Beech Ki Dhoop

Mahip Singh

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789380146225

बीच की धूप

अथक शब्दकर्मी महीप सिंह का प्रस्तुत उपन्यासबीच की धूप' इस देश के उस दौर की कहानी कहता है जब लोकतंत्र के मुखौटे में डरी हुई राजनीतिक सत्ता तमाम तरह के अलोकतांत्रिक दंद-फंद के सहारे स्वयं को कायम रखने की कोशिशों में क्रूर से क्रूरतर होती जा रही थी।

सभी आदर्शात्मक शब्द अपनी परिणति में मनुष्य के विरोधी ही नहींशत्रु सिद्ध हो रहे थे। विचारधारा और धर्म अंततः यंत्रणा और नरसंहार के कारक बन रहे थे।

इसका विरोध करने के दावे लेकर आने वाले राजनेताओं में कोई गहरी एवं व्यापक अंतर्दृष्टि और दूरदृष्टि नहीं थी।

समाज में प्रगति का अर्थ किसी भी प्रकार अधिकाधिक आर्थिक सुविधाएँ पा लेना भर बनता जा रहा था, जिसके चलते नैतिक-अनैतिक की सीमारेखा का मिटते जाना स्पष्ट लक्षित हो रहा था। सत्ता या सत्ता से निकटता की आकांक्षा संभ्रांत वर्ग को मूल्यगत विवेक से विमुख कर रही थी तो निम्न-मध्य वर्ग को अपराध का ग्लैमर आकर्षित करने लगा था।

इस आतंककारी परिदृश्य में सतह के नीचे खदबदाती कुछ सकारात्मक परिवर्तनकामी धाराएँ अपनी राह खोजने की प्रक्रिया में अवरोधों और हिंसक प्रतिरोधों से टकरा रही थीं। स्त्री की अस्मिता और दलित चेतना ऐसी ही घटनाएँ थीं।

बीच की धूप' में लेखक ने निकट अतीत की उन प्रवृत्तियों को अपनी कलात्मक लेखनी का स्पर्श देकर जीवंत कथा बना दिया हैजो आज की परिस्थितियों के मूल में हैं। यह ‘अभी शेष हैसेआरंभ हुई महीप सिंह की उपन्यास त्रयी का दूसरा चरण भी है और स्वतंत्र उपन्यास भी।

वरिष्ठ लेखक का यह उपन्यास अनेक प्रश्न पाठक के समक्ष रखता है। उनके द्वारा प्रस्तुत मार्मिक, विचारोत्तेजक एवं रोचक कृतियों की श्रृंखला में एक नई कड़ी जोड़ताबीच की धूप' अविस्मरणीय होने की पात्रता लिए हुए है।

Mahip Singh

महीप सिंह जन्म : 15 अगस्त, 1950 जन्म-स्थान : जिला उन्नाव (उत्तर प्रदेश) शिक्षा : एम०ए० (हिंदी), डी०ए०वी० कॉलेज, कानपुर (1951), पी-एच०डी०, आगरा विश्वविद्यालय, आगरा (1963) व्यवसाय प्राध्यापक-खालसा कॉलेज, मुंबई (1955-63), श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज, दिल्ली (1963-93), विदेश अध्ययन की कन्साई यूनिवर्सिटी, हीराकाता जापान में एक वर्ष तक अतिथि प्राध्यापक (1975-76) रचनाएँ कहानी-संग्रह : 'सुबह के फूल', 'उजाले के उल्लू', 'घिराव', 'कुछ और कितना', 'कितने संबंध', 'धूप की अंगुलियों के निशान', 'सहमे हुए', 'इक्यावन कहानियाँ', 'चर्चित कहानियाँ' तथा तीन खंडों में 'समग्र कहानियाँ' । उपन्यास : 'यह भी नहीं' (हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी, पंजाबी, मलयालम में भी प्रकाशित) संपादन : 25 पुस्तकों का संपादन पुरस्कार : उ०प्र० हिंदी संस्थान पुरस्कार, भाषा विभाग (पंजाब), शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय पुरस्कार, हिंदी अकादमी (दिल्ली) पुरस्कार, छठे हिंदी सम्मेलन (सितंबर, 1999 लंदन) में साहित्यिक सेवाओं के लिए विशिष्ट सामान स्मृति-शेष : 24 नवम्बर, 2015

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