Bharatvanshi : Bhasha Evam Sanskriti

Pushpita Awasthi

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789385054464

डॉ.. पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनाकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों, यथा--सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। 
डॉ. अवस्थी ने इन्हीं पर दशकों तक काम किया। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इसमें प्रवासी भारतीयों के इलाकों की भी छवियां हैं। मूलतः यह कृति उन भारतवंशियों के अंधेरों को रोशनी में लाती है जो बहुत हद तक अलक्षित रहा। 
भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है। संस्कृति और भाषा का यह गहन-गंभीर अध्ययन कदाचित् पहली बार वैज्ञानिक दृष्टि से सामने आ रहा है। इसमें सृजनशील लेखक और इतिहासविद् की अनूठी जुगलबंदी है। 
डॉ. अवस्थी ने भारतवंशियों की अलग-अलग धर्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पहचानों में हिंदुस्तानियत की शिनाख्त करते हुए उन तत्त्वों का अन्वेषण किया है जो उन्हें भारतवंशी होने के सांस्कृतिक स्वाभिमान में एकसूत्र करते हैं। यह एकसूत्रता संस्कृति और भाषा की अंतर्तहों में किस तरह अंतर्भुक्त है, इसे अकेले दम पर लेखक ने घूम-घूमकर चिन्हित किया है। वे भारतीय आर्यों और पारसीक आर्यों के सांस्कृतिक और भाषायी इतिहास के रास्तों से वैचारिक यात्रा करती हैं और मोटे तौर पर 19वीं से 20वीं सदी के बीच बनी संस्कृति और भाषा की जड़ों को टटोलकर अपनी स्थापनाओं के लिए रास्ता निर्मित करती हैं। इस प्रक्रिया में वे यूरोपीय उपनिवेशों में भारतवंशियों के तत्कालीन दारुण इतिहास, यातनाओं, यंत्राणाओं के वास्तविक चित्रों को क्रमशः सजीव करती हैं। 
डॉ. अवस्थी ने संस्कृति और भाषा को उस संजीवनी के रूप में खोजा है जिनके कारण ही भारतवंशियों का जीवन है। ये दोनों उनके प्राण तत्त्व बने हुए हैं। इन्हीं दो तत्त्वों से विश्व में उनकी भारतीय अस्मिता का स्थापन हुआ। यह अस्मिता उन भारतीयों से अलग है जो पिछले 30-40 सालों में प्रवास पर पहुंचे। प्रवासी और अप्रवासी के भेद को, भ्रम को अनावृत्त करती यह किताब एक उपलब्धिकी तरह सामने है।
भूमंडलीकरण के भयावह आक्रमण के दौर में जबकि संस्कृतियों और भाषाओं, बोलियों और लिपियों को बचाना कठिन होता जा रहा है तब यह एक किताब भाषा एवं संस्कृति को बचाने का मेटाफर रचती है। यही इसका मानीख़ेज हासिल है।

Pushpita Awasthi

हिंदी की सुपरिचित लेखिका पुष्पिता अवस्थी का जन्म गुरगांव, कानपुर में हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पीएच.डी. उपाधिहासिल करने वाली पुष्पिता कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के बसंत कालेज फार वीमेन (का.हि.वि.से संबद्ध) में हिंदी की विभागाध्यक्ष रही हैं। 2001 में वे सूरीनाम राजदूतावास में प्रथम सचिव व प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहीं। 2003 में सूरीनाम में हुए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इस अवसर पर उन्होंने सूरीनाम के सर्जनात्मक योगदान को रेखांकित करते हुए कथा सूरीनाम, कविता सूरीनाम के संपादन के अलावा सूरीनाम पर विनिबंध एवं भारतवंशी कवि लक्ष्मणदत्त श्रीनिवासी व जीत नराइन की कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया।
प्रकृति से ही कवयित्री पुष्पिता अवस्थी की रुचि लेखन और यायावरी में रही है! ‘शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएं’ और ‘अक्षत’ से उन्होंने कविता के क्षेत्र में मजबूती से कदम रखा। ‘गोखरू’ कहानी संग्रह से वे कथाकार के रूप में भी जानी-पहचानी गईं। बाद में सूरीनाम व अब नीदरलैंड में रहते हुए उनके हिंदी, अंग्रेजी, डच व अन्य भाषाओं में दशाधिक कविता-संग्रह छप चुके हैं। ‘जन्म’ कहानी-संग्रह की कहानियों की जमीन कहने भर को विदेशी है पर उसकी संवेदना में एक मुकम्मल भारतीय मन रचा-बसा है। ‘आधुनिक काव्यालोचना के सौ वर्ष’ उनका मानक कोटि का शोधकार्य है। ‘कैरेबियाई देशों में हिंदी शिक्षण’ के अलावा ‘दि नागरी स्क्रिप्ट फार बिगनर्स’ से विदेश में हिंदी के प्रसार को लेकर उनकी सतत सक्रियता का पता चलता है।
पुष्पिता विश्व के अनेक देशों के कला, साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थानों की मानद सदस्य हैं। वे विश्व भर के भारतवंशियों व अमर इंडियन जनजातियों पर अपने अध्ययन व विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। संप्रति नीदरलैंड में हिंदी युनिवर्स हिंदी फाउंडेशन की निदेशक एवं शमशेर सम्मान सहित देश-विदेश के अनेक सम्मानों से विभूषित पुष्पिता भारत ही नहीं, विश्व के साहित्यिक फलक पर हिंदी कविता-आलोचना व निबंध की सुरभि बिखेर रही हैं।

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