रव इसके प्रसार के कारण हें। इन बातों को ध्यान में रखकर और इनसे परहेज करके आप रोगी के साथ मजे से गुजर-बसर कर सकते हैं। एड्स के बारे में बहुत सी भ्रांत धारणाएं समाज में व्याप्त हैं। उन भ्रांतियों का निवारण और तथ्यों की सटीक जानकारी देना ही पुस्तक का मंतव्य है। एड्स के प्रति आम आदमी की भाषा में जागरूकता जगाने के ही उद्देश्य से पुस्तक लिखी गई है।
  • Babu Harishchandra (Paperback)
    Jaivardhan
    130

    Item Code: #KGP-7219

    Availability: In stock

    हरिश्चन्द्र का जन्म काशी के एक संपन्न अग्रवाल परिवार में हुआ। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे, जो गिरधरदास उपनाम से लेखन कार्य करते थे। गिरधरदास नाम से लिखित ‘नहुष’ नाटक को हिंदी का प्रथम नाटक कहा जाता है। नहुष नाटक को ही पढ़कर हरिश्चन्द्र में नाटककार बनने की इच्छा जागृत हुई और हरिश्चन्द्र हिंदी रंगमंच के संस्थापक के रूप में स्थापित हो गए।

  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Hamare Aadarsh Mahapurush
    Nirankar Dev Sewak
    40

    Item Code: #KGP-948

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Ramnika Gupta
    Ramnika Gupta
    240 216

    Item Code: #KGP-623

    Availability: In stock


  • Kucch Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100 90

    Item Code: #KGP-9238

    Availability: In stock

    ये कहानियां बच्चों के लिए भी हैं और किशोरांे के लिए भी। अपनी जीवन-यात्रा में आए हुए कुछ मार्मिक प्रसंगों से मेंने ये कहानियां रची हैं। सभी के पात्र मनुष्य हैं। हां, दो कहानियां ऐसी हैं, जो शुद्ध काल्पनिक हैं और जिनके पात्र पशु हैं। मैंने चाहा है कि इन कहानियों से बच्चों का मनोरंजन तो हो ही, वे अपने वय की कुछ समस्याओं से रूबरू हों और उन्हें अच्छे जीवन-व्यवहार की सीख मिले।
    —रामदरश मिश्र
  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Toro Kara Toro-1 (Nirman)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-1574

    Availability: In stock


  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195 176

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock


  • Sau Baal Kavitayen
    Atri Garg
    75

    Item Code: #KGP-1450

    Availability: In stock


  • Pattharon Per Tootata Jal
    Surendra Pant
    160 144

    Item Code: #KGP-1852

    Availability: In stock

    पत्थरों पर टूटता जल

    आरम्भिक कविताएँ कवि के आत्मसंघर्ष का,
    खुद से लड़ते हुए कहीं न पहुँचने की
    विवशता के बीच भी अपनी पहचान
    बनाने की ललक से भरी तैयारी
    का दस्तावेज होती है ।
    उनमें एक ओर प्रचलित काव्यविधान
    से टूटने की छटपटाहट होती है
    तो दूसरी और शास्त्र की चुनौतियों के सम्मुख
    कुछ नया कहने का तेवर होता है ।
    इतना कहने का प्रयोजन यह नहीं कि
    सुरेन्द्र पंत की कविताएँ अन्तिम कविताएँ हैं
    जिन पर बहस नहीं की जा सकती ।
    वास्तव में वे कविताएँ बहस की कविताएँ है ।
    कारण यह कि उनमें एक गंभीर किस्म के
    कवि की मुद्रा सहसा किसी शब्द मा शब्दार्थ
    के कोने से झलकने लगती है ।

    वे चाहे आज की भाषा में खुद को खोजने की
    कोशिशें हो पर उनमें आज और कल की
    कालगत धारणाओं से बचने की कोशिशें हों ।
    इस अर्थ में वे ऐसे वर्तमान की कविताएँ है
    जो सदैव अमानवीय परिस्थितियों में
    ऐसी ही रुपाकृ्ति देता है ।
  • Ghane Kertarutale
    N.E. Vishwanath Iyyer
    140 126

    Item Code: #KGP-9118

    Availability: In stock

    निबंधकार के रूप में लेखक का राष्ट्रीय व्यक्तित्व हर रचना में अपनी छाप छोड़ता है। यह उस सृजनधर्मी राष्ट्रीय व्यकिततव के अनुरंजक छाप की गुणवता होती है कि मोटे रूप में शुष्क समझा जाने वाला यात्रा-वर्णन सरल ललित निबंध की कलाभंगिमा में प्रस्तुत मिलता हैं
    यात्रा-वर्णन के अतिरिक्त इन निबंधों में संस्करण, स्मृति-तर्पण, वर्णन, पत्र, रिपोर्ताज और संवाद-शिल्प प्रयुक्त हुआ है। विधा कोई भी हो, लेखक का लक्षित विधेयक मूलतः एक है और वह है राष्ट्रीय समन्वयात्मक विशालता। इसके लिए व्यष्टि के छोर से समष्टि की खोज-खबर ली जाती है और साहित्य चिंतन अथवा आत्म-चिंतन से राष्ट्रीय चिंतन को संपृक्त करते हुए लेखक प्रादेशिक छवियों, रंगारंग सभ्यताओं और नए अभ्युत्थान के प्रतिष्ठानी आकर्षणों को संवेदनीय शिल्प में विस्तार के साथ रेखांकित-चित्रित करता है।
    —डाॅ. विवेकीराय
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan
    Usha Kiran Khan
    240 216

    Item Code: #KGP-685

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aurat Ek Raat Hai
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-1984

    Availability: In stock

    औरत एक रात है 
    ‘नहीं, आप गलत क्यों कहेंगे? गलत तो उन्हांने कहा है, जो दीदी के अविवाहित रहने के लिए जिम्मेदार हैं। अपनी गलती छिपाने के लिए उन्होंने यह कहानी गढ़ ली है। ...यह घर की बात थी, घर में ही रह जाती, तो अच्छा था; पर दीदी के बारे में ऐसा कुप्रचार हो और मैं चुप रह जाऊँ, यह तो नहीं हो सकता; तो सुन लीजिए, दीदी शादी नहीं कर सकीं, क्योंकि छोटे भैया की पढ़ाई बाकी थी और बड़े भाई ने साफ इंकार कर दिया था। वह अनब्याही रह गईं, क्योंकि घर में बूढ़ी बीमार माँ थी और उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। वह अविवाहित रह गईं, क्योंकि मेरी परवरिष करनी थी, और सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी शादी के लिए आज तक किसी ने पहल नहीं की और खुद अपना दूल्हा ढूँढ़ने के संस्कार हमारे परिवार में नहीं थे, इसीलिए उनकी शादी नहीं हो सकी,’ बात करते करते मेरा गला भर गया था। मैं एकदम उठ खड़ी हुई, ‘अच्छा, अब मुझे इजाजत देंगे। थैंक्स फॉर द टाइम यू गेव मी।’
    ‘अरे बिटिया, चाय तो पीती जाओ।’ जज साहब की पत्नी बोलीं। गृहिणियों को हमेषा मेहमानों को खिलाने पिलाने की ही पड़ी रहती है, और बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता, पर जज साहब मेरी बात समझ रहे थे। दोनों भाई मेरे साथ ही उठ खड़े हुए और मुझे छोड़ने बाहर तक आए।
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘अवसान एक स्वप्न का’ से)
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mahesh Darpan
    Mahesh Darpan
    250 225

    Item Code: #KGP-9382

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : महेश दर्पण

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार महेश दर्पण ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘दिग्विजय’, ‘पछाड़’, ‘जाल’, ‘लेकिन...’, ‘नेवर टु डाइ’, ‘जाने जिगर’, ‘जख्म’, ‘किस्सा सीताराम’, ‘मेरी जगह’ तथा ‘चिड़िया की उड़ान’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महेश दर्पण की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Swami Ram Tirath Ki Shreshtha Kahaniyan
    Jagnnath Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9140

    Availability: In stock

    स्वामी रामतीर्थ की श्रेष्ठ कहानियां जहाँ अत्यंत रूचि-मोहक है, वहां उसका दामन उज्ज्वल प्रेरणाओं और सुनहले शिक्षा-तत्वों से जगमगा रहा है तथा ह्रदय व मन को आलोकित किये देता है । 
    प्रत्येक कहानी के अंत में कुछ शब्दों द्वारा कहानी में निहित शिक्षा-तत्त्व का संकेत दिया  गया है । यही ऐसा न किया जाता, तो इन कहानियों एवं स्वामी जी के उद्देश्य से न्याय नहीं हो सकता था । स्वामी जी ने प्रत्येक कहानी का उद्भावना केवल इसीलिए किया था की उसके रोचक माध्यम से अपने श्रोताओं एवं पाठकों के निकट विषय की गंभीरता तथा दुरूहता बोधगम्य व सरल हो जाये और साथ ही साथ शिक्षा के तत्त्व भी उजागर हो उठें । 
  • Prakaaraantar
    Madhur Shastri
    125 113

    Item Code: #KGP-1862

    Availability: In stock

    प्रकारान्तर
    वर्तमान जीवन-परिवेश की दुर्दान्त अमानवीयता के सामने पड़ने पर अस्वीकार का स्वर ही स्वाभाविक परिणति होती है एक सर्जक कवि की । मधुर शास्त्री का कवि भी मुक्त- छंद की इन कविताओं में अपना कटु अस्वीकार दर्ज करता है : 'चलो, लौट चलें पुराने दिनों की ओर/शाम झुकने लगी है/रात जाने वाली है/मुँह में भरकर झाग/लाल जीभ में है काला जहर इसके साथ है खूँख्वार अँधेरा' -प्रतीकात्मक व्यंजना में युग की विभीषिका व्यक्त है ।
    गीत के ऊँचे सृज़न-तल से बाध्यकारी जिन सीमाओं- स्थितियोंवश मधुर शास्स्त्री का गीतकार मुक्तछंद के तल पर उतरा है, वे निश्चय ही युग-यथार्थ  को रेखांकित कर रही हैं तथा जिन्होंने कवि को झेंझोड़ दिया है। अन्याय, हिंसा, हत्या के अपूर्व भयावह वर्तमान को भावोपचार  से अधिक संवेदनात्मक विचारोपचार एवं व्यंग्य-प्रहार की दरकार है ।
    समाज-जीवन की विचार-विश्लेषणमयी पहचान के बावजूद मधुर जी का गीतकार कवि अपनी मूल प्रकृति को पूरी तरह छोड़ नहीं देता । यह अच्छा हैं, क्योंकि सृजन की मौलिक चिंतन-दृष्टि ही प्रामाणिकता को सिद्ध करती है। बाहरी बाध्यताओं में घिरकर भी मधुर शास्त्री दृष्टि, भाषा, लय, तुक आदि को शिथिल नहीं होने देते तथा निराला की मुक्तछंद परंपरा में काव्य-सृजन की हरीतिमा, सरसता, संवेदना, लोकाभिमुखता, संप्रेषणीयता, सहजता की भूमि को विकसित करने में संलग्न रहते हैं । यहीं यह कह देना अप्रासंगिक न होगा कि निराला ने छंद तोड़ा नहीं था, एक नया छंद-मुक्तछंद, जोड़ा था।
  • Badalate Ahsaas
    Birsen Jain Saral
    225 203

    Item Code: #KGP-9384

    Availability: In stock

    बदलते अहसास

    जीवन की कहानियों की भूमि प्रायः परिवार होता है। इस अर्थ में बीरसेन जैन पारिवारिक परिवेश की कहानियों के कहानीकार हैं। परिवार के भीतर के जीवंत दृश्य, स्थितियाँ, तनाव, अलगाव और अकेले रह जाने की पीड़ा से भरे पात्रों को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वह प्रकारांतर से अपनी कहानियों के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि दूसरों के जीवन से प्रेरणा लेकर हम चाहें तो अपना जीवन सफल, संतोषमय व सुखी बना सकते हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक बदलते अहसास की सातों कहानियाँ अपने आसपास के परिवेश से निकली हैं। यहाँ हम परिवार और समाज के परिवर्तित होते स्वरूप के बीच कथा-चरित्रों पर पड़ते प्रभाव को अनुभव कर सकते हैं। सच पूछें, तो ये कहानियाँ एक नया जीवन बनाने की प्रेरणा देती हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप अनुभव करेंगे कि इनकी आवाज कहीं आपके भीतर भी दबी पड़ी है। कारण यह है कि यहाँ मनुष्य के अनेक रूपों के मध्य दरकते संबंध ही नहीं, पश्चात्ताप के आँसू भी नजर आएँगे। कहानीकार की यह विशेषता है कि वह उन स्थितियों को भी उजागर करता है जो समाज का स्याह चेहरा सामने रखती हैं।
  • Swami Dayanand Ki Jeevan-Yaatra
    Jagat Ram Arya
    30

    Item Code: #KGP-9194

    Availability: In stock

    हिंदुओं में आज जो राष्ट्रीयता और जीवन की नई लहर हमें दीख पड़ती है, उसका श्रेय उस पुरुष श्रेष्ठ को है जो आर्य समाज के प्रवर्तक के नाम से प्रसिद्ध है। उसने जो आग अपने तेज और तप से जलाई, उसने हिंदुओं की लाखों वर्षों की गुलामी और गंदगी को भस्म कर दिया।
    उसने सोई हुई हिंदू जाति को ठोकर मारकर कहा-उठ, उठ, ओ महाजातियों की माता, उठ! 
    भारत का यह विख्यात विद्वान्, तपस्वी और इन्द्रिय विजय पुरुष जन्म-भर विरोधों को अपनी मुठमर्दी से कुचलता हुआ आगे ही बढ़ता चला गया। उसने उस प्राचीन दीवार को ढहा दिया जिसमें हिंदू जाति कैद थी। उसने विशुद्ध वैदिक शिक्षण संस्थाएं खोलने की प्रेरणा दी। यह पुरुष श्रेष्ठ ऋषि दयानंद थे।
  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Vishwa Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-3
    Shuk Deo Prasad
    545 491

    Item Code: #KGP-699

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं को कथा की एक विधा के रूप में मान्यता मिले, ह्यूगो गन्र्सबैक ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई और उन्होंने ही इसे ‘साइंटीफिक्शन’ नाम से अभिहित किए जाने का परामर्श दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने इस विधा को अपनी तरह से परिभाषित भी किया। ‘अमेजिंग स्टोरीज’ के प्रथमांक में संपादकीय टिप्पणी में गन्र्सबैक ने लिखा-‘साइंटीफिक्शन’ से मेरा अभिप्राय जूल्स वर्न, एच.जी. वेलस और एडगर एलन पो द्वारा लिखी गई ऐसी कहानियों से है, जिसमें आकर्षक रोमांच के साथ वैज्ञानिक तथ्य और युगद्रष्टा की दूरदर्शिता का सम्मिश्रण हो। ....आज विज्ञान कथा-साहित्य में चित्रित किए गए किसी आविष्कार के कल सत्य हो जाने में असंभव जैसा कुछ नहीं है।’
    गन्र्सबैक की इसी परिभाषा के कारण विज्ञान-गल्पों को ‘भविष्यद्रष्टा साहित्य’ भी कहा जाने लगा और लेखकों से ऐसी अपेक्षाएं की जाने लगीं जो निंतात अव्यावहारिक थीं।
    तो क्या विज्ञान कथाओं में आज के कल्पित आविष्कार कल के सच हैं? जी नहीं! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। किसी भी गल्प में परिकल्पित कोई भी आविष्कार तदनुरूप कभी भी साकार नहीं हुआ। ऐसे सारे दावे मिथ्या हैं। हां, आविष्कारकों ने विज्ञान-गल्पों से प्रेरणाएं अवश्य ली हैं, इसकी स्वीकारोक्तियां हैं।
    ऐसा इसलिए असंभव है कि गल्पकार आविष्कारक नहीं है और आविष्कारक की गल्प-लेखन में मति-गति नहीं है। विज्ञान-गल्प-लेखन एक विरल विधा है, जिसमें विज्ञानसिद्धि और रससिद्धि दोनों वांछनीय हैं। और ऐसा संयोग विरल ही है।
  • Bimla
    Jagnnath Prabhakar
    75 68

    Item Code: #KGP-2023

    Availability: In stock

    राजा समरसिंह को उनके दीवान सतीशचन्द्र ने अपने एक विश्वस्त नौकर के उकसाने पर मरवा डाला । उनकी रानी ने उसके विरुद्ध अति भयंकर व्रत धारण किया । वह व्रत क्या था ? इन्द्रनाथ को महाश्वेता की बेटी सरला से प्रेम हो गया, पर ब्याह महाश्वेता का व्रत पूरा हुए बिना नहीं हो सकता था । इस व्रत को पूरा करने के लिये इन्द्रनाथ घर से चल पडा । महेश्वर मन्दिर में एक अद्वितीय सुन्दरी उस पर मोहित हो गयी । सुन्दरी ने अपना नाम भिखारिन बताया ।  उसने एक भिक्षा इन्द्रनाथ से सतीशचन्द्र का वध न करने की माँग ली और सतीशचन्द्र के नौकर को हत्यारा बताया । इन्द्रनाथ मुंगेर पहुँच कर राजा टोडरमल की सेना में भरती हो गया । संध्या समय वह गंगा-तट पर शत्रुओं से लड़ता हुआ बेहोश हो कर गंगा से गिर पड़ा । एक युवक! अपनी नाव से कूदा, उसे उठाकर अपनी नाव में डाल लिया । होश आने पर उसने देखा, इस युवक के भेस में वही भिखारिन थी । उधर दीवान के उसी शबित-सम्पन्न नौकर ने महाश्वेता को सरला सहित चतुर्वेष्ठित दुर्ग में कैद कर लिया था । भिखारिन उन्हें काल कोठरी से निकालकर अपने मकान में ले आयी । इधर टोडरमल ने पठानों के दुर्ग पर हमला किया । गुड़सवार नायक इन्द्रनाथ लड़ाई में घायल व बेहोश होकर गिर पडा । शात्रुओं ने उसे उठा कर दुर्ग में कैद कर लिया । भिखारिन ने वहाँ पहुँच कर उसे दुर्ग से कैसे बाहर भेज दिया और स्वय इन्द्रनाथ बन कर कैद हो गयी ? भेद खुलने पर भिखारिन को मृत्यु दण्ड देने के लिये वृक्ष के साथ बांध दिया गया । परन्तु इन्द्रनाथ ने किस प्रकार उसे बचा लिया ? इतने में दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली गयी ।  इसके बाद सतीशचन्द्र के उसी नौकर ने उन्हें मार डाला । विजेता इन्द्रनाथ अपने वचन के अनुसार निश्चित दिन सरला के पास पहुँच गया ।
    राजा टोडरमल की सभा लगी थी । सतीशचन्द्र का हत्यारा कैदी के रूप में राजा के सामने पेश किया गया । उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया । कैदी ने कहा, "मैं ब्राह्मण हूँ । ब्राह्यण को मृत्यु दण्ड देना शास्त्र-विरुद्ध है । धार्मिक टोडरमल सोच में पड़ गये । इतने में एक निहत्थी महिला तेजी से सभा मण्डल में घुसी और छुरी से सतीशचन्द्र के हत्यारे कैदी की हत्या कर डाली । वह महिला कौन थी और उसने छुरी कैसे प्राप्त कर ली ?
    अपने ब्याह के निश्चित दिन इन्द्रनाथ भिखारिन के पास गया और कहा, "भिखारिन । तुमने मुझे चार बार मौत से बचाया, जिसका बदला मैं चुका नहीं सकता । मेरी प्रार्थना है, तुम मेरे पास पटरानी की तरह रहो । सरला तुम्हारी सेवा करेगी ।" इस प्रकार जाने क्या-क्या स्नेह-भरी बाते कह रहा था, परन्तु वास्तव में भिखारिन वहाँ नहीं थी, था उस का प्राणहीन पार्थिव शरीर । वह इन्द्रनाथ के प्रति शाश्वत प्रेम रखती थी, उसी प्रेम की ज्वाला में वह आत्म- बलिदान कर चुकी थी । हाँ तो यह भिखारिन वास्तव में थी कौन?
    उपर्युक्त समस्त रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर विविध रोमांचकारी विवरणों सहित यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है ।
  • Mere Saakshaatkaar : Mannu Bhandari
    Mannu Bhandari
    350 315

    Item Code: #KGP-678

    Availability: In stock


  • Jalte Huye Daine Tatha Anya Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    225 203

    Item Code: #KGP-25

    Availability: In stock

    जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियाँ
    'जलते हुए डैने' से 'इस बार' तक की कथा-यात्रा के ये अनेक पड़ाव है । अनुभव एवं अनुभूतियों के कई अक्स ! जीवन और जगत में जो हो रहा है, उसके कुछ धुँधले, कुछ उजले रेखा-चित्र ! पर रेखा-चित्रों में यथार्थ की मात्र रेखाएँ ही नहीं, कहीं-कहीं कुछ रंग भी है, जो मिट कर मिटते नहीं । घुलने के बावजूद भी घुलते नहीं । स्मृति-पटल पर ऐसे अंक्ति हो जाते है, जैसे पाषाण पर उकेरी गहरी रेखाएँ । रेखाओं की भी अपनी भाषा होती है । रेखाओं के भी अपने सुख-दु:ख, अपनी व्यथा-वेदना होती है ।  इस निखिल सृष्टि में ऐसा कुछ भी तो नहीं, जो अर्थपूर्ण न हो ! जिसकी अपनी कोई सार्थकता न हो !
    अनेक सत्यों को परिभाषित करती ये सरल, सहज, सपाट-सी कहानियाँ, कहीं कुछ न कह कर भी कितना कुछ नहीं कह जाती । असत्य का यथार्थ, सत्य के यथार्थ से सम्भवत: आज़ अधिक गहरा होता है । अधिक विस्तृत, अधिक प्रामाणिक । प्रासंगिक ही नहीं, अधिक आकर्षक भी । शायद इसलिए हर दौड़ में सत्य के पाँव, झूठ से पीछे रह जाते हैं ।  पर असत्य जीत कर भी हार क्यों जाता है ? जल में पड़ी परछाई पकड़ने की तरह आदमी कुछ चाहता है । परन्तु जो है, और जो होना चाहिए के बीच की संधि-रेखा इतनी धुँधली क्यों है ?

  • Lalachi Brahman
    Dharmpal Gupta
    50

    Item Code: #KGP-1188

    Availability: In stock


  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Kamleshwar Rachana-Sanchayan
    Ganga Prasad Vimal
    850 765

    Item Code: #KGP-797

    Availability: In stock


  • Bankon Mein Dvibhashi Computerikaran : Dasha Aur Disha
    Jayanti Prasad Nautiyal
    245 221

    Item Code: #KGP-675

    Availability: In stock

    बैकों में द्विभाषी कंप्यूटरीकरण
    दशा और दिशा
    हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर पर कार्य करने हेतु उपलब्ध सुबिधाओं की अद्यतन जानकारी से युक्त यह पुस्तक विद्वान् लेखक के गत तीस वर्षों के भाषा प्रौद्योगिकी के अनुभव पर आधारित है।
    कंप्यूटर विज्ञान पर अंग्रेजी भाषा में बहुत-सी पुस्तकें है, परंतु हिंदी में कंप्यूटर जैसे विषय पर प्रामाणिक पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। इस अभाव की पूर्ति करने का विनम्र प्रयास है या पुस्तक। 
    यह पुस्तक कंप्यूटर जगत विशेषज्ञों द्वारा सामग्री को जाँच के बाद भारतीय रिजर्व बैंक, कृषि बैंकिंग महाविद्यालय की हिन्दी में मौलिक पुस्तक लेखन योजना के अंतर्गत प्रकाशित है। इसकी प्रामाणिकता और उपयोगिता का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है।
    इस पुस्तक में कंप्यूटर के माध्यम से हिंदी में तथा भारतीय भाषाओं में काम करने संबंधी उपलब्ध सुविधाओं, विभिन्न सॉफ्टवेयरों, पैकजों, उपकरणों पर प्रामाणिक एवं अद्यतन जानकारी दी गई है । इसमें नवंबर, 2007 तक हुए कंप्यूटर संबंधी समस्त विकास एवं सूचनाएँ और शोधपरक सामग्री समाहित हैं। माथ ही कंप्यूटर के भाषायी अनुप्रयोग संबंधी विभिन्न विषयों पर गभीर विवेचन है ।
    यह पुस्तक सभी बैकों के कर्मचारियों तथा अधिकारियो, उनके राजभाषा विभागो के कर्मचारियों व अधिकारियों, सभी विश्वविद्यालयों के बैंकिंग वाणिज्य व हिंदी में अध्ययनरत विद्यार्थियों व प्राध्यापकों, भारत सरकार के सभी कार्यालयों, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, भाषाविदों, भाषा प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों, अनुवाद विज्ञान व अनुवाद में हर स्तर के पाठयक्रम में अध्ययन-अध्यापन में कार्यरत अध्यापको एवं विद्यार्थियों कंप्यूटर निर्माण में लगे सभी सॉफ्टवेयर निर्माताओं, कंप्यूटर में नीति निर्माताओं व निरीक्षण से जुडे कार्मिकों और भाषा तथा कंप्यूटर से सरोकार रखने वाले आम पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है ।

  • Pratap Narayan Mishra Rachanavali (4 Volumes)
    Chandrika Prasad Sharma
    1050 945

    Item Code: #KGP-9057

    Availability: In stock


  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Polywood Ki Apsara
    Girish Pankaj
    225 203

    Item Code: #KGP-2049

    Availability: In stock

    पॉलिवुड की अप्सरा
    "पॉलीवुड की अप्सरा' उत्तर-आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की तथा-कथा है, जिसमें गिरीश पंकज विशुद्ध व्यंग्यकार सिद्ध होते है । (जहाँ हास्य का हाशिए पर भी जगह नहीं है) तात्पर्य यह है कि इस उपन्यास में व्यंग्यकार ने  यथार्थ का पल्ला कहीं भी नहीं छोडा है, जिससे यह समझने में आसानी होती है कि व्यंग्य-लेखन ही सच्चा लेखन हो सकता है। जिस प्रकार 'हॉलीवुड' के सादृश्य पर 'बॉलीबुड' रखा गया, उसी प्रकार 'बॉलीबुड' कै सादृश्य पर 'पॉलीवुड' बना । 'पॉलीवुड की अप्सरा' भी बॉलीवुड की समांतर भूमि में अपने रूप, रस, गंध और स्पर्श के साथ प्रतिष्ठित है  ।
    शेक्सपियर ने कभी कहा था कि नास में क्या रखा है, परंतु इस उपन्यास में सार नाम इसीलिए सोद्देश्य एवं सार्थक हैं कि नाम सुनते या पढ़ते ही उनका 'चरित्तर' मूर्त हो उठता  है ।
    'अप्सरा' अपने जन्म से ही अभिशप्त रही है, जिस ‘स्वर्वेश्या' भी कहा गया है । बॉलीबुड की अप्सरा बनने का पावती का सपना अंत तक पूरा सच नहीं हो पाता । यह त्रासदी 'अप्सरा' में व्यंजित तथाकथित आभिजात्य की निस्सास्ता से और भी सटीक हो गई है, जो परी में नहीं है । 'पार्वती' का 'पैरी' में  रूपांतरण एक ऐसी चेतावनी है, जिससे वर्त्तमान एवं भावी पीढ़ी झूठी महत्वाकांक्षा की आग में न कूदे । दार्शनिक शब्दावली में कहें तो जो कुछ दिख रहा है, यह सब माया है, छलावा  है । लगता है, समकालीन परिस्थितियों ने ही कबीर जैसे युगचेता का 'आखिन देखी ' कहने के लिए विवश किया ।
    इस कृति में उत्तर-आधुनिक मनुष्य और उसकी क्रीत-कुँठा सफल व्यंग्यकार गिरीश पंकज की सारग्रही सूक्ष्म-दूष्टि से उजागर होकर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचती है कि मनुष्य की सफलता मनुष्यता का पाने में है, खोने में नहीं ।
  • Bhagwan Mahaveer
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-127

    Availability: In stock

    भगवान महावीर विश्व के उन महापुरुषों में थे, जो मानव-श्रेणी से ऊपर उठकर देव-कोटि में पहुंच जाते हैं । भगवान महावीर के उपदेशों, सिद्धांतों और शिक्षाओं को लोगों ने हृदय से स्वीकार किया । वे अहिंसा के साक्षात् अवतार थे । उनका हृदय करुणा से आपूरित था । वे मानव मात्र के कल्याण के लिए विश्व-बंधुत्व के भाव को जन-जन  तक पहुंचना चाहते थे ।
    आज़ विश्व से चारों ओर हिंसा का तांडव फैला है । सर्वत्र मार-काट मची है । एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करने की घात लगाए रहता है। ऐसी दशा में भगवान महावीर की शिक्षाएँ बहुत ही उपयोगी हैं। उनका बताया हुआ शांति का मार्ग सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है । वे जन-जन में अहिंसा, सत्य, करुणा और प्रेम की उदात्त भावनाएँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं । 
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान महावीर के जीवन-परिचय के साथ-साथ उनके सिद्धांतो, उपदेशों और शिक्षाओं का भी उल्लेख किया गया है । समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उनकी शिक्षाओं पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
    विश्वास है कि पाठक-समूह भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों से प्रेरणा लेकर पूरे समाज का जीवन सुखी बना सकेगा ।
  • Jo Nahin Hai
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-1899

    Availability: In stock

    जो नहीं है
    यह मृत्यु और अनुपस्थिति की एक अद्वितीय पुस्तक है । राग और विराग का पारंपरिक द्वैत यहाँ समाप्त है । अवसाद और आसक्ति पडोसी है । यह जीवन से विरक्ति की नहीं, अनुरक्ति की पोथी है ।  मृत्यु मनुष्य का एक चिरन्तन सरोकार है और चूँकि कविता मनुष्य के बुनियादी सरोकारों को हर समय में खोज़ती-सहेजतो है, वह आदिकाल से एक स्थायी कवियमय भी है ।   विचार- शीलता और गहरी ऐन्द्रियता के साथ अशोक वाजपेयी ने  अपनी कविता में वह एकान्त खोजा-रचा है जिसमें मनुष्य का यह चरम प्रश्न हमारे समय के अनुरूप सघन मार्मिकता और बेचैनी के साथ विन्यस्त हुआ है
    यहाँ मृत्यु या अनुपस्थिति कोई दार्शनिक प्रत्यय न होकर उपस्थिति है । वह नश्वरता की ठोस सचाई का अधिग्रहण करते हुए अनश्वरता का सपना देखने वाली कविता है-अपने गहरे अवसाद के बावजूद वह जीने से विरत नहीं करती । बल्कि उस पर मँडराती नश्वरता की छाया जीने की प्रक्रिया को अधिक समुत्सुक और उत्कट करती चलती है
    दैनन्दिन जीवन से लेकर भारतीय मिथ के अनेक बिम्बो और छवियों को अशोक वाजपेयी ने मृत्यु को समझने-सहने  की युक्तियों के रूप में इस्तेमाल किया है । उनकी गीति-सम्वेदना यहाँ महाकाव्यात्मक आकाश को चरितार्थ करती है और उन्हें फिर एक रूढ हो गये द्वैत से अलग एक संग्रथित और परिपक्व कवि सिद्ध करती है
    यहीं किसी तरह की बेझिलता और दुर्बोधता नहीं, पारदर्शी लेकिन ऐंद्रिक चिंतन है, कविता सोचती-विचारती है पर अपनी ही ऐंद्रिक प्रक्रिया से । 
  • Ek Sadaa Aati To Hai
    Pramod Beria
    150 135

    Item Code: #KGP-9307

    Availability: In stock


  • Yahin Kahin Hoti Thi Zindagi
    Ajeet Kaur
    300 270

    Item Code: #KGP-9218

    Availability: In stock

    अजीत कौर की अपनी एक खास ‘कहन’ है, जिसके कारण उनकी कहानियां बहुत सादगी के साथ व्यक्त होती हैं और पाठकों की संवेदना में स्थान बना लेती हैं। ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ उनका नया कहानी संग्रह है। पंजाबी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां विषयवस्तु से नयापन लिए हैं और शिल्प के एतबार से पाठक को अजब सी राहत देती हैं। एक एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है, न केवल पठनीयता से समृद्ध है बल्कि एक दार्शनिक वैचारिक संपदा से भी संपन्न है। अजीत कौर की रचनात्मक सुघड़ता तो सर्वोपरि है ही।
  • Aadami Aur Uska Samaaj
    Vishnu Nagar
    225 203

    Item Code: #KGP-88

    Availability: In stock


  • Vaigyanikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #KGP-921

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Na Radha Na Rukamani
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2103

    Availability: In stock

    आज हरकृष्ण को अपना वह सपना याद आया तो लगा—इंसान ने सचमुच कभी इन्सान लफ़ज़ के अर्थ के नहीं जाना, और न उसने कभी धर्म लफ़ज़ के अर्थ को जाना है—
    और उसी सांस में हरकृष्ण को अहसास हुआ कि इंसान ने अभी तक रिश्ता लफ़ज़ की भी  थाह नाते पाई है... 
    रिश्ता लहू के कौन-कौन से तार से जुड़ता है, लोगों को सगा कर जाता है, और कौन-कौन से तार से उखड़कर लोगों को पराया कर जाता है, कुछ भी हरकृष्ण  की पकड़ में नहीं आया । लेकिन जिंदगी को सुनी हुई और भुगती हुई कुछ हकीकतें थी जो उसके सामने एक खुली किताब की तरह थीं—

    -इसी उपन्यास से
  • Michal Jackson Ki Topi
    Madhukar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-1931

    Availability: In stock

    माइकल जैक्सन की टोपी
    स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद प्रेमचंद की ग्राम्य चेतना की साहित्यिक विरासत को अपने लेखन के बल पर जिन लेखकों ने जीवित रखा है तथा इमे विकसित किया है उनमें मधुकर सिंह का नाम उल्लेखनीय है । यह कहानीकार न केवल अपनी सामाजिक-राजनितिक  चेतना को अपनी कथाओं में अनुगुंफित करता है बल्कि जीवन की सम्यक् प्रगतिशीलता का आलोक भी उसे गंभीरता से आकर्षित क्रग्या है । इसीलिए उसकी कहानियाँ वंचितों के जीवन की केवल लपट की नहीं, लौ की भी कहानियाँ हैं ।
    अपने कथाकर्म के बारे में मधुकर सिंह का कहना है कि उनकी 'दर्जनो कहानियाँ समाज और इतिहास- विरोधी उन ताकतों से लड़ती हुई मामूली और कमजोर आदमी को चेतना के स्तर पर जागृत करने की कोशिश करती हैं-यानी, इतिहास-विरोधी ताकतों द्वारा सताए जा रहे आदमी को अपनी पहचान कराने की क्षमता भी ये कहानियां रखती है ।'
    मधुकर सिंह के प्रस्तुत कहानी-संग्रह में शामिल दस कहानियां हैं- 'माइकल जैक्सन की टोपी’, 'युग' . ‘नस्ल-दंश', ‘बेली रोड के पत्ते' , 'कउड़ा' , 'कमीना', 'जालिम मिह उसका बाप था', 'कविता भी आदमी', 'सनहा' तथा पोखर नया गाँव' । प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपी ये कहानियाँ इस  बात की प्रमाण है कि यह कथाकार नये भारत के निर्माण के लिए, चेतना-सम्पन्न विचार-पुरुष की तलाश में तन्मय है ।
  • Hindi Shikshan : Sankalpana Aur Prayog
    Hiralal Bachhotia
    150 135

    Item Code: #KGP-1105

    Availability: In stock

    हिंदी शिक्षण: संकल्पना और प्रयोग
    प्रायः हिंदी भाषा और हिंदी की साहित्यिक शैली को एक माना जाता रहा है। इसमें भेद कर तदनुसार शिक्षण की आवश्यकता के संदर्भ में साहित्येतर अभिव्यक्तियों और शैलियों के सक्षम प्रयोग की निपुणता प्राप्त करना अपेक्षित है। इस दृष्टि से ‘हिंदी-शिक्षण: संकलपना और प्रयोग’ में विधियों आदि की अवधारणा के साथ उसके प्रायोगिक रूपों को प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। प्रारंभिक स्तर पर विशेष रूप से हिंदीतर भाषी शिक्षार्थी के लिए शैक्षिक-भाषायी कार्यकलापों (भूमिका-निर्वाह आदि) के माध्यम से भिन्न-भिन्न संदर्भों में बोलने का अभ्यास, कैसे पढ़ाएं के अंतर्गत परिवेश निर्माण, वाचन, कथ्य या विषयवस्तु का विश्लेषण, रूपांतरण, स्थानात्ति, बोध प्रश्न आदि पर विचार तथा उनके अभ्यासपरक उदाहरणों के माध्यम से अध्यापन हेतु विविध आयाम प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। 
  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Hiralal Bachhotia
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Pratidaan
    Virendra Jain
    60 54

    Item Code: #KGP-2093

    Availability: In stock

    प्रतिदान

    सुरेखा-पर्व की विद्या का विवाह माँ ने तय किया था । अच्छा घर-वर खोज़कर ।

    प्रतिदान को प्रभा को ससुराल के तमाम संबंधियों ने देख-परखकर पसंद किया था ।

    उसके हिस्से का विश्वास की कविता ने कबीर को स्वयं चुना था ।

    तीनों के पति अलग-अलग स्थान, परिवेश, पेशे से जूड़े थे । अलग-अलग प्रवृति के थे । फिर भी तीनों स्त्रियों  का दुख एक-सा क्योंकर हुआ?

    साथ न सहकर भी साथ सहे गए दुख का बयान करती वीरेन्द्र की तीन उपन्यासिकाएँ ।

    स्त्रियाँ ही स्त्रियों की कथा-व्यथा को संजीदगी से बयान कर सकती हैं, इस अवधारणा को झुठलाती तीन व्यथा-कथाएँ ।

    थोड़े में बहुत कह देने में समर्थ युवा कथाकार के आकार में लघु और कथ्य में बृहद् तीन लघु उपन्यास-सुरेखा-पर्व, प्रतिदान, उसके हिस्से का विश्वास ।
  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Hindi Kahaniyon Mein Hans Patrika Ka Yogdan
    Meera Ramrav Nichale
    450 405

    Item Code: #KGP-758

    Availability: In stock

    हिंदी कहानियों में ‘हंस’ पत्रिका का योगदान
    सौ०  मीरा निचळे से मेरा परिचय इस शोध-प्रबंध के दौरान ही हुआ। साधना शाह का पत्र लेकर वह मुझसे मिलने औरंगाबाद से आई थी और शीघ्र ही इतनी खुल गई कि जब तक अपने प्रश्नों के सही जवाब नहीं पा लेती थी तब तक पूछती ही रहती थी। वह सीधे-सरल स्वभाव की अध्ययनशील लड़की है।
    मैंने उसका शोध-प्रबंध देखा है और मुझे लगा कि काफी परिश्रम और सूझबूझ के साथ मीरा ने यह अध्ययन प्रस्तुत किया है। मैं उसे इसके लिए बधाई देता हूं। यह प्रबंध अपने आप में तो महत्त्वपूर्ण है ही, आगे काम करने वालों के लिए भी इसकी जरूरत बनी रहेगी। मीरा अपना अध्ययन और लिखना आगे भी चलाए रखे इसके लिए मेरी शुभकामनाएं...
    —राजेन्द्र यादव
  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Gian Ranjan
    Gyanranjan
    160 144

    Item Code: #KGP-27

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ज्ञानरंजन ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शेष होते हुए', 'पिता', 'फैंस के इधर और उधर', 'छलाँग', 'यात्रा', 'संबंध', 'घंटा', 'बहिर्गमन', 'अमरूद का पेड़' तथा 'अनुभव' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ज्ञानरंजन की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    200 180

    Item Code: #KGP-0001

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बाबू', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Akshar-Kundali
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-1977

    Availability: In stock

    अक्षर-कुण्डली
    'पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे'-
    यह तो महाचैत्तन्य का अनुभव है ।
    इसके लिए तो मीरा हो जाना होता है ।
    लेकिन जब एक जिज्ञासु ऐसी मंजिल के
    सम्भावना अपने में नहीं देख माता,
    तब भी, मैं मानती हूँ कि उसके
    कान उस रास्ते के ओर लगे रहते है-
    जहाँ, दूर से मीरा के पाँव में बँधे
    हुए घुँघरू- उस पुरे रास्ते को तरंगित
    कर रहे होते है ।
    यह पुस्तक 'अक्षर-कुण्डली' मेरी किसी प्राप्ति की गाथा नहीं है । यह तो एक जिज्ञासु मन की अवस्था है, जिसे कभी-कभी किसी पवन के झोंके मेँ, मिली हुई मीरा के घुंघरुओं की ध्वनि सुनाई देती है... 
    -अमृता प्रीतम
  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Pahiye Ki Vikaas Katha
    Chetan Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-959

    Availability: In stock


  • Naani Ki Khichadi
    Manju Kapoor
    60

    Item Code: #KGP-936

    Availability: In stock


  • Gandhivaad Aur Hindi Kavya
    Bhakt Ram Sharma
    225 203

    Item Code: #KGP-890

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी इस शताब्दी के महत्तम व्यक्तियों में गिने जाते हें। उनका चरित और चिंतन तपःपूत है। भारतीय इतिहास में महात्मा बुद्ध के अतिरिक्त ऐसा शक्तिशाली लोकनायक नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व का स्पर्श पाकर ‘कोई कवि बन जाए संभाव्य है’। मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी और भवानीप्रसाद मिश्र जैसी प्रतिभाएं उनके संपर्क में आकर उद्दीप्त हुई हैं। गांधीवादी काव्य की सबसे बड़ी शक्ति उज्जवल भारतीय परंपराओं का स्वीकार है। इन कवियों ने जीवन और काव्य के माध्यम से स्वातंत्र्य-आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। वस्तुतः हिंदी काव्य के इतिहास में गांधी-विचारधारण से प्रभावित रचनाओं के अनुशीलन के बिना तत्कालीन हिंदी साहित्य के विकास-क्रम को सम्यक् परिप्रेक्ष्य में समझना कठिन होगा। गांधी-विचारधारा के फलस्वरूप ही तत्कालीन कवियों ने शुद्ध, सात्त्विक, सुरुचिपूर्ण एवं स्वस्थ दृष्टिकोण संपन्न कृतियों की सृष्टि की। हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखक ऐसे स्वस्थ साहित्य का सम्यक् मूल्यांकन नहीं कर पाए थे। सर्वप्रथम तो गांधी-विचारधारा को आत्मसात करना ही बड़ा दुष्कर कार्य हैं फिर दूसरा उस विचारधारा को काव्य में अनुम्यूत करना और भी कठिन कार्य है। ऐसे गांधीवादी साहित्य का पूर्वाग्रह से मुक्त मूल्यांकन ही इस ग्रंथ की महत्ता एवं मौलिकता है। गांधीवाद काव्य को कहां, कितना, किस रूप में प्रभावित, मुखरित करता है, लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में यही सब जांचा-परखा है।
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala
    Suryabala
    230 207

    Item Code: #KGP-418

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ath Nadi Katha
    Hari Krishna Devsare
    450 405

    Item Code: #KGP-219

    Availability: In stock

    अथ नदी कथा
    भारत की नदियों की पवित्रता, ऐतिहासिकता, पौराणिकता और उनके गौरवशाली वरदानों से हम सदियों से जुडे है । आम आदमी के लिए, नदी की यह कथा न केवल रोचक हो सकती है, उसके लिए प्रेरक भी हो सकती है। समय के साथ हमने कितनी ही नदियों की गाथाएँ भुला दी हैं। केवल उँगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम ही लोगों को याद हैं। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि भारत को लगभग सभी महत्वपूर्ण? नदियों के सम्मिलित किया जाए। फिर भी क्षेत्रीय महत्त्व की और छोटे यात्रा-पथ वाली नदियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है।
    इस पुस्तक में सम्मिलित नदियों का यथासंभव पौराणिक माहात्य, उनकी पौराणिक एवं लोक- प्रसिद्ध कथाएँ, उनसे संबद्ध ऋषियों, तपस्वियों की कथाएँ दी गई है । इसी के साथ उनकी उत्पत्ति, की कथाएँ, उद्गम स्थल का भौगोलिक महत्त्व और फिर आगे के यात्रा-पथ का वर्णन है। यात्रा-पथ में नदी के दोनों तटों पर बसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं औद्योगिक नगरों के साथ साथ तीर्थों, संगमों, मंदिरों आदि के लोकव्यापी महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है। ये सभी विवरण हमारी भावी पीढ़ी, युवा पीढ़ी और प्रौढ़ों-तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • Ek Aur Chandrakanta : 1
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-9040

    Availability: In stock

    एक और चन्द्रकान्ता-1
    भारतीय दूरदर्शन के इतिहास में 'चन्द्रकान्ता' सीरियल है जो लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया है, इसका श्रेय हिन्दी के अग्रणी उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री को जाता है क्योंकि 'चन्द्रकान्ता' सीरियल के सुप्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर का मानना है कि इसकी प्रेरणा उन्होंने खत्री जी से ही ग्रहण की है । खत्रीजी की प्रेरणा के महादान से संपन्न इस शीर्ष कथाकार ने जिम प्रकार उपन्यास से सीरियल को अलग किया था, उसी तरह सीरियल से एक और चन्द्रकान्ता की इस महागाथा को अलग करके प्रस्तुत किया है ।
    'एक और चन्द्रकान्ता' के इस पाठ में हिन्दी पाठक एक बार फिर से अपनी भाषा तथा कथा के आदर्श तथा गौरवमयी अनुभव से गुजर सकेगा । कहा जा सकता है कि हिन्दी में यह रचना के स्तर पर एक प्रयोग भी है । लेखक के अनुसार यह “भाषायी स्तर पर एक विनम्र प्रयास है ताकि हिन्दी अधिकतम आम-फ़हम बन सके ।" हिन्दी कथा-परंपरा में किस्सागोई की मोहिनी को पुन: अवतरित करने में लेखक के भाषागत सरोकार और उपकार का यह औपन्यासिक वृत्तांत अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। 
    चमत्कार, ऐयारी, फंतासी, बाधाएँ, कर्तव्य, दोस्ती, युद्ध-पराक्रम, नमकहरामी, बगावत, प्रतिरोध, साजिश, मक्कारी, तांत्रिक एवं शैतानी शक्तियाँ, वासना, वफादारी तथा अंधसत्ता आदि को बखानती और परत-दर-परत खुलती-बंद होती अनेक कथा-उपकथाओं को इस उपन्यास-श्रृंखला ने मात्र प्यार-मोहब्बत की दास्तान को ही नहीं बखाना गया है बल्कि इस दास्तान के बहाने लेखक ने अपने देश और समाज की झाडा-तलाशी ली है ।  यही कारण है कि कुंवर  वीरेन्द्रसिंह और राजकुमारी चन्द्रकान्ता की उद्याम प्रेमकथा को बारंबार स्थगित करते हुए लेखक को दो देशों की परस्पर शत्रुता के बीच संधि की कोशिश को शिरोधार्य करता प्रतीत होता है तो वहीं भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोह को प्रतिच्छाया वाली उपकथाओं के सृजन में व्यस्त दीखता है । समय के साथ निरंतर बहने भी रहने वालो 'एक और चन्द्रकान्ता' को इस महाकथा में महानायकों का चिरंतन संघर्ष यहाँ मौजूद है, उनका समाधान नहीं।  अर्थात यह एक अनंत कथा है जो यथार्थ और कल्पना की देह-आत्मा से सृजित और नवीकृत होती रहती है । कहना न होगा कि यह हिन्दी की एक समकालीन ऐसो 'तिलिस्मी' उपन्यास-श्रृंखला है जो हमारे अपने ही आविष्कृत रूप-स्वरूप को प्रत्यक्ष करती  है । इस उपन्यास-श्रृंखला  के सैकड़ों बयानों की अखण्ड पठनीयता लेखक की विदग्ध प्रतिभा का जीवंत साक्ष्य है ।
    यदि इस लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता क्रो बात पर ध्यान दें तो 'एक और चन्द्रकान्ता’ उसकी सम्यक लेखकीय 'जवाबदेही' का साहसिक उदाहरण है । अपने अग्रज-पूर्वज उपन्यासकारों का ऋण स्वीकार करते हुए, स्पर्धाहीन सर्जन की ऐसी बेजोड़ मिसाल आज अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । दूसरे शब्दों में, कमलेश्वर का हिन्दी साहित्य में यह एक स्वतंत्रता संग्राम भी है जिसमें आम हिन्दी को सुराज सौंपने का सपना लक्षित है ।
  • Sampurna Kahaniyan Himanshu Joshi (3 Vol.)
    Himanshu Joshi
    2100 1890

    Item Code: #KGP-9345

    Availability: In stock

    संपूर्ण कहानियां: हिमांशु जोशी
    अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि रचनाकार हिमांशु जोशी की कहानियों  का वैविध्य देखते ही बनता है। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल से आने वाले हिमांशु जी की कहानियां एक ओर अपनी जमीन से जुड़ने की ललक लिए हैं, तो दूसरी ओर विश्व के मनुष्य के दुःख-सुख और संवेदनात्मक पड़ताल की जरूरत के महत्त्व को रेखांकित करती हैं। छह दशक से भी अधिक के अपने कहानी लेखन में इस महत्त्वपूर्ण रचनाकार ने 167 कहानियां लिखीं। साहित्य प्रेमियों, शोधर्थियों और कहानी के अध्येताओं की सुविधा  के लिए इन कहानियों को क्रमशः तीन खंडों में प्रस्तुत किया गया है। इन्हें एक साथ पढ़ते हुए हिमांशु जोशी के कहानीकार के क्रमिक विकास की पहचान भी की जा सकती है।
    इसके पहले भाग में वर्ष 1956 से 1962 तक की कहानियां, दूसरे भाग में वर्ष 1963 से 1976 तक की कहानियां और तीसरे भाग में वर्ष 1980 से 2009 तक की कहानियां शामिल की गई हैं। उनकी इस कथा-यात्रा में अनेक कहानियां ऐसी हैं जिन्हें हिंदी कहानी के इतिहास में मील का पत्थर कहा जा सकता है। कहना अवश्य होगा कि इसीलिए आधुनिक  हिंदी कहानी के इतिहास में उनकी एक अनिवार्य उपस्थिति है। इस दृष्टि से यह एक संग्रहणीय ग्रंथ है जिसके अध्ययन से एक ईमानदार रचना-यात्रा की नई पड़ताल की जा सकती है। 
  • Mannu Bhandari : Srijan Ke Shikhar
    Sudha Arora
    550 495

    Item Code: #KGP-801

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
    हिन्दी साहित्य का समृद्ध करने में जिन कथा-लेखिकाओं  का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी उनमें एक अग्रणी नाम हैं । पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय मन्नू भंडारी हिंदी भाषा के साथ-साथ अनेक देशी-विदेश भाषाओं में एक से आदर-सम्मान के साथ पढी जाने वाली रचनाकार हैं ।
    मन्नू भंडारी के दो उपन्यास 'आपका बंटी' और  'महाभोज' हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर और सृजनात्मकता शिखर पर प्रतिष्ठित हैं । ये दोनों  उपन्यास अपने समय से आगे की कहानी कहत्ते और एक लंबे कालखंड का सच होने के कारण कालजयी उपन्यास, की श्रेणी में आते हैं ।
    मीडिया लेखन में भी मन्नू जी की पटकथाओं ने और  धारावाहिकों में 'रजनी' ने अपनी धाक जमाई । मन्नू  जी  व्यक्तित्व व रचनात्मक पक्ष  सभी कोणों का इस  पुस्तक में विश्लेषण है।
    एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी मन्नू जी का जीवन एक दृढ़ और जिजीविषा की अद्भुत  मिसाल हैं । हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में पहले एक पग्म स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं. जो पहली  ही मुलाकात में आपका बनावट आया दिखावट से पर अपने आत्मीय घेरे में  ले लेता है   ।
    बंगाल की सर्वाधिक लोकप्रिय लेखिका और  सामाजिक कार्यकर्ता महास्वेता देवी से लेकर ? वरिष्ट चिंतक-समीक्षक नामवर सिंह, निर्मला जैन, राजेद्र यादव, गिरिराज किशोर, विश्वनाथ त्रिपाटी, विजयमोहन सिंह, अजितकुमार, देवेंद्रराज अंकुर, स्वयं प्रकाश, राजी सेठ, अर्चना वर्मा तथा मन्नू जी का करीब से जानने वाले उनके अध्याय स्वजनों ने अपने वक्तव्यों, आलेखों और  विश्लेषण से इम पुस्तक को समृद्ध बनाया है । आशा है  पाठकों की कसौटी पर भी यह पुस्तक खरी उतरेगी ।
    -सुधा अरोड़ा
  • Aakhyaan Mahila Vivashata Ka
    Harish Chandra Vyas
    140 126

    Item Code: #KGP-112

    Availability: In stock

    विगत हजारों वर्षों के इतिहास में किसी भी काल में पुरुष ने नारी की आर्थिक अवस्था की ओर कभी भी ध्यान नहीं दिया और इसी अर्थ-विवशता के कारण नारी की दशा समाज में सदैव हीन बनी रही।
    पाषाण काल से लेकर वर्तमान काल तक नारी की सामाजिक यात्रा अत्यंत दुर्गम, सामाजिक बंधनों, बर्बर अत्याचारों, मर्यादाओं और समाजशास्त्रियों द्वारा खोदी गई विशाल गहरी खाई व बिछाए गए कंटीले झाड़-झंखाड़ों में से होकर 21वीं सदी तक पहुंची है। आज उसी नारी-देह का विज्ञापन और व्यवसायीकरण धड़लले से हो रहा है। नाचने, अंग-अंग की भंगिमाएं दिखाने, मुद्राओं से, स्पर्श से, यौवन से उभार से, जरूरी हो तो सहवास से समाज में कई भयंकर विकृतियां दु्रतगति से उभरकर सामने आ रही है।
    प्रस्तुत पुस्तक के सृजन के पीछे प्रमुख उद्देश्य यह रहा है कि इस विषय पर उत्कंठा रखने वाले नागरिक तथा सामान्य जन वस्तुस्थिति का अवलोकन करें और समाज में फैल रही व्यभिचार की विभीषिका से निजात दिलवाने में अभिरुचि एवं अभिवृत्ति का विकास करें।
    —हरिश्चन्द्र व्यास
  • Mere Saakshaatkaar : Vidya Sagar Nautiyal
    Vidya Sagar Nautiyal
    250 225

    Item Code: #KGP-635

    Availability: In stock


  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    245 221

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Jiyo Us Pyar Mein Jo Maine Tumhe Diya Hai
    A.M. Nayar
    200 180

    Item Code: #KGP-663

    Availability: In stock

    जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है
    प्रेम कविता पर विचार करते हुए हमारे सामने सदियों की प्रेम कविता की परंपरा सम्मुख आ खड़ी होती है। एक आधुनिक कवि के लेखे तो वह जैसे ’स्थायी कवि समय’ ही रहा है। किंतु प्रेम की इस अनुभूति को शब्दबद्ध कर पाना सदैव कवियों के लिए चुनौती रहा है। प्रेम कविता का अधिकांश दैहिक मिलन और उसके बखान में अतिरंजित है। जबकि प्रेम के बीज तो प्रकृति में ही छितरे-बिखरे होते हैं; वही प्रेम करना सिखाती है। इसलिए मिलन की परिणति से गुजरना ही प्रेम नहीं है। यह मिलन, विरह, उत्कंठा, प्रतीक्षा, पीड़ा, अनुभूति, विकलता और उम्मीद का दूसरा नाम है। प्रेम का अनुभव देह होते हुए भी विदेह होने में है, भोगे जाते हुए या भोगते हुए भी अभुक्त होने में है, उस उदात्तता, प्रांजलता और सात्त्विकता को बचा लेने में है जो देहाभिभूत होते हुए भी अक्षुण्ण रहती है।
    हमारे समय की बड़ी प्रेम कविताओं के नेपथ्य में करुणा का आवेग भी कहीं न कहीं दिखता है क्योंकि कविता प्रेम के नेपथ्य में रची-बसी करुणा तक पहुँचती है। प्रेम में कुंठा नहीं, निर्बंधता होती है। इसलिए अच्छी प्रेम कविता हमें खोलती है, मुक्त  करती है, भौतिकता से पार ले जाने में मदद करती है। यह सुखद है कि आधुनिक हिंदी कविता प्रेम कविता की तमाम खूबियों का एक साथ वहन कर रही है। उसमें देह का संगीत भी है, आत्मिक सुख की निर्झरिणी भी। इसमें बहते हुए स्नेह-निर्झर को समेटने की शक्ति है तथा मुनष्य को प्रेयस् की अक्षुण्ण रासायनिकी से ओतप्रोत करने की ऊर्जा भी। प्रेम का क्षितिज उदात्त होता है तभी कोई कवि ’कनुप्रिया’ या ’गुनाह का गीत’ (धर्मवीर भारती) लिखता है, कोई ’टूटी हुई बिखरी हुई’ (शमशेर),’हे मेरी तुम’ (केदारनाथ अग्रवाल), ’देह का संगीत’ (सर्वेश्वर), ’नख-शिख’ (अज्ञेय), ’हरा जंगल’ (कुँवर नारायण), ’वह शतरूपा’ (लीलाधर जगूड़ी), ’उसके लिए शब्द’ (अशोक वाजपेयी) और ’ट्राम में एक याद’ (ज्ञानेन्द्रपति) आदि।
    अज्ञेय प्रेम कविता की लंबी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवियों में हैं। वे प्रेम को दो मानव इकाइयों के मिलन के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर के दो अंशों के पारस्परिक मिलन के रूप में देखते हैं। उनकी कविता में भाषा, कथ्य और भाव का जैसा क्लासिकी संयम और अनुशासन है, वैसा ही उनकी प्रेम कविताओं में लक्षित होता है। कदाचित् उन्हें देना श्रेयस्कर लगता है, इसलिए प्रेम में भी लेना उन्हें गवारा नहीं। उनके लेखे प्रेम लेने का नाम नहीं, देने का नाम है। देकर ही मानो पाने का अहसास गहरा होता है। इसे बेशक दाता का दर्प कहें, पर अज्ञेय के प्यार में देने का भाव है, आशीषों का स्वस्तिवाचन है, पथ बुहारने- सँवारने का उद्यम है और प्रिय को दुःख की गलियों में नहीं, स्नेह-सिक्त वीथियों, सरणियों में देखने की कामना निहित है। शायद यही वजह है कि एक बार जब मैंने उनसे एक लंबी बातचीत के बाद उनकी सर्वाधिक प्रिय कविता की पंक्तियों के लिए अपनी डायरी बढ़ाई तो उन्होंने यही लिखा ‘जियो उस प्यार में जो मंैने तुम्हें दिया है।‘
    यह संग्रह अज्ञेय की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Bhartiya Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-2
    Shuk Deo Prasad
    450 405

    Item Code: #KGP-9152

    Availability: In stock

    सत्तरादि के आरंभ में हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में वैज्ञानिक कहानियां प्रभूत मात्रा में लिखी जाने लगीं। बंगला में सत्यजित राय और प्रेमेन्द्र मित्र के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इन्होंने अपनी लेखनी को विराम क्यों दिया? क्या विज्ञान कथाएं कथा की एक विधा के रूप में जनमानस में अपनी पैठ नहीं बना सकीं?
  • Paryavarneeya Pradushan
    Vishnu Dutt Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-111

    Availability: In stock

    पर्यावरणीय प्रदूषण
    बीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी ने मानव को प्राकृतिक स्रोतों के उपयोग के लिए अधिक संख्या में अपूर्व शक्ति के साधन उपलब्ध कराए हैं। इन साधनों के निरंतर उपयोग ने पर्यावरण में परिवर्तन कर दिया है। टेक्नोलाॅजी के बेलगाम प्रसारण तथा विकास ने परिस्थितिविज्ञान के संतुलन को खराब कर दिया। वे बड़े-बड़े उद्योग, जो हमें समृद्ध बनाते हैं, बोनस के रूप में हमें प्रदूषण देते हैं। किंतु हम अपने उद्योगधंधे तो बंद नहीं कर सकते। अतः आवश्यकता इस बात की है कि औद्योगिक व्यर्थों का समुचित उपचार करके या तो उसका पुनः उपयोग किया जाए अथवा सर्वथा अहानिकर बना दिया जाए।
    जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, मनुष्य का कार्यक्षेत्र भी बढ़ता गया और उसके साथ-साथ प्रदूषण भी बढ़ता गया। यह एक गंभीर समस्या है किंतु औद्योगिक क्रांति के बाद प्रदूषण अत्यधिक तेज हो गया। आज प्रदूषण इस सीमा तक पहुंच गया है कि सूर्य की प्रखर विकिरणों से हमारी रक्षा करने वाली ओजोन परत भी झीनी हो रही है, फलस्वरूप इस कवच में सूराख हो चुका है जो संपूर्ण प्राणी जगत् को न केवल विलुप्तिकरण की ओर ले जाएगा अपितु प्रलय का स्पष्ट संकेत देता है। अतः व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से मनुष्य अपने अस्तित्व के प्रत्येक खण के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है।
    डाॅ. विष्णुदत्त शर्मा की कृति ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ समय की आवश्यकता के अनुरूप है तथा एक गंभीर समस्या की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। इसमें पर्यावरणीय प्रदूषण के कारणों, कारकों तथा तत्जनित समस्याओं के विषय में प्रकाश डाला गया है। सचित्र एवं सरल भाषा में लिखी यह पुस्तक प्रदूषण की समस्या को समझने और उसके समाधान में कार्यरत वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, उत्पादकों, जनस्वास्थ्य अधिकारियों, विधायकों तथा उद्योगपतियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Krishan Baldev Vaid
    Krishna Baldev Vaid
    70 63

    Item Code: #KGP-9056

    Availability: In stock


  • Premchand Ki Shresth Kahaniyan
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-7801

    Availability: In stock

    यद्यपि प्रेमचंद ने नाटक, जीवनी, अनुवाद, निबंध तथा बाल-साहित्य की रचना भी की किंतु उनकी अक्षय कीर्ति का आधर उनके उपन्यास और कहानियां ही हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूति, काया-कल्प, गबन, कर्मभूमि तथा गोदान जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों एवं प्रायः तीन सौ कहानियों की रचना कर अपने को अमर करने वाले प्रेमचंद की गुल्ली-डंडा, नमक का दारोगा, प्रेरणा, दो बैलों की कथा, मंदिर, ईश्वरीय न्याय, सवा सेर गेहूं, रामलीला, पूस की रात, महातीर्थ, जुलूस, पशु से मनुष्य, दुस्साहस, आत्माराम, नशा, गृह-दाह आदि लोकप्रिय कहानियां हैं। प्रेमचंद ने अपने समय और समाज के ज्वलंन प्रश्नों को अपनी कहानियों के माध्यम से चित्रित किया है। ग्रामीण जीवन-परिवेश और पात्रों का इतना जीवंत चित्रण करने वाला कथाकार हिंदी में तो क्या अन्य भारतीय भाषाओं में भी कदाचित् ही कोई हुआ हो। यही कारण है कि वे उस समय के सर्वप्रमुख भारतीय कथाकार हैं। विद्वानों ने बीसवीं शती के विश्व-साहितय के तीन बड़े शीर्ष कथाकारों में प्रेमचंद की गणना की है।
  • Prati Shurti
    Shree Naresh Mehta
    350 315

    Item Code: #KGP-1955

    Availability: In stock

    प्रति श्रुति : श्रीनरेश मेहता की समय कहानियाँ 
    श्रीनरेश मेहता का कथा-गद्य, जैनेंद्र और अज्ञेय की परंपरा मेँ रखकर देखा जाए तो समाज और अध्यात्म, राष्ट्र और राजनीति, जीवन और दर्शन से संपृक्त वाद्य है । वे न तो जैनेंद्र का प्रतिबिंब बने और न ही अज्ञेय की छाया । उन्होंने सर्वथा स्वायत्त और स्वाधीन कथा साहित्य लिखा जिसमें काव्यात्मक रस भी है और जिसका आस्वाद हमारे सामाजिक और संस्कृतिक भाव-बौधों को प्रगल्भ भी बनाता है। श्री मेहता जी की भाव-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और जीवन-दृष्टि उनके कथा-गद्य में जिस प्रकार प्रकट हुई है उससे लगता है कि श्रीनरेश जी ने नई कथा-भाषा रचकर हिंदी को एक सांस्कृतिक शक्ति का लोक संस्करण सौंपा है। भाषा अपनी सर्जनात्मक शक्ति में जब सार्थक होती है तो वह स्वयं ही समाज और संस्कृति को अपने में समा लेती है । श्रीनरेश जी ने अपने कथा-शिल्प से भाषा की संभावनाओं को विराट बनाया, गद्य की एक नई शैली विकसित की और यह सिद्ध किया कि एक जीवंत भाषा और सजीव भाषा किस पवार अपनी सांस्कृतिकता और आंचलिक नास्टिलजिया को एक साथ एकाकार कर सकती है । श्रीनरेश जी का समूचा गद्य-साहित्य और विशेष रूप से कथा-साहित्य अपने ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों ही परिप्रेक्ष्यों में गहन शोध और विमर्श की माँग करता है । एक कवि और सर्जक को मात्र 'वैष्णव' कहकर ब्रांड नाम से सज्जित कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी वैष्णवता के पीडालोक को किसी गांधी की तरह बाहर निकाल नरसिंह मेहता के गीत 'वैष्णव जन' की तरह लोकव्यापी बनाना होगा । श्रीनरेश मेहता जैसा सर्जक अतीत की इतिहास-वस्तु बनकर, वर्तमान की संज्ञा से पृथक नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनकी सर्जन-यात्रा की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हिंदी मानस उनमें निहित समस्त संभावनाओं को समय स्मृति और अवकाश तीनो में रखकर एक ऐसे श्रीनरेश मेहता का अन्वेषण करे जो हिंदी साहित्य की चेतना का नरेश हो, सृजन की उस्कृष्टता का प्रतिमान हो और अपनी सांस्कृतिक सामाजिकता का अद्वितीय उदाहरण हो ।
  • Vikalp
    Sukhdev Prasad Dubey
    1100 990

    Item Code: #KGP-653

    Availability: In stock


  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Ullanghan
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-810

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Safed Parde Par
    Ramesh Chandra Shah
    150 135

    Item Code: #KGP-1244

    Availability: In stock

    सफेद परदे पर
    उफ कैसे भंवर में आ फंसा हूँ मैं, अपनी ही करनी से ! किसने कहा था यह बखेडा मोल लेने को  बहुत शौक चढा था ना अकेले रहने का? फँसावट नग रही थी बेटा-बहू की गिरस्ती और पोते की माया? अच्छा वानप्रस्थ है यह तुम्हारा, जिससे तुम्हें एक ओर दत्ता-दंपति का सहारा चाहिए और दूसरी ओर रामरतिया का । उधर बेटा-बहू परेशान, इधर बेटी अलग परेशान । क्या अधिकार था तुम्हें उन बेचारों को इस तरह सारी दुनिया के सामने अकारण अपराधी बना देने का?
    ० 
    उन्हें पता भी नहीं चला, कब वह योगिनी महामाया अपनी जगह से उठकर उनके पास आकर खडी हो गई और उनके सिर को, सिर के बालों की जडों को हौले-हौले सहलाने लगी ।… उनकी आँखे पूरी तरह मुँद गई । एक अदभुत शीतल करेंट-सी उनके मस्तक को भेदकर बूँद-बूँद रिसती हुई पोर-पोर में पसर रही है... क्या वे सचमुच होश में है? हैं, तभी न ऐसे अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं, जैसा सुख उनकी स्नायुओं ने अब तक कभी नहीं जाना...

    तुमने कहा था आप क्यों पूछ रहे हैं बाबूजी? क्या मेरी कहानी की किताब लिखना चाहते हैं ? मैं बुरी तरह चौक गया था तुम्हारे मुँह से यह सुनकर । तुम्हें कैसे लगा रामरती, कि मैं  तुम्हारी कहानी लिख सकता हूँ? पहली बार मुझे इलहाम जैसा हुआ कि हर आदमी की यह सबसे बड़ी, सबसे गहरी चाहत होती होगी कि कोई उसे सचमुच पूरा-पूरा समझे और न्याय करे ऐसा न्याय, जो और कोई नहीं कर सकता। सिर्फ लेखक नाम का प्राणी कर सकता है । लेखक, जो भगवान् की तरह लंबा इंतजार भी नहीं कराता । इसी जनम में, इसी शरीर और मन से निवास करने वाली जीवात्मा का एक्स-रे निकाल के रख सकता है ।
    (इसी उपन्यास से)

  • Paisa Aapka Bhavishya Aapka
    Ajay Shukla
    240 216

    Item Code: #KGP-9362

    Availability: In stock

    ‘अर्थ’ (धन) इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसे ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ में शामिल किया गया है। कोई भी युग हो, कोई भी देश, कोई भी सभ्यता हो या कोई भी संस्कृति—रुपयों के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन रहा है। आज तो चारों ओर पैसे का बोलबाला है। उसकी चमक और खनक के सामने सब फीका है। ...और यह जरूरी भी है कि सुखपूर्वक जीवन की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास यथेष्ट पैसा हो।
    प्रश्न है कि पैसा किस तरह बचाया और बढ़ाया जाए। सीमित आय वालों को ‘मनी मैनेजमेंट’ सिखाने के लिए ही अजय शुक्ला ने पैसा आपका भविष्य आपका नामक पुस्तक लिखी। आसान भाषा और दिलचस्प शैली में यह पुस्तक पाठकों को बताती है कि छोटी-छोटी बचतों और कुछ सावधानियों से भविष्य के लिए पैसा बचाया जा सकता है। बुढ़ापे में जब कमाने की शक्ति नहीं रहती, अनेक तरह की हारी-बीमारी घेर लेती हैं और कई बार जब अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं तब बचाया हुआ पैसा ही काम आता है। किसी ने कहा है कि पैसा भगवान् तो नहीं है, पर भगवान् से कम भी नहीं है।
    प्रस्तुत पुस्तक को जिन अध्यायों में संयोजित किया गया, वे हैं—बचत प्रबंधन, बीमा, इंटरनेट का प्रयोग, मुद्रास्फीति, आयकर, निवेश के मूल सिद्धान्त, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, निवेश के साधन, स्वर्ण में निवेश, घर/प्राॅपर्टी में निवेश, पोर्टफोलियो बनाना, वसीयतनामा, रिटायरमेंट प्रबंधन। इन अध्यायों को पढ़कर सुखी, निश्चिंत  व धन संपन्न भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
  • Sansaar Ki Shreshtha Kahaniyan
    Gyanchand Jain
    300 270

    Item Code: #KGP-813

    Availability: In stock

    संसार की श्रेष्ठ कहानियां
    कहानी-लेखन विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में प्रचुर परिमाण में होता आया है । उसने विश्व-साहित्य के इतिहास से अपनी एक खास जगह बनाई है। कहानी चाहे राजा-रानी के ऐश्वर्य और विलासितापूर्ण जीवन पर रची गई हो या शासन-सत्ता की बनती-बिगड़ती छवि को अंकित करती हो, वह घोर अराजकता और  असामाजिकता का चित्रण करती हो या भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के गर्त में दूबे हुए राजनीतिज्ञों का नग्न चित्र उतारती हो; देश-काल की व्यथा-कथा कहती हो या उसकी खुशहाली बयान करती हो-अंतत: होती वह आईने की तरह निर्दोष है । एकदम यथार्थ और कटु सत्य ।
    कहानियां चाहे मार्क टूवेन, जेम्स ज्वाएस, मैन्सफील्ड ने लिखी हों या बालज़क, मोपासां ने; लियो टाल्सटाय, चेखव, गोर्की ने लिखी हों या लुई जी पिरानडेलो, मारिसन, ए०ई० कोपर्ड ने; अनातोले फ्रांस, रोमानोफ  ने लिखी हों या एडवर्ड डेक्कर, हरमैन हेजरमैन्स ने, जेसिंन्टो पिकोन, कारेल कापेक, वानगी पामर ने लिखी हो या जेकब वासरमैन, मिक्सजथ, इमानोव ने; बजार्न्सन, आइजक पेरेज, लू शुन ने लिखी हो या प्रेमचंद, गुलेरी और मंटो ने-सबने अपने इर्द-गिर्द के समाज का और स्वयं भोगे हुए यथार्थ का अंकन किया है ।
    प्रस्तुत संकलन में ऊपर चर्चित अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्व-भर के लेखकों की तीस चुनिंदा कहानियां सम्मितित हैं। ये कहानियां अपने-जपने देश-काल की सामाजि- कार्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों की अंतरंग झाँकियाँ प्रस्तुत करती हैं । ये विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में पढी गई और इन्होंने लोकप्रियता के उच्चतम शिखरों को छुआ । संकलन की अंतिम चार कहानियों (एक चीनी, दो हिंदी, एक उर्दू) के अतिरिक्त शेष सभी का रूपांतरण हिंदी के वरिष्ट साहित्यकार श्री ज्ञानचंद जैन ने अत्यंत सरल और सहज ग्राह्य भाषा- शैली में किया है।
  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Manushkhor
    Ganga Prasad Vimal
    595 506

    Item Code: #KGP-405

    Availability: In stock


  • Indradhanush
    Vinod Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-992

    Availability: In stock

    सभ्यता के आदिकाल से ही बच्चे नानी या दादी से कहानियां सुनते आए हैं। छापेखाने के आविष्कार के बाद कहानियां पढ़ी जाने लगीं। इससे पहले कहानियां सिर्फ सुनी जाती थीं। टेलीविजन और सिनेता के जन्म के बाद तो वे देखी भी जाने लगीं। कहानी सुनने में अधिक मजा आता है या पढ़ने में या फिी देखने में; इसका फैसला तो आप स्वयं ही कीजिए। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि कहानी पढ़ना सबसे अधिक सुविधाजनक है। दरअसल कहानी सुनने के लिए आपको दादी या नानी पर निर्भर रहना पड़ता है और देखने के लिए टी.वी. सेट पर। आप कहोगे कि यों तो पढ़ने के लिए भी पुस्तक पर निर्भर रहना पड़ता है। आपकी बात में दम तो है मगर, अगर दादी या नानी का स्वास्थ्य या मूड ठीक नहीं है तो आप तो गए काम से। और फिर उन्हें कितनी कहानियां याद रह सकती हैं? इसकी भी एक सीमा है और टी.वी. सेट तो टी.वी. सेट ठहरा। रुकावट के लिए खेद प्रकट कर देगा तो आप क्या कर लेंगे? और अगर बिजली गुल हो जाए तो? यही नहीं, अगर पिताजी खबरें सुन रहे हैं तो क्या होगा? और अगर आप किसी ऐसे गांव या हिल स्टेशन या गेस्ट हाउस में हों जहां टी.वी. में सभी या किसी एक चैनल के प्रोग्राम नहीं देखे जा सकते तो हो गया बंटाधार। और फिर टी.वी. के कार्यक्रमों की भी एक सीमा तो है ही। यों भी आजकल दूरदर्शन अधिसंख्य प्रोग्राम अमरीका, इंगलैंड या जर्मनी के ही दिखता है। मगर कहानियां तो हर देश में सुनी, पढ़ी या देखी जाती हैं।
    स्पष्ट है कि कहानी पढ़ना अधिक सुविधाजनक है। और फिर पुस्तकों में संचित ज्ञान की कोई सीमा भी नहीं है।
    —विनोद शर्मा
  • Kaag Ke Bhaag Bare
    Prabha Shanker Upadhayaye
    145 131

    Item Code: #KGP-1811

    Availability: In stock

    काग के भाग बड़े
    व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं— ‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरा की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, "तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।" रामचरितमानस में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, "दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।"
    लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाज़ों, भांडों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। अतः दीगर यह कि विश्व में हास्य-व्यंग्य के पुरोधा हम ही हैं।
    अस्तु, इस व्यंग्य-संग्रह को विषय एवं शैली-वैविध्य के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें व्यंग्य- कथा, निबंध, गोष्ठी, प्रश्नोत्तरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस, संवाद, साक्षात्कार, सर्वे आदि शिल्पों की चौंतीस व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गई हैं।
  • Mere Saakshatkaar : Maheep Singh
    Mahip Singh
    160 144

    Item Code: #KGP-529

    Availability: In stock


  • Tv Samaachaar Ki Duniyaa
    Kumar Kaustubh
    500 450

    Item Code: #KGP-604

    Availability: In stock

    ‘टीवी समाचार की दुनिया’ में समाचार के स्वरूप और उसके कुशल निर्माण व प्रसारण पर लगभग सभी दृष्टिकोणों से विशद चर्चा की गई है। सरल और मनोरंजक शैली में जहां खबर के उत्कृष्ट लेखन-संपादन को समझाया गया है, वहीं उन तमाम टेलीविजन-इतर प्रभावों का चित्रण भी है जिनसे बचा जाना चाहिए। इसके अध्ययन से खबर के निर्माणक डेस्क से लेकर माइक के सामने या परोक्ष में खबरों की सफल और प्रभावी प्रस्तुति तक का सफर सहज और ग्राह्य होकर सामने आ जाता है। इसी तरह ‘न्यूज़ रूम से पैनल तक’ शीर्षक से लेख में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि आज का प्रसारण पूरी तरह कंप्यूटर-आधारित प्रक्रिया कैसे है। कुमार कौस्तुभ ने पुस्तक में उद्धारण के रूप में ‘खबर: एक कहानी’ का नाम देकर आत्मानुभव को कौशल से लेखनीबद्ध किया है। मैं मानता हूं कि खबरों के उत्पादन-विधान को पढ़ाने वाले अध्यापकगणों को इस पुस्तक से रोचक अनुभव-सामग्री मिलेगी और चैनलों के दर्शकों का भी इसमें किए गए विश्लेषणों से और अधिक जुड़ाव होगा। अध्येता के लिए भी कुमार कौस्तुभ की लिखी यह अनुभवजन्य पुस्तक नई संभावनाओं के द्वार खोलेगी।
    प्रस्तुत पुस्तक में टीवी खबर और उसके परिवेश की समग्रता दिशा-निर्देशों के साथ खुलकर उजागर हुई है।
    —राजनारायण बिसारिया
  • Zane Ajeeb : Nasera Sharma
    Prem Kumar
    275 248

    Item Code: #KGP-281

    Availability: In stock

    ज़ने अजीब : नासिरा शर्मा
    अपनी मनबसी नामी-गिरामी शख़्सियतों के बारे में बहुत कुछ—ख़ूब-ख़ूब जान लेने की चाहत सबमें होती है। पसंदीदा के प्रभाव के बढ़ते-गहराते जाने के क्रम में एक बिंदु वह भी आता है, जब यह चाहत कसकता-सा एक जुनून तक बन जाती है। उस अपने मनभावन के अंदर- बाहर-आसपास से जुड़ी हर छोटी-छिपी बात जानने-सुनने के लिए हम उत्कर्ण-उत्कंठ हो उठते हैं। अगर वह मनभावन कोई कलाकार-साहित्यकार है तो स्थिति और भी विकट एवं दिलचस्प हो जाती है। उसकी रचनाओं के पात्रों, घटनाओं, चित्रों, कथनों के आधार पर हम अपनी- अपनी तरह से उसके निज—नितांत निज की दुनिया की अजब-ग़ज़ब तस्वीरें बनाने लगते हैं—बनाते रहते हैं।
    लेकिन जब कोई बड़ी शख़्सियत—नासिरा शर्मा जैसी लेखिका—अपने स्वभाव, अनुभवों, संवेदनाओं, संबंधों, मान्यताओं, विचारों, अभावों, आघातों, संघर्षों, प्राप्तियों...उससे भी अहम यह कि अपने पात्रों, सरोकारों, इरादों एवं रचित-संभावित रचनाओं के बारे में सहज, स्पष्ट, उत्सुक भाव से रचना करने की तरह कहे-बताए...तो...तो यह पाठक, रचना और साहित्य की दृष्टि से विशिष्ट, उपयोगी और मूल्यवान हो जाता है। तब और भी अधिक—जब हम नासिरा जी के पास-साथ होने के उन क़रीबी क्षणों में यह जानें-महसूस करें कि इस लेखिका के जीने-लिखने-सोचने का अंदाज़ और सोच का आसमान एकदम अलग भी है एवं व्यापक व विराट् भी।
    किसी कलाकार की सृष्टि व कलाकारिता की वीथियों-अमराइयों में उसके साथ चल, गुज़र, देख, सुन, जान पाना अपने आप में भिन्न, सुखद, अधिकतम प्रामाणिक और बेहतरीन क़िस्म का अनुभव होता है। ऐसे इस अनुभव का अहसास-भर पाठक को कराने की मुन्नी-सी एक ख़्वाहिश और कोशिश है यह—ज़ने अजीब: नासिरा शर्मा।
  • Triya Hath
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-82

    Availability: In stock


  • Patra-Samvad : Ageya Aur Nand Kishore Aacharya
    Krishna Dutt Paliwal
    175 158

    Item Code: #KGP-1242

    Availability: In stock


  • Usane Kaha Tha Aur Anya Kahaniyan
    Shri Chandra Dhar Sharma Guleri
    150 135

    Item Code: #KGP-9078

    Availability: In stock


  • Avsarvaadi Bano
    Shri Chandra Dhar Sharma Guleri
    75 68

    Item Code: #KGP-1803

    Availability: In stock

    रीति सम्प्रदाय के अनुयायी आचार्य कुन्तक ने कहा है :
    'वक्रोक्ति : काव्यस्य जीवितम' अर्थात् उक्ति की वक्रता ही काव्य का जीवन है। काव्यप्रकाश के प्रणेता आचार्य मम्मट भी व्यंजना-प्रधान रचना को ही उत्तम काव्य मानते हैं।
    वस्तुत: बात सब करते हैं किन्तु बात करने का ढंग सबका अलग-अलग होता है। एक की बात में रस की फुहार होती है किन्तु दूसरे की बात नीरस होती है। ऐसा क्यों ? क्योंकि बात को कहने की शैली अच्छी न थी। स्पष्ट है कि एक बात कई मुखों से सुनने पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ श्रोता के मन-मस्तिष्क पर उत्पन्न करती है । जो शैली अथवा ढंग श्रोता तथा दर्शक को प्रभावित करने में अथवा रसासिक्त करने में समर्थ होती है, वही काव्य में रसोत्पत्ति करने में भी समर्थ होती है।
    निकम्मी से निकम्मी बात प्रभावोत्पादक ढंग से कही या लिखी जाने पर काव्यास्वाद का आनन्द देती है किन्तु अच्छी बात भी यदि उचित ढंग से न कही जाए तो नीरस बनकर रह जाती है। काव्य में औचित्य का महत्त्व नकारा नहीं जा सकता, तभी तो कलामर्मज्ञ क्षेमेन्द्र ने औचित्य को काव्य-स्थिरता का मापदण्ड माना है ।
    स्पष्ट है वक्रता और औचित्य के विना काव्यत्व की बात निरर्थक है। मेरे इन बीस निबन्धों के संग्रह 'अवसरवादी बनो' में उपर्युक्त दोनों तथ्यों के आत्मसात करने की भरपूर चेष्टा रही है, अत: आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि 'अवसरवादी बनो' कृति सामाजिक रूढियों पर प्रहार करेगी और सामाजिकों को स्वस्थ मनोरंजन की उपलब्धि भी कराएगी । इससे अधिक की बात प्रबुद्ध पाठको पर ही छोड़ देना श्रेयस्कर होगी।
    --भरतराम भट्ट
  • Tinku Chala Nana Ke Ghar
    Anju Sandal
    60

    Item Code: #KGP-927

    Availability: In stock


  • Himanshu Joshi Rachana Sanchayan
    Himanshu Joshi
    995 896

    Item Code: #KGP-589

    Availability: In stock


  • Ghar Nikaasi
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1890

    Availability: In stock


  • Mahaan Yoddha Prithviraaj Chauhan : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    190 171

    Item Code: #KGP-492

    Availability: In stock

    भारतवर्ष के इतिहास में क्षत्रिय राजवंशों की गौरवगाथा इतनी लोमहर्षक है कि उन्हें बारंबार पढ़ने को मन करता है। पौराणिक काल से ही क्षत्रिय वंश ने राष्ट्र और समाज की रक्षा में अपनी तलवार उठाए रखी और अपने कर्तव्य का पालन किया।
    अजमेर चैहान वंश की राजधनी रहा है, जिसके प्रतापी राजा सोमेश्वर चैहान थे। सोमेश्वर चैहान के पुत्र पृथ्वीराज चैहान थे, जिनकी वीरता को आज भारतवर्ष में बड़े गर्व से याद किया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘महान् योद्धा पृथ्वीराज चैहान: जीवन दर्शन’ में पृथ्वीराज चैहान के जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को सरल, सरस व सुबोध् शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  • Koi Aur Raasta Tatha Anya Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    200 180

    Item Code: #KGP-731

    Availability: In stock

    कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक
    यह नया नाट्य-संग्रह आपके हाथों में है । एकांकी के बंधनों को तोड़ने वाले इन नौ लघु नाटकों के विषय अलग-अलग हैं।
     'अंक-दृष्टा' जहाँ रामानुजन की जीनियस को रेखांकित करता है तो 'अंतराल के बाद' में बदलते मूल्यों के बीच माँ एवं पुत्र के संवेदनात्मक संबंधी के बदलने की गाथा है । 'दफ्तर में एक दिन' एक सरकारी दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यशैली एवं उबाऊ माहौल को उकेरता है तो 'कोई और रास्ता' संस्कारों से बँधी एक आधुनिक लड़की की संघर्ष-गाथा है । 'फैसला' में नारी- सम्मान का प्रश्च है तो 'लडाई' जाति के बंधनों के विरोध की दास्तान है । 'वापसी' अपनी जड़ों से उखड़ विदेश बसने की आकांक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते युवा पीढी का बयान है तो 'लम्हों ने खता की थी' एड्स के खतरों से आगाह करने की कोशिश है । इसी तरह से 'मेरी-तेरी सबकी गंगा' में गंगा की पौराणिक कथा को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास है ।
    यानी कुल मिलाकर सभी नाटकों का रंग अलग, मिजाज अलग, समस्या अलग है । मामूली लोगों के जीवन के विविध पक्षों को पकड़ते, परखते ये लधु नाटक आपको बाँधेंगे भी, कोंचेंगे भी ।

  • Ritusamhaar
    Kaalidas
    395 356

    Item Code: #KGP-308

    Availability: In stock

    ऋतुसंहार
    प्रेम, सौंदर्य, भक्ति, मर्यादा, कला व संस्कृति के सम्मिश्रण का दूसरा नाम है—कालिदास। स्थान व काल के संदर्भ में अपने को अपरिचित रखकर जिसने अपनी कृतियों के माध्यम से, विषयवस्तु के साथ-साथ भारतवर्ष की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक गरिमा और भौगोलिक सौंदर्य से हमें सुपरिचित कराया, वह आज किसी एक काल व एक स्थान का कवि न होकर, सार्वकालिक विश्वकवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है।
    उसी महाकवि की एक छोटी-सी काव्यकृति है—‘ऋतुसंहार’। इसमें सचित्रा षड् ऋतु वर्णन के परिपार्श्व में तदनुरूप स्त्री-पुरुष के प्रेम और सौंदर्य-भोग का श्रृंगारिक चित्रण हुआ है।
    इस त्रैभाषिक पुस्तक की विशेषता एक तो यह है कि सामान्य हिंदी पाठक हिंदी रूपांतर द्वारा कालिदास के काव्य-सौंदर्य एवं प्रेम की अनुभूति प्राप्त करेंगे, दूसरी यह कि संस्कृत जानने वाले संस्कृत मूल का भी रसास्वादन कर सकेंगे। तीसरी विशेषता यह कि अंग्रेजी अनुवाद से आधुनिक पाश्चात्य प्रेमी भी भारत की संस्कृति की सरसता से परिचय पा लेंगे।
    इस चित्रात्मक कृति की सर्वोपरि विशेषता भी है। वह यह कि यह पुस्तक गृहस्थाश्रम में कदम रखने वाले युवक-युवतियों के लिए पठनीय है और मित्रों एवं सखियों को विवाहोत्सव पर भेंट करने के लिए इसे खास तौर से तैयार कराया गया है।

  • Kavi Ne Kaha : Anamika
    Anamika
    150 135

    Item Code: #KGP-223

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Saahasi Bachchon Ke Kaarnaame
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-52

    Availability: In stock

    जब मैं छोटा था तो दूसरे बच्चों की तरह खुद भी काॅमिक्स वगैर पढ़ने का शौक रखता था। कुछ बड़ा हुआ तो सोचा कि ये काॅमिक्स बच्चों का मनोरंजन भले ही करते हों, लेकिन न तो उनका चरित्र-निर्माण ही कर पाते हैं और न उन्हें सही राह ही दिखा पाते हैं। मुझे लगा कि बच्चों के लिए ऐसे साहित्य की रचना होनी चाहिए जो वास्तवित धरातल से जुड़ा हो, उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे तथा एक अच्छा मनुष्य बनाए।
    पत्रकारिता से जुड़ा और प्रतिवर्ष राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से बात करने, उनकी कवरेज करने का अवसर मिला तो मन में दबी यह इच्छा फिर से बलवती होने लगी।
    वर्ष 2003 के प्रारंभ में बहादुर बच्चों से मिलने का अवसर मिला तो सोचा कि इस बार उसी प्रयास को और बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इस बारमैंने कहानियों को बहादुर बच्चों से बातचीत की शैली में तैयार कियाताकि उनमें और अधिक वास्तविकता आ सके। कहानियों की संख्या भी दस से बढ़कर उन्नीस है और उनका प्रस्तुतिकरण भी अधिक आकर्षक हैं पहली पुस्तक की तुलना में यह पुस्तक और भी कई मायनों में बेहतर स्वरूप संजोए है। 
    —संजीव गुप्ता
  • Dropadi Ka Cheer Haran Aur Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    65 59

    Item Code: #KGP-949

    Availability: In stock

    मूल महाभारत का कलेवर वर्तमान में उपलब्ध महाभारत का दशांश रहा होगा। उसके पश्चात् जो मौखिक प्रक्षेप होता रहा है और अब भी होता रहता है, उसका अंत नहीं हैं ऐसे ही कुछ अधिक महत्वपूर्ण विषयों पर इस छोटी-सी पुस्तक में विचार किया गया है। उन्हें अन्तिमेत्थम् के रूप में स्वीकार किए जाने का लेखक का आग्रह नहीं है। सुधीजनो के विचारार्थ प्रस्तुत है।
    —विद्यानन्द सरस्वती
  • Heeraman High School
    Kusum Kumar
    500 450

    Item Code: #KGP-577

    Availability: In stock


  • Suraj Men Lage Dhabba
    Ramesh Bakshi
    65 59

    Item Code: #KGP-9092

    Availability: In stock


  • Hilne Lagi Dharti (Stories)
    Shrinivas Vats
    200 180

    Item Code: #KGP-1934

    Availability: In stock

    हिलने लगी धरती
    पंचदेश में शत्रु देश के जासूसों ने विद्रोह करवा दिया । भाट कवि ने राजा नरसिंह के दरबार तक पहुंच बना महामंत्री रुद्रदेव को शक्तिहीन कर दिया। कुछ दिन बाद राज्य में खबर फैल गई कि रुद्रदेव विद्रोहियों के हाथों मारे गए । पर हुआ उलटा । भाट कवि अपनी ही चाल में उलझ गया ।  रुन्द्रदेव तो जिंदा निकले । [गहरी वाला]
    बहेलिये को क्या पता कि जिस पक्षी को उसने पकडा है वह शापित मुनि-कुमार है । बेटे के पैर से परेशान बहेलिये ने देखा, चोंच में जडी-बूटी लिए अनेक पक्षी उसके घर की मुँडेर पर आ बैठे हैं । [बेटे का पैर]
    आलसी हरिया को मिल गए जादुई कुदाल और कुल्हाड़ा । उसने लोगों को डराना शुरू कर दिया । पर मिला क्या ? अपना कुदाल-कुल्हाड़ा ही गँवा बैठा । [मीठे बेर]
    देवपति को कम सुनता था। यह लड़की तुतलाकर बोलती थी। दोनों मिले तो शादी को राजी हो गए। फिर उनकी मुलाकात हुई एक मेंढक से । [मिठाई दो]
    जमींदार के खेत में हल जोतते बेलाराम को पेड़ पर हार मिला । जमींदार ने कहा-“मेरा खेत, मेरा पेड़, अत: हार भी मेरा ।" बेलाराम ने अपनी बात कही तो जमींदार ने अपने कान पकड़ लिए । बोला- "माफ कर दो बेलाराम ।" [घोसले में हार]
    शीतक के बहकावे में आकर माणिक की बेटी सुधा को सब मनहूस समझने लगे । कोई उससे शादी को तैयार न हुआ तो एक पेड़ से उसकी शादी कर दी गई । पर पेड़ पर ऐसा कौन बैठा था, जिससे सारे लोग सुधा के एहसानमंद हो गए ? [घर चलो]
    श्रीनिवास वत्स की ऐसी ही दर्जनों कहानियों को इस पुस्तक से संगृहीत किया गया है । बच्चे तो बच्चे बड़े भी इन्हें पूरा पढ़े  बिना नहीं रह सकेंगे । अनूठे अंदाज, अनूठे ताने-बाने से रची ये रचनाएँ मनोरंजन का खजाना हैं । पढ़कर देखिए तो सही ।
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-1
    Kamal Kishore Goyenka
    500 440

    Item Code: #KGP-57

    Availability: In stock

    मंजुल भगत : समग्र कथा-साहित्य (1)
    संपूर्ण उपन्यास
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मंजुल भगत को मैंने कुछ गोष्ठियों में बोलते सुना और संवाद भी किया तो पाया कि वे भारतीय स्त्री का प्रतिरूप है । उनमें भारतीय स्त्री के गहरे संस्कार थे । उनसे मिलना भारत की एक आधुनिक स्त्री से मिलना था । यह स्त्री भारत की संस्कृति और यहाँ  की मिट्टी की उपज थी, जिसमें गहरा अस्तित्व-बोध एवं  स्त्री-स्वातंत्र्य की चेतना थी । उन जैसी संस्कारवान, संकल्पशील, संघर्षरत और संवेदनाओ से परिपूर्ण लेखिका के संपूर्ण कथा-साहित्य के संकलन तथा संपादन का कार्य  करना मेरे लिए गौरव की बात है ।
    मजुल भगत की प्रमुख विधा कहानी है और इसी से वे साहित्य में प्रवेश करती हैं, परंतु उपन्यास के क्षेत्र मैं भी उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा का परिचय दिया और 'अनारो' जैसे उपन्यास की रचना करके देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की ।
    लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    इस समग्र रचना-संसार को पढ़कर कहा जा सकता है  कि साहित्य के प्रति मंजुल भगत की गहरी आस्था थी । लेखिका का दृढ़ विश्वास था कि आने वाले समय में, तमाम अपसंस्कृति एवं अमानवीयकरण के बावजूद उनके उपन्यास और कहानियाँ अवश्य ही पढे जाएंगे । बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्त्री को जानने और समझने के लिए मंजुल भगत का कथा-साहित्य एक प्रामाणिक दस्तावेज है
  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Yoon Banee Mahabharat
    Pratap Sehgal
    100 90

    Item Code: #KGP-1207

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Bhartiya Loktantra Aur Hamare Raastrapati
    Janak Raj Jai
    495 446

    Item Code: #KGP-141

    Availability: In stock

    भारतीय लोकतंत्र और हमारे राष्ट्रपति
    भारत के गणतंत्र-राष्ट्र बनने पर 26 जनवरी, 1950 को डॉ० राजेन्द्रप्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, जो लगभग बारह वर्ष तक इस पद पर रहे…और अब 25 जुलाई, 2007 को श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की।
    हमारे सभी राष्ट्रपति प्रबुद्ध, देशभक्त तथा विद्वान थे, जो विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण पदों पर रहे । सभी ने अत्यंत प्रतिबद्धता, गौरव तथा निष्ठा से अपना कार्यकाल पूरा  किया। जनहित के कुछ मुद्दों पर कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के बीच मतभेद भी हुए । कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति ने अपने पद की गरिमा निभाते हुए अपने निर्णय स्पष्ट रूप से जाहिर किए । महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने तो साफ कह दिया है कि वे सभी कार्य व निर्णय संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत करेंगी ।
    भारत का सविधान आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रपति को भारतीय नागरिकों के उत्थान एवं संविधान की रक्षा हेतु पूर्ण अधिकार देता है ।
    इस पुस्तक में हिंदू कोड बिल, पोस्टल बिल, अध्यादेश, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स प्रकरण, शाहबानू प्रकरण, संसद और विधानसभाओं को भंग करना, हंग संसद, संविधान के अंतर्गत बाहर रहकर समर्थन देना और प्रधानमंत्री की नियुक्ति जैसे प्रमुख मुदूदों पर भी चर्चा की गई है ।
    राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच अनकहे घात-प्रतिघातों की रोचक घटनाओँ का विवरण भी इस पुस्तक में पढ़ने को मिलेगा ।
    यह पुस्तक वास्तव में सुधी नागरिको और पाठकों के लिए जीवंत दस्तावेज सिद्ध होगी । देश के प्रति प्रेम रखने वालों तथा स्वातंत्र्य-प्रेमी पाठकों को यह पुस्तक अवश्य रुचिकर लगेगी ।
  • Hindi Turkey Dictionary
    Sita Laxmi
    495 446

    Item Code: #KGP-2039

    Availability: In stock


  • Puraskrit Bacchon Ki Prerak Sahasi Kathayen
    Sanjiv Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-9352

    Availability: In stock

    मित्रो, ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ प्राप्त बच्चों की कहानियों पर आधारित  शृंखला की सातवीं पुस्तक के साथ एक बार मैं फिर आपसे मुखातिब हूं। आपसे मिल रहे प्यार और प्रतिक्रिया  के बलबूते एक और किताब तैयार करने का उत्साह मिला। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह किताब भी आप सभी को पसंद आएगी। बाल पाठकों की रुचि को देखते हुए इस बार इसमें चित्रों को भी खास तवज्जो दी गई है।
    वैसे तो बहादुर बच्चों की कहानियां हमेशा ही रोमांचित और प्रेरित करती हैं, लेकिन आज जबकि समाज में संवेदना खत्म होती जा रही है तो ये और भी प्रासंगिक हो गई हैं। यह देखकर बहुत ही दुःख होता है कि किसी को विपत्ति में देखकर आज लोग पीड़ित की मदद करने की बजाय उसका वीडियो बनाने और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने में लग जाते हैं। यह भविष्य वेफ लिए अच्छा संकेत नहीं है। हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि विपत्ति किसी  के भी साथ कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। आज जो किसी और वेफ साथ घटित हो रहा है, कल को हमारे साथ भी हो सकता है।
    जरा सोचिए...अगर ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ पाने वाले बच्चों ने भी इसी संवेदनहीनता का परिचय दिया होता तो क्या होता! इन बच्चों ने तो दूसरों की जान बचाने  के लिए अपनी और अपनों की भी परवाह नहीं की। उम्मीद करता हूं कि वर्ष 2016 वेफ लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  के हाथों पुरस्कृत इन बच्चों की कहानियां हमारे समाज में इस संवेदना को बनाए रखने में मददगार साबित होंगी और बच्चों व युवाओं को प्रोत्साहित करेंगी।
  • Madhumeh Evam Chikitsa
    Jagnnath Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-9319

    Availability: In stock

    सन् 1967 की बात है। उन दिनों मैं अखिल भारतीय संस्थान, नई दिल्ली के मेडीसन विभाग में कार्य कर रहा था। फारमकाॅलाॅजी में एम. डी. करने के पश्चात् मेडीसन में भी एम. डी. करने की योजना थी। उन दिनों रोगियों से बातचीत करने पर लगता था कि दिल्ली के नागरिकों को स्वास्थ्य संबंधी विशेष जानकारी नहीं थी। कारण भी स्पष्ट था। उन दिनों न तो हिंदी में स्वास्थ्य संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं और न पत्र-पत्रिकाओं से इस प्रकार की जानकारी मिल पाती थी। हां, अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में यदा-कदा लेख छप जाया करते थे। 
    अतः मन में निरंतर यह बात खटकती रहती थी कि इस कमी को कैसे दूर किया जाय। संयोगवश उन्हीं दिनों श्री रतनलाल जी जोशी से परिचय हुआ। वे उन दिनों ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र के प्रधान संपादक थे। बस, उन्हीं से प्रेरणा प्राप्त कर मैंने ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र में स्वास्थ्य संबंधी लेखन प्रारंभ किया जो आगे चलकर ‘रोगियों के प्रश्नोत्तर’ नाम से स्थायी स्तंभ के रूप में लगभग बीस साल तक चलता रहा।
    मेरी ऐसी मान्यता है कि आयुर्विज्ञान संबंधी साहित्य का जब तक हिंदी में मौलिक सृजन नहीं होगा, तब तक इस विज्ञान को जन-मानस से नहीं जोड़ा जा सकता। अनुवादित ग्रंथों से जानकारी तो मिल जाती है, परंतु मौलिकता नहीं आ पाती।
    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संगठित हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में मैंने सदैव अनुभव किया है कि स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान हिंदी के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
    इसी परिवेश में प्रस्तुत पुस्तक ‘मधुमेह एवं चिकित्सा’ की रचना की गई हे, जिससे लोगों को लाभ होगा, ऐसा विश्वास है।
  • Chetana
    Madan Lal Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-1812

    Availability: In stock


  • Saaksharta Aur Samaj
    Vinod Das
    125 113

    Item Code: #KGP-9122

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में साक्षरता की महिमा और संबंधित सामाजिक द्वंद्वों और इसके प्रसार में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, जनसंचार माध्यमों की भूमिकाओं, तत्संबंधी सांस्कृति-उपभोक्तावादी ऊहापोहों, स्त्री-साक्षरता के महत्त्व जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पहचानने का प्रयास किया गया है, वहीं उन वर्गीय पूर्वाग्रहों को भी अनोखी अंतर्दृष्टि और वयस्क विवेक से चिह्नित किया गया है, जिनके कारण साक्षरता का आलोक देश की धूसर और मटमैली झुग्गियों-झोंपड़ियों में अभी तक नहीं पहुंच पाया है। यह सही है कि लेखक के इन विमर्शों और स्थापनाओं में तीखापन और तुर्शी है। कई बार सामाजिक जड़ता और धीमी गति को लेकर यहां गुस्सा, क्षोभ और अवसाद भी मिलता है। लेकिन विनोद दास हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जो एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की तरह शिक्षा से जुड़े गंभीर सवालों पर वैचारिक हस्तक्षेप करते हुए अपनी परंपरा को पहचानकर मूल्यवान की खोज करते हैं। इस संकलन में उनका एक ऐसा व्यक्तिपरक निबंध भी है, जिसमें वह जमीन से जुड़े उन दो अक्षरवंचित विभूतियों को आत्मीयता से स्मरण करते हैं, जिन्होंने मूल रूप से उन्हें साक्षरता की दिशा में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित किया है। एक तरफ इन निबंधों में साक्षरता के बारे मंे व्याप्त भ्रांतियों और धुंध को छांटने की कोशिश है, वहीं उस उम्मीद की लौ को तेज करने की कोशिश है, जो मनुष्य में समाज को बेहतर बनाने के लिए भीतर-भीतर ही सुलगती रहती है।
  • Sampurna Baal Kavitayen : Balswaroop Rahi
    Vinod Das
    300 270

    Item Code: #KGP-470

    Availability: In stock

    बालस्वरूप राही हिंदी के अत्यंत सम्मानित और दिग्गज बालकवि हैं, जिनकी कविताएँ कई पीढ़ियों से बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी रिझाती आई हैं। कथ्य के अनूठेपन और नदी सरीखी लय के साथ बहती उनकी कविताओं ने बाल कविता का समूचा परिदृश्य ही बदल दिया। सच तो यह है कि राही जी बच्चों के लिए लिखने वाले उन बड़े कवियों में से हैं जिनकी कविताएँ पढ़-पढ़कर एक पीढ़ी जवान हो गई, पर इन कविताओं का जादुई सम्मोहन आज भी वैसा ही है। इन कविताओं में बच्चों के मन, सपनों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को बोलचाल की बड़ी ही सीधी-सहज भाषा में ऐसी नायाब अभिव्यक्ति मिली कि आज भी हजारों बच्चे राही जी की बाल कविताओं के मुरीद हैं और उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं। खासकर ‘चाँद’ पर लिखा गया उनका एक बालगीत तो इतना प्रसिद्ध हुआ कि बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए लिखने वाले साहित्यिकों में भी उसकी धूम रही और आज भी इसे बाल कविता में एक ‘युगांतकारी’ मोड़ के रूप में याद किया जाता है। चंदा मामा की पुरानी शान और ठाट-बाट यहाँ गायब है और बच्चा कुछ-कुछ ढिठाई से उसकी ‘उधार की चमक-दमक’ पर व्यंग्य करता है। यह नए जमाने के बदले हुए बच्चे का गीत है, जो चंदा मामा पर पारंपरिक ढंग से लिखे गए सैकड़ों बालगीतों से अलग और शायद सबसे मूल्यवान भी है।
    राही जी ने एक ओर बच्चों के कोमल मनोभावों और शरारतीपन पर खूबसूरत कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर ऐसी कविताएँ भी जिनमें खेल-खेल में बड़ी बातें कही गई हैं। उनकी कविताएँ एक अच्छे दोस्त की तरह बच्चों को हाथ पकड़कर एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जिसमें बड़ों की डाँट-डपट और ‘यह करो, वह न करो’ से मुक्त एक ऐसा मनोरम संसार है, जिसमें प्रकृति के एक से एक सुंदर नजारे हैं और आनंद के सोते बहते हैं। पर इसके साथ ही राही जी अपनी कविताओं में अनायास ही एक ऐसा प्रीतिकर संदेश भी गूँथ देते हैं, जो बच्चों के दिल में उतर जाता है और उन्हें सुंदर भावनाओं और संकल्पों वाला एक बेहतर इनसान बनाता है। 
    राही जी के शिशुगीतों में भी बड़े मनोहर रंगों के साथ कुछ नई और मोहक भंगिमाएँ हैं। कार पर लिखा गया उनका एक चुटीला शिशुगीत तो बार-बार याद आता है जिसमें बच्चे का गर्व देखने लायक है, ‘पापा जी की कार बड़ी है / नन्ही-मुन्नी मेरी कार / टाँय-टाँय फिस्स उनकी गाड़ी / मेरी कार धमाकेदार।’ जो कवि बच्चे का मन पढ़ना जानता हो, वही ऐसे शिशुगीत लिख पाएगा जो खेल-खेल में बच्चे की जबान पर चढ़ जाएँ। और राही जी इस मामले में उस्ताद कवि हैं, जिनकी दर्जनों कविताएँ न सिर्फ बच्चे झूम-झूमकर गाते-गुनगुनाते हैं, बल्कि वे बाल कवियों के लिए भी नजीर बन चुकी हैं।
    बाल साहित्य के शिखर कवि बालस्वरूप राही की बच्चों के लिए लिखी गई चुस्त-दुरुस्त और मस्ती की लय में ढली कविताएँ एक साथ, एक ही पुस्तक में बच्चों को पढ़ने को मिलें, यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं। हिंदी बाल साहित्य की यह ऐतिहासिक घटना है, इसलिए भी कि बाल कविता के इतिहास के सर्वोच्च नायकों में राही का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उम्मीद है, राही जी की संपूर्ण बाल कविताओं का यह संचयन बच्चों के साथ-साथ सहृदयजनों और हिंदी के साहित्यिकों को भी हिंदी बाल कविता के सबसे सशक्त और सतेज स्वर से रू-ब-रू होने का अवसर देगा।
  • Gautam Buddha
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-126

    Availability: In stock

    भगवान गौतम बुद्ध की गौरवगाथा स्वदेश की सीमाओं को लाँघकर विश्व के अनेक देशों में फैली हुई है । उनके सिद्धातों और शिक्षाओं ने सभी देशों के लोगों को आकृष्ट किया है । अशोक जैसे महान् सम्राट ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और उसका प्रचार-प्रसार किया । गौतम बुद्ध की शिक्षाओं ने जनता के हृदय में अपना स्थान बना लिया । गौतम बुद्ध मानव-मात्र के कल्याण की शिक्षा देते थे ।
    अहिंसा के पुजारी गौतम बुद्ध ने हिंसा का डटकर विरोध किया । वे अहिंसा को महान धर्म मानते थे । बाल्यावस्था से ही वे हिंसा के विरोधी थे । किसी भी प्रकार की हिंसा पर वे अपने मित्रों को समझाते थे कि हिसा महान् पाप है । इससे आत्मा को बहुत क्लेश होता है ।
    गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करने की सलाह ही । यज्ञ-बलि की वे सर्वत्र निंदा करते थे और उसे निकृष्टतम  कृत्य मानते थे । वास्तव में वे करुणा के अवतार थे । उनका संदेश था कि मनुष्य को सामाजिक हित का सदैव ध्यान रखना चाहिए । वे एकांतवास के पक्षधर थे ।
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान बुद्ध के संक्षिप्त जीवन-परिचय के साथ उनकी शिक्षाओं, उपदेशों, सिद्धांतों और आदशों का वर्णन सरल भाषा में किया गया है।
  • Kamzor Pyaar Ki Kahaniyan
    Bhimsen Tyagi
    100 90

    Item Code: #KGP-1948

    Availability: In stock


  • Roma Putri Ke Naam
    Shyam Singh Shashi
    300 255

    Item Code: #KGP-9355

    Availability: In stock

    श्याम सिंह शशि ने अनेक विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है। वहां की जीवन स्थिति, प्रकृति, संस्कृति और मनःस्थिति का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व भारत छोड़कर गए रोमा समुदाय पर विशेष लेखन किया है। तीन करोड़ यायावर भारतवंशी रोमा समुदायों की जीवन पद्धति का उनको विशेषज्ञ माना जाता है। रोमा पुत्री के नाम उनकी विशेषज्ञता का एक और रचनात्मक चरण है।
    आत्माख्यान-यायावरी उपन्यास ‘रोमा पुत्री के नाम’ 
    श्याम सिंह शशि की रचनाशीलता का नया आयाम है। लेखक के शब्दों में, "...यह यायावरी उपन्यास कलेवर में भले ही बहुत बड़ा न लगे किंतु इसमें एक अनूठी दुनिया है जो यथार्थ की अद्भुत यात्रा है। कला और साहित्य का सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में यायावरी प्रस्तुतीकरण है। मेरे नए-पुराने यात्रा-विवरणों की अनकही कथा है।य् लेखक ने परम घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भी इस संदर्भ में स्मरण किया है। इस उपन्यास को मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत भारतवंशी रोमा समाज का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
    यह उपन्यास रोमा पुत्री कैथी की मार्मिक और रोचक दास्तान है। यूक्रेन के कीव नगर में जन्मी, वारसा शहर में पली-बढ़ी, जर्मनी के बर्लिन महानगर में युवती हुई कैथी की दास्तान जो यायावर है और चित्रकार है। कैथी का जीवन उकेरते हुए लेखक ने विश्व के बीच रोमा समुदाय के आत्मसंघर्ष को अंकित किया है। इस समुदाय के मन में अपने प्रति हुए निरंतर अन्याय के लिए अत्यंत आक्रोश है। विशेषकर हिटलर के रक्तशुद्धता वाले कांड के लिए। रोमा भारत को ‘बारोथान’ कहते हैं—‘बड़ा स्थान’। यहां आते रहना उनको भाता है। फिर भी, उनका जीवन एक रहस्य है। कैथी के संदर्भ में लेखक कहता है, फ्रोमा पुत्री कितने मूड्स हैं तुम्हारी कला में, तुम्हारे जीवन में!"
    हिंदी में अपनी तरह का यह अन्यतम उपन्यास है। एक जीवित यायावर समुदाय के जीवन-समुद्र का अवगाहन करती एक अत्यंत पठनीय रचना।
  • Satta Ke Nagaare
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-229

    Availability: In stock

    लोकतंत्र में राजनीति हर ताले की चाबी मानी जाती है। राजनीति का जितना ज्ञान महानगरों में रहने वाले विश्लेषकों, कंप्यूटर पर आंकड़ों की जोड़-तोड़कर चुनावी भविष्यवाणी करने वालों, अर्थशास्त्रियों, राजनयिकों या प्रकाड पत्रकारों को होता है, उससे अच्छी व्यावहारिक समझ सुदूर गांवों में रहने वाले गरीब पिछड़े-अर्द्धशिक्षित भलेमानुष की होती है। गांव की पंचायतों में राजनीति चैपड़ की पकड़ अधिक अच्छी होती है। उन्हें मालूम है कि सत्ता के नगाड़े कब और क्यों बजते हैं। सत्ता के अनंत विस्तार को मरुस्थल भी कहा जा सकता है और अथाह सागर भी। राम राज्य रहा हो या महाभारत काल, ब्रिटिश राज रहे या अमेरिका से अभिभूत रहने वाली सत्ता-व्यवस्था राजनीति का लावा कभी ठंडा नहीं होगा।
    पत्रकारिता का दायित्व यही है कि अपने पाठकों को हर समय राजनीति के अमृत और विषय का सही आकलन करके बाता रहे। पिछले वर्षो के दौरान इस कड़वे सच को पेश करते रहने से जहां पाठकों का अधिकाधिक स्नेह और समर्थन मिला, वहीं कई राजनीतिज्ञ नाराज भी होते रहे। लेकिन हमारा कर्तव्य समाज और सत्ता की पहरेदारी करना है। इसलिए किसी की खुशी या किसी की नाराजगी की चिंता नहीं कर सकते। सत्ता के नगाड़े इस तरह बजने चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक समाज जागता रहे और अच्छे पके हुए फल उसे मिलते रहें। इस संकलन में पिछले वर्षो के दोरान सत्ता के इर्द-गिर्द चलते रहे घटनाचक्रों पर लिखी गई टिप्पणियां शामिल हैं। एक तरह से यह इतिहास के कुछ पन्नों को संजोकर रखने का प्रयास मात्र है। आज ऐसी टिप्पणियों पर चाहे जैसी खट्ठी-मीठी प्रतिक्रियाएं हों, राजनीति के दूरगामी परिणाम समझाने वालों के लिए ये सदैव उपयोगी साबित हो सकती है। 
  • Imandaari Ka Swaad
    Harish Kumar 'Amit'
    180 162

    Item Code: #KGP-9367

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Leeladhar Mandloyi
    Leeladhar Mandloi
    150 135

    Item Code: #KGP-227

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : लीलाधर मंडलोई
    लीलाधर मंडलोई अपनी पीढ़ी के उन थोड़े-से कवियों से अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने समय के वैचारिक दिभ्रमों से जूझते हुए, कविता के वृहत्तर सरोकार को बचाए रखने का उपक्रम किया है । पिछले तीस-बत्तीस वर्षों की काव्ययात्रा में उनका एक अलग स्वर उभरकर आया है ।
    हिंदी कविता में किसान चेतना की व्यापकता तो देखी जा सकती है, मगर मज़दूरों, खासकर औद्योगिक मज़दूरों की उपस्थिति सांकेतिक ही रही है । मंडलोई शायद पहली बार उसके जीवन-संघर्ष को, उसकी 'सफ़रिंग' को, उसकी करुणा को अपनी कविता में दर्ज करने में सफल हुए हैं । वे अपने बचपन को याद करते हुए मध्यप्रदेश की कोयला खदानों के उस यथार्थ को सामने लाते हैं जो श्रमिक संगठनों के दस्तावेजो तक में शामिल नहीं है । अपने जीवन के सच को समय के सच से जोड़ देने की कला की व्याप्ति उनकी अन्य कविताओं में भी देखी जा सकती है । अंदमान की जनजातियों के जीवन संघर्ष को पहली बार कविता में लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है ।
    लीलाधर मंडलोई की कविताओं में प्रकृति और स्त्री की अपनी खास जगह है । वे केवल नैसर्गिक सौंदर्य का ही उदघाटन नहीं करते हैं, बल्कि उन कठोर सच्चाइयों को भी सामने लाते है जिनसे उनके समकालीन कवि प्राय: बचना चाहते हैं । उन्होंने कुछ ऐसी मार्मिक कविताएं भी लिखी हैं  जो हमारी संवेदना का विस्तार करती हैं । प्रसंग चाहे अपने कुत्ते के खो जाने का हो अथवा पत्नी द्वारा मोहल्ले की उस कुतिया को रोटी खिलाने का, जो मां बनने वाली है-वे छीजती हुई संवेदना के इस कठिन दोर से भी मनुष्यता के बचे होने की गाथा ही नहीं रचते, अपनी कलात्मकता से पाठको को भी उसमें शामिल कर लेते हैं
    ध्यान देने की बात है कि उनकी मार्मिक कविताएं भी हमें हताश नहीं करती, बल्कि जीवन की जद्दोजहद से और डूबने की प्रेरणा देती हैं । वे निराशा और मृत्यु के कवि नहीं हैं । उनकी कविता जीने और जीतने की हमारी इच्छा को मज़बूत करती है, दुखों से लड़ते हुए जीवन की सुंदरता को पहचानने की दृष्टि देती है 
  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Toro Kara Toro-4 (Nirdesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-740

    Availability: In stock


  • Aavahayami
    Ramesh Chandra Shah
    400 360

    Item Code: #KGP-9011

    Availability: In stock

    'आवाहयामि' पुस्तक में श्री जे. एल. मेहता पर लिखे गए संस्मरण में एक उद्धरण है-'कल्पना क्योंकि मूलत: भाषिक होती है इसलिए हाइडेगर का कहना है कि स्वयं भाषा ही बीजरूप में कविता है, पूर्वप्रक्षिप्त अर्थों का ऐसा आकार, जो हमारे वस्तुजगत को प्रकाशित और निर्मित करता है। इसी आधारभूमि पर चिंतक और कवि चिंतन और सृजन के नए रास्ते बनाते हैं।' यानी बड़ी से बड़ी प्रतिमा के भीतर से उपजे विचार या कविता का विस्फोट भी मात्र उसकी प्रतिभा की करामात नहीं होते बल्कि उसके पूर्वजों व तमाम पूर्ववर्ती कवि-चिंतकों द्वारा रची और बार-बार आविष्कृत की गई भाषा की देन भी होते हैं। इसीलिए नई पीढी के लिए यह जरूरी है कि वह न सिर्फ अपनी भाषा को बनाने वाली कविता व चिंतन के पास बार-बार जाए बल्कि उस समय के सरोकारों को भी भली-भांति जाने-बूझे क्योकिं तभी वह अपनी पीढ़ी व अपने समय के तनावों को भी ठीक-ठीक समझ पाएगी ।
    संस्मरणों की यह पुस्तक दरअसल ऐसा ही एक आवाहन है-एक आधुनिक, भारतीय कवि का अपने भाषिक परिवेश के पूर्ववर्ती और समवर्ती कवियों-चिंतकों से सतत संवाद करने, उन्हें और उनके माध्यम से खुद को बेहतर समझने की अदम्य इच्छा का दस्तावेज । वहीं दूसरी और यह संस्मरण एक प्रखर आलोचक को पैनी दृष्टि से देखे गए जीवन-प्रसंगों और हिंदी साहित्य में स्था-समय पर प्रकट हुई गहन चिंताओं, अनुरागों और ऊहापोहों का लेखा-जोखा भी है। इसीलिए यह पुस्तक संस्मरण के सामान्य अर्थों में उन व्यक्तित्वों, जिन पर ये लिखे गए हैं, उनके जीवन के रोचक या प्रेरणादायी घटनाओं का संपुंजन मात्र न होकर हिंदी साहित्य के एक पूरे युगबोध का सिंहावलोकन है ।
    संस्मरण-विधा की साहित्य में अहमियत 'रिक्त स्थानों की पूर्ति' करने वाली हो सकती है जो न केवल उन कवि-चिंतकों बल्कि उस घूरे समय की सर्जना एवं विचार-प्रवाहों को समझने में मदद करें, ऐसा इस पुस्तक के पाठकों को अनुभव होगा।
    ये संस्मरण जिनके बारे में लिखे गए हैं, उनके व्यक्तित्व को उजागर करने के साथ-साथ लिखने वाले की जिज्ञासाओं, अभिरुचियों, खुलेपन और संवाद करने की ललक को भी अनायास ही उजागर करते चलते हैं।
    हिंदी का जैसा लबालब, हिलोरें लेता, चौडा पाट इस पुस्तक में उजागर होता है-उसमें जैसी और जितनी सार्थक बहसें लेखक अपने समय और आपस में एक- दूसरे के लेखन-चिंतन और स्वयं अपने अंतर्द्वंद्वों से कर रहे थे यह देखना आज की पीढ़ी के लिए चकित करने वाला अनुभव हो सकता है। युवा पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने तो हिन्दी के  इस चौडे और जीवंत पाट को जाना ही नहीं है, और एक दुबली, सतही धार जो अब सूखी, तब सूखी- भला किसी को कितना-क्या और कब तक है सकती है ?
  • Devinder Ki Kahaniyan
    Devindra
    125 113

    Item Code: #KGP-1828

    Availability: In stock


  • Faaltu Aurat
    Ajeet Kaur
    320 288

    Item Code: #KGP-9373

    Availability: In stock

    पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर फेमिनिज्म में यकीन रखती हैं पर वह हर बात में पुरुषों का विरोध करने वाली फेमिनिस्ट नहीं हैं, वह ख़ुद को विचारों से फेमिनिस्ट मानती हैं। वह जब-जब स्त्री पर लिखती हैं, अपनी इस बात को पुख्ता भी करती हैं। फालतू औरत कहानी संग्रह में स्त्री  केंद्रित कहानियों की बहुलता है।
    प्रस्तुत कहानियाँ भारतीय समाज में जिस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती हैं, वह पत्नी, प्रेमिका, बेटी, माँ तो है ही, पर पुरुषवादी समाज में वह ‘फालतू औरत’ होने का अभिशाप भी झेल रही है। न वह पूरी तरह पत्नी है, न प्रेमिका, न माँ, न बेटी। वह है महज एक ‘फालतू औरत’। इसी ‘फालतू औरत’ के दर्द, उसकी पीड़ा, उसके संघर्ष को अजीत कौर संवेदना के स्तर पर बड़ी शिद्दत से रेखांकित करते हुए हमें समाज का वह चेहरा दिखाने की ईमानदार कोशिश करती हैं जो अपने स्वार्थ की खातिर इस औरत को कभी उसका पूरा ‘स्पेस’ नहीं देना चाहता। ‘फालतू औरत’ की गीता, ‘एक मरा हुआ पल’ की शालिनी, ‘कमरा नंबर आठ’ की दो स्त्रियाँ, ‘हाॅट वाॅटर बोतल’ की मंजरी, ‘बुतशिकन’ की मिसेज़ चौधरी और ‘महक की मौत’ की मोनिका, ‘माँ-पुत्र’ की शांता, ‘एक पोट्र्रेट’ की तारा दीदी ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जो प्रेम की दुनिया में, परिवार में, समाज में, देश में अपने लिए एक मुकम्मल स्पेस की चाहत रखती हैं।
    अजीत कौर की प्रस्तुत कहानियाँ सतत प्रवाहमय नदी की तरह हैं जो पाठक को अपने संग बहा ले जाने की पूरी ताकत और सामर्थ्य रखती हैं।
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jivan Darshan
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-809

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam
    Gopal Rai
    425 383

    Item Code: #KGP-259

    Availability: In stock

    दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
    प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
     दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
    दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
    ‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
    वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’
  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Dharmik Kathayen
    Jagat Ram Arya
    150 135

    Item Code: #KGP-108

    Availability: In stock

    धार्मिक कथाएं

    एक दन ब्राह्मण ने मार्ग पर चलते हुए एक हीरा, जिसकी कीमत एक लाख थी, पड़ा आया। वह साधारण रूप से ही हरे को लिए हुए जा रहा था कि उधर आगे की ओर से एक जौहरी जगह-जगह भूमि को देखता हुआ आ रहा था और विशेष व्याकुल था। इतने में ब्राह्मण ने उसे व्याकुल देखकर कहा कि जौहरी भाई, तू व्याकुल क्यों है? देख, एक हीरा हमने पाया है। तेरा हो तो तू ले ले। यह कहकर जौहरी को हीरा दे दिया। अब जौहरी कहने लगा कि मेरे तो दो हीरे थे, इसलिए एक तो तूने दे दिया, दूसरा भी दे दे, तब मैं तुझे छोड़ूंगा। उस जौहरी ने ब्राह्मण को पुलिस के हवाले कर अपना मुकदमा अदालत में दे दिया। वहां अफसर ने उस ब्राह्मण से पूछा कि कहो भाई, क्या मामला है? उसने कहा कि मैं मार्ग में आ रहा था कि मुझे एक हीरा पड़ा मिला। मैं साधारण रूप से जा रहा था तभी उधर से यह कुछ ढूंढ़ता हुआ व्याकुल सा आ रहा था। मैंने इससे पूछा, क्या हे? तब इसने कहा कि मेरा एक हीरा खो गया है। मैंने वह हीरा इसे देकर कहा कि देखो, यह एक हीरा मैंने पाया है। यदि तुम्हारा हो तो ले लो। तब इसने ले लिया और अब यह कहता है कि मेरे तो दो हीरे थे। पुनः अफसर ने सेठ जी से पूछा। तब सेठ जी बोले कि मेरे तो दो हीरे थे जो मार्ग में गिर पड़े थे। उनमें से एक तो इसने दे दिया, पर एक नहीं देता है। अफसर ने समझाया कि यह ब्राह्मण यदि अपने ईमान का पक्का न होता, तो इतना दीन होते हुए एक भी क्यांे देता? अतः यह फैसला किया कि वह हीरा ब्राह्मण को दे दिया जाए। वह जौहरी का नहीं, क्योंकि इसके तो दो हीरे एक साथ गिरे थे, सो इसके कहीं और होंगे। तब तो सेठ बोले कि सरकार, तो मुझे एक ही दिला दिया जाए। तब अफसर ने कहा कि अब तुमहो नहीं मिल सकता।
    —इस संग्रह की ‘सत्यमेव जयते’ कथा
  • Pustak Sameeksha Ka Paridrishya
    Vishwanath Prasad Tiwari
    120 108

    Item Code: #KGP-1476

    Availability: In stock

    हिंदी पुस्तकों की समीक्षा पर एकाग्र प्रस्तुत चयन में इस विषय के अनेक आयामों के संस्पर्श और आस्वाद का गहरा अनुभव मिलता है। यह अनुभव पाठक-लेखक, समीक्षक-प्रकाशक और संपादक को समांतर रूप से इसलिए छूता है, क्योंकि पुस्तक-समीक्षा के संसार में ये सब निकटतम और घनिष्ठतम ‘पड़ोसी’ हैं। भावनात्मक और सक्रियात्मक दोनों ही रूप में अभिन्न। पुस्तक-समीक्षा का आधुनिक परिदृश्य एक सत बहस और पूछताछ से आच्छादित है और संभवतः इसीलिए यह विषय साहित्य के हाशिए पर रहने वाला विमर्श न रहकर अब केंद्र में आ गया है।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा संचालित वार्षिक ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के वर्ष 2005 के आयोजन में पुस्तक समीक्षा की स्थिति की गहराई से पड़ताल करने के उपक्रम में अनेक गंभीर एवं कतिपय रोचक कथ्य-तथ्य सामने आए। कुल मिलाकर उक्त विषयक स्थिति को चिंतामयी ही चिन्हित किया गया। साथ ही, यह विचार भी सामने आए कि पुस्तक के प्रकाशन के उपरांत होने वाले इस सर्वप्रथम संस्कार (समीक्षा) की पवित्रता को कैसे पुनस्र्थापना मिले तथा इसके भावी रूप-स्वरूप को किस प्रकार मिल आकार और आकृति। इन आलेखों में पाठक पाएंगे कि पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय ही पाठक के मनोभाव में विश्वसनीयता जगा सकता है।
    संभवतः हिंदी की यह अकेली और पहली ऐसी पुस्तक है, जिसका विषय किताब के जीवन से सीधे जुड़ा हैं। अर्थात् किताब की चिंता में तल्लीस एवं एक किताब। मुद्रित शब्द पर आए-छाए संकटों के बीच विश्वसनीय पुस्तक-समीक्षा ही एक ऐसा अस्त्र हो सकता है, जिसके सहारे शब्दों के सार्वजनिक प्रहरी सीना तानकर, दृश्यलिप्त दुनिया को यह दिखा सकते हैं कि अंततः शब्द ही ब्रह्म है।
  • Chhajju Ram Dinmani Tatha Anya Kahaniyan
    Mohan Thapliyal
    60 54

    Item Code: #KGP-1929

    Availability: In stock

    छज्जूराम दिनमणि तथा अन्य कहानियाँ
    मोहन थपलियाल ऐसे कहानीकार हैं, जिनके लिखने की रफ्तार बहुत धीमी है, फिर भी कम छपने के बावजूद वह उल्लेखनीय कथाकार बने रहे है । इनकी कहानियों में ग्रामीण और शहरी परिवेश का अदभुत संयोजन दिखाई देता है । निम्न-मध्य और गरीब तबके के लोग इन कहानियों के मुख्य पात्र हैं, जिनके साथ समकालीन समाज की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों की ऐतिहासिकता भी बराबर मौजूद है । जहाँ तक कथ्य और शिल्प का ताल्लुक है, ये कहानियाँ अवसर पारंपरिक ढांचे का निषेध करती हैं। कहीं-कहीं एक नए डिक्शन की तलाश भी इनमें है- 'शवासन' इसी तरह का मंजर पैदा करती है । यथार्थ और फंतासी का ताना-बाना मोहन थपलियाल की कहानियों में एक अलग जादूगरी पैदा करता है, लेकिन यह जादूगरी किसी चकमे या चमत्कार को दिखाने के लिए न होकर पात्रों व परिस्थितियों की हकीका जानने में मददगार सिद्ध होती है । द्वंहात्पक दर्शन को पहचान देने वाली ये कहानियाँ व्यक्ति की निजी लडाई को समाज की व्यापक लडाई से जोडना अपना फर्ज समझती है । यह अलग बात है कि यह मकसद पाने के लिए ऊँचे-ऊँचे आदर्शों, जोशीले नारों और बड़बोले भाषणों का इस्तेमाल प्रत्यक्षत: लेखक ने कहीं नहीं किया है । शायद इस संदर्भ में लेखक बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की इस उक्ति --'हमने उनके दुख के नहीं, दुख के कारणों के बारे में बात की' --का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहता है । दुख के कारण और सामाजिक विसंगतियों की गहरी पड़ताल इस संग्रह की तमाम कहानियों में मौजूद है । बतौर बानगी ‘एक वक्त की रोटी' और 'छज्जूराम दिनमणि' देखी जा सकती है । दुख की घडी की टिक-टिक दोनों जगह समान है भले ही सामाजिक परिवेश बिलकुल भिन्न । लेकिन इस संग्रह को वहानियों का अंतिम लक्ष्य दुख और नैराश्य न होकर पाठक के मन में बेहतर भविष्य के लिए एक जीती-जागती उम्मीद भरना है ।
  • Mere Saakshatkaar : Shyam Singh Shashi
    Shyam Singh Shashi
    300 255

    Item Code: #KGP-581

    Availability: In stock


  • Apna Raag
    Pushpa Mehra
    140 126

    Item Code: #KGP-176

    Availability: In stock

    अपना राग
    जिस युग में सब अपना-अपना राग आलापना चाह रहे हों, श्रीमती पुष्पा मेहरा का ‘अपना राग’ जितना उनका, उतना ही मेरा-आपका, बल्कि हम सबका राग है। उसके इस लक्षण की ओर आपका ध्यान अवश्य जाएगा कि भले ही वह रग-रग में समाया प्रतीत न हो, पर वह घुन की तरह भीतर पैठा रोग कदापि नहीं। 
    पुष्पा मेहरा ने हिंदी कविता के समसामयिक मुहावरे को अपनाने या आधुनिकता की होड़ में शामिल होने की जगह अपने आसपास की दुनिया को ऐसी सीधी, सरल शैली में चित्रित किया है कि उनकी अनुभूति सहृदय पाठक को अपनी वह अनुभूति मालूम होगी, जिसे हम-आप व्यस्तता या लापरवाही के कारण भले लिपिबद्ध न कर पाएँ, किंतु पुष्पा मेहरा ने सँजोकर हमारे लिए सुलभ कर दिया है। यह कुछ-कुछ वैसा है, जैसे तड़क- भड़क-भरे माहौल में किसी का बिलकुल सीधे-सादे परिधान में प्रकट हो, कइयों को इस पछतावे से भर देना कि वे नाहक ही इतना सजे-सँवरे।
    वैसे तो कविता के बहुतेरे प्रयोजन होते हैं–उनमें से एक यह भी कि वह जहाँ उपजे, उससे कहीं अन्यत्र उसकी शोभा झलके। आशा करनी चाहिए कि पुष्पा मेहरा की कविताएँ अंधी दीवार से टकराकर लौट आने वाली बंद कविताएँ होने के बजाय विभिन्न हृदयों में खुलने-खिलने वाली कविताएँ सिद्ध होंगी।
  • Mahayaatra Gaatha (1 & 2) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-22

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Manch Andhere Mein
    Narendra Mohan
    120 108

    Item Code: #KGP-1915

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Is Bar Sapne Mein Tatha Anya Kavitayen
    Parmanand Shrivastva
    175 158

    Item Code: #KGP-1898

    Availability: In stock

    इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ परमानंद श्रीवास्तव की काव्ययात्रा से एक ऐसा चयन है, जिसे अपने दर्पण-समय का साक्ष्य कहा जा सके। ‘उजली हँसी के छोर पर’, ‘अगली शताब्दी के बारे में’, ‘चौथा शब्द’ और ‘एक अ-नायक का वृत्तांत’ से मुख्यतः चुनी कविताएँ अनामिका के संपादन में एक समय-संवाद बनाती हैं। प्रेम भी प्रतिरोध के विमर्श में शामिल है। ‘चित्र में स्त्रियाँ’, ‘छिपने की जगह’ जैसी कविताएँ एक नया मुहावरा हासिल करती हैं। परमानंद श्रीवास्तव के लिए कविता एक अकेली दुनिया का हालचाल, जिसे बताना मुश्किल है, तो छिपाना लगभग असंभव। ‘आसिया बानो’, ‘भानु मजूमदार’ जैसे नाम काल्पनिक भी हों तो आत्मा की भीतरी सृष्टि हैं। 
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ स्त्री-उत्पीड़न और साम्प्रदायिक बर्बरता का आख्यान हैं, जिसे कविता अनोखे संवाद-शिल्प में अंकित करती हैं। कविता जैसे एक पटकथा हो, एक लैंडस्केप, एक विस्थापित की डायरी, एक समय-गाथा। ‘एलिना के लिए’ जैसी कविताएँ गहरे भेद खोलने वाली कविताएँ हैं। यहाँ भीतर का त्रासद तनाव प्रकट है तो कोमल मूक अन्तर्ध्वनि भी।
    विस्थापन इन कविताओं का केन्द्रीय सच है। निर्वासन में कवि का आत्मनिर्वासन भी शामिल है।
  • Gopal Krishna Gokhale : Jeevan Darshan
    Gaurav Chauhan
    200 180

    Item Code: #KGP-670

    Availability: In stock

    जिस समय हमारी यह भारतभूमि अंग्रेजों के अत्याचारों, प्रताड़नाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी उस समय देश के अनेक वीर सपूतों ने या तो अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के मान-प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा की या जीवन भर देश के लोगों को देश की आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहे। उन्हीं वीर सपूतों में से एक वीर सपूत थे—गोपालकृष्ण गोखले। गोखले जी ने उस समय न केवल इस देश के युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया बल्कि अपना संपूर्ण जीवन देश को आजादी दिलाने के प्रयासों में ही न्योछावर कर दिया।
  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • Nadi Phir Laut Aaee
    Rajjan Trivedi
    90 81

    Item Code: #KGP-2015

    Availability: In stock

    उपन्यास
  • Parda Baari
    Kusum Kumar
    190 171

    Item Code: #KGP-39

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap
    Madan Kashyap
    150 135

    Item Code: #KGP-225

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Maila Darpan
    Moti Bhuvania
    125 113

    Item Code: #KGP-1851

    Availability: In stock

    मैला दर्पण
    'मैला दर्पण’ कलापारखी मोती भुवानिया का क्या संचयन  है । उनकी कविताओँ में कलाकृतियों जैसे वर्णबिम्बों को भरमार को वजह शायद यही है कि एक लंबे अर्से तक कला की दुनिया से संबद्ध होने के कारण वे कविता में या कहें शब्दों में एक मुकम्मल चित्र की रचना कर डालते है ।  कविता के लिए शब्द चुनते वक्त जैसे वे आकृतियों के रूप चुनते है ।
    'मैला दर्पण’ स्मृति का पुनरख्यान नहीं है । वह एक लंबे 'कैनवस' पर जीवन को संपूर्णता में उकेरने की एक व्यवस्थित कोशिश है । व्यवस्थित इसलिए कि मोती भुवानिया का विचार जगत अनिर्णय से ग्रस्त किसी मोह से लिपटा हुआ नहीं है । वे भरसक खुद को भी तोड़कर-फिर से नए रूप में छोड़ने की ललक से भरे हुए है । नई कविता के उत्कर्ष काल में जिस विविधता का भव्यतापूर्ण रचनात्मक रूप कविताओं में चित्रित हुआ है उसका सौष्ठव अपनै चरम रूप में भुवानिया जी की कविताओं में मिलेगा । यह तो मात्र संयोग है कि 'मैला दर्पण' के उस सौष्ठव में काव्य-भाषा के अब तक प्रचलित रूपों के साथ अद्यतन रूपों की झलक भी मिलेगी । और कहना पडेगा कि एक प्रासंगिक कविता में परंपरा और भविष्य दोनों एकमेक होकर कविता को अगली दस्तक की पहचान मिलती है ।
    सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण 'मैला दर्पण' की भाषा है, जिसमें एक साथ प्राज्जलता का प्रदर्शनकारी रूप है तो लोक का विलुप्त-सा वह संस्पर्श भी जो हलके से हमें अपनी 'लोकस्मृति' से जोड़ देता हैं ।
    कुल मिलाकर भुवानिया जी की वे कविताएँ हमें हमारे  वैभव में परिचित कराती है तो साथ ही साथ हमें बहुत कूर रूप से हमारे वर्तमान से भी जोड़ती है। भाषा के स्तर पर भुवानिया जी की कविताएँ न केवल अपने समकालीनों से अलग है अपितु अपने परवर्तियों से भी कुछ आगे का अनुभव देतीं है । 

  • Do Dhurva
    Anton Chekhov
    225 191

    Item Code: #KGP-614

    Availability: In stock

    दो ध्रुव 
    अन्तोन चेखोव (1860-1904) रूस के ही नहीं, वरन विश्व के सुविख्यात कथाकार और नाटककार हैं। अपनी कहानियों में उन्होंने बहुत ही सीधे-सरल शब्दों में मनुष्य के असत्य, आडंबर, चापलूसी और  असहाय व्यक्ति के शोषण के विरुद्ध संकेत कर यह संदेश दिया है कि हम अधिक से अधिक मानवीय शोर संवेदनशील बनकर बेहतर इंसान बनें। साथ ही हम संसार को भी बेहतर बनाने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि यह सब लोगों के जीने  के योग्य बन सके ।
    इन कहानियों के मंच के लिए किए गए नाटय-रूपांतर, कॉन्स्टेंट गारनेट द्वारा रूसी से अंग्रेजी में किए उनके अनुवादों के आधार पर हिंदी  में किए गए है ।
    ऐसे ही आठ नाटय-रूपांतर इस पुस्तक में संकलित किए गए । आशा है, ये पाठकों को भी, और इन छोटे-बड़े नाटकों को मंच पर खेलने वाले अभिनेताओं-निर्देशकों को भी पसंद आएंगे, दर्शकों  को भी ।
    ये नाटक थोड़े बहुत आवश्यक परिवर्तन के साथ मंच पर आसानी से खेले जा सकते है ।
  • Vyangya Samay : Sharad Joshi
    Sharad Joshi
    380 342

    Item Code: #KGP-9347

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-4)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-895

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Om Prakash Valmiki
    Om Prakash Valmiki
    175 158

    Item Code: #KGP-432

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : ओमप्रकाश वाल्मीकि
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘बैल की खाल’, ‘अम्मा’, ‘बंधुआ लोकतंत्रा’, ‘पीटर मिश्रा’, ‘शवयात्रा’, ‘छतरी’, ‘घुसपैठिए’, ‘प्रमोशन’, ‘बपतिस्मा’ तथा ‘पच्चीस चैका डेढ़ सौ’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190 171

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Bhasha Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhasha
    Bholanath Tiwari
    500 450

    Item Code: #KGP-636

    Availability: In stock

    भाषा विज्ञान प्रवेश एवं हिंदी भाषा
    डॉ.  भोलानाथ तिवारी लब्धप्रतिष्ठ भाषाविज्ञानी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने भाषा विज्ञान को सरल और सहज रूप में प्रस्तुत किया है। भाषा विज्ञान के पारंपरिक विषयों के साथ-साथ नए विषयों व भाषा विज्ञान के नए आयामों को शामिल करते हुए उन्होंने पुस्तक की उपादेयता बढ़ा दी है।
    यह पुस्तक भाषा विज्ञान हेतु भारत के सभी विश्वविद्यालयों के लिए तो उपयोगी होगी ही, साथ ही केंद्र सरकार, सार्वजनिक उपक्रमों व बैंकों के राजभाषा अनुभागों तथा उनमें कार्यरत हिंदी से जुड़े अधिकारियों, सहायकों, अनुवादकों व भाषा से जुड़े प्रौद्योगिकीविदों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी, क्योंकि इसमें भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा से जुड़े अद्यतन ज्ञान को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। 
    यह पुस्तक भाषा से सरोकार रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए भी उपयोगी होगी, यह हमारा विश्वास है।
    इस पुस्तक में अद्यतन जानकारियाँ तथा जटिल संकल्पनाओं को भी इतने सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि भाषा विज्ञान में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक के लिए भी यह उपादेय सिद्ध होगी।
  • Bhartiya Vangmay Per Divyadrishti
    Kashiram Sharma
    400 360

    Item Code: #KGP-9137

    Availability: In stock

    भारतीय वाड्मय का एक बहुत बड़ा भाग चार महास्तंभों पर आरित है। वे हैं: रामायण, पुराण और बड्ढकहा (बुहत्कथा)। सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकारों ने आदिकाव्य रामायण, जयकाव्य महाभारत और पुराणों को अपना उपजीव्य बनाया है। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पर्याप्त वाड्मय ‘बड्ढ कहा’ पर भी आश्रित है। अतः इन चार महास्तंभों का सम्यक् परिचय प्राप्त किए बिना भारतीय वाड्मय का सुचारु अध्ययन संभव नहीं है। इस बात को तो लोग प्रायः स्वीकृत कर लेते हैं कि भारतीय वाड्मय भवन का बहुत बड़ा भाग इन चार स्तंभों पर टिका है पर ये महास्तंभ किस ‘घातु’ के बने हैं, यह जानारी बहुत ही कम लोगों को है। इस पुस्तका में उस धातु का परिचय कराने का विनम्र प्रयास है। वह धातु क्या है और उसका उद्गम स्थान कहा हैं, यह भी बताने का प्रयास किया गया है।
  • Paap-Punya Se Pare
    Rajendra Rao
    225 203

    Item Code: #KGP-1832

    Availability: In stock


  • Aadivasi : Srijan Mithak Evam Anya Lokkathayen
    Ramnika Gupta
    500 400

    Item Code: #KGP-682

    Availability: In stock

    आदिवासी संस्कृति अब तक ज्ञात मानव सभ्यताओं में सबसे प्राचीन है। इस समाज की लोककथाओं-गाथाओं में मानव सभ्यता के शुरुआती दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यबोध की झलक तो मिलती ही है, साथ ही ये हमें आदिम मनुष्य को विस्मित कर देने वाली कल्पना की उड़ान और मनुष्य की आकांक्षाओं-अपेक्षाओं की मंत्र-मुग्ध करने वाली विरासत भी सौंपती हैं। ये कथाएँ--मिथक मानव सभ्यता के विकास की कथाएँ हैं--परिवर्तनों की दस्तकें दर्ज हैं इनमें--कल्पना और यथार्थ की भाषा में बोलती हैं ये कथाएँ। यदि हमने मौजूदा भूमंडलीकरण के दौर में मानव सभ्यता की इस विरासत को सुरक्षित नहीं रखा तो वर्तमान पीढ़ी के साथ ही ये विस्मृत हो जाएँगी।  
    इस संकलन में झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार की कथाओं को शामिल किया गया है। इन्हें पाठकों की सुविधा के लिए 12 खंडों में विभाजित किया गया है। पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित खंड में आदिवासी समूहों व समाजों में मौजूद आस्थाओं, विश्वासों व उनकी अपनी-अपनी अवधारणाओं पर आधारित लोककथाएँ शामिल की गई हैं।
    ‘पशु-पक्षी और जलचर खंड’ में संताली की ‘छोटी चिड़िया की कथा’ में छोटी चिड़िया की वीरोचित कथा का संवाद सुनकर मानव में एक संदेश पहुँचता है कि कैसे एक छोटी चिड़िया भी एक अन्यायी एवं अहंकार से भरे हाथी का दर्प-दलन कर सकती है। यह साहस तभी जुटने लगता है, जब कोई व्यक्ति अथवा प्राणी सत्य-पथ पर चलकर किसी अत्याचारी के विरुद्ध अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति एवं संकल्प के साथ सामना करने के लिए तैयार हो। इस खंड में मानव और अन्य जीवों के बीच भावनात्मक संबंधों की प्रेरणादायक कथाएँ संकलित हैं। 
    इसके अलावा ‘प्रेम-कथा’, ‘विवाह, गोत्र और रीति- रिवाज’, ‘रिश्तों का सच’, ‘कायांतरण’ और ‘लोकजन्य कथाएँ’ खंड की मिथ कथाओं में स्वैरागात्मक व संवेदनाओं, सामाजिक गतिविधियों के उद्भव व विकास, प्रकृति के सहयोग व संवाद और मनुष्य की विभिन्न अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
  • Vaigyanikon Ki Batein (Paperback)
    Shuk Deo Prasad
    50

    Item Code: #KGP-7085

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Das Pranidhini Kahaniyan : S.R. Harnot
    S. R. Harnot
    280 252

    Item Code: #KGP-9333

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Sarjana Ka Agni-path
    Prabhakar Shrotiya
    125 113

    Item Code: #KGP-9135

    Availability: In stock

    सर्जना का अग्नि-पथ
    "तुमसे अच्छा ऐसा साहित्य का संयोजन कोई कर सका है या कर सकता है, मेरी कल्पना में नहीं है ।" यह लिखा था प्रख्यात वरिष्ठ विचारक, आलोचक और लेखक डॉ० रघुवंश ने 'ज्ञानोदय' से प्रकाशित पत्र में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादन के बारे में । डॉ० श्रोत्रिय के संपादन की प्रशंसा बडे विचारकों, लेखको, विद्वानों से लेकर सामान्य पाठको ने भी अकसर की है । परंतु 'वागर्थ' और 'नया ज्ञानोदय' में विविध विषयों पर लिखे उनके अग्रलेखों ने एक विशाल पाठक समाज को प्रभावित और उद्वेलित करने के साथ ही समय के प्रश्नों पर गहराई से सोचने को प्रेरित किया है । झालावाड़ के विवेक मिश्र अपने पत्र में लिखते हैं—"आपके संपादकीय विवेक से हमारे समय का सांस्कृतिक विमर्श बन रहा है।" 'बिन पानी सब सून' अक पर साइप्रस से ममता जैन लिखती हैं—"यूरोप के भूमध्य सागर के मनोरम तट पर बैठ विशाल जलराशि की लहरों की बूँदें मुझे स्पर्श कर रहीं हैं और मैं ‘बिन पानी सब सून' के प्रवाह से बह रही हूँ...आपके संपादकीय के चार पृष्ठ इस विशद 300 पृष्ठ के विशेषांक की आत्मा हैं ।"
    "शक्ति का केन्द्रीकरण' लेख पर बहादुरगढ़ से श्री ज्ञानप्रकाश विवेक लिखते हैं—"संपादकीय अमेरिकी नीतियों और इराक युद्ध की जिस ईमानदार लहजे में और आक्रामक भाषा में निंदा करता है, वह नायाब है।" एक अन्य पाठक की राय में— "अग्रलेख में आपने अमेरिकी साम्राज्यवाद की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक निरंकुश रूप की निर्भीक समीक्षा की है।" इस आलेख को दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने पाट्यक्रम में शामिल किया है । 'दुर्जेय पर विजय' आलेख पर प्रसिद्ध कवि देवव्रत जोशी की राय थी–"इस संपादकीय को 'जनसत्ता', 'नवभारत टाइम्स’ में और हो सके तो अनुवाद कर अंग्रेजी पत्र में भी छपवा दें। यह राष्ट्रीय अस्मिता, चिकित्सकीय जीवन और लाखों के मरने के विरुद्ध एक सशक्त आलेख है ।"
  • Nimaadi Lokokti Kosh
    Dr. Manjula Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-9189

    Availability: In stock

    निमाड़ी लोकसाहित्य में लोकोक्तियों का श्रेष्ठतम स्थान है। ये संपन्न वाचिक परंपरा की परिचायक हैं। इनमें ‘गागर में सागर’ भरने की अद्भुत क्षमता है। इन कहावतों का जन्म कब कहां और कैसे हुआ, इसके संबंध में प्रामाणिक रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी लोकमान्यता है कि लोक मनीषा की कोख से लोकोक्तियों का जन्म हुआ। निमाड़ी जनमानस उठते-बैठते अहर्निश बात-बात पर ‘सूत्र-वाक्य’ के रूप में इन कहावतों का प्रयोग करता है। जिसे पढ़कर, सुनकर, गुनकर अच्छे-अच्छे ‘एजुकेटेड’ की बुद्धि चकरा जाती है। सीधे-सादे, भोले-भाले, सच्चे, सरल, माटी से जुड़े अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों का जीवनानुभव से जुड़ा सच, अभिव्यकित का पैनापन, अकाट्य तर्क प्रस्तुत करता है, सौ टंच (खरा सोना) है जिसे चुनौती देने का साहस हम में नहीं है।
  • Veerendra Mishra : Geet-Samagra-(4 Vols.)
    Pradeep Pant
    2500 2250

    Item Code: #KGP-816

    Availability: In stock

    वीरेन्द्र मिश्र : गीत-समग्र (4 भागों में)
    नई कविता के आगमन के साथ काव्य-जगत् का पूरा परिदृश्य बदल गया । कारण कि छंदमुक्त कविता ने गीत को सबसे अधिक प्रभावित किया । यद्यपि नई कविता के अनेक कवियों ने स्वयं भी गीतो की रचना की और छंदों का सहारा लिया, किंतु नई कविता के उदय के साथ ही गीत की उपेक्षा भी आरंभ हो गई । गीत के उपेक्षित होने के अपने कारण भी थे । जैसे कि गीत के नाम पर तुकबंदी हावी होती गई, गीत प्रायः रूमानियत तक सिमट गया, उसने अपने को मंच या कवि-सम्मेलनों तक सीमित कर लिया । कालांतर में नई कविता के बाद जो कविता सामने आई, उसके चलते गीत और भी उपेक्षित हुआ, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नई कविता के बाद की छंदमुक्त कविता प्राय: नई कविता की रूढि बनकर रह गई और आज तो ऐसी अधिकांश कविताएँ कवियों के सपाट वक्तव्य सरीखी प्रतीत होती हैं । बहरहाल कविता के रूप-स्वरूप के परिवर्तन के दौर में कुछेक कवि समस्त ऊर्जा और सर्जनात्मकता के साथ गीतों की रचना करते रहे । वीरेन्द्र मिश्र ऐसे ही कवियों में है, बल्कि वे गीतों के प्रमुख और अत्यंत स्मरणीय रचनाकार हैं। इसका मुख्य कारण है उनकी गहरी सामाजिक संलग्नता और प्रगतिशील सोच, जिस वजह से वे किशोर वय से युवावस्था की ओर बढ़ने के दौर में बंगाल के भीषण अकाल पर सशक्त छांदिक रचना प्रस्तुत कर सके । उन्होंने जहाँ एक ओर मछुआरों, कामगारों, मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दु:खों और हर्ष-विषाद पर सार्थक गीत लिखे, वहीं एशिया के नव-स्ततंत्र राष्ट्रों पर मंडराते युद्ध के खतरे, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और विश्व-शांति के प्रश्नों को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया । साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में प्रदूषण आदि भी उनकी चिंत्ता के केंद्र में थे । बडे पैमाने पर उन्होंने गीतों के माध्यम से विसंगतियों पर व्यंग्य किए, जबकि गीत से व्यंग्य का इस्तेमाल अधिकांश कवियों के यहाँ बहिष्कृत-सा  ही रहा है । अदभुत शब्द-संयोजन, असंख्य छांदिक प्रयोग, संगीतात्मकता आदि ऐसे उपकरण है, जिन्होंने उनके गीतों को उजास ही । वीरेन्द्र मिश्र की गीत-यात्रा सही अर्थों से अप्रतिम हैं ।
  • Aadi Jagadguru Shankaracharya
    Chandrika Prasad Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9009

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria
    Madhu Kankria
    280 238

    Item Code: #KGP-719

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora
    Sudha Arora
    280 238

    Item Code: #KGP-701

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।