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  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Yashpal
    Yash Pal
    250 225

    Item Code: #KGP-9155

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं यशपाल की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘मक्रील’, ‘नई दुनिया’, ‘प्रतिष्ठा का बोझ’, ‘परदा’, ‘मंगला’, ‘उत्तमी की मां’, ‘ओ भैरवी!’, ‘वैष्णवी’, ‘कलाकार की आत्महत्या’ तथा ‘भूख के तीन दिन’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Kavi Ne Kaha : Shriprakash Shukla (Paperback)
    Shri Prakash Shukla
    140

    Item Code: #KGP-7017

    Availability: In stock

    रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 3
    Dr. Prem Bharti
    195

    Item Code: #KGP-265

    Availability: In stock

    पिछले कुछ वर्षों से शैक्षिक पाठ्यचर्या में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता को अनुभव करते हुए कुछ शासकीय/अशासकीय संस्थाओं में इसके शिक्षण हेतु प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु इसके प्रभावी परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैँ। देश तथा विश्व के महान् शिक्षकों-अरस्तू विवेकानन्द, अरविन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर , महात्मा गांधी आदि ने शिक्षा के इस पक्ष को व्यावहारिक आचरण के रूप से प्रस्तुत करने पर बल दिया है क्योकि किसी पर थोपे गए आचरण अथवा इस विषय की लिखित परीक्षा में पाए गए अधिकतम अड्डों से नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का पाठ नहीं पढाया जा सकता।
    अत: शिक्षक को ही शिक्षा की धुरी होने के नाते अपने शिक्षण विषय के साथ-साथ इस विषय को उपदेशात्मक शैली में न पढाकर व्यावहारिक रूप से प्रस्तुत करना चाहिए ताकि बालकों को जीवन के विभिन्न सन्दभों में उपस्थित समस्याओं को हल करने में यह प्रभावी सिद्ध हो सके। शिक्षकगण यह भी ध्यान रखें कि आज के युवक में समस्याओं का क्षेत्र उतना ही व्यापक होता जा रहा है, जितना जीवन का मापदण्ड। 
    प्राचीन भारतीय साहित्य में नैतिकता तथा आध्यात्मिकता सम्बन्धित ज्ञान का भण्डार भरा पडा है । यदि हम बालकों के उस साहित्य को पढने के प्रति रुचि भी उत्पन्न कर दें, तो उन्हें इतनी समझ आ जाएगी कि अनैतिक एवं असंयमी व्यवहार करके हम मानवता को सुख और शान्ति का संदेश नहीं दे सकते।
    प्रस्तुत पुस्तक इसी दृष्टि से तैयार की गई है । आशा है, नैतिक शिक्षा के विभिन्न पहलुओं क्रो विविध संदभों में समझकर बालकों में निश्चित परिवर्तन होगा।
  • The Hanuman Factor (Self-Help)
    Anand Krishna
    345 286

    Item Code: #KGP-593

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
  • Dekhana Ek Din
    Dinesh Pathak
    240 216

    Item Code: #KGP-491

    Availability: In stock

    साहित्य में प्रचलित नारों और विमर्शों के शोर-शराबे से अलग अपने एकांत में रचनारत दिनेश पाठक की अधिकांश कहानियां मानव संबंधों व विभिन्न कारणों से उनमें  बनते-बदलते सरोकारों की पड़ताल करती हैं।  
    ‘देखना एक दिन’ संग्रह की कहानियों का मूल स्वर भी इसी भावभूमि के इर्द-गिर्द हैं। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां एक विशेष परिवेश से जुड़ी दिखने के बावजूद संपूर्ण भारतीय समाज के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत करती हैं। बहुआयामी धरातल की इन कहानियों में गांव व कस्बे का जीवन तो है ही, साथ ही उनका संघर्ष, उनका जुझारूपन, उनके सुख-दुःख, उनकी आशा-निराशा, उनके बनते- ध्वस्त होते सपने तथा मूल्य संक्रमण के कारण उत्पन्न मानसिक विचलन और इन सबसे इतर जीवन के प्रति उनकी गहन आस्था व गहरी जिजीविषा है। यही कारण है कि वे पराजित नहीं होते, पराजय के बीच से फिर-फिर उठ खड़े होते हैं। यहां ठेठ ग्रामीण जीवन से निकले पात्र भी हैं जिनके लिए जीवन सदा सोद्देश्य है, आधुनिक जीवनशैली व चकाचौंध के प्रति आसक्त चरित्र भी हैं, राजनीतिज्ञों के दुश्चक्र में फंसकर सामाजिक सरोकारों के योद्धा रूप में विकसित होते-होते अपनी संभावनाओं से भटक जाने वाले व्यक्ति भी हैं तो यहां अपनी अस्मिता को तलाशती और उसके लिए जूझती ऐसी स्त्रियां भी हैं जो अंततः विद्रोह की हद तक जा सकती हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक में कथाकार ने भाषा को किसी उलझाव में डाले बिना अत्यंत सहज-सरल भाषा-शैली में कथ्य को, परिवेश को, चरित्रों को और परिवेशगत बेचैनी व छटपटाहट को पूरी विश्वसनीयता, प्रामाणिकता तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ये कहानियां आदि से अंत तक न केवल अपने पाठकों को बांधे चलती हैं बल्कि उन्हें झकझोरने से भी नहीं चूकतीं।

  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Yug Pravartak Swami Dayanand
    Lala Lajpat Rai
    290 261

    Item Code: #KGP-815

    Availability: In stock


  • Door Van Mein Nikat Man Mein
    Ajit Kumar
    360 288

    Item Code: #KGP-868

    Availability: In stock

    दूर वन में निकट मन में
    मनुष्य एक-दूसरे को सुख-दुःख देते किन नातों के जाल में बँधते-जुड़ते रहते हैं? उनके संबंधों की आधारभूमि क्या है? एक-दूसरे के सारे मीठे-कड़वे अनुभव कालांतर में एक भाव, एक स्मृति, एक टीस बनकर रह जाते हैं! उस भाव का महत्त्व क्या है?
    ‘दूर वन में’ अजितकुमार द्वारा रचित कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणों का संग्रह है। इसमें कुछ प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध विशेषकर ऐसे लोग हैं जो अब भूले से जा रहे हैं, पर अपने ज़माने के विशिष्ट व्यक्तित्व रहे हैं। अधिकांश संस्मरण पारिवारिक दायरे में आने वाले लोगों के हैं। 
    ‘निकट मन में’ भी अजितकुमार के संस्मरणों का संग्रह है।  इन पुस्तकों के शीर्षकों में तुक तो अनायास मिल गया है, उनकी तान, लय और समझ में भी पाठकगण उस निरंतरता का, तारतम्य का आभास पाएँगे, जो अजितकुमार की कविता और गद्य-रचना का स्वाभाविक गुण है।
    संस्मरणों के माध्यम से अजितकुमार अतीत को नहीं पगुराते, हिसाब-किताब भी बराबर नहीं करते, वे अनुभव तथा संवेदना का पथ प्रशस्त करते हैं। इस नाते, ये संस्मरण जितने उनके हैं, लगभग उतने ही या उससे भी अधिक औरों के अपने हो सकेंगे।
    अजितकुमार के संस्मरणों की ये दो पुस्तकें एक ही जिल्द में प्रस्तुत हैं। प्रसिद्ध कवि अजितकुमार एक समर्थ और सशक्त गद्यकार भी हैं। इनके गद्य की ताकत का नमूना तो ये संस्मरण हैं ही, उनके संवेदनशील, सजग, जागरूक व्यक्तित्व का भी परिचय देते हैं।
  • Shivani Ka Katha Sahitya Yug-Parivesh-Sanskriti Ka Sandarbh
    Sushil Bala
    1100 770

    Item Code: #KGP-743

    Availability: In stock

    कोई भी सक्षम रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से युग-परिवेश-संस्कृति की विभिन्न व विशिष्ट छवियां निर्मित करता है। इन छवियों में उसकी वैचारिकी तथा भावसंपदा समाहित होती है। शिवानी के प्रचुर कथा साहित्य को पढ़ते हुए इस तथ्य का अनुभव शब्द-शब्द में किया जा सकता है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘शिवानी का कथा साहित्य: युग-परिवेश- संस्कृति का संदर्भ’ में सुशील बाला ने अत्यंत लोकप्रिय लेखिका शिवानी के कथा-संदर्भ रेखांकित किए हैं। शिवानी अपनी परिनिष्ठित अभिरुचियों के लिए जानी जाती हैं। विशद वैदुष्य की गरिमा से आलोकित उनकी रचना-शैली एक अलग मार्ग का अन्वेषण करती रही। वे भारतीयता को समझकर उसे व्यापक मानवता के हित में व्याख्यायित करती रहीं। सुशील बाला ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही लिखा है कि ‘वे क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, जातिवाद, भाषावाद, सांप्रदायिकता जैसी देश को खंडित करने वाली नकारात्मक वृत्तियों का प्रबल विरोध कर सौहार्दपूर्ण वातावरण को उद्घाटित करती हैं।’ यह सच है कि शिवानी के कथा साहित्य में मानव मनोविज्ञान की उपस्थिति का विश्लेषण करते हुए उसमें सकारात्मक सोच के अनेक आयाम तलाशे जा सकते हैं। 
    चैदह अध्यायों में विभाजित प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने व्यवस्थित ढंग से शिवानी के व्यक्तित्व के नियामक तत्त्वों को रेखांकित करते हुए उनके रचना-परिवेश को उद्घाटित किया है। इसके पश्चात् उन्होंने शिवानी के कथा साहित्य (कहानी व उपन्यास) में पारिवारिक स्थिति, सामाजिक चेतना, नारी की स्थिति, राजनीतिक परिदृश्य, आर्थिक पक्ष, धर्मिक मान्यताएं और जीवन-दृष्टि, नैतिक मान्यताएं, कला साहित्य और ज्ञान-विज्ञान, प्राकृतिक परिवेश एवं भाषा का आलोचनात्मक अनुसंधन किया है। सुशील बाला के पास उपयुक्त भाषा है, जिस कारण पाठक तक उनका मंतव्य पहुंच जाता है। यह पुस्तक शिवानी पर केंद्रित आलोचनात्मक लेखन की नई संभावनाएं खोलती है। आज जब नए-नए संदर्भों में साहित्य का मूल्यांकन किया जा रहा है तब इस पुस्तक का विशेष महत्त्व है। यह निश्चित रूप से एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Mere Saakshatkaar : Maheep Singh
    Mahip Singh
    160

    Item Code: #KGP-529

    Availability: In stock


  • Pride And Prejudice (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-347

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Khabar
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    1150 805

    Item Code: #KGP-584

    Availability: In stock

    अपने कथ्य को कम शब्दों में रखना वंद्योपाध्याय की विशेषता है। वह अकारण शब्दों को विस्तृत नहीं होने देते। जब वह जगदंबा द्वारा पत्नी पर मार-काट सामने लाते हैं, जबान को बहुत फैलने नहीं देते। कथा में परेशान विनायक सामने आता है। उपन्यास में जब कथा आगे चलती है, अलग किस्म के अनेक पात्र सामने आ जाते हैं। उपन्यास में असंख्य पात्र हैं। इन्हीं से उपन्यास अपना आकार पाता है। कथा के असंख्य चरित्र आते और जाते हैं, और वे फिर आ जाते हैं। विनायक के बाद मुख्य चरित्र है नैना। दूसरे तमाम बिहारीपुर के लोगों के माफिक वह एक औरत है, जो सबसे अलग है। अंत में विनायक का एकदम चले जाना एक विराट् घटना है। हम महसूस करते हैं बिहारीपुर की हंसी अब हलकी हो गई। बस, बिहारीपुर फिर भी इसी तरह चलता रहता है।
    -द टाइम्स ऑफ इंडिया

    उपन्यास की घटनाएं रोचक ढंग से सामने आती हैं। ‘मालगुडी डेज़’ की तरह उपन्यास आगे और पीछे जाता रहता है। उपन्यास के तमाम पात्र अपने-अपने तरीके से सामने तो आते हैं, लेकिन कई बातें एकदम अलग हैं। उपन्यास के प्रत्येक अंश में कई बातें एकदम नहीं होतीं, जिससे कथा एकदम बदल जाती है। दूरदर्शन के धारावाहिक ‘नुक्कड़’ में भी इसी तरह बनती और टूटती है। 
    -इंडियन एक्सप्रेस

    खबर
     की तमाम बातें स्थानीय भाषा और लहजे पर सामने आती हैं। कथा में कुछ लोग तो मेहनतकश हैं, कुछ भंगी हैं, कुछ हैं स्थानीय गुंडे और शराबी। गरीबी की मार लोगों पर इतनी ज्यादा है कि वे चटपटी बातों के अलावा कुछ और देख या सुन नहीं पाते। उपन्यास के पात्र परशुराम वैद्य और मुरारी डॉक्टर अपने हिसाब से काम कर रहे हैं। विनायक के कर्म को छोटा करने के लिए वे जब तब मिलते और सोचते रहते हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र विनायक जो एक श्रम संगठन का नेता है और होम्योपैथी का डॉक्टर। कोई ध्यान नहीं देता। विनायक का भद्र आचरण उसे बहुत दूर शायद ले नहीं जाता। वो बिहारीपुर के कौशल्या भवन के बीच अपने परिचय के साथ बहुत कुछ देखता रहता है। लेखक एक शहर के तमाम गरीबों पर अलग-अलग अनुभव प्राप्त करता रहता है। अपने अनुभव से वो देखता है एक नया संसार।
    -संडे

    इस उपन्यास के भीतर असंख्य चरित्र, तमाम घटनाएं और बिहारीपुर के ढेर सारे लोग और उनकी कथाएं हैं। इसके भीतर तमाम लोग किसी न किसी बहाने कथा में आते रहते हैं। कथा के बीच विद्यानिवास तिवारी जो एक प्राथमिक स्कूल का शिक्षक है और संभवतः एक ज्योतिषी भी। पात्र की बेटी जानकी एक शराबी के प्रेम में डूब जाती है। वह एक पहलवान भी है। नाम है लुक्का। जिस पर कोई न कोई जुड़ा हुआ है। उसमें कोई गांजे का दम भरता है। साथ हैं भोलानाथ गिरी। आगे है नौरंगीलाल अपने ढंग से चलने वाला ‘एडवोकेट साहिब’, जो एक जिले की कचहरी में एक छोटा-मोटा क्लर्क-भर है, जिसकी तमाम बातें घड़ी के पेंडुलम की तरह हिलती रहती हैं। इसका एक केंद्रीय चरित्र विनायक तमाम पात्रों और घटनाओं को देखता रहता है। और उसके बाद आती है नैना, मेम के चरित्र में जो उपन्यास को अपने ढंग से गढ़ती और तोड़ती रहती है। यह उपन्यास अलग-अलग घटनाओं को जिस प्रकार संजोता है वो एक अभूतपूर्व अनुभव है।           
    -इंडियन रिव्यू ऑफ बुक्स

  • Nahin Koi Ant
    Pratap Sehgal
    80

    Item Code: #KGP-1300

    Availability: In stock


  • Mahayogi Gorakhnath : Sahitya Aur Darshan
    Govind Rajnish
    560 392

    Item Code: #KGP-9344

    Availability: In stock

    महायोगी गोरखनाथ: साहित्य और दर्शन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। प्रस्तुति प्रो. गोविंद रजनीश की है, जिन्होंने इसका संपादन भी किया है। प्रो. रजनीश गूढ़-गंभीर विषयों को सुगम रूप में व्यक्त-व्याख्यायित करने के लिए जाने जाते हैं। इस पुस्तक में उन्होंने भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ मनीषियों में से एक परमयोगी गोरखनाथ के निगूढ़ साहित्य और उसमें निहित दर्शन को संयोजित किया है। गोरखबानी के साथ उसका गद्यार्थ होने से पाठकों के लिए यह सामग्री कई दृष्टियों से पठनीय और संग्रहणीय बन पड़ी है।
    प्रो. रजनीश ने ‘भूमिका के दो अध्याय’ के अंतर्गत गोरखनाथ के व्यक्तित्व और उनकी गुरु परंपरा पर विस्तार से लिखा है। एक व्यक्ति के रूप में योगी गोरखनाथ के जन्म-जाति आदि पर यह प्रामाणिक सामग्री है। प्रो. रजनीश ने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के ये वाक्य उद्ध्ृत किए हैं, ‘गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े धर्मता थे।...उनका चरित्रा स्पफटिक के समान उज्ज्वल, बुद्धि भावावेश से एकदम अनाविल और कुशाग्र तीव्र थी।’ अध्याय 2 में ‘नाथ और सिद्ध’ शीर्षक से इन महान् परंपराओं का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। साथ ही उस आभावलय को भी प्रकट किया गया जिसमें गोरखनाथ की अजेय अस्मिता चमकती है। प्रो. रजनीश के शब्दों में, ‘गोरखनाथ का काव्य दुरूह होकर भी उनके संबंध् में असंख्य दंतकथाओं, लोककथाओं और प्रवादों का जुड़ जाना उनके प्रखर और प्रभावी व्यक्तित्व का परिचायक है।’
    साखी (सबदी) और पद के अंतर्गत गोरखबानी को प्रस्तुत किया गया है। मूल के साथ सरल अर्थ भी है, जो पाठक के लिए उपयोगी है। गोरखनाथ के जीवन दर्शन को समझने के लिए इसका पाठ नितांत आवश्यक है। अनेक विद्वानों ने कबीर आदि परवर्ती संतों पर गोरखनाथ के प्रभाव का उल्लेख किया है, जो सर्वथा उचित है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajee Seth
    Raji Seth
    230 207

    Item Code: #KGP-798

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी...?', 'अपने दायरे', 'ठहरो, इन्तजार हुसैन', 'उतनी दूर' तथा 'यह कहानी नहीं'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजी सेठ की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal (Paperback)
    Indira Mishra
    180

    Item Code: #KGP-410

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
    --राजेश जैन
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar
    Ramdhari Singh Diwakar
    250 225

    Item Code: #KGP-8006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    रामधारी सिंह दिवाकर

    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।

    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।

    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार', 'खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानी', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पुल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।

    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Antarmilan Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 280

    Item Code: #KGP-754

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    प्रस्तुत कहानियाँ मैंने विशाल भारतीय पौराणिक साहित्य में से चुनी हैं। इनको मैंने इसलिए लिखा कि इनमें मुझे इतिहास की बहुत-सी गुत्थियाँ सुलझती मिलीं। हमारी संस्कृति में एक ही स्रोत की प्रेरणा नहींहै। महाभारत युद्ध के बाद से गौतम बुद्ध तक, फिर गौतम बुद्ध से गुप्त सम्राटों के काल तक, निरंतर भारत में जातियों का अंतर्मिलन चला। इन दो दौरों में-
    पहली बार-आर्य, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, गरुड़, पिशाच, असुर तथा अनेक जातियाँ परस्पर घुल-मिल गईं। इनके मिलन से इनके देवता भी परस्पर मिल गए। विष्णु, शिव, गरुड़, पार्वती, वासुकि, कुबेर, पुलस्त्य, वृत्र, शाक्त इत्यादि भी परस्पर मैत्री भाव से स्थित हुए।
    दूसरी बार-भारत में यवन, शक, कुषाण, पहलव इत्यादि जातियाँ आईं, जो भी भारत में घुल-मिल गईं।
    यहाँ मैंने पहले दौर के अंतर्मिलन को प्रकट करने वाली कथाएँ रखी हैं, जो प्रकट करती हैं कि हिंदू धर्म कितनी व्यापक भूमि पर बना था।
    -रांगेय राघव

  • Kharra Aur Anya Kahaniyan
    Subhash Sharma
    460 368

    Item Code: #KGP-9366

    Availability: In stock

    ‘आजादी! वह भी औरतों की! क्या होती है यह आजादी? इसका रंग क्या होता है? बू क्या होती है? स्वाद क्या होता है? काश, एक बार मिल जाती तो मैं उसे छूकर, सूंघकर, चखकर देखती। फिर उसे पकड़कर कलेजे से भींचकर रोती...।’—प्रस्तुत कहानी संग्रह खर्रा और अन्य कहानियां की कहानी ‘कुहुकि कुहुकि जिया जाय’ की इन पंक्तियों में जो प्रश्नाकुलता है, वह बहुत मूल्यवान है। कोई भी रचना यदि सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की सभी कहानियां समकालीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को बड़े परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के लेखक सुभाष शर्मा यथार्थवादी लेखक हैं। कहानी में कथानक, सामाजिक सरोकार, विवरणधर्मिता और युक्तिसंगत समापन में उनका भरोसा है। यही कारण है कि सुभाष की कहानियां बेहद पठनीय हैं और पाठक की चेतना को झकझोरती हैं।
    इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां व्यवस्था और सत्ता के भीतरी सच को बयान करती हैं। अनेक कहानियां शिक्षा तंत्र के तहखानों को रोशनी में लाती हैं। योग्यता, अवसर और दायित्व का उपहास करती स्थितियों व मनोवृत्तियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ कहानीकार ने उजागर किया है। इस संग्रह में स्त्री के  संघर्षमय संसार को चित्रित किया गया है। बिना किसी विमर्श के जाल में उलझे हुए लेखक ने स्मरणीय कहानियां लिखी हैं।
    ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि बिना लाउड हुए या बिना प्रचारात्मक हुए सुभाष शर्मा ने वर्तमान राजनीति के बहुलांश चरित्र को कहानियों में उतार दिया है। इस चरित्र को चित्रित करने में लेखक की अर्थगर्भित भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘दास्तान-ए-सुबूत’ में लेखक कहता है, ‘पहले कार्यकाल में वह जान गए थे कि खजाना कहां-कहां है। चुनाव, मुकदमा, राजनीतिक षड्यंत्र आदि में जितना खर्च हुआ था, उसकी भरपाई उन्होंने सुपरसोनिक गति से करना शुरू कर दिया।’ ऐसी व्यंजक भाषा में रची गईं ये कहानियां यथार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ निश्चित रूप से एक पठनीय और उल्लेखनीय कहानी संग्रह है।
  • Abhi Shesh Hai
    Mahip Singh
    350 291

    Item Code: #KGP-746

    Availability: In stock

    स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास का वह एक ऐसा कालखंड था, जब निकट अतीत की व्यक्तिवादी, भ्रष्ट एवं सर्वसत्तावादी निरंकुश प्रवृत्तियाँ चरम पर पहुँच गई थीं और लोकतंत्र आधी रात को किसी भी दरवाजे पर पड़ने वाली दस्तक के आतंक से सहमा हुआ था।

    उस दौर में कुछ आवाजें बिना बोले भी बहुत कुछ कह रही थीं।

    ...और कैसे जी रहा था देश का आम आदमी ?

    ...वह आम आदमीजो देश के विभाजन की भयावह स्मृतियाँ लिए द्विभाजित मानसिकता में जीने को अभिशप्त था।

    ...और वह आम आदमी, जो पाश्चात्य देशों को स्वर्ग मान बैठा था।

    महाकाव्यात्मक आयाम लिए उस कालखंड के भारतीय समाज की कथाजिसमें इतिहास के साथ-साथ भविष्यदृष्टि भी विद्यमान है।

  • Chintan Karen Chintan Mukt Rahen
    Swed Marten
    250 213

    Item Code: #KGP-279

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं ।
  • Swatantarata Sangharsh Ka Itihaas
    Hazari Prasad Dwivedi
    100

    Item Code: #KGP-1061

    Availability: In stock

    स्व. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक गं्रथों द्वारा हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की है। उन्होंने जहां एक तरफ अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना की वहीं दूसरी तरफ शोधपरक ग्रंथों की। निबंध-लेखन के क्षेत्रा में भी उन्होंने ललित निबंधों के सृजन द्वारा हिंदी को अत्यंत सुंदर निबंध दिए। प्रस्तुत पुस्तक स्व. आचार्य द्विवेदी के चिंतन को समझने में एक महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करती है। सैकड़ों साल की गुलामी से सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ था। भारत के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। जागरूक एवं संवेदनशील साहित्यकार इस घटना की उपेक्षा नहीं कर सकता था। स्व. आचार्य जी ने स्वतंत्रता-संघर्ष के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसमें नामांे की भरमार नहीं है। यह उनकी अपनी दृष्टि थी। इस पुस्तक का रचनाकाल सन् 1948 के बरी है। इसमें हमने किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया है। नई पीढ़ी को हमारी यह एक विनम्र भेंट है।
    —मुकुंद द्विवेदी
  • Kuchh Alag
    Pushpa Rahi
    200 170

    Item Code: #KGP-9262

    Availability: In stock

    मैं जब अपनी कविताएं पढ़ रही थी तब मुझे यह लगा कि ये मेरे मन की उड़ान से अधिक मेरे अनुभवों की यथार्थता के अधिक निकट हैं। कविता लिखते समय मेरा मूड एक कवयित्री से भी अधिक एक डायरी लेखक जैसा होने लगा है। अब मन नहीं होता कि अपने से या किसी भी चीज से आंख चुराएं। मन होता है कि कविता लिखते समय वास्तविकता की आंखों में आंखें गड़ाए रहें। बढ़ती उम्र के साथ-साथ कल्पना के पंख उखड़ चुके हैं और आकाश में उड़ने की बजाय धरती पर चलना कभी तेज कदमों से और कभी पांव रगड़ते हुए अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है। 
    कभी गीतों को मैंने अभिव्यक्ति के माध्यम से रूप में इस्तेमाल किया था, अब जीवनानुभव, कटु अथवा मधुर, मेरा अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में प्रयोग कर रहे हैं। इसीलिए इन कविताओं में मैं पहले की कविताओं की अपेक्षा ज्यादा मौजूद हूं। और अनुभव भी कैसे? कोई असाधारण नहीं। वैसे ही जैसे आम आदमी को जीवन में होते रहते हैं।
    —भूमिका से
  • Idannamam
    Maitreyi Pushpa
    550 385

    Item Code: #kgp-2003

    Availability: In stock

    इदन्नमम
    समकालीन कथा-लेखन में सक्रिय एक सशक्त हस्ताक्षर मैत्रेयी  पुष्पा की कलम से निकली औपन्यासिक कृति इदन्नमम से बुनी गई है तीन पीढियों की बेहद सहज और संवेदनशील कहानी । कहानी जो बऊ (दादी), प्रेम (माँ) और सदा (उपन्यास की नायिका)--तीनों को समानांतर रखने के साथ-साथ, एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा भी करती है । विरोधाभास की इस प्रतीति को लेखिका ने सक्षमता, सूक्ष्मता और पारदर्शी भाषाजाल से बुना है, जो अत्यंत पठनीय है और अपने स्वर में मौलिक भी।
    इदन्नमम के आँचल से छिपा है विंध्य का अंचल । विंध्य की पहाडियों से घिरे वर्णित गांव श्यामली और सोनपुरा के जन-जीवन की जीवंत धड़कनों को यह उपन्यास सांस-दर-सांस कहना है और पाठक को लगता है मानो यह पूरे अंचल में कदम-कदम चल रहा है । इन गाँवों में-अंचल से धूल है, नदी है, पर्व  है, गीत है, आहें-कराहें हैं, सत-असत है और है रूढियों और परंपराओं की भरी-पूरी दुनिया । उपन्यास के अंचल की इस दुनिया से आकांक्षा है, ईषर्या है और उन पर झपटते भेड़िये हैं, उन्हें त्यागते 'साधु' हैं तथा हैं हाढ़-मांस के सौ फीसदी पात्र ! शोषित होने से इंकार करते ये पात्र इस उपन्यास की अतिरिक्त विशेषता हैं ।
    वरिष्ट कथाकार राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहें तो इदन्नमम में "मिट्ठी-पत्थर के ढोकों या उसी डालियों और खुरदुरी छाल के आसपास की सावधान छटाई करके सजीव आकृतियाँ उकेर लेने की अद्भुत निगाह हैं लगभग "रेणु" की याद दिलाती हुई ।"
    वास्तव में घनीभूत संवेदना और भावनात्मक लगाव से लिखी गई इदन्नमम की कहानी समकालीन हिंदी उपन्यास जगत् में एक घटना है, जिसका स्वागत किया जाना अभीष्ट है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    200

    Item Code: #KGP-766

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshaatkaar : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    400 320

    Item Code: #KGP-629

    Availability: In stock


  • Aapki Pratiksha
    Shyam Vimal
    270 238

    Item Code: #KGP-555

    Availability: In stock

    आपकी प्रतीक्षा
    सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
    जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
    उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
    ‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
    परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
    क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
    अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’
  • Sahitya : Vividh Vidhayen
    Shashi Sahgal
    240 216

    Item Code: #KGP-755

    Availability: In stock

    साहित्य: विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Priyakant
    Pratap Sehgal
    160 144

    Item Code: #KGP-2043

    Availability: In stock

    प्रियकांत
    प्रताप सहगल उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने अपने लड़कपन से ही दिल्ली नगर को महानगर और महानगर को सर्वदेशीय नगर (Cosmopolitan City) बनते हुए देखा है। इस बदलाव के साथ जुड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक पहलुओं के बदलते रंगों को भी महसूस किया है। इन बदलते रंगों के साथ बदलते वैयक्तिक संबंधों और मूल्य-मानों पर उनकी पैनी निगाह रहती है। इसीलिए उनके लेखन में निरा वर्णन नहीं होता, बल्कि उसके साथ समय के कई सवाल जुड़े रहते हैं। कभी यथार्थ के धरातल पर तो कभी दर्शन के स्तर पर ।
    उनका नया उपन्यास 'प्रियकांत' भी कोई अपवाद नहीं है। पिछले तीस-चालीस सालों में धर्म का व्यापारीकरण और बाजारीकरण हुआ है। इसके लिए आम-जन को अपने परोसने के लिए धर्म के नए-नए मंच बने और नए-नए धर्मगुरु तथा धर्माचार्य फिल्मी सितारों की तरह चमकने लगे।
    'प्रियकांत' एक ऐसे ही धर्माचार्य के उदय और उसके साथ जुड़ी महत्वाकांक्षाओं और विसंगतियों की कथा है। पात्र पौराणिक हो, ऐतिहासिक हों या समकालीन-प्रताप सहगल की नज़र हमेशा उनके माध्यम से समय के साथ मुठभेड़ मर ही रहती है। और इस उपन्यास में भी धर्म, धर्मगुरु, ज्ञान एवं अनुभव से जुड़े कुछ सवाल ही रेखांकित होते हैं...शेखर, नीहार और गुलशन के साथ...आप पढ़ेंगे तो आपको भी लगेगा कि इस कथा में आप भी कहीं न कहीं ज़रूर हैं।
  • Premchand Kee Kahaniyon Kaa Kaalkramanusar Adhyayan
    Kamal Kishore Goyenka
    1100 770

    Item Code: #KGP-671

    Availability: In stock

    प्रेमचंद पराधीन भारत के स्वाधीनताकामी कालजयी कहानीकार हैं। वे विराट् भारतीय जीवन के महागाथाकार हैं तथा उनकी कथा-सृष्टि में महाकाव्यीय चेतना है। वे भारत राष्ट्र एवं स्वराज्य, भारतीय विवेक एवं अस्मिता तथा भारतीय चेतना एवं भारतीयता के कथाकार हैं। प्रेमचंद कथाकार के रूप में वाल्मीकि, व्यास, तुलसीदास, कबीर, भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में आते हैं। ये देश के ऐसे राष्ट्रीय साहित्यकार हैं, जिन्होंने उच्च कोटि के मानवीय जीवन-मूल्यों, आत्म-बोध, स्वत्व तथा अस्मिता की प्रतिष्ठा तथा रक्षा करके भारतीयता को स्वरूप प्रदान करके उसे भारत की आत्मा के रूप में सदैव के लिए प्रतिष्ठित कर दिया। प्रेमचंद का कहानीकार इसी भारतीयता का अन्वेषक, उद्घोषक तथा प्रस्थापक है। प्रेमचंद की कहानी-यात्रा में प्रमुखतः राष्ट्रीय-सांस्कृतिक नवजागरण, गांधीवाद, कभी-कभी माकर्स का साम्यवाद, भारत का अद्वैत-दर्शन इत्यादि उनकी इस यात्रा को अपनी-अपनी दर्शन-दृष्टि के अनुसार आलोकित करते हैं, परंतु प्रेमचंद सभी को अपने भारतीय भाव एवं विवेक से देखते और ग्रहण करते हैं और देश-संस्कृति-मानवता के अनुकूल तत्त्वों को ग्रहण करके अपनी भारतीयता में संग्रथित-संश्लिष्ट करके पराधीन भारत को मुक्ति का एक संदेश तथा एक स्वप्न देते हैं। प्रेमचंद की कालक्रमानुसार कहानी-यात्रा को इस पुस्तक में इसी दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया है। यदि हम भारत को ‘इंडिया’ के स्थान पर ‘भारत’ बनाए रखना चाहते हैं तो प्रेमचंद के कहानी-संसार की मूल आत्मा भारतीयता को अपने राष्ट्रीय-सांस्कृतिक जीवन का अंग बनाना होगा।
    प्रेमचंद की कहानियों के कालक्रमानुसार अध्ययन का यह पहला प्रयास है। इससे पूर्व किसी आलोचक ने न तो इस दृष्टि से सोचा है और न कहानियों को कालक्रम में पढ़ने तथा परखने की ही चेष्टा की है। 
    यहां तक कि हिंदी का कोई आलोचक यह दावा नहीं कर सकता कि उसने प्रेमचंद की कहानियों पर जो कुछ लिखा है, वह उनकी संपूर्ण कहानियों के अध्ययन के बाद ही लिखा है। जिन आलोचकों ने ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों की कहानियों को अध्ययन का आधार बनाया है, वे भी उनमें संकलित 203 कहानियों तक ही सीमित रहे हैं और लगभग 95 कहानियां उनकी पकड़ से बाहर रही हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों में भी कहानियां कालक्रमानुसार संकलित नहीं हैं, अतः किसी भी आलोचक के कालक्रम से कहानियों के अध्ययन की कोई संभावना भी नहीं रह गई थी। अतः कहानियों पर दिए गए उनके निष्कर्ष एवं आलोचनात्मक अवधरणाएं भी निर्मूल, निरर्थक तथा भ्रमोत्पादक बनकर रह जाती हैं।
    ‘प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन’—यह पहला प्रामाणिक अध्ययन है, जो प्रत्येक कहानी को कालक्रम में देखता और परखता है तथा कहानी के पूर्वापर संबंधें के रहस्यों को भी उद्घाटित करता है। कोई भी कहानी हो, श्रेष्ठ या साधरण, अच्छी या बुरी, उसे इस अध्ययन में समान रूप से महत्त्व दिया गया है और कहानी की संवेदना, उसकी आत्मा तथा लेखकीय दृष्टिकोण का विवेचन किया गया है और इस प्रकार उनकी उपलब्ध 298 कहानियों की रचना-प्रक्रिया, उनकी मूल चेतना, उनके युग-संदर्भ तथा लेखकीय अभिप्रेत की, कहानी के पाठ के आधार पर, समीक्षा की गई है तथा पुरानी मान्यताओं की परीक्षा के साथ कुछ नई अवधारणाएं स्थापित की गई हैं, किंतु यह काम प्रमाणों तथा तथ्यों एवं तर्कों के आधर पर किया गया है।...
    अतः मेरा विश्वास है कि यह अध्ययन पाठकों को एक नए प्रेमचंद से परिचित कराएगा, जिसे इससे पूर्व न तो खोजा गया था, न देखा गया था, बल्कि उसे दबा दिया गया था।
    –भूमिका से
  • Yugdhvani
    Bal Swaroop Raahi
    250 225

    Item Code: #KGP-807

    Availability: In stock

    लोकप्रियता की युगधवनि
    बालस्वरूप राही की ये कविताएं उस यादगार दौर की कविताए हैं, जब कविता के पाठक तथा श्रोता रसज्ञ तथा संवेदनशील हुआ करते थे और युवक-युवतियों में विशेष रूप से कविता के प्रति गहरा लगाव होता था। इन कविताओं को पढ़-पढ़ कर प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे कविता-प्रेम भी पुन: युवा को जाया करते थे। आज को लगभग पांच दशक पहले भी राही की रुबाइयों, ग़ज़लों, गीतों तथा लम्बी कविताओं में यही खूबी थी। इन पंक्तियों के लेखक ने वह ज़माना देखा है, जब मंच से सुनाए जाने पर ये कविताएं श्रोताओं के मन-प्राण पर अंकित हो जाया करती थीं और उन की डायरियों में दर्ज हो जाती थीं। घनघोर रूप से पसन्द की जाने वाली उन की अनेक कविताएं देश- भर में काव्य-प्रेमियों को कंठस्थ है ।
    प्रसन्नता की बात है कि राही की ऐसी विविध आयामी परम लोकप्रिय कविताएं, जो अब तक उन के किसी संकलन में नहीं आई थीं और कविता-प्रेमियों  द्वारा जिन के प्रकाशन की मांग निरन्तर की जा रही थी, अब पुस्तकाकार प्रकाशित हो रही हैं।
    देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओँ में एक के बाद एक प्रकाशित होने वाली ये अविस्मरणीय कविताएं न केवल राही की लम्बी सार्थक काव्य-यात्रा में मील के पत्थर के समान हैं, वरन् पिछले पांच दशकों में हिन्दी-कविता के बदलते रूप-रंग तथा मिजाज़ की भी पुख्ता पहचान कराती हैं।
    राही का यह अनूठा काव्य-संकलन 'युगध्वनि' हिन्दी कविता की लोकप्रियता के इतिहास को समझने के इच्छाओं तथा काव्य-प्रेमियों के लिए सचमुच एक तोहफे के समान है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    100

    Item Code: #KGP-7196

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Prati Shurti
    Shree Naresh Mehta
    350 291

    Item Code: #KGP-1955

    Availability: In stock

    प्रति श्रुति : श्रीनरेश मेहता की समय कहानियाँ 
    श्रीनरेश मेहता का कथा-गद्य, जैनेंद्र और अज्ञेय की परंपरा मेँ रखकर देखा जाए तो समाज और अध्यात्म, राष्ट्र और राजनीति, जीवन और दर्शन से संपृक्त वाद्य है । वे न तो जैनेंद्र का प्रतिबिंब बने और न ही अज्ञेय की छाया । उन्होंने सर्वथा स्वायत्त और स्वाधीन कथा साहित्य लिखा जिसमें काव्यात्मक रस भी है और जिसका आस्वाद हमारे सामाजिक और संस्कृतिक भाव-बौधों को प्रगल्भ भी बनाता है। श्री मेहता जी की भाव-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और जीवन-दृष्टि उनके कथा-गद्य में जिस प्रकार प्रकट हुई है उससे लगता है कि श्रीनरेश जी ने नई कथा-भाषा रचकर हिंदी को एक सांस्कृतिक शक्ति का लोक संस्करण सौंपा है। भाषा अपनी सर्जनात्मक शक्ति में जब सार्थक होती है तो वह स्वयं ही समाज और संस्कृति को अपने में समा लेती है । श्रीनरेश जी ने अपने कथा-शिल्प से भाषा की संभावनाओं को विराट बनाया, गद्य की एक नई शैली विकसित की और यह सिद्ध किया कि एक जीवंत भाषा और सजीव भाषा किस पवार अपनी सांस्कृतिकता और आंचलिक नास्टिलजिया को एक साथ एकाकार कर सकती है । श्रीनरेश जी का समूचा गद्य-साहित्य और विशेष रूप से कथा-साहित्य अपने ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों ही परिप्रेक्ष्यों में गहन शोध और विमर्श की माँग करता है । एक कवि और सर्जक को मात्र 'वैष्णव' कहकर ब्रांड नाम से सज्जित कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी वैष्णवता के पीडालोक को किसी गांधी की तरह बाहर निकाल नरसिंह मेहता के गीत 'वैष्णव जन' की तरह लोकव्यापी बनाना होगा । श्रीनरेश मेहता जैसा सर्जक अतीत की इतिहास-वस्तु बनकर, वर्तमान की संज्ञा से पृथक नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनकी सर्जन-यात्रा की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हिंदी मानस उनमें निहित समस्त संभावनाओं को समय स्मृति और अवकाश तीनो में रखकर एक ऐसे श्रीनरेश मेहता का अन्वेषण करे जो हिंदी साहित्य की चेतना का नरेश हो, सृजन की उस्कृष्टता का प्रतिमान हो और अपनी सांस्कृतिक सामाजिकता का अद्वितीय उदाहरण हो ।
  • Aate Jaate Om Shwaas Mein
    J.P. Sharma
    75

    Item Code: #KGP-1446

    Availability: In stock

    मैंने ‘आते-जाते ओम् स्वास में’ का अध्ययन किया है और यह स्पष्ट रूप से सीखा है कि ओम् श्वास के साथ भीतर जाते हैं, हृदय और पूरे तन को झंकृत करते हैं श्वास के बाहर जाते हलंत ‘म्’ नासिका के बालों के जाल में छनकर बाहर जाते हें। अद्भुत दिव्य संगीत की ध्वनि प्रतिध्वनित होती है। स्पष्ट काव्य-रूप में लिखा है कि ओम् यही से लिया गया है-
    हर पल है अनुभूति श्वास में,
    ‘ओ’ भीतर औ’ म् बाहर हैं।
    ओम् उच्चरित होते भीतर,
    साकारी में निराकार हैं।
    ओम् श्वास से लिए गए हैं,
    स्वाभाविक प्राकृतिक रूप।
    सब धर्मों में सदा मान्यता,
    रंक, भूप में यही अनूप।
    —डाॅ. हर्षवर्धन
  • Mousi Ne Kahi Kahani
    Varsha Das
    140 126

    Item Code: #KGP-9303

    Availability: In stock


  • Bindu-Bindu Vichar (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    190

    Item Code: #KGP-457

    Availability: In stock

    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की, पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है ।
    -पुस्तक से
  • The Lost Identity (Novel)
    Troy Bond
    745 559

    Item Code: #KGP-341

    Availability: In stock

    After the tragic death of his son, all the American wants is to live a quiet life in a sleepy tourist town in northern Italy. But his solace is shattered when British agents locate him to break the news that his friend from college, Oxford Professor Paul Ross, was killed in a car bombing.
    The agents believe Dr. Ross was murdered after he discovered the “Text of Akbar”, a mysterious collection of 2,000-year-old Sanskrit fragments, which could hold the key to the entire Christian faith.
    To find Dr. Ross’s killer, the agents want the expat to assume the identity of his dead friend at an auction of rare books soon to be held at a faraway palace in India. The last Maharaja of Naipurna is hosting a group of religion scholars from around the world for this chance-of-a- lifetime event.
    Out of sympathy for Dr. Ross’s widow, the expat reluctantly agrees to travel to the remote desert city where his three-day assignment spirals into a nightmare of danger and intrigue.
    Arriving at the grim and sinister Ganesha’s Palace, the new Dr. Ross is a marked man. He’s in far more danger than he anticipated when he learns his fellow guests at the palace are consumed with being the first to acquire the Text of Akbar . . . and one of them will gladly kill for that chance.

  • Mahaan Sant Raidas
    Hari Krishna Devsare
    150

    Item Code: #KGP-208

    Availability: In stock


  • Naav Doobne Se Nahin Darati
    Leena Malhotra
    200 180

    Item Code: #KGP-423

    Availability: In stock

    कभी-कभी तो ऐसा लगता है, प्रगतिशील कवियों ने बात-बात पर तन जाने वाली जो बेटियाँ साहित्य को दीं, बड़ी होकर वे सब लीना-जैसी (मीठी फटकार लगाने और सात्त्विक आक्रोश दिखाने में निपुण) स्त्री-कवि बन गईं। 
    लीना और फटकार? एक झलक में बात बनती नहीं जान पड़ती! इतनी संजीदा लड़की और फटकार? ये तो भरमुँह किसी से बोलतीं भी नहीं। ये नहीं बोलतीं पर इनकी कविताएँ तो बोलती हैं न-आपके मन पर पड़ी सब चट्टानों की आखिरी परत तक से इनका दो-टूक संवाद हो जाता है, और उनकी फॉसिलों में दबके पड़े स्नेह के सोते एकदम से फूट जाते हैं। 
    एक महीन अर्थ में प्रायः सारी कविताएँ राजनीतिक हैं-हर अन्याय को तमाशे की तरह देखते, आपके ही भीतर छुपे उस टुच्चे आदमी को धता बतातीं कविताएँ जिसे एक प्रगतिसिद्ध कवि बरजता रहा था: कभी अभिधा, कभी व्यंजना, कभी लक्षणा में! लीना में व्यंजना का स्वर अधिक प्रबल है और सबसे बड़ी बात ये है कि शायद ही कहीं वे इकहरी होती हैं! लीना-जैसी सांद्र ऐंद्रिकता की प्रेम- कविताएँ भी कम ही स्त्री-कवियों ने लिखी हैं। स्त्री-नागरिकता और स्त्री-फैंटेसी के अनेक रंग आपको इस संग्रह में एक साथ मिलेंगे।  
    -अनामिका
  • Mere Saakshatkaar : Manager Pandey
    Manager Pandey
    125

    Item Code: #KGP-541

    Availability: In stock


  • Mahaan Ganitagya Aryabhat
    Vishv Nath Gupta
    90

    Item Code: #KGP-1879

    Availability: In stock


  • Hindi Sahitya Ka Itihas (Paperback)
    Hemant Kukreti
    350 298

    Item Code: #KGP-511

    Availability: In stock

    ‘साहित्य के बेहतर इतिहास में तथ्यों का वस्तुनिष्ठ परीक्षण और पूर्वग्रहरहित विश्लेषण होता है।’ ‘महान साहित्य अपने समय के प्रश्नों और समाज से अलग नहीं होता और न रचनाकार का विवेक इतिहास से स्वायत्त होता है।’ ‘एक अच्छे इतिहास में भाषा और साहित्य की सांस्कृतिक परंपरा, लेखकीय रचनात्मकता का विश्लेषण, देशकाल वातावरण के द्वंद्व और घात-प्रतिघात का संतुलित विश्लेषण किया जाता है। इतिहास लेखन में विकासवादी नजरिया और वैज्ञानिक प्रस्तुति होनी चाहिए।’ हेमंत कुकरेती की ये उपर्युक्त पंक्तियां उनके साहित्य इतिहासबोध को स्पष्ट करती हैं।
    यह अब तक प्रकाशित हिंदी साहित्य का सबसे अद्यतन इतिहास है। हिंदी गीत, गजल इत्यादि से लेकर पत्रकारिता, तमाम गद्य-विधएं, स्त्री एवं दलित विमर्श एवं लेखन के विकास का विश्लेषण किया गया है। इस मायने में यह हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य शुक्ल, द्विवेदी जी, डाॅ. रामविलास शर्मा इत्यादि की परंपरा को आगे बढ़ाता है।
  • Shri Arvind
    Chandrika Prasad Sharma
    190

    Item Code: #KGP-130

    Availability: In stock

    भारतीय मनीषा की विशिष्ट गरिमा और गौरव को संसार ने प्राचीन काल से ही स्वीकारा है । भारत का अध्यात्म, योग, दर्शन और साहित्य अपने वैभव का प्रभाव सर्वत्र प्रस्तुत करता रहा है । यहाँ के विज्ञान ने विभिन्न क्षेत्रों में अपना विशेष प्रभाव प्रदर्शित  किया है ।
    भारतीय योग विद्या के विभिन्न चमत्कारों की प्रशंसा विदेशियों  ने मुक्त कंठ से की है । हमारा प्राचीन योग आज भी बडी उत्सुकता और चाव के साथ विदेशों में अपनाया जा रहा  है। अनेक विदेशी भारत आकर योग विद्या का व्यावहारिक और सैद्धांतिक अध्ययन करने में रत हैं ।
    महान् योगी महर्षि श्री अरविन्द के जीवन-काल में ही विदेश के अनेक विद्वान, उनके रहस्यों को जानने के लिए उत्सुक थे । आज भी देशी और विदेशी आचार्य उनके रहस्यमय जीवन के गुह्य  तत्त्वों पर शोध-कार्य कर रहे  ।
    योगिराज अरविन्द का जीवन विभिन्न विलक्षण रहस्यों से युक्त था । वे समाधि विज्ञान  सिद्ध महापुरुष थे । उनका जीवन राष्ट्रहित के लिए समर्पित था । भारतीय राष्ट्रवाद के वे पक्षधर थे । उनका अदभुत एवं विलक्षण व्यक्तित्व चिंतन, मनन, साधना और तपश्चर्या में व्यतीत हुआ ।
  • Mere Saakshatkaar : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    350 280

    Item Code: #KGP-713

    Availability: In stock


  • Vaigyonikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #Kgp-vkb

    Availability: In stock


  • Tabdeel Nigahein
    Maitreyi Pushpa
    300 255

    Item Code: #KGP-396

    Availability: In stock

    तबदील निगाहें
    किसी भी व्यक्ति, विषय या कृति के संबंध में जो सिद्धांत, मान्यताएं और अवधारणाएं, वर्षों या सदियों पहले सही मान ली गई थीं, जरूरी नहीं कि हर युग में उनको उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समय और परिस्थितियों से उपजे सवाल, उसे अपने मानकों पर कसते हैं। हालांकि सच यह भी है कि साहित्य और समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताओं और प्रतिमानों को खंडित करने का साहस यदा-कदा ही किया जाता है, क्योंकि बहुजन के दबाव और विरोध को सहकर अपनी बात कहने से प्रायः बुद्धिजीवी लोग बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बावजूद इसके कुछ रचनाकार अपवाद रहे हैं।
    सच को पूरे साहस से कहने वाली रचनाकारों में सम्मिलित मैत्रेयी पुष्पा ने इस पुस्तक के संकलित लेखों में कुछ ऐसा ही प्रयास किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गोदान’, ‘चित्रालेखा’, ‘धु्रवस्वामिनी’, ‘त्यागपत्र’, ‘मैला आंचल’ और ‘राग दरबारी’ जैसी अपने समय की कालजयी रचनाओं को बिलकुल अलग निगाह से देखतीं और उसके स्त्री-पात्रों के मन में सोए पड़े सवालों को उघाड़कर उन्होंने एक नई बहस को आधार प्रदान किया है। इन कृतियों के संदर्भ में लेखिका द्वारा उठाए गए सवाल, न केवल पढ़ने वाले को बेचैन कर सकते हैं बल्कि इन्हें नए तरह से तबदील निगाहों के जरिए पुनर्मूल्यांकित करने की मांग भी करते हैं। 
    कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके और कुछ अवसरों पर दिए गए इन वक्तव्यों में मैत्रेयी पुष्पा के भीतर की आलोचकीय दृष्टि भी सघन रूप से प्रकट हुई है। बनी-बनाई धारणाओं और अपनी कूपमंडूकता में आनंदित रहने वाले आलोचकों के लिए यह पुस्तक एक सबक की तरह हो सकती है।
    –विज्ञान भूषण
  • Vaksh Shila
    Sunil Gangopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-2008

    Availability: In stock

    वक्ष-शिला
    'वक्ष-शिला' पढ़ने का अर्थ है एक पुरे इतिहास से गुजरना । सातवें दशक  में पश्चिम बंगाल, बिहार आदि राज्यों में नक्सलवाद की जो तीव्र आंधी, चली थी, उसमें जिस तरह हजारों युवकों को बलि चढी थी, उसका साक्षी इतिहास है और उस इतिहास का एक अंश है यह उपन्यास । प्रसिद्ध बांग्ला क्याकार सुनील गंगोपाध्याय ने उस समय को, उस काल की स्थितियों को, युवा मन की भावनाओं को, राजनीति को लेकर इस उपन्यास का जो रोचक ताना-बाना बुना है, वह अदभुत है । यह उपन्यास प्रमाणित करता है कि एक औपन्यासिक जाते के माध्यम से किसी विशेष कालखंड को कितनी गहनता से प्रस्तुत किया जा सकता है ।
    'नक्सलवाद' वैचारिक धरातल पर बहुत सारे प्रश्न छोड़ गया है, आज भी हम उन प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं निकले हैं, किंतु इस उपन्यास में अनेक प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सबत्ते हैं जो उस आंदोलन को समझने में मदद करते हैं ।
    अनूठी शैली, रोचक भाषा और नये धरातल पर खडी कथा के कारण यह उपन्यास अपना एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ता है ।
  • Jhooth Nahin Bolta Itihaas
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    250 225

    Item Code: #KGP-579

    Availability: In stock

    झूठ नहीं बोलता इतिहास 
    इतिहास झूठ नहीं बोलता, यह सच है; लेकिन प्रायः इतिहासकार झूठ बोल जाते हैं, क्योंकि इतिहास लिखने वाले पहले भी दरबारी होते थे चारण, भाट और राजकवि, और आज भी दरबारी होते हैं कुछ प्रत्यक्ष तो कुछ परोक्ष । सत्ता-प्रतिष्ठान का वरदहस्त तो उन्हें मिला ही होता है । इसलिए इतिहास में वही सब कुछ लिखा जाता है, जो सत्ता चाहती है । हां, इतना अवश्य है कि किसी-किसी इतिहास लेखक का जमीर कभी-कभी उसे इस बात की गवाही नहीं देता था कि वह झूठ की मक्खी को जानते-बुझते निगल ले । इसलिए वह घटनाओं के बीच 'गैप' या 'संकेत' छोड़ देता है, जो घटना के दूसरे पक्ष को उजागर कर सके । इन्हीं 'गैप' या 'संकेतों' को पढ़ने को अंग्रेजी में 'बिटवीनस दी लाइंस' पढ़ना कहा गया है । इसी तरह 'बिटवीनस न लाइंस' पढ़ने की कोशिश से जन्मी हैं प्रस्तुत संकलन की रचनाएं । 
    प्रस्तुत संकलन को  रचनाओ में इतिहास की ज्ञात, अज्ञात और अल्पज्ञात रोचक घटनाओं  आलेख  हैं जो प्रमाणित हैं, जिनके स्रोत और संदर्भ यथास्थान दिए गए हैं ।
    हालांकि सभी रचनाएँ इतिहास से जुड़ी हैं फिर भी कुछ रचनाएं चमत्कारों से संबंधिन हैं जो यह बताती हैं कि प्रकृति के नियमों के बारे में जितना इम समझे हुए हैं, शायद उतना पर्याप्त नहीं हैं, । कुछ रचनाएँ गुप्तचरी को किंवदंतियां बनी गुप्तचर युवतियो माताहारी, नूर इनायत और तेनिया पर हैं, जो अद्यतन जानकारी लिए हुए हैं, जैसे माताहारी तो जासूस थी ही नहीं ।
    एक आलेख टावर ऑव लंदन की लेकर, जिसमें ब्रिटेन के छह सौ साल के इतिहास का क्रूरतम चेहरा दफन है । एक आलेख नेपोलियन के उस चेहरे का बेनकाब करता है, जो उनसे  प्रजातंत्र के नाम पर ओढ़ रखा था । चर्च के अंधे धर्माधिकरण  न सत्य की खोज करने वाले वैज्ञानिकों को किस तरह जिंदा  जलवा दिया, यह भी जानना रोमांचक है ।
    आलेखों की वस्तुगत विविधना लेखक के बहुपठित और  बहुविज्ञ होने को प्रमाणित ना करती ही है, साथ ही भाषा पर उसकी पकड़ और शैली की प्रवाहमय सहज सरलता पाठक को अभिभूत किए बिना नहीं रहती।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 4
    Dr. Prem Bharti
    195

    Item Code: #KGP-267

    Availability: In stock

    नैतिक शिक्षा का प्रत्यक्ष पाठ बचपन में माता-पिता से तथा विद्यालयों में गुरुजनों के सान्निध्य में बैठकर मिलता है । धीरे-धीरे समझ विकसित होने पर धर्म और संस्कृति द्धारा भी हमें नैतिक शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष स्वाध्याय के माध्यम से सीखने को मिलता है । फिर समाज और राष्ट्र के लिए किए गए सेवा-कार्यों के लिए समर्पण के प्रति हमारे मन में जो भावना निरंतर उठती रहती है, उससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी नैतिक शिक्षा के संबंध में धारणा कितनी व्यावहारिक है।
    माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति बढ़ती अश्रद्धा, वैज्ञानिक दुष्टिकोण
    के नाम पर धर्म एव संस्कृति के प्रति घटती निष्ठा ने नैतिक शिक्षा को
    विवादों के घेरे में ला दिया है। सरकार द्वारा पाठयक्रम में भले ही उसे
    पढाने का संकेत दिया जाता रहा है, किन्तु ऐसे कितने शिक्षक एवं
    विधालय है जो इसके प्रति गंभीर हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज एवं
    राष्ट्र में बढ़ती चोरी, लूटमारी, बेईमानी, हिंसा और भ्रष्टाचार के रूप में
    दिखाई देने लगा है।
    घर में माता-पिता को समयाभाव के कारण नैतिक शिक्षा का पाठ पढाने का समय भी नहीं मिलता । अत: विद्यालयों को ही इसका दायित्व संभालना होगा । यह ठीक है कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन एवं परीक्षा- कार्यों की अधिकता के कारण समयाभाव रहता है, किन्तु तीन स्तरों पर यह संभव है…एक तो विषयों के पठन-पाठन के अंतर्गत ही जो नैतिक संदर्भ आते है, उन प्रसंगों का सदुपयोग कर, दूसरे, नैतिक शिक्षा के अन्य कार्यक्रम बनाकर, जैसे-प्रार्थना, पुस्तकालय, पत्रिका, संग्रह-पुस्तिका, दुश्य-श्रव्य सामग्री तथा दिनचर्या आदि सभी माध्यमों का प्रयोग करने का वातावरण  बनाकर।  तीसरे, विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में ऐसे अवसर प्रदान कर जिससे बालको में नैतिक विचारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगे ।
  • Shrikant (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-201

    Availability: In stock


  • Anuvaad Ki Vyavharik Samasyaen
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    290 247

    Item Code: #KGP-749

    Availability: In stock

    अनुवाद की व्यावहारिक समस्याएँ
    आज के विश्व में अनुवाद का महत्व दिनोदिन बढ़ता जा रहा है , और जैसे-जैसे विश्व की विभिन्न भाषाओं का साहित्य समृद्ध होता जाएगा, अनुवाद का महत्त्व और भी बढ़ता जाएगा।  ऐसी स्थिति में किसी भी भाषा की समृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि उसमें अधिकाधिक अच्छे अनुपाद हों। हिंदी में सर्वाधिक अनुवाद अंग्रेजी से  होते हैं, किन्तु अभी तक कोई भी ऐसी पुस्तक नहीं आई, जिससे अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद का अभ्यास किया जा सके। प्रस्तुत पुस्तक इसी कमी को पूरा करने के लिए प्रकाशित की जा रही है। इससे प्रारंभ  में अनुवाद के सिद्धात तथा उसके प्रयोग के संबंध में व्यवहारिक जानकारी दी गई है फिर स्तरित अनुवाद-सामग्री दी गई है तथा अंत में कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों के अनुवाद पर संक्षिप्त चर्चा है ।
    इस प्रकार यह पुस्तक अपने छोटे से आकार में अनुवाद का अध्यासार्थ अपेक्षित सभी बातों से चुका है। आशा है, अनुवाद का अभ्यास करने वालों के लिए यह उपयोगी सिद्ध होगी।
  • Netaji Subhash Chandra Bose
    Chandrika Prasad Sharma
    200

    Item Code: #KGP-134

    Availability: In stock

    यह जीवनी है उस क्रांतिकारी महाबली की, जो देश की आजादी के लिए प्राणी को हथेली पर रखकर अर्द्धरात्रि में अपने घर से वेश बदलकर काबुल होकर जर्मनी-जापान पहुंच गए । अंग्रेज उन्हें ताकते ही रह गए और वे देश से विदेश पहुँच गए । ये थे-नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ।
    नेताजी 'आजाद हिंद फौज' बनाकर देश की आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहे । 'दिल्ली चलो' का नारा उन्होंने ही बर्मा में दिया । उनका प्रत्येक क्षण देश की आजादी के विषय में सोचने में लगता था ।
    नेताजी गरीबों के मसीहा थे, किसानों और मजदूरों के संरक्षक थे । वे धैर्यवान, शक्तिमान और महान राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने देशवासियों से कहा था—'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा ।'
  • Bharat Ke Pramukh Sahityakaron Se Antrang Baatcheet
    Ranvir Rangra
    450 360

    Item Code: #KGP-234

    Availability: In stock

    भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अन्तरंग बातचीत
    किताबघर प्रकाशन श्रेष्ठ भारतीय साहित्य के आदान-प्रदान से भी सक्रिय रहा है । भारतीयता और भारतीय साहित्य की अंतर्धारा को समझने के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी भाषा की सीमारेखाओं से बाहर भी झाँकें । प्रमुख भारतीय साहित्यकारों को एक मंच पर लाने की दिशा में हमारा पहला अभिनव प्रयोग था 'भारतीय लेखिकाओं से साक्षात्कार' । प्रस्तुत प्रकाशन उसी की अगली कड़ी है जिससे भारत के पच्चीस साहित्यकारों से इस विधा के विशेषज्ञ डॉ० रणवीर रांग्रा की अन्तरंग बातचीत सम्मितित है, जिसके माध्यम से अनेक ऐसे रचना-रहस्य प्रकाश में आए हैं जिनसे अब तक हिंदी-जगत ही नहीं, भारतीय साहित्य-समाज भी अनभिज्ञ था ।
    इस प्रकार, यह पुस्तक मात्र एक और प्रकाशन नहीं, बल्कि एक दस्तावेज से जिसका उपयोग भारतीय साहित्य के संदर्भ-ग्रंथ के रूप में भी किया जा सकता है । आशा हैं, इससे प्रबुद्ध पाठको की अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सकेगा और उन्हें एक ऐसी अंतर्दूष्टि प्राप्त होगी जिससे समकालीन भारतीय साहित्य की आत्मा तक पहुंचने में सहायता मिलेगी ।
  • Samkalin Sahitya Samachar July, 2019
    M.A. Sameer
    0

    Item Code: #KGP-MGZN 2019 July

    Availability: In stock

  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Face Your Fears (Self-Help)
    David Tolin
    695 521

    Item Code: #KGP-355

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • Navak Ke Teer
    Sharad Joshi
    390 312

    Item Code: #KGP-21

    Availability: In stock

    नावक के तीर
    मैं धर्मयुग छोड़कर कलकत्ता गया । 'रविवार’ का प्रकाशन प्रारम्भ हो रहा था । वहीं पहुँचते ही मैंने पहला पत्र शरद जी को लिखा था : शरद जी, समय आ गया है । अब आप शुरू हो जाइये । आपकी यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि आपको हिंदी वालों ने नियमित स्तंभ लिखने का मौका नहीं दिया । शाद जी ने सहमति का पत्र तो भेजा, पर साथ ही यह भी जड़ दिया कि प्यारे, अब मैं देनिक स्तंभ के बारे में सोच रहा हूँ । कोई साहसी संपादक मिल ही नहीं रहा है ।  बहरहाल, उनका स्तंभ चालू हुआ । हमारी संपादकीय टीम ने काफी बहस-मुबाहसे के बाद तय दिया कि स्तंभ का नाम 'नावक के तीर' होना चहिए । बिहारी से साभार । उनका पहला लेख था-अथ गणेशाय नम: और स्तंभ का नाम छपा था-नाविक के तीर । पहला अंक बाजार में आते ही शरद जी की घबराहट-भरी चिट्ठी आयी--"भैया, नाविक नहीं नावक । अपना अज्ञान मुझ पर क्यों थोप रहे हो ।" खैर । कॉलम चला और खूब चला । पाठक प्रमुदित थे और कई व्यंग्यकार निराश। 
    मुझे गर्व की अनुभूति कभी-कभी होती रहती है कि हिन्दी व्यंग्य-लेखन की इस विजय-यात्रा में बतौर दर्शक ही, मेरी भी एक विनम्र भूमिका रही है ।
    --सुरेन्द्र प्रताप सिंह
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Phanishwar Nath Renu
    Phanishwarnath Renu
    225 203

    Item Code: #KGP-556

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रसप्रिया', 'नैना जोगिन', 'तीर्थोदक', 'तॉबे एकता चलो रे', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'पुरानी कहानी : नया पाठ', 'भित्तिचित्र की मयूरि, 'आत्म-साक्षी', 'एक आदिम रात्रि की महक' तथा 'तीसरी कसम, अर्थात् मारे गए गुलफाम'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी' से-
    वह औरत जो तमाम उम्र एक कसी हुई रस्सी पर बाजीगरनी की तरह अपने बोझ का संतुलन कायम रखने की कोशिश में सारी ताकत और समूची एकाग्रता खर्च करती हुई चलती रही थी, आज ज़मीन पर खडी थी । रस्सी के दोनों सिरे कभी उनके सास-ससुर और खाविंद के दरम्यान तने रहे थे, कभी उनके खाविंद और बच्चों के दरम्यान । बहुत बरसों से एक सिरा भाइया जी के वजूद से बँधा था और दूसरा सिरा बड़े मामा जी के साथ । भाइया जी नहीं रहे तो रस्सी कड़क करके टूट गई । भाभी जी चक्कर खाकर ज़मीन पर आ गिरी । ज़मीन पर खडे होना तो वह भूल ही गई थीं ।  लडखड़ाती, काँपती, चकराती, हिचकोले खाती वह नए सिरे से छोटे बच्चे की तरह ज़मीन पर खडी होना सीखेंगी । शायद छोटे मामा जी का हाथ पकड़कर यह पैर बढाना सीखेंगी । पर फिलहाल तो वह चारों खाने चित गिरी पडी थीं ।
    भाइया जी नहीं रहे, तो बड़े मामा जी भी चले जाएँ-चले जाएँ..
    और उन्होंने दो-दो पुरानी सोने की चूडियों अपने हाथों से उतारी । उठीं और वे चारों चूडियाँ मामा जी के कोट की जेब में डाल दी, "बस, यही है मेरे पास । इसे ले ले और चला जा । पैंशनों वाले चले गए । रोटी खत्म । चूल्हा बुझ गया । तोड़ दिया है मैंने चूल्हा । तोड़ दिया है । तूने सुना ? चूल्हा तोड़ दिया है मैंने । चला जा । ”
    हिंदी और पंजाबी में समान रूप से रचनारत, साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार की मानव-मन के सच को उकेरती कहानियों का नया संग्रह ।

  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-1
    Kamal Kishore Goyenka
    500 400

    Item Code: #KGP-57

    Availability: In stock

    मंजुल भगत : समग्र कथा-साहित्य (1)
    संपूर्ण उपन्यास
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मंजुल भगत को मैंने कुछ गोष्ठियों में बोलते सुना और संवाद भी किया तो पाया कि वे भारतीय स्त्री का प्रतिरूप है । उनमें भारतीय स्त्री के गहरे संस्कार थे । उनसे मिलना भारत की एक आधुनिक स्त्री से मिलना था । यह स्त्री भारत की संस्कृति और यहाँ  की मिट्टी की उपज थी, जिसमें गहरा अस्तित्व-बोध एवं  स्त्री-स्वातंत्र्य की चेतना थी । उन जैसी संस्कारवान, संकल्पशील, संघर्षरत और संवेदनाओ से परिपूर्ण लेखिका के संपूर्ण कथा-साहित्य के संकलन तथा संपादन का कार्य  करना मेरे लिए गौरव की बात है ।
    मजुल भगत की प्रमुख विधा कहानी है और इसी से वे साहित्य में प्रवेश करती हैं, परंतु उपन्यास के क्षेत्र मैं भी उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा का परिचय दिया और 'अनारो' जैसे उपन्यास की रचना करके देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की ।
    लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    इस समग्र रचना-संसार को पढ़कर कहा जा सकता है  कि साहित्य के प्रति मंजुल भगत की गहरी आस्था थी । लेखिका का दृढ़ विश्वास था कि आने वाले समय में, तमाम अपसंस्कृति एवं अमानवीयकरण के बावजूद उनके उपन्यास और कहानियाँ अवश्य ही पढे जाएंगे । बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्त्री को जानने और समझने के लिए मंजुल भगत का कथा-साहित्य एक प्रामाणिक दस्तावेज है
  • Mere Saakshatkaar : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    195 176

    Item Code: #KGP-739

    Availability: In stock


  • Main Jasdev Singh Bol Raha Hoon
    Jasdev Singh
    480 384

    Item Code: #KGP-40

    Availability: In stock


  • Manikin Aur Anya Kahaniyan
    Gouri Shankar Raina
    200 170

    Item Code: #KGP-MKAAK

    Availability: In stock

    आधुनिक संवेदना की अलग-अलग मिज़ाज की इन कहानियों में मानवीय स्थिति की सच्चाइयों को विषय-भूमि बनाकर जीवन की विभिन्न स्थितियों में व्यक्ति की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं की प्रस्तुति की गई है। मानवीय संबंधों के संक्रमित यथार्थ को पकड़ने की कोशिश भी इन कथाओं में नज़र आती है। कहीं-कहीं ये तीखे रंगों के साथ उपस्थित होती हैं और कथा-दृष्टि के नए धरातल उभरते दिखाई देते हैं।

    कथाकार ने कहानी-लेखन की अपनी यात्रा में सभी मंज़िलें खुद चलकर तय की हैं और अपनी कुछ कहानियों को अन्य भाषाओं में विशेषकर जर्मन (यू टर्न), स्पानी (हाइवे), तेगु मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी तथा उर्दू में अनूदित होकर मुख़्तलिफ़ समाजों के विभिन्न पाठकों तक जाने दी है।

    आलोचकों का मानना है कि गौरीशंकर रैणा आधुनिक जीवन का एक प्रामाणिक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं और एक किस्सागो का रचना-व्यक्तित्व उनकी कहानियों से उभरता है।

  • Svadeshi Chikitsa Paddhati (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-7072

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Kathin Samay Mein
    Ramesh Chandra Shah
    300 240

    Item Code: #KGP-9383

    Availability: In stock

    हिंदी की वरिष्ठतम पीढ़ी के अनूठे रचनाकार रमेशचन्द्र शाह की डायरी पढ़ना एक विशेष अनुभव से गुजरना है। डायरी लेखन की इनकी प्रथम कृति ‘अकेला मेला’ के पाठक जानते हैं कि इसमें 1981 से 1985 तक की अवधि के अनुभवों का संसार शामिल था। इस विधा की शाह जी की दूसरी कृति ‘इस खिड़की से’ 1986 से 2004 तक का उनका संसार समाहित किए हुए थी। डायरी की तीसरी कृति का शीर्षक है ‘आज और अभी’। इसका फलक 2004 से 2009 तक फैला हुआ है। अंतःप्रक्रियाओं का यह क्रम चैथी डायरी कृति ‘जंगल जुही’ में 2013 तक का कालखंड आबद्ध करता है। इस कृति में रमेशचन्द्र शाह रामप्पा, ऋषियों की घाटी, यादगिरिगुट्टा और भोंगीर का किला, नागार्जुनकोंडा, हम्पी आदि की यात्राओं वेफ बहाने एक अद्भुत संसार से अंतरंग परिचय कराते हैं। इस तरह कि देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूंघना और आस्वाद वेफ साथ आत्मसात् करना एक रचना की विधा ही बन जाए। अकारण नहीं कि इस कोलाजमय डायरी में प्राग का यात्रा-प्रसंग भी आ जुड़ा था। यहाँ एक नाट्य वृत्तांत इसका आधर बना।
    पाठकों द्वारा सराही गई और आलोचकों द्वारा बहुप्रशंसित इन डायरी कृतियों का नव्यतम पड़ाव है ‘कठिन समय में’। यहाँ 15 सितंबर, 2009 में जयपुर से प्रारंभ हुई बाह्य व अंतर्यात्रा अंततः 23 फरवरी, 2017 को भोपाल के हिंदी भवन में हुए शरद व्याख्यान तक चली आई है। पाठक यहाँ भी वही रस, प्रवाह, गहराई और अंतरंगता अनुभव करेंगे।
    शाह जी की मान्यता इस विधा पर सटीक है—‘डायरी ऐसी विधा है जिस पर परनिर्भरता लागू नहीं होती।’ वह इसे दैनंदिन घटनाओं, चरित्रों और यात्रा-प्रसंगों के लिए सही जगह मानते हैं। यहाँ आत्मसंवाद भी है और संवाद भी, किंतु एक बहुपठित, निश्छल साहित्यिक, रसिक और खोजी व्यक्ति उसमें इस तरह संलग्न रहता है कि पढ़ने वाले की समझ का आकाश और विस्तृत हो जाता है। कारण यह कि रमेशचन्द्र शाह, वस्तुतः व्यक्ति को नहीं, उसे उसकी पूरी परंपरा में देखना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उन्हें सीमन्तनी को देख रांगेय राघव और उनकी स्फूर्ति याद हो आती है। ‘आइडेंटिफिकेशन आॅफ वुमेन’ जैसी फिल्म देखकर वह इस महाप्रश्न से जूझते हैं कि नायक को आखिर चाहिए क्या था?
    उनका संवाद समय के अपने सरीखे शिखर व्यक्तियों से चलता रहता है। वह किताबों पर टिप्पणियाँ करते हैं, तो ऐसे कि पाठक उन्हें पढ़ने की कुंजी ही पा जाएँ। जैसे श्री अरविंद वेफ ‘लाइफ डिवाइन’ और प्लेटो के ‘दि रिपब्लिक’ पर एक साथ विचार करते हुए वह अतिमानस के अवतरण की चर्चा करते हैं। सच बात तो यह है कि रमेशचन्द्र शाह की इस पाँचवीं डायरी कृति में विश्व वेफ आधुनातन व पुरातन सभी कला-क्षेत्र सहजता से आ जाते हैं। पढ़ते-पढ़ते आप समझ जाएँगे कि यह रचनाकार अपने शेष समय को ‘ही हैज रिटन द बुक आॅफ हिज लाइफ’ सरीखे रचनात्मक काम में ‘आत्मा’ नाम की असलियत का पता लगाते हुए व्यतीत करना चाहते हैं। कहना आवश्यक है कि शाह जी की यह डायरी कृति हिंदी साहित्य को अपनी तरह से समृद्ध करती है।
  • Divangat Vriksh Ka Geet
    Jagmohan Singh Rajput
    125

    Item Code: #KGP-1568

    Availability: In stock

    दिवंगत वृक्ष का गीत
    जीवन के कई धु्रवांतों पर अपनी बौद्धिक उपस्थिति और प्रशासनिक दक्षता रेखांकित कर चुकने के बाद अकस्मात् एक अजनबी की तरह कविता के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति जताना, प्रत्येक उस भावाकुल मन की लाचारी होगी जो मानता हो कि जीवन न तो बुद्धि-व्यवसाय है, न ही कोरा भाव-विलास ही। कविता की कला को भी काव्य-विवेक की जरूरत पड़ती है जैसे कि भावावेगों के विस्फोट को जीवन-विवेक की। इन कविताओं में यह ‘विवेक’ साफ-साफ अनुभव किया जा सकता है।
    यथार्थ, शास्त्रीय यथार्थ, पंजीकृत और सूचीबद्ध यथार्थ के पार के यथार्थ का सीधा-सच्चा बयान करती ये कविताएँ उस संवेदनशील चित्त की देन हैं जो प्रत्येक पल सचेत और भाव- प्रखर रहा है। कविता अंततः भाव-प्रखरता ही तो है। व्यक्ति, समाज, समय और राजनीति का प्रति-अक्स रचती ये रचनाएँ उस कवि की कृतियाँ हैं, जो मूलतः सर्जक होकर भी अपने इस दावे की घोषणा नहीं ही करता रहा है। हिंदी कविता के पाठक ही तय करेंगे कि दावे का यह हक उसका बनता है या नहीं।
    मेरे भरोसे की ये कविताएँ उन जीवन-सत्यों और अनुभवों से लदी-फँदी हैं, जिन्हें तमाम जाने-पहचाने समकालीन कवियों ने औसत और मामूली समझकर दरकिनार कर दिया था। या फिर उनके देखने लायक अनुभव नहीं थे ये। जगमोहन सिंह राजपूत ने ज्यादातर मनमौज में आकर कहते-कहते कुछ ऐसा कह डाला है, जिसे कविता के सिवाय और कुछ भी कहना मुश्किल है। कहने में अपनी बेइंतहा सादगी, कथ्यों में असंदिग्ध भरोसेमंदी और रूपाकार में जानी-पहचानी नैसर्गिकता के चलते ये कविताएँ न तो वाम हैं, न दक्षिण। फिर भी, अगर कहना ही पड़े तो यही कि लोकपरकता ही इनका असली चरित्र है। भाषा, उसके मुहावरे और अभिव्यक्ति में भी ये उसी लोक की हैं जो किसी को भी अपने स्पर्श से कवि बना डालता है।
  • Hindi Vyangya Ki Dharmik Pustak : Harishankar Parsai
    Prem Janmejai
    480 360

    Item Code: #KGP-9358

    Availability: In stock

    डाॅ. प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित पुस्तक हिंदी व्यंग्य की धर्मिक पुस्तक: हरिशंकर परसाई अत्यंत मूल्यवान है।
    प्रेम जनमेजय हिंदी व्यंग्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार और इस विध के सबसे बड़े संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो चुके हैं। उनके लेखन में साहित्य अपनी गरिमा के साथ विकसित होता है। अध्ययन और अनुभव के सहमेल से उनका रचनात्मक व आलोचनात्मक लेखन विशिष्ट बन गया है। प्रेम जनमेजय की एक बहुत बड़ी और अनुकरणीय विशेषता है—अपनी परंपरा के श्रेष्ठ रचनाकारों के कृतित्व को संजोना; उन रचनाकारों पर आलोचना पुस्तक संपादित करना। ...यह काम वे लगातार करते रहे हैं। उनसे अपेक्षाएं बहुत रहती हैं। हर बार की तरह इस किताब में भी वे अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं।
    यह किताब प्रेम जनमेजय के संपादकीय विवेक का परिचय देती है। इसमें परसाई का महत्त्व है, मूल्यांकन है। उनके व्यक्तित्व पर आलेख हैं। इसमें शामिल मुख्य लेखक हैं—राजेन्द्र यादव, सूर्यबाला, नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, नरेन्द्र कोहली, शिव शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, अतुल चतुर्वेदी आदि। पुस्तक इन खंडों में संयोजित है—संपादकीय, चिंतन, स्मृतियों में, परसाई से बातचीत। परसाई पर पहले भी अच्छी सामग्री प्रकाशित हो चुकी है। यह पुस्तक उसमें गुणात्मक वृद्धि है। शीर्षक ही बताता है कि प्रेम जनमेजय किसी भी रचनाकार को धार्मिक पुस्तक की तरह अनालोचनीय, अन्यतम, मानवेतर और आसमानी नहीं मानते। शीर्षक में गहरा व्यंग्य है। जिन लोगों ने परसाई को पठनीय के स्थान पर पूजनीय बना रखा है, यह वाक्य उन पर तंज करता है।
    पुस्तक में शामिल साक्षात्कार में परसाई और प्रेम जनमेजय की बातचीत है। इसमें कुछ प्रश्नकर्ता और भी हैं। परसाई कहते हैं, ‘व्यंग्य का प्रयोजन एक चेतना जागृत करता है कि जो गलत है उसे बदलना है। बदलने के लिए साहित्य के अलावा बहुत सी चीजें हैं। राजनीतिक दल हैं, ट्रेंड  यूनियन हैं। परंतु व्यंग्य उनकी तरफ संकेत तो करेगा ही। व्यंग्य सिर्फ पोलिटिकल ही नहीं, रचनात्मक भी है।’ परसाई के मूल्यांकन के लिए यह एक अनिवार्य किताब है।
  • Puraskrit Bacchon Ki Prerak Sahasi Kathayen
    Sanjiv Gupta
    200 170

    Item Code: #KGP-9352

    Availability: In stock

    मित्रो, ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ प्राप्त बच्चों की कहानियों पर आधारित  शृंखला की सातवीं पुस्तक के साथ एक बार मैं फिर आपसे मुखातिब हूं। आपसे मिल रहे प्यार और प्रतिक्रिया  के बलबूते एक और किताब तैयार करने का उत्साह मिला। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह किताब भी आप सभी को पसंद आएगी। बाल पाठकों की रुचि को देखते हुए इस बार इसमें चित्रों को भी खास तवज्जो दी गई है।
    वैसे तो बहादुर बच्चों की कहानियां हमेशा ही रोमांचित और प्रेरित करती हैं, लेकिन आज जबकि समाज में संवेदना खत्म होती जा रही है तो ये और भी प्रासंगिक हो गई हैं। यह देखकर बहुत ही दुःख होता है कि किसी को विपत्ति में देखकर आज लोग पीड़ित की मदद करने की बजाय उसका वीडियो बनाने और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने में लग जाते हैं। यह भविष्य वेफ लिए अच्छा संकेत नहीं है। हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि विपत्ति किसी  के भी साथ कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। आज जो किसी और वेफ साथ घटित हो रहा है, कल को हमारे साथ भी हो सकता है।
    जरा सोचिए...अगर ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ पाने वाले बच्चों ने भी इसी संवेदनहीनता का परिचय दिया होता तो क्या होता! इन बच्चों ने तो दूसरों की जान बचाने  के लिए अपनी और अपनों की भी परवाह नहीं की। उम्मीद करता हूं कि वर्ष 2016 वेफ लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  के हाथों पुरस्कृत इन बच्चों की कहानियां हमारे समाज में इस संवेदना को बनाए रखने में मददगार साबित होंगी और बच्चों व युवाओं को प्रोत्साहित करेंगी।
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    190 171

    Item Code: #KGP-549

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।
    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।
    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
  • Sambhavami
    Asha Rani Vhora
    150

    Item Code: #KGP-9136

    Availability: In stock

    श्रीमती आशारानी व्होरा की यह रचना ‘संभवामि’ सामयिक भी है, प्रासंगिक भी। सामयिक इस दृष्टि से कि ‘संभवामि’ की विषयवस्तु इन दिनों चर्चा में है। प्रासंगिक इसलिए कि इस विषय पर अभी जो कुछ लिखा जा रहा है उसमें से अधिकांश में गहराई और दृष्टि का अभाव है। ‘संभवामि’ इन दोनों की पूर्ति करता है।
    लेखिका ने उन्मुक्त दृष्टि से पक्ष-विपक्ष दोनों को संतुलित दृष्टि से प्रस्तुत कर अपना सुचिंतित मंतव्य भी दिया है जो उनकी लेखकीय जिम्मेवारी बनती है।
    संधि-युग का आज का मानव-मन संशयालु हो उठा है। वह राह की खोज में है। ‘संभवामि’ में उसे आशा की वह किरण दिख सकती है, जो उसके मन को संशय से मुक्त करने में सहायक हो।
    अभी इतना ही पर्याप्त होगा क्योंकि पाठकों का स्वयं का निर्णय ही आगे आने वाली सदी में उनकी भूमिका निर्धारित करेगा।
    -सिद्धेश्वर प्रसाद
  • Nai-Naveli Paheliyan
    Kulbhushan Lal Makhija
    80

    Item Code: #KGP-952

    Availability: In stock


  • Kuch Lekh Kuch Bhashan (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    250 225

    Item Code: #KGP-7025

    Availability: In stock


  • Ek Mulakaat Bahadur Bachchon Ke Saath
    Sanjiv Gupta
    200 170

    Item Code: #Kgp-embbks

    Availability: In stock


  • The Growing Years (Novel)
    Ann Delorme
    595 446

    Item Code: #KGP-339

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.

  • Aagaaz
    Devendri Mandrawal
    160

    Item Code: #KGP-125

    Availability: In stock


  • Aavaran (Paperback)
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-525

    Availability: In stock

    यह मेरा दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। आठवीं शताब्दी के संधिकाल के अंतस्सत्त्व को ‘सार्थ’ में, उपन्यास के रूप में, आविष्कृत करने का और अब ‘सार्थ’ के समय के बाद के सत्य को ‘आवरण’ द्धउपन्यासऋ में चित्रित करने का मैंने प्रयास किया है। भारत के इतिहास के अत्यंत संकीर्ण इस अवधि के बारे में विपुल प्रमाण में सामग्री उपलब्ध होती है, लेकिन आवरण की शक्ति इस विपुलता के ऊपर विजृंभित हो रही है। ‘सार्थ’ की अवधि का इतिहास ज्यादातर आवरण-शक्ति के लिए आहुति बन नहीं पाया है। उनके बारे में निर्भीक रूप से सत्य को अंकित किया जा सकता है। लेकिन ‘आवरण’ की अवधि के इतिहास के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। प्रत्येक सोपान में आवरण की शक्ति को बेधते हुए आगे बढ़ने की अपरिहार्यता सामने आती है। इसीलिए इस उपन्यास के स्वरूप और तंत्रें को उसके अनुकूल समायोजित कर लेना पड़ा।
       इस उपन्यास की ऐतिहासिकता के विषय में मेरा अपना कुछ भी नहीं है। प्रत्येक अंश या पग के लिए जो ऐतिहासिक आधार हैं उनको साहित्य की कलात्मकता जहाँ तक सँभाल पाती है वहाँ तक मैंने उपन्यास के अंदर ही शामिल कर लिया है। उपन्यास के तंत्र के विन्यास में यह अंश किस प्रकार प्रधान रूप में कार्यान्वित हुआ है, इसको सर्जनशील लेखक और दर्शनशील पाठक, दोनों पहचान सकते हैं। शेष आधारों को उपन्यास के अंदर के उपन्यास को रच डालने वाले चरित्र ने ही, अपनी क्रिया की आवश्यकता के रूप में, प्रस्तुत कर दिया है, न कि मैंने। इस पूरी वस्तु को जो अद्यतन रूप प्रदान किया है, उसमें ही मेरी मौलिकता है। इतिहास की सच्चाई में कला का भाव यदि चुआ है, तो वहाँ तक साहित्य के रूप में यह सफ़ल हुआ है, ऐसा मैं मानता हूँ।
    -भैरप्पा

  • Aupacharik Patra-Lekhan
    Om Prakash Singhal
    380 304

    Item Code: #KGP-786

    Availability: In stock

    औपचारिक पत्र-लेखन
    विषय एवं शैली की दृष्टि से पत्रों का एक महत्त्वपूर्ण वर्ग औपचारिक पत्रों का है। औपचारिक पत्र एक प्रकार के दस्तावेज होते हैं। जरूरत पड़ने पर उनका उपयोग साक्ष्य एवं प्रमाण के रूप में किया जाता है। अतएव उन्हें लिखते समय पर्याप्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अब विभिन्न कार्यालयों में नियुक्त हिन्दी पढ़े-लिखे व्यक्तियों से हिन्दी पत्रचार में दक्ष होने की अपेक्षा की जाती है।
    औपचारिक पत्रों के विविध रूपों की  लेखन-शैली का सोदाहरण सैद्धांतिक विवेचन करने वाली पुस्तक का हिन्दी में सर्वथा अभाव है। विषयगत अपेक्षाओं एवं समय की माँग को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक हिन्दी में अपने विषय की पहली पुस्तक है।
    अनुप्रयुक्त हिन्दी के क्षेत्र में एक नया मार्ग प्रशस्त करने के कारण हिन्दी के प्रत्येक जागरूक पाठक और पुस्तकालय के पास इसका होना अनिवार्य है।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-4
    Balram
    350 291

    Item Code: #KGP-826

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-4
    समकालीन लघुकथाओं से गुजरते हुए इधर जिस खास बात पर ध्यान अटक गया है, वह है ‘लघुकथा में प्रवेश कर रहे काव्य-तत्त्व’। लघुकथा के इतिहास पर गौर करें तो पता चलेगा कि इस विधा के अंकुरण-काल में ही प्रेमचंद ने इसे गद्य-काव्य और कहानी के बीच की विधा कह दिया था, जिसका उल्लेख कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने अपने लघुकथा-संग्रह ‘आकाश के तारे, धरती के फूल’ की भूमिका में किया है। प्रेमचंद के अनुसार ‘लघुकथा में गद्य-काव्य का चित्र और कहानी का चरित्र होता है’। अज्ञेय इसे ‘छोटी कहानी’ कहते थे तो कमल गुप्त ने ‘लघुकहानी’ का झंडा फहरा रखा है और विनायक अपनी लघुकहानियों के लिए अलग से पहचाने जाते हैं। बालेंदुशेखर तिवारी, हरीश नवल, प्रेम जनमेजय और दामोदर दत्त दीक्षित आदि लघु-व्यंग्य के शामियाने तले गुफ्तगू करते रहे हैं। महेश दर्पण का संग्रह ‘लघुकहानी-संग्रह’ के रूप में छपा है, न कि लघुकथा-संग्रह के रूप में। मुकेश वर्मा की ऐसी रचनाओं को विष्णु नागर ने ‘छोटी कहानियां’ कहते हुए इस समय को छोटी कहानी का समय कहा है और हममें से अधिसंख्य लोग मुकेश वर्मा की छोटी कहानियों को उच्चस्तरीय लघुकथा के नमूने कहेंगे। उदय प्रकाश अपनी ऐसी रचनाओं को किस्से, छोटे किस्से कहकर पुकारना पसंद करते हैं अर्थात् छोटी कथा-रचनाओं की अहमियत तो निर्विवाद है, विवाद सिर्फ नाम पर है और काम सभी छोटी कथाएं प्रायः एक ही करती हैं : पाठक पर त्वरित प्रभाव, जैसे तुरंता भोजन, पाठक की मानसिक तृप्ति। परम। पाठक को परम मानसिक तृप्ति देने वाला चैतन्य त्रिवेदी का लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ बीसवीं सदी की ढलती शाम में लोकार्पित हुआ तो विष्णु प्रभाकर से लेकर राजकुमार गौतम तक प्रायः सभी पीढ़ियों के लोग उस पर लट्टू हो गए और कमलेश्वर ने तो कह ही दिया कि आज लघुकथा एक विधा के रूप में स्थापित हो गई। उसी विधा की एक सदी की संघर्ष-यात्रा का प्रतीक-वृत्तांत पाठकों को सौंपकर अब हम आश्वस्त हैं कि इस कारवां में मुकेश वर्मा जैसे सिद्ध नाम दिन-प्रतिदिन जुड़ते चले जाएंगे और अंततः एक दिन कहानी और उपन्यास जैसी प्रतिष्ठा लघुकथा को भी हासिल हो जाएगी।
  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-1313

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]
  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Sant Ravidas Ki Ramkahani
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-732

    Availability: In stock

    'संत रविदास की रामकहानी' कवि देवेन्द्र दीपक की संत  रविदास के जीवन-दर्शन पर अपने किस्म की प्रथम औपन्यासिक रचना है । इसमें सृजन और अध्यात्प चेतना के आस्थाशील आयाम उदघाटित हुए हैं । लेखक ने रविदास के अंतत् से उतरने, उसके चिंतन के मर्म को उकेरने का सफल प्रयास किया है । इसमें संत के मन-आत्म की पारदर्शी निर्मलता तथा हाथ के श्रम के प्रति गहरी आस्था भी व्यक्त  हुई है । अपने समाज के श्रमशील उज्जवल समुदाय को दलित बना दिए जाने की पीडा के साथ भारतीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए सामाजिक न्याय, समता, संवेदना की हितैषी स्थापनाएँ भी हुई है ।
    संत रविदास की वाणी से पौराणिक आख्यानों, भक्ति-ज्ञान-कर्म के योग विषयक विचारों, लोक में व्याप्त पारंपरिक इनके रंरा-रूपों को यथावश्यक प्रयुक्त करके देवेन्द्र दीपक ने एक बड़े अभाव की पूर्ति कर बड़ा काम किया है । भारतभूमि पर बहने वाली पुण्य-सलिला नदियों-गंगा, यमुना, सरस्वती को मानव शरीर से कार्यशील-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से जोड़कर योग-अध्यात्म को तथा राष्ट्रीयता के चिंतन-दर्शन को पुष्ट किया है ।
    वसुधैव कुटुंबकम के वैश्विक विचार को रविदास की समूची वाणी में लक्षित-रेखांकित कर भारतीय अस्मिता एवं लोक-आस्था के प्रति छीजती निष्ठा को पुनः सृजनात्मक आधार प्रदान किया है तो जात-पांत, ऊँच-नीच के सामाजिक संताप को मन और मनोरथ की स्पंदनशीलता, सुचिता, मानवीयता के समक्ष व्यर्थ एवं अमानवीय सिद्ध किया है । भारतीय समाज में फैले धार्मिक पाखंड को निरस्त करती एवं रविदास के ब्रह्मांड व्यापी राम तथा गुरु रामानंद की देशना को रूपायित करती यह रचना अपने काव्यात्मक ललित गद्य के कारण आकर्ष और पठनीय है ।
  • Mahan Vibhutiyon Ka Adhura Bachpan
    Vinod Kumar Mishra
    200

    Item Code: #KGP-247

    Availability: In stock

    महान् विभूतियों का अधूरा बचपन
    विश्व की अनेक महान् विभूतियाँ बचपन में ही गंभीर विकलांगता का शिकार हो गई थीं। विकलांगता अपने साथ शारीरिक कष्ट के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक व सामाजिक दुःख भी लाती है। इन विभूतियों ने विकलांगता का सामना एक सामान्य चुनौती की भाँति किया और समस्त संसार उनकी उपलब्धियों व योगदानों के समक्ष नतमस्तक हो गया।
    दूसरी ओर एक आम अच्छा-भला व्यक्ति मामूली समस्याओं से झुँझला जाता है और लक्ष्य पूरा न हो पाने  के लिए परिस्थितियों को अधिक दोष देने का प्रयास करता है।
    प्रस्तुत पुस्तक न केवल इन महान् व्यक्तियों का उदाहरण देते हुए आम बच्चों को चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है वरन् यह भी बताती है कि किस प्रकार आम बच्चों व विकलांग बच्चों के बीच सम्मानजनक समन्वय होना चाहिए।
    वास्तव में विकलांगता बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करती है और यदि परिस्थितियाँ अनुकूल बना दी जाएँ तो विकलांगता का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है। अतः यह आवश्यक है कि भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी अनुकूल बनाया जाए ताकि विकलांगजनों व शेष समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो और उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap
    Madan Kashyap
    150

    Item Code: #KGP-225

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Sabeena Ke Chaalees Chor
    Nasera Sharma
    295 266

    Item Code: #KGP-31

    Availability: In stock

    सबीना के चालीस चोर
    'सबीना के चालीस चोर' इस संग्रह की बाकी कहानियों के कथा-सूत्रों का बुनियादी विचार है । सबीना एक छोटी लड़की है, जो बडों जैसी दृष्टि और समझ रखती है । उसका मानना है कि फसाद कराने वाले, दूसरों का हक मारने वाले ही चालीस चोर है, जो हमेशा कमजोर वर्ग को दबाते हैं । इसी सबके बीच बार-बार अपने होने का अहसास दिलाती छोटी-छोटी मगर समझदार लड़कियां समूचे संघर्ष का हिस्सा है, अलग-अलग कहानियों से अलग-अलग किरदार निभाती सबीना से लेकर गुल्लो, सायरा, चम्पा, मुन्नी जैसी लड़कियों में नासिरा शर्मा खुद को ही 'प्लांट' करती हैं।
    दर्द की बस्तियों की ये कहानियाँ जिस भारतीय आबादी का प्रतिनिधित्व करती है वही इस देश की बुनियाद हैं ।  दरअसल ये ही कहानियां हिंदुस्तान की सच्ची तस्वीर हैं, जिनका अंतर्संगीत  इनके कथानकों के तारों में छिपा है, जिन्हें जरा-सा छेड़ो तो मानवीय करुणा का अधाह सागर ठाठें मारने लगता है । कहानियों का कैनवास और लेखक के सरोकार में जहाँ विस्तार एव गहराई है वहाँ घनीभूत और चौतरफा व्यथा है ।
    इन कहानियों की भाषा जिंदा भाषा है, जिसमें निजता और लोक-गंध की मिठास है। एक वरिष्ट कथाकार की ये कहानियां सचमुच उसके संपूर्ण कथा-संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं ।
  • Paani Kera Budbudaa
    Susham Bedi
    300 240

    Item Code: #KGP-9310

    Availability: In stock

    ‘यही कहानी थी पिया की? यह कथन है या सवाल? नहीं, कथन नहीं हो सकता। ऐसे खत्म नहीं हो सकती यह कहानी! ...शायद जिंदगी का सच यही है। कुछ भी नहीं है वहां पर हम बहुत कुछ भरकर उसी को सच मान बैठते हैं। ...पिया के मन में विरक्ति-सी हुई। सच क्या हस्ती है हमारी? कबीर के ही लफ्जों में पानी के बुलबुले जैसी!’ ये पंक्तियां ‘पानी केरा बुदबुदा’ उपन्यास का सारांश सरीखी हैं। सुप्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी का यह नवीनतम उपन्यास—जीवन, प्रेम, विवाह, सुख, विराग आदि शब्दों को समकालीन संदर्भ देते हुए लिखा गया है। उपन्यास विदेशी पृष्ठभूमि में लिखा गया है, लेकिन इसकी बेचैनियां सार्वदेशिक हैं।
    पिया इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है। उसका वैवाहिक जीवन, विवाह विच्छेद, तलाक के बाद प्रेम को फिर विवाह में बदलने की आकांक्षा, पुत्र और उसका पारिवारिक परिदृश्य—ऐसी अनेक बातों से मिलकर इस उपन्यास की कथावस्तु निर्मित हुई है। इस निर्मिति में निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहन आदि बहुत दिलचस्प तरीके से शामिल हैं। पिया के लिए सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है, पर वह ‘साथ’ चाहती है। विवाह इसीलिए उसे आश्वस्त और आकर्षित करता है। लेकिन नियति या मानव स्वभाव का निर्णय कुछ दूसरा है।
    सुषम बेदी कथानक को गतिशील रखते हुए जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात करती हैं। स्वाभाविक रूप से स्त्री-विमर्श भी आता है। पिया के बारे में लेखिका का कथन है, ‘अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खून के थक्के भी जमे हुए थे।’ ऐसी जाने कितनी विडंबनाएं इस उपन्यास को स्त्री-जीवन का मार्मिक दस्तावेज बना देती हैं। सुषम बेदी का लंबा जीवनानुभव और जनमनोविज्ञान समझने का ढंग भाषा के अनूठे स्वरूप में व्यक्त हुआ है। बेहद पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास। 
  • Aavaran
    Bhairppa
    600 480

    Item Code: #KGP-873

    Availability: In stock

    यह मेरा दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। आठवीं शताब्दी के संधिकाल के अंतस्सत्त्व को ‘सार्थ’ में, उपन्यास के रूप में, आविष्कृत करने का और अब ‘सार्थ’ के समय के बाद के सत्य को ‘आवरण’ द्धउपन्यासऋ में चित्रित करने का मैंने प्रयास किया है। भारत के इतिहास के अत्यंत संकीर्ण इस अवधि के बारे में विपुल प्रमाण में सामग्री उपलब्ध होती है, लेकिन आवरण की शक्ति इस विपुलता के ऊपर विजृंभित हो रही है। ‘सार्थ’ की अवधि का इतिहास ज्यादातर आवरण-शक्ति के लिए आहुति बन नहीं पाया है। उनके बारे में निर्भीक रूप से सत्य को अंकित किया जा सकता है। लेकिन ‘आवरण’ की अवधि के इतिहास के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। प्रत्येक सोपान में आवरण की शक्ति को बेधते हुए आगे बढ़ने की अपरिहार्यता सामने आती है। इसीलिए इस उपन्यास के स्वरूप और तंत्रें को उसके अनुकूल समायोजित कर लेना पड़ा।
       इस उपन्यास की ऐतिहासिकता के विषय में मेरा अपना कुछ भी नहीं है। प्रत्येक अंश या पग के लिए जो ऐतिहासिक आधार हैं उनको साहित्य की कलात्मकता जहाँ तक सँभाल पाती है वहाँ तक मैंने उपन्यास के अंदर ही शामिल कर लिया है। उपन्यास के तंत्र के विन्यास में यह अंश किस प्रकार प्रधान रूप में कार्यान्वित हुआ है, इसको सर्जनशील लेखक और दर्शनशील पाठक, दोनों पहचान सकते हैं। शेष आधारों को उपन्यास के अंदर के उपन्यास को रच डालने वाले चरित्र ने ही, अपनी क्रिया की आवश्यकता के रूप में, प्रस्तुत कर दिया है, न कि मैंने। इस पूरी वस्तु को जो अद्यतन रूप प्रदान किया है, उसमें ही मेरी मौलिकता है। इतिहास की सच्चाई में कला का भाव यदि चुआ है, तो वहाँ तक साहित्य के रूप में यह सफ़ल हुआ है, ऐसा मैं मानता हूँ।
    -भैरप्पा

  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Thank You Idi Amin
    Mohezin Tejani
    595 476

    Item Code: #KGP-9011

    Availability: In stock

    Through adversity, a new life emerges
    Bouncing back from one of the horrific episodes of world history—Idi Amin’s expulsion of 80,000 Asians from Uganda— Mohezin Tejani presents a collection of true stories about being a global Muslim refugee.
    Liberated from the confines of his own culture by political realities, Tejani sets out to learn how to be rooted in the absence of a place to call home. His writing is a hypnotic bhangra dance through time and space where he deftly explores both geographical and psychological displacement. Yet it is precisely through such disorientation and a host of intercultural encounters that he eventually finds solace in being a ‘global village on two legs.’
    Thank You, Idi Amin portrays the intersecting points of congruence among humans that are neither from the East nor the West, nor the North or South, but are all part of a global compass navigating the new world of tomorrow.
  • Taaki Desh Mein Namak Rahe
    Asghar Wajahat
    390 312

    Item Code: #KGP-475

    Availability: In stock

    ताकि देश में नमक रहे पुस्तक में कुल 42 लेख संकलित हैं, जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया गया है। पहले खंड के अंतर्गत साहित्यिक लेख हैं, जब कि दूसरे खंड में सामाजिक-सांस्कृतिक लेख संकलित हैं। साहित्यिक लेखों में सिर्फ साहित्यिक विधाओं या सरोकारों की ही बात नहीं की गई है बल्कि कई ऐसी साहित्यिक विभूतियों पर भी लेखक ने पूरी आत्मीयता से लिखा है, जिन्होंने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। मुज़फ्फर अली के साथ बिताए ख़ूबसूरत दिन हों या बेगम अख़्तर, शैलेन्द्र और शहरयार के लिए मन में मौजूद दीवानगी का अहसास, प्रमोद जोशी और ब्रजेश्वर मदान जैसे अपनी तरह की विशिष्ट-सामान्य शख़्सियतों की बातें हों या कुर्रतुलऐन हैदर और मंटो जैसे अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के प्रति आदर-भाव प्रकट करना हो, हर लेख में असग़र वजाहत कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर दे जाते हैं जिसे पाठक अपने मन से कभी विस्मृत नहीं कर सकता। 
    पुस्तक के दूसरे खंड में संकलित लेख हालांकि सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े हैं लेकिन उनका वैचारिक धरातल अत्यंत विस्तृत है। इनमें भाषा से जुडे़ सवाल, सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंध, आने वाले समय में हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा का आकलन, भारतीय गणतंत्र से जुड़े दशकों पुराने अनुत्तरित सवाल और लगातार छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहन चिंताएं मौजूद हैं। असग़र वजाहत इन लेखों के जरिए वर्तमान समय के जटिल सवालों को न केवल उभारते हैं बल्कि उनसे मुठभेड़ कर उनकी तहों में जाकर कारण भी तलाशते हैं। 
    इन विविध लेखों को क्रमिक रूप से पढ़ने पर हम अतीत से शुरू कर वर्तमान को पार करते हुए भविष्य के संभावित सवालों से भी रूबरू हो सकते हैं। यह असग़र वजाहत के लेखन की कलात्मकता ही है कि वह छोटे तथा मामूली से दिखने वाले मुद्दे या सवाल से अपनी बात शुरू कर उसे पूरे समाज और व्यवस्था के लिए एक ज़रूरी सवाल का स्वरूप प्रदान कर देते हैं।
    भूमिका से 
  • The Mother Of All Books (Paperback)
    Rajni Arun Kumar
    99

    Item Code: #KGP-1451

    Availability: In stock

    Sense has been banned from discotheque, multiplex, several restaurants, shopping mall, plane and many other places of recreation*. And this was even before the baby was born... Yes, Sense was expecting... A baby...
    To make things worse, she has to contend with having no permanent address, a set of friends who think nothing of scrutinising her like a specimen under a microscope, and relatives who mean well. Then there’s the journey of re-discovering her constantly changing body, which for anyone who has crossed puberty is not in the least pleasant – now it’s cold, now it isn’t; now it’s fat, no, it isn’t; now it fits, Ha! Now it doesn’t! All very confusing... For someone who has prided on knowing her mind since she was three, this was allgoing horribly wrong.
    Come due date, and Sense, as usual has managed to get herself into a pickle and is once again, very nearly banned from the hospital*! Can the Baa-lamb (who has the patienceof a saint) and Sense’s parents (whose understanding parallels the Dalai Lama) guide her through these tumultuous times? Will the little one survive Sense’s adventures unscathed? And what other adventures are in store for Sense and family in this journey called Motherhood? 
    *She staunchly insists this is through no fault of hers and blames it squarely on extenuating circumstances.
  • Mool Chanakya Niti
    Vigyan Bhushan
    280 238

    Item Code: #KGP-192

    Availability: In stock

    आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान् विभूति थे, जिन्होंने  अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री होने के साथ ही नीतिशास्त्रज्ञ के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवनानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह निःस्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।
    वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारु ढंग से संचालित करने के लिए चाणक्य द्वारा बताई गई नीतियाँ और सूत्रा अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। उनके सिद्धांतों में निहित अर्थों की महत्ता समझते हुए ही कई विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों में भी ‘चाणक्य नीति’ पर शोध और अध्ययन किया जा रहा है। ऐसे विलक्षण व्यक्ति के अमूल्य वचनों को सार-रूप में प्रस्तुत करती इस पुस्तक में ‘चाणक्य नीति’ और ‘चाणक्य सूत्र’ के साथ ही ‘अर्थशास्त्र’ को भी सम्मिलित किया गया है।


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Akhilesh (Paperback)
    Sushil Sidharth
    250 213

    Item Code: #KGP-7191

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : अखिलेश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, श्रृंखला तथा अँधेरा।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अखिलेश   की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • 20-Best Stories From Russia (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-351

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words? 
    In this first in the 20-BEST series, we bring to you short stories and classics from a land that is as enigmatic as intriguing. Russian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious—as well as the equally famous Russian authors. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.  
    With stories like The Bet and Vanka by Chekhov, God sees the truth but waits by Leo Tolstoy, The Queen of Spades by Alexander Pushkin, Her Lover and One Autumn Night by Gorky, The Cloak by Gogol, The Signal by Garshin, this book is a compilation of 20 famous Russian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Russia.  
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    425 340

    Item Code: #KGP-248

    Availability: In stock

    अथर्ववेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की अन्तिम कड़ी ‘अथर्ववेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें अथर्ववेद के 120 मन्त्रों को दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। अथर्ववेद की विषयवस्तु अत्यन्त रोचक तथा विविधता लिए हुए है। यही नहीं--ज्ञान, शिक्षा तथा गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर भी यहाँ प्रकाश डाला गया है। परिवार में अतिथि की महत्ता का उल्लेख हुआ है तो अन्य पारिवारिक सम्बन्धों की समरसता का महत्त्व बताया गया है। शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य दोनों ही जीवन में रहते हैं। अथर्ववेद का यथार्थवाद दोनों का वर्णन भी करता है तथा अशुभ से, पाप से मुक्ति की राह बताता है, प्रायश्चित्त का विधान भी करता है।
    यद्यपि व्यक्तिगत सौख्य के लिए यहाँ शत्रुनाशविषयक मन्त्र भी हैं तथा कुछ जादू-टोने जैसी क्रियाएँ भी वर्णित हैं परन्तु तब भी समष्टिगत कल्याण की उपेक्षा नहीं हुई है। आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ होने के नाते यहाँ रोगों के नाम, लक्षण तथा उपचार विधियाँ वर्णित हैं। इन विधियों की विविधता व्यक्त करती है कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद के ऋषि कितना सजग थे। वनस्पतियों, औषधियों के नाम, उनके गुण तथा रोग-विशेष में उनके उपचारात्मक प्रयोग भी बहुधा वर्णित हुए हैं।
    राजनीति पर यहाँ विशिष्ट सामग्री उपलब्ध है। राजा, उसकी सेना, अस्त्र-शस्त्र, युद्धनीति और शत्रुनाशपरक प्रार्थनाओं का अपना महत्त्व है। विभिन्न वृक्ष, लताओं, वनादि के वर्णन तथा जल, वायु को सम्बोधित सूक्तों से पर्यावरण- विषयक चिन्तन झलकता है। ‘भूमिसूक्त’ में प्रथम बार ‘धरती माँ’ का उल्लेख है--‘माता भूमिः पुत्रोअह पृथिव्याः’--‘भूमि माता है मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।’ यह माता-पुत्र के गहन सम्बन्ध धरती का पर्यावरण संरक्षण करता है तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए सन्नद्ध भी करता है। सबके भीतर दिव्यता है, सब प्रेमभाव से जुड़े हैं, जुड़े रहें। विश्व संरक्षण, विश्व कल्याण के तत्त्व सत्य, ऋत, दीक्षा, ज्ञान, तप, यज्ञादि हैं। आतंक हिंसा से जूझते विश्व में अभयता का साम्राज्य हो--यही कामना व्यक्त हुई है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो ‘मन से युवा’ हैं तथा प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को आधुनिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Dhoop Ke Beej
    Hemant Kukreti
    225 203

    Item Code: #KGP-649

    Availability: In stock

    ‘धूप के बीज’ हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हेमंत कुकरेती का पाँचवाँ संग्रह है। किसी अच्छे कवि के पाँचवें संग्रह का आना उसके और उसकी भाषा दोनों के लिए उल्लेखनीय होता है। नब्बे के दशक में आए हिंदी कवियों में हेमंत की कविताएँ अलग से पहचानी जाती हैं। उन्होंने अपना मुहावरा पा लिया है। इधर उनकी भाषा की त्वरा ही नहीं बदली है, उसमें निहित चुभन का पारा भी चढ़ा है। ऐसा किसी चमत्कार के कारण संभव नहीं हुआ है। यह तब संभव होता है जब कवि की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि में परिपक्वता और स्पष्टता आती है; जब उसके लगभग सभी भ्रम तिरोहित हो जाते हैं; जब वह 'मनुष्य' और 'छाया मनुष्य' का अंतर करते हुए विषाद से भर जाता है। कवि को पता है कि कुछ लोगों ने कविता को खेल और मजाक बना दिया है। ऐसे कुकवियों के लिए कविता में जीवन की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण नहीं है। हेमंत के इस संग्रह की कविताएँ इस पतनशील प्रवृत्ति का प्रतिवाद करते हुए काली रात के विरुद्ध धूप के बीज रोपने की आकांक्षा रखने और देने वाली कविताएँ हैं।
    ये कविताएँ हमारे अपने समय में संबंधें की ऊष्मा और जीवन के तापमान का पता देती हैं। ये समय के कुचक्र को परिभाषित करती हैं और हर उस ‘चाल’ पर उँगली रखती हैं जो आत्मीयता के लिहाफ के भीतर अनवरत चलती रहती है। आजकल जब कविताएँ बहुत अबूझ होती जा रही हैं तब हेमंत की साफ-सुथरी कविताएँ पढ़ना सुखद अनुभव की तरह है। हेमंत बिना किसी बनावटी गंभीरता के अपनी बात कहते हैं और कविता बनी रहती है। वे कविता में बहस नहीं करते बल्कि बहसों को कविता में लाते हैं और पाठक के मन में उतार देते हैं। उनकी कविताएँ यदि बाजार के चरित्र को बारीकी से पकड़ती हैं तो जीवन के रंग को भी। कहना चाहिए, उनकी कविता दुःख का विलोम रचना जानती है। 
    एक कवि के रूप में हेमंत स्मृतियों का महत्त्व जानते हैं। वे जानते हैं कि स्मृतियाँ मनुष्य की थाती होती हैं। जो जितना जीवंत होता है, उसके पास उतनी ही अधिक स्मृतियाँ होती हैं। 
    हेमंत के पास अपने पहाड़ की, गाँव-जवार की, दिल्ली की, प्रेम की, तमाम साथियों और घटनाओं की अपार स्मृतियाँ हैं जो उनके कवि को मित्र की तरह ऊर्जस्वित करती हैं। उनकी शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो यथास्थिति के विरुद्ध उम्मीद न जगाती हो। कहा जा सकता है कि वे नाउम्मीदी के इस कठिन समय में उम्मीद के कवि हैं।
    यह संग्रह इसका प्रमाण है कि हेमंत की कविताएँ उस ओर तीक्ष्ण निगाहों से देखती हैं, जिधर ठीक से देखा नहीं गया है। वे शहर की निस्पंद हो रही देह में सिहरन जैसी कोई चीज तलाशते हैं और पाते हैं, 'कोई सिहरन पैदा नहीं होती/शहर के जिस्म में/वह थोड़ा और मर जाता है।' इस संग्रह की कविताएँ किंतु, परंतु और लेकिन को पीछे छोड़ती हुई निष्कवच सत्य के साथ खड़ी हैं।
    हेमंत की कई कविताएँ पितृसत्ता का नया मायावी चेहरा दिखाती हैं। 'घर से चली जाती हैं जो औरतें' और 'घरों में काम करने वाली औरतें' जैसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं। हिंदी के समकालीन काव्य परिदृश्य पर ऐसे कितने कवियों की मौजूदगी है जो हेमंत की तरह कह सकें-'साहित्य के आलोचक चुक गए/और बन गए कवियों के निंदक।' इस संग्रह की कविताएँ यथार्थ के कई चेहरे लेकर आई हैं। बुजुर्गों के बारे में उनकी सादगी से कही पंक्तियों में छुपा घाव बहुत गहरा है।
    इसी तेज नजर के कारण हेमंत शहरी जीवन को व्यक्त करने वाले बड़े कवि हैं। इस कविता में दया दिखाने की कोई अपील नहीं है क्योंकि कवि जानता है कि पूँजी के सौंदर्यशास्त्र में दया और करुणा घिनौने शब्द हैं। बुजुर्गों पर बात करते हुए जब हेमंत इस मार्मिक पंक्ति को लिखते हैं कि 'हँसी भी एक तरह का रोना है' तो समकालीन समय का नागरिक होने पर रोना आता है। इस संग्रह की अंतिम कविता हेमंत की बड़ी रेंज का पता देती है। इस संग्रह की सभी कविताएँ कविता की स्वाभाविक जमीन पर खड़ी हैं। इनमें समाई हुई लयात्मकता इनकी ताकत है। लंबे अंतराल के बाद आया हेमंत कुकरेती का यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक सार्थक और जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।
  • Chaar Lambi Kahaniyan
    Aruna Sitesh
    200 180

    Item Code: #KGP-9156

    Availability: In stock

    इस संग्रह में प्रस्तुत हैं डॉ. अरुणा सीतेश की चार बहुचर्चित कहानियां, जो धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि में लंबी कहानी अथवा लघु उपन्यास के रूप में प्रकाशित एवं प्रशंसित होकर उनके विभिन्न संग्रहों में सम्मिलित हैं । 
  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Baadalon Mein Barood
    Madhu Kankria
    300 249

    Item Code: #KGP-474

    Availability: In stock

    हिंदी में यात्रा-वृत्तांत लिखने की उल्लेखनीय परंपरा रही है। कथाकार मधु कांकरिया ने ‘बादलों में बारूद’ के द्वारा इस परंपरा को एक सार्थक समकालीनता प्रदान की है। यह कहना मुनासिब होगा कि अपने को खोजते हुए लेखिका ने भूगोल, इतिहास, संस्कृति, पुरातत्त्व, आदिजीवन, पुरातन प्रकृति, अलक्षित लोकमन और अदम्य अस्तित्व के कई कोने-अंतरे झांक लिए हैं। मधु कांकरिया ने परिवर्तन की पदचाप भी सुनी है। उन्होंने ‘अभावों के लोकतंत्र’ को भी देखा है और इस प्रक्रिया में जो वृत्तांत रचा है वह इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर जीवंत है। 
    लोहरदगा और गुमला के आदिवासी अंचल, धरधरी की चढ़ाई और पलामू, यूमथांग और हिमालय-प्रांतर, नेपाल, शिलांग, सुंदरवन और सजनारवाली टापू, चेन्नई, लद्दाख और पैनगोंग, कालडी--इन जगहों पर घूमते हुए मधु कांकरिया ने अनुभवों का एक ख़ज़ाना एकत्रा किया है। अपने अनुभवों को पारदर्शी बनाकर बेहद रचनात्मक भाषा में उन्होंने पाठकों तक पहुंचाया है। इस यायावरी में कहीं कोई पूर्वाग्रह नहीं है। यथार्थ को उसके अधिकाधिक आयामों में देखने, परखने व सहेजने की ईमानदार कोशिश है।
    लेखिका ने रूप और विरूप दोनों को देखा है; शब्दांकित किया है। यात्रा करते हुए ज़रूरी विमर्शों पर ठहरकर उन्होंने ‘सभ्यताओं’ के सच पर भी रोशनी डाली है। असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश जैसी जगहों पर कई तरह की नाइंसाफियां देखकर वे लिखती हैं, ‘सभ्यता की इन महायात्राओं की नींव में हमारी उदासियां भरी हुई हैं। हर सभ्यता वहां के मूल निवासियों...वहां के आदिवासियों को कुरूप बनाकर ही इतना आगे बढ़ी है। आज हम जाग रहे हैं और चाहते हैं ऐसी व्यवस्था कि इतिहास के वे काले पृष्ठ फिर दोबारा न खुलें।’ इस पुस्तक की ऐसी अनेक विशेषताएं इसे अन्य यात्रा-वृत्तांतों में विशेष बनाती हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Om Dhingra
    Sudha Om Dhingra
    250 213

    Item Code: #KGP-9378

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ सुधा ओम ढींगरा
    ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा ओम ढींगरा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘पासवर्ड’, ‘टाॅरनेडो’, ‘बेघर सच’, ‘कमरा नंबर 103’, ‘सूरज क्यों निकलता है?’, ‘क्षितिज से परे...’, ‘वह कोई और थी...’, ‘विकल्प’, ‘अनुगूँज’ तथा ‘काश! ऐसा होता...’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार सुधा ओम ढींगरा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Toro Kara Toro-1 (Nirman)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-1574

    Availability: In stock


  • Nasha Jeevan Ka Saar Nahin
    Jagat Ram Arya
    50

    Item Code: #KGP-1228

    Availability: In stock

    नशा करने वाला अपना मनुष्यत्व खो बैठता है, स्वास्थ्य व पैसे की बरबादी कर गृह-कलह को जन्म देता है और समाज में अपनी प्रतिष्ठा भी गंवा बैठता है। जिस दिन से व्यक्ति नशा करने लगता है, समझिए कि उसी दिन से वह अपने विनाश का मार्ग प्रशस्त कर लेता है। अगर बीच ही में समय रहते संभलकर वह नशे से किनारा कर लेता है तब तो ठीक है वरना यह मार्ग अंततः उसे दुर्दशा और दुर्गति के कंटीले रास्तों पर घसीटता हुआ मौत के अंधेरे गहरे गर्त में धकेल देता है। इस पुस्तक में नशाखोरी के दुष्परिणामों को उजागर करने और उनसे बचने से संबंधित एक प्रेरणादायी, शिक्षाप्रद कथा है।
    —जगतराम आर्य
  • Gujrat : Sahakarita, Samaj Seva
    Neelam Kulshreshtha
    420 357

    Item Code: #KGP-599

    Availability: In stock

    गुजरात गांधी जी, सरदार पटेल, विक्रम साराभाई परिवार, अमूल डेरी, अपनी सहकारिता व औद्योगिक प्रगति के कारण जाना जाता है लेकिन ये बड़े-बड़े नाम हैं । समाज के उत्थान के लिए अनेक लोग अपनी आत्मा में नन्हे-नन्हे दीप संजोए बैठे हैं, गांधी जी के व साहित्यिक मूल्यों को अपने जीवन में जीते हुए । यदि अन्य प्रदेश प्रगति करना चाहते हैं तो इस समृद्धतम प्रदेश गुजरात से संबंधित निम्न बिंदुओं का विश्लेषण करें जिनसे समाज के भौतिक ही नहीं ,मानवता के विकास के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
    ० वडोदरा के महाराजा सयाजीराव तृतीय के शासनकाल की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की जा सकती है। उनकी दी हुई परंपरा के कारण ये शहर 'कलाकारों का मक्का' कहलाता है। लेखिका इसे 'सिटी ऑफ इंटरनेशनल 'सोल्स' कहती हैं ।
    ० गांधी जी की प्रेरणा से भारत  द्वितीय महिला संगठन  'ज्योति संग' की स्थापना हुई व सन् 1920 में एक स्त्री अनुसूइया साराभाई ने टेक्सटाइल मिल की भारत की सर्वप्रथम सबसे वृहद ट्रेड यूनियन संगठित की ।
    ० विश्व भर में लोकप्रिय होती जा रही लोक अदालत को  श्री हरिवल्लभ पारिख ने रंगपुर (क्वांट) स्थित आनंद  निकेतन आश्रम में जन्म दिया  ।
    ० मैग्सेसे पुरस्कार विजेता इला भट्ट की 'सेवा' संस्था सेल्फ एम्प्लॉयड वीमन एसोसिएशन आज़ भी अपनी तरह की विश्व की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है । 
    ० विश्व में संभवतः एकमात्र उदाहरण है यहाँ के शहरों व गांवों में फैला पुस्तकालयों के नेटवर्क का संगठन 'गुजरात पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल' ।
    ० एशिया में सहकारी बैंक अन्योन्य बैंक, महिला सहकारी बैंक व उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करने वाली जागृत ग्राहक संस्था सर्वप्रथम यहीं संगठित हुई ।
    ० डॉ. जी. एम. ओझा ने भारत ही नहीं, एशिया में भी पर्यावरण संरक्षण की संस्था 'इनसोना' सन् 1975 में यहीं स्थापित की ।
    ० श्री सूर्यकांत पटेल का चालीस एकड़ जमीन में बनाया विश्वविख्यात फार्महाउस वडोदरा में है। 
    ० भारत में महाराष्ट्र में दो, सिर्फ गुजरात में ही तीन स्टॉक एक्सचेंज हैं जहाँ सभी राज्यों से अधिक पैसे का निवेश होता है ।
    ० विकलांगों द्वारा संस्था बनाकर विकलांगों की सहायता के उदाहरण अन्य प्रदेशों में दुर्लभ हैं । 
    ०  'गुजराती नी गजी नो तडियो भा तो नथी' इस कहावत का अर्थ जानिए इस पुस्तक से ।
    ० अस्मिता : गुजरात से एक साहित्यिक आंदोलन' इस पुस्तक से जानिए क्यों 'एक्सेल गुप्त इंडस्ट्रीज' में  प्रबंधन व मज़दूरों का कभी झगड़ा नहीं हुआ ।
    ० विश्यविख्वात आर्कीटेक्ट कर्ण ग्रोवर, जिनके हैदराबाद में बनाए सोहराबजी ग्रीन बिजनेस सेंटर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ग्रीन बिल्डिंग घोषित किया गया है, व उनके साथियों द्वारा स्थापित हेरिटेज ट्रस्ट के प्रयासों से चांपानेर को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है । ग्रोवर जी की नई उपलब्धि है कि उनकी बनाई बी एन एमरो बैंक को भी विश्व की पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ इमारत घोषित किया गया है । 
    ० यदि किसी शहर का उत्थान करना है तो वडोदरा की स्वयंसेवी  संस्थाओं ‘बड़ौदा सिटिजंस काउंसिल' व 'यूनाइटेड वे ऑफ बड़ौदा' को समझना होगा ।
  • Vyavaharik Shailivigyan (Hindi)
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    400 320

    Item Code: #Kgp-vs

    Availability: In stock


  • Megha Megha Pani De
    Madhukar Singh
    60

    Item Code: #KGP-1155

    Availability: In stock

    मेघा-मेघा पानी दे
    (एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक)

    गांव की एक डगर। सामने बड़ा-सा चरागाह है। कृष्ण एक ऊंचे टीेले पर बैठा है। तीन-चार लड़के कुछ दूरी पर एक-दूसरे से कटे हुए बैठे हैं। कृष्ण की बंसी के स्वर धीरे-धीरे तेज होते जा रहे हैं।
  • Naya Vidhaan
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-633

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    200 180

    Item Code: #KGP-2078

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "संपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Deshraag
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 280

    Item Code: #KGP-9306

    Availability: In stock

    ‘देशराग’ सुविज्ञ और सुप्रतिष्ठित कवि-आलोचक-संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अध्ययन व मनन को रेखांकित करती एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। रचना के अपूर्व आयाम विकसित करने के साथ-साथ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘दस्तावेज़’ जैसी उल्लेखनीय साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते हुए शब्द की संस्कृति को शिखर तक पहुंचाया है। यह पत्रिका संतुलित, सकारात्मक व संपन्न सामग्री के लिए तो प्रशंसित है ही, इसके संपादकीय प्रत्येक पाठक की अमूल्य धरोहर हैं। ‘देशराग’ में कुछ ऐसे ही विचारोत्तेजक संपादकीय संगृहीत हैं।
    राजनीति, समाज और साहित्य के विविध पक्षों पर ‘दस्तावेज़’ के इन संपादकीयों में विचार किया गया है। लेखक के शब्दों में, इन टिप्पणियों में साहित्य, संस्कृति, भाषा, समाज और व्यक्तियों के प्रति जो कुछ भी व्यक्त हुआ है, वह गहरे देशराग के ही कारण। भारत का साधरण आदमी और उच्चतर मूल्य ही इन टिप्पणियों का पक्ष रहा है और उसे संकट में डालने वाला सब कुछ विपक्ष। भाव का जो अंश रचना में ढलने से रह गया, वही इस सीधे कथन के रूप में व्यक्त हुआ।
    विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने इन लेखों के माध्यम से स्वस्थ विमर्श का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे ‘निर्णयात्मक’ होकर विचार नहीं करते। एक चिंतन प्रक्रिया चलती है, तर्क मुखर होते हैं, पक्ष-विपक्ष प्रकट होते हैं, व्यापक सामाजिक निहितार्थ खुलते हैं–तब कोई निर्णय उपलब्ध होता है। भाषा में वे सारे तत्त्व हैं जिनसे मिलकर ‘हिंदी जाति का तेजस्वी गद्य’ बनता है। 
    देश और उसमें गूंजने वाली प्रशस्त सामाजिकता के राग को चीन्हने के लिए ‘देशराग’ बहुमूल्य पुस्तक है।
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri (Paperback)
    Leeladhar Jaguri
    150

    Item Code: #KGP-1442

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    200 180

    Item Code: #KGP-479

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Katha Samay : Srijan Aur Vimarsh
    Shashi Kala Rai
    245 221

    Item Code: #KGP-905

    Availability: In stock


  • Paarijat (Novel)
    Nasera Sharma
    795 596

    Item Code: #KGP-778

    Availability: In stock


  • Yeh Dilli Hai
    Raj Budhiraja
    125

    Item Code: #KGP-1961

    Availability: In stock

    मैं इतना कहना चाहुँगी कि मैंने दिल्ली में रहकर सुखद-दुखद और त्रासद अनुभव किए हैं लेकिन मैंने सुखद अनुभवों को ही अभिव्यक्ति प्रदान की है । अभी तक मैंने दिल्ली पर तीन पुस्तके लिखी हैं-'दिल्ली अतीत के झरोखे से, 'हाशिये पर' और 'हाशिये पर दिल्ली' । ऐसी दिल्ली की चारों दिशाओं से सुख व्यापता रहे । इन्हीं शब्दों के साथ मैं ये पुस्तक (जिसका नामकरण मैंने खुद किया है) अपने दिल्लीवासियों को सौंपने का प्रयास करती हूँ। सस्नेह आपकी
    --राज बुद्धिराजा

  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastva (Paperback)
    Jitendra Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7018

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
  • Naamdev Rachanavali
    Govind Rajnish
    320 272

    Item Code: #KGP-146

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora (Paperback)
    Sudha Arora
    180

    Item Code: #KGP-420

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सुधा अरोड़ा 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjiv (Paperback)
    Sanjeev
    80

    Item Code: #KGP-1271

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : संजीव
    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    सजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
  • Phalon Ki Baagbaani
    Darshna Nand
    595 476

    Item Code: #KGP-822

    Availability: In stock

    फलों की बागबानी
    फल हमारे दैनिक आहार के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं। यह स्वास्थ्यवर्द्धक होते है और आवश्यक विटामिन, खनिज लवण और अनेक पोषक तत्वों से भरपूर रहते है । बिना फल-सब्जियों के भोजन अपूर्ण रह जाता है । वर्तमान में जबकि अपना देश कुपोषण और प्रदूषण का शिकार बना हुआ है, फलों का महत्त्व और भी अधिक बढ जाता है। बेल, जामुन, आँवला, पपीता, नीबू, अमरूद, अंजीर, हरड़, बहेडा व अन्य कुल फलों को तो यदि सीधे औषधि ही कह दिया जाए तो अनुचित न होगा ।
    वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दशा में फलों के अंतर्गत क्षेत्रफल व फल उत्पादन बढाना नितांत आवश्यक है । आम, कटहल, केला आदि फल व आलू तथा अन्य कंद वाली सब्जियां तो भोजन के रूप में ही खाए जा सकते है । फिर भी क्षेत्रफल और उत्पादन से वृद्धि लाना केवल उसी दशा में संभव है, जबकि उद्यान-स्वामी को आम, आंवला, पपीता जैसे फलों में अफलन के कारण व समाधान का ज्ञान हो तथा फल-वृक्षों में वष्टि-व्याधियों, खाद-पानी, काट-छांट  आदि जैसी आवश्यक कर्षण क्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी हो ।
    इस पुस्तक की रचना लेखक द्वारा किए गए शोध-विकास कार्यों, अपने पूर्व ज्ञान, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से अध्ययनोपरांत व अन्य स्रोतों से साभार प्राप्त सामग्रियों, क्रियात्मक अनुभवों, समय-समय पर औद्यानिक राष्ट्रीय  अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों-संगोष्टियों में भाग लेकर प्राप्त ज्ञान के आधार पर की गई है ।
    प्रस्तुत पुस्तक विभिन्न विभागों के विभिन्न स्तर के अधिकारियो, कर्मचारियों तथा शिक्षण व शोध संस्थानों के पुस्तकालयों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इसके साथ ही विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों हेतु धरोहर साबित होगी ।
  • Sachitra Yogasan
    Om Prakash Sharma
    495 347

    Item Code: #KGP-615

    Availability: In stock

    भारत सदा से ऋषि-मुनियों, योगियों और दार्शनिकों का देश रहा है। यहां के निवासी सदा ही ज्ञान की खोज में लगे रहे हैं। आज नाना प्रकार की नई-नई सुविधएं मौजूद हैं, फिर भी व्यक्ति अधूरा, अतृप्त और अशांत है। उसका मन आज भी दुविधा में पड़ा है। नई पीढ़ी दिशाहीन हो गई लगती है। आत्महत्या करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अनेक भारतीय असफल रहकर पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाते जा रहे हैं। वे भूल चुके हैं कि हम उन ऋषियों की संतान हैं, जिनके ज्ञान का डंका कभी पूरे विश्व में बजता था।
    इस ऋषि-परंपरा में महर्षि पतंजलि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके द्वारा प्रतिपादित योग-दर्शन के परिणामों को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी स्तब्ध रह गए हैं।
    महर्षि पतंजलि ने विश्व-भर के प्राणियों के जीवनकाल का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात् चैरासी लाख योगासनों का चुनाव किया और विकारों से बचकर सुखी एवं त्यागमयी जीवन जीने की विधि खोज निकाली।
    योगासन के धीरे-धीरे अभ्यास से आप गंभीर बीमारियों से भी बच सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक महर्षि पतंजलि द्वारा निरूपित सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।
  • Dohra Abhishaap (Paperback)
    Kaushlya Baisntari
    120

    Item Code: #KGP-290

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
    —मस्तराम कपूर 
  • Sharat Ka Katha Sahitya (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    320 288

    Item Code: #KGP-205

    Availability: In stock


  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maitreyi Pushpa
    Maitreyi Pushpa
    280 238

    Item Code: #KGP-2073

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फैसला', 'तुम किसकी हो बिन्नी', 'उज्रदारी', 'छुटकारा', 'गोमा हँसती है', 'बिछुड़े हुए', 'पगला गई है भागवती', 'ताला खुला है पापा', 'रिजक' तथा 'राय प्रवीण' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kitaab Ke Bahaane
    Nasera Sharma
    700 560

    Item Code: #KGP-KKB HB

    Availability: In stock

    आलोचना भी सृजनात्मक हो सकती है? यह विश्वास इस पुस्तक के वे सारे लेख देते हैं, जो हिंदी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी व अंग्रेज़ी पुस्तकों पर लिखे गए हैं। जिनके द्वारा ज़िंदगी के कुछ अहम मुद्दे और संवेदना का संसार हमारे सामने उजागर होता है। ‘अलिफ़ लैला’ और ‘हज़ार व यक दास्तान’ की क़िस्सागोई की तरह किताब के बहाने भी किसी एक बिंदु से अपनी बात उठा तर्क व तथ्य के सहारे एक लेखक को कई लेखकों, इलाक़ों, विचारधाराओं और यथार्थ की अनगिनत पगडंडियों से जोड़ती अपनी परिक्रमा पूरी कर पाठकों को सोच के उस धरातल पर ले जाकर खड़ा करती है, जो उनको मौलिकता प्रदान करती एक नई दृष्टि देती है। किसी एक किताब का फ़लक कितना विस्तृत हो सकता है, इसके उदाहरण ये लेख हैं, जो देशी और विदेशी लेखकों द्वारा सभ्यता, समाज, साहित्य, नारी-आत्मकथा जैसे विषयों पर लिखे गए हैं। ये लेख सात सौ वर्ष पहले लिखी पुस्तक से लेकर बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों तक लिखी कृतियों से हमारा परिचय कराते हैं। लेखिका का अपना विश्वास हैµ‘‘किताबों के अलावा मेरा कोई ख़ुदा नहीं है।’’
  • Manav Adhikar Aur Ham (Paperback)
    Urmila Jain
    140

    Item Code: #KGP-285

    Availability: In stock

    मानव अधिकार और हम
    हिंदी में प्रति वर्ष एक हज़ार से अधिक पुस्तकें छपती  हैं, पर अभी तक कोई ऐसी पुस्तक मेरे देखने में नहीं  आई है जिससे जन-सामान्य को सहज-सरल भाषा में मानव अधिकार संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके। हिंदी की इस कमी का ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में मानव अधिकार की धारणा सहित अन्य विषयों के संबंध में भी चर्चा की गई है । 
    मानव अधिकार का उल्लंघन कब, कैसे और क्यों  होता है और हो सकना है—इसके कुछ उदाहरण देते हुए यह भी बतलाया गया है कि अधिकांश देश किस प्रकार सैद्धांतिक रूप से तो मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा का समर्थन करते हैं और इसी के आधार पर उन्होंने अपने-अपने देश में तरह-तरह के कानून भी बनाए हैं, पर जहाँ नक उन पर अमल  करने की बात है-इस संबंध में अधिकांश, देशों का रिकॉर्ड बहून ही निराशाजनक है ।
    प्रस्तूत पुस्तक में बाल अधिकार उल्लंघन और बालकों के यौन शोषण का उल्लेख करते हुए बतलाया गया है कि किस प्रकार अपराधियों का दोष सिद्ध होने के बावजूद उनके विरुद्ध कोई ऐसी कार्यवाई नहीं की जाती, उन्हें ऐसा दंड नहीं दिया जाता कि इस प्रकार के अपराधों पर रोक लगे ।
    -उर्मिला जैन

  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 240

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock

    ”भारत का वह एक प्रान्त था, प्रान्त की वह राजधानी थी, राजधानी का वह क्लब था। देखें तो पूरा देश ही था... क्योंकि अफसर जो यहाँ आते थे, वे देश के कोने-कोने से थे।“...
    ”ये जो खेल रहे हैं...आला सर्विस के हैं, बाहर और यहाँ खेल में भी वे स्टार हैं। यहाँ से जाकर कुर्सी पर बैठ जायेंगे, सरकार हो जायेंगे। सरकारी खाल ओढ़े बैठे। उस खोल के भीतर सब छिपा रहता है, जो यहाँ खेल में झलक जाता है क्योंकि खेल में भीतर की प्रवृत्तियाँ बाहर आये बिना नहीं रहतीं।
    स्टार...जो ये खुद को लगाते हैं, या जंगल चर रहे जानवर, किसिम-किसिम के जानवर...ये क्या हैं...गधा सोच रहा था।“
    प्रशासन के इस जंगल में हाथी, हिरन, ऊँट, घोड़ा, खच्चर, तेंदुआ, रीछ, बायसन, बन्दर तो हैं ही, बारहसींगा, नीलगाय और शिपांजी भी हैं। सबसे ऊपर है शेर-सीनियर। वह जाल भी खूब दिखाई देता है जो उनकी उछलकूद अनायास ही बुनती होती है। यह है ‘अरण्य-तंत्र’, गोविन्द मिश्र का ग्यारहवाँ उपन्यास, जिसमें वे जैसे अपनी रूढ़ि (अगर उसे रूढ़ि कहा जा सकता है तो)-संवेदनात्मक गाम्भीर्य-को तोड़ व्यंग्य और खिलंदड़ेपन पर उतर आये दिखते हैं। यहाँ यथार्थ को देखा गया है तो हास्य की खिड़की से। फिर भी ‘अरण्य-तंत्र’ न व्यंग्य है, न व्यंग्यात्मक उपन्यास। अपनी मंशा में यह लेखक के दूसरे उपन्यासों की तरह ही बेहद गम्भीर है।
    ”बायीं तरफ़ की सिन्थैटिक कोर्ट-कोर्ट नं. 2 के ठीक ऊपर लॉन के किनारे कभी दो बड़े पेड़ थे, जिनमें से एक पहली कोर्ट बनाने के लिए जो खुदाई हुई थी उसके दौरान बलि चढ़ गया। दायीं तरफ़ की कोर्ट-कोर्ट नं. 1 के आखिरी छोर पर भी दो बड़े पेड़ थे-जुड़वाँ, एक हल्के गुलाबी रंग के फूलों वाला, एक हल्के बैगनी रंग के फूलों वाला। उनमें से एक कोर्ट नं. 1 के तैयार होने के बाद शेर-सीनियर की सनक और सियार-पाँड़े की चापलूसी में ढेर हो गया। तो बड़े पेड़ अब दो ही बचे थे...एक इस तरफ़, एक उस तरफ़...
    दो वे पेड़ अलग-थलग पड़े, अकेले थे, उदास...भयभीत भी।“ 
  • Rang-Saakshatkaar
    Jai Dev Taneja
    650 488

    Item Code: #KGP-817

    Availability: In stock


  • Grameen Samaj(Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    290 261

    Item Code: #KGP-206

    Availability: In stock


  • Antariksh Anveshan Ki Vartmaan Pragati
    Kali Shanker
    450 338

    Item Code: #KGP-9142

    Availability: In stock

    अंतरिक्ष अन्वेषण की वर्तमान प्रगति
    आज अंतरिक्ष और अंतरिक्ष अन्वेषण मानव के लिए बेहद दिलचस्पी और आकर्षण का विषय बना हुआ है तथा एक सामान्य मानव इससे संबंधित अधिकाधिक जानकारी हासिल करना चाहता है। हाइटेक विषय होने के कारण अंतरिक्ष और अंतरिक्ष अन्वेषण के विभिन्न पहलुओं और विषयों की जानकारी प्रायः एक स्थान पर उपलब्ध नहीं हो पाती है। प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से अंतरिक्ष जैसे जटिल विषय को ‘गागर में सागर’ जैसे स्वरूप में भरने का प्रयास किया गया है। 
    इस पुस्तक ‘अंतरिक्ष अन्वेषण की वर्तमान प्रगति’ के माध्यम से अंतरिक्ष के विभिन्न अभियानों, अंतरिक्ष के उपयोगी स्वरूपों, अंतरिक्ष अन्वेषण के विभिन्न तरीकों, अंतरिक्ष पर्यटन एवं अंतरिक्ष व्यवसायीकरण, भावी अंतरिक्ष अन्वेषण के नए आयामों, स्पेस वाक, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन अल्फा, गैर मानव अंतरिक्ष यात्रियों तथा अंतरिक्ष में हर्ष और विषाद जैसे जटिल विषयों को एक स्थान पर सरल और ज्ञानवर्द्धक भाषा में लिखकर एकीकृत किया गया है। 
    अंतरिक्ष अन्वेषण से संबंधित प्रेरणादायक अनेक हस्तियों–जान केप्लर, आर्थर सी. क्लार्क, सिवोल्को- वोस्की, जान ग्लेन, एलीन कालिंस, आइजक न्यूटन इत्यादि के विषय में भी वर्णन किया गया है, जो पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेंगे।
  • Naamdev Rachanavali (Paperback)
    Govind Rajnish
    90

    Item Code: #KGP-1493

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Sangharsh Ki Pratimurti : Aang Saan Su Ki (Paperback)
    M.A. Sameer
    120

    Item Code: #KGP-7078

    Availability: In stock

    आग सान सू की यह नाम एक ऐसी महिला का है, जिसने अपने असाधारण धैर्य और असीमित देशप्रेम को भावना से अपने देश बर्मा को 70 वर्ष की तानाशाही सैन्य सरकार से मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र की स्थापना करके विश्च भर को नारी-शक्ति से परिचित कराया हैं। इस महान् महिला सू की का जीवन कठिन संघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहने के गुण और तानाशाहों की कुटिल प्रताड़नाओँ से भरा रहा है।
    प्रस्तुत पुस्तक 'संघर्ष की प्रतिमूर्ति -- आंग सान सू की : जीवन दर्शन' में आंग सान सू की के जीवन से जुडी घटनाओँ व तथ्यों को सरस, सरल और रोचक भाषाशैली में कलमबद्ध करने का प्रयास किया गया है। अहिंसा को अपना प्रमुख अस्त्र मानने वाली आग सान सू की के जीवन पर आधारित यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठक को अवश्य रुचिकर लगेगी।
  • Boojho To Jaanen
    Vinod Sharma
    60

    Item Code: #KGP-1107

    Availability: In stock


  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan (Paperback)
    Surendra Tiwari
    450 360

    Item Code: #KGP-391

    Availability: In stock


  • Sikhon Ka Itihaas (Paperback) (Two Valumes)
    Khushwant Singh
    950 760

    Item Code: #KGP-268

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Triya Hath
    Maitreyi Pushpa
    300 255

    Item Code: #KGP-82

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रहीपुस्तक को पाठकों ने सराहा। उसके प्रत्याशित अंत पर बहुत-सी स्त्रियाँ मुग्ध हुईं और रो पड़ीं। फोन आएपत्र आए। हम आपस में संगति बिठाते हुए एकमएक नजर आए। आप मानें या  मानेंमगर यहीं कहानी प्रभावहीन हो गई। विगलन और आँसुओं में वह ताकत कहाँजो कथा को सफल ही नहींसार्थक भी बना दे। इसी आधार पर बेतवा बहती रहीपढ़िए और तब तक कोई राय  बनाइएजब तक कि प्रस्तुत पुस्तक में आए पात्रों से जुड़ी यह दूसरी कहानी  पढ़ लें। 

    यह मैं इसलिए कह रही हूँ कि मेरी करुणाजनित कथा क्रंदन भरी पुस्तक के बारे में आप सुन चुके हैं या पढ़ चुके हैंजिसने अपनी विस्तारवादी प्रकृति से वास्तविकता और गल्प के अंतर को मिटा डाला। लेकिन गल्प ही तो ऐसा सशक्त साधन हैजो वास्तविकता का सच्चा भरोसा देता चलता है।

    आज का युवा समीक्षक कहता हैµकथानक और कथ्य का साँचा घिसा हुआ हो तो अच्छी या सार्थक कहानी की संभावना पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।इसी वाक्य की रोशनी में मैं अपनी भावनाओं को समझने का प्रयास करती हूँ और उन पात्रों के लिए कसौटी बनाती हूँजो बेतवा बहती रहीउपन्यास में आए हैं। त्रिया-हठउन्हीं पात्रों के खरे और खोटेपन की कहानी है

    मैत्रेयी पुष्पा  
  • Sayru Se Ganga
    Kamlakant Tripathi
    850 595

    Item Code: #KGP-SSG HB

    Availability: In stock

    अठारहवीं शती का उत्तरार्द्ध ऐसा कालखंड है जिसमें देश की सत्ता-संरचना में ईस्ट इंडिया कंपनी का उत्तरोत्तर हस्तक्षेप एक जटिबहुआयामी राजनीतिक-सांस्कृति संक्रमण को जन्म देता है। उसकी व्याप्ति की धमक हमें आज तक सुनाई पड़ती है। सरयू से गंगा उस कालखंड के अंतर्द्वंद्वों का एक बेलौस आईना है। सामान्य नजीवन की अमूर्त हलचलों और ऐतिहासिक घटित के बीच की आवाजाही से प्रचलित विधाओं की परिधि का अतिक्रमण कर एक विशिष्ट विधा की रचना बनाती है।अकारण नहीं कि समें इतिहास स्वयं एक पात्र है और सामान्य एवं विशिष्टमूर्त एवं अमूर्त के तानेबाने को जोड़ता बीच-बीच में स्वयं अपना पक्ष रखता है। इस दृष्टि से ‘सरयू से गंगा  एक कथाकृति के रूप में उस कालखंड के इतिहास की सृजनात्मक पुनर्रचना का उपक्रम भी है।

    सरयू से गंगा’ की कथात्मक उपजीव्य ध्वंस और निर्माण का वह चक् है जो परिवर्तनकामी मानव-चेतना का सहजसामाजिक व्यापार है कथाकृति के रूप में यह संप्रति प्रचलित वैचारिकी के कुहासे को भेदकर चेतना के सामाजिक उन्मेष को मानव-स्वभाव के अंतर्निहित में खोजती है और समय के दुरूह यथार्थ से टकराकर असंभव को संभव बनानेवाली एक महाकाव्यात्मक  गाथा का सृजन करती है।

    फ़ॉर्मूलाबद्ध लेखन से इतरजीवन जैसा है उसे उसी रूप में लेते हुएउसके बीहड़ के बीच से अपनी प्रतनु डंडी बनानेवाले रचनाकार को स्वीकृति और प्रशस्ति से निरपेक्ष होनापड़ता है। लेकिन तभी वह अपने स्वायत्त औज़ारों से सत्य के नूतन आयामों के प्रस्फुटन को संभव बना पाता है। तभी वह वैचारिक यांत्रिकता के बासीपन से मुक्त होकर सही अर्थों में ‘सृजन’ कर पाता है।  सरयू से गंगा   ऐसे ही मुक्त सृजन की ताज़गी से लबरेज़ है। लेखीपतिमामासावित्रीपुरखिन अइयामतईनाई काकाशेख़ चाचाजमीलरज़्ज़ाक औरजहीर जैसे पात्र मनुष्य की जिस जैविक और भावात्मक निष्ठा को अर्घ्य देकर जेय बनाते हैंवह अपने नैरंतर् में कालतीत है। मानवता के नए बिहान की नई किरण भी शायद वहीं कहीं से फूटे।

  • Gandhi Ko Samajhane Ka Yahi Samay
    Jagmohan Singh Rajput
    300 240

    Item Code: #KGP-GKSKYS

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी वह महामानव हैं जिनकी प्रासंगिकता हर दौर में बनी रहेगी। व्यवस्थित जीवन जीने के लिए गांधी जी ने जो सूत्र दिएवे उनके व्यक्तित्व की भाँति आज भी उतनी महत्ता रखते हैं जितनी तत्कालीन समय में थी। जीवन के जिस भी क्षेत्र में उन्होंने जो भी अनुभव प्राप्त किएवही अनुभव उन्होंने साररूप में मानव जाति को प्रदान किए। वे जीवन के हर क्षेत्र-चाहे वह शैक्षिक हो या राजनीतिक-के प्रति बहुत गंभीर थे। उनका विचार था कि सामयिक क्रांति के पहले सुषुप्त समाज को जाग्रत करना जरूरी है और ऐसा तभी हो सकता है जब शिक्षा की प्रकाश-किरणें सब तक पहुँचें। इसके लिए उन्होंने वैचारिक चिंतन ही नहीं कियाअपितु व्यावहारिक प्रयोग भी किए।

    गांधी जी का मानना था कि शिक्षा वही उचित है जो बच्चों को उनके उत्तरदायित्व और कर्तव्य का बोध कराए। उनके अनुसार शिक्षा तो वही सही है जो चरित्र का उचित दिशा में निर्माण करे। प्रस्तुत पुस्तक गांधी को समझने का यही समय अपने में गांधी जी द्वारा प्रतिपादित चारित्रिकशैक्षिकसामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों को समाहित किए हुए है। इन मूल्यों में जो विकृति आई हैउसे दूर करने के लिए हमें गांधी को समझना होगा और गांधी को समझने का यही समय उपयुक्त है।

     

    स्वतंत्रता के बाद के सभी शिक्षा संबंधी अधिकांश दस्तावेजों में चरित्र निर्माण तथा मानव मूल्यों की शिक्षा पर बल दिया जाता रहा है। मगर स्थिति पहले से अधिक चिताजनक ही होती जा रही है। गांधी जी के जन्म के 150वें वर्ष में व्यक्तित्व-निर्माण और शिक्षा से व्यक्तित्व-विकास पर गहन विचार-विमर्श के द्वारा एक ऐसी रणनीति तैयार की जानी चाहिए जिसमें सभी की