Guru-Dakshina

Sanjiv Jaiswal

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9789380048574

गुरु-दक्षिणा
"सर, आप चाहते थे कि मैं केवल दो रातों के लिए आपके पास आ जाऊं लेकिन आपका बेटा पूरी जिंदगी के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता है," दीपा ने एक-एक  शब्द पर जोर देते हुए कहा ।
सड़ाक...सड़ाक...सड़ाक...जैसे नंगी पीठ पर चाबुक पड़ रहे हों। प्रो. कुमार का सर्वांग कांप उठा। उन्होंने कभी स्वप्न में भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी।  दीपा ने एक झटके में उनके चेहरे का नकाब नोच डाला था। अपने बेटे के सामने ही उन्हें नंगा कर दिया था। उनका चेहरा सफेद पड़ गया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सारा रक्त चूस लिया है।
अवाक तो प्रकाश भी रह गया था। चंद क्षणों तक तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करें। फिर उसने दीपा की बाहों को पकड़ झिंझोड़ते हुए कहा, "दीपा, तुम होश में तो हो। तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो?"
"अच्छी तरह मालूम है लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे डैडी रिसर्च पूरी कराने के लिए मुझसे क्या गुरु-दक्षिणा मांग रहे थे । यदि सत्य उजागर किए बिना मैं तुमसे शादी कर लेती तब तुम्हारे डैडी जिंदगी भर मुझसे आंखें न मिला पाते । वे भले ही गुरु का धर्म भूल गए हों लेकिन मैं शिष्या का धर्म नहीं भूली हूँ। इसलिए अपनी बहू के सामने आजीवन जलील होने की जलालत से मैं उन्हें मुक्ति देती हूँ। यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी ।"

-इसी संग्रह से

Sanjiv Jaiswal

संजीव जायसवाल 'संजय'
जन्म : 1959
प्रकाशित कृतियां-
आठ उपन्यास, नौ कहानी-संग्रह, 25 चित्र-कथाएं और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 850 से अधिक कहानियां एवं व्यंग्य-लेख प्रकाशित ।
रेडियो एवं टी.वी. पर कई कहानियां एवं भेंटवार्ताएं प्रसारिता। 
पुरस्कार-
भारत भरकर का भारतेन्दु दृरिश्चंद्र पुरस्कार ( 2005 एवं 2010), उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सूर पुरस्कार (2005 ) तथा पं. सोहनलाल द्विवेदी पुरस्कार (2005), राष्ट्रीय स्तर की कई कहानी प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार, यूनीसेफ द्वारा कहानियां प्रकाशित, सी.बी.टी. एवं कई अन्य संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित ।

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