Manvadhikar Ki Aseemit Sarhadein

Pushpa Sinha

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
250.00 213 + 40.00


  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-83233-97-7

इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म  एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।
लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थान विशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है। तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें।
मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है।
अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है, यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।

Pushpa Sinha

पुष्पा सिन्हा
श्रीमती पुष्पा सिन्हा का जन्म 30 मार्च, 1953 को पटना में हुआ। इनका बचपन कोलकाता में बीता एवं अध्ययन भी कोलकाता में ही हुआ।
आपने विज्ञान, कानून, शिक्षा तथा मानवाधिकार विषयों पर कई उपाधियाँ प्राप्त कीं। दिल्ली में अध्यापन के दौरान आपमें बच्चों के प्रति गहरी रुचि जागी, जिसके परिणामस्वरूप आप बच्चों के अधिकारों पर ‘ह्यूमन राइट्स फॉर चिल्ड्रेन’ नामक पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित हुईं। अब तक विभिन्न विषयों पर आपकी पंद्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। संप्रति आप स्वतंत्र लेखन के कार्य में संलग्न हैं।
आपको राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा मानव अधिकार विषयक हिंदी में लिखित मौलिक कृति ‘मानव अधिकार एवं महिलाएँ’ (महिलानामा) के लिए वर्ष 2006 में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आप ‘भारतीय लेखक समाज’ की सदस्या भी हैं।

Scroll