Sarla : Ek Vidhva Ki Aatmjeevani

Pragya Pathak

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  • Year: 2018

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9788188121939

स्वप्न में एक ऐसी दुनिया की कामना जो स्त्रियों की स्वतंत्रता और समानाधिकार की पोषक हो सिर्फ दुखिनीबाला ही नहीं करतीं। रुकैया शेखावत हुसैन की 1905 की रचना है ‘सुल्तान का सपना’। यह अंग्रेजी में छपी है। यहाँ भी सुल्ताना कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाती है और सपने में देखती है कि मर्द ‘मर्दाना’ में बंदिशों के भीतर हैं और औरतें देश-दुनिया के तमाम मुद्दे संभाल रही हैं। इसी तरह मार्च, 1920 के ‘स्त्री दर्पण’ में श्रीयुत अखबारीलाल की रचना छपी है ‘एक संपादिका का स्वप्न।’
इसमें एक संपादिका किसी लेख को संपादित करते हुए सो जाती है और स्वप्न में एक ऐसे लोक में पहुंच जाती है जहां स्त्रियां ही समाज की नियंता और शासक हैं। सपनों की इस दुनिया में स्त्रियां दमन और पराधीनता से ही मुक्ति की आकांक्षा नहीं करतीं बल्कि पराधीनता और दमन के लिए जिम्मेदार वर्ग को दंड देने की आकांक्षा को भी अभिव्यक्त करती हैं।
सरला: एक विधवा की आत्मजीवनी हिंदी में किसी स्त्री के द्वारा आत्मकथा लिखने का पहला प्रयास है इसलिए ऐतिहासिक भी है। यह अपने आप में आश्चर्यजनक है कि वर्ष 1915-1916 के बाद इस क्षेत्र में एक लंबा अंतराल दिखाई देता है।
इस आत्मजीवनी के पाठ के संदर्भ में यह जिक्र करना भी आवश्यक लगता है कि यह इक्कीसवीं सदी की किसी नारीवादी महिला की आत्माकथा नहीं है बल्कि एक सामान्य स्त्री की आपबीती है। तत्कालीन समय और समाज में यह बात ही अपने आप में नई है कि कोई विधवा स्त्री अपनी और अपने जैसों की पीड़ा के बारे में सोचती है, न सिर्फ सोचती है बल्कि लिखकर उस पीड़ा को समाज के सामने उजागर करने का साहस करती है।
इस आत्मजीवनी में लेखिका के निजी जीवन से जुड़े वह हिस्से हैं जो जीवन के एक खंड की कथा के रूप में तत्कालीन सामाजिक परिदृश्य में स्त्रियों से जुड़ी अनेक सामाजिक समस्याओं को उभारकर सामने ले आते हैं। -प्रज्ञा पाठक

Pragya Pathak

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