Khed Nahin Hai

Mridula Garg

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789380146379

खेद नहीं है
मृदुला गर्ग की छवि पाठकों के बीच अब तक एक कथाकार की रही है। धीर-गंभीर पर ऐसा कथाकार, जिसके कथानकों में व्यंग्य की सूक्ष्म अंतर्धारा बहती है। इस पुस्तक में संकलित लेखों से गुज़रने के बाद यह धारणा पुष्ट होगी कि खाँटी व्यंग्य-लेखन की रसोक्ति पर भी उनकी पकड़ प्रभावी है। इनमें वे जिस पैनेपन से व्यवस्था में धँसे विद्रूप की काट-छाँट करती हैं उसी तर्ज़ पर पूरे खिलंदड़ेपन के साथ हमारे भीतर उपस्थित विसंगतियों को भी सामने ला खड़ा करती हैं। 
दरअसल, ये सभी लेख पिछले कुछ वर्षों से ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका में ‘कटाक्ष’ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित हो रहे हैं, जिनके ज़रिए वे अपने आसपास पसरी विडंबनाओं की शिनाख़्त कर पाठकों के सामने पेश करती हैं, बिना किसी लाग-लपेट के। जब जहाँ जैसा ठीक लगा, उसे वहाँ वैसा ही बयान कर दिया। कोई बंदिश नहीं। न भाषा की, न शैली की और न ही विधा की। पर उनकी इसी अनुशासनहीनता से ये लेख विशिष्ट बन पड़े हैं। मज़े की बात यह भी कि इस बेतकल्लुफ़ी को लेकर उनके मन में ज़रा भी ‘खेद नहीं है’।
इन्हें पढ़ना इसलिए भी ज़रूरी है कि इस बहाने हमें खुद पर हँसने का मौक़ा मिलेगा। और शायद सोचने का भी।

Mridula Garg

मृदुला गर्ग
जन्म : 25 अक्तूबर, 1938

1960 में उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स से अर्थशास्त्र में एम०ए० किया और तीन साल कॉलेज में अध्यापन किया । पहली कहानी 'रुकावट' 'सारिका' पत्रिका में 1971 में छपी । पहला उपन्यास 'उसके हिस्से की धूप' 1975 में प्रकाशित हुआ और उसे मध्य प्रदेश साहित्य परिषद से 'महाराज वीरसिंह अ०भा० पुरस्कार' प्राप्त हुआ । अब तक छह उपन्यास प्रकाशित हुए है । पाँच अन्य उपन्यास हैं :  'वंशज' , 'चित्तकोबरा', 'अनित्य', ‘मैं और मैं' तथा 'कठगुलाब' । 'कठगुलाब' को वर्ष 2004 का 'व्यास सम्मान' प्राप्त हुआ ।
करीब 11 संग्रहों में अस्सी कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं । 1973-2003 तक की संपूर्ण कहानियां संगति-विसंगति' नाम से दो खंडों में संगृहीत हैं । इसके अलावा चार नाटक ('एक और अजनबी', 'जादू का कालीन', 'तीन कैदें' व 'साम-दाम-दंड-भेद') तथा तीन निबंध-संग्रह ('रंग-ढंग', 'चुकते नहीं सवाल', 'कुछ अटके कुछ भटके') प्रकाशित हुए है । नाटक 'जादू का कालीन' को 'सेठ गोविन्ददास पुरस्कार' प्राप्त हुआ है ।
'चित्तकोबरा' उपन्यास का जर्मन अनुवाद 1987 में जर्मनी में प्रकाशित हुआ व अंग्रेजी अनुवाद 1990 में । 'कठगुलाब' उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद 'कंट्री ऑफ़ गुडबाइज़' 2003 में प्रकाशित हुआ व जापानी से अनुवाद हो रहा है । अनेक कहानियां भारतीय भाषाओं तथा चैक, जर्मनी, अंग्रेजी, जापानी में अनूदित हैं । अंग्रेजी में अनूदित कहानियों का संग्रह 'डैफ़ोडिल्स ऑन फायर' नाम से प्रकाशित है ।
1988-89 में उन्हें दिल्ली हिंदी अकादमी ने 'साहित्यकार सम्मान', 1999 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने 'साहित्य भूषण' और 2001 में न्यूयॉर्क ह्यूमन राइट्स वाच ने 'हैलमन हैमट ग्रांट' प्रदान किया ।
2003 से वे 'इंडिया टुडे" (हिंदी) में पाक्षिक स्तंभ ‘कटाक्ष' लिख रही है । 2003-2006 तक के लेख 'कर लेंगे सब हज़म' नाम से 2007 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए हैं ।

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