Rangey Raghav Teen Charchit Upanyas

Rangey Raghav

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Surabhi Prakashan

  • ISBN No: 9789380631165

रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएं अपने समय को लांघकर भी जीवित रहती हैं। रांगेय राघव के तीन उपन्यासों—‘आग की प्यास’, ‘छोटी सी बात’ और ‘दायरे’ को पाठकों की सुविधा के लिए यहां एक ही जिल्द में प्रस्तुत किया जा रहा है—
‘आग की प्यास’ रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केंद्र में ग्रामीण जीवन है—वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धर्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेंद्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है।
‘छोटी सी बात’ रांगेय राघव का अत्यंत लोकप्रिय एवं पठनीय उपन्यास है। कलेवर में भले ही यह लघु है परंतु अपने कथ्य में अत्यंत विराट है। कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जीवंत दस्तावेज है।
‘दायरे’ उपन्यास का केंद्र एक अवैध (?) बच्चे और उसकी मां की यातना है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष के संबंधों से लगाकर धर्म-संस्कृति तक को अपने दायरे में ले लिया है। एक तीव्र संवेदनात्मक तथा वैचारिक द्वंद्व उपन्यास में शुरू से आखिर तक चलता रहता है। रांगेय राघव ने हिंदी कथा साहित्य को रोजा, सत्यदेव, फादर तोलियाती के रूप में तीन अमर पात्र इस उपन्यास में दिए हैं...

Rangey Raghav

रांगेय राघव 17 जनवरी, 1923 को जन्म आगरा में । मूल नाम टी०एन०बी० आचार्य (तिरुमल्लै नम्बाकम् वीर राघव आचार्य) । कुल से दाक्षिणात्य, लेकिन ढाई शतक से पूर्वज वैर (भरतपुर) के निवासी और वैर, बारौली गांवों के जागीरदार । शिक्षा आगरा में । सेंट जॉन्स कॉलेज से 1944 में स्नातकोत्तर और 1948 में आगरा विश्वविधालय से गुरू गोरखनाथ पर पी-एच०डी० । हिंदी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत पर असाधारण अधिकार । 13 वर्ष की आयु में लेखनारंभ । 23-24 वर्ष की आयु में ही अभूतपूर्व चर्चा के विषय । 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद लिखे रिपोर्ताज 'तूफानों के बीच' से चर्चित। साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, संगीत और पुरातत्त्व में विशेष रुचि थी । साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में सिद्धहस्त थे । मात्र 39 वर्ष की आयु से कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, सभ्यता और संस्कृति पर शोध व व्याख्या के क्षेत्रों को 150 से भी अधिक पुस्तकों से समृद्ध किया । अपनी अद्भुत प्रतिभा, असाधारण ज्ञान और लेखन-क्षमता के लिए सर्वमान्य अद्वितीय लेखक थे। संस्कृत रचनाओं का हिंदी, अंग्रेजी में अनुवाद। विदेशी साहित्य का हिंदी में अनुवाद । 7 मई, 1956 को सुलोचना जी से विवाह। 8 फरवरी, 1960 को पुत्री सीमन्तिनी का जन्म। अधिकांश जीवन आगरा, वैर और जयपुर में व्यतीत । आजीवन स्वतंत्र लेखन । हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार (1951), डालमिया पुरस्कार (1954), उत्तर प्रदेश सरकार पुरस्कार (1957 व 1959), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) तथा मरणोंपराते (1966) महात्पा गांधी पुरस्कार से सम्मानित । विभिन्न कृतियाँ अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित और प्रशंसित । लंबी बीमारी के बाद 12 सितंबर, 1962 को मुंबई में देहांत ।

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