Daadoo Samgra (2 Vols.)

Govind Rajnish

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  • Year: 2007

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9788188466481

दादू समग्र : 1
भक्तिकाल के निर्गुण संप्रदाय में कबीर के पश्चात सबसे महत्त्वपूमृर्प सर्जनात्मक व्यक्तित्व संत दादू दयाल (दादू अवधूत जोग्यन्द्र) का है । पुरे भारत से सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना को जगाने तथर विराट सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में इनकी अग्रणी भूमिका रही है । इन्होंने मनुष्य के भीतर सोए हुए विराट अनुराग को जगाने तथा ज्ञानात्मक संवेदनाओं और आध्यात्मिक अनुभवों से संपन्न करने का प्रयास किया था। इनके 'न्रिपख' दर्शन ने हिंदू और मुसलमानों की कुरीतियों, बाह्याडंबरों, जड़ताओं, रूढियों और विसंगतियों की आलोचना करते हुए, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठने का संदेश दिया था ।
दादू महान् संत, रचनाकार, नीतिज्ञ और उपदेशक ही नहीं थे, विश्व-बोध और मानवीयता से ओतप्रोत समाज-सुधारक भी थे । इन्होंने मजहब और जाति-भेद से ऊपर उठकर मानवीय भावों को परखकर विशाल मानवीय बोध जगाया था। इनकी साधना-भूमि, काव्य-भूमि एवं भाव-भूमि अत्यंत व्यापक और संवेदना जन-मन-स्पर्शिनी थी । इन्होंने भेदों से अभेद और नानात्व में एकता का संधान तथा आत्म-बोध और जगत्-बोध को एकाकार किया था । दादू का काव्य कबीर के वैचारिक क्षितिज को व्यापक किंतु धीर-गंभीर बनाने का उपक्रम है।
दादू अपने सहज, निश्छल भगवत्प्रेम के सोपान से ब्रह्म-द्वार की उस सीमा तक पहुंचे, जहाँ परम तत्त्व के यथार्थ स्वरूप को पहचानने और पाने का मार्ग संसार को दिखा सके । इन्होंने ऐसे व्यक्ति और समाज की रचना का प्रयास किया था, जो सच्चाई, समता, प्रेम, भाईचारे और मानवीयता से ओतप्रोत था।
अनेक प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर पहली बार इनकी समग्र रचनाओं का प्रामाणिक और पूर्ण वैज्ञानिक पाठ-संपादन करके तथा पुनरावृत्ति तथा भ्रमपूर्ण पाठों का निराकरण करते हुए, दादू की मूल रचना का पाठ प्रस्तुत किया गया है । विद्वतजनों के अतिरिक्त सामान्य पाठकों को इनका सृजन सहज बोधगम्य हो सके, इसके लिए भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए हैं।

दादू समग्र : 2
महिमामय व्यक्तित्व और रचनात्मक प्रतिभा से संपन्न निर्गुणपंथी  कवियों में कबीर के पश्चात् दूसरा स्थान संत दादू दयाल का है । स्वयं सक्रिय रचनाशील रहते हुए अपने शिष्यों की रचनात्मक प्रतिभा को आगे बढाने वाले प्रेरक के रूप से उनका विशिष्ट महत्त्व रहा है । इसी कारण से मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के समस्त संप्रदायों में सर्वाधिक रचनाकार दादू-पंथ मेँ हुए थे।
दादू दयाल की रचनाओं का समग्र एवं प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करना, अन्य कवियों की अपेक्षा जटिल, समय-साध्य एवं चुनौतीपूर्ण कार्य था। संत-काव्य-मर्मज्ञ डॉ० रजनीश ने 14 वर्षों की निरंतर साधना से विभिन्न स्थानों, दादू-द्वारों और सांस्थानों में जाकर, वहाँ से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन 29 पांडुलिपियों के आधार पर दादू-काव्य का पूर्णिया वैज्ञानिक, मूल एवं विश्वसनीय पाठ प्रस्तुत किया है।
दादू 'जोग्यन्द्र' की अज्ञात, लुप्तप्राय और अपूर्व रचना 'आदि बोध-सिद्धांत-ग्रंथ' के साथ उनकी अन्य रचनाएँ पहली  बार इसमें दी जा रही हैं। 'समग्र' में समग्रत: पुनरावृत्ति और प्रक्षिप्त साखियों को छाँटकर पाद-टिप्पणियों या अतिरिक्त साखियों के अंतर्गत रखकर, कथ्य द्वार संदर्भ की दृष्टि से उनका उपयुक्त स्थान निर्धारित किया गया है ।
ग्रंथ की विस्तृत भूमिका और यथार्थपरक विवेचना से अनेक लोक-प्रवादों और भ्रांत धाराओं का निराकरण करते हुए इस प्रस्तुति में दादू के जीवन और रचनाधर्मिता के बारे में नई दिशाएं दी गई हैं।
जन-सामान्य को दादू दयाल की कविता का मर्म सहज ग्राह्य हो सके, इसके लिए साखियों और पदों के साथ भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए है, जिससे यह ग्रंथ विद्वानों, सुधी पाठकों और जन-सामान्य के लिए समान रूप से उपयोगी हो गया है ।

Govind Rajnish

डॉ० गोविन्द रजनीश
जन्म : 10 सितंबर, 1938 को राजस्थान के वैर कसी में 
शिक्षा : राजस्थान विश्वविद्यालय से एम०ए० आगरा विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० और डी०लिट्० सैंतीस वर्षों तक विश्वविद्यालयों में अध्यापन 1 जुलाई, 1999 को प्रोफेस-पद से सेवानिवृत्त इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के भाषा-सलाहकार तथा क० मुं० हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ के निदेशक रहे।  जाने-माने साहित्यकार । तीस पुस्तकें प्रकाशित । पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन
प्रमुख रचनाएँ-
समकालीन हिंदी कविता की संवेदना', 'साहित्य का सामाजिक यथार्थ', 'पुनश्चितन', 'समसामयिक हिंदी कविता : विविध परिदृश्य', 'रांगेय राघव का रचना-संसार', 'नयी कविता : परिवेश, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति' (आलोचना) ० 'रहीम ग्रंथावली', 'सत्यनारायण ग्रंथावली', 'रैदास रचनावली', 'नामदेवर चनावली', 'पंचामृत और पंचरंग', 'बखना रचनावली', 'हिंदी की आदि और मध्यकालीन फागु कृतियां' (संपादन) ०  'लोक महाकाव्य : आल्हा', 'हरदौल लोकगाथा', 'राजस्थान के पूर्वी अंचल का लोकसाहित्य', 'ब्रज की लोकगाथाएँ' (लोकसाहित्य) ० साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'इनसाइक्लोपीडिया आंफ इंडिया लिट्रेचर' के छह खंडों के लिए लेखन
सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मेलन, केंद्र साकार, उ०प्र० सरकार, उ०प्र० हिंदी संस्थान, सत्यनारायण-स्मारक-समिति, आगरा विश्वविद्यालय तथा लोक परिषद से सम्मानित एवं पुरस्कृत ।

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