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385

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  • Saabja Patra Katha Kahe
    Shiv Prasad Singh
    80 72

    Item Code: #KGP-9273

    Availability: In stock

    यह धरती कितना देती है!
    अगम अथाह समुद्रों से परिवेष्टित, धु्रव उत्तर में शिव के अट्टहास की उजली ज्योति जहां श्वेत बर्फ में ढंकी है हिमालय की मुकुटमाला-कोच्चि में अरब सागर का निनाद है, सह्याद्रि की पर्वत-श्रृंखलाओं की कड़ी सीमा से छिटककर एक तनी हुई तलवार की तरह लगती है केरल धरणी-बैंगलूर दक्षिण की सुगंधि की मंजूषा और फिर योगिराज श्रीअरविन्द का आश्रम जो बंगाल की खाड़ी का अमूल्य उपहार है सम्पूर्ण मानवता के नाम और ओडीसा, ओड्र, कलिंग अथवा उत्कल जो प्रस्तर मुलायम काष्ठ में बदलने की कला जानता है, एकाश्म पर रचता है युग्म मूर्तियों को मायाजाल।
    सभी कुछ एक साथ एक छोटी-सी पुस्तिका में!
    क्या यह संभव है?
    शायद नहीं।
    पर असंभव को भाषा की लचीली बांहों में बांधना शिवप्रसाद सिंह का प्रिय कर्म है
    आप सुनिये वह कथा जिसे पत्थरों ने गाया, धरती ने फलसों के बहाने उगाया और पकी फसल को काटती दरांती ने फुसफुसाया। 
  • Jalte Huye Daine Tatha Anya Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    225 203

    Item Code: #KGP-25

    Availability: In stock

    जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियाँ
    'जलते हुए डैने' से 'इस बार' तक की कथा-यात्रा के ये अनेक पड़ाव है । अनुभव एवं अनुभूतियों के कई अक्स ! जीवन और जगत में जो हो रहा है, उसके कुछ धुँधले, कुछ उजले रेखा-चित्र ! पर रेखा-चित्रों में यथार्थ की मात्र रेखाएँ ही नहीं, कहीं-कहीं कुछ रंग भी है, जो मिट कर मिटते नहीं । घुलने के बावजूद भी घुलते नहीं । स्मृति-पटल पर ऐसे अंक्ति हो जाते है, जैसे पाषाण पर उकेरी गहरी रेखाएँ । रेखाओं की भी अपनी भाषा होती है । रेखाओं के भी अपने सुख-दु:ख, अपनी व्यथा-वेदना होती है ।  इस निखिल सृष्टि में ऐसा कुछ भी तो नहीं, जो अर्थपूर्ण न हो ! जिसकी अपनी कोई सार्थकता न हो !
    अनेक सत्यों को परिभाषित करती ये सरल, सहज, सपाट-सी कहानियाँ, कहीं कुछ न कह कर भी कितना कुछ नहीं कह जाती । असत्य का यथार्थ, सत्य के यथार्थ से सम्भवत: आज़ अधिक गहरा होता है । अधिक विस्तृत, अधिक प्रामाणिक । प्रासंगिक ही नहीं, अधिक आकर्षक भी । शायद इसलिए हर दौड़ में सत्य के पाँव, झूठ से पीछे रह जाते हैं ।  पर असत्य जीत कर भी हार क्यों जाता है ? जल में पड़ी परछाई पकड़ने की तरह आदमी कुछ चाहता है । परन्तु जो है, और जो होना चाहिए के बीच की संधि-रेखा इतनी धुँधली क्यों है ?

  • Laxmibai
    Jagat Ram Arya
    70 63

    Item Code: #Kgp-Lb

    Availability: In stock


  • Mahayogi Gorakhnath : Sahitya Aur Darshan
    Govind Rajnish
    560 476

    Item Code: #KGP-9344

    Availability: In stock

    महायोगी गोरखनाथ: साहित्य और दर्शन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। प्रस्तुति प्रो. गोविंद रजनीश की है, जिन्होंने इसका संपादन भी किया है। प्रो. रजनीश गूढ़-गंभीर विषयों को सुगम रूप में व्यक्त-व्याख्यायित करने के लिए जाने जाते हैं। इस पुस्तक में उन्होंने भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ मनीषियों में से एक परमयोगी गोरखनाथ के निगूढ़ साहित्य और उसमें निहित दर्शन को संयोजित किया है। गोरखबानी के साथ उसका गद्यार्थ होने से पाठकों के लिए यह सामग्री कई दृष्टियों से पठनीय और संग्रहणीय बन पड़ी है।
    प्रो. रजनीश ने ‘भूमिका के दो अध्याय’ के अंतर्गत गोरखनाथ के व्यक्तित्व और उनकी गुरु परंपरा पर विस्तार से लिखा है। एक व्यक्ति के रूप में योगी गोरखनाथ के जन्म-जाति आदि पर यह प्रामाणिक सामग्री है। प्रो. रजनीश ने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के ये वाक्य उद्ध्ृत किए हैं, ‘गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े धर्मता थे।...उनका चरित्रा स्पफटिक के समान उज्ज्वल, बुद्धि भावावेश से एकदम अनाविल और कुशाग्र तीव्र थी।’ अध्याय 2 में ‘नाथ और सिद्ध’ शीर्षक से इन महान् परंपराओं का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। साथ ही उस आभावलय को भी प्रकट किया गया जिसमें गोरखनाथ की अजेय अस्मिता चमकती है। प्रो. रजनीश के शब्दों में, ‘गोरखनाथ का काव्य दुरूह होकर भी उनके संबंध् में असंख्य दंतकथाओं, लोककथाओं और प्रवादों का जुड़ जाना उनके प्रखर और प्रभावी व्यक्तित्व का परिचायक है।’
    साखी (सबदी) और पद के अंतर्गत गोरखबानी को प्रस्तुत किया गया है। मूल के साथ सरल अर्थ भी है, जो पाठक के लिए उपयोगी है। गोरखनाथ के जीवन दर्शन को समझने के लिए इसका पाठ नितांत आवश्यक है। अनेक विद्वानों ने कबीर आदि परवर्ती संतों पर गोरखनाथ के प्रभाव का उल्लेख किया है, जो सर्वथा उचित है। 
  • Aavahayami
    Ramesh Chandra Shah
    400 360

    Item Code: #KGP-9011

    Availability: In stock

    'आवाहयामि' पुस्तक में श्री जे. एल. मेहता पर लिखे गए संस्मरण में एक उद्धरण है-'कल्पना क्योंकि मूलत: भाषिक होती है इसलिए हाइडेगर का कहना है कि स्वयं भाषा ही बीजरूप में कविता है, पूर्वप्रक्षिप्त अर्थों का ऐसा आकार, जो हमारे वस्तुजगत को प्रकाशित और निर्मित करता है। इसी आधारभूमि पर चिंतक और कवि चिंतन और सृजन के नए रास्ते बनाते हैं।' यानी बड़ी से बड़ी प्रतिमा के भीतर से उपजे विचार या कविता का विस्फोट भी मात्र उसकी प्रतिभा की करामात नहीं होते बल्कि उसके पूर्वजों व तमाम पूर्ववर्ती कवि-चिंतकों द्वारा रची और बार-बार आविष्कृत की गई भाषा की देन भी होते हैं। इसीलिए नई पीढी के लिए यह जरूरी है कि वह न सिर्फ अपनी भाषा को बनाने वाली कविता व चिंतन के पास बार-बार जाए बल्कि उस समय के सरोकारों को भी भली-भांति जाने-बूझे क्योकिं तभी वह अपनी पीढ़ी व अपने समय के तनावों को भी ठीक-ठीक समझ पाएगी ।
    संस्मरणों की यह पुस्तक दरअसल ऐसा ही एक आवाहन है-एक आधुनिक, भारतीय कवि का अपने भाषिक परिवेश के पूर्ववर्ती और समवर्ती कवियों-चिंतकों से सतत संवाद करने, उन्हें और उनके माध्यम से खुद को बेहतर समझने की अदम्य इच्छा का दस्तावेज । वहीं दूसरी और यह संस्मरण एक प्रखर आलोचक को पैनी दृष्टि से देखे गए जीवन-प्रसंगों और हिंदी साहित्य में स्था-समय पर प्रकट हुई गहन चिंताओं, अनुरागों और ऊहापोहों का लेखा-जोखा भी है। इसीलिए यह पुस्तक संस्मरण के सामान्य अर्थों में उन व्यक्तित्वों, जिन पर ये लिखे गए हैं, उनके जीवन के रोचक या प्रेरणादायी घटनाओं का संपुंजन मात्र न होकर हिंदी साहित्य के एक पूरे युगबोध का सिंहावलोकन है ।
    संस्मरण-विधा की साहित्य में अहमियत 'रिक्त स्थानों की पूर्ति' करने वाली हो सकती है जो न केवल उन कवि-चिंतकों बल्कि उस घूरे समय की सर्जना एवं विचार-प्रवाहों को समझने में मदद करें, ऐसा इस पुस्तक के पाठकों को अनुभव होगा।
    ये संस्मरण जिनके बारे में लिखे गए हैं, उनके व्यक्तित्व को उजागर करने के साथ-साथ लिखने वाले की जिज्ञासाओं, अभिरुचियों, खुलेपन और संवाद करने की ललक को भी अनायास ही उजागर करते चलते हैं।
    हिंदी का जैसा लबालब, हिलोरें लेता, चौडा पाट इस पुस्तक में उजागर होता है-उसमें जैसी और जितनी सार्थक बहसें लेखक अपने समय और आपस में एक- दूसरे के लेखन-चिंतन और स्वयं अपने अंतर्द्वंद्वों से कर रहे थे यह देखना आज की पीढ़ी के लिए चकित करने वाला अनुभव हो सकता है। युवा पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने तो हिन्दी के  इस चौडे और जीवंत पाट को जाना ही नहीं है, और एक दुबली, सतही धार जो अब सूखी, तब सूखी- भला किसी को कितना-क्या और कब तक है सकती है ?
  • Toro Kara Toro-1 (Paperback)
    Narendra Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-7041

    Availability: In stock


  • Himanshu Joshi Rachana Sanchayan
    Himanshu Joshi
    995 647

    Item Code: #KGP-589

    Availability: In stock


  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Ikkisveen Sadi : Kavita Aur Samaj
    Jagdish Narayan Shrivastva
    690 621

    Item Code: #KGP-1550

    Availability: In stock

    ‘आज जैसा कष्ट है, उसमें सबसे बड़ी चुनौती तो कवि की ही है। हर युग के कवि को कोई न कोई चुनौती मिलती रही है, चाहे समाज की परंपरा दे, चाहे दर्शन दे, चाहे राजनीति दे लेकिन सबको मिलाकर इतनी बड़ी चुनौती कभी नहीं मिली, जो आज मिली है। हर देश के कवि को मिली है, हमारे देश के कवि को ही नहीं मिली है। ‘अस्ति-नस्ति’ के बीच में अगर हम रोक सकें ध्वंस को तो जीवन बच जाएगा। न रोक सकेंगे तो जीवन जाता रहेगा।...
    यहां नई पीढ़ी के कवि हैं, पुरानी के भी हैं।...दो पीढ़ियां न सामने हों तो चलता नहीं है।...कवियों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जब मित्र की तरह सामने होती हैं तब शायद बड़ा साहित्य बनता है और अगर दोनों लड़ते हैं तो उनकी लड़ाई ही समाप्त हो जाती है।
    जो आज का कवि है वह आज की परिस्थिति को देखे लेकिन युगबोध के साथ वह युगांतरबोध को भी जाने। कविता लिखना एक सामाजिक कर्म तो है ही। समान गति रखता हो वह समाज है, कवि उसी से आता है और उसकी व्यथा जानता है। सुख-दुःख जानता है। चेतना के अनेक स्तर हैं, उनमें एक सहचेतना है। अपने युग को समझने के लिए और बहुत से कर्म के संस्कार इनमें हैं, जो अब चेतना है। अपने युग को समझने के लिए एक पराचेतना भी है। ये सब चेतनाएं एक साथ कविताओं में मिल जाती हैं, तब हमें एक बड़ा कवि मिलता है। इसलिए युगबोध तो है ही आपका, युगांतरबोध भी होगा आपके पास।...जब ये सब मिलते हैं तो एक महान् कवि आता है।
    चिंतन सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया है पर अनुभूति सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया नहीं है। बड़ा कवि होने के लिए विशाल अनुभूति होती है, भाषा-संवेदना होती है, आंसू भी होंगे, हंसी भी होगी।
    ‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू’--इससे बड़ी परिभाषा नहीं है कवि की क्योंकि वह मनीषी है, सब कालों को मिलाकर देखता है, वह परिभू है, सबमें, सबके हृदय को जानता है और स्वयंभू होता है।...
    भाषा-भाव-अनुभूति विलक्षण हो तो आप पूरी समष्टि को बना सकेंगे। पर उसके पहले आपकी कविता पहले आपको बनाएगी। जो कविता आपको नहीं बना सकती, वह किसी को नहीं बनाएगी।’
    ---महादेवी
  • Aids : Tathya Evam Bhrantiyan
    Shuk Deo Prasad
    100 90

    Item Code: #KGP-9144

    Availability: In stock

    एड्स कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है कि रोगी का पारिवारिक या कि सामाजिक बहिष्कार किया जाय जैसा कि पहले कुष्ठ रोगियों प्रति किया जाता था। वैसे कुष्ठ भी अब असाध्य नहीं रहा। इस सामाजिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है। एड्स रोगी को घृणा नहीं आपका स्नेह चाहिए। एक साथ रहने, उठने-बैठने, भोजन करने, सामूहिक स्नान गृह/शौचालय में जाने, वस्त्रों के संप्रयोग से एड्स नहीं फैलता और न ही एक दफ्तर में साथ काम करने से या कि भीड़ भरे स्थानों में, रेल-बस में साथ-साथ सफल करने से। अतः आप एच.आई.वी. संक्रमित/एड्स ग्रस्त व्यक्ति के साथ सहभागिता कर सकते हैं। ऐसी सामाजिकता से उसकी अपनी जिंदगी के प्रति रुझान बढ़ जाएगी।
    एड्स के अधिकांश मामले यौन संसर्ग के देखे गए हैं। फिर दूषित रक्ताधान, साझे ब्लेडों, सुइयों/सिरिंजों के इस्तेमाल से भी संक्रमण होता है अर्थात् शारीरिक द्रव, यौनिक द्रव इसके प्रसार के कारण हें। इन बातों को ध्यान में रखकर और इनसे परहेज करके आप रोगी के साथ मजे से गुजर-बसर कर सकते हैं। एड्स के बारे में बहुत सी भ्रांत धारणाएं समाज में व्याप्त हैं। उन भ्रांतियों का निवारण और तथ्यों की सटीक जानकारी देना ही पुस्तक का मंतव्य है। एड्स के प्रति आम आदमी की भाषा में जागरूकता जगाने के ही उद्देश्य से पुस्तक लिखी गई है।
  • Dropadi Ka Cheer Haran Aur Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    65 59

    Item Code: #KGP-949

    Availability: In stock

    मूल महाभारत का कलेवर वर्तमान में उपलब्ध महाभारत का दशांश रहा होगा। उसके पश्चात् जो मौखिक प्रक्षेप होता रहा है और अब भी होता रहता है, उसका अंत नहीं हैं ऐसे ही कुछ अधिक महत्वपूर्ण विषयों पर इस छोटी-सी पुस्तक में विचार किया गया है। उन्हें अन्तिमेत्थम् के रूप में स्वीकार किए जाने का लेखक का आग्रह नहीं है। सुधीजनो के विचारार्थ प्रस्तुत है।
    —विद्यानन्द सरस्वती
  • Pranaam Kapila (Paperback)
    Devendra Deepak
    250

    Item Code: #KGP-1547

    Availability: In stock

    खंड 'अ' के कवि 
    डॉ. अब्दुल ज़ब्बार, अयोध्या प्रसाद ‘हरिऔध’, अरविंद कुमार तिवारी, अशोक जमनानी, आशाराम त्रिपाठी, इस्माइल मेरठी, कमलेश मौर्य ‘मृदु’, काका हाथरसी, कुंकुम गुप्ता, डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र, कृष्ण गोपाल रस्तोगी, डॉ. कृष्ण मुरारी शर्मा, गणेशदत्त सारस्वत, पं. गांगेय नरोत्तम शास्त्री, पं. गिरिमोहन गुरु, गिरीश ‘पंकज’, चकबस्त, छीत स्वामी, जगदीश किंजल्क, डॉ. जयकुमार ‘जलज’, जयकुमार जैन ‘प्रवीण’, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, तुलसीदास, दिनेश ‘प्रभात’, दिवाकर वर्मा, डॉ. दुर्गेश दीक्षित, आचार्य धर्मेन्द्र, नरहरि, नरेन्द्र गोयल, नारायणदास चतुर्वेदी, परमानंद, डॉ. परशुराम शुक्ल, डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’, प्रकाश वैश्य, प्रताप नारायण मिश्र, प्रद्युम्ननाथ तिवारी ‘करुणेश’, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, प्रेमनारायण त्रिपाठी ‘प्रेम’ , आचार्य भगवत प्रसाद दुबे, भोजराज पटेल, डॉ. मनोहरलाल गोयल, महावीर प्रसाद ‘मधुप’, मुंशीराम शर्मा ‘सोम’, मुक्ति कुमार मिश्र, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. योगेश्वर प्रसाद सिंह ‘योगेश’, रघुनंदन शर्मा, रमेश कुमार शर्मा, रमेशचंद्र खरे, पं. राजेन्द्र तिवारी, डॉ. रानी कमलेश अग्रवाल, महात्मा रामचंद्रवीर महाराज, रामदास मालवीय, आचार्य रामनाथ ‘सुमन’, डॉ. रामप्रकाश अग्रवाल, रामस्वरूप दास, डॉ. राष्ट्रबंधु, लाला भगवानदीन, लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘विश्वबंधु’, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त ‘किंकर’, लेखराम चिले ‘नि:शंक’, वागीश ‘दिनकर’, विजय लक्ष्मी ‘विभा’, डॉ. विमल कुमार पाठक, विमला अग्रवाल, वियोगी हरि, डॉ. शरद नारायण खरे, शिवदीप ‘कनक’, श्याम नारायण पांडेय, श्रीकृष्ण मित्र, श्रीकृष्ण शर्मा, श्रीकृष्ण ‘सरल’, डॉ. श्रीराम परिहार, सुदर्शन ‘चक्र’, सुधेश जैन, डॉ. सुशीला आर्य, सूरदास, हनुमान प्रसाद पोद्दार,  पद्मश्री डॉ. हरिशंकर शर्मा, हरिश्चंद्र टाँटिया, हरीश दुबे
  • Safed Parde Par
    Ramesh Chandra Shah
    150 135

    Item Code: #KGP-1244

    Availability: In stock

    सफेद परदे पर
    उफ कैसे भंवर में आ फंसा हूँ मैं, अपनी ही करनी से ! किसने कहा था यह बखेडा मोल लेने को  बहुत शौक चढा था ना अकेले रहने का? फँसावट नग रही थी बेटा-बहू की गिरस्ती और पोते की माया? अच्छा वानप्रस्थ है यह तुम्हारा, जिससे तुम्हें एक ओर दत्ता-दंपति का सहारा चाहिए और दूसरी ओर रामरतिया का । उधर बेटा-बहू परेशान, इधर बेटी अलग परेशान । क्या अधिकार था तुम्हें उन बेचारों को इस तरह सारी दुनिया के सामने अकारण अपराधी बना देने का?
    ० 
    उन्हें पता भी नहीं चला, कब वह योगिनी महामाया अपनी जगह से उठकर उनके पास आकर खडी हो गई और उनके सिर को, सिर के बालों की जडों को हौले-हौले सहलाने लगी ।… उनकी आँखे पूरी तरह मुँद गई । एक अदभुत शीतल करेंट-सी उनके मस्तक को भेदकर बूँद-बूँद रिसती हुई पोर-पोर में पसर रही है... क्या वे सचमुच होश में है? हैं, तभी न ऐसे अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं, जैसा सुख उनकी स्नायुओं ने अब तक कभी नहीं जाना...

    तुमने कहा था आप क्यों पूछ रहे हैं बाबूजी? क्या मेरी कहानी की किताब लिखना चाहते हैं ? मैं बुरी तरह चौक गया था तुम्हारे मुँह से यह सुनकर । तुम्हें कैसे लगा रामरती, कि मैं  तुम्हारी कहानी लिख सकता हूँ? पहली बार मुझे इलहाम जैसा हुआ कि हर आदमी की यह सबसे बड़ी, सबसे गहरी चाहत होती होगी कि कोई उसे सचमुच पूरा-पूरा समझे और न्याय करे ऐसा न्याय, जो और कोई नहीं कर सकता। सिर्फ लेखक नाम का प्राणी कर सकता है । लेखक, जो भगवान् की तरह लंबा इंतजार भी नहीं कराता । इसी जनम में, इसी शरीर और मन से निवास करने वाली जीवात्मा का एक्स-रे निकाल के रख सकता है ।
    (इसी उपन्यास से)

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar (Paperback)
    Ajit Kumar
    90

    Item Code: #KGP-1384

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजितकुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'उपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bhasha-Praudyogiki Evam Bhasha-Prabandhan
    Prof. Surya Prasad Dixit
    550 495

    Item Code: #KGP-738

    Availability: In stock

    भाषा-प्रौद्योगिकी एवं भाषा-प्रबंधन
    हिंदी भाषा-साहित्य को प्रौद्योगिकी रूप में सुगठित करना और प्रबंध-विज्ञान के सहारे संपूर्ण देश में उसे कार्यान्वित करना संप्रति बहुत बड़ी चुनौती है। पहली आवश्यकता यह है कि भाषा-प्रौद्योगिकी का एक व्यावहारिक शास्त्र बनाया जाए और फिर उसकी प्रविधि तथा प्रक्रिया का परिविस्तार किया जाए। भारत की भाषा-समस्या का निराकरण विधवा-विलाप से नहीं होगा, बल्कि वह संभव होगा विधेयात्मक वैकल्पिक परिकल्पनाओं से। ऐसी ही कुछ वृहत्तर परिकल्पनाओं से उपजी है यह पुस्तक।
    इसमें हिंदी की भाषिक प्रकृति तथा संस्कृति पर विचार करते हुए भाषा के विभिन्न चरित्रों की मीमांसा की गई है। राजभाषा, संपर्क-भाषा, शिक्षण-माध्यम-भाषा, संचार-भाषा और कंप्यूटर-भाषा की शक्ति तथा सीमाओं का विश्लेषण करते हुए यहाँ लेखक ने अनुवाद, वेटिंग, अनुसृजन, पारिभाषिक शब्दावली, संकेताक्षर, दुभाषिया प्रविधि, डबिंग, मीडिया-लेखन, संभाषण-कला, रूपांतरण, सर्जनात्मक लेखन, पत्रकारिता, नाट्यांदोलन, प्रचार- साहित्य-लेखन, कोश-निर्माण, ज्ञान-विज्ञानपरक वैचारिक लेखन, देहभाषा, यांत्रिक भाषा, लोक वाङ्मय, शोध समीक्षा, प्राध्यापन, भाषा-शिक्षण, इतिहास-दर्शन, प्रकाशन, परीक्षण, विपणन, संगोष्ठी-संयोजन, लिपि के मानकीकरण, विभाषाओं के संरक्षण तथा इन विचार-बिंदुओं से जुड़े तमाम पक्षों का बारीक विश्लेषण किया है।
    प्रस्तावना, भाषा-प्रौद्योगिकी, भाषा-प्रबंधन और समाहार नामक चार स्तंभों पर आधारित यह कृति हिंदी भाषा-साहित्य का एक नया ढाँचा निर्मित करने हेतु कृतसंकल्प रही है। इसका अनुगमन करते हुए इस ढाँचे को जन-सहभागिता के सहारे भव्य प्रासाद का रूप दिया जा सकता है। यही आह्नान एक-एक अध्याय में किया गया है। अस्तु, यह मात्रा लेखन मात्रा न होकर समग्रतः एक सुनियोजित भाषांदोलन है। एक रचनात्मक महानुष्ठान !
  • Andhere Mein Juganu
    Ajit Kumar
    240 192

    Item Code: #KGP-1937

    Availability: In stock


  • Paarijat (Novel)
    Nasera Sharma
    795 557

    Item Code: #KGP-778

    Availability: In stock


  • Ek Na Ek Din
    Rajni Gupt
    600 480

    Item Code: #KGP-220

    Availability: In stock

    पिछले कुछ वर्षों में स्त्री-पुरुष संबंधों के असमंजन और असमंजसग्रस्त अवसाद का स्वरूप कुछ बदला है-विशेषकर शहरी मध्यवर्ग के उन परिवारों मेंजहाँ स्त्रियाँ शिक्षित हैंपरिवार के बाहर भी एक बंधु-परिवार (Family of Friends) जिनका है ! वहाँ एक कलाकारअफसरशिक्षक के रूप में इनकी मान्यता हैसम्मान भीनई कहानी के ज़माने की बीमार (‘परिंदे'), बेचारी (‘एक कमज़ोर लड़की की कहानी’, ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है'), बिंदास (‘मचाचा') औरआसानी से बरगलाई जा सकने वाली टाइपिस्ट/पी०ए० (‘आधे-अधूरे’) बालाओं के ज़माने लदेअब जो कथा-नायिकाएँ हैं-कृति या अनन्या की पीढ़ी की-उनका अपना एक अलग प्रभामंडल है-एक प्रेमी का स्थानापन्न वहाँ कईप्रशंसक हो गए हैं। पर कभी-कभी वे चाहे-अनचाहे एक नई तरह की समस्या खड़ी कर जाते हैं-घर मेंऔर बाहर भीखब्तुलहवास पति के अहं पर चोट कर उसे और अधिक खूँखार बना देते हैंकई तरह की ठोस और फोकीअसुरक्षाएँ गढ़ते हैं उसके भीतरतरह-तरह के प्रवाद फैलाते हैंकई दफा अनुचित प्रस्तावों की मूक श्रृंखला से स्लो-पेस में बलात्कार की ऊभ-चूभ पैदा करते हैं और मुसीबत की घड़ी ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। चूँकि वे ‘दोस्त' (?) होते हैं या सहकर्मी यानी कि आस्तीन का साँप-उन्हें उस तरह झटका जाना संभव नहीं होता जैसे प्रकट दुश्मन को झटक सकते हैं। कुल मिलाकर स्थिति ‘तार से गिरेखजूर में अटकेवाली बनती है बेटे कुछ दिनों तकमाँ से सहानुभूति रखते हैंफिर उनकी अपनी एक दुनिया हो जाती है। हाँबेटियों का सखी-भाव अक्सर अंत तक बना रहता हैमित्रबहन या बेटी के रूप में स्त्री का अवलंब स्त्री ही बनती है या उसको खुद ही अपनी सहेली बनजीना होता है।

    तो घर-बाहर-दोनों जगह स्त्री के दुःख के टाँके महीन हुए हैंकई बार खुली आँख से दीखते भी नहींतभी लोग उन्हें ‘खाती-पीतीसुख से ऊबी और बेकार बेचैन महिलाओं का शगलकहते हैंरजनी एक स्त्री-लेंस लेकर सामने आती हैंऔर भूमंडलीकरण (नहींभूमंडीकरणके बाद की पीढ़ी के चौहान साहब और राजीव जैसे फर्राटेदारनो-नॉन्सेसरॉबटनुमा पुरुषों को भी आईना दिखाती हुई उनसे पूछना चाहती हैं कि रैट रेस जीतकर भी चूहा चूहा ही रह जाता है,आदमी तो नहीं हो जाताकंप्यूटर की दुनिया हो या कला-जगत्-स्त्रियों को अपने पाए का और किंचित् विशिष्ट ‘मनुष्यसमझे बिना पुरुष भी आधे मशीन और आधे पशु ही बने रहेंगेदोहरे मानदंड पूँछ की तरह कभी तो झड़ेंगे ही!

    जहाँ तक बच्चों का सवाल है, ‘आपका बंटीभी बड़ा हो गया हैतनावग्रस्त परिवारों में या अकेली माँओं के संरक्षण में पलते बच्चों का मानसिक धरातलउनकी परिपक्वता और (कभी-कभीकटुता भी प्रश्नविकल बंटियों से तोकाफी अधिक होने लगी है।

    पारिवारिक जीवन के इन सब ‘बड़ेकिंतु ‘सूक्ष्मपरिवर्तनों का सजग साक्ष्य वहन करती रजनी की सरल-सहज भाषा रिश्तों के बीच पसरी ‘कच्चे-पके आमों की खट्टी बास’ कई मांसल बिंबों और सूक्ष्म विवरणों में पकड़ती है।उपन्यास में ‘घोरबाइरे’ की बिमोला और ' डॉल्स हाउसकी नोरा के आत्मसंघर्ष का एक नया चरण आपके सामने खुलता चला जाता है...!!

    -अनामिका    
  • Maitreyi Pushpa : Stri Hone Ki Katha
    Vijay Bahadur Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-9041

    Availability: In stock


  • Yoon Banee Mahabharat (Paperback)
    Pratap Sehgal
    60

    Item Code: #KGP-1417

    Availability: In stock

    प्रताप सहगल
    कवि, नाटककार, कथाकार, आलोचक
    जन्म : 10 मई, 1945, झंग, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में)
    प्रकाशित रचनाएँ 
    कविता-संग्रह : 'सवाल अब भी मौजूद है', 'आदिम आग', 'अँधेरे में देखना', 'इस तरह से', 'नचिकेतास ओडिसी', 'छवियाँ और छवियाँ' 
    नाटक : 'अन्वेषक',  'चार रूपांत',  'रंग बसंती', 'मौत क्यों रात- भर नहीं आती', 'नौ लघु नाटक', 'नहीं कोई अंत', 'अपनी-अपनी भूमिका', 'पाँच रंग नाटक', 
    तथा 'छू मंतर' और 'दस बाल नाटक'
    उपन्यास : 'अनहद नाद', 'प्रियकांत' 
    कहानी-संग्रह : 'अब तक', 'मछली-मछली  कितना पानी'
    आलोचना : 'रंग चिंतन', 'समय के निशान', 'समय के सवाल', 
    विविध : 'अंशतः' (चुनिंदा रचनाओं का संग्रह)
    सम्मान एवं पुरस्कार : ० मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ० 'रंग बसंती' पर साहित्य कला परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार ० 'अपनी-अपनी भूमिका' शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत  ० 'आदिम आग' व 'अनहद नाद' हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत ० सौहार्द सम्मान, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ० राजभाषा सम्मान, भारत सरकार ० साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली और अन्य पुरस्कार । 
    संपर्क : एफ- 101, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली- 110027
    फोन : 25100565, मो० : 9910638563
    ई-मेल : partapsehgal@gmail.com 

  • Vaigyanikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #KGP-921

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Boomraing
    Rekha Rajvanshi
    225 203

    Item Code: #KGP-877

    Availability: In stock

    बूमरैंग
    इस पुस्तक की संपादक रेखा राजवंशी को आस्ट्रेलिया के प्रमुख कवियों को जोड़ने और पुस्तक-प्रकाशन का विचार तब सूझा जब कैनबरा और सिडनी में आयोजित कवि-सम्मेलनों में किशोर नंगरानी, अब्बास रजा अलवी, शैलजा चतुर्वेदी, हरिहर झा तथा सुभाष शर्मा जी से उनकी मुलाकात हुई । पर्थ के प्रेम माथुर जी व अनिल वर्मा जी की कविताएं भी उन्हें यहीं सुनने को मिली । बाद में जब वह होली के कवि-सम्मेलन में मेलबर्न गईं तो सुभाष जी से इस बारे से चर्चा हुई और उनके सहयोग तथा ई-पत्रों के माध्यम से इस विचार को आकार मिला । बाद में एडीलेड से राय कूकणा जी व पर्थ से रेनू शर्मा जी को भी इसने सम्मिलित किया गया । 
    रेखा राजवंशी के अनुसार, पुस्तक का नाम 'बूमरैंग' इसलिए रखा गया, क्योंकि 'बूमरैंग' आस्ट्रेलिया की आदिवासी देशीय जनजाति का प्रतिनिधित्व करता है । यह एक ऐसा हथियार है, जिसे किसी भी दिशा में फेंका जाए, यह फेंकने वाले के पास ही वापस आ जाता है । तात्पर्य यह कि भारतीय कवि कहीं भी रहें, उनका हृदय बार-बार अपने देश भारत की और ही वापस जाता है। यानी हर भारतीय प्रवासी चाहे- अनचाहे ही 'बूमरैंग' बन जाता है ।
  • Yatra Ke Panne
    Rahul Sankrityayan
    425 298

    Item Code: #KGP-1923

    Availability: In stock

    यात्रा के पन्ने
    कालजयी व्यक्तिव के स्वामी महापंडित राहुल सांकृत्यायन  की प्रस्तुत पुस्तक 'यात्रा के पन्ने' से उनके द्वारा की गई तिब्बत-यात्राओं को शामिल किया गया है । अपनी प्रमुख कर्मस्थली तिब्बत से लेखक का अत्यंत गहरा एवं भावनात्मक लगाव रहा है । तिब्बत की पहली, दूसरी तथा तीसरी यात्राओं का विवरण इस पुस्तक में आने  से राहुल जी के यात्रा-साहित्य की यह एक उल्लखनीय कृति बन गई है । 'यात्रा  के पन्ने' में जहाँ राहुल जी तिब्बत के सर्वस्व को अपनी चेतस दृष्टि से जान और पहचान पाए है, वहीं इन यात्राओं में उनकी जन-प्रतिबद्धता की झलक भी दिखाई पड़ती हैं । इतिहास-दृष्टि के आलोक में आधुनिक जीवन-दृष्टि को वैज्ञानिक विस्तार देती उनकी यात्राएं पाठक को समृद्ध करने में सक्षम है । तिब्बत की शताब्दियों की स्मृति, निर्माण और ध्वंस को यहीं महसूस किया जा सकता है ।
    इस पुस्तक में संकलित लेखक के पत्रों का भी विशिष्ट महत्त्व हैं । पेरिस, जर्मनी, लंका तथा स्वदेश से लिखे उनके पत्रों में न केवल लेखक का 'वर्तमान' रचा-बसा है बल्कि अपन समय तथा समाज का दस्तावेजीकरण भी हुआ है । इन संकलित पत्रों को इतिहास के संभवत: सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज माना जा सकता है ।
    'यात्रा के पन्ने' पुस्तक का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष है स्वदेशी यात्राओं का । राहुल जी की इस प्रस्तुति में राजस्थान तथा बिहार के अनेक ऐतिहासिक नगरों का यात्रा-वर्णन है, जो इन स्थलों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक निधियों को सामने लाता है
  • Aise Hamaare Harda
    Pradeep Pant
    350 315

    Item Code: #KGP-587

    Availability: In stock


  • Baron Ki Baatein
    Shuk Deo Prasad
    240 216

    Item Code: #KGP-244

    Availability: In stock

    आराम कहां?
    चीनी हमले के बाद हार की वजह से नेहरू जी कुछ हिल से गए थे। एक दिन मौका देखकर उनके सहकारी टी.एन. कौल ने कहा--‘पंडित जी, आप कुछ दिन के लिए विश्राम क्यों नहीं कर लेते? एक सप्ताह आप आराम कर लें तब तक आप काफी तनावरहित महसूस करने लगेंगे।’
    नेहरू जी ने छूटते ही कहा--‘तुमने भी खूब कहा। विश्राम और वह भी एक सप्ताह का? यदि मैं एक सप्ताह बिस्तर पर पड़ गया तो कभी उठ नहीं पाऊंगा। मेरे जीवन में विश्राम कहां?’
    सचमुच पं. जवाहरलाल नेहरू के जीवन का मंत्र ही था चरैवेति-चरैवेति। उन्होंने ही नारा दिया था-- ‘आराम हराम है।’ और जीवन की आखिरी सांस तक वे इस पर अमल करते रहे।
    उनकी मेज पर राबर्ट फ्रास्ट की ये कविताएं लिखी हुई सदा विराजमान रहती थीं: ‘वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप। बट आई हैव प्रामिसेस टू कीप। माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप। माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप।’
    सघन ये वन सुंदर भरपूर
    पर मुझे तो रखनी बात जरूर।
    सोने से पहले तो मुझे जाना
    है मीलों दूर।
    मुझे जाना है मीलों दूर।
    --इसी पुस्तक से
  • Amar Ho Gaya Magar
    Ramesh Bedi
    50

    Item Code: #KGP-1197

    Availability: In stock


  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-5)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-892

    Availability: In stock


  • Apna Hi Desh (Paperback)
    Madan Kashyap
    90

    Item Code: #KGP-1301

    Availability: In stock

    यह चर्चित कवि मदन कश्यप का पांचवां संग्रह है। मदन कश्यप आम आदमी का शोषण करने वाले और उसे उसके हक़ से दूर करने वाले तंत्र पर कड़ी नज़र रखते हैं और उसे बेनक़ाब करने का कोई मौका नहीं चूकते। बाज़ार उनके निशाने पर है, जिसने बड़ी बारीकी से मनुष्य को उपभोक्ता में बदलने का अभियान चला रखा है। उसने न सिर्फ सत्ता को अपने चंगुल में ले लिया है बल्कि सामाजिक मूल्यों पर भी गहरा आघात किया है। उसकी कोशिश है कि सब कुछ उसी के रंग में रंग जाए ताकि हर कोई बाज़ार के मुताबिक ही सोचे ‘कुछ ऐसा चल निकला रंगों का खेल कि बेरंग ज़िंदगियों को भी बदरंग करने लगे हैं रंगों के सौदागर/अब हमारी आकांक्षा, हमारे संघर्ष, हमारी करुणा पर कालिख नहीं रंग-बिरंगे रंग पोते जाते हैं।’ बाज़ार कई रूपों में, कई स्तरों पर सक्रिय है। वह एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें कोई विचार न हो, संघर्ष की कोई बात न हो। वह तकलीफ को भी एक उत्सव में बदल देना चाहता है। आज का समय ऐसा है कि ‘जिसमें कोई बहस नहीं/केवल गिरोहबंदियां हैं/मतभेदों के लिए कोई जगह नहीं।’ यह स्थिति बाज़ार ने ही पैदा की है। उसने एक ऐसा नवधनाढ्य वर्ग तैयार किया है जिसका शेष समाज से कोई संवाद नहीं है, किसी और के प्रति उसके भीतर कोई संवेदना भी नहीं है। यह तबका ग़रीबों की त्रासदी में भी अपने लिए मनोरंजन ढूंढ़ता है। उसके लिए निठारी की त्रासदी भी महज़ एक सूचना है, सनसनी से भरी हुई। वह उसे तटस्थ होकर एक रियलिटी शो की तरह देखता है--‘दूर खड़े तालियां बजा रहे थे/भूसंपदा की उछाल से/रातोरात खरबपति बन चुके धनपशु/उन्हें भा रहा था यह रियलिटी शो।’ निठारी की तरह देश की असंख्य ग़रीब बच्चियों का दर्द इस वर्ग को दिखाई नहीं देता। इसे बस अपनी तरक्की और मुनाफे से मतलब है। यह नया सौदागर है, ‘इन्हें सखुए के बीज नहीं पूरा जंगल चाहिए/हड़िया के लिए भात नहीं सारा खेत चाहिए।’ यह वर्ग आज देश का नियंता बना हुआ है। हमारा शासक वर्ग सीधे या परोक्ष रूप से इसकी दलाली में लगा हुआ है। वह इसी के हित के लिए आदिवासियों से जंगल और ज़मीन छीनने पर आमादा है और इसके लिए हिंसा तक का सहारा लेता है। पर विडंबना यह है कि यह सब वह लोकतंत्र का मुखौटा लगाकर करता है--‘महोदय! लूट और हिंसा के अलावा/और क्या बचा है आपके लोकतंत्र में/आपने पहाड़ बेच डाले/नदियां बेच डालीं जंगल बेच दिया...आपको जिसने भी वोट दिया देश चलाने के लिए दिया होगा देश बेचने के लिए तो नहीं।’ दुर्भाग्य से पढ़ा-लिखा और अपने को बुद्धिजीवी कहने वाला मध्यवर्ग भी नवधनाढ्य तबके की नकल करता है और उसमें शामिल होना चाहता है हालांकि ऊपर से वह बदलाव और क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें करता रहता है। इस पर व्यंग्य करते हुए मदन कश्यप कहते हैं--‘आप क्रांति करना नहीं चाहते/लेकिन क्रांति होते देखना चाहते हैं/आपके बारे में सिर्फ यह तय है/कि कुछ भी तय नहीं है।’ पर इन सबके बावजूद कवि में निराशा नहीं है। उसे जनता की ताक़त पर पूरा भरोसा है क्योंकि वह बड़े-बड़े तानाशाहों को उनकी औकात बता देती है--‘लेकिन यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही/खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया/चारों तरपफ से फेंके जाने लगे जूते।’ मदन कश्यप संघर्ष में ही सौंदर्य देखते हैं। वंचितों और पीड़ितों के लिए संघर्ष करती हुई स्त्री उन्हें औरों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है। गुजरात के दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत समाजसेवी तीस्ता सीतलवाड़ के लिए वह कहते हैं--‘जब हवा में तनी तुम्हारी मुट्ठी/तुम सबसे ख़ूबसूरत लगी।’ यह निश्चय ही एक अलग सौंदर्यदृष्टि है जो स्त्री की गरिमा को प्रतिष्ठित करती है। उनका दृढ़ विश्वास है कि कोई समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब वह स्त्री को स्वतंत्रता और सम्मान दे। इस संग्रह की प्रायः सभी कविताएं बदलाव की गहरी आकांक्षा से भरी हुई हैं।
    --संजय कुंदन
  • Vishva-Kavita Ki Or
    Shyam Singh Shashi
    140 126

    Item Code: #KGP-9082

    Availability: In stock


  • Hindi Ke Srijankarmi
    Sushil Kumar Phul
    495 446

    Item Code: #KGP-532

    Availability: In stock


  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • Datta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150

    Item Code: #KGP-202

    Availability: In stock


  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Paani Kera Budbudaa
    Susham Bedi
    300 270

    Item Code: #KGP-9310

    Availability: In stock

    ‘यही कहानी थी पिया की? यह कथन है या सवाल? नहीं, कथन नहीं हो सकता। ऐसे खत्म नहीं हो सकती यह कहानी! ...शायद जिंदगी का सच यही है। कुछ भी नहीं है वहां पर हम बहुत कुछ भरकर उसी को सच मान बैठते हैं। ...पिया के मन में विरक्ति-सी हुई। सच क्या हस्ती है हमारी? कबीर के ही लफ्जों में पानी के बुलबुले जैसी!’ ये पंक्तियां ‘पानी केरा बुदबुदा’ उपन्यास का सारांश सरीखी हैं। सुप्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी का यह नवीनतम उपन्यास—जीवन, प्रेम, विवाह, सुख, विराग आदि शब्दों को समकालीन संदर्भ देते हुए लिखा गया है। उपन्यास विदेशी पृष्ठभूमि में लिखा गया है, लेकिन इसकी बेचैनियां सार्वदेशिक हैं।
    पिया इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है। उसका वैवाहिक जीवन, विवाह विच्छेद, तलाक के बाद प्रेम को फिर विवाह में बदलने की आकांक्षा, पुत्र और उसका पारिवारिक परिदृश्य—ऐसी अनेक बातों से मिलकर इस उपन्यास की कथावस्तु निर्मित हुई है। इस निर्मिति में निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहन आदि बहुत दिलचस्प तरीके से शामिल हैं। पिया के लिए सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है, पर वह ‘साथ’ चाहती है। विवाह इसीलिए उसे आश्वस्त और आकर्षित करता है। लेकिन नियति या मानव स्वभाव का निर्णय कुछ दूसरा है।
    सुषम बेदी कथानक को गतिशील रखते हुए जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात करती हैं। स्वाभाविक रूप से स्त्री-विमर्श भी आता है। पिया के बारे में लेखिका का कथन है, ‘अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खून के थक्के भी जमे हुए थे।’ ऐसी जाने कितनी विडंबनाएं इस उपन्यास को स्त्री-जीवन का मार्मिक दस्तावेज बना देती हैं। सुषम बेदी का लंबा जीवनानुभव और जनमनोविज्ञान समझने का ढंग भाषा के अनूठे स्वरूप में व्यक्त हुआ है। बेहद पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास। 
  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat
    Bhagwat Rawat
    190 171

    Item Code: #KGP-552

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh
    Sushil Sidharth
    500 450

    Item Code: #KGP-9217

    Availability: In stock

    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 
  • Prem Chand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    70

    Item Code: #KGP-7049

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
    -कमलेश पाण्डेय
  • Koi Aur Raasta Tatha Anya Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    200 180

    Item Code: #KGP-731

    Availability: In stock

    कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक
    यह नया नाट्य-संग्रह आपके हाथों में है । एकांकी के बंधनों को तोड़ने वाले इन नौ लघु नाटकों के विषय अलग-अलग हैं।
     'अंक-दृष्टा' जहाँ रामानुजन की जीनियस को रेखांकित करता है तो 'अंतराल के बाद' में बदलते मूल्यों के बीच माँ एवं पुत्र के संवेदनात्मक संबंधी के बदलने की गाथा है । 'दफ्तर में एक दिन' एक सरकारी दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यशैली एवं उबाऊ माहौल को उकेरता है तो 'कोई और रास्ता' संस्कारों से बँधी एक आधुनिक लड़की की संघर्ष-गाथा है । 'फैसला' में नारी- सम्मान का प्रश्च है तो 'लडाई' जाति के बंधनों के विरोध की दास्तान है । 'वापसी' अपनी जड़ों से उखड़ विदेश बसने की आकांक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते युवा पीढी का बयान है तो 'लम्हों ने खता की थी' एड्स के खतरों से आगाह करने की कोशिश है । इसी तरह से 'मेरी-तेरी सबकी गंगा' में गंगा की पौराणिक कथा को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास है ।
    यानी कुल मिलाकर सभी नाटकों का रंग अलग, मिजाज अलग, समस्या अलग है । मामूली लोगों के जीवन के विविध पक्षों को पकड़ते, परखते ये लधु नाटक आपको बाँधेंगे भी, कोंचेंगे भी ।

  • Kavi Ne Kaha : Uday Prakash_120 (Paperback)
    Uday Prakash
    120

    Item Code: #KGP-226

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : उदय प्रकाश
    सादगी उदय प्रकाश की कविताओं की जान है जो हर उस आदमी से तुरंत रिश्ता कायम कर लेती है जो सामाजिक अन्याय और शोषण की मार उन लोगों के बीच बैठा सह रहा है, जिनके पास आंदोलन और नारे नहीं हैं, सिर्फ खाली अकेले न होने का अहसास भर है... । . . .ये कविताएँ पाठक की संवेदना में बहुत कुछ ऐसा तोड़फोड़ कर जाती हैं, जिनके सहारे वह फिर कुछ नया रचने की ज़रूरत महसूस करने लगता है । किसी भी यातना को कवि बिना उस यातना से मानसिक रुप से गुज़रे हुए प्रेषित नहीं कर सकता । उदय प्रकाश की कविताएँ काफी कुछ इसकी दुर्लभ मिसाल है । -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
    कविताओं में उदय प्रकाश की एक और कलात्मक विशेषता गौरतलब है । वे एक ओर वर्तमान के अलग-अलग संदर्भों और  स्थितियों को लेते हैं, पृथक और विच्छिन्न दुनियाओं को साथ-साथ रख देते हैं, ये पिघलकर एक इकाई बन जाते हैं । इनके 'फ्यूजन' से एक समग्र समय बनता है हम इन पृथक और विभिन्न दिखते संदर्भों और स्थितियों के भीतर की तारतम्यता तक पहुंचते हैं। यहीं कविता का अभीष्ट है। कुछ कविताओं में उदय प्रकाश ने बीज से वृक्ष बनने तक की पूरी प्रक्रिया को उलट दिया है । जैसे कोई विपरीत दिशा में चलती फ़िल्म हो । यह एक रचनाकार का नियति के क्रम में हस्तक्षेप है । -विजय कुमार 
    क्यों ऐसा नहीं हुआ कि उदय प्रकाश की कविताओं में छिपे उनके कथाकार और उनकी कहानियों में छिपी कविता पर सतर्क पाठको का ध्यान जाता और मूल्यांकन की कोई और नई समावेशी पद्धति जन्म लेती ! जिस जादुई यथार्थवाद के लिए …. उदय प्रकाश की कहानियों अनेकार्थी जान पड़ती हैं और एक से अधिक पाठ के लिए पाठकों को उत्युक बनाती हैं उससे मिलती-जुलती अपरिचयीकरण (डिफेमिलियराइजेशन) सरीखी काव्ययुक्ति का इस्तेमाल करके ही उनकी कविताएँ अधिक सार्थक बन सकी हैं । -परमानंद श्रीवास्तव
  • Maharshi Dayanand Saraswati
    Chandrika Prasad Sharma
    200 170

    Item Code: #Kgp-mds

    Availability: In stock


  • Sayru Se Ganga (Novel) (Hard Bound)
    Kamlakant Tripathi
    850 595

    Item Code: #KGP-SSG HB

    Availability: In stock

    अठारहवीं शती का उत्तरार्द्ध ऐसा कालखंड है जिसमें देश की सत्ता-संरचना में ईस्ट इंडिया कंपनी का उत्तरोत्तर हस्तक्षेप एक जटिबहुआयामी राजनीतिक-सांस्कृति संक्रमण को जन्म देता है। उसकी व्याप्ति की धमक हमें आज तक सुनाई पड़ती है। सरयू से गंगा उस कालखंड के अंतर्द्वंद्वों का एक बेलौस आईना है। सामान्य नजीवन की अमूर्त हलचलों और ऐतिहासिक घटित के बीच की आवाजाही से प्रचलित विधाओं की परिधि का अतिक्रमण कर एक विशिष्ट विधा की रचना बनाती है।अकारण नहीं कि समें इतिहास स्वयं एक पात्र है और सामान्य एवं विशिष्टमूर्त एवं अमूर्त के तानेबाने को जोड़ता बीच-बीच में स्वयं अपना पक्ष रखता है। इस दृष्टि से ‘सरयू से गंगा  एक कथाकृति के रूप में उस कालखंड के इतिहास की सृजनात्मक पुनर्रचना का उपक्रम भी है।

    सरयू से गंगा’ की कथात्मक उपजीव्य ध्वंस और निर्माण का वह चक् है जो परिवर्तनकामी मानव-चेतना का सहजसामाजिक व्यापार है कथाकृति के रूप में यह संप्रति प्रचलित वैचारिकी के कुहासे को भेदकर चेतना के सामाजिक उन्मेष को मानव-स्वभाव के अंतर्निहित में खोजती है और समय के दुरूह यथार्थ से टकराकर असंभव को संभव बनानेवाली एक महाकाव्यात्मक  गाथा का सृजन करती है।

    फ़ॉर्मूलाबद्ध लेखन से इतरजीवन जैसा है उसे उसी रूप में लेते हुएउसके बीहड़ के बीच से अपनी प्रतनु डंडी बनानेवाले रचनाकार को स्वीकृति और प्रशस्ति से निरपेक्ष होनापड़ता है। लेकिन तभी वह अपने स्वायत्त औज़ारों से सत्य के नूतन आयामों के प्रस्फुटन को संभव बना पाता है। तभी वह वैचारिक यांत्रिकता के बासीपन से मुक्त होकर सही अर्थों में ‘सृजन’ कर पाता है।  सरयू से गंगा   ऐसे ही मुक्त सृजन की ताज़गी से लबरेज़ है। लेखीपतिमामासावित्रीपुरखिन अइयामतईनाई काकाशेख़ चाचाजमीलरज़्ज़ाक औरजहीर जैसे पात्र मनुष्य की जिस जैविक और भावात्मक निष्ठा को अर्घ्य देकर जेय बनाते हैंवह अपने नैरंतर् में कालतीत है। मानवता के नए बिहान की नई किरण भी शायद वहीं कहीं से फूटे।

  • Maalish Mahapuran (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-514

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    -[इसी पुस्तक से]
  • Haasya Vyangya Ke Vividh Rang
    Barsane Lal Chaturvedi
    160 128

    Item Code: #KGP-1808

    Availability: In stock

    बरसानेलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "हास्य-व्यंग्य के विविध रंग"
    हास्यरस प्रधान कविताएं सैकड़ों वर्षों से लिखी जा रही हैं । आजकल हास्य-कवि सम्मेलन सर्वाधिक लोकप्रिय हैं । आज का मनुष्य इसी के अभाव में जीता है । वह इतना व्यस्त तथा त्रस्त है कि उसके पास हँसने का समय ही नहीं है ।
    हास्यरस के कवियों ने जहाँ विकृति देखी है उसी को लक्ष्य बनाकर कविता रच डाली है । तुलसीदास हो या सूरदास, बिहारी हों या  अलीमुहीब खाँ 'प्रीतम'—हास्यरस की कविताएं सभी न लिखी हैं । किसी ने दुष्टों पर लिखा है तो किसी ने कंजूसों पर, किसी ने भ्रष्ट नेताओं को अपना शिकार बनाया है तो किसी ने दलबदल की प्रवृति को अपना लक्ष्य बनाया है । भ्रष्टाचारी अफसर, मुनाफाखोर  व्यापारी, रिश्वत, मिलावट, तस्करी, कुर्सीमोह- कहने का तात्पर्य ये है कि हास्यकवियों की निगाह से कोई बच नहीं पाया ।
    यह संकलन उन व्यक्तियों तथा प्रवृतियों का सिलसिलेवार 'एलबम' है जो हास्यरस के कवियों की चपेट में आए हैं और जिनकी पोल समय- समय पर खोली गई हैं। यह आलम्बन कोश इन्हें असंगतियों पर व्यंग्यबाण चलाने वाली हास्य-व्यंग्य की कविताओं का प्रथम संग्रह हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ हास्य-काव्य का इतिहास भी प्रस्तुत करता है ।
  • Sunanda Ki Dairy (Paperback)
    Raj Kishore
    195

    Item Code: #KGP-903

    Availability: In stock

    एक थी सुनंदा  ।
    संपन्न परिवार की लड़की । मित्र से पति बने मलय के  साथ नहीं बनी, तो वह किसी नीहारिका की तरह शून्य में विचरण करने लगी । कभी इस शहर में, कभी  उस शहर में  । उसने कई नौकरियाँ कीं, परंतु स्वतंत्रता की उसकी चेतना ने उसे कहीं भी टिकने नहीं दिया । यह एक अदृश्य बेचैनी का शिकार थी । उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे, पर किसी भी उत्तर से उसे संतोष नहीं होता था । उसकी यह खोज ही उसे नैनीताल ले आई, जहाँ वह कुछ दिनों तक विश्राम करना चाहती थी, ताकि आगे की जिंदगी की कोई रूपरेखा उभर सके ।
    एक था सुमित ।
    मस्त, फक्कड़ और विचारशील । माँ-बाप नहीं रहे, तो पारिवारिक संपत्ति को अपने गाँव के कल्याण के लिए समर्पित कर वह आवारगी करने लगा । उसकी एक अंतरंग मित्र मंडली थी, जिसके आर्थिक सहयोग से वह अपनी मनचाही जिंदगी बिता रहा था । उसकी जिंदगी में किताब, शराब और सिगरेट के अलावा और कुछ नहीं था । घुमते-फिरते वह भी नैनीत्ताल आ गया । संयोग से यह उसी गेस्ट हाउस में ठहरा जहाँ सुनंदा ठहरी हुई थी ।
    दोनों की मुलाकात दोनों  के ही लिए एक अविस्मरणीय घटना बन गई । सुनंदा और सुमित विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे, जैसे ईश्वर, धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, स्त्री, लोकतंत्र, मानव अधिकार आदि । इसके साथ ही, दोनों के हृदय अनुराग की आभा से भरते चले गए । लेकिन परिपाक की ऐश्वर्यमयी रात के तुरंत बाद जुदाई का मुहूर्त आ पहुंचा - दोनों की जिंदगी को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए ।
    'सुनंदा की डायरी' विचार-विमर्श के इन्हें घटनापूर्ण दिनों का दिलचस्प दस्तावेज है ।
  • Million Dollar Not Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    80

    Item Code: #KGP-1419

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात है ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Maalish Mahapuran
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-782

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    [इसी पुस्तक से]
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Rameshchandra Shah
    Krishna Dutt Paliwal
    240 216

    Item Code: #KGP-698

    Availability: In stock


  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mahesh Darpan
    Mahesh Darpan
    250 200

    Item Code: #KGP-9382

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : महेश दर्पण

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार महेश दर्पण ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘दिग्विजय’, ‘पछाड़’, ‘जाल’, ‘लेकिन...’, ‘नेवर टु डाइ’, ‘जाने जिगर’, ‘जख्म’, ‘किस्सा सीताराम’, ‘मेरी जगह’ तथा ‘चिड़िया की उड़ान’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महेश दर्पण की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Anant Naam Jigyasa
    Amrita Pritam
    240 192

    Item Code: #KGP-1976

    Availability: In stock

    अनंत नाम जिज्ञासा
    जाने किस-किस काल के स्मरण इंसान के
    अंतर में समाए हुए होते हैं, और जब कुदरत 
    उनको किसी रहस्य में ले जाती है, तो इस
    जन्म की जाति और मजहब बीच में हायल
    नहीं होते…
    इसी से मन में आया कि जो लोग अपनी
    आपबीती कभी नहीं लिखेंगे, उनके इतने बड़े 
    अनुभव, उन्हीं की कलम से लेकर सामने रख
    सकूँ  … 
    ओशो याद आए, जो कहते हैँ- 'अगर आप
    लोग मुझसे कोई प्रश्न न पूछते, तो मैं
    खामोश रहता, मुझे किसी को कुछ भी कहना
    नहीं था, यह तो आप लोग पूछते है, तो
    इतना बोल जाता हूँ...'
    ओशो ने जो इतना बड़ा ज्ञान दुनिया को दिया
    है, वह सब उनकी खामोशी में पड़ा रहता,
    अगर  लोग उन्हें प्रश्न-उत्तर के धरातल पर न
    ले आते... यही धागा हाथ में आया, तो मैंने
    अपनी पहचान वालों के सामने कितने ही प्रश्न
    रख दिए । बातचीत की सूरत में कुछ लिखने
    के लिए नहीं, केवल उनकी खामोशी को
    तोड़ने के लिए । इसीलिए मैं यहीं कई जगह
    अपने किसी प्रश्न को सामने नहीं रख रही,
    लेकिन जवाब में जो उन्होंने कहा, या लिखकर
    दिया, वही पेश कर रही हूँ ।
    -अमृता
  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    120

    Item Code: #KGP-7215

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Science Ki Karamaat
    Dhram Pal Shastri
    100 90

    Item Code: #KGP-9204

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का युग है अर्थात् साइंस की करामात का युग। विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों से सारा संसार चकित है और साथ ही चिंतित भी; क्योंकि आज का विज्ञान कल्याणकारी भी है और विनाशकारी भी। विश्व-भर में वैज्ञानिक अनुसंधानों-आविष्कारों की होड़ लगी हुई है। विज्ञान की इस प्रतिस्पद्र्धा ने मानव-कल्याण के बहुत-से आयाम प्रस्तुत किए हैं, लेकिन साथ ही संपूर्ण मानव जाति को विनाश के कगार पर भी ला खड़ा किया है। विनाशकारी अणु बमों, उद्जन बमों, प्रक्षेपास्त्रों, ध्वंसक राॅकेटों तथा समुद्री पनडुब्बियों का निर्माण वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है।
    इस पुस्तक में इन सभी की प्रारंभ से लेकर अब तक की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है तथा विज्ञान-क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान और उपलब्धियों पर सरल एवं रोचक शैली में प्रकाश डाला गया है। अंतरिक्ष के बारे में जिज्ञासु पाठकों के लिए यह पुस्तक निःसंदेह उपयोगी सिद्ध होगी।
  • Indradhanush
    Vinod Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-992

    Availability: In stock

    सभ्यता के आदिकाल से ही बच्चे नानी या दादी से कहानियां सुनते आए हैं। छापेखाने के आविष्कार के बाद कहानियां पढ़ी जाने लगीं। इससे पहले कहानियां सिर्फ सुनी जाती थीं। टेलीविजन और सिनेता के जन्म के बाद तो वे देखी भी जाने लगीं। कहानी सुनने में अधिक मजा आता है या पढ़ने में या फिी देखने में; इसका फैसला तो आप स्वयं ही कीजिए। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि कहानी पढ़ना सबसे अधिक सुविधाजनक है। दरअसल कहानी सुनने के लिए आपको दादी या नानी पर निर्भर रहना पड़ता है और देखने के लिए टी.वी. सेट पर। आप कहोगे कि यों तो पढ़ने के लिए भी पुस्तक पर निर्भर रहना पड़ता है। आपकी बात में दम तो है मगर, अगर दादी या नानी का स्वास्थ्य या मूड ठीक नहीं है तो आप तो गए काम से। और फिर उन्हें कितनी कहानियां याद रह सकती हैं? इसकी भी एक सीमा है और टी.वी. सेट तो टी.वी. सेट ठहरा। रुकावट के लिए खेद प्रकट कर देगा तो आप क्या कर लेंगे? और अगर बिजली गुल हो जाए तो? यही नहीं, अगर पिताजी खबरें सुन रहे हैं तो क्या होगा? और अगर आप किसी ऐसे गांव या हिल स्टेशन या गेस्ट हाउस में हों जहां टी.वी. में सभी या किसी एक चैनल के प्रोग्राम नहीं देखे जा सकते तो हो गया बंटाधार। और फिर टी.वी. के कार्यक्रमों की भी एक सीमा तो है ही। यों भी आजकल दूरदर्शन अधिसंख्य प्रोग्राम अमरीका, इंगलैंड या जर्मनी के ही दिखता है। मगर कहानियां तो हर देश में सुनी, पढ़ी या देखी जाती हैं।
    स्पष्ट है कि कहानी पढ़ना अधिक सुविधाजनक है। और फिर पुस्तकों में संचित ज्ञान की कोई सीमा भी नहीं है।
    —विनोद शर्मा
  • Deshbhakat Bane
    Jagat Ram Arya
    140 126

    Item Code: #KGP-9249

    Availability: In stock

    हम अपने सुंदर देश को दिल से प्यार करते हैं। इसके बीते हुए दिन, इसकी पुरानी शान भी हमें प्यारी है। इसके दुःख हमारे दुःख हैं। इसका दर्द हमारा अपना दर्द है। जैसे हम अपने जीवन वृक्ष को फलता-फूलता देखना चाहते हैं वैसे ही हम कामना करते हैं कि हमारा देश भी फले और फूले।
    इसके लिए हम अपना तन-मन-धन बलिदान करने को तैयार हैं। हमने भारतमाता की सहनशीलता को देखकर क्षमा करने की प्रेरणा ली है। हम केवल इसे प्रेम ही नहीं करते अपितु हर क्षेत्र में इसकी उन्नति के लिए कंधा भी लगाएंगे। हमारे शरीर की रग-रग में रक्त का एक-एक कण इसी मातृभूमि की नदियों का दिया हुआ रस है और इसके खेतों में उपजे हुए अनाजों से हमारा शरीर बलवान बना है। यह हमारी जन्मदायिनी मां है। यही हमारा भगवान है। हम इसके चरणों में अपना सिर झुकाते हें। इसका प्यार पाने के लिए हम इसकी वंदना करते हैं और दिन-रात पवित्र मन से इसी का स्मरण करते हैं। भारत माता की जय हो।
  • Vidrohi
    Chander Shekhar Prem
    100 90

    Item Code: #KGP-9225

    Availability: In stock

    विद्रोही
    ‘‘जनता जनार्दन के रूप में मेरी आत्माओं! राजा विपुलवर्द्धन के साथ हमारी निजी या जाती तौर पर कोई दुश्मनी नहीं है। वह स्वतंत्रता देवी का शत्रु है और हम देवी के पुजारी। वह बिलासपुर रियासत की जनता को पुश्त-दर-पुश्त अपना दास बनाकर रखना चाहता है और हम लोग उसे आजाद कराना चाहते हैं। वह अपने आपको ईश्वर का भेजा हुआ फरिश्ता समझता है और हम उसे पुकार-पुकारकर कहते हैं कि विपुलवर्द्धन! तुम भी हमारी तरह एक आदमी हो। वह कहता है कि उसे खुदा ने हमारे और तुमारे ऊपर हुकूमत करने के लिए भेजा है और हम लोग कहते हैं कि वह सब कुछ उसका झूठा प्रपंच है। इस प्रकार दोस्तो! हमारे और राजा साहब के दरम्यान दीवारें खड़ी हैं, जिन्हें तोड़ना हम सबका मूल उद्देश्य है। वह गरीबों का शोषण करके अपन भंडार भरता आ रहा है, और इधर इन गरीब किसानों को देखिए जो जेठ की कड़कती धूप, सावन-भादों की घनघोर बरखा में तथा पोह-माघ की ठिठुराती हुई सर्दी में दिन-रात परिश्रम करते मर जाते हैं और वह खलिाहनों पर से अनाज उठवाकर ले जाता हे और ये बेचारे किसान मुश्किल से गुजर कर पाते हैं।’’
    —इसी उपन्यास से
  • Ukaav
    Kshitij Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-765

    Availability: In stock

    उकाव
    'उकाव' पहाडी जिंदगी की गाथा है। एक मायने में उपन्यास की कथा पुरुष-नियंत्रण समाज द्वारा नारी पर थोपे गए उत्पीडक नियमों की भर्त्सना है । नैतिकता के इकहरे मानदंडों के कारण किन्हीं कमजोर क्षणों में हुई एक तथाकथित 'गलती' के प्रतिकार में श्यामा किस तरह सारा जीवन होम कर देती है, लेखक ने इस संघर्ष को इतने मार्मिक और प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया है कि यह पहाडी औरत की जिंदगी का ही दस्तावेज बन गया है । कुमाऊँ के पहाडों का ग्रामीण जीवन जितनी अंतरंगता  और विविधता में इस उपन्यास में चित्रित हुआ है, यह बरबस रेणु और शैलेश मटियानी की याद दिला देता है । संभवत: किसी रचना का आंचलिक बनना इस बात पर निर्भर है कि वह किसी स्थान विशेष के लोगों का चित्रण करते हुए यहीं की भौगोलिक ही नहीं वक्ति सांस्कृतिक और मूल्यगत विशिष्टताओं को कितनी उत्कटता व सघनता से अभिव्यक्त करती है । इस संदर्भ में देखें तो 'उकाव' निश्चित ही एक आंचलिक रचना है, पर तब दुनिया की कौन-प्ती ऐसी रचना है जो इस बात से न पहचानी जाती हो कि उसमें कितनी गहराई और मजबूती से अपने समय और स्थान की पहचान छिपी है ?
    सही मायनों में देखा जाए तो प्रेम, प्रतिकार, बलिदान और संघर्ष की यह गाथा अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई पहाडी औरत के ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय नारी के बहुआयामी व विराट, स्वरूप का दर्शन कराती है । और यही लेखक की सृजनात्मकता की कसौटी है ।
    यह इत्तफाक नहीं है कि क्षितिज शर्मा लेखन की उस परंपरा के अधिक निकट पड़ते है जिसका स्रोत शैलेश मटियानी है । मटियानी जी की रचनाओं में पहाडी जीवन की झाँकी सबसे ज्यादा वास्तविक और प्रामाणिक ढंग से नजर जाती है । क्षितिज शर्मा उस परंपरा को आगे बताते हुए पहाडी गाँवों के संघर्षमय जीवन को जिस तरह से चित्रित करते है, वह मुझ जैसे तथाकथित पहाडियों के लिए भी एक 'रिबिलेशना से कम नहीं है ।
    -पंकज बिष्ट
  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 200

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Dehri Bhai Vides
    Rajendra Yadav
    400 360

    Item Code: #KGP-70

    Availability: In stock

    इस ग्रंथ में संकलित सभी आत्मकथांश और आत्मकथ्य किसी न किसी स्तर की प्रतिष्ठित और स्थापित, जानी-मानी लेखिकाओं का योगदान है। सत्य है कि आत्मकथा उन लोगों की अभिव्यक्ति का सीधा औजार बन चुकी है जो अभी तक हाशिए पर रहते आए हैं और स्वयं अपने इतिहास से भी अपरिचित हैं। इतिहास में दाखिल होने के लिए भाषा में अंकित होना जरूरी है। किसी भी इच्छित और आयोजित परिवर्तन के लिए इतिहास के प्रति जागरूकता और नियति के लिए चुनौती स्वयं अनिवार्य हो जाती है। जो अपना इतिहास आज रचना शुरू कर रहे हैं उनके लिए सबसे सुगम और शीघ्र तरीका स्वयं अपने जीवन को ‘कथंत’ और ‘पठंत’ में बदलना है। इस संदर्भ में आत्मकथा, अभिव्यक्ति के एक साहित्यिक प्रकार की अपेक्षा राजनीतिक-सामाजिक दस्तावेज के रूप में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसके सहारे जूलिएट मिशेल के शब्दों में ‘पर्सनल इज पोलिटिकल’ का विमर्श रचा जाता है। यहां वह ‘व्यक्ति वैशिष्ट्यवाद’ का अगला उदाहरण नहीं, एक समूचे समुदाय के सामान्य जीवन की उन यातनाओं और यंत्रणाओं का नमूना है जो हर जीवन में समान रूप से मौजूद होने के बावजूद एक गोपनीयतारक्षी चुप्पी की साजिश के तहत हर व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग अतः व्यक्तिगत बनी रहती है।

    इस ‘व्यक्तिगत’ यंत्रणा के गुणनफल की सामूहिक-सामुदायिक यातना के रूप में पहचान ही परिवर्तन के लिए राजनीतिक संघर्ष की पहली सीढ़ी है।

    यहां प्रस्तुत आत्मकथांशों और आत्मकथ्यों के संकलन के पीछे यही आशा सक्रिय है, पंद्रह विशिष्ट स्त्रियों द्वारा अपने होने की दास्तान दर्ज करने की कोशिश में छिपी व्यक्तिगत यंत्रणाओं में सामुदायिक यातना की तसवीर खोज निकालने की आशा।...हिंदी में अभी तो यह एक शुरुआत भर है।

  • Topitantra Zindabad
    Sudhir Kumar Chaudhary
    50 45

    Item Code: #KGP-9103

    Availability: In stock

    टोपीतंत्र जिन्दाबाद
    व्यंग्य-लेखन के क्षेत्र में सुधीरकुमार चौधरी काफी आगे तक जाने की संभावना रखते हैं । उनका लेखन सहज है । लेखक की अपनी समझ व दृष्टि से उभरता है । उन पर किसी का असर नहीं है । हाँ, उनके लेखन में क्योंकि आक्रोश और अधीरता के बजाय तटस्थ चित्रण और मध्यममार्गी आलोचना का स्वर है, वे परसाई स्कूल से अधिक शरद स्कूल के निकट पडते हैं । पर इतनी तुलना उनके लेखन की शक्ल का अंदाज देने के लिए है । सच्चाई यह है कि सुधीर के व्यंग्य उनके अपने व्यंग्य हैं । 
    एक बात और गौर करने लायक है । वह है विषय का चुनाव । अर्थात् किन बातो पर सुधीर की नजर जाती है जिन पर व्यंग्य किया जा सके । सुधीर के विषय हल्ले-फुलके हैं । वे सद्य विकृति और हास्योत्पादक विसंगति को अपने घेरे में लेते है।  इस वजह से रचना हास्य की तरफ ज्यादा झुक गई है और 'लतियाव', 'जुतियाव' व 'ठुकाई' कम करती है जिसकी इस बेशर्म और उजड्ड जमाने को अब ज्यादा जरूरत है, लेकिन पूर्ण तो कोई लेखक नहीं होता । सुधीर की भाषा सीधी, स्पष्ट व रोचक है । हम एक परिपाक पत्रकार व उभरते साहित्यकार के सम्पर्क में हैं । 
    -अजातशत्रु 

  • Dubari Dube
    Chandrika Prasad Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-9206

    Availability: In stock

    इस संग्रह में मैंने अपने गांव-जवार के लोगों के शब्द-चित्र दिए हैं। इन सभी पात्रों के बीच में मैं वर्षों रहा हूं। इनके परिवेश, रहनि, दिनचर्या, खानपान आदि को मैंने निकट से देखा ही नहीं है, उनमें सम्मिलित भी रहा हूं। इनकी खूबियों और खामियों को भी निरखा है। गांव के प्राकृतिक वातावरण में जीने वाले इन लोगों के अनगिनत बिंब मेरे मस्तिष्क में भरे हैं। इसी कारण, कहीं भी रहूं, ये मेरे मानसिक सहचर बने रहते हैं।
    यदि मैं अपने मनोविज्ञान की बात करूं तो यह कहूंगा कि चूंकि कभी मैं इनके बीच में रहा और इनका ही जैसा जीवन जीता रहा, इस कारण इनका शब्दांकन करना अन्तर्मन से मुझे अच्छा लगा। गंवई-गांव के इन लोगों को शहातू बाबू यह न समझें कि ये निरे भोंदू, बुद्धू और सिलबिल्ले होते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जो बड़े चतुर सुजान होते हैं, बड़े चर्बांक होते हैं, बड़े-बड़ों के कान काट सकते हैं।
    अफसोस! आज पहले वाले गांव धीरे-धीरे राजनीति के गंदे कीचड़ में अपने गंवई चरित्र को खोते जा रहे हैं। वहां भी ग्रामराज्य, रामराज्य का सपना भ्रष्टराज और नेताराज्य ने मटियामेट कर रखा है। इस संग्रह के रेखाचित्रों में पहले के गांव के पात्रें के साथ आज के गांव के भी कुछेक पात्रों का चित्रण किया गया है।
    विश्वास है कि पाठक इन बदरंग पात्रों के चित्रा बांचकर अपना मानसिक तनाव अवश्य दूर कर सकेंगे।
    -चन्द्रिका प्रसाद शर्मा
  • Chintan Karen Chintamukt Rahen (Paperback)
    Swed Marten
    80

    Item Code: #KGP-1248

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं । 
  • Priyakant
    Pratap Sehgal
    160 144

    Item Code: #KGP-2043

    Availability: In stock

    प्रियकांत
    प्रताप सहगल उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने अपने लड़कपन से ही दिल्ली नगर को महानगर और महानगर को सर्वदेशीय नगर (Cosmopolitan City) बनते हुए देखा है। इस बदलाव के साथ जुड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक पहलुओं के बदलते रंगों को भी महसूस किया है। इन बदलते रंगों के साथ बदलते वैयक्तिक संबंधों और मूल्य-मानों पर उनकी पैनी निगाह रहती है। इसीलिए उनके लेखन में निरा वर्णन नहीं होता, बल्कि उसके साथ समय के कई सवाल जुड़े रहते हैं। कभी यथार्थ के धरातल पर तो कभी दर्शन के स्तर पर ।
    उनका नया उपन्यास 'प्रियकांत' भी कोई अपवाद नहीं है। पिछले तीस-चालीस सालों में धर्म का व्यापारीकरण और बाजारीकरण हुआ है। इसके लिए आम-जन को अपने परोसने के लिए धर्म के नए-नए मंच बने और नए-नए धर्मगुरु तथा धर्माचार्य फिल्मी सितारों की तरह चमकने लगे।
    'प्रियकांत' एक ऐसे ही धर्माचार्य के उदय और उसके साथ जुड़ी महत्वाकांक्षाओं और विसंगतियों की कथा है। पात्र पौराणिक हो, ऐतिहासिक हों या समकालीन-प्रताप सहगल की नज़र हमेशा उनके माध्यम से समय के साथ मुठभेड़ मर ही रहती है। और इस उपन्यास में भी धर्म, धर्मगुरु, ज्ञान एवं अनुभव से जुड़े कुछ सवाल ही रेखांकित होते हैं...शेखर, नीहार और गुलशन के साथ...आप पढ़ेंगे तो आपको भी लगेगा कि इस कथा में आप भी कहीं न कहीं ज़रूर हैं।
  • Toro Kara Toro-5 (Sandesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-667

    Availability: In stock


  • Bharat Ke Mahan Sant
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkms

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey (Paperback)
    Agyey
    120

    Item Code: #KGP-7014

    Availability: In stock


  • Raag Viraag
    Shree Lal Shukla
    150 135

    Item Code: #KGP-42

    Availability: In stock


  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Shree Lal Shukla
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamleshwar
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-736

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमलेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "कोहरा', 'राजा निरबंसिया', 'चप्पल', 'गर्मियों के दिन', 'खोई हुई दिशाएँ', 'नीली झील', 'इंतजार', 'दिल्ली में एक मौत' , 'मांस का दरिया' तथा 'बयान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमलेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kalanidhi Kaustubh
    Har Govind Gupt
    100 90

    Item Code: #KGP-9201

    Availability: In stock

    कलानिधि-कौस्तुभ स्व. राय कृष्णदास के जन्मशती के अवसर पर संकलित अनेक प्रकार के संस्मरणों और मूल्यांकनों का अनूठा गुलदस्ता है। कई वर्ष तक लगातार चिरगांव के मौन साहित्य पर श्री हरगोविन्द गुप्त ने परिश्रम किया और अपने व्यक्तिगत संपर्कों के बल पर अनूठे लेख एकत्रित किए हैं।
    ‘कलानिधि’ संज्ञा श्री राय कृष्णदास को कई कारणों से मिली। वे सभी कलाओं के मर्मज्ञ तो थे ही, साहित्य के सृजक और लेखक भी थे। कवि, लेखक, कहानीकार, निबंधकार, उनके जिस रूप को देखेंगे वही अपने-आप में अनूठा लगेगा। श्री हरगोविन्द गुप्त ने प्रयत्न किया है कि यह कलानिध के योग्य स्मृति उपहार बने और इसीलिए उसका नाम कौस्तुभ रखा है। कौस्तुभ मणि समुद्र-मंथन में अमृत के साथ मिली थी। यह संकलन केवल स्मृति-मंजूषा नहीं है, भारत कलानिधि जैसे विश्व के अनन्यतम कला-संग्रहों के निर्माण की ऐतिहासिक गाथा भी है।
    इस संकलन में अनेक ऐसी विभूतियों के लेख हैं जो आज नहीं हैं। उनमें मैथिलीशरण गुप्त, डाॅ. वायुदेवशरण अग्रवाल, डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और अज्ञेय जैसे लोग हैं। इसलिए यह अपने-आप में रत्नमालिका है। श्री हरगोविन्द गुप्त हिंदी जगत और कला-जगत की बधाई के पात्र हैं। उन्होंने निःस्पृह भाव से बड़े मनोयोग से इस पुस्तक को तैयार किया है।
    -विद्यानिवास मिश्र
  • 20-Best Stories From Spain & Portugal (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-7198

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics 
    from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Spanish & Portuguese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories 
    open up a new world on each page.

    With stories like Vain Queen, Maid and the Negress, Three Citrons of Love, Daughter of the Witch, Pedro and the Prince, Tower of ill Luck, this book is a compilation of 20 famous Spanish & Portuguese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Spain & Portugal.
  • Rigveda Yuvaon Ke Liye
    A.W.I.C.
    400 320

    Item Code: #Kgp-rykl

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Zalzala
    Gulshan Rai Monga
    60 54

    Item Code: #KGP-2057

    Availability: In stock

    एक अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए आदमी को जिन चीजों की तवक्को रहती है मसलन महानगर में अपना निजी फ्लैट, गाड़ी, चलता हुआ व्यवसाय, वह सब उसे हासिल था । संतुष्टि के लिए पर्याप्त प्राप्य। 
    भीतर यह जो आत्मा है इतने पर संतोष कर ले यह आवश्यक नहीं है । उसकी अपनी इच्छाएं, वृत्तियां, संस्कार और जरूरतें हैं जिन्हें 'सप्रैस' करने में कोई औचित्य नहीं है । ऐसा प्रयास किसी ओर से भी किया जाए तो आत्मा विद्रोह कर देती है और इस विद्रोह की परिणति होती है एक गहरी सोच में । इस जीव-जगत में अपने होने की अर्थवत्ता अर्थात इस संसार में  के मकसद की तलाश। 
    इस दिशा में गजानन की सफलता-असफलता का लेख-जोखा करने की जुर्रत की गयी है । यह चरित्र अपनी तमाम कमियों, कमजोरियों  और कुछ अच्छाइयों के साथ आपके (पाठकों के) निर्णय का मोहताज है जिसे उसके आंतरिक और बाह्य परिवेश में रखते हुए उसके साथ सहानुभूति, नफरत अथवा प्यार करना आप पर निर्भर करता है । 
  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Arvacheen Kavya-Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    30

    Item Code: #KGP-950

    Availability: In stock


  • Teri Roshanai Hona Chahati Hoon
    Alka Sinha
    140 126

    Item Code: #KGP-524

    Availability: In stock

    तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ
    प्रतिष्ठित कवयित्री अलका सिन्हा की नवीनतम काव्यकृति 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' की पेम कविताएँ उस कोमल और अमूल्य अहसास की पावन कराती हैं, जिसका अभाव किसी को वहशी बना देता है तो किसी को संन्यासी । इन कविताओं में महानगरीय जीवन की आपाधापी के बीच एक भावात्मक विस्तार की अनुभूति होती है और यह विस्तार कहीं-कहीं तो दार्शनिकता पर जा टिकता है । इसीलिए पूरी कृति में बिखेरे प्रेम-प्रसंगो के वावजूद नितात निजी और आत्मीय क्षणों का यह अहसास कहीं भी छिछला या बेपर्दा नहीं होता । कवयित्री आम जिंदगी की मामूली घटनाओं को सरल और सधी भाषा में अपनी कविताओं में इस प्रकार गुंफित करती है मानो कविता की गलबहियां डाले कोई कहानी साथ-साथ चलती हो ।
    ये कविताएं एक ओर प्रकृति में जीवन की अनंत संभावनाओं की तलाश करती हैं तो दूसरी ओर युगीन विषमताओं पर व्यंग्य भी कसती हैं । सामाजिक चेतना से संबद्ध एक स्वस्थ विमर्श इन कविताओं को लोकमंगल की भावना से जोड़ता है ।
    हर किसी को अपनी-सी लगती ये कविताएं तमाम तनावों, परेशानियों और नाकामियों के बीच जीवन के प्रति आस्था और विश्वास जगाती है और आश्वस्त करती है कि सचमुच कीमती है हमारे बीच बची प्रेम की तरलता !
  • Ghar Nikaasi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    70

    Item Code: #KGP-1316

    Availability: In stock


  • Doobte Waqt
    Dixit Dankauri
    150 135

    Item Code: #KGP-1901

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।

  • Shesh Prashna
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-72

    Availability: In stock


  • Dr. Sarvapalli Radhakrishanan
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-dsrk

    Availability: In stock


  • Sanetary Pad
    Sayed Javed Hasan
    250 225

    Item Code: #KGP-1885

    Availability: In stock

    बस्ती का खुदा उठा । मैदान की ओर देखकर मुस्कुराया और धीरे-धीरे चबूतरे की सीढी चढ़ने लगा ।
    दो चढ़ता रहा । तालियां बजनी रहीं।
    अचानक तालियां रुक गई ।
    लोगों ने बस्ती के खुदा को एकाएक बीच सीढी पर रुकते हुए देखा । '
    सबकी धडकने तेज हो गई । उसे अपने इस खुदा पर पूरा  विश्वास था । ताली बजाने वालों में अब मैदान के एक- आध हिस्से को छोडकर बाकी लोग भी शामिल हो गए थे । वे पहले के तीन खुदाओं की छवि से बुरी तरह निराश थे और चाहते थे कि कम से कम इस खुदा की छवि दुरुस्त रहे ।  बस्ती का यह खुदा औरों के मुकाबले अधिक सौम्य, संजींदा और भरोसेमंद था ।
    बस्ती के खुदा ने बस्ती के लोगों को मुड़ के देखा । मुस्कुराया । हाथ हिलाया और फिर सीढी चढने लगा ।
    तालियां फिर बजनी शुरू हुई ।
    तालियां बजती रहीं . . . . बजती रहीं ।
    और फिर . . . . पूरे मैदान में मरघट-सा सन्नाटा छा गया ।
    आईने के सामने बस्ती का खुदा खडा था और उसमें मुखौटों का अक्स उभर आया था ।
    बस्ती के लोग पागलों की तरह अपना सिर धुन रहे थे । उसे अपने जिस खुदा पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वो  बहरूपिया बना उनके सामने खड़ा था ।
    - इसी पुस्तक से
  • Pratidaan
    Virendra Jain
    60 54

    Item Code: #KGP-2093

    Availability: In stock

    प्रतिदान

    सुरेखा-पर्व की विद्या का विवाह माँ ने तय किया था । अच्छा घर-वर खोज़कर ।

    प्रतिदान को प्रभा को ससुराल के तमाम संबंधियों ने देख-परखकर पसंद किया था ।

    उसके हिस्से का विश्वास की कविता ने कबीर को स्वयं चुना था ।

    तीनों के पति अलग-अलग स्थान, परिवेश, पेशे से जूड़े थे । अलग-अलग प्रवृति के थे । फिर भी तीनों स्त्रियों  का दुख एक-सा क्योंकर हुआ?

    साथ न सहकर भी साथ सहे गए दुख का बयान करती वीरेन्द्र की तीन उपन्यासिकाएँ ।

    स्त्रियाँ ही स्त्रियों की कथा-व्यथा को संजीदगी से बयान कर सकती हैं, इस अवधारणा को झुठलाती तीन व्यथा-कथाएँ ।

    थोड़े में बहुत कह देने में समर्थ युवा कथाकार के आकार में लघु और कथ्य में बृहद् तीन लघु उपन्यास-सुरेखा-पर्व, प्रतिदान, उसके हिस्से का विश्वास ।
  • Lalit Nibandh : Swaroop Evam Parampara
    Dr. Shri Ram Parihar
    750 675

    Item Code: #KGP-781

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    150 135

    Item Code: #KGP-1872

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Qurratulain Hyder
    Qurratulain Hyder
    260 234

    Item Code: #KGP-833

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कुर्रतुलऐन हैदर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो', 'फोटोग्राफ़र', 'कारमिन', 'पतझड़ की आवाज़', 'जुगनुओं की दुनिया', 'कलंदर', 'कोहरे के पीछे', 'कुलीन', 'डालनवाला' तथा 'यह दाग-दाग उजाला' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कुर्रतुलऐन हैदर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Patrakarita Mein Anuvad Ki Samasyayen
    400 360

    Item Code: #KGP-239

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में सामान्य समाचारों का अनुवाद, खेलकूद के समाचारों का अनुवाद, बाजार-भाव के समाचारों का अनुवाद, विज्ञापनों का अनुवाद तथा संपादकीय का अनुवाद आदि उन सभी विषयों को दिया गया है जिनसे समाचारपत्रों के संपादकीय विभाग को जूझना पड़ता है। व्यक्तिवाचक नामों तथा वर्तनी की समस्या भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अतः उन्हें भी ले लिया गया है। अंत में आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचारों पर भी अनुवाद की दृष्टि से विचार किया गया है। अंत में कुछ पारिभाषिक शब्दों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है जो इस प्रसंग में काम के हैं।
    विश्वास है कि यह पुस्तक अनुवाद में सामान्य रूप से रुचि रखने वालों तथा विशेष रूप से समाचारपत्रों और आकाशवाणी-दूरदर्शन के अनुवादकों के लिए उपयोगी होगी।
  • Shubhada (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-204

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है शुभदा और दूसरा है बड़ी दीदी।
  • Nibandhkar Hazari Prasad Diwvedi
    Usha Singhal
    60 54

    Item Code: #KGP-1468

    Availability: In stock

    निबंधकार हजारीप्रसाद द्विवेदी
    शैली विज्ञान के संदर्भ में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध-साहित्य पर अभी तक कोई निरुपाधि या सोपाधि शोधकार्य संभवत: नहीं हुआ है । अत: शैली विज्ञान की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी के निबंधों के सम्यक विश्लेषण का यह पहला प्रयास है ।
    शैलीवैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में किसी कृति के सम्यक विश्लेषण के लिए, आज नानाविध प्रतिमान प्रचलित हैं, जिनमें 'चयन-प्रतिमान' को सभी प्रतिमानों का मूलाधार माना जाता है । प्रस्तुत अध्ययन इसी प्रतिमान को आधार बनाकर किया गया है ।
    आचार्य द्विवेदी ने अपने निबन्धों में किस प्रकार ध्वनि, शब्द, वाक्य, तथा विभिन्न व्याकरणिक कोटियों के सार्थक चयन से कथ्य का चयन किया है, इस पर भी विदुषी आलोचिका डा० उषा सिंहल ने अपनी विश्लेषणपरक दृष्टि केंद्रिय रखी है ।
    यह अध्ययन विद्वत् समाज के लिए आचार्य द्विवेदी के साहित्य के अध्ययन की नई दिशाएँ प्रशस्त करेगा ।
  • Manjhi Na Bajao Vanshi
    Om Bharti
    225 203

    Item Code: #KGP-1883

    Availability: In stock

    माँझी! न बजाओ वंशी
    केदारनाथ अग्रवाल के जीवन और कविता दोनों में एक अनिंद्य प्रेम का भाव विराजता है। जो जीवन में है वह कविता की परिधि से बाहर नहीं है। जहां लोग दांपत्य प्रेम को जीते हुए अपने उत्तरवर्ती जीवन तक आकर ऊब का अनुभव करने लगते हैं, वहीं केदार जी आजीवन इस प्यार से बँधे-बिंधे रहे। हिंदी की काव्य परंपरा में प्रेम का अनूठा और अद्वितीय स्थान है पर है वह परकीया प्रेम से बँधा हुआ। आधुनिक कवियों में  केदारनाथ अग्रवाल का एक विरल उदाहरण है जहाँ वे दांपत्य प्रेम में ही लौकिक-अलौकिक सुखों की अपूर्व व्यंजना कविताओं में संभव करते हैं। जमुन जल तुम जैसा संग्रह तथा अन्य संकलनों की प्रेम कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने प्रेम को दांपत्य की सुखद अनुभूतियों और संवेदना से भरा है। छायावादियों में जो प्रेम लौकिक धरातल से ऊपर उठकर दार्शनिक उपपत्तियों में पर्यवसित हो गया था, सूफी कवियों के यहाँ जो प्रेम ईश्वरीय सत्ता से लगन का पर्याय बन गया है, वह केदारनाथ अग्रवाल जैसे प्रगतिवादी कवि के यहाँ लोक में उपलब्ध प्रेम की कर्मठ जिजीविषा का पर्याय है।
    प्रेम केदारनाथ अग्रवाल की दिनचर्या का ही एक अंग रहा है। वह जीवन की मांसपेशियों में रुधिर की तरह प्रवाहित है। प्रेममय जीवन के सारे काम जीवन के काम हैं। कुरते में बटन नहीं लगी, ऊपर से वह फटा हुआ है, सारा घर अस्त-व्यस्त हो उठा है, न सोपकेस में साबुन, न तेल की एक बूँद, न खोजने से मिल पाता रूमाल, मेजपोश पर धूल, किताब पर प्याला, कॉपी पर औंधा रखा गिलास-कवि अधीर होकर संबोधित करता है पत्नी को कि घर सँवारने कब आओगी। घर की सारी शिष्ट सँवरन पत्नी की देन है-पत्नी जो प्रिय है, जिसके होने से जीवन है।
    कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ लिखकर रोमानी अनुभूतियों के प्रदेश में एक हलचल मचा दी थी। ‘वंशी और मादल’ के इस गीत को नवगीत के स्थापत्य में नवता के उन्मेष के रूप में देखा गया। गीत स्निग्धता के लिए जाने जाते रहे हैं, उनकी कोमल पदावलियों को केदारनाथ अग्रवाल ने अपने कवि-जीवन में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में ग्रहण किया है। आज भी हम उनकी कविताएँ पढ़ते हैं तो लगता है, माँझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है और उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है। वह किसी कान्हा की बाँसुरी से कम नहीं है। जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्यंजना में बदल जाती है। केदार जी ने कविता में यही किया है।
     यह संग्रह केदारनाथ अग्रवाल की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Mahasagar (Paperback)
    Himanshu Joshi
    25

    Item Code: #KGP-1212

    Availability: In stock


  • Phalon Ki Baagbaani
    Darshna Nand
    595 536

    Item Code: #KGP-822

    Availability: In stock

    फलों की बागबानी
    फल हमारे दैनिक आहार के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं। यह स्वास्थ्यवर्द्धक होते है और आवश्यक विटामिन, खनिज लवण और अनेक पोषक तत्वों से भरपूर रहते है । बिना फल-सब्जियों के भोजन अपूर्ण रह जाता है । वर्तमान में जबकि अपना देश कुपोषण और प्रदूषण का शिकार बना हुआ है, फलों का महत्त्व और भी अधिक बढ जाता है। बेल, जामुन, आँवला, पपीता, नीबू, अमरूद, अंजीर, हरड़, बहेडा व अन्य कुल फलों को तो यदि सीधे औषधि ही कह दिया जाए तो अनुचित न होगा ।
    वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दशा में फलों के अंतर्गत क्षेत्रफल व फल उत्पादन बढाना नितांत आवश्यक है । आम, कटहल, केला आदि फल व आलू तथा अन्य कंद वाली सब्जियां तो भोजन के रूप में ही खाए जा सकते है । फिर भी क्षेत्रफल और उत्पादन से वृद्धि लाना केवल उसी दशा में संभव है, जबकि उद्यान-स्वामी को आम, आंवला, पपीता जैसे फलों में अफलन के कारण व समाधान का ज्ञान हो तथा फल-वृक्षों में वष्टि-व्याधियों, खाद-पानी, काट-छांट  आदि जैसी आवश्यक कर्षण क्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी हो ।
    इस पुस्तक की रचना लेखक द्वारा किए गए शोध-विकास कार्यों, अपने पूर्व ज्ञान, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से अध्ययनोपरांत व अन्य स्रोतों से साभार प्राप्त सामग्रियों, क्रियात्मक अनुभवों, समय-समय पर औद्यानिक राष्ट्रीय  अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों-संगोष्टियों में भाग लेकर प्राप्त ज्ञान के आधार पर की गई है ।
    प्रस्तुत पुस्तक विभिन्न विभागों के विभिन्न स्तर के अधिकारियो, कर्मचारियों तथा शिक्षण व शोध संस्थानों के पुस्तकालयों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इसके साथ ही विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों हेतु धरोहर साबित होगी ।
  • Paisa Aapka Bhavishya Aapka
    Ajay Shukla
    240 216

    Item Code: #KGP-9362

    Availability: In stock

    ‘अर्थ’ (धन) इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसे ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ में शामिल किया गया है। कोई भी युग हो, कोई भी देश, कोई भी सभ्यता हो या कोई भी संस्कृति—रुपयों के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन रहा है। आज तो चारों ओर पैसे का बोलबाला है। उसकी चमक और खनक के सामने सब फीका है। ...और यह जरूरी भी है कि सुखपूर्वक जीवन की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास यथेष्ट पैसा हो।
    प्रश्न है कि पैसा किस तरह बचाया और बढ़ाया जाए। सीमित आय वालों को ‘मनी मैनेजमेंट’ सिखाने के लिए ही अजय शुक्ला ने पैसा आपका भविष्य आपका नामक पुस्तक लिखी। आसान भाषा और दिलचस्प शैली में यह पुस्तक पाठकों को बताती है कि छोटी-छोटी बचतों और कुछ सावधानियों से भविष्य के लिए पैसा बचाया जा सकता है। बुढ़ापे में जब कमाने की शक्ति नहीं रहती, अनेक तरह की हारी-बीमारी घेर लेती हैं और कई बार जब अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं तब बचाया हुआ पैसा ही काम आता है। किसी ने कहा है कि पैसा भगवान् तो नहीं है, पर भगवान् से कम भी नहीं है।
    प्रस्तुत पुस्तक को जिन अध्यायों में संयोजित किया गया, वे हैं—बचत प्रबंधन, बीमा, इंटरनेट का प्रयोग, मुद्रास्फीति, आयकर, निवेश के मूल सिद्धान्त, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, निवेश के साधन, स्वर्ण में निवेश, घर/प्राॅपर्टी में निवेश, पोर्टफोलियो बनाना, वसीयतनामा, रिटायरमेंट प्रबंधन। इन अध्यायों को पढ़कर सुखी, निश्चिंत  व धन संपन्न भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
  • Aadami Aur Uska Samaaj
    Vishnu Nagar
    225 203

    Item Code: #KGP-88

    Availability: In stock


  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar
    Laxman Prasad
    595 536

    Item Code: #KGP-726

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Raai Or Parvat
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-63

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Bhawani Prasad Mishra
    Bhawani Prasad Mishra
    280 252

    Item Code: #KGP-413

    Availability: In stock


  • Sau Baal Kavitayen
    Atri Garg
    75

    Item Code: #KGP-1450

    Availability: In stock


  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jivan Darshan
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-809

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Swasthya Gyan
    Dr. Rakesh Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-722

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य-ज्ञान
    पुस्तक में स्वास्थ्य से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर लगभग  35 लेख संकलित हैं । जो लोग यह कहते  हैं की चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम में ही पढाया जा सकता हैं, उनके लिए वे लेख चुनौती है और सिद्ध करते है कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा कै। उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को  माध्यम से पढाया जा सकता है । 
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है । इन लेखों में अधिकांशतः इस बात को ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग  दवाओं का नाय याद कर लेते है और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते है । उससे कितनी हानि हो सकती है, यह 'दवाओ के उपयोग में सावधानियाँ' शीर्षक से स्पष्ट हैं । इसी प्रक्रार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारना से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है । 'ह्रदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हदय- रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है । इसमें अधुनातन  चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है । अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-सम्पन्न है । कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्य एवं उनके सफल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतिक है ।
  • Baarish Ke Baad
    Radhey Shyam Tiwari
    125 113

    Item Code: #KGP-1990

    Availability: In stock

    बारिश के बाद
    राधेश्याम तिवारी हिंदी के एक ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास के साधारण-सामान्य और लगभग घटनाविहीन जीवन से मार्मिकता को बड़े अचूक ढंग से पकडने की क्षमता रखते हैं। उनकी कविताओं में कल्पना की ऊँचाइयाँ हैं, लेकिन जैसा कि वे अपनी एक कविता 'बीज-मंत्र' में कहते हैं कि बीज का बाहर निकलकर भी धरती से जुडाव कम नहीं होता, उसी तरह उनकी कविता  का लगाव भी किसी भी हालत में इस धरती से, यहाँ के इंसान से, यहाँ के मौसमों से, अभावों और स्मृतियों से कम नहीं होता, बल्कि और सघन होता जाता है । उनकी हर कविता जीवन के बीच सहज ही मिलने वाला एक मार्मिक प्रसंग बन जाती है । यह मार्मिकता शब्द-क्रीड़ा से हासिल नहीं की गई है बल्कि जीवन की परिस्थितियों से प्राप्त की गई है। शहर तथा गाँव के बीच हिलगी हुई राधेश्याम तिवारी की कविता कई जगह गीतात्मक हो जाती है बल्कि कहीं-कहीं वे अपनी बात कहने के लिए गीत का सहारा भी लेते है, मगर दिलचस्प बात यह है कि यह कवि जीवन के प्रति हमेशा बहुत सकारात्मक है, कटु और कठोर नहीं । उसका लहजा शिकायत-भरा नहीं, ललक-भरा है । उनकी कविताओं से जीवन के दबावों-तनावों को दरगुजर नहीं किया गया है, अभावों की चर्चा से परहेज नहीं किया गया है, मगर विवशता की बजाय एक दार्शनिक ऊँचाई दी गई है । उनकी एक कविता है 'न्यूटन', जिसमें वह कहते हैं कि "न्यूटन ने यह तो सोच लिया कि सेब पेड़ से नीचे क्यों गिरता है, लेकिन यह नहीं सोचा कि नीचे गिरकर भी वह नीचे के लोगों को क्यों नहीं मिलता?" इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि "यह तो ठीक है कि गुरुत्वाकर्षण सबको अपनी ओर खींचता है, मगर जमीन में दबा हुआ बीज कैसे ऊपर उठ जाता है, न्यूटन ने यह नहीं सोचा ।" यहीं अभावों की चर्चा है, लेकिन यहाँ बेचैनी का स्वर और स्तर भिन्न है तथा इसी के साथ यह सकारात्मक स्वर भी है ।
    इस संग्रह में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जैसे 'बाकी सब माया हैं, 'पुराना पता', 'सर्कस में बाघ', ‘संबंध', 'घर', 'किराए का मकान' आदि जो हमारे इस दैनिक संसार की कविताएँ हैं मगर उससे बाहर ले जाकर विचलित करने वाली कविताएँ भी हैं। ये कविताएँ सहज हैं, क्योकि मर्मभेदी हैं । वे सहज हैं, क्योंकि मनुष्य के साथ ये प्रकृति से भी सघन रूप से जुड़ती हैं। ये सहज हैं, क्योंकि इनमें हमारा सहजात मनुष्य है, उसकी मानवीयता है, उसका राग और विराग है ।
  • Katha Ki Afwah
    Chaitanya Trivedi
    280 224

    Item Code: #KKA

    Availability: In stock

    ‘उल्लास’ संग्रह की ‘खुलता बंद घर’ एवं ‘जूते और कालीन’ के जरिए चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा सृजन की नई ऊचाइयों पर बात कर सकते हैं। कविता, कहानी और व्यंग्य को फेंटकर चैतन्य अपनी लघु कथाओं को सबसे अलग खड़ा कर लेते हैं।  इन कथाओं में एक व्यक्ति, अपनी स्वतंत्र चेतना के साथ निरंतर निरुपाय परिस्थितियों का सामना करता जान पड़ता है। पाठक को एक अतिरिक्त आस्वाद के साथ आत्ममनोरंजन भी प्राप्त हो सके ऐसा प्रयास करती हैं ये लघुकथाएँ। सार्थक साहित्य का पैमाना भी यही है कि वह कागज पर संपन्न होने के बाद पाठक के मन में फिर से शुरू हो और कुछ नया रचे। कुछ ऐसा ही चैतन्य के इस नए लघुकथा संग्रह कथा की अफवाह में पाएंगे। 
  • The Great Horizon (Biography)
    Debabrata Dasgupta
    345 311

    Item Code: #KGP-342

    Availability: In stock

    The Great Horizon is a biographical novel on Sir Alexander Fleming, a Scottish biologist and pharmacologist. His best-known discoveries are the discovery of the enzyme lysozyme and the antibiotic substance penicillin from the mold Penicillium notatum, for which he shared the Nobel Prize in Physiology or Medicine in 1945 with Howard Florey and Ernst Chain.
    Discovery of penicillin has come naturally as a life-giver to mankind. Disease-torn distressed humans have got a means of longevity through this life-saver. It has contributed in no less measure, to the average human longevity crossing the figure of seventies. The bright rays of the antibiotics have dispersed the dark clouds of sickness and diseases, which overcast the sky of human destiny. All this has been made possible due to the physician named Alexander Fleming who discovered it in 1928 and unfolded a new horizon.
  • Kuhuk Koyaliya Ki
    Santosh Shelja
    90 81

    Item Code: #KGP-9251

    Availability: In stock

    कुहुक कोयलिया की
    संतोष शैलजा की संपूर्ण कविताओं का संग्रह ‘कुहुक कोयलिया की’। इसमें जहां एक ओर आपत्काल में लिखी विरहपूर्ण कविताएं हैं, वहीं दूसरी ओर प्रकृति के मनमोहक सौंदर्य, कोयल की कुहुक एवं फूलों की घाटी की सुगंध है।
    इनकी कल्पना की ऊंची उड़ान ‘धौलाधार’ के हिमशिखरों को छूती है, तो भावों की गहराई ‘विपाशा’ की अतल गहराइयों तक पहुंचती है।
  • Nashta Mantri Ka Gareeb Ke Ghar
    Prabha Shanker Upadhayaye
    90 81

    Item Code: #KGP-1863

    Availability: In stock

    नाश्ता मंत्री का गरीब के घर
    विषमताओं विसंगतियों और विद्रूपताओं  से अटी है आज के जिंदगी । ऐसे अनुभवों को अनुभूत का, प्रहारात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, व्यंग्य कहा जाता है । साथ ही मानव को कुंठाओं एवं जीवन-मूल्यों में स्खलन के प्रति भी फिक्रमंद होता है व्यंग्यकार । उसकी सोच का पैनापन पाठक के मन को कभी कचोटता है तो कभी उसका फक्कड़ मिजाज पाठक के मन को गुदगुदा जाता है । इसीलिए व्यंग्य के साथ हास्य का जुडाव हो गया है ।
    प्रस्तुत संग्रह में नाना भाँति की महक सहेजे तीस व्यंग्य-पुष्प संकलित हैं, जिन्हें मैंने डेढ़ दशक की अवधि में लिखा है । समाज, व्यवस्था राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, अर्थशास्त्र तथा दफ्तरी जिन्दगी इत्यादि विषयों पर कलम चलाने का प्रयास किया है । मैं अपनी लेखनी का तेवर दिखा पाने में कितना कामयाब हो सका हूँ इसका निर्णय तो प्रबुद्ध पाठक एवं सुधी समीक्षक ही करेंगे  ।
    ---प्रभा शंकर उपाध्याय 'प्रभा'
  • Gandhi Ko Samajhane Ka Yahi Samay
    Jagmohan Singh Rajput
    300 240

    Item Code: #KGP-GKSKYS

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी वह महामानव हैं जिनकी प्रासंगिकता हर दौर में बनी रहेगी। व्यवस्थित जीवन जीने के लिए गांधी जी ने जो सूत्र दिएवे उनके व्यक्तित्व की भाँति आज भी उतनी महत्ता रखते हैं जितनी तत्कालीन समय में थी। जीवन के जिस भी क्षेत्र में उन्होंने जो भी अनुभव प्राप्त किएवही अनुभव उन्होंने साररूप में मानव जाति को प्रदान किए। वे जीवन के हर क्षेत्र-चाहे वह शैक्षिक हो या राजनीतिक-के प्रति बहुत गंभीर थे। उनका विचार था कि सामयिक क्रांति के पहले सुषुप्त समाज को जाग्रत करना जरूरी है और ऐसा तभी हो सकता है जब शिक्षा की प्रकाश-किरणें सब तक पहुँचें। इसके लिए उन्होंने वैचारिक चिंतन ही नहीं कियाअपितु व्यावहारिक प्रयोग भी किए।

    गांधी जी का मानना था कि शिक्षा वही उचित है जो बच्चों को उनके उत्तरदायित्व और कर्तव्य का बोध कराए। उनके अनुसार शिक्षा तो वही सही है जो चरित्र का उचित दिशा में निर्माण करे। प्रस्तुत पुस्तक गांधी को समझने का यही समय अपने में गांधी जी द्वारा प्रतिपादित चारित्रिकशैक्षिकसामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों को समाहित किए हुए है। इन मूल्यों में जो विकृति आई हैउसे दूर करने के लिए हमें गांधी को समझना होगा और गांधी को समझने का यही समय उपयुक्त है।

     

    स्वतंत्रता के बाद के सभी शिक्षा संबंधी अधिकांश दस्तावेजों में चरित्र निर्माण तथा मानव मूल्यों की शिक्षा पर बल दिया जाता रहा है। मगर स्थिति पहले से अधिक चिताजनक ही होती जा रही है। गांधी जी के जन्म के 150वें वर्ष में व्यक्तित्व-निर्माण और शिक्षा से व्यक्तित्व-विकास पर गहन विचार-विमर्श के द्वारा एक ऐसी रणनीति तैयार की जानी चाहिए जिसमें सभी की भागीदारी होजो शब्दों में नहींव्यवहार में पारदर्शिता के साथ समाज के अंतिम छोर पर अभी भी प्रतीक्षा कर रहे लोगों पर केंद्रित हो। साथ ही साथ देश इस पर भी बहस करे कि विशेषाधिकार प्राप्त करने की होड़ पर अंकुश कौन लगाएगायह विकृति कहाँ तक पहुँची हैइसका अंदाजा उस खबर से लगाया जा सकता है जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अपने कार्यस्थल तक आने-जाने के लिए एक विशेष मार्ग की माँग की गई थी। एक राज्य सरकार केवल वीआईपीके लिए एक फ्रलाईओवर हवाई अड्डे तक बनाने जा रही थी जिसे जनता ने प्रतिरोध कर रोक दिया था। इस उदाहरण में समस्या की गंभीरता तथा उसके समाधान दोनों ही निहित हैं। यदि इसका सारतत्त्व समझ लिया जाए तो हम सिर उठाकर गांधी को याद करने लायक हो सकेंगे।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora
    Sudha Arora
    280 238

    Item Code: #KGP-701

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Muhim
    Sitesh Alok
    280 252

    Item Code: #KGP-291

    Availability: In stock

    कहानियाँ किसी अन्य अनजान लोक से नहीं आतीं...हमारे बीच, हमारे आसपास ही उपजती और पनपती रहती हैं...किंतु कोई साहित्यकार ही अपनी पारखी दृष्टि से चुनकर और संवेदना से सँवारकर उन्हें शब्दों के संसार में स्थापित करता है। 
    बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. सीतेश आलोक ने गत तीन दशकों में साहित्य की अनेकानेक विधओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य, समसामयिक विषयों पर लेख आदि पर लिखी डॉ. आलोक की अनेक पुस्तकों को न केवल पाठकों ने सराहा, कई संस्थाओं ने सम्मान भी प्रदान किया। मौलिकता इनके लेखन की एक विशेषता है। इनके चरित्र एवं कथानक न तो किसी साँचे में ढलकर आते हैं और न किसी वाद से प्रभावित होकर रूपाकार ग्रहण करते हैं।
    डॉ. सीतेश आलोक उन इने-गिने लेखकों में से हैं जिनमें लीक से हटकर अनेक ऐसे विषयों पर भी लिखने का साहस है, जिन्हें अधिकांश लेखक छूने से भी कतराते हैं।
    इस संग्रह की अनेक कहानियाँ वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, साहित्य अमृत, नयी धारा आदि में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amarkant
    Amarkant
    150 135

    Item Code: #KGP-2076

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमरकान्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इंटरव्यू', 'जिंदगी और जोंक', 'शुभचिंता', 'लड़का-लड़की', 'फर्क', 'मित्र-मिलन', 'बहादुर', 'बउरैया कोदो', 'श्वान गाथा' तथा 'जनशत्रु'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अमरकान्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dhoop Ke Beej
    Hemant Kukreti
    225 203

    Item Code: #KGP-649

    Availability: In stock

    ‘धूप के बीज’ हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हेमंत कुकरेती का पाँचवाँ संग्रह है। किसी अच्छे कवि के पाँचवें संग्रह का आना उसके और उसकी भाषा दोनों के लिए उल्लेखनीय होता है। नब्बे के दशक में आए हिंदी कवियों में हेमंत की कविताएँ अलग से पहचानी जाती हैं। उन्होंने अपना मुहावरा पा लिया है। इधर उनकी भाषा की त्वरा ही नहीं बदली है, उसमें निहित चुभन का पारा भी चढ़ा है। ऐसा किसी चमत्कार के कारण संभव नहीं हुआ है। यह तब संभव होता है जब कवि की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि में परिपक्वता और स्पष्टता आती है; जब उसके लगभग सभी भ्रम तिरोहित हो जाते हैं; जब वह 'मनुष्य' और 'छाया मनुष्य' का अंतर करते हुए विषाद से भर जाता है। कवि को पता है कि कुछ लोगों ने कविता को खेल और मजाक बना दिया है। ऐसे कुकवियों के लिए कविता में जीवन की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण नहीं है। हेमंत के इस संग्रह की कविताएँ इस पतनशील प्रवृत्ति का प्रतिवाद करते हुए काली रात के विरुद्ध धूप के बीज रोपने की आकांक्षा रखने और देने वाली कविताएँ हैं।
    ये कविताएँ हमारे अपने समय में संबंधें की ऊष्मा और जीवन के तापमान का पता देती हैं। ये समय के कुचक्र को परिभाषित करती हैं और हर उस ‘चाल’ पर उँगली रखती हैं जो आत्मीयता के लिहाफ के भीतर अनवरत चलती रहती है। आजकल जब कविताएँ बहुत अबूझ होती जा रही हैं तब हेमंत की साफ-सुथरी कविताएँ पढ़ना सुखद अनुभव की तरह है। हेमंत बिना किसी बनावटी गंभीरता के अपनी बात कहते हैं और कविता बनी रहती है। वे कविता में बहस नहीं करते बल्कि बहसों को कविता में लाते हैं और पाठक के मन में उतार देते हैं। उनकी कविताएँ यदि बाजार के चरित्र को बारीकी से पकड़ती हैं तो जीवन के रंग को भी। कहना चाहिए, उनकी कविता दुःख का विलोम रचना जानती है। 
    एक कवि के रूप में हेमंत स्मृतियों का महत्त्व जानते हैं। वे जानते हैं कि स्मृतियाँ मनुष्य की थाती होती हैं। जो जितना जीवंत होता है, उसके पास उतनी ही अधिक स्मृतियाँ होती हैं। 
    हेमंत के पास अपने पहाड़ की, गाँव-जवार की, दिल्ली की, प्रेम की, तमाम साथियों और घटनाओं की अपार स्मृतियाँ हैं जो उनके कवि को मित्र की तरह ऊर्जस्वित करती हैं। उनकी शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो यथास्थिति के विरुद्ध उम्मीद न जगाती हो। कहा जा सकता है कि वे नाउम्मीदी के इस कठिन समय में उम्मीद के कवि हैं।
    यह संग्रह इसका प्रमाण है कि हेमंत की कविताएँ उस ओर तीक्ष्ण निगाहों से देखती हैं, जिधर ठीक से देखा नहीं गया है। वे शहर की निस्पंद हो रही देह में सिहरन जैसी कोई चीज तलाशते हैं और पाते हैं, 'कोई सिहरन पैदा नहीं होती/शहर के जिस्म में/वह थोड़ा और मर जाता है।' इस संग्रह की कविताएँ किंतु, परंतु और लेकिन को पीछे छोड़ती हुई निष्कवच सत्य के साथ खड़ी हैं।
    हेमंत की कई कविताएँ पितृसत्ता का नया मायावी चेहरा दिखाती हैं। 'घर से चली जाती हैं जो औरतें' और 'घरों में काम करने वाली औरतें' जैसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं। हिंदी के समकालीन काव्य परिदृश्य पर ऐसे कितने कवियों की मौजूदगी है जो हेमंत की तरह कह सकें-'साहित्य के आलोचक चुक गए/और बन गए कवियों के निंदक।' इस संग्रह की कविताएँ यथार्थ के कई चेहरे लेकर आई हैं। बुजुर्गों के बारे में उनकी सादगी से कही पंक्तियों में छुपा घाव बहुत गहरा है।
    इसी तेज नजर के कारण हेमंत शहरी जीवन को व्यक्त करने वाले बड़े कवि हैं। इस कविता में दया दिखाने की कोई अपील नहीं है क्योंकि कवि जानता है कि पूँजी के सौंदर्यशास्त्र में दया और करुणा घिनौने शब्द हैं। बुजुर्गों पर बात करते हुए जब हेमंत इस मार्मिक पंक्ति को लिखते हैं कि 'हँसी भी एक तरह का रोना है' तो समकालीन समय का नागरिक होने पर रोना आता है। इस संग्रह की अंतिम कविता हेमंत की बड़ी रेंज का पता देती है। इस संग्रह की सभी कविताएँ कविता की स्वाभाविक जमीन पर खड़ी हैं। इनमें समाई हुई लयात्मकता इनकी ताकत है। लंबे अंतराल के बाद आया हेमंत कुकरेती का यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक सार्थक और जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।
  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Bachchon Ke Chhah Naatak
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-1816

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    195 176

    Item Code: #KGP-739

    Availability: In stock


  • Badalate Ahsaas
    Birsen Jain Saral
    225 180

    Item Code: #KGP-9384

    Availability: In stock

    बदलते अहसास

    जीवन की कहानियों की भूमि प्रायः परिवार होता है। इस अर्थ में बीरसेन जैन पारिवारिक परिवेश की कहानियों के कहानीकार हैं। परिवार के भीतर के जीवंत दृश्य, स्थितियाँ, तनाव, अलगाव और अकेले रह जाने की पीड़ा से भरे पात्रों को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वह प्रकारांतर से अपनी कहानियों के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि दूसरों के जीवन से प्रेरणा लेकर हम चाहें तो अपना जीवन सफल, संतोषमय व सुखी बना सकते हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक बदलते अहसास की सातों कहानियाँ अपने आसपास के परिवेश से निकली हैं। यहाँ हम परिवार और समाज के परिवर्तित होते स्वरूप के बीच कथा-चरित्रों पर पड़ते प्रभाव को अनुभव कर सकते हैं। सच पूछें, तो ये कहानियाँ एक नया जीवन बनाने की प्रेरणा देती हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप अनुभव करेंगे कि इनकी आवाज कहीं आपके भीतर भी दबी पड़ी है। कारण यह है कि यहाँ मनुष्य के अनेक रूपों के मध्य दरकते संबंध ही नहीं, पश्चात्ताप के आँसू भी नजर आएँगे। कहानीकार की यह विशेषता है कि वह उन स्थितियों को भी उजागर करता है जो समाज का स्याह चेहरा सामने रखती हैं।
  • Teen Laghu Upanyas : Mamta Kalia
    Mamta Kalia
    300 240

    Item Code: #KGP-9080

    Availability: In stock


  • Karyalayi Anuvad Ki Samasyayen
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    450 338

    Item Code: #KGP-KAKS HB

    Availability: In stock

    अनुवाद आज के युग की एक अनिवार्य आवश्यकता है।भारत मेंजिन विभिन्न प्रकार के साहित्यों का आज अनुवाद हो रहा हैउनमें कार्यालयी साहित्य प्रमुख है किंतु अभी तक इस प्रकार केअनुवाद की समस्याओं पर विस्तार से विचार नहीं हुआ है।प्रस्तुत पुस्तक इसी दिशा में एक प्रयास है।इसमें कार्यालयी अनुवाद से संबंधित सारी समस्याओं को एक ही स्थान पर दिया गया है।साथ हीपुस्तक के अंत में विभिन्न प्रकार के कार्यालयी अनुवाद के उदाहरण भी दिए गए हैं। विश्वास है यह पुस्तक ऐसे अनुवाद में रुचि रखने वाले लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

    सहयोगी लेखिकाओं और लेखकों के प्रति हम आभारी हैंजिनके सहयोग के बिना यह संकलन अधूरा रह जाता।


  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan Taatvik Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    215 194

    Item Code: #KGP-542

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है । 
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • Das Pranidhini Kahaniyan : S.R. Harnot
    S. R. Harnot
    280 224

    Item Code: #KGP-9333

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Ek Qatara Khoon (Paperback)
    Ismat Chugatai
    250

    Item Code: #KGP-97

    Availability: In stock

    उर्दू की प्रख्यात लेखिका इस्मत चुगताई द्वारा मुस्लिम इतिहास की उस महान् गाथा का कलमबंद बयान, जो विश्व की करुणतम मानवीय गाथाओं में विशिष्ट स्थान रखती है। यह गाथा है मानव के बुनियादी अधिकार के लिए अडिग संघर्ष, अदम्य शौर्य और अद्भुत बलिदान की-कर्बला ! पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब के नवासे और हज़रत अली के सुपुत्र इमाम हुसैन के सपरिवार जौहर और शहादत की हृदयद्रावक दास्तान। फ़र्ज़ और हक की सत्ता के विरुद्ध जद्दोजहद की एक महान् गाथा ! इसी दास्तान ने उर्दू साहित्य की बेमिसाल धरोहर-अनीस और दबीर के मर्सियों को जन्म दिया। ये मर्सिये केवल उर्दू बल्कि भारतीय करुण काव्य की महान् निधि हैं। यह वही दास्तान है, जिसका स्मरण अकीदत के साथ मुहर्रम में किया जाता है। इस्मत चुगताई की इस महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति को हिंदी प्रकाशन की एक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करते हुए हम गौरव अनुभव करते हैं। हमने इस पुस्तक को उर्दू से अनूदित करवाकर केवल लिप्यंतरण के साथ प्रस्तुत किया है ताकि उर्दू भाषा का मौलिक रसास्वादन पाठकों को उपलब्ध हो। कठिन शब्दों का अनुवाद फुटनोट्स में मौजूद है। हमें विश्वास है कि हिंदी जगत् में इस