Asia Ke Durgam Bhukhandon Mein

Rahul Sankrityayan

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  • Year: 2019

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 9788188125692

एशिया के दुर्गम भूखंडों में
'एशिया के दुर्गम भूखंडों में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की महत्त्वपूर्ण यात्रा-पुस्तक है, जिसमें  लेखक ने मध्य एशिया के कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अक्षुनदी की उपत्यका तथा अफगानिस्तान का भ्रमण-वृत्तान्त दिया है । अपनी कठिन यात्राओं एवं इन यात्राओं की उपलब्धियों के बारे में भी राहुल जी ने सविस्तार वर्णन किया है ।
राहुल जी के यात्रा-साहित्यकी विशेषता है उनकी वर्णन-शैली, जो इतनी आकर्षक है कि पाठक पुस्तक पढते समय यही अनुभव करता है कि वह भी लेखक के साथ-साथ भ्रमण कर रहा है । लेखक की दूसरी विशेषता है उनकी सूक्ष्म पर्यवेक्षकीय दृष्टि, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है ।
'एशिया दुर्गम भूखंडों में' की अपनी ऐतिहासिक विशेषता भी है, क्योंकि राहुल जी के देखे हुए कई देशों का इतिहास अब बदल चुका है, इसलिए भी इस पुस्तक का दस्तावेज महत्व बढ़ जाता है। राहुल-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक अनिवार्य कृति है ।
--कमला सांकृत्यायन

Rahul Sankrityayan

राहुल सांकृत्यायन
9  अप्रैल,1893 : याम पंदहा, जिला आजमगढ़ (उ०प्र०) में जन्म ।  जन्म नाम पडा - 'केदारनाथ पाण्डे । 
1907 : निजामाबाद से मिडिल की परीक्षा । 
1910 : अयोध्या, हरिद्वार, केदार-बद्रीनाथ की यात्रा ।
1912-13 : परसा मठ (जिला छपरा) के महन्त के बुलावे पर उत्तराधिकारी की नियुक्ति । नाम रखा गया 'रामउदारदास'
1913-14 : दक्षिणा भारत की यात्रा ।
1915 : आर्य मुसाफिर विद्यालय में दाखिला और आर्यसमाज के प्रचारक बनने की तैयारी । 
1917-21 : पंजाब से बंगाल तक घुमक्कडी की ।
1921 : असहयोग आंदोलन के दोरान राजनीति में प्रवेश । 
1922 : राजनीतिक कार्य के लिए पहली जेल-यात्रा ।
1923-25 : बाईसवीं सदी की रचना ।
1927 : श्रीलंका के लिए प्रस्थान ।
1928 : विद्यालंकार । बिहार, श्रीलंका द्वारा 'त्रिपिटिकाचार्य' की उपाधि ।
1929 : तिब्बत की पहली यात्रा ।
1930 : महापंडित की उपाधि । श्रीलंका में प्रव्रज्या ग्रहण  का रामोदर सांकृत्यायन से राहुल सांकृत्यायन  बने ।
1934 : तिब्बत की दूसरी यात्रा । 
1936 : तिब्बत की तीसरी यात्रा ।
1938 : तिब्बत की चौथी यात्रा ।
1940-42 : हजारीबाग जेल में ।
1944 : ईरान में प्रवास ।
1945-47 : भाषा-नीति के कारण कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासन । 
1950 : मसूरी में निवास । आठ वर्ष तक वहीं रहे ।
1955 : पुन: कम्युनिस्ट पार्टी में ।
1961 : स्मृति-लोप का आधात ।
1963 : भारत सरकार द्वारा पद्मभ्रूषण से सम्मानित । 
4 अप्रैल, 1963 : दार्जिलिंग में महाप्रयाण। 

इतिहास, पुरातत्त्व, धर्म, संस्कृति, विज्ञान और दर्शन, राज़नीति, आत्मकथा, जीवनियां, यात्रा, नाटक, उपन्यास तथा कहानी लेखन के अलावा संकलन, अनुवाद तथा संपादन के कार्यों में अदभुत योगदान । कृतियों की संख्या लगभग डेढ़ सौ है ।

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