Himalaya Ki Sanskritik Sampada

Sudarshan Vashishath

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  • Year: 2017

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Suhani Books

  • ISBN No: 9789380927367

आज भी हिमालय अपने में आदि संस्कृति छिपाए हुए है। आज के युग में तमाम प्रदूषण, मिश्रण और संकरण के बावजूद पर्वत कंदराओं में पुरातन संस्कृति के दर्शन हो सकते हैं। जैसे हिम ग्लेशियरों में सदियों से पानी छिपा रहता है, ठीक वैसे ही पर्वतों की गुफाओं में वे संस्कार छिपे हैं जिन्हें आधुनिकतावादी मृतप्राय समझ बैठे हैं। यह एक तथ्य है कि संस्कृति किसी भी बाहरी आक्रमण से एकदम नहीं मरा करती। वह जीवित रहती है चिरकाल तक, चाहे आक्रमणकारी यह समझें कि इसे मिटा दिया गया है। संस्कार अपने भीतर का एक अनुशासन है जो भीतर ही भीतर छिपा रहता है और चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने प्रकट होता है। बाहरी हाव-भाव, क्रियाकलाप से लेकर मन की गहराइयों तक संस्कार अपना घर बनाए रहते हैं जिन्हें जड़ से समाप्त करना किसी के लिए भी संभव नहीं।
हिमाचल प्रदेश में किन्नौर तथा लाहौल-स्पीति, दो जिले पूर्ण रूप से जनजातीय घोषित हैं। जिला चंबा में भरमौर तथा पांगी क्षेत्र जनजातीय हैं। यहाँ संस्कृतियों का संगम भी एक विलक्षणता लिए हुए है। किन्नौर में बुशहर का राजवंश पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाणासुर, उषा-अनिरुद्ध उपाख्यान से जुड़ा हुआ है। यहाँ उषा देवी का मंदिर है तो दूसरी ओर बौद्ध परंपरा भी विद्यमान है। किन्नौर में हिंदू मंदिर तथा गोम्पा यानी बौद्ध मठ एक ही प्रांगण में स्थापित हैं। यही संगम लाहौल से होता हुआ भरमौर तक चला गया।
हिमालय का साक्षात्कार कराती प्रस्तुत पुस्तक संस्कृति- प्रेमियों, अनुसंधानकर्ताओं तथा पाठकों के लिए उपयोगी एवं रोचक सिद्ध होगी।
अस्तर में: बुद्ध प्रतिमा (8वीं शताब्दी)
परशुराम मंदिर निरमंड से ये प्रतिमाएँ 1981 में हुए ‘भुंडा उत्सव’ के अवसर पर बाहर निकाली गई थीं। ये मूर्तियाँ उत्सव के कुछ समय बाद चोरी हो गईं। पुलिस द्वारा इन प्रतिमाओं को अन्य चोरी हुई मूर्तियों सहित बरामद कर लिया गया। अब ये रामपुर के सरकारी खजाने में जमा हैं।

Sudarshan Vashishath

सुदर्शन वशिष्ठ
जन्म  : 24 सितंबर, 1949, पालमपुर (हि०प्र०) के एक गाँव में
प्रकाशान : 'अंतरालों में घटता समय’, 'सेमल के फूल', 'पिंजरा', 'हरे-हरे   पतों का घर', 'संता  पुराण', 'कतरनें' (कहानी-संग्रह); चुनिंदा कहानियों के तीन संग्रह प्रकाशित; 'आतंक', 'सुबह की नींद’ (उपन्यास) 'युग परिवर्तन, 'अनकहा' (काव्य-संकलन); 'अर्द्धरात्रि का सूर्य’ , 'नदी और रेत’ (नाटक); 'व्यास की धारा', 'कैलास पर चाँदनी', 'पर्वत से पर्वत तक', 'रंग बदलते पर्वत', 'पर्वत मंथन', 'हिमाचल', 'हिमाचल की लोककथाएँ', 'ब्राह्यणत्व : एक उपाधि', 'पुराण गाथा', 'देव संस्कृति' (संस्कृति शोध तथा यात्रा) 'हिमाचल संदर्भ कोष' (आठ खंडों में शीघ्र प्रकाशित)
दो काव्य-संकलन, चार कहानी-संग्रहों का संपादन । तीन पत्रिकाओं  तथा चार दर्जन से ऊपर सरकारी पुस्तकों का संपादन देश की वर्तमान तथा विगत शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओँ में रचनाएँ प्रकाशित
जम्मू अकादमी, हिमाचल अकादमी, साहित्य कला परिषद दिल्ली सहित कई स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा साहित्य-सेवा के लिए सम्मानित

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