Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri

Leeladhar Jaguri

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  • Year: 2018

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788189859886

कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।

Leeladhar Jaguri

लीलाधर जगूड़ी
जन्म: 1 जुलाई 1940, धंगण गाँव, टिहरी (उत्तराखंड)।
ग्यारह वर्ष की अवस्था में घर से भागकर अनेक शहरों और प्रांतों में कई प्रकार की जीविकाएँ करते हुए शालाग्रस्त शिक्षा के अनियमित क्रम के बाद हिंदी साहित्य में एम. ए.। फौज (गढ़वाल राइफल) में सिपाही। लिखने-पढ़ने की उत्कट चाह के कारण तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन को फौज से मुक्ति के लिए प्रार्थनापत्रा भेजा, फलतः छुटकारा। 1970 के 13 सितंबर को भयंकर प्राकृतिक त्रासदी में परिवार के सात लोगों की एक साथ मृत्यु। 1966-80 तक शासकीय विद्यालयों में शिक्षण- कार्य और बचे हुए परिवार का पुनर्वास उत्तरकाशी में।
1980 में पर्वतीय क्षेत्र में प्रौढ़ों के लिए लिखी ‘हमारे आखर’ (प्रवेशिका) तथा ‘कहानी के आखर’ पाठ्यपुस्तकें साक्षरता निकेतन, लखनऊ से प्रकाशित। राजस्थान के कवियों के संकलन ‘लगभग जीवन’ का संपादन। अखिल भारतीय भाषाओं की नाट्यालेख प्रतियोगिता में 1984 में ‘पाँच बेटे’ नाटक पर प्रथम पुरस्कार तथा फिल्म निर्माण। मराठी, पंजाबी, मलयालम, बाँग्ला, उड़िया, उर्दू आदि भारतीय भाषाओं में तथा रूसी, अंग्रेजी, जर्मन, जापानी और पोलिश आदि विदेशी भाषाओं में कविताओं के अनुवाद।
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उ.प्र. की मासिक पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश’ तथा नए राज्य उत्तरांचल की प्रथम पत्रिका ‘उत्तरांचल दर्शन’ का संपादन। सेवानिवृत्ति के बाद उत्तरांचल के प्रथम सूचना सलाहकार रहे तथा उत्तराखंड संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद के प्रथम उपाध्यक्ष।
प्रकाशित कविता-संग्रह: ‘शंखमुखी शिखरों पर’ नाटक जारी है’, ‘इस यात्रा में’, ‘रात अब भी मौजूद है’, ‘बची हुई पृथ्वी’, ‘घबराए हुए शब्द’, ‘भय भी शक्ति देता है’, ‘अनुभव के आकाश में चाँद’, ‘महाकाव्य के बिना’, ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’ और अब ‘ख़बर का मुँह विज्ञापन से ढका है’।
गद्य: मेरे साक्षात्कार के लिए।
सम्मान: रघुवीर सहाय सम्मान, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता द्वारा सम्मानित। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के नामित पुरस्कार सहित अन्य सम्मान। ‘अनुभव के आकाश में चाँद’ के लिए 1997 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। 2004 में पद्मश्री से अलंकृत।

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