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  • Himalaya Gaatha-5 (Lokvarta)
    Sudarshan Vashishath
    600 480

    Item Code: #KGP-693

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-5 (लोकवार्ता)
    अदभुत है लोक वाड्मय। यह जितना गहन है, उतना ही तर्कशील और विवेकशील है । इसके रचयिता वे अनाम रचनाकार रहे हैं, जिन्होंने कभी अपने नाम नहीं दिए । लोक की रचना जितनी मारक रही है, उतनी ही काव्यमयी । हालाँकि उन रचयिताओं ने कहीँ से छंदविधान नहीं सीखा, किसी काव्यशास्त्र की शिक्षा नहीं ली । सबसे बडी बात यह कि राजाओं के निरंकुश शासन के समय भी उन्होंने बड़ी से बडी बात अपने ढंग से निडर होकर कही । वे काल और स्थिति के अनुसार नए-नए छंद रचते रहे । लोक की रचना में अपनी परंपरा के वहन के साथ समाज- सुधार की एक धारा भी निखार बहती रही । अपनी संस्कृति का संरक्षण, अपने संस्कारों का समादर इनका अभीष्ट रहा ।
    हमारी लोकवार्ता लोकगीत, लोकसंगीत, लोकनाट्य, लोकोक्ति-मुहावरे, लोककथा और लोकगाथा के रूप में सुरक्षित रही है। यह मात्र मनोरंजन का साधन न होकर संस्कृति के संवाहक और संरक्षक के रूप में अधिक जानी गई । समाज के विश्वास, आस्थाएँ, धारणाएं और समस्त क्रियाकलाप लोकवार्ता में परोक्ष रूप से छिपे रहते हैं, जो हमारी थाती को बुढ़िया की गठडी की भाँति सिरहाने रखे रहते हैं।
    लेकिन आज हमारी यह संपदा लुप्त होने के कगार पर है । भौतिकवाद, बाजारवाद और समाज के बदलते परिवेश और मूल्यों ने पुरानी परंपराओं को धराशायी कर दिया । लोकगायकों, वादकों ने अपना कर्म छोड़ दिया । आज न किसी के पास कथा या गाथा सुनने का समय है और न सुनने का । दादी-नानी दूरदर्शन में सास-बहू की कहानी देखती हैं । हम अपनी भाषा, वेशभूषा से विमुख हुए । ऐसे अपसंस्कृति के कुसमय में इस दुर्लभ साहित्य का संग्रहण आवश्यक हो जाता है ।
    कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अमूल्य थाती का संग्रह कर एक अति महत्त्वपूर्ण काम किया है, जिसके लिए कल का इंतजार नहीं किया जा सकता था । लोकवार्ता की मात्र प्रस्तुति न देकर उसका सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण विषय को और भी गहनता प्रदान करता है । 'हिमालय गाथा' के पाँचवें खंड में दी गई दुर्लभ सामग्री हमारी परंपराओं के अध्ययन के लिए एक मील का पत्यर साबित होगी, ऐसा विश्वास है ।

  • Jangal Juhi
    Ramesh Chandra Shah
    320 288

    Item Code: #KGP-443

    Availability: In stock

    रमेशचन्द्र शाह के डायरी-लेखन की पहली कृति 'अकेला मेला' में सन् 1981 से 1985 तक की प्रविष्टियाँ शामिल थी तो दूसरी कृति 'इस खिड़की से' 1986 से 2004 तक की डायरी को समाहित किए हुए थी। तीसरी 'आज और अभी' का फलक 2004 से 2009 तक पाँच वर्षों को अंतः प्रक्रियाओं को समेटे हुए है और, अब यह चौथी डायरी 'जंगल जुही' अद्यावधि और 'अद्यतन' को। इस डायरी में लेखक ने अपने प्राग और हैदराबाद प्रवास के अत्यंत रोचक और मूल्यवान् यात्रानुभवों को भी सहज ही स्वत:स्फूर्त ढंग से पिरो दिया है, जिनसे-पाठक पाएँगे कि-उनके अपने ही जिये और भोगे हुए में एक नया और अप्रत्याशित आयाम आ जुड़ा है।
    जैसा कि एक सुधी समालोचक का मंतव्य है-"एक ही विधा में अनेक विधाओं का कायंतरण और अर्थांतस्या कैसे होता है, यह रमेशचन्द्र शाह की डायरियों को पढ़कर जाना जा सकता हैं।" यह भी कि-"एक सर्जक अपनी निर्विकार चेतना में कितना बहुविध हो जाता हैं। शाह की डायरी केवल तिथिक्रम में घटित जीवन-लीलाओं का बयान नहीं है, बल्कि भाव-विपुल सौंदर्य और अनुभूतियों में निहित मर्म का उदघाटन है। यहाँ दर्शन है-साहित्य की तरह; साहित्य है संस्मरणों की समृद्धि की तरह; संस्मरण है-जीवन के धड़कते हर पल की तरह डायरियाँ अनुभवों की जीवंत गाथाओं के समान होती हैँ।
    वे कल्पना-प्रसूत कविता-कहानी न होकर भी अगर उन्हीं की तरह आंदोलित और आनंदित करती है तो मानना पड़ेगा कि डायरी-लेखक एक कल्पनाशील-विचारशील व्यक्ति के साथ भाषा- शिल्पज्ञ भी है।" शाह की डायरियाँ अर्थान्वेषण की गंभीरता के साथ-साथ आलोचनात्मक अंतर्दूष्टि, 'विट' और 'ह्यूमर' से भी परिपूर्ण होती हैं। पाठक देख सकते हैं कि उनकी काल-चेतना कितनी प्रखर, प्रबुद्ध और संवेदनशील है।
    रमेशचन्द्र शाह की डायरी एक और रसिक मर्मज्ञ के शब्दों मे-"महज डायरी नहीं है; इसमें सही  में साहित्य का वैश्वीकरण हो गया है, जिसने मनुष्य की बनाई सारी सरहदों को तोड़कर सारी धरती को अपना घर-कूटुंब मान लिया है।' कुल मिलाकर शाह का डायरी-लेखन देश-काल की हदों को लाँघ  हमें उस लेकि में ले जाता है जहाँ हम खुद को सच के आईने के सामने खड़ा पाते है, जहाँ अपने से बचना मुरिकल ही नहीं, नामुमकिन होता है।
  • Sapnon Ka Shahar : Dubai
    Manoj Singh
    260

    Item Code: #KGP-7221

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के कई नाम हो सकते हैं...‘दुबई: वंडर वल्र्ड’, ‘कमर्शियल कैपिटल’, ‘भविष्य का शहर’, ‘एक केस स्टडी’, ‘एक सफल राजतंत्र’, ‘एक विश्व मेला’, ‘एक आधुनिक बाजार’, ‘सिटी आॅफ माॅल्स’... लेकिन मैंने नाम दिया था ‘दुबई: एक मानवीय चमत्कार’...रेगिस्तान में सुंदर बाग-बगीचे और आइसफील्ड किसी चमत्कार से कम नहीं...मगर अंत में नाम रखा गया ‘सपनों का शहर: दुबई’...सपने अकल्पनीय होते हैं, अविश्वसनीय, रहस्य रोमांच से भरपूर और अति सुंदर भी...(इसी पुस्तक से)
  • Vastunishth Hindi
    Munish Sharma
    280 210

    Item Code: #KGP-9243

    Availability: In stock

    आज वर्तमान समय दौड़ का समय है जहाँ स्पर्धा है, प्रतियोगिता है जिनके चलते सभी विषयों के रूप-उपरूप उनके ही अनुरूप गढ़ा जाने लगा है । यदि आज की प्रतियोगी परीक्षाओं पर दृष्टपात करे तो हम पाते हैं कि विभिन्न परीक्षा-संस्थाओं द्वारा परीक्षार्थी के ज्ञान को मापने के लिए कुछ नए सूत्र ईजाद किये गए है, जिसके अंतर्गत वे कम से कम समय में प्रतिभागी के सकल ज्ञान की परीक्षा ले लेना चाहते हैं । 'कर्मचारी चयन आयोग' हो अथवा 'संघ लोक सेवा आयोग' सभी आज आधुनिक रीति से ज्ञान की परीक्षा ले रहे हैं जिसमें वस्तुनिष्ठ प्रश्नों द्वारा परीक्षा लेना रामबाण सिद्ध हुआ भी है । इसके माध्यम से परीक्षार्थी के समग्र ज्ञान की परीक्षा कुछ ही समय में हो जाती है । वस्तुनिष्ठ प्रश्न व्यवस्था वास्तव में है क्या ? इस पद्धति के अंतर्गत जो भी प्रश्न पूछा जाता है उस प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर होते हैं । उन चारों उत्तरों में से एक ही उत्तर सही होता है । परीक्षार्थी को उस सही उत्तर का चयन करना पड़ता है । 
    स्तर की गरिमा तथा विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण हिंदी साहित्य, काव्यशास्त्र तथा भाषा-विज्ञान से ऐसे प्रश्नों को चुना है जो की परीक्षा एवं ज्ञान दोनों की दृष्टि से सहायक हों । वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के अतिरिक्त अंत में तथ्यात्मक पक्ष के अंतर्गत विद्यार्थियों की सुविधा हेतु प्रश्नों एवं उत्तर को भी आमने-सामने रख गया है । इससे विद्यार्थी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का ज्ञानार्जन तो कर ही सकेंगे, साथ  ही कुछ अन्य तथ्यात्मक पहलुओं से भी अभिज्ञ हो सकेंगे । 
  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-5)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-892

    Availability: In stock


  • Qaidi
    Shanta Kumar
    120 108

    Item Code: #KGP-1996

    Availability: In stock

    कैदी
    "राजीव ! इस देश में हर आदमी के
    माथे पर उसकी कीमत लिखी रहती है ।
    वह कीमत चुकाओ और उसे खरीद लो ।
    यहां बाज़ार में सरेआम इंसान
    नीलामी पर चढते है और जाहिर
    में भगवान बेचे जाते है ।
    बड़ा अनुभव है मुझे जिंदगी का ।
    जेल में वार्डर पैसे लेकर क्या नहीं
    ले आते ? बस, इतनी बात है कि
    दुगुना-तिगुना मूल्य चुकाना पड़ता है ।
    जब उन्हें पता चल गया कि मेरे पास
    धन है तब मेरो इज्जत होने लगी ।

    'मैंने कैद पूरी की । छूटकर बाहर आया,
    पर जाता कहाँ? फिर से वही धंधा,
    पुलिस और जेल । इसी प्रकार अब
    सातवीं बार यहाँ आया हूँ ।
    अब यह कैद समाप्त हो रही है
    तो फिर मेरे सामने सवाल
    खडा हो गया है कि बाहर जाकर
    कहाँ जाऊंगा व क्या  करूँगा ?
    जानता हूँ कि कुछ भी और
    नहीं कर सकता । यह जिंदगी अब
    जेल की ही हो गई है ।”
    [इसी उपन्यास से]
  • Dil Ko Mala Kare Hai
    Vishnu Chandra Sharma
    80 72

    Item Code: #KGP-2007

    Availability: In stock

    दिल को मला करें है
    हिंदी  बहुत कम लेखकों ने जीवन के रग-रेशे को इतना करीब से बनते-बनाते, बिगड़ते-सँवरते देखा है, जैसा कि विष्णुचन्द्र शर्मा ने । प्रस्तुत उपन्यास आदि से अंत तक मनुष्य  जीवन-संघर्ष की गाथा है, जिसमें दुख  सुख है, राग है, विराग है, हर्ष है, विषाद है । जीवन  तमाम उतार-चढाव अपनी संपूर्णता में व्यक्त हुए है ।
    'दिल को मला की है' स्मृति-आख्यान है। लेखक ने अपनी पत्नी के अवसान के बाद कलम-कागज से जुगलबंदी की, जिसका सुफल है यह औपन्यासिक कृति । पली की मृत्यु के बाद घर-आँगन, रसोई-बगीचा कैसे बिखरता है, दरो-दीवार कैसे टूटती है, बिलखती है ! उपन्यास का कथाक्रम ठीक मनुष्य के जीवन की तरह है । किसी आत्मीय जन का हँसते-बतियाते 'टुक' चुप हो जाना या ऐसी यात्रा पर निकल जाना, जहाँ से वापसी संभव नहीं, निस्संदेह शोक का कारण बनता है लेकिन बकौल उपन्यासकार इसी शोक से जीवन का राग फूटता है ।
    पत्नी की स्मृतियों को खँगालते तथा डरो-दिवार में उसकी तलाश करने के क्रम में ढेरों पात्रों की जीवंत  उपस्थिति उपन्यास की रोचकता बढाती है । सरि पात्र जस के तस ।  बिना किसी शाब्दिक बुनावट के। मनुष्य मात्र मनुष्य होता है देवता या राक्षस नहीं। जिजीविषा ही उसकी पहचान है । काल भैरव, सादतपुर से लेकर यूरोप तक स्थितियाँ तथा विडंबनाएँ एक हैं, पर कोई भी पात्र निराश या हतोत्साहित नहीं दिखता ।
  • Mere Saakshatkaar : Kamleshwar
    Kamleshwar
    400 360

    Item Code: #KGP-777

    Availability: In stock


  • Aadarsh Ghar-Parivaar Aur Mahilayen
    Sudha Gautam
    180 162

    Item Code: #KGP-187

    Availability: In stock

    'आदर्श घर-परिवार और महिलाएँ' पुस्तक में सुधा गौतम ने अपने अनुभवों के आधार पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी है, उनमें से कुछ शीर्षकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है, यह पुस्तक महिलाओं के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होगी :
    ० जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
    ० छोटी-छोटी बातों से न हो परेशान
    ० बाँधे रखें पति को
    ० कड़वी यादे भुला दें
    ० जब आप फोटो खिंचवाने जाएं
    ० आप और आपकी शारीरिक गठन
    ० आप और आपका परिधान
    ० आप और आपकी नींद
    ० वर्तमान में जीना सीखें
    ० यदि आपके घर में नौकर है
    ० आप और आपकी खरीदारी
    ० आप और आपके घर के कीड़े-मकोड़े
    ० आपकी बढती उम्र और आप
    ० बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए
    ० जब आप सफर पर जाएं
    ० जब आपके मेहमान आपके घर आएं
    ० आप और आपकी सेहत
    ० बच्चों के लिए नाश्ता 
    ० चमकदार त्वचा के लिए
    ० खूबसूरत होंठों के लिए
    ० त्वचा में निखार के लिए
    ० गर्मियों में आपका मेकअप
    ० मुँहासों से छुटकारा
    ० खूबसूरत बालों के लिए
    ० आपकी गर्दन रहे सुंदर
    ० धूप का चश्मा
    ० आप और आपके गहने
    ० आपके घर का फर्श
    ० महिलाएँ और रसोई
    ० आपके गरम कपडे
    ० कैसे छुड़ाएँ कपडों के दाग
    ० अपने बच्चों के मित्र बनिए
    ० जब बच्चा स्कूल जाने लगे
    ० जिद्दी बच्चा
    ० माँ-बेटी का रिश्ता
    ० बच्चे कैसे बनाएं अपनी अलग पहचान
    ० बच्चे अपना काम स्वयं करें
    ० बच्चे भोजन बेकार न करें
    ० शरारती बच्चों को कैसे सुधारें
    ० बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए
    ० जब आपका बच्चा आपसे दूर रहे
    ० छात्र और परीक्षा
    ० बच्चे कैसे रहें परीक्षा के दिनों में  तनावमुक्त
    ० कैसे लिखे प्रश्नों के उत्तर
    ० कैसे मिले परीक्षा में सफलता
    ० आपका कंप्यूटर
    ० आप और आपके छोटे बच्चे
    ० बच्चों की छोटी-मोटी तकलीफें
    ० घरेलू दवाइयाँ
    ० छोटी-छोटी काम की बातें

  • Pashchatya Kavya Shastra Ka Itihas
    Dr. Tarak Nath Bali
    395 356

    Item Code: #KGP-864

    Availability: In stock


  • Shakti Se Shanti (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    250 213

    Item Code: #KGP-459

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति
    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।
    आइये, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।
    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें हुम पर नाज है, हमें हुम पर गर्व है । -[इसी पुस्तक से]
  • Uttar Kand (Paperback)
    Bhairppa
    300 240

    Item Code: #UK pb

    Availability: In stock

    वाल्मीकि के ‘रामायण’ का अध्ययन करते समय हमें चरित्रें की दृष्टि से, चरित्र-चित्रण की दृष्टि से, घटनाओं की स्वाभाविकता की दृष्टि से, वर्णनों के औचित्य की दृष्टि से और चरित्रें के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की दृष्टि से जो कमियाँ नजर आती हैं, उन सभी का समाधान उत्तर कांड नामक इस उपन्यास में मिलता है। जैसा कि ‘पर्व’ में किया गया था, ‘उत्तर कांड’ में भी चरित्रें और घटनाओं को मिथकीकरण से मुक्त करके, स्वाभाविक परिवेश में प्रस्तुत कर दिया गया है। इसलिए इसको आधुनिक गद्य-महाकाव्य होने की प्रतिष्ठा भी मिली है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है 
  • Kalpana Chawla
    A.W.I.C.
    40 36

    Item Code: #Kgp-kc

    Availability: In stock


  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Arvacheen Kavya-Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    30

    Item Code: #KGP-950

    Availability: In stock


  • Hindi Vartani Ki Samasyayen Evam Mankikaran
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    400 300

    Item Code: #KGP-9381

    Availability: In stock

    वर्तनी या ‘स्पेलिंग’ भाषा का एक बुनियादी तत्त्व है। मौखिक भाषा जब से लिखित रूप में अस्तित्वमान हुई तब से वर्तनी की यात्रा भी शुरू हुई। जाने कितनी लिपियों और जाने कितने भाषा प्रकारों से संशोधित होते हुए आज हिंदी भाषा ने वर्तनी का एक मानक स्वरूप प्राप्त कर लिया है। ‘हिंदी वर्तनी की समस्याएँ एवं मानकीकरण’ पुस्तक में लेखकद्वय डॉ. भोलानाथ तिवारी और डॉ. किरण बाला के लेख वर्तनी के विभिन्न आयामों पर विधिवत् व तर्कसंगत प्रकाश डालते हैं। लेखकों के अनुसार, ‘वर्तनी का सबसे बड़ा आधार तो उच्चारण (आधुनिक परंपरागत या ध्वनि परिवर्तन से विकसित) है। उसके बाद शब्द रचना का स्थान है। शेष निर्णय अशुद्धि या प्रभाव आदि कुछ ही वर्तनियों के आधार बन पाते हैं। गत कई दशकों से राजभाषा के प्रचार-प्रसार के कारण भारत सरकार एवं इसके अधीन गठित संस्थानों ने वर्तनी के मानकीकरण पर निरंतर कार्य किया है। इसके परिणामस्वरूप हिंदी की वर्तनी में कई परिवर्तन किए गए। इन सभी परिवर्तनों व सुझावों को भी इस पुस्तक में शामिल करके इसे अद्यतन किया गया है।’
    प्रस्तुत पुस्तक ‘भारतीय आर्यभाषाओं में वर्तनी का विकास’, ‘हिंदी वर्तनी: चिंतन की परंपरा’, ‘हिंदी वर्तनी की समस्याएँ’, ‘हिंदी के संख्यावाचक शब्दों की वर्तनी’, ‘हिंदी लेखन में होने वाली वर्तनी की अशुद्धियाँ’ आदि आठ अध्यायों में विभक्त है। अशुद्ध लिखे जाने वाले और एकाधिक वर्तनी वाले शब्दों की सूची एवं हिंदी वर्तनी के मानकीकरण एवं सरलीकरण जैसे नवीनतम मुद्दों को समाहित करके पुस्तक को अधिक रोचक व उपयोगी बनाया गया है। प्रत्येक लिखने-पढ़ने वाले सामान्य व्यक्ति से लेकर भाषाप्रेमियों, विद्यार्थियों व अनुवादकों के लिए एक जरूरी पुस्तक।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjiv (Paperback)
    Sanjeev
    80

    Item Code: #KGP-1271

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : संजीव
    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    सजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-55

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    150 135

    Item Code: #KGP-30

    Availability: In stock

    किताबघर प्रकाशन की महत्वाकांक्षी कथा-सीरीज़ 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' को विस्तार देते हुए इसे अब अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया है । अर्थात् इस सीरीज़ में अब सभी भारतीय भाषाओँ के शीर्ष कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियां उपलब्ध कराये जाने की योजना है ।
    सीरीज़ के इस नव्यतम सेट में शामिल कथाकार हैं : अमरकान्त, कृष्ण बलदेव वैद, खुशवंत सिंह, गोविन्द मिश्र, ज्ञानरंजन, देवेन्द्र सत्यार्थी, निर्मल वर्मा, प्रतिभा राय, शनी, शेखर जोशी तथा शैलेश मटियानी । विभिन्न भाषाओँ के इन भारतीय कथाकारों ने अपनी सर्जनात्मकता के बल पर स्वयं को आधुनिक कथा के जिस शीर्षस्थ स्थान पर स्थापित किया है वह अपने आप में एक उपलब्धि है । इसी 'उपलब्धि' को एक सीरीज़ के माध्यम से पाठक तक पहुँचाकर हम गौरवान्वित है ।
    यह सुखद संयोग है कि आजादी के पावन स्वर्ण जयंती  के शुभ अवसर पर देश का विशाल पाठक वर्ग इन कथाओं के माध्यम से मनुष्य और परिवेश के नितांत नये रूपों और अप्रकाशित छवियों को पा सकेगा । इन कहानियों में आदमी के मनुष्य हो जाने की अनुभूतियों के जिस तरलता और सरलता से पिरोया गया है, वह सचमुच एक अदभुत पाठकानुभव है । 
    कहानीकार के कथाकर्म का प्रतिनिधि एवं केंद्रीय स्वर, गहन आत्मीयता से यहाँ सामने लाया गया है । यह कथाकार की अपनी कथाभूमि तो है ही, लगता है, हम सबकी सगी दुनिया भी यही है । टूटती-ढहती और फिर से बनती-सँवरती दुनिया । मानवताकामी शुभेच्छा की यह आकांक्षा ही इस सीरीज़ की वह शक्ति है जो आज के तमाम चालू कथा- सीरीज़ों से इसे अलग खड़ा करती है ।
    तो, प्रस्तुत है खुशवंत सिंह की दस प्रतिनिधि कहानियाँ  ।
  • Lagaav
    Raghubir Chaudhary
    50 45

    Item Code: #KGP-9058

    Availability: In stock


  • Rachna Ka Jeevdravya
    Jitendra Shrivastva
    600 510

    Item Code: #KGP-9222

    Availability: In stock

    ‘रचना का जीवद्रव्य’ इस दौर के महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव की नई आलोचना पुस्तक है। इस पुस्तक की परिधि में आपातकाल के बाद की हिंदी कहानी का इतिहास है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन की अद्वितीय आत्मकथा का गहन विश्लेषण भी। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब हैं तो विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर भी। जितेन्द्र जिस बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कविता पर विचार करते हैं, उसी बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कथा साहित्य पर भी। वे आलोचना के औजारों को गड्डमड्ड नहीं करते। उनकी आलोचना में गहरी विचारशीलता है। जितेन्द्र श्रीवास्तव जब भी किसी विषय को उठाते हैं, उसे संपूर्णता में समझने-समझाने का उद्यम करते हुए उसे एक सर्वथा नई ऊंचाई भी देते हैं। यह अकारण नहीं है कि उनकी छवि एक विश्वसनीय आलोचक की है। वे भाषा की ताकत को जानते हैं इसलिए भाषिक पारदर्शिता के घनघोर आग्रही हैं। इस पुस्तक में संकलित आलेख भाषिक ताज़गी के अप्रतिम उदाहरण हैं। यह देखना सुखद है कि जितेन्द्र अपने पाठकों को उलझाते नहीं हैं। वे उन्हें वह मार्ग दिखाते हैं जो बिना किसी भटकाव के रचना के जीवद्रव्य तक ले जाता है। कहना न होगा कि जितेन्द्र श्रीवास्तव के बहुप्रशंसित और बहुउद्धृत आलोचनात्मक आलेखों की यह पुस्तक आलोचना के वर्तमान परिदृश्य को निश्चित रूप से संपन्न बनाएगी। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya (Paperback)
    Ravindra Kalia
    120

    Item Code: #KGP-430

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रवीन्द्र कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    150 135

    Item Code: #KGP-1872

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।
  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Nashta Mantri Ka Gareeb Ke Ghar
    Prabha Shanker Upadhayaye
    90 81

    Item Code: #KGP-1863

    Availability: In stock

    नाश्ता मंत्री का गरीब के घर
    विषमताओं विसंगतियों और विद्रूपताओं  से अटी है आज के जिंदगी । ऐसे अनुभवों को अनुभूत का, प्रहारात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, व्यंग्य कहा जाता है । साथ ही मानव को कुंठाओं एवं जीवन-मूल्यों में स्खलन के प्रति भी फिक्रमंद होता है व्यंग्यकार । उसकी सोच का पैनापन पाठक के मन को कभी कचोटता है तो कभी उसका फक्कड़ मिजाज पाठक के मन को गुदगुदा जाता है । इसीलिए व्यंग्य के साथ हास्य का जुडाव हो गया है ।
    प्रस्तुत संग्रह में नाना भाँति की महक सहेजे तीस व्यंग्य-पुष्प संकलित हैं, जिन्हें मैंने डेढ़ दशक की अवधि में लिखा है । समाज, व्यवस्था राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, अर्थशास्त्र तथा दफ्तरी जिन्दगी इत्यादि विषयों पर कलम चलाने का प्रयास किया है । मैं अपनी लेखनी का तेवर दिखा पाने में कितना कामयाब हो सका हूँ इसका निर्णय तो प्रबुद्ध पाठक एवं सुधी समीक्षक ही करेंगे  ।
    ---प्रभा शंकर उपाध्याय 'प्रभा'
  • Gehoon Ghar Aaya Hai
    Divik Ramesh
    175 158

    Item Code: #KGP-1893

    Availability: In stock

    गेहूँ घर आया है
    ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित हिंदी कवि दिविक रमेश बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। 38 वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच’ और ‘खुली आँखों में आकाश’ कविता-संग्रहों पर सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलना उनकी कविताओं की महत्ता को रेखांकित करता है। उनकी अब तक की कविता-यात्रा को इस संग्रह में हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने अपनी रुचि के अनुसार चुनिंदा ढंग से प्रस्तुत किया है। निःसंदेह इससे पाठकों का एक बड़ा हित सधेगा।
    युवा कवि हेमंत कुकरेती की धारणा है कि दिविक रमेश की "कविताओं में हम जिंदगी से प्यार करने वाले मन को महसूस कर सकते हैं। वह सुख-दुःख से रची ज़िंदगी में डूबकर ही जीवन का वास्तविक अर्थ हासिल करता है। इसीलिए उसका संबोधन सीधे पृथ्वी, काल, हवा, रात, धूप और अंततः जीवन से है। आसानी से समझ में आने वाली ये कविताएँ किताबी अनुभववाद का भाषानुवाद नहीं हैं। सरलीकरण से बचते हुए दिविक रमेश जीवन की जटिलताओं को आसानी से कह देते हैं और उनका इतना सहज और स्वाभाविक होकर कहने में सफल होना कई बार हैरत में डालता है...।" (‘इंडिया टुडे’, 10 जनवरी, 2001)
    और ‘छोटा-सा हस्तक्षेप’ की कविताओं पर बोलते हुए प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा--इस संग्रह को पढ़कर उन्हें प्रीतिकर आश्चर्य हुआ। कवि दिविक रमेश ने बहुत लंबी छलाँग लगा दी है। कविताओं में कई तरह की आवाजें हैं। जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, ये कविताएँ उनसे हटकर हैं। दिविक रमेश ने कविता की एक नई आवाज़ विकसित कर दी है। अशोक वाजपेयी और विष्णु खरे जैसे रचनाकारों ने इन कविताओं को सराहा है। ‘यात्रांत’ एक अद्भुत कविता है। रूस पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन रूस के अनुभव पर लिखी गई कविता बहुत ही बारीक है। हिंदी में पहली बार ऐसी कविता संभव हुई है। हिंदी में ‘भूत’ जैसी कविता नहीं है। फैंटेसी की बहुत बात की जाती है, लेकिन फैंटेसी यहाँ देखिए। यह एकमात्रा ऐसा संग्रह है, जिसमें एक साथ दर्जन से ऊपर उत्कृष्ट कविताएँ हैं।   
  • Khushboo Udhaar Le Aye
    Upendra Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1902

    Availability: In stock

    खुशबू उधार ले आए
    उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लों का 'हिन्दीपन' एक ओर 'उर्दू' की फारसीयत से अलगाता है तो दूसरी ओर गजल के व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य को सबल बनाता है, जिसका अनुकरण पाकिस्तान के ग़ज़लकार भी करते है । डॉ० शेरजंग गर्ग ने ठीक ही कहा है कि उपेन्द्र की कहन में वैविध्य है जो उन्हें बहुत-से ग़ज़लकारों से सर्वथा अलग का देता है । 
    -डॉ० गंगाप्रसाद विमल
    हबीब जालिब की तरह उपेन्द्र कुमार भी व्यवस्था से लड़ते और कारावास में डाले गए इंसान की वेदना को शिद्दत से महसूस करते है :
    वो कैदी चुप था लेकिन गुनगुनाया
    बजी जंजीर की जब इक कड़ी थी
    उपेन्द्र के पास शे'र कहने का सलीका भी है और कल्पना को इस्तेमाल करने का फन भी । 
    -ज्ञानप्रकाश विवेक
    उपेन्द्र के पास शायद किसी चालाक अनुभवी कवि का शिल्प-कौशल नहीँ है, यह अच्छी बात है अन्यथा उनकी रचनाओं में कथ्य की प्रमुखता नहीं रह पाती । अनगढ़ यथार्थ का विशाल भंडार परोसती उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लें पाठकों को अपने आसपास को सतर्कता से देखने को मजबूर करेंगी, ऐसा विश्वास है ।
    - विजय किशोर मानव
    न तो उपेन्द्र जी उर्दू ग़ज़ल की रिवायतों की रौ में बहे है और ना ही उन्होंने अपनी ग़ज़लों पर हिन्दी का ‘कवितापन हावी होने दिया है । उनकी ग़ज़लों की बुनावट और उनकी प्रकृति गीतों से अलग है । इसीलिए उनमें गजलियत की मौजूदगी का अहसास बना रहता है । सोजो-साज़ (वेदना और संगीतात्मकता) हूँ तो कविता मात्र के आधार तत्त्व माने जाते है, मगर इनके बरौर तो ग़ज़ल का काम ही नहीं चल सकता । ग़ज़ल में रोमानिया की चाशनी भी ज़रूरी है । उपेन्द्र जी ने ग़ज़ल की इन खूबियों को न केवल समझा है, बल्कि इनसे अपनी ग़ज़लों को बखूबी सँवारा भी है ।
    - बालस्वरूप राही
  • Yeh Dilli Hai
    Raj Budhiraja
    125 113

    Item Code: #KGP-1961

    Availability: In stock

    मैं इतना कहना चाहुँगी कि मैंने दिल्ली में रहकर सुखद-दुखद और त्रासद अनुभव किए हैं लेकिन मैंने सुखद अनुभवों को ही अभिव्यक्ति प्रदान की है । अभी तक मैंने दिल्ली पर तीन पुस्तके लिखी हैं-'दिल्ली अतीत के झरोखे से, 'हाशिये पर' और 'हाशिये पर दिल्ली' । ऐसी दिल्ली की चारों दिशाओं से सुख व्यापता रहे । इन्हीं शब्दों के साथ मैं ये पुस्तक (जिसका नामकरण मैंने खुद किया है) अपने दिल्लीवासियों को सौंपने का प्रयास करती हूँ। सस्नेह आपकी
    --राज बुद्धिराजा

  • Head Office Ke Girgit
    Arvind Tiwari
    300 255

    Item Code: #KGP-463

    Availability: In stock

    हेड ऑफिस के गिरगिट' वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविन्द तिवारी का नया व्यंग्य उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि इसकी पांडुलिपि पर उन्हें वर्ष 2014 का 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान प्राप्त हुआ है।

    यह उपन्यास शिक्षा, समाज और राजनीति के साथ व्यवस्था की संधियों-दुरभिसंधियों का आंतरिक यथार्थ उजागर करता है। भारतीय लोकतंत्र के विकास का एक बड़ा दायित्व शिक्षा व्यवस्था पर है। शिक्षा व्यवस्था जाने कैसे-कैसे निहितार्थों का भार वहन कर रही है। स्मरणीय है, वर्षों पहले कालजयी उपन्यास 'राग दरबारी' में श्रीलाल शुक्ल ने शिक्षा व्यवस्था पर बेहद तीखी टिप्पणी की थी। शिक्षा के सरोकारों या राष्ट्रीय उद्देश्यों को थोड़ी देर के लिए भूल भी जाएं तो भी प्रक्रिया, परिणाम व प्रभाव पर समयानुसार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे ही बहुतेरे सवालों से मुठभेड़ करते हुए अरविन्द तिवारी ने यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखा है।

    शहर से आठ किलोमीटर दूर बियाबान में स्थित शिक्षा विभाग के एक आला दफ्तर' को केंद्र में रखकर लेखक ने कर्मचारियों की गतिविधियों का ‘एक्स-रे' किया है। लेखक के अनुसार, 'हेड ऑफिस की यह विशेषता है कि फील्ड में नाकारा साबित हुआ अधिकारी हेड ऑफिस में ड्यूटी ज्वाइन करते ही सबसे सक्षम अधिकारी बन जाता है।' अनेकानेक चरित्रों, घटनाओं, स्थितियों, मन:स्थितियों व विचारों को 'व्यंग्य विदग्ध' भाषा-शैली में उपस्थित करता 'हेड ऑफिस के गिरगिट' पाठकीय चेतना को प्रमुदित-आंदोलित करता है। प्रारंभ से अंत तक प्रफुल्लित भाषा में लिखी यह रचना हिंदी के व्यंग्य उपन्यासों में एक सुखद वृद्धि करती है।

    कथा, कौतूहल और कौतुक का सहमेल व्यंग्य उपन्यास की सबसे बड़ी कसौटी है। कहना न होगा कि यह उपन्यास इस कठिन कसौटी पर खरा उतरता है। अत्यंत पठनीय और संग्रहणीय कृति।


  • Aalochana Ka Naya Paath
    Gopeshwar Singh
    425 319

    Item Code: #KGP-757

    Availability: In stock

    आलोचना का नया पाठ-नई पीढ़ी के गंभीर और दृष्टिसंपन्न आलोचक गोपेश्वर सिंह की नई आलोचना पुस्तक है। इसके जरिए लेखक हिंदी आलोचना के पुराने पाठ को न सिर्फ नए पाठ में बदलने का आलोचनात्मक संघर्ष करता है, बल्कि उसकी नई भूमिका की जमीन भी तैयार करता है। पठनीयता के गुणों से युक्त साहित्य में पाठक की दिलचस्पी पैदा करने वाली यह आलोचना पुस्तक हिंदी आलोचना में आते नए बदलाव का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
    गोपेश्वर सिंह की रुचि एकांगी नहीं। उनकी आलोचनात्मक पहुँच समग्रतावादी है। मध्य काल से लेकर आधुनिक काल तक, कथा-साहित्य से लेकर कविता तक तथा साहित्य से लेकर समाज तक सभी इनकी रुचि के क्षेत्रा हैं। ऐसे समय में जब आलोचना में गतिरोध का शोर मचाया जा रहा है और जब आलोचक किसी खास विधा या काल तक सीमित होते जा रहे हैं, तब गोपेश्वर सिंह जैसे बहुआयामी सोच वाले नए और गंभीर आलोचक की उपस्थिति आश्वस्त करती है कि आलोचना में गतिरोध का प्रश्न बेमानी है।
    हिंदी आलोचना को प्रगतिवाद और आधुनिकतावाद के शीतयुद्धकालीन दुराग्रही प्रत्ययों की छाया से बाहर निकालना गोपेश्वर सिंह के आलोचनात्मक लेखन की मूल प्रतिज्ञा है। इसलिए यथार्थवाद या रूपवाद जैसे पदों और पक्षों से वे आलोचना को मुक्त करते हैं और उसे नए विमर्शों की रोशनी में ले जाते हैं, लेकिन विमर्शों की अतिरेकी परिणति से उसे बचाते भी हैं।
    ‘आलोचना का नया पाठ’--शीर्षक यह पुस्तक सैद्धांतिकियों के आतंक से मुक्त व्यावहारिक आलोचना का ऐसा पाठ है, जो--भाषा, दृष्टि और शैली--हर तरह से नया है।
  • Nirogyogsadhna
    Manoj Kumar Chaturvedi
    300 270

    Item Code: #KGP-677

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Swami Dayanand
    Jagat Ram Arya
    70 63

    Item Code: #Kgp-sd

    Availability: In stock


  • Triya Hath (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    160 144

    Item Code: #KGP-7046

    Availability: In stock


  • Shesh Parichay (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    200

    Item Code: #KGP-155

    Availability: In stock


  • Hindi Sahitya Ka Itihas (Paperback)
    Hemant Kukreti
    350 280

    Item Code: #KGP-511

    Availability: In stock

    ‘साहित्य के बेहतर इतिहास में तथ्यों का वस्तुनिष्ठ परीक्षण और पूर्वग्रहरहित विश्लेषण होता है।’ ‘महान साहित्य अपने समय के प्रश्नों और समाज से अलग नहीं होता और न रचनाकार का विवेक इतिहास से स्वायत्त होता है।’ ‘एक अच्छे इतिहास में भाषा और साहित्य की सांस्कृतिक परंपरा, लेखकीय रचनात्मकता का विश्लेषण, देशकाल वातावरण के द्वंद्व और घात-प्रतिघात का संतुलित विश्लेषण किया जाता है। इतिहास लेखन में विकासवादी नजरिया और वैज्ञानिक प्रस्तुति होनी चाहिए।’ हेमंत कुकरेती की ये उपर्युक्त पंक्तियां उनके साहित्य इतिहासबोध को स्पष्ट करती हैं।
    यह अब तक प्रकाशित हिंदी साहित्य का सबसे अद्यतन इतिहास है। हिंदी गीत, गजल इत्यादि से लेकर पत्रकारिता, तमाम गद्य-विधएं, स्त्री एवं दलित विमर्श एवं लेखन के विकास का विश्लेषण किया गया है। इस मायने में यह हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य शुक्ल, द्विवेदी जी, डाॅ. रामविलास शर्मा इत्यादि की परंपरा को आगे बढ़ाता है।
  • Aakhyaan Mahila Vivashata Ka
    Harish Chandra Vyas
    140 126

    Item Code: #KGP-112

    Availability: In stock

    विगत हजारों वर्षों के इतिहास में किसी भी काल में पुरुष ने नारी की आर्थिक अवस्था की ओर कभी भी ध्यान नहीं दिया और इसी अर्थ-विवशता के कारण नारी की दशा समाज में सदैव हीन बनी रही।
    पाषाण काल से लेकर वर्तमान काल तक नारी की सामाजिक यात्रा अत्यंत दुर्गम, सामाजिक बंधनों, बर्बर अत्याचारों, मर्यादाओं और समाजशास्त्रियों द्वारा खोदी गई विशाल गहरी खाई व बिछाए गए कंटीले झाड़-झंखाड़ों में से होकर 21वीं सदी तक पहुंची है। आज उसी नारी-देह का विज्ञापन और व्यवसायीकरण धड़लले से हो रहा है। नाचने, अंग-अंग की भंगिमाएं दिखाने, मुद्राओं से, स्पर्श से, यौवन से उभार से, जरूरी हो तो सहवास से समाज में कई भयंकर विकृतियां दु्रतगति से उभरकर सामने आ रही है।
    प्रस्तुत पुस्तक के सृजन के पीछे प्रमुख उद्देश्य यह रहा है कि इस विषय पर उत्कंठा रखने वाले नागरिक तथा सामान्य जन वस्तुस्थिति का अवलोकन करें और समाज में फैल रही व्यभिचार की विभीषिका से निजात दिलवाने में अभिरुचि एवं अभिवृत्ति का विकास करें।
    —हरिश्चन्द्र व्यास
  • Makka, Kauva Aur Kavi Tatha Anya Kavitayen
    Ramesh Chandra Diwedi
    140 126

    Item Code: #KGP-289

    Availability: In stock


  • Ramcharitmanas Sandarbha Samagra
    Lalit Shukla
    325 293

    Item Code: #KGP-238

    Availability: In stock

    रामचरितमानस संदर्भ समग्र
    ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अमर एवं अद्वितीय कृति है। प्रबंध-काव्य के गुणों से ओतप्रोत यह प्रस्तुति भारतीय संस्कृति और मानवोचित लोकानुभव की संदेशवाहिका बनी हुई है। यह अनेक प्रचलित और गूढ़ संदर्भों से युक्त है। इस रचना से उन्हीं संदर्भों को व्याख्यायित और सरलीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। 
    हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि इस प्रस्तुति से ‘रामचरितमानस’ के अनुरागियों और अध्येताओं  को कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। लोकभाषा अवधी और देवभाषा संस्कृत के अनेक मार्मिक संदर्भों का सरल रूप यहाँ दिया गया है। 
    यह कृति न तो टीका है और न कोश है। यह अपनी पृथक् शैली की प्रस्तुति है, जो हिंदी और ‘मानस के पाठकों के सामने पहली बार आ रही है। सचमुच महाकवि की यह साहित्यिक यात्रा पाठकों का पाथेय है।’ मानस उसका अमिट स्मारक है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Cour (Paperback)
    Ajeet Kaur
    175

    Item Code: #KGP-7010

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजीत कौर
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरों वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिडिया’ , 'चीख एक उकाब की हैं' तथा 'नया साल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Apni Dharti Apne Log-3 Vols. (Paperback)
    Ram Vilas Sharma
    600

    Item Code: #KGP-7112

    Availability: In stock


  • Bhartiya Loktantra Aur Hamare Raastrapati
    Janak Raj Jai
    495 347

    Item Code: #KGP-141

    Availability: In stock

    भारतीय लोकतंत्र और हमारे राष्ट्रपति
    भारत के गणतंत्र-राष्ट्र बनने पर 26 जनवरी, 1950 को डॉ० राजेन्द्रप्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, जो लगभग बारह वर्ष तक इस पद पर रहे…और अब 25 जुलाई, 2007 को श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की।
    हमारे सभी राष्ट्रपति प्रबुद्ध, देशभक्त तथा विद्वान थे, जो विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण पदों पर रहे । सभी ने अत्यंत प्रतिबद्धता, गौरव तथा निष्ठा से अपना कार्यकाल पूरा  किया। जनहित के कुछ मुद्दों पर कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के बीच मतभेद भी हुए । कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति ने अपने पद की गरिमा निभाते हुए अपने निर्णय स्पष्ट रूप से जाहिर किए । महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने तो साफ कह दिया है कि वे सभी कार्य व निर्णय संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत करेंगी ।
    भारत का सविधान आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रपति को भारतीय नागरिकों के उत्थान एवं संविधान की रक्षा हेतु पूर्ण अधिकार देता है ।
    इस पुस्तक में हिंदू कोड बिल, पोस्टल बिल, अध्यादेश, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स प्रकरण, शाहबानू प्रकरण, संसद और विधानसभाओं को भंग करना, हंग संसद, संविधान के अंतर्गत बाहर रहकर समर्थन देना और प्रधानमंत्री की नियुक्ति जैसे प्रमुख मुदूदों पर भी चर्चा की गई है ।
    राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच अनकहे घात-प्रतिघातों की रोचक घटनाओँ का विवरण भी इस पुस्तक में पढ़ने को मिलेगा ।
    यह पुस्तक वास्तव में सुधी नागरिको और पाठकों के लिए जीवंत दस्तावेज सिद्ध होगी । देश के प्रति प्रेम रखने वालों तथा स्वातंत्र्य-प्रेमी पाठकों को यह पुस्तक अवश्य रुचिकर लगेगी ।
  • Roma Putri Ke Naam
    Shyam Singh Shashi
    300 255

    Item Code: #KGP-9355

    Availability: In stock

    श्याम सिंह शशि ने अनेक विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है। वहां की जीवन स्थिति, प्रकृति, संस्कृति और मनःस्थिति का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व भारत छोड़कर गए रोमा समुदाय पर विशेष लेखन किया है। तीन करोड़ यायावर भारतवंशी रोमा समुदायों की जीवन पद्धति का उनको विशेषज्ञ माना जाता है। रोमा पुत्री के नाम उनकी विशेषज्ञता का एक और रचनात्मक चरण है।
    आत्माख्यान-यायावरी उपन्यास ‘रोमा पुत्री के नाम’ 
    श्याम सिंह शशि की रचनाशीलता का नया आयाम है। लेखक के शब्दों में, "...यह यायावरी उपन्यास कलेवर में भले ही बहुत बड़ा न लगे किंतु इसमें एक अनूठी दुनिया है जो यथार्थ की अद्भुत यात्रा है। कला और साहित्य का सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में यायावरी प्रस्तुतीकरण है। मेरे नए-पुराने यात्रा-विवरणों की अनकही कथा है।य् लेखक ने परम घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भी इस संदर्भ में स्मरण किया है। इस उपन्यास को मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत भारतवंशी रोमा समाज का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
    यह उपन्यास रोमा पुत्री कैथी की मार्मिक और रोचक दास्तान है। यूक्रेन के कीव नगर में जन्मी, वारसा शहर में पली-बढ़ी, जर्मनी के बर्लिन महानगर में युवती हुई कैथी की दास्तान जो यायावर है और चित्रकार है। कैथी का जीवन उकेरते हुए लेखक ने विश्व के बीच रोमा समुदाय के आत्मसंघर्ष को अंकित किया है। इस समुदाय के मन में अपने प्रति हुए निरंतर अन्याय के लिए अत्यंत आक्रोश है। विशेषकर हिटलर के रक्तशुद्धता वाले कांड के लिए। रोमा भारत को ‘बारोथान’ कहते हैं—‘बड़ा स्थान’। यहां आते रहना उनको भाता है। फिर भी, उनका जीवन एक रहस्य है। कैथी के संदर्भ में लेखक कहता है, फ्रोमा पुत्री कितने मूड्स हैं तुम्हारी कला में, तुम्हारे जीवन में!"
    हिंदी में अपनी तरह का यह अन्यतम उपन्यास है। एक जीवित यायावर समुदाय के जीवन-समुद्र का अवगाहन करती एक अत्यंत पठनीय रचना।
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand
    Shanta Kumar
    300 240

    Item Code: #KGP-1865

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापक विवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Godhooli
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-669

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Hamare Aadarsh Mahapurush
    Nirankar Dev Sewak
    40

    Item Code: #KGP-948

    Availability: In stock


  • Kannu
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-294

    Availability: In stock

    अजीत कौर का लेखन, जीवन की ऊहापोह को समझने और उसके यथार्थ को उकेरने की एक ईमानदार कोशिश है। उनकी रचनाओं में न केवल नारी का संघर्ष और उसके प्रति समाज का असंगत दृष्टिकोण रेखांकित होता है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विकृतियों और सत्ता के गलियारों में व्याप्त बेहया भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ज़ोरदार मुहिम भी नज़र आती है।
    अजीत कौर ने विभाजन की त्रासदी को झेला है। लोगों को घर से बेघर होकर, आँधी में उड़ते सूखे पत्तों की तरह भटकते देखा है, जिनमें वह खुद भी शामिल थीं। 1984 में बेगुनाह सिखों का क़त्लेआम होते देखा है। गुजरात में निरंकुश हिंसा का तांडव देखा है। अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, रवांडा, यूगोस्लाविया, फ़िलिस्तीन में लोगों की तबाही का दर्द महसूस  किया है। साठ लाख यहूदियों के क़त्ल की दास्तानें सुनते उनका बचपन गुज़रा है। फ़िलिस्तीनियों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेघर होकर रहने, उनकी तबाही और बौखलाए गुस्से से उनकी आत्मा में ख़रोंचें आई हैं। उन्हें तीखा अहसास है व्यापक भूख का-भारत में, एशिया में, सूडान में, अफ्रीका में।
    उनकी कहानियों में न केवल बेक़सूर, निहत्थे लोगों के क़त्ल का दर्द है, बल्कि पेड़ों के कटने का, पंछियों के मरने का, चींटियों के बेघर होने का, नदियों के सूखने का और जंगलों की आखि़री पुकार का भी शिद्दत से अहसास है। 
    अजीत कौर के लेखन में यह संघर्ष और ये समस्याएँ पूरी संवेदन- शीलता, सजगता और आक्रोश के साथ प्रतिबिंबित हैं। इन सरोकारों के लिए वे सुप्रीम कोर्ट तक लड़ती भी हैं, ख़ासकर पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए।
    इन सरोकारों के लिए ही उन्होंने अपनी समूची पैतृक संपत्ति बेचकर और बेटी अर्पणा की पेंटिंग्ज़ बेच-बेचकर एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक संस्था एकेडेमी ऑफ  फ़ाइन आर्ट्स एंड लिट्रेचर की स्थापना की, जो संस्कृति और कला का एक बहुआयामी केंद्र है।
    एकेडेमी का एक विशेष कार्यक्रम है समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर तथा पिछड़े वर्ग की बालिकाओं को शिक्षा देना और व्यावसायिक प्रशिक्षण द्वारा उनका आर्थिक सशक्तीकरण करना।
    अजीत कौर का लक्ष्य है सार्क देशों के सही सोच वाले लोगों को एकजुट करना। इसी इरादे से उन्होंने 1987 में फ़ाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिट्रेचर की स्थापना की और सार्क देशों के साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को एक मंच पर इकट्ठा किया है। उद्देश्य: आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर, सार्क देशों में भाईचारे और सहयोग की भावना का विकास करना।
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh
    Mahip Singh
    160 144

    Item Code: #KGP-2065

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kartavya (Paperback)
    Samual Smiles
    125

    Item Code: #KGP-7034

    Availability: In stock

    कर्तव्य
    चौबीस वर्ष पूर्व मैंने ‘आत्मनिर्भरता’ (Self Help)  पुस्तक लिखी थी। तीन वर्ष उपरांत सन् 1853 में वह प्रकाशित हुई। वह पुस्तक संयोग से ही लिखी गई थी। मैंने ‘लीडस’ स्थान पर नवयुवकों के सम्मुख कुछ भाषण दिए थे। उन भाषणों में मैंने इस बात पर जोर दिया था कि उनके जीवन की प्रसन्नता व सफलता मुख्यतः उनके निरंतर आत्मसंस्कार, अनुशासन, संयम और सबसे अधिक ईमानदारी व साहस सेकर्तव्यपालन करने पर निर्भर करती है। मेरे इन भाषणों का आशा से अधिक प्रभाव हुआ।
    अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने के बाद सायंकाल का समय मैं अपनी पुस्तक के लेखन में लगाता था। पुस्तक जब पूरी हो गई, तो मैंने उसे लंदन के एक प्रकाशक के पास भेजा। क्रीमिया के युद्ध के कारण उन दिनों पुस्तकें प्रायः बहुत कम बिकती थीं। इसलिए प्रकाशक ने धन्यवाद सहित मेरी पुस्तक लौटा दी। ‘जार्ज स्टीफेंसन का जीवन-चरित्र’ छपने के बाद ही श्री मूरे की कृपा से ‘आत्मनिर्भरता’ प्रकाशित हो सकी। 
    इसके तेरह वर्ष पश्चात् मेरी पुस्तक ‘चरित्र’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में मैंने महापुरुषों के चरित्रों को चित्रित करने का प्रयत्न किया, क्योंकि नवयुवकों को संस्कार देने का यह सर्वोत्तम ढंग है। इसके पाँच वर्ष बाद मेरी पुस्तक ‘बचत’ (Thrift) प्रकाशित हुई। इसमें मैंने श्रम के महत्त्व और बचत के लाभों पर जोर दिया था। 
    इनके पाँच वर्ष उपरांत इसी क्रम की अंतिम पुस्तक ‘कर्तव्य’ प्रकाशित हो रही है। मुझे आशा है कि पिछली पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी। इस पुस्तक में मैंने सर्वोत्तम और साहसी स्त्री-पुरुषों के उदाहरण दिए हैं। महापुरुषों के जीवन हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह कार्य कर सकते हैं। जो व्यक्ति कर्तव्य की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह महान् बन जाता है।   
    —सैमुअल स्माइल्स
  • Bharat Ke Vishva Prasidha Smarak
    A.W.I.C.
    90 81

    Item Code: #Kgp-bkvps

    Availability: In stock


  • Mahaan Guru Gobind Singh
    Satayendra Pal Singh
    300 270

    Item Code: #KGP-9219

    Availability: In stock

    हिंदू धर्म की रक्षा के लिए पिता गुरु तेग बहादुर जी के दिल्ली में बलिदान के बाद मात्र नौ वर्ष की आयु में गुरुगद्दी पर आसीन होने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी का एक ही संकल्प था 'सुभ करमन ते कबहू न टरों'। इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने अनंत शक्ति 'सवा लाख सों एक लड़ाऊं" का आहवान किया और विकारों से मुक्त सशक्त अंतर और अन्याय से रहित धर्मानुकूल समाज बनाने के लिए खालसा की साजना की। विचार और आचार की शुद्धता को स्थापित करने में अपना पूरा जीवन लगा देने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी की गुरु शबद की देग और गुरु कृपा की तेग दोनों साथ-साथ चलीं और एक अभूतपूर्व इतिहास बना। यह कैसे संभव हुआ इसे समझने और अहसास करने में यह पुस्तक सहायक है। गुरु गोबिंद सिंह जी के बरे में समग्र दृष्टि प्रदान करने वाली, राष्ट्र भाषा हिंदी में लिखी गई यह पहली पुस्तक है जो भावनाओं से जोड़ने वाली है ।
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (2nd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1582

    Availability: In stock


  • Akasmaat Kuchh Kavitayen (Paperback)
    Surendra Pant
    160

    Item Code: #KGP-7216

    Availability: In stock

    हिंदी कवियों ने अपने काव्य-मुहावरों को यदि रसिकतापूर्ण काव्यरूपों से श्रृंगारित किया है तो कुछ कवियों ने कविताओं को चीखने की स्वतंत्रता भी दी है। मगर इस संगह की कविताओं में पाठक पाएंगे कि कवि का सरोकार बृहत्तर मानवता की उपस्थिति करने में कई बार वह संप्रेषणीयता की रूप-सज्जा की भी परवाह नहीं करता। व्यापक जनहितों की आकांक्षाओं के बीच से अंकुरित इन कविताओं को सच्चे ईश्वर, खरे अध्यात्म तथा खनकदार वर्तमान की चाहत है, जो भोले-भाले लोक को उसकी निष्कपटता लौटा सके। ‘मदर टेरेसा’ पर केंद्रित कविता को पढ़कर हमें कवि की मानवगत अवधारणाओं का समूचा अहसास होता है।
    पुलिस विभाग के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ‘संवेदनशील’ पद का निर्वहन करते हुए यह कवि समाज और राजनीति की ‘रणनीति’ में लाखों-लाख हंसते-रोते हैवानों-इंसानों के परम-चरम अनुभवों का साक्षी रहा है, इसीलिए ये कविताएं हमारे समय और समाज की धाराओं-उपधाराओं के रूप में कवि के सामने ‘पेशी’ पाकर शब्दांकित होती हैं। संभवतः इस अनुभवबहुलता ने कवि को किसी इकहरे विषय का मर्मज्ञ न रहने देकर, सर्वत्र का प्रवक्ता कवि भी बना दिया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस विविधता के बावजूद कवि का ध्यान अपने देश, संस्कृति और जन पर लगभग प्रत्येक कविता मंे कंेद्रीकृत हुआ है।
    कहना न होगा कि इन कविताओं के नए तेवर का आगमन भले ही अकस्मात् रूप में हुआ है, मगर निश्चित ही इनका सृजन गहरी विचारशीलता के बाद ही संभव हुआ होगा।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu (Paperback)
    Ramesh Bedi
    200

    Item Code: #KGP-178

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid
    M.A. Sameer
    395 356

    Item Code: #KGP-9330

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Himalaya Gaatha-4 (Samaj-Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    400 360

    Item Code: #KGP-795

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-4 (समाज-संस्कृति)
    स्वर्ग की कल्पना एक ऊँचे स्थान पर की गई है । पृथ्वी के स्वर्ग पर्वतों पर स्थित थे । हमारे पुराणों से भूगोल वर्णन के समय जिन स्थानों पर स्वर्ग बताए गए हैं, वे सभी पर्वतों पर थे । शंकर का प्रिय कैलास, कुबेर की अलकापुरी, इंद्र की इन्द्रपुरी, सब ऊँचे स्थानों पर अवस्थित थे । गंधमादन पर्वत, कैलास पर्वत तथा मेरु पर्वत के चारों और शीतांत आदि केसर पर्वतों का वर्णन मिलता है, जहाँ धार्मिक पुरुष वास करते थे । ये संपूर्ण स्थान पृथ्वी के स्वर्ग कहलाते थे । इन पर विजय पाने के लिए सभी देव, दानव और मानव प्रयत्न करते रहते ।
    पर्वतवासियों से मैदानी सभ्यता का संघर्ष होता रहा । आर्यों ने पर्वतों पर विजय पाने के लिए अनेक प्रयास किए । उन्हें परास्त किया और बार-बार पर्वतों की ओर धकेला । इस सबके बाबजूद भी पार्वती संस्कृति अपने मूल रूप में बनी रही और अनेक बाहरी प्रभावों के बाद आज भी अपने आदि रूप से संरक्षित मिलती है ।
    हिमाचल प्रदेश के अनेक भूखड़ों से आज भी वे परंपराएँ विद्यमान हैं, जो एकदम आदि परंपराएँ कही जा सकती है । प्रकृति पूजा में आकाश, भूमि, जल, पाषाण, वनस्पति पूजा  आज भी की जाती है । कुछ परंपराएँ गोपनीय ढंग से निभाई जाती हैं, जो अधिक महत्वपूर्ण है ।
    आज समाज, पर्वतीय समाज की प्रमुख विशेषता रही है । आज भी जनजातीय समाज जाति और वर्गविहीन है ।
    आज संस्कृति पर लेखन कम होता जा रहा है । संस्कृति पर लेखनी बताने वाली में वशिष्ठ एक बिरले साहित्यकार है, जिन्होंने गहरे में जाकर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से समाज का एक चित्र प्रस्तुत किया है । परंपरा की एक अमूल्य थाती शनै:- शनै: समाप्त हो रही है । इसे पिछडी सभ्यता का द्योतक माना जा रहा है। ऐसे में यह कार्य और भी मह्रत्वपूर्ण हो जाता है।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत चौथे खंड मेँ समाज और संस्कृति की सूक्ष्म मान्यताओं, लोकविश्वासों, रीति-रिवाजों और संस्कारगत परंपराओं पर ऐसी दुर्लभ सामग्री दी जा रही है, जो अब मिटने के कगार पर है ।
  • Trishpathga
    Irawati
    400 360

    Item Code: #KGP-2020

    Availability: In stock

    त्रिशपथगा
    साहित्य इतिहास को वाणी देता है, इसलिए इतिहास से साहित्य का संबंध बहुत पुराना है। अपने अतीत के ज्ञान की ललक प्रायः हर व्यक्ति में होती है और उनकी इस जिज्ञासा की तृप्ति इतिहास करता है; परंतु ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं जो विभिन्न कारणों से इतिहास का अध्ययन पूरी रुचि से नहीं कर पाते। ऐसे लोग ऐतिहासिक तथ्यों के ज्ञान के साथ-साथ उन तथ्यों को जीवंत बनाने वाले अभिव्यक्ति-सौंदर्य के आनंद की भी इच्छा रखते हैं। अतः वे साहित्य, विशेषकर उपन्यास की ओर देखते हैं। इसी से ऐसे साहित्य की मांग सदैव बनी रहती है जो पाठकों को अतीत से परिचित कराने के साथ-साथ उनकी साहित्य-तृषा को भी तृप्त करे। 
    डॉ. इरावती के इस उपन्यास ‘त्रिशपथगा’ में इतिहास और साहित्य का मणिकांचन संयोग है। उपन्यास की पृष्ठभूमि भारतीय इतिहास का सैंधव सभ्यता काल है जो भारतीय इतिहास और संस्कृति की उन कड़ियों को अपने में समेटे हुए है जो अब हमारे मनोमस्तिष्क से विस्मृत हो चुकी हैं। उपन्यास में अतीत को पुनर्जीवित करना सरल नहीं है किंतु यह उपन्यास भारत की प्राचीनतम संस्कृति के एक प्रतीक ‘लोथल’ को केंद्र बनाकर उस युग की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, दैनिक जीवन, रीति-रिवाज और परंपराओं को जीवंत कर एक ओर हमें उसी युग में ऐसे पहुंचा देता है कि हम पात्रों के सुख-दुःख का सीधा अनुभव करने लगते हैं तो दूसरी ओर एक अत्यंत उदात्त प्रेम और त्याग की कथा सुनकर भावविह्नल हो उठते हैं। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों का अभाव नहीं है परंतु ऐसे उपन्यासकार कम रहे हैं जो इतिहास का भी यथोचित ज्ञान रखते हों और साहित्य की सरसता का भी निर्वाह कर सकें। डॉ. इरावती एक ऐसी ही उपन्यासकार हैं। अतः ‘त्रिशपथगा’ में तीन शपथों के मार्ग का अनुसरण करती नायिका वन्हि की कथा सुनाने में साहित्य की ‘मसि’ में डूब-डूबकर इरावती की इतिहास की लेखनी ने एक अत्यंत रुचिकर उपन्यास की रचना कर दी है। इस उपन्यास में सुधी पाठकों के लिए ऐसा बहुत कुछ है कि एक बार हाथ में लेकर पूरा पढ़े बिना वे इसे रख नहीं पाएंगे।
  • Kintu Parantu
    Sudrashan Kumar Chetan
    125 113

    Item Code: #KGP-1987

    Availability: In stock

    किन्तु-परन्तु
    कहाँ से चले, कहाँ ठिकाना है
    न देखा आदि न अंत जाना है
    हम न जान सके दुनिया को तो क्या 
    दुनिया ने कहाँ हमको पहचाना है

    प्रेम के नयनों ने मुझे आप निहारा
    अभिसार के अधरों ने कई बार पुकारा
    कब बांध के रखा किसी नाव को तट ने
    हर नाव को लहरों ने दिया आप सहारा
    ० 
    दूर हैं हमसे तो क्या हुआ अपने तो हैं 
    न हों ज़मीनी, हवाई सही, सपने तो हैं
    भले ही कहानी उनकी बेवफाई की हो
    बदनामी के वरक हमीं को ढकने तो हैं

    खुद साठ बरस के, दुल्हन बीस बरस की
    यहाँ ये तरसते, वहां वो तरसती
    जी तो चाहता है घटा झूम के बरसे
    मगर हाल यह है, इक बूँद न बरसती
    ० 
    सुचिता और व्यवस्था जोडे हाथ खड़ी 
    जैसे दोनों शासन की हो बाँदियाँ 
    मिल न सकी समता, वंचित जाग रहे
    बहुत दिनो से नाच रही हैं आँधियाँ 
    ० 
    शेष नहीं कुछ कहने को
    शेष नहीं कुछ सहने को
    मिट रहीं सब तीव्र गति से
    कहने - सहने की सीमाएं
  • Bharat Ke Mahan Neta
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkkmn

    Availability: In stock


  • Dr. Sarvapalli Radhakrishanan
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-dsrk

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    150 135

    Item Code: #KGP-75

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastava
    Jitendra Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7818

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
    --कपिलदेव
  • Kitaab Ke Bahaane
    Nasera Sharma
    700 490

    Item Code: #KGP-KKB HB

    Availability: In stock

    आलोचना भी सृजनात्मक हो सकती है? यह विश्वास इस पुस्तक के वे सारे लेख देते हैं, जो हिंदी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी व अंग्रेज़ी पुस्तकों पर लिखे गए हैं। जिनके द्वारा ज़िंदगी के कुछ अहम मुद्दे और संवेदना का संसार हमारे सामने उजागर होता है। ‘अलिफ़ लैला’ और ‘हज़ार व यक दास्तान’ की क़िस्सागोई की तरह किताब के बहाने भी किसी एक बिंदु से अपनी बात उठा तर्क व तथ्य के सहारे एक लेखक को कई लेखकों, इलाक़ों, विचारधाराओं और यथार्थ की अनगिनत पगडंडियों से जोड़ती अपनी परिक्रमा पूरी कर पाठकों को सोच के उस धरातल पर ले जाकर खड़ा करती है, जो उनको मौलिकता प्रदान करती एक नई दृष्टि देती है। किसी एक किताब का फ़लक कितना विस्तृत हो सकता है, इसके उदाहरण ये लेख हैं, जो देशी और विदेशी लेखकों द्वारा सभ्यता, समाज, साहित्य, नारी-आत्मकथा जैसे विषयों पर लिखे गए हैं। ये लेख सात सौ वर्ष पहले लिखी पुस्तक से लेकर बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों तक लिखी कृतियों से हमारा परिचय कराते हैं। लेखिका का अपना विश्वास हैµ‘‘किताबों के अलावा मेरा कोई ख़ुदा नहीं है।’’
  • Badalate Ahsaas
    Birsen Jain Saral
    225 180

    Item Code: #KGP-9384

    Availability: In stock

    बदलते अहसास

    जीवन की कहानियों की भूमि प्रायः परिवार होता है। इस अर्थ में बीरसेन जैन पारिवारिक परिवेश की कहानियों के कहानीकार हैं। परिवार के भीतर के जीवंत दृश्य, स्थितियाँ, तनाव, अलगाव और अकेले रह जाने की पीड़ा से भरे पात्रों को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वह प्रकारांतर से अपनी कहानियों के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि दूसरों के जीवन से प्रेरणा लेकर हम चाहें तो अपना जीवन सफल, संतोषमय व सुखी बना सकते हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक बदलते अहसास की सातों कहानियाँ अपने आसपास के परिवेश से निकली हैं। यहाँ हम परिवार और समाज के परिवर्तित होते स्वरूप के बीच कथा-चरित्रों पर पड़ते प्रभाव को अनुभव कर सकते हैं। सच पूछें, तो ये कहानियाँ एक नया जीवन बनाने की प्रेरणा देती हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप अनुभव करेंगे कि इनकी आवाज कहीं आपके भीतर भी दबी पड़ी है। कारण यह है कि यहाँ मनुष्य के अनेक रूपों के मध्य दरकते संबंध ही नहीं, पश्चात्ताप के आँसू भी नजर आएँगे। कहानीकार की यह विशेषता है कि वह उन स्थितियों को भी उजागर करता है जो समाज का स्याह चेहरा सामने रखती हैं।
  • Bhagwan Mahaveer
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-127

    Availability: In stock

    भगवान महावीर विश्व के उन महापुरुषों में थे, जो मानव-श्रेणी से ऊपर उठकर देव-कोटि में पहुंच जाते हैं । भगवान महावीर के उपदेशों, सिद्धांतों और शिक्षाओं को लोगों ने हृदय से स्वीकार किया । वे अहिंसा के साक्षात् अवतार थे । उनका हृदय करुणा से आपूरित था । वे मानव मात्र के कल्याण के लिए विश्व-बंधुत्व के भाव को जन-जन  तक पहुंचना चाहते थे ।
    आज़ विश्व से चारों ओर हिंसा का तांडव फैला है । सर्वत्र मार-काट मची है । एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करने की घात लगाए रहता है। ऐसी दशा में भगवान महावीर की शिक्षाएँ बहुत ही उपयोगी हैं। उनका बताया हुआ शांति का मार्ग सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है । वे जन-जन में अहिंसा, सत्य, करुणा और प्रेम की उदात्त भावनाएँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं । 
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान महावीर के जीवन-परिचय के साथ-साथ उनके सिद्धांतो, उपदेशों और शिक्षाओं का भी उल्लेख किया गया है । समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उनकी शिक्षाओं पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
    विश्वास है कि पाठक-समूह भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों से प्रेरणा लेकर पूरे समाज का जीवन सुखी बना सकेगा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam (Paperback)
    Amrita Pritam
    80

    Item Code: #KGP-1518

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृता प्रीतम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृता प्रीतम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बृहस्पतिवार का व्रत', 'उधड़ी हुई कहानियाँ', 'शाह की कंजरी', 'जंगली बूटी', 'गौ का मालिक', 'यह कहानी नहीं', 'नीचे के कपड़े', 'पाँच बरस लम्बी सड़क', 'और नदी बहती रही' तथा 'फैज की कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Unke Hastakshar
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2029

    Availability: In stock

    उनके हस्ताक्षर
    ० एक लम्बा रास्ता गुजर गया, जब एक उपन्यास लिखा था, डॉक्टर देव । अब चालीस साल के बाद जब मैंने उसे फिर से देखा, लगा-उसका  हिन्दी अनुवाद अच्छा नहीं हुआ है । मन में आया, अगर उसका अनुवाद मैं अब स्वयं करूँ, तो उसकी रगों में कुछ धड़कने लगेगा और यही जब करने लगी, तो बहुत कुछ बदल गया ।
    ० इसी तरह एक मुद्दत हो गई, एक उपन्यास लिखा था…'घोंसला' । प्रकाशित हुआ तो बाद में किफायती संस्करण 'नीना' नाम से चलता रहा । आज उसे देखकर लगा कि वह उस कदर पुख्ता नहीं हो पाया था, जो होना चाहिए था । और उसी को अब फिर से लिखा है, जिससे वह सघन भी हो पाया है और पुख्ता भी ।
    ० इसी तरह कभी एक कहानी लिखी थी ‘पाँच बहनें-और उस कहानी को लेकर जब किसी ने फिल्म बनाने की बात की, तो मैंने कहानी को फिर से देखा । अहसास हुआ कि इस जमीन पर जो कहा जा सकता था, वह कहानी में नहीं उतर पाया था। यह अहसास कुछ इस तरह मेरा पीछा करने लगा कि एक दिन मुझे पकड़कर बैठ गया । कुछ और मसले भी थे, जो कहानी में नहीं आ पाए थे । और उन सबको लेकर पाँच की जगह सात श्रेणियों के किरदार सामने रखे और उन सबको कागज़ पर उतार दिया । अब उसे नाम दिया है-उनके हस्ताक्षर' ।
    -अमृता प्रीतम
  • Bhartiya Vangmay Per Divyadrishti
    Kashiram Sharma
    400 360

    Item Code: #KGP-9137

    Availability: In stock

    भारतीय वाड्मय का एक बहुत बड़ा भाग चार महास्तंभों पर आरित है। वे हैं: रामायण, पुराण और बड्ढकहा (बुहत्कथा)। सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकारों ने आदिकाव्य रामायण, जयकाव्य महाभारत और पुराणों को अपना उपजीव्य बनाया है। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पर्याप्त वाड्मय ‘बड्ढ कहा’ पर भी आश्रित है। अतः इन चार महास्तंभों का सम्यक् परिचय प्राप्त किए बिना भारतीय वाड्मय का सुचारु अध्ययन संभव नहीं है। इस बात को तो लोग प्रायः स्वीकृत कर लेते हैं कि भारतीय वाड्मय भवन का बहुत बड़ा भाग इन चार स्तंभों पर टिका है पर ये महास्तंभ किस ‘घातु’ के बने हैं, यह जानारी बहुत ही कम लोगों को है। इस पुस्तका में उस धातु का परिचय कराने का विनम्र प्रयास है। वह धातु क्या है और उसका उद्गम स्थान कहा हैं, यह भी बताने का प्रयास किया गया है।
  • Pratidaan
    Virendra Jain
    60 54

    Item Code: #KGP-2093

    Availability: In stock

    प्रतिदान

    सुरेखा-पर्व की विद्या का विवाह माँ ने तय किया था । अच्छा घर-वर खोज़कर ।

    प्रतिदान को प्रभा को ससुराल के तमाम संबंधियों ने देख-परखकर पसंद किया था ।

    उसके हिस्से का विश्वास की कविता ने कबीर को स्वयं चुना था ।

    तीनों के पति अलग-अलग स्थान, परिवेश, पेशे से जूड़े थे । अलग-अलग प्रवृति के थे । फिर भी तीनों स्त्रियों  का दुख एक-सा क्योंकर हुआ?

    साथ न सहकर भी साथ सहे गए दुख का बयान करती वीरेन्द्र की तीन उपन्यासिकाएँ ।

    स्त्रियाँ ही स्त्रियों की कथा-व्यथा को संजीदगी से बयान कर सकती हैं, इस अवधारणा को झुठलाती तीन व्यथा-कथाएँ ।

    थोड़े में बहुत कह देने में समर्थ युवा कथाकार के आकार में लघु और कथ्य में बृहद् तीन लघु उपन्यास-सुरेखा-पर्व, प्रतिदान, उसके हिस्से का विश्वास ।
  • Bhartiya Sabhyata Ki Nirmiti
    Bhagwan Singh
    540 432

    Item Code: #KGP-401

    Availability: In stock

    भारतीय सभ्यता की निर्मिति भगवान सिंह की रचनाओं में ही भारतीय इतिहासलेखन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान इस विशेष अर्थ में है कि इससे पहले इतिहासकारों की दृष्टि हड़प्पा के नगरों या ऋग्वेद तक जाकर रुक जाती थी, इससे आगे कुछ दीखता नहीं था और बहुत से प्रश्नों का हमें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। 
    प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार उन्होंने हड़प्पा काल से भी आठ-दस हजार पीछे के सांस्कृतिक विकासों और सभ्यता के उन नियामक तत्त्वों की खोज की, जिनका उपयोग विविध सभ्यताओं ने अपने निर्माण में गारे और पलस्तर के रूप में किया। विषय गंभीर होते हुए भी उन्होंने इसे इतना सरल और बहुजनग्राह्य रूप में प्रस्तुत किया है कि अखबार पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़ते हुए किसी तरह के भारीपन या उलझाव का अनुभव नहीं करता। इस पुस्तक में उनकी विवेचनशैली भी उनकी अन्य कृतियों से भिन्न है। नृतत्त्व, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और साहित्य की सामग्री का इतनी कल्पनाशीलता से उपयोग किसी अन्य कृति में देखने में नहीं मिलता।
  • Raai Or Parvat
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-63

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi
    Rajesh Joshi
    190 171

    Item Code: #KGP-384

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Pata Nahin Kal
    Pravesh Chaturvedi
    80 72

    Item Code: #KGP-1850

    Availability: In stock

    पता नहीं कल क्या गाऊँगा
    जैसे-जैसे हम सभ्य होते गए, नए-नए शब्दों से हमारी भाषा का विकास होता गया । हम समझदार होते गए-डॉक्टर-इंजीनियर-एडमिनिस्ट्रेटर, नेता-अभिनेता और पता नहीं क्या-क्या । 
    पहले जो दिल कहलाता था वह हार्ट कहलाने लगा हार्ट एनलार्जमेंट यानी बड़ा दिल । सो बड़े दिल वाला, जिसका हार्ट एनलार्ज हो गया हो।
    उसी भाषा में लाल रंग यानी इमरजेंसी !
    हम दिल की भाषा से दिमाग की भाषा बोलने लगे, लेकिन हमारा दिल तो दिमाग की जगह फिट हो गया है। इसीलिए हम दिल की बात सुनते हैं और दिल की बात कहते हैं ।
    अब नाम तो 'प्रवेश' है सो जहाँ भी अंतरंग प्रदेशों में जाना होगा वहीं मैं तुम्हारे सफल प्रयास का पहला द्वार होऊँगा-
    बिना मुझसे मिले तुम भीतर नहीं जा सकोगे!
    एक प्रयास असफल तो दूसरा 'प्रवेश द्वार' !
    यानी आशा के दीप से उजियारा !
    यह तो मुझे भी पता नहीं के कल क्या गाऊँगा
    लेकिन अपना अंतरंग सखा मैं
    भरी भीड़ में अकेला मिल जाऊँगा
    तब हम दोनों साथ-साथ कहेगे-सुनेंगे-
    कहाँ-कहाँ की लनतरानियाँ
    झुठी-सच्ची कुछ कहानियाँ। 

    -प्रवेश चतुर्वेदी
  • Aagaaz
    Devendri Mandrawal
    160 144

    Item Code: #KGP-125

    Availability: In stock


  • Alikhit Adikhat
    Ganga Prasad Vimal
    125 113

    Item Code: #KGP-1860

    Availability: In stock

    अलिखित-अदिखत
    कविताएँ शब्दों से बनती हैं, किन्तु शब्दों से परे वे एक दूसरी दुनिया ही का अहसास कराती है । एक अर्थ में महत्तम कविताएं अर्थ से परे बिंबन की एक अलग पद्धति विकसित करती हैं । इस मायने में वे न सिर्फ शब्दों को विचलित करती है, बल्कि गढ़े गए ढाँचों को तोड़ती हैं और भाषागत प्रतीतियों से घोर असहमति द्योतित करती है । मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सृजन की तमाम विधाओं में कलाओं की तरह कविताएँ एक नया ही वस्तुरूप प्रस्तुत करती है । ऐसा नहीं कि सभी कविताएँ यह काम करती हों-हमारे समाजों में परंपरागत शिल्प की, खुद को दोहराने वाली कविताओं का ज़मावड़ा ज्यादा होता है-पर कभी-कभी परंपरागत शिल्प से भी सृजन के आगामीपन की दस्तक मिलती है। निष्कर्ष यह कि कविता चाहे जिस शिल्प में रची जा रही है, अगर वह प्रचलित रूपों को तोड़ती चलती है तो उसमें वह भावी आहट, धीमे ही सही, सुनाई देती है, जो भाषा और व्याकरण के लिए जाती बनकर सामने जाती है ।
    अलिखित-अदिखत की कविताएं पाठकों काव्य-रसिकों में कुछ ऐसी ही अपेक्षाएं जाग्रत करने की अनुगूँज ध्वनित करती है, जिन्हें सृजन की जोखिम-भरी टकराहट के बीच महसूस किया जा सकता है...
  • Baapu Qaid Mein
    Rajendra Tyagi
    120 108

    Item Code: #KGP-1824

    Availability: In stock

    बापू कैद में
    आवाज : ठीक, बहुत ठीक । वैसे भी तुम लोग अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, क्योंकि अब मैं आजाद हूँ देहमुक्त हूँ। (विराम) तुन्हीं ने तो अपनी गोली से मुझे आजाद किया था । हाँ-हाँ, मुझे आजाद किया था और बापू को कैद !
    (कुछ देर रुकने के बाद) हाँ, मैं ठीक कह रहा हूँ बापू तुम्हारी ही कैद में है । तुन्हीं ने उन्हें कैद कर रखा है और तुम्ही बापू की समाधि पर… ! (बल देते हुए) हाँ-हाँ-हाँ! आत्मविहीन समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित का रहे हो । है ना मजाक ! "तुम नेता ही नहीं, अव्वल दर्जे के अभिनेता भी हो । जाओ, पहले बापू को आजाद करो और फिर आना उन्हें  श्रद्धांजलि अर्पित करने ।
    (क्षण-भर रुकने के बाद, अटटहास का स्थान सिसकियाँ ले लेती हैं और रुंधे गले से वही आवाज पुन: आती है) 'नहीं-नहीँ, तुम बापू को अभी आजाद नहीं करोगे, क्योकि तुममें इतना साहस ही नहीं है। तुम डरपोक हो। तुम जानते हो, बापू यदि आजाद हो गए तो देश में क्रांति आ जाएगी और तुम्हारी दुकानदारी बंद हो जाएगी ।
    (रुदन बंद और पुन: अटटहास) जाओ अपने-अपने घर लौट जाओ। नाटक बंद करो। सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा में है। बापू जब तक कैद हैं, तब तक तुम्हारा सिंहासन अटल है । क्यों गृहमंत्री जी, ठीक कहा ना मैंने ? मैं भी जा रहा के तुम भी लौट जाओं ।
    बापू आज भी प्रासंगिक है । आम जन के हदय से उनके प्रति श्रद्धा है, उनके आदर्शों व सिद्धांतों के प्रति आस्था; किंतु बापू की इस लोकप्रियता का नेता अनुचित लाभ उठा रहे हैं । उनके लिए बापू एक ब्रांड हैं । ऐसा ब्रांड, मार्केट में जिसकी साख हैं । क्योकि साख है, इसलिए उसे कैश करना वे अपना धर्म समझते है । निहित स्वार्थ व दूषित राजनीति के अनुरूप वे बापू के आदर्शों व सिद्धांतों को जैसा चाहे उसी रूप में परिभाषित कर रहे हैं । केवल आम जन को सम्मोहित करने के लिए वे बापू की दुहाई देते हैं, उनके आदर्श व सिद्धांतों की दुहाई देते है । उनके लिए बापू की बस यही उपयोगिता है। यथार्थ में बापू की हत्या किसी गोड़से ने नहीं की थी । इसी दूषित राजनीति ने की थी और अब स्वार्थ-पूर्ति के लिए इसी राजनीति ने बापू की आत्मा को कैद कर रखा है ।
  • Ve Devta Mar Gaye
    Mika Valtari
    250 225

    Item Code: #KGP-2102

    Availability: In stock

    वे देवता मर गये

    ०  विश्व साहित्य में अत्यन्त लोकप्रिय ऐतिहासिक उपन्यास ।

    ०  तीन हजार वर्ष पूर्व मिस्त्र के फ़राउन-साम्राज्य के अपार वैभव और विलास की धधकती हुई तस्वीर 

    ० महलों के षडयंत्रों और भीषण युद्धों की जीवन्त झाँकी ।

    ०  गरीबों और दासों पर अमानवीय जुल्मों और उनके आंसुओं से लिखी गई एक करुण कहानी ।

    ०  और नि:सन्देह ही एक समृद्ध, शक्तिशाली और शानदार ऐतिहासिक उपन्यास, इतिहास की प्रामाणिकता के साथ रोमांच और रोचकता से  भरपृऱ ।
  • Kashmir Aur Bharat Pak Sambandh
    Prakash Veer Shastri
    400 360

    Item Code: #KGP-143

    Availability: In stock

    देश-हित को ध्यान में रखते हुए अत्यंत आवश्यक विषयों की ओर दोनों सदनों का ध्यान आकर्षित करने की कला में श्री शास्त्री जी अति निपुण थे । उन्होंने जिन गंभीर विषयों की चर्चा सदन में की थी, आज लगभग 40  वर्षा बाद भी वे विषय, वे प्रश्न ज्यों के त्यों अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहे हैं । आज राजनीति में सत्य के कहने वाले और सुनने वालों का प्रायः अभाव हो रहा है, ऐसी दशा में लोकोपकारक सत्य को अभिव्यक्ति करने का साहस जुटा पाना किसी निर्भय, वीर पुरुष का ही काम है ।
    इस ग्रन्थ में प्रकाशित शास्त्री जी के इन विचारों से देश की जनता तथा नेताओं को एक नई दिशा मिल पाएगी, जिससे देश की गंभीर समस्याओं से निपटने में सही मार्गदर्शन हो सकेगा और पाठक महानुभाव श्री प्रकाशवीर शास्त्री की विद्वत्ता, देशभक्ति, स्पष्टवादिता, वाक्चातुर्य, वर्णन-शैली तथा विषयों की गंभीरता से सुपरिचित हो सकेंगे ।
  • Gulmohar Phir Khilega
    Kamleshwar
    300 270

    Item Code: #KGP-46

    Availability: In stock


  • Buniad Ali Ki Bedil Dilli
    Dronvir Kohli
    400 300

    Item Code: #KGP-263

    Availability: In stock

    बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
    यह अपूर्व संग्रह 'धर्मयुग' के लोकप्रिय स्तंभ बेदिल दिल्ली में प्रकाशित लेखों का है। डॉ० धर्मवीर भारती के विशेष आग्रह पर इसे लिखा करते थे उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली बुनियाद अली के छद्म नाम से। स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्राय: तीखी प्रतिक्रिया होती थी। साहित्यिक गोष्ठियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तभ-लेखक के बारे में तरह तरह के कयास लगाए जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा इतना कि 'धर्मयुग' में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाते थे कि इसे लिख कौन रहा है। भारती जी लेखक के साथ पत्र-व्यवहार भी स्वयं करते थे। जैसे, उनका 25.3.83 को यह पत्र : "Message for Shri Buniad Ali : दोनों किस्तें मिलीं"बहुत जोरदार और to the point हैं। इस बार दिल्ली में बहुत से लोगों (सामान्य पाठक तक) ने बेदिल दिल्ली की चर्चा की।Bravo! Keep it up."
    यही नहीं, इस स्तंभ के लेखों का संपादन-संशोधन भी भारती जी स्वयं करते थे। जैसे, 17 जनवरी, '83 के अपने पत्र में उनकी यह विस्मयकारी टिप्पणी :"पार्लियामेंट वाली किस्त मिल गई है। गृहमंत्री के रूप में ज्ञानी जी वाली घटना निकालनी पड़ेगी। उसके कुछ कारण हैं-गैर-राजनीतिक। कभी मिलने पर बताऊँगा"
    कहना न होगा कि ये सारे लेख ऐतिहासिक महत्व है। दिल्ली की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का ये आईना हैं। उन दिनों यहाँ की साहित्यिक गोष्ठियों में किस तरह एक-दूसरे की टाँग खींची जाती थीं, इसका प्रामाणिक विवरण इन लेखों में ही मिलेगा। आजादी से पहले गर्मियों में राजधानी शिमला जाती थी, तो कनॉट प्लेस के आगे केंद्रीय सचिवालय का सारा इलाका इतना सुनसान-बियाबान हो जाता था कि लोग दिन-दिहाडे उधर जाने से भय खाते थे; फिर शिमला- प्रवास के दौरान कर्मचारी कैसी-कैसी हरकतें करते थे, इसका शायद पहली बार इतना दिलचस्प वर्णन इस स्तंभ में किया गया है।
    डॉ० धर्मवीर भारती इस स्तंभ के बारे में इतने उत्साहित थे कि लेखक को उन्होंने अपने 4.4.81 के पत्र में यह कहकर प्रोत्साहित किया था : ""स्तंभ जोरदार जा रहा है। अपने ढंग का बिलकुल अलग।"
  • Toro Kara Toro-5 (Paperback)
    Narendra Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-505

    Availability: In stock


  • Doston Ke Jaane Par Kamleshwar Ki Yadein
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-403

    Availability: In stock


  • Sabeena Ke Chaalees Chor
    Nasera Sharma
    295 266

    Item Code: #KGP-31

    Availability: In stock

    सबीना के चालीस चोर
    'सबीना के चालीस चोर' इस संग्रह की बाकी कहानियों के कथा-सूत्रों का बुनियादी विचार है । सबीना एक छोटी लड़की है, जो बडों जैसी दृष्टि और समझ रखती है । उसका मानना है कि फसाद कराने वाले, दूसरों का हक मारने वाले ही चालीस चोर है, जो हमेशा कमजोर वर्ग को दबाते हैं । इसी सबके बीच बार-बार अपने होने का अहसास दिलाती छोटी-छोटी मगर समझदार लड़कियां समूचे संघर्ष का हिस्सा है, अलग-अलग कहानियों से अलग-अलग किरदार निभाती सबीना से लेकर गुल्लो, सायरा, चम्पा, मुन्नी जैसी लड़कियों में नासिरा शर्मा खुद को ही 'प्लांट' करती हैं।
    दर्द की बस्तियों की ये कहानियाँ जिस भारतीय आबादी का प्रतिनिधित्व करती है वही इस देश की बुनियाद हैं ।  दरअसल ये ही कहानियां हिंदुस्तान की सच्ची तस्वीर हैं, जिनका अंतर्संगीत  इनके कथानकों के तारों में छिपा है, जिन्हें जरा-सा छेड़ो तो मानवीय करुणा का अधाह सागर ठाठें मारने लगता है । कहानियों का कैनवास और लेखक के सरोकार में जहाँ विस्तार एव गहराई है वहाँ घनीभूत और चौतरफा व्यथा है ।
    इन कहानियों की भाषा जिंदा भाषा है, जिसमें निजता और लोक-गंध की मिठास है। एक वरिष्ट कथाकार की ये कहानियां सचमुच उसके संपूर्ण कथा-संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं ।
  • Kachche Resham Si Larki
    Amrita Pritam
    300 255

    Item Code: #KGP-9079

    Availability: In stock

    मेरे लिए जिन्दगी एक बहुत लम्बी यात्रा  का नाम है। जड़ से लेकर चेतन तक की यात्रा का नाम।  अक्षर से लेकर अर्थ तक की यात्रा का नाम। और हकीकत जो है - वहां से लेकर हकीकत  होनी चाहिए -  उसकी कल्पना और उसमें एतक़ाद रख पाने की यात्रा का नाम।  इस लिए कह सकती हूँ कि मेरी कहानियों में जो भी किरदार हैं वह सभी किरदार जिन्दगी से लिए हुए हैं। लेकिन वह लोग - जो यथार्थ और यथार्थ का फासला तय करना जानते हैं - अमृता प्रीतम
  • The Great Gatsby (Novel)
    F. Scott Fitzgerald
    345 311

    Item Code: #KGP-364

    Availability: In stock

    Nick Carraway, the narrator of the novel, takes us back to the spring in 1922, when Wall Street was booming, and bootleggers were in business due to the alcohol ban. Nick travels to New York from the mid-west in order to become a bondsman. He takes residence in West Egg, next to a huge mansion which belongs to a mysterious Mr. Gatsby.  Nick is reacquainted with Daisy and Tom Buchanan, a wealthy couple who lives across the bay from him. Nick befriends Gatsby, who is revealed to be infatuated with Daisy. Nick arranges for them to meet, and they began to have an affair.  Tom, who is also having an affair with a married woman, confronts Daisy and Tom, and Daisy is forced to return to Tom. As Daisy and Gatsby drive off afterwards, they run over and kill Myrtle Wilson, Tom's mistress. Tom lies to Myrtle's husband, and tells him that Gatsby was the driver, when in reality, Daisy was driving. Wilson shoots Gatsby at his home afterwards, and then commits suicide. Nick is disillusioned with the life he planned for in New York, and returns west to his home town.
    Nick reflects that just as Gatsby's dream of Daisy was corrupted by money and dishonesty, the American dream of happiness and individualism has disintegrated into the mere pursuit of wealth. Though Gatsby's power to transform his dreams into reality is what makes him “great,” Nick reflects that the era of dreaming—both Gatsby's dream and the American dream—is over.
  • Manjhi Na Bajao Vanshi
    Om Bharti
    225 203

    Item Code: #KGP-1883

    Availability: In stock

    माँझी! न बजाओ वंशी
    केदारनाथ अग्रवाल के जीवन और कविता दोनों में एक अनिंद्य प्रेम का भाव विराजता है। जो जीवन में है वह कविता की परिधि से बाहर नहीं है। जहां लोग दांपत्य प्रेम को जीते हुए अपने उत्तरवर्ती जीवन तक आकर ऊब का अनुभव करने लगते हैं, वहीं केदार जी आजीवन इस प्यार से बँधे-बिंधे रहे। हिंदी की काव्य परंपरा में प्रेम का अनूठा और अद्वितीय स्थान है पर है वह परकीया प्रेम से बँधा हुआ। आधुनिक कवियों में  केदारनाथ अग्रवाल का एक विरल उदाहरण है जहाँ वे दांपत्य प्रेम में ही लौकिक-अलौकिक सुखों की अपूर्व व्यंजना कविताओं में संभव करते हैं। जमुन जल तुम जैसा संग्रह तथा अन्य संकलनों की प्रेम कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने प्रेम को दांपत्य की सुखद अनुभूतियों और संवेदना से भरा है। छायावादियों में जो प्रेम लौकिक धरातल से ऊपर उठकर दार्शनिक उपपत्तियों में पर्यवसित हो गया था, सूफी कवियों के यहाँ जो प्रेम ईश्वरीय सत्ता से लगन का पर्याय बन गया है, वह केदारनाथ अग्रवाल जैसे प्रगतिवादी कवि के यहाँ लोक में उपलब्ध प्रेम की कर्मठ जिजीविषा का पर्याय है।
    प्रेम केदारनाथ अग्रवाल की दिनचर्या का ही एक अंग रहा है। वह जीवन की मांसपेशियों में रुधिर की तरह प्रवाहित है। प्रेममय जीवन के सारे काम जीवन के काम हैं। कुरते में बटन नहीं लगी, ऊपर से वह फटा हुआ है, सारा घर अस्त-व्यस्त हो उठा है, न सोपकेस में साबुन, न तेल की एक बूँद, न खोजने से मिल पाता रूमाल, मेजपोश पर धूल, किताब पर प्याला, कॉपी पर औंधा रखा गिलास-कवि अधीर होकर संबोधित करता है पत्नी को कि घर सँवारने कब आओगी। घर की सारी शिष्ट सँवरन पत्नी की देन है-पत्नी जो प्रिय है, जिसके होने से जीवन है।
    कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ लिखकर रोमानी अनुभूतियों के प्रदेश में एक हलचल मचा दी थी। ‘वंशी और मादल’ के इस गीत को नवगीत के स्थापत्य में नवता के उन्मेष के रूप में देखा गया। गीत स्निग्धता के लिए जाने जाते रहे हैं, उनकी कोमल पदावलियों को केदारनाथ अग्रवाल ने अपने कवि-जीवन में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में ग्रहण किया है। आज भी हम उनकी कविताएँ पढ़ते हैं तो लगता है, माँझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है और उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है। वह किसी कान्हा की बाँसुरी से कम नहीं है। जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्यंजना में बदल जाती है। केदार जी ने कविता में यही किया है।
     यह संग्रह केदारनाथ अग्रवाल की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Faaltu Aurat
    Ajeet Kaur
    320 256

    Item Code: #KGP-9373

    Availability: In stock

    पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर फेमिनिज्म में यकीन रखती हैं पर वह हर बात में पुरुषों का विरोध करने वाली फेमिनिस्ट नहीं हैं, वह ख़ुद को विचारों से फेमिनिस्ट मानती हैं। वह जब-जब स्त्री पर लिखती हैं, अपनी इस बात को पुख्ता भी करती हैं। फालतू औरत कहानी संग्रह में स्त्री  केंद्रित कहानियों की बहुलता है।
    प्रस्तुत कहानियाँ भारतीय समाज में जिस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती हैं, वह पत्नी, प्रेमिका, बेटी, माँ तो है ही, पर पुरुषवादी समाज में वह ‘फालतू औरत’ होने का अभिशाप भी झेल रही है। न वह पूरी तरह पत्नी है, न प्रेमिका, न माँ, न बेटी। वह है महज एक ‘फालतू औरत’। इसी ‘फालतू औरत’ के दर्द, उसकी पीड़ा, उसके संघर्ष को अजीत कौर संवेदना के स्तर पर बड़ी शिद्दत से रेखांकित करते हुए हमें समाज का वह चेहरा दिखाने की ईमानदार कोशिश करती हैं जो अपने स्वार्थ की खातिर इस औरत को कभी उसका पूरा ‘स्पेस’ नहीं देना चाहता। ‘फालतू औरत’ की गीता, ‘एक मरा हुआ पल’ की शालिनी, ‘कमरा नंबर आठ’ की दो स्त्रियाँ, ‘हाॅट वाॅटर बोतल’ की मंजरी, ‘बुतशिकन’ की मिसेज़ चौधरी और ‘महक की मौत’ की मोनिका, ‘माँ-पुत्र’ की शांता, ‘एक पोट्र्रेट’ की तारा दीदी ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जो प्रेम की दुनिया में, परिवार में, समाज में, देश में अपने लिए एक मुकम्मल स्पेस की चाहत रखती हैं।
    अजीत कौर की प्रस्तुत कहानियाँ सतत प्रवाहमय नदी की तरह हैं जो पाठक को अपने संग बहा ले जाने की पूरी ताकत और सामर्थ्य रखती हैं।
  • G-male Express
    Alka Sinha
    300 240

    Item Code: #KGP-9376

    Availability: In stock

    बदलते समय के साथ वैचारिक मुठभेड़ करता यह उपन्यास पाठक को एक ऐसी दुनिया से रूबरू कराता है जो उसे चैंकाती है कि ये पात्र, ये परिवेश उसके लिए अपरिचित तो नहीं थे मगर वे उसे उस तरह से पहचान क्यों नहीं पाए? देवेन त्रिपाठी को मिली डायरी की तरह ही हमारी जिंदगी की किताब भी अनेक प्रकार के कोड्स से भरी है जिसे सभी अपनी-अपनी तरह से डिकोड करते हैं। इसीलिए उसे जानने और समझने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। 
    स्कूल-काॅलेज की जिंदगी के बीच पनपते अबोध प्रेम की मासूमियत को चित्रित करता यह उपन्यास जब उसमें हो रही सौदेबाजी को उजागर करता है तब सारा तिलिस्म टूट जाता है और सवाल उठता है कि अगर दैहिक सुख के बिना प्रेम अधूरा है तो क्या यौन-सुख हासिल करना ही प्रेम की परिणति है? क्या स्त्री के लिए इस सुख की कामना करना अनैतिक है? सवाल यह भी है कि महज गर्भ धारण न करने से ही स्त्री की यौन-शुचिता प्रमाणित हो जाती है तो पुरुष की शुचिता कैसे प्रमाणित की जाए? पैसों की खातिर यौन-सुख देने वाली स्त्रियाँ अगर वेश्याएं हैं तो स्त्रियों को काम-संतुष्टि बेचने वाले पुरुषों को कौन सी संज्ञा दी जाए? इन सभी पहलुओं पर शोधपरक चिंतन करता यह उपन्यास स्त्रियों की काम-भावना की स्वीकृति का प्रश्न उठाने के साथ-साथ स्त्री-पुरुष की यौन-शुचिता को बराबरी पर विश्लेषित करने की भी मांग करता है क्योंकि बेलगाम संबंधों से पैदा हुई जटिलताओं को समझे बिना ‘आधुनिक’ होने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता है।
    यह कृति निम्नतम से उच्चतम की एक ऐसी चेतना-यात्रा है जो बुद्धत्व अथवा महामानव में रूपांतरण का दावा करने के बदले पाठक को सही मायने में जाग्रत करती है।
  • Anaam Yatraayen
    Ashok Jairath
    300 270

    Item Code: #KGP-237

    Availability: In stock

    जीवन एक सफर और हमें निरंतर इस सफर में चलते रहना है । जो चलता रहा, वह जीता रहा और जो बैठ गया, सो बैठ गया । अकसर लोग यात्राओं से घबराते है । कई कारण हैं -आर्थिक अभाव साथ की कमी या वैसे ही मन नहीं करता, आलस्य में स्चा-बसा मन बस आराम करना चाहता है । हमारा शरीर 'हड्ड हराम' हैं, वह आराम चाहता है, पर जितना ही इसे माँजा जाए, उतना ही यह निखरता है ।
    हिमालयी श्रृंखलाएं, हिममंडित शिखर व्यक्ति को बार-बार बुलाते हैं । इनके ऊपर गूंजते संगीत के स्वर और लोककाथाएं आत्मविभोर कर देती हैं और इनके अजस्र जलस्रोत जहां नैसर्गिक परिवेश को जन्म देते है, वहीं पर थके हुए मन और शरीर को संबल देते है ।
    लेखक ने पश्चिमी हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र व अनेक हिमानियों के साथ-साथ दूसरे दुर्गम इलाकों की साहसिक यात्राएं की हैं, जिनका विशद विवरण इस पुस्तक के रूप में पाठकों को सौंपा जा रहा है । ये यात्राएं कूमाऊं-गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय एव सांस्कृतिक क्षेत्रों से ही संबंधित हैं, मात्र द्वारकापुरी की यात्रा को छोड़कर । यात्राओं का निरंतर सिलसिला लेखक के अलमोड़ा में प्रवास के दौरान शुरू हुआ, जब सारे उत्तरांचल के साथ हिमानियों को भी ट्रेक किया गया, जहाँ हिमालियाई संस्कृति को बहुत करीब से देखकर स्वयं लेखक हिमालियाई हो आया था ।
    इन ब्योरों के साथ ही उन सभी साथियों-सहयोगियों और मार्गदर्शक का सीधा-सहज और बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन भी दिया जा रहा है, जो इन संस्मरणों को और भी मनोरंजक और दिलचस्प बना देता है । आशा है, ये सभी संस्मरण/यात्राओं का वर्णन पाठकों को अच्छा लगेगा ।
  • Sarla : Ek Vidhva Ki Aatmjeevani
    Pragya Pathak
    100 90

    Item Code: #KGP-2062

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From France (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-7204

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. French short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Abandoned by Maupassant, A Christmas In The Forest by Theuriet, The Three Low Masses by Alphonse Daudet, The Necklace by Maupassant, The Conscript by Honore De Balzac, A Piece Of Bread by Coppee, this book is a compilation of 20 famous French short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from France.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal
    Bhagwan Das Morwal
    300 255

    Item Code: #KGP-706

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढ़ियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Pahiye Ki Vikaas Katha (Paperback)
    Chetan Kumar
    60

    Item Code: #KGP-7089

    Availability: In stock


  • Aastha Ka Raasta
    Dr. Arsu
    160 144

    Item Code: #KGP-9002

    Availability: In stock

    आस्था का रास्ता 
    हर युग की समस्याएं और संवेदना, बदलती रहती हैं । इसका असर साहित्य पर पड़ना सहज स्वाभाविक है, लेकिन बाहरी तौर की विकास योजनाएं हमेशा हमें अंतर्दृष्टि नहीं देती हैं । अंतर्दृष्टि ही आस्था की नीव है । विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के युग में साहित्य में आए परिवर्तन के स्वरूप पर साहित्यकार के मन में आशंकाएं बढ़ रही हैं ।
    आस्था का आलोक बुझ रहा है । बुद्धि-विकास के अनुपात में अनाज हृदय-विकास नहीं होता है । परंपरा, संस्कृति, साहित्य, धरोहर और विरासत का महत्त्व आज फीका पढ़ रहा है ।
    इसके कारणों-परिणामों पर सोच-विचार करने वाले अट्ठारह लेखों का संकलन ।
    मलयालमभाषी हिंदी लेखक और अनुवादक डॉ० आरसु की अद्यतन कृति । इसमें चिंतन का इंधन है । आस्था और आशंकाओं की धड़कन है ।
  • Brahm Kamal
    Swati Tiwari
    300 270

    Item Code: #KGP-497

    Availability: In stock


  • Pride And Prejudice (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-347

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Vajpayee Rachna-Sankalan (Set Of 7 Books)
    Atal Bihari Vajpayee
    1420 1136

    Item Code: #KGP-7235

    Availability: In stock

    वाजपेयी रचना-संकलन 
    7 चर्चित एवं प्रमुख वैचारिक पुस्तकें
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Yadav
    Rajendra Yadav
    180 162

    Item Code: #KGP-2077

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र यादव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिंहवाहिनी', 'मैं तुन्हें मार दूँगा', 'वहाँ तक पहुँचने की दौड़', 'रोशनी कहीं है?', 'संबंध', 'सीज फायर', 'मेहमान', 'एक कटी हुई कहानी', 'छोटे-छोटे ताजमहल' तथा 'तलवार पंचहजारी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kucha E Kaatil
    Ram Lal
    175 158

    Item Code: #KGP-2067

    Availability: In stock

    कूचा-ए-कातिल

    यह एक बहुत ही मामूली आदमी की खुदनोश्त
    दास्तान है, जिसने काफी गुरबत देखी है
    और यह महरूमियों का भी शिकार हुआ है ।
    कौमी और समाजी सतह पर इसने
    बेशुमार मसायब का खामोशी से मशाहदा
    किया है और दर-बदरी इसके
    खुन में हमेशा मोजूद रहीं हे।

    मैं इस शख्स को बहुत करीब से जानता हूँ,
    क्योंकि वह मैं ही हूँ। मैंने 1943 से अब तक
    जितने अफ़साने, नावल, ड्रामे, सफरनामे,
    मजामीन वगैरह लिखे हैं, इनमें मेरी
    जाती कैफियतें मुख्तलिफ शक्लों और रवैयों 
    का रूप धारकर हमेशा मौजूद रही हैं ।
    मेरे नज़दीक खुदनोश्त भी एक तरह का
    तखलीकी इजहार है, लेकिन इसमें 
    बयान की गई सच्चाइयाँ
    दूसरी असनाफ़ के मुकाबले में कुछ
    ज्यादा ही खुरदरी और तकलीफदेह हैं।
    -रामलाल
  • Hindustan Ki Diary
    Dirgha Narayan
    350 280

    Item Code: #KGP-HKD HB

    Availability: In stock

    'हिंदुस्तान की डायरी' में दीर्घ नारायण के कहानीकार का वह रूप सहज ही नजर आ जाता है जिसमें वह कहानी को अपने समय, समाज व बदलती संस्कृति की धड़कन बना देना चाहते हैं। यहाँ अनुभव जिंदगी से निकलकर चौदह कहानियों में इस तरह प्रविष्ट हो गए हैं कि विविध पक्षीय संबंधों-मूल्यों पर संजीदगी से विचार होता चलता है। वर्तमान को तो ये कहानियाँ गहराई से अंकित करती ही हैं, एक गंभीर व सकारात्मक भविष्य-दृष्टि भी सृजित करती हैं जिससे हमारे समाज को संचालित करने वाली शक्तियाँ सचेत हो सकेंगी। लेखक की यह एक वाजिब चिंता है कि भारत का हर नागरिक तो पाकिस्तान में अमन-चैन व तरक्की ही चाहता है किंतु दुर्भाग्य यह है कि पाकिस्तान की नजर में सबसे बड़ा शत्रु भारत बना हुआ है। भारत की ओर से दरअसल यह एक ईमानदार डायरी है जिससे दोनों ओर के हुक्मरानों को सही दिशा मिल सकती है। अपने यथार्थ में एक मुख्य अधिशासी अधिकारी की ये कहानियाँ बदलते समय में उन दस्तकों की शिनाख्त हैं। जो परिवार, शहर, देश और समाज के दरवाजों पर सुनाई पड़ रही हैं। यहाँ भाषा ऐसी दोस्ताना है कि कथा के पात्रों और स्थितियों का मूल भाव बड़ी सहजता से संप्रेषित हो जाता है। रूपवादी लटकों-झटकों से संघर्ष कर रही आज की हिंदी कहानी के लिए दीर्घ नारायण जी की ये कहानियाँ एक सार्थक मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं क्योंकि यहाँ हर कहानी एक नया कथ्य खोजकर लाती है और यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करती है 
  • Godaan (Play)
    Jaivardhan
    120 108

    Item Code: #KGP-8005

    Availability: In stock

    कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास 'गोदान' का नाटय रूपांतरण।
  • Shishu Seekhen Achchhi Baaten-1
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1116

    Availability: In stock


  • Meri Ekyavan Kavitayen (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    160 139

    Item Code: #KGP-1026

    Availability: In stock


  • Ek Thi Sara
    Amrita Pritam
    240 192

    Item Code: #KGP-1978

    Availability: In stock

    एक थी सारा

    मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है
    लेकिन मैं उनका जायका नहीं बन सकती
    मैं टूटी दस्तकें झोली में भर रही हूँ
    ऐसा लगता है पानी में कील ठोक रही हूँ
    हर चीज़ बह जाएगी—मेरे लफ्ज, मेरी औरत
    यह मशकरी गोली किसने चलाई है अमृता !
    जुबान एक निवाला क्यूँ कुबूल करती है ?
    भूख एक और पकवान अलग-अलग
    देखने के लिए सिर्फ 'चाँद सितारा' क्यूँ देखूँ ?
    समुंदर के लिए लहर ज़रूरी है
    औरत के लिए जमीन जरूरी है
    अमृता ! यह ब्याहने वाले लोग कहाँ गए ?
    यह कोई घर है ?
    कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा... 
    मैंने बगावत की है, अकेली ने,
    अब अकेली आंगण में रहती हूँ
    कि आजादी से बड़ा कोई पेशा नहीं
    देख ! मेरी मज़दूरी, चुन रही हूँ लूँचे मास
    लिख रहीं हूँ
    कभी मैं दीवारों में चिनी गई,
    कभी बिस्तर से चिनी जाती हूँ... 
    [इसी पुस्तक से]

  • Hindi Vyakaran : Ek Navin Drishticon
    Kavita Kumar
    550 440

    Item Code: #KGP-65

    Availability: In stock

    यह पुस्तक सामान्य विद्यार्थियों की सामान्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण व्याकरण को छोटी-छोटी इकाइयों-भाषा-ढांचों-में विभाजित करके सुगम, सुबोध एवं सामान्य भाषा में प्रस्तुत करने का एक छोटा-सा प्रयास है। एक शुष्क विषय को रेखाचित्रण द्वारा सजीव व आकर्षक बनाकर, यथासंभव व्याकरणिक पारिभाषिक शब्दावली का कम से कम प्रयोग, आवश्यकतानुसार पुस्तक में स्थान-स्थान पर वर्तनी तथा विराम चिह्नों के प्रयोग संबंधी निर्देश, वाक्य-रचना पर विशेष ध्यान एवं प्रत्येक व्याकरणिक बिंदु पर प्रचुर उदाहरणों सहित प्रस्तुतीकरण इस पुस्तक की विशिष्टता है।
    -कविता कुमार
  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap (Paperback)
    Madan Kashyap
    80

    Item Code: #KGP-1277

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीँ रहते, उसमें पैठत्ते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते है और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते है ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृज़नात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • The Mother Of All Books (Paperback)
    Rajni Arun Kumar
    99

    Item Code: #KGP-1451

    Availability: In stock

    Sense has been banned from discotheque, multiplex, several restaurants, shopping mall, plane and many other places of recreation*. And this was even before the baby was born... Yes, Sense was expecting... A baby...
    To make things worse, she has to contend with having no permanent address, a set of friends who think nothing of scrutinising her like a specimen under a microscope, and relatives who mean well. Then there’s the journey of re-discovering her constantly changing body, which for anyone who has crossed puberty is not in the least pleasant – now it’s cold, now it isn’t; now it’s fat, no, it isn’t; now it fits, Ha! Now it doesn’t! All very confusing... For someone who has prided on knowing her mind since she was three, this was allgoing horribly wrong.
    Come due date, and Sense, as usual has managed to get herself into a pickle and is once again, very nearly banned from the hospital*! Can the Baa-lamb (who has the patienceof a saint) and Sense’s parents (whose understanding parallels the Dalai Lama) guide her through these tumultuous times? Will the little one survive Sense’s adventures unscathed? And what other adventures are in store for Sense and family in this journey called Motherhood? 
    *She staunchly insists this is through no fault of hers and blames it squarely on extenuating circumstances.
  • The Luck Of The Jews (Novel)
    Michael Benanav
    595 536

    Item Code: #KGP-893

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Aadivasi Shourya Evam Vidroh (Jharkhand)
    Ramnika Gupta
    280 224

    Item Code: #KGP-751

    Availability: In stock

    इतिहास-लेखन को लेकर समय-समय पर सहमतियाँ व असहमतियाँ दर्ज की जाती रही हैं। कई बार वे व्यक्ति/समुदाय/संघर्ष/प्रतिवाद हाशिए पर रह जाते हैं या नेपथ्य में चले जाते हैं जिन्होंने समय के नुकीले प्रहार सहे होते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में आदिवासियों को प्रायः नेपथ्य में रखा जाता रहा है। धीरे-धीरे उनके संघर्षों के मूल्यांकन का कार्य शुरू हुआ। यह एक तरह से असंख्य मनुष्यों के प्रति सभ्यता का आभार ज्ञापन भी है। रमणिका गुप्ता ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘आदिवासी: शौर्य एवं विद्रोह (झारखंड)’ उनका इस सिलसिले में नया हस्तक्षेप है। झारखंड के आदिवासियों पर केंद्रित इस पुस्तक में अनेक भूले-बिसरे वृत्तांत समाहित हैं।
    रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित प्रस्तुत पुस्तक में वीरांगना सिनती दई, पहाड़िया वीर, तिलका माँझी, रानी शिरोमणि, सिदो व कान्हू, पृथ्वी माँझी, बिरसा मुंडा तथा जतरा भगत आदि अविस्मरणीय चरित्रों के विषय में महत्त्वपूर्ण सामग्री सँजोई गई है। अनेक लेखकों ने झारखंड के आदिवासियों का योगदान रेखांकित किया है। भूमिका में रमणिका लिखती हैं, ‘झारखंड के शौर्य और विद्रोह की यह गाथा बूढ़े बुजुर्गों की स्मृतियों, उनके गीतों, बैलेड्स, लीजेंड्रियों, लोककथाओं व किंवदंतियों और अंग्रेजों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधरित है।’ सचमुच, आदिवासियों का योगदान इतना विस्मयपूर्ण है कि वह लोककथाओं, लोकगीतों का अनिवार्य हिस्सा बन गया है। अपने देश और समाज के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली विभूतियों का जीवन चरित पीढ़ियों को प्रेरणा दे रहा है। 
    आज के संदर्भ में ऐसी पुस्तकों का महत्त्व इस कारण बढ़ जाता है क्योंकि ‘जल-जंगल-जमीन’ को लेकर कई तरह के संघर्ष छिड़े हुए हैं। एक व्यापक सामाजिक न्याय की भूमिका बनाती यह सामग्री विस्मृतप्राय इतिहास का नया आख्यान है।
  • Parinti (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7101

    Availability: In stock


  • Aadhunik Nibandh
    Shyam Chandra Kapoor
    350 263

    Item Code: #KGP-741

    Availability: In stock


  • Panchtantra Ke Natak
    Shri Prasad
    125 113

    Item Code: #KGP-316

    Availability: In stock


  • Upnivesh
    Narayan Gangopadhyaya
    125 113

    Item Code: #KGP-1942

    Availability: In stock

    उपनिवेश
    नदी-मातृक्र देश बंगाल-पश्चिम और पूर्व की  सीमाओं से मुक्ति-संयुक्त और सम्पूर्ण बंगाल के उस अछूते क्षेत्र विशेष-चर-इस्माइल की एक अदभुत गाथा जिसे पुर्तगाली ज़ल-टस्युओं। में बसाया था, नदी के मुहाने पर, सुन्दर वन से जुडा हुआ ।
    प्रकृति के साथ मनुष्य के संघर्ष की रोमांचपूर्ण जीवन-यात्रा की लोमहर्षक कहानी सभ्य और सहज के मानसिक द्वन्द्व भी वर्गगत संघर्ष का एक अनूठा दस्तावेज विभिन्न नस्लो के विविध चरित्रों को मनोमुग्धकारी मंजुषा आप इस उपन्यास में पायेंगे ।
    द्वितीय महायुद्ध में जमता त्रास और आत्म रक्षा के लिए एकता और संघर्ष भी गुहार की राष्ट्रीय तस्वीर की सजीव रूपरेखा वास्तव ये इस उपन्यास को बंगला उपन्यासों में क्लासिक का दर्जा सही ही प्राप्त है । 
    रहस्य, रोमांच, हास्य, करुणा, प्रेम वासना-क्या कुछ नहीँ है इसमें ।
  • Ramdhari Singh Dinkar
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-rdsd

    Availability: In stock


  • Dona Paavala Aur Teen Auraten
    Rohitashv
    175 158

    Item Code: #KGP-1836

    Availability: In stock

    गोवा का समुद्री तट। लहरों में लहराता एकांत। फैनी की मादक गिरफ्त। ऑन्जना बीच पर निर्वस्त्र विदेशी नर-नारी देखकर व्हिस्की पीने को मचलता मन। पीने के बाद इस स्वर्ग में गोते खाता नायक ! हाँ, यही तो होटल, बार और क्रूज के साथ तस्वीर है गोवा की। धनाढ्य पर्यटकों की मौज-मस्ती का अपना निजी रंगस्थल, देश-विदेशों में मशहूर ! प्रचलित यह भी है कि गोवा की औरतें स्वच्छंद जीवन की अभ्यस्त होती हैं। वे पैसे कमाती हैं और ऐश करती हैं।
    मगर रोहिताश्व की लिखी कहानियाँ, ये किस गोवा की कथाएँ हैं, जिनमें गोवा का स्वर्ग अपने ही बाशिंदों को आजाद रहन-सहन के बावजूद गरीबी, धोखे, जालसाजी और भावात्मक शोषण की चक्की में पीसकर रख देता है। अत्याचार और शोषण चक्र को खोलता हुआ लेखक सागर-किनारे के चप्पे-चप्पे को खँगालता है। संवेदना की बुनावट में गोवा की तस्वीर बदल जाती है। समुद्र की लहरों पर बल खाती चाँदनी के नीचे कितनी-कितनी काली रातें बिछी हुई हैं। उजाला होने की उम्मीद यहाँ स्त्री-पुरुषों के त्याग और बलिदानों से बने सूरज के हाथ है।
    दोना पावला और तीन औरतें’ संसार की उन तमाम औरतों का प्रतिनिधित्व करती है, जिनका जीवन अकेलेपन की त्रसदी के लिए है। पढ़ते हुए भयानक बेचैनी जकड़ती चली जाती है। कहीं आशा जागती है कि संघर्ष ही उनका मकसद है। स्त्रियाँ टूटती हैं, डगमगाती फिर भी नहीं...
    लेखक कहानियों में विभिन्न नामों से उपस्थित है और अपनी परिचय-भूमियों (गोवा और हैदराबाद) पर घटित होते इतिहास तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को बराबर दर्ज करता जाता है। कहन का प्रस्तुतीकरण ऐसा जैसे समूह में बैठकर हम लोककथाएँ सुन रहे हों। यहाँ कथाओं के प्रति वही अटूट आकर्षण जागता है, जिसके गायब हो जाने से कथा-कहानी के प्रति पाठक उदासीन हुआ है। संवेदी लगाव की यह धारदार प्रस्तुति रोमानी हालात में भी संघर्ष की पराकाष्ठा तक अनायास ही पहुँच जाती है।
  • Parvatiya Sanskriti Main Shiv Shakti
    Sudarshan Vashishath
    460 414

    Item Code: #KGP-9360

    Availability: In stock

    शिव और शक्ति आदि देव रहे हैं हमारी संस्कृति के। हर पर्वत शिखर शिव का प्रतीक है तो हर घाटी में देवी पार्वती अपने अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। किन्नर कैलास और मणिमहेश की कठिन यात्राएँ प्रसिद्ध हैं जो शिव के मूल स्थान की खोज में हजारों फुट की ऊँचाई तक हर वर्ष की जाती हैं। उधर पुराने समय में मणिकर्ण पहुँच पाना भी सुगम नहीं था। हालाँकि मंडी राज्य में प्रमुख देवता माधोराव रहे हैं किंतु यहाँ महाशिवरात्रि का उत्सव सात दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। वैद्यनाथ धाम, प्रसिद्ध शिव मंदिर मसरूर आदि ऐसे स्थान हैं जो पुरातन काल से शिव उपासना के सिद्धपीठ बने हुए हैं।
    यदि हिमाचल प्रदेश का ऊपरी भाग देव भूमि है तो निचला क्षेत्र ‘देवी भूमि’ है जहाँ शक्ति अपने अनेक रूपों में विद्यमान है। शक्ति की स्थापना चंडीगढ़ से आरंभ हो जाती है जहाँ चंडी मंदिर है। उसके साथ ही प्रसिद्ध मनसा देवी और फिर कालका। उससे ऊपर तो समस्त भूभाग देवीमय हो गया है। श्री नैना देवी, चिंतपूर्णी माता, श्री ज्वालामाई, वजे्रश्वरी, चामुंडा—न जाने कितने ही स्थान हैं जहाँ देवी किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इस ओर कामाक्षा देवी, भीमाकाली तो उस ओर लक्षणा देवी और आदिशक्ति।
    हिमालय के इस पर्वतीय क्षेत्र में एक सशक्त देव परंपरा की व्यवस्था है। यहाँ देवी और देवता को सामान्यतः ‘देउ या देवता’ ही संबोधित किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में देवता का संस्थान बहुत शक्तिशाली है जो सामाजिक जीवन के हर पहलू को नियोजित करता है। धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक; कोई भी क्षेत्र हो, देव का संस्थान उसे संचालित करता है। हर देवता का अपना क्षेत्रा होता है जिसे ‘शासन’ कहा जाता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में शिव व शक्ति के प्रमुख व प्रसिद्ध स्थानों के अलावा कुछेक ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों के देवों को भी सम्मिलित करने का प्रयास किया गया है।
  • Swatantarata Sangharsh Ka Itihaas_100
    Hazari Prasad Dwivedi
    100 90

    Item Code: #KGP-1061

    Availability: In stock

    स्व. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक गं्रथों द्वारा हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की है। उन्होंने जहां एक तरफ अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना की वहीं दूसरी तरफ शोधपरक ग्रंथों की। निबंध-लेखन के क्षेत्रा में भी उन्होंने ललित निबंधों के सृजन द्वारा हिंदी को अत्यंत सुंदर निबंध दिए। प्रस्तुत पुस्तक स्व. आचार्य द्विवेदी के चिंतन को समझने में एक महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करती है। सैकड़ों साल की गुलामी से सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ था। भारत के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। जागरूक एवं संवेदनशील साहित्यकार इस घटना की उपेक्षा नहीं कर सकता था। स्व. आचार्य जी ने स्वतंत्रता-संघर्ष के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसमें नामांे की भरमार नहीं है। यह उनकी अपनी दृष्टि थी। इस पुस्तक का रचनाकाल सन् 1948 के बरी है। इसमें हमने किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया है। नई पीढ़ी को हमारी यह एक विनम्र भेंट है।
    —मुकुंद द्विवेदी
  • Manto Zinda Hai
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-805

    Availability: In stock

    मंटो जिन्दा है
    सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । फीनिक्स पक्षी की तरह वह उड़ानें भरता रहा, अपनी ही राख से पुनर्जीवित होता रहा, जिन्दगी और लेखन के मोर्चों पर जीता-मरता रहा और भारतीय उपमहाद्वीप की साइकी में उतर गया । जाहिर हैं, ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है ।
    'मंटो जिन्दा है' ऐसी जीवनकथा है जो वृतांत होते हुए भी, वृतांत को बाहर-भीतर से काटती-तोड़ती पाठकीय चेतना को झकझोरती जाती है । मंटो की जिन्दगी के कई केंद्रीय मोटिफ, प्रतीक और पेटॉफर पाठक को स्पन्दित करने लगते है और यह महसूस करता है जैसे वह मंटो को अपनी परिस्थिति, समय और साहित्य के साथ जीने लगा हो । लेखक ने जैसे मंटो को जिन्दा महसूस किया है, पाठक भी किताब पढ़ते हुए वैसी ही हरारत महसूस करने लगता है ।
    मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है ।
    वृतांत और प्रयोग के निराले संयोजन में बँधी यह मंटो- कथा मंटो को उसके विविध रंगों और छवियों के साथ उसके प्रशंसकों-पाठकों के रू-ब-रू खडा कर देती है ।
  • Mera Jamak Vapas Do
    Vidya Sagar Nautiyal
    350 315

    Item Code: #KGP-393

    Availability: In stock


  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1272

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है। 
  • Bharat Ke Rashtriya Prateek Bhaag-1
    A.W.I.C.
    90 81

    Item Code: #Kgp-bkrpb-1

    Availability: In stock


  • Sahachar Hai Samay
    Ramdarash Mishra
    800 640

    Item Code: #KGP-124

    Availability: In stock

    सहचर है समय
    रामदरश मिश्र का समय को सहचर मानना प्रकारांतर से 'स्व' और 'समय' के संबंधों की द्वंद्वात्मकता और सामंजस्य की ओर संकेत करता है । इस आत्मवृत्त से एक ओर कछार के अंचल में बीते बचपन से लेकर वाराणसी में उच्च शिक्षा, जीविका-संघर्ष, गुजरात-प्रवास, दिल्ली- आगमन, बहुआयामी रचनाशीलता और दिल्ली के साहित्यिक परिवेश से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का जुलूस उमड़ पड़ा है, दूसरी ओर इसी के समानांतर स्वतंत्रता-पूर्व का ग्रामीण परिवेश, स्वतंत्रता और जनतांत्रिक आकांक्षाएँ, व्यवस्था के अंतर्विरोध, अध्यापन-जगत की राजनीति, भारत-पाक युद्ध, आपातकाल, इंदिरा गाँधी का निधन, सिख-विरोधी हिंसा यानी कि पचास वर्षों का जीवंत इतिहास अपनी अनेक विशेषताओं और कुरूपताओं के साथ उभरा है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाकारों और कलाकारों ने आत्मकथाएँ लिखी हैं। अधिकतर चर्चित आत्मकथाओं में काम-संबंधों की सनसनी परोसने या स्वयं को 'अतिविशिष्ट' सिद्ध करने की जो प्रवृत्ति मुखर है, 'सहचर है समय' से उसका अभाव है । अत: यह आकस्मिक नहीं कि रामदरश मिश्र का प्रस्तुत आत्मवृत्त अमृता प्रीतम, हंसा वाडेकर, दुर्गा छोटे, कमला दास और पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि की आत्मकथाओं से अलग किस्म का बन पडा है ।
    'सहचर है समय' का प्रस्थान बिंदु जीवन के प्रति गहरी आस्था है । मिश्र जी ने अपने जन्म लेते ही कीड़े-मकोडों के चलते मौत के मुँह में चले जाने और पडोस की एक बुआ के हाथों बनाए जाने का उल्लेख क्रिया है। इस घटना को अर्थविस्तार देते हुए उन्होंने लिखा है :
    'मेरी जीवन-यात्रा से कीड़े-मकोड़े भी खूब मिले, लेकिन मुझे उनसे बचाने वाली शक्तियां भी मिलती ही गईं । कीड़े-मकोड़े तो सभी को मिलते हैं, किसी-किसी को तो साफ ही कर जाते हैं, उनकी जिजीविषा, उनके जीवन- मूल्य सभी को चट कर जाते हैं, लेकिन मुझे जिजीविषा मिली है । जीवन के प्रति अगाध विश्वास, निष्ठा और मूल्य मिला है इसीलिए कि कीड़े-मकोडों के बावजूद जीवनदायक कोई न कोई शक्ति, रस मुझे देर-सबेर मिलता ही रहा है ।'
    प्रारंभ से ही स्वप्नदर्शिता का जिक्र भी हैं :
    'तब कुत्ता पाला था, अब सपने पालता हूँ अपने लिए, समाज के लिए, देश के लिए । वे छीन लिए जाते हैं, छीनकर किसी और को दे दिए जाते है, या तोड़ दिए जाते हैं—अपनों द्वारा भी और दूसरों द्वारा भी। ...लेकिन न जाने क्या है कि मैं टूटा नहीं, बिखरा नहीं, मिट-मिटकर बनता हूँ। गिर-गिरकर उठता गया हूँ, भटक-भटककर रास्ते पर आ गया हूँ।'
    सपने पालना, सपनों का टूटना-बिखरना, स्वयं के टूटने की स्थिति, लेकिन जीवनदायक शक्तियों और दृढ़ आस्था के फलस्वरूप आखिरकार सँभल जाना-यही मिश्र जी की अब तक की जीवन-यात्रा है। आज के स्वार्थ-संकुल परिवेश में टूटना-बिखरना किसी संवेदनशील बुद्धिजीवी की अनिवार्य नियति है । लेकिन बिना कुंठित  और निराश हुए अंतत: परिवार के भरेपूरेपन का संतोष महसूसना सबका सौभाग्य नहीं होता ।
    मिश्र जी ने अपने आत्मवृत्त का समापन करते हुए लिखा है : 'अनेक सांसारिक अनुपलब्धियों के बावजूद परिवार का यह भरापूरापन हमें मिला है, उससे हम बहुत प्यार करते हैं । जिस किसी शक्ति के कारण हमें यह वरदान मिला है, उसके प्रति हम गहरा आभार व्यक्त करते हैं...।'
  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Charitraheen (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    280

    Item Code: #KGP-727

    Availability: In stock


  • Angrezi Ki Rangrezi
    Raj Kumar Gautam
    140 112

    Item Code: #KGP-2091

    Availability: In stock

    राजकुमार गौतम में लेखन की जो पकड़ है, वह द्वार अपेक्षाकृत मुश्किल विधा (व्यंग्य) में भी एक हद तक उनका साथ निभा जाती हैं । यही वजह है कि संग्रह के कुछ व्यंग्य, गौतम के व्यंग्यकार की संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं । रचनाएँ प्राय: निबंध-शैली में हैं ।  भाषा व्यंग्यकार का सबसे प्रभावी औजार है; यत्र-तत्र उसकी चमक यहां भी दिखाई पड़ती है ।
  • Snehbandh Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    250 225

    Item Code: #KGP-1997

    Availability: In stock

    वरिष्ठ रचनाकार मालती जोशी असंख्य पाठकों की प्रिय कहानीकार हैं। आज जब अनेक तर्क देकर यह कहा जा रहा है कि साहित्य के पाठक सिमटते जा रहे हैं तब पाठकों को मालती जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों की प्रतीक्षा रहती है। ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ में उनकी ऐसी ही रचनाएं हैं। उनकी लोकप्रिय रचनाशीलता का रहस्य लेखन की सहजता में छिपा है। कथानक का चयन, भाषा, पात्रों का अंतरद्वंद्व और अभिव्यक्ति प्रणाली—सबमें एक सहजता अनुभव की जा सकती है। मालती जोशी छोटी-छोटी घटनाओं या अनुभूतियों से रचना का निर्माण करती हैं। उनका ध्यान व्यक्ति और समाज की मानसिकता पर रहता है। बाहरी हलचल से अधिक वे मन की सक्रियता अंकित करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र भावुक, विचारशील, निर्णय संपन्न और व्यावहारिक होते हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए वे कोरी भावुकता में नहीं जीते। एक अजब पारिवारिकता उनकी रचनाओं में महकती रहती है। संवाद मालती जोशी की पहचान हैं। छोटे-छोटे वाक्य, संकेतों से भरे शब्द और संवेदना की अपार ध्वनियां—इन गुणों से भरे संवाद पाठक के मन में उतर जाते हैं। किस्सागोई और विवरणशीलता का बहुत अच्छा उपयोग इन कहानियों में मिलता है। परिस्थिति और संयोग के माध्यम से प्रसंगों को गति मिलती है।
    इस संग्रह की सारी कहानियां स्त्री-मन की गहराई व सच्चाई को पूरी विश्वसनीयता के साथ व्यक्त करती हैं। यहां प्रचलित विमर्श नहीं, जीवन की समझ से उत्पन्न विवेक है। निश्चित रूप से ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ की सभी कहानियां पाठकों की प्रशंसा प्राप्त करेंगी।
  • Shankar Shesh Ke Naatakon Mein Sangharsh Chetna
    Hemant Kukreti
    280 252

    Item Code: #KGP-9097

    Availability: In stock


  • Aadivasi : Srijan Mithak Evam Anya Lokkathayen
    Ramnika Gupta
    500 400

    Item Code: #KGP-682

    Availability: In stock

    आदिवासी संस्कृति अब तक ज्ञात मानव सभ्यताओं में सबसे प्राचीन है। इस समाज की लोककथाओं-गाथाओं में मानव सभ्यता के शुरुआती दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यबोध की झलक तो मिलती ही है, साथ ही ये हमें आदिम मनुष्य को विस्मित कर देने वाली कल्पना की उड़ान और मनुष्य की आकांक्षाओं-अपेक्षाओं की मंत्र-मुग्ध करने वाली विरासत भी सौंपती हैं। ये कथाएँ--मिथक मानव सभ्यता के विकास की कथाएँ हैं--परिवर्तनों की दस्तकें दर्ज हैं इनमें--कल्पना और यथार्थ की भाषा में बोलती हैं ये कथाएँ। यदि हमने मौजूदा भूमंडलीकरण के दौर में मानव सभ्यता की इस विरासत को सुरक्षित नहीं रखा तो वर्तमान पीढ़ी के साथ ही ये विस्मृत हो जाएँगी।  
    इस संकलन में झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार की कथाओं को शामिल किया गया है। इन्हें पाठकों की सुविधा के लिए 12 खंडों में विभाजित किया गया है। पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित खंड में आदिवासी समूहों व समाजों में मौजूद आस्थाओं, विश्वासों व उनकी अपनी-अपनी अवधारणाओं पर आधारित लोककथाएँ शामिल की गई हैं।
    ‘पशु-पक्षी और जलचर खंड’ में संताली की ‘छोटी चिड़िया की कथा’ में छोटी चिड़िया की वीरोचित कथा का संवाद सुनकर मानव में एक संदेश पहुँचता है कि कैसे एक छोटी चिड़िया भी एक अन्यायी एवं अहंकार से भरे हाथी का दर्प-दलन कर सकती है। यह साहस तभी जुटने लगता है, जब कोई व्यक्ति अथवा प्राणी सत्य-पथ पर चलकर किसी अत्याचारी के विरुद्ध अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति एवं संकल्प के साथ सामना करने के लिए तैयार हो। इस खंड में मानव और अन्य जीवों के बीच भावनात्मक संबंधों की प्रेरणादायक कथाएँ संकलित हैं। 
    इसके अलावा ‘प्रेम-कथा’, ‘विवाह, गोत्र और रीति- रिवाज’, ‘रिश्तों का सच’, ‘कायांतरण’ और ‘लोकजन्य कथाएँ’ खंड की मिथ कथाओं में स्वैरागात्मक व संवेदनाओं, सामाजिक गतिविधियों के उद्भव व विकास, प्रकृति के सहयोग व संवाद और मनुष्य की विभिन्न अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
  • Doobte Waqt (Paperback)
    Dixit Dankauri
    200 160

    Item Code: #KGP-7053

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।
    -मोईन अख्तर अंसारी
  • Premchand Ki Shresth Kahaniyan
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-7801

    Availability: In stock

    यद्यपि प्रेमचंद ने नाटक, जीवनी, अनुवाद, निबंध तथा बाल-साहित्य की रचना भी की किंतु उनकी अक्षय कीर्ति का आधर उनके उपन्यास और कहानियां ही हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूति, काया-कल्प, गबन, कर्मभूमि तथा गोदान जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों एवं प्रायः तीन सौ कहानियों की रचना कर अपने को अमर करने वाले प्रेमचंद की गुल्ली-डंडा, नमक का दारोगा, प्रेरणा, दो बैलों की कथा, मंदिर, ईश्वरीय न्याय, सवा सेर गेहूं, रामलीला, पूस की रात, महातीर्थ, जुलूस, पशु से मनुष्य, दुस्साहस, आत्माराम, नशा, गृह-दाह आदि लोकप्रिय कहानियां हैं। प्रेमचंद ने अपने समय और समाज के ज्वलंन प्रश्नों को अपनी कहानियों के माध्यम से चित्रित किया है। ग्रामीण जीवन-परिवेश और पात्रों का इतना जीवंत चित्रण करने वाला कथाकार हिंदी में तो क्या अन्य भारतीय भाषाओं में भी कदाचित् ही कोई हुआ हो। यही कारण है कि वे उस समय के सर्वप्रमुख भारतीय कथाकार हैं। विद्वानों ने बीसवीं शती के विश्व-साहितय के तीन बड़े शीर्ष कथाकारों में प्रेमचंद की गणना की है।
  • Nepathya Se
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9117

    Availability: In stock

    इस पुस्तक का प्रारंभ एक आत्मनिबंध-सी लगने वाली रचना से होता है और उपसंहार एक ऐसे पत्र-संवाद से, जो दरअसल समूची पुस्तक में अंतव्र्याप्त विषयवस्तु से ही संबद्ध विचारों का वाद्य-वृंद अथवा ‘ड्रामा’ है। इस तरह यह एक ओर मेरे विशुद्ध व्यक्ति-व्यंजक निबंध-संग्रहों ‘रचना के बदले’, ‘आडू का पेड़’ और ‘शैतान के बहाने’ से और दूसरी ओर मेरे वैचारिक निबंध-संकलनों ‘सबद निरंतर’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ तथा ‘स्वाधीन इस देश में’ से जुड़ता है; हालांकि है यह कुल मिलाकर वैचारिक निबंधों का संग्रह ही। पाठक लक्ष्य करेंगे कि विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जिसे कहा जाता है, उससे भिनन कोटि का उपक्रम होते हुए भी यह लेखन ‘आलोचना’ को हर जगह स्पर्श करता चलता है अलगपन इसमें यह, कि आलोचना का यह स्वर संस्कृति के व्यापक सरोकारों का, कहंे कि एक तरह की सभ्यता-समीक्षा का स्वर है।
    पिछले तीन-चार बरसों के दौरान लिखे गए इन निबंधों में सुधी पाठक को कुछ न कुछ तारतम्य और पूर्वापर-संबंध की प्रतीति भी अवश्य होगी जो इनके पुस्तकाकार प्रकाशन को संकलन की तरह ही नहीं, अंतग्र्रथित गं्रथ के रूप में भी यथेष्ट औचित्य प्रदान करती है। इस अवसर पर लेखक उन समस्त संस्थाओं और पत्रिकाओं के प्रति आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता है, जिन्होंने इन निबंधों को प्रेरित या प्रकाशित किया।
    —रमेशचंद्र शाह
  • Godhooli (Paperback)
    Bhairppa
    150

    Item Code: #KGP-1414

    Availability: In stock

    गोधूलि
    ‘वंशवृक्ष’, ‘उल्लंघन’ तथा ‘पर्व’ जैसे महान् उपन्यासों के यशस्वी कृतिकार श्री भैरप्पा के श्रेष्ठतम उपन्यासों में है—‘गोधूलि’। कर्नाटक के ग्रामीण अंचल के माध्यम से भैरप्पा ने भारतीय अस्मिता की पहचान को ‘गोधूलि’ में सांस्कारिक गौरव के साथ उभारा है।
    प्रामाणिकता के साथ निर्लिप्तता भैरप्पा के लेखन की विशेषता है, जो ‘गोधूलि’ में उभरकर सामने आई है। ‘गोधूलि’ के कई संस्करण कन्नड़ में निकल चुके हैं। कन्नड़ तथा हिंदी में यह उपन्यास फिल्माया भी जा चुका है।
    गोधूलि’ जीवन के प्रति आस्था और मूल्यों के संघर्ष का संकेत है।
  • Naajaayaz
    Salam Azaad
    100 90

    Item Code: #KGP-1827

    Availability: In stock

    नाजायज
    भारतीय मुसलमानों की परवर्ती पीढ़ी, जिसकी आबादी बाँग्लादेश की कूल जनसंख्या से लगभग दुगनी है, कैसे अपना जीवन जी रही है ? खास तौर पर भारत की मुस्लिम महिलाएँ, जो शरा के क्रानून की चक्की में हर पल घिसती रहती हैं, क्योंकि 'भारत के मुस्लिम नेताओं ने शरीयत से जुड़े कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बहाने इस देश की मुस्लिम महिलाओं को मध्य युग के घुप्प अँधेरे में बंद कर रखा है ।
    लगातार तीन वर्ष तक दिल्ली में निर्वासित जीवनयापन के दौरान इन मुस्लिम महिलाओं के प्रति इस घोर अमानवीय और शरा कानून की दुहाई देकर मुल्लाओं द्वारा ढाए गए इन जुल्मों को सलाम आजाद ने बहुत नज़दीक से देखा है । उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान दिल्ली ही नहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, केरल, पश्चिम बंग और कश्मीर के साथ अन्यान्य प्रदेशों में इस भयावहता को महसूस किया है। उन्होंने यह भी पाया है कि इस्लाम के नाम पर इन तमाम इलाकों की मुस्लिम महिलाएँ पुरुषशासित समाज-व्यवस्था द्वारा कितनी विषम वंचनाओं और यंत्रणाओं की शिकार है । पति के क्रोध और उत्तेज़ना के चलते स्त्री को तलाक कहने पर इस्लाम द्वारा तलाक को भले ही स्वीकृति नहीं मिली हो, लेकिन भारत का शरापसंद मुस्लिम समाज इसे तलाक के तोर पर मानने को मजबूर करता है । इस्लाम और मानवाधिकारवादी इस तलाक के समय स्त्री यदि गर्भवती हो तो जन्म-ग्रहण के बाद उस संतान को वैध नहीं माना जाता है।  उस निष्पाप, निष्कलंक मानव शिशु को 'नाजायज़' ठहराया जाता है ।
    भारत के मुसलमानों को केंद्र में रखकर इस समस्या पर छिटपुट लेखादि अवश्य प्रकाशित हुए है, लेकिन अपनी अच्छी देखकर और 'फील्ड वर्क' को आधार बनाकर 'नाजायज' जैसे विषय पर एक पूरी पुस्तक लिखने की परिकल्पना पहली बार बाँग्लादेश के इस लेखक द्वारा हुई है ।

  • Anmol Vichar
    A.W.I.C.
    300 225

    Item Code: #Kgp-av

    Availability: In stock


  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Mori Ki Int
    Madan Dikshit
    150 135

    Item Code: #KGP-9073

    Availability: In stock


  • Manikin Aur Anya Kahaniyan
    Gouri Shankar Raina
    200 160

    Item Code: #KGP-MKAAK

    Availability: In stock

    आधुनिक संवेदना की अलग-अलग मिज़ाज की इन कहानियों में मानवीय स्थिति की सच्चाइयों को विषय-भूमि बनाकर जीवन की विभिन्न स्थितियों में व्यक्ति की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं की प्रस्तुति की गई है। मानवीय संबंधों के संक्रमित यथार्थ को पकड़ने की कोशिश भी इन कथाओं में नज़र आती है। कहीं-कहीं ये तीखे रंगों के साथ उपस्थित होती हैं और कथा-दृष्टि के नए धरातल उभरते दिखाई देते हैं।

    कथाकार ने कहानी-लेखन की अपनी यात्रा में सभी मंज़िलें खुद चलकर तय की हैं और अपनी कुछ कहानियों को अन्य भाषाओं में विशेषकर जर्मन (यू टर्न), स्पानी (हाइवे), तेगु मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी तथा उर्दू में अनूदित होकर मुख़्तलिफ़ समाजों के विभिन्न पाठकों तक जाने दी है।

    आलोचकों का मानना है कि गौरीशंकर रैणा आधुनिक जीवन का एक प्रामाणिक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं और एक किस्सागो का रचना-व्यक्तित्व उनकी कहानियों से उभरता है।

  • Helen Keller
    Vinod Kumar Mishra
    350 315

    Item Code: #KGP-240

    Availability: In stock


  • Teen Taal
    Sanjay Kundan
    335 302

    Item Code: #KGP-9340

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध कथाकार संजय कुंदन का नवीनतम उपन्यास तीन ताल समकालीन यथार्थ को उसके समुचित कद में चित्रित करती रचना है। संजय अपने लेखन में जनप्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। व्यवस्था और सत्ता के अंतर्विरोध वे कलात्मक कुशलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं।
    ‘तीन ताल’ के केंद्र में तीन चरित्रा हैं—सुमित, पारुल और अभिषेक। उनमें मित्राता की अद्भुत लय है। सुमित पत्रकारिता के संकटों का सामना कर रहा है, पारुल अपनी सार्थकता हासिल करने के लिए छटपटा रही है और अभिषेक एक बड़ी कंपनी में काम करते हुए पाखंड का नग्न रूप देख रहा है। इन व्यक्तियों, संघर्षों के साथ देश-समाज की ज्वलंत समस्याएं गुंथी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार। इसने राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति को पंगु-सा कर दिया है। संजय एक स्थान पर लिखते हैं—‘लड़ाइयां चल रही थीं। छोटी-बड़ी कितनी लड़ाइयां। हो सकता है ये सब मिलकर एक दिन बड़ी लड़ाई का रूप ले लें। इसलिए संघर्ष रुकना नहीं चाहिए।’ क्योंकि तभी ‘नीला निरभ्र आकाश’ और ‘एक महीन चंपई-सी रेखा’ दिखने की संभावना निर्मित हो सकती है।
    यह उपन्यास रोचक कथानक के साथ कई जरूरी सवालों से भी गुजरता है। ध्वस्त होती पत्रकारिता, इंटेलेक्चुअल दलाल, भीषण बेरोजगारी, एनजीओ की लूटपाट, जनजागरूकता और काॅमर्स के बीच मारक संघर्ष, स्त्राी-पुरुष संबंधों का तनाव, योग्यता की उपेक्षा...आदि-इत्यादि। सवालों के साथ समाधन के लिए उठ खड़ा एक जन आंदोलन भी है, जिसकी अगुआई ‘छोटे गांधी’ ने की। एक हालिया इतिहास भी इस रचना में दर्ज है।
    संजय कुंदन सच को सूक्तियों में बयान करते हैं। जैसे—‘अब नौकरी का अर्थ है व्यक्ति का अनुकूलन बाजार के प्रति।’ ऐसे ही यथार्थ का मुकाबला करने के लिए ‘तीन ताल’ नाट्यदल का गठन होता है। उद्देश्य है जनजागरण। क्योंकि भविष्य संकटों से घिरा है। उपन्यासकार लिखता है—‘मुझे तो डर है कि एक दिन सब कुछ काॅरपोरेट के हाथ में हो जाएगा।’ इसलिए चेतना में ‘नवगति नवलय ताल छंद नव’ की आवश्यकता है। यानी, एक नया स्वप्न!
    ‘तीन ताल’ एक नए स्वप्न की शुरुआत है।
  • Kab Tak Pukarun
    Shanta Kumar
    200 180

    Item Code: #KGP-9335

    Availability: In stock

    ‘कब तक पुकारूं’ शान्ता कुमार और संतोष शैलजा की कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियों का संग्रह है। हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां पति व पत्नी दोनों लेखक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। जैसे—धर्मवीर भारती-पुष्पा भारती, राजेन्द्र यादव-मन्नू भंडारी, रवीन्द्र कालिया-ममता कालिया। इसी क्रम में शान्ता कुमार और संतोष शैलजा का नाम भी लिया जाना चाहिए। दोनों अत्यंत संवेदनशील, विचारवान और अभिव्यक्ति-निपुण रचनाकार हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियों को पढ़कर इस बात की तसदीक की जा सकती है।
    ये कहानियां विषयवस्तु की दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध हैं। आधुनिक समाज की विसंगतियों से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-ध्रुवस्वामिनी व नेपोलियन के कथासूत्रों तक रचनाओं का विस्तार है। लेखकद्वय ने मानवता के दृष्टिकोण से कथा-स्थितियों और चरित्रों को विस्तार दिया है। उदाहरण के लिए ‘गोल दायरा’ में नेपोलियन विश्वमानवता एवं सृष्टि-सत्य को उपेक्षित करने के कारण ‘सेंट हेलना’ द्वीप में अंतिम सांस लेने के लिए विवश हुआ था। ‘समर्पण’ में ‘भामति टीकाकार’ वाचस्पति और भामति का अद्भुत दांपत्य मन को छू लेता है। ‘बेतवा की लहरें’, ‘कलाई’, ‘ज्योतिर्मयी’ और ‘जरी-पटका’ कहानियां इतिहास-रस से आप्लावित हैं। ‘कलाई’ की भाषा विशेषतः उल्लेखनीय है—‘प्रकाश की धीमी लौ में ध्रुवस्वामिनी की मानिनी आकृति दमक रही थी। इस साहस व दृढ़ता ने उसके सौंदर्य को सौ गुना बढ़ा दिया था।’
    लेखकद्वय मानव मनोविज्ञान के गहरे पारखी हैं। अपनी-अपनी कहानियों में उन्होंने यह सिद्ध भी किया है। ‘जब फूल खिल उठे’ कहानी वैसे तो एक मीठी प्रेम कहानी है, मगर इसमें घर के बच्चों का मनोविज्ञान सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। इस संग्रह की कुछ रचनाएं अतीत को वर्तमान संदर्भों में देखते हुए विकसित हुई हैं। ‘न्यू सीता’ में स्त्राी जीवन का एक नया आयाम है जो पौराणिक सीता से जुदा है। ‘रज्जो काकी’ भी स्त्राी विमर्श का एक मार्मिक पक्ष है।
    समग्रतः यह कहानी संग्रह दो उत्कृष्ट रचनाकारों की रचनाओं से समृद्ध है। इसे पढ़ते हुए संवेदना, विचार और इतिहास के अनेक पक्ष झिलमिलाने लगते हैं।
  • Rangon Ki Gandh-1
    Govind Mishra
    530 477

    Item Code: #KGP-9160

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • In Dinon
    Vinita Gupta
    60

    Item Code: #KGP-1909

    Availability: In stock

    इन दिनों
    ग़ज़लों में छन्द का अनुशासन काकी दूर तक दिखाई देता है । इसके साथ-साथ ग़ज़ल के मुहावरे, व्याकरण, अंदाज़े-बयां, भाषा और विभिन्न बहरों को भी अपने जीवनानुभव तथा अभ्यास से उपलब्ध करने की सफ़ल कोशिश है । ग़ज़लों में एक ओर व्यक्तिगत अनुभूतियों तथा राग-विराग की स्थितियों के प्रस्तुति है तो दूसरी ओर समष्टिगत वेदनाएं, व्यथाएँ भी अंकित हुई हैं। विनीता के पास हिन्दी मुहावरे और शब्दावली का भण्डार तो है ही, उर्दू का रंग भी देखने को मिलता है । हिंदी, उर्दू के सहीं अनुपात ने इन ग़ज़लों को और भी निखार दिया है ।
  • Dr. Ambedkar Jeevan Ke Antim Kuchh Varsh
    Nanak Chand Rattu
    500 450

    Item Code: #KGP-9187

    Availability: In stock

    ‘डाॅ. अम्बेदकर: जीवन के अंतिम कुछ वर्ष’ पुस्तक डाॅ. अम्बेदकर के जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं का उद्घाटन करती है। इस देश के राजनीतिक चरित्र में गत कुछ वर्षों से उल्लेखनीय परिवर्तन आ रहा है। लोकतंत्र की अवधारणा और उसकी स्वीकृति ने समाज के उन वर्गों को भी देश की राजनीति में वह पहचान देनी प्रारंभ कर दी है, जिससे वे सदा वंचित रहे। जिसके संबंध में जब भी उन्होंने छोटे-मोटे प्रयास किए, वे बुरी तरह दुत्कार दिए गए। आज ऐसे वर्गों ने न केवल अपनी अस्मिता स्थापित की है, अपने आप को सत्ता का सक्रिय भागीदार भी बना लिया है।
    इन सभी उपलब्ध्यिों का बहुत बड़ा श्रेय डाॅ. बाबा साहेब अम्बेदकर की प्रतिभा और उनके जीवनपर्यंत के अथक प्रयसों को दिया जा सकता है।
    डाॅ. अम्बेदकर के अंतिम वर्ष एक ओर उनक जीवन के अत्यंत निर्णायक वर्ष थे, दूसरी ओर उनके गिरते हुए स्वास्थ्य और उनके चारों ओर की संदेहात्मक स्थितियों की छाया भी उन वर्षों पर छाई हुई थी। इसलिए यह पुस्तक डाॅ. अम्बेदकर के जीवन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई है।
  • Samrat Ashok
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-250

    Availability: In stock


  • Apajas Apne Naam
    Ram Kumar Krishak
    190 171

    Item Code: #KGP-1895

    Availability: In stock

    कवि केदारनाथ अग्रवाल ने एक बार मुझसे कहा था—'जब लोग पैसे कमा रहे थे, तब मैं बदनामी कमा रहा था। ' ठीक यहीं भावार्थ देता है कृषक का यह नया ग़ज़ल-संग्रह—'अपजस अपने नाम' । केदार जी की 'बदनामी' और कृषक जी का 'अपजस' क्या है? रचना की खेती करनेवालों और रचना-कर्म में जीवन होमनेवालों को 'दुनियादार लोग' बेकार ही तो समझते है । कबीर और उनके समकालीनों के प्रति भी धन्नासेठों और श्रीमती का यही रवैया था।
    कृषक जी का साहित्य और उनका जीवन एक-दूजे से अलग नहीं है, इसीलिए उनकी ग़ज़लें विश्वसनीय हैं । उनमें वर्णित सच किसी भी तरह की पॉलिमिक्स नहीं है । तरह-तरह के अभावों में जीते, धारा के विरुद्ध संघर्ष करते उन्होंने एक लंबी और बहुस्तरीय रचना-यात्रा की है, जिसमें हमेशा ही उनके कथ्य ने नई और माकूल भाषा बरती है ।
    वर्तमान सामाजिक जीवन में व्यवस्थाजन्य अनेक जहरीली गुत्थियाँ हैं,  जिन्हें खोलते-खोलते रचनाकार बार-बार हँसा जाता है, लेकिन मरता नहीं और आत्यंतिक सच सामने रख देता है । सच कहने के एवज में हर युग, हर समय में कवियों-कलाकारों-विचारकों-जननायकों को अपार कष्ट झेलना पडा, लेकिन वे न झुके, न टूटे । यही कारण है कि कृषक जी की ग़ज़लें हमारे समय के रोज पैदा होनेवाले यक्ष प्रश्नों से गुत्थमगुत्था हैं। वे कहीं संकेतों में अपनी बात कहते है, कहीं सीधे-सीधे ।
    दरअसल कृषक उन कवियों में नहीं है, जो रचना और आलोचना के बने-बनाए खाँचों और ठप्पो में फिट बैठते हों। जन-प्रतिबद्ध कोई कवि ऐसा हो भी नहीं सकता। वे एक सजग और निडर सामाजिक कवि है । कवियों की उस जमात से कत्तई अलग, जहाँ सब कुछ ज़गमग-ज़गमग होता है। इसीलिए उनके यहीं अनुपयोगी सजावट, पच्चीकारी या कला-कोविदी नहीं है। इसीलिए वे 'अदबी नसीहतों' पर कुर्बान नहीं होते, बल्कि न्याय और इंसानियत के लिए लड़ रही जनता पर कुर्बान होते हैं ।
    उम्मीद है, 'नीम की पतियां' के बाद कृषक जी का यह ग़ज़ल-संग्रह पाठकों को ज़रूर कुछ नया देगा ।
    -कुबेरदत्त
  • Face Your Fears (Paperback)
    David Tolin
    245

    Item Code: #KGP-356

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • She (Paperback)
    Dixy Gandhi
    245 221

    Item Code: #KGP-332

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times

    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.
  • Zindagi Aur Jugaar
    Manohar Puri
    250 225

    Item Code: #KGP-9025

    Availability: In stock

    जिन्दगी और जुगाड़
    आपाधापी के इस युग में व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जुगाड़ का सहारा लेना ही पड़ रहा है। व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में कोई भी गतिविधि बिना जुगाड़ के संपन्न करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि शैक्षणिक जीवन भी जुगाड़ पर निर्भर होकर रह गया है। हर एक व्यक्ति दिन-भर किसी न किसी प्रकार से जुगाड़ करके अपने जीवन की गाड़ी को धकेलने का प्रयास कर रहा है। उसके चौबीसों घंटे किसी न किसी प्रकार का जुगाड़ करने में ही व्यतीत होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और अन्य सभी गतिविधियां जुगाड़ के बिना निरर्थक हैं। जिन्दगी का कोई पक्ष जुगाड़ से अछूता नहीं रहा, इसका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को प्रत्येक कदम पर होता है।
    इस उपन्यास में जीवन के कुछ ही पक्षों को छूना संभव हो पाया है। रोजमर्रा का पारिवारिक जीवन, हमारे परस्पर संबंध, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन, समाज में निरंतर फैलता भ्रष्टाचार, नशे की दुनिया में डूबती हमारी नई पीढ़ी, धन की अंधाधुंध दौड़ के मोहजाल में फंसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी से जल्दी वह सब प्राप्त कर लेना चाहती है, जो उसे वर्षों के परिश्रम के बाद भी ईमानदारी से मिलना संभव नहीं दिखाई देता। इसके लिए शॉर्टकट जरूरी है और यही शॉर्टकट जुगाड़ का मकड़जाल है। एक बार इसमें फंसा व्यक्ति लाख सिर पटक ले, इससे बाहर नहीं निकल पाता।
    इस उपन्यास में विश्वविद्यालयों में पनपते माफिया गिरोह और देह-व्यापार, अस्पतालों से होती मानव-अंगों की व्यापक स्तर पर तस्करी और राजनीति में लगातार पनप रहे भ्रष्ट गठजोड़ सरीखे कुछ पक्षों को ही मात्र छुआ जा सका है। ये समाज में फलने-फूलने वाले कैंसर की एक बानगी मात्र हैं। आप स्वयं इससे कहीं अधिक जानते हैं और प्रतिदिन उसे भोगने को अभिशप्त हैं। समाज के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग ने इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर विरोध का एक स्वर भी उछाला तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। हां, इतना निश्चित है, जितना इसमें लिखा गया है, हालत उससे कहीं अधिक गंभीर है। समय रहते जाग जाना बहुत जरूरी है। जागो, कहीं बहुत देर न हो जाए।    
  • Premchand Kee Kahaniyon Kaa Kaalkramanusar Adhyayan
    Kamal Kishore Goyenka
    1100 990

    Item Code: #KGP-671

    Availability: In stock

    प्रेमचंद पराधीन भारत के स्वाधीनताकामी कालजयी कहानीकार हैं। वे विराट् भारतीय जीवन के महागाथाकार हैं तथा उनकी कथा-सृष्टि में महाकाव्यीय चेतना है। वे भारत राष्ट्र एवं स्वराज्य, भारतीय विवेक एवं अस्मिता तथा भारतीय चेतना एवं भारतीयता के कथाकार हैं। प्रेमचंद कथाकार के रूप में वाल्मीकि, व्यास, तुलसीदास, कबीर, भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में आते हैं। ये देश के ऐसे राष्ट्रीय साहित्यकार हैं, जिन्होंने उच्च कोटि के मानवीय जीवन-मूल्यों, आत्म-बोध, स्वत्व तथा अस्मिता की प्रतिष्ठा तथा रक्षा करके भारतीयता को स्वरूप प्रदान करके उसे भारत की आत्मा के रूप में सदैव के लिए प्रतिष्ठित कर दिया। प्रेमचंद का कहानीकार इसी भारतीयता का अन्वेषक, उद्घोषक तथा प्रस्थापक है। प्रेमचंद की कहानी-यात्रा में प्रमुखतः राष्ट्रीय-सांस्कृतिक नवजागरण, गांधीवाद, कभी-कभी माकर्स का साम्यवाद, भारत का अद्वैत-दर्शन इत्यादि उनकी इस यात्रा को अपनी-अपनी दर्शन-दृष्टि के अनुसार आलोकित करते हैं, परंतु प्रेमचंद सभी को अपने भारतीय भाव एवं विवेक से देखते और ग्रहण करते हैं और देश-संस्कृति-मानवता के अनुकूल तत्त्वों को ग्रहण करके अपनी भारतीयता में संग्रथित-संश्लिष्ट करके पराधीन भारत को मुक्ति का एक संदेश तथा एक स्वप्न देते हैं। प्रेमचंद की कालक्रमानुसार कहानी-यात्रा को इस पुस्तक में इसी दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया है। यदि हम भारत को ‘इंडिया’ के स्थान पर ‘भारत’ बनाए रखना चाहते हैं तो प्रेमचंद के कहानी-संसार की मूल आत्मा भारतीयता को अपने राष्ट्रीय-सांस्कृतिक जीवन का अंग बनाना होगा।
    प्रेमचंद की कहानियों के कालक्रमानुसार अध्ययन का यह पहला प्रयास है। इससे पूर्व किसी आलोचक ने न तो इस दृष्टि से सोचा है और न कहानियों को कालक्रम में पढ़ने तथा परखने की ही चेष्टा की है। 
    यहां तक कि हिंदी का कोई आलोचक यह दावा नहीं कर सकता कि उसने प्रेमचंद की कहानियों पर जो कुछ लिखा है, वह उनकी संपूर्ण कहानियों के अध्ययन के बाद ही लिखा है। जिन आलोचकों ने ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों की कहानियों को अध्ययन का आधार बनाया है, वे भी उनमें संकलित 203 कहानियों तक ही सीमित रहे हैं और लगभग 95 कहानियां उनकी पकड़ से बाहर रही हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों में भी कहानियां कालक्रमानुसार संकलित नहीं हैं, अतः किसी भी आलोचक के कालक्रम से कहानियों के अध्ययन की कोई संभावना भी नहीं रह गई थी। अतः कहानियों पर दिए गए उनके निष्कर्ष एवं आलोचनात्मक अवधरणाएं भी निर्मूल, निरर्थक तथा भ्रमोत्पादक बनकर रह जाती हैं।
    ‘प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन’—यह पहला प्रामाणिक अध्ययन है, जो प्रत्येक कहानी को कालक्रम में देखता और परखता है तथा कहानी के पूर्वापर संबंधें के रहस्यों को भी उद्घाटित करता है। कोई भी कहानी हो, श्रेष्ठ या साधरण, अच्छी या बुरी, उसे इस अध्ययन में समान रूप से महत्त्व दिया गया है और कहानी की संवेदना, उसकी आत्मा तथा लेखकीय दृष्टिकोण का विवेचन किया गया है और इस प्रकार उनकी उपलब्ध 298 कहानियों की रचना-प्रक्रिया, उनकी मूल चेतना, उनके युग-संदर्भ तथा लेखकीय अभिप्रेत की, कहानी के पाठ के आधार पर, समीक्षा की गई है तथा पुरानी मान्यताओं की परीक्षा के साथ कुछ नई अवधारणाएं स्थापित की गई हैं, किंतु यह काम प्रमाणों तथा तथ्यों एवं तर्कों के आधर पर किया गया है।...
    अतः मेरा विश्वास है कि यह अध्ययन पाठकों को एक नए प्रेमचंद से परिचित कराएगा, जिसे इससे पूर्व न तो खोजा गया था, न देखा गया था, बल्कि उसे दबा दिया गया था।
    –भूमिका से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    200 180

    Item Code: #KGP-0001

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बाबू', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vish-Beej
    Suryakant Nagar
    75 68

    Item Code: #KGP-1936

    Availability: In stock


  • Sabha Parv
    Badiuzamma
    300 270

    Item Code: #KGP-2040

    Availability: In stock

    सभापर्व 
    जो कहानी महाभारत के 'सभापर्व' से शुरू हुई वह आज भी पूरी नहीं हुई । छोटे-से शहर गया के एक मोहल्ले से शुरू होकर ये उपन्यास इतिहास का सैकडों साल का सफर तय करता है-वह इतिहास जो न चाहते हुए भी हममें जिदा है और हमारे दिले-दिमाग पर हावी है ; वह इतिहास जो बजाहिर तो बदलता है लेकिन दरअसल सिर्फ अपने-आप को दोहराता है । सतह के नीचे सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि था । धर्म बदले, सिद्धान्त बदले, सत्ता के लिए जद्दोजहद के तरीके बदले लेकिन सत्ता का बुनियादी स्वरूप नही बदला । बनी हाशिम-बनी उमय्या; शीया-सुन्नी, हिन्दू-मुस्लिम, बौद्धधर्म-ब्राह्यणवाद…संघर्ष के मुखोटे बदलते रहते हैं, इंसानी प्रवृत्ति नहीं बदलती । सैकडों साल के सफ़र के दौरान ये उपन्यास समाज के विभिन्न वर्गों का एक जायजा लेता है । घर, कबीले और मुल्क के नक़्शे, और इंसानी ताल्लुकात का बनना- बिगडना न बदलने वाली मानसिकता की पहचान है । यह ऐसी मानसिकता है जिससे हजार साल की नफ़रत, लगाव, तजूर्बात परत-दर-परत जिन्दा हैं ।  इसमें श्रीकृष्ण के कालिय दमन, महात्मा बुद्ध की धर्म विजय और सूफियों के चमत्कार-सब की याद बाकी है । 'सभापर्व' इसी मानसिकता की खोज और पहचान है ।
  • Saundarya-Meemansa
    V.K. Gokak
    90 81

    Item Code: #KGP-9126

    Availability: In stock

    "सौंदर्य-मीमांसा" कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक डॉ० वी० के० गोकाक की कन्नड़ कृति 'काव्य-मीमांसे' का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में सौंदर्यशास्त्र पर यह अपने ढंग की पुस्तक होगी ओर निश्चय ही मोंदृवंशद्रस्व के अध्येताओं को इस पुस्तक से काफी सहायता मिलेगी । गोकाक ने विशेष भाषण-माला के अन्तर्गत सौंदर्यशास्त्र पर भाषण दिए थे । 'कला-स्वरूप', 'ध्वनि तथा प्रतिध्वनि', 'रस या जीवन-दृष्टि'–इन लेखों में लेखक ने भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना त्तत्वों के आधार पर विचार करके अपने मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । डॉ. गोकाक स्वयं कन्नड़ और अंग्रेजी के कवि, उपन्यासकार और श्रेष्ठ आलोचक हैं। गोकाक के पास जीवन का व्यापक अनुभव और अंग्रेजी साहित्य का अपार पांडित्य है । दार्शनिक मनोवृति से वस्तु को तटस्थ दृष्टि से देखकर उसके सत्य को परखने की जिज्ञासा उनमें है । इन लेखों में उन्होंने साहित्या, कला, धर्म के  तत्यों के आराधक होकर सौंदर्य के तत्तवों का साक्षात्कार किया है। नि:संदेह यह कृति भारतीय काव्यशास्त्र को लेखक की अमूल्य देन है। इस अनुवाद में यदि त्रुटियाँ मिल जाएँ तो समझिए यह मेरी कमजोरी है ।
    डॉ. टी. आर० भट्ट

  • Manch Andhere Mein
    Narendra Mohan
    120 108

    Item Code: #KGP-1915

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Bhakt Soordas
    Chandrika Prasad Sharma
    190 171

    Item Code: #KGP-140

    Availability: In stock


  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan : Taatvik Vivechan (Paperback)
    Jayanti Prasad Nautiyal
    60

    Item Code: #KGP-7029

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है ।
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • Jalvayu Aur Mausam
    Dr. S. Kahsyap
    80 72

    Item Code: #KGP-9293

    Availability: In stock

    मौसम का मानव के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मौसम के तापमान का प्रभाव उसके शरीर पर पड़ता है। गर्म वातावरण में मनुष्य की समस्या शीतलन को इस प्रकार बनाए रखने की होती है कि वह आरामदायक हो। ठंडी जलवायु में शरीर को गर्म रखना, गर्म जलवायु में उसे उपयुक्त रूप से शीतल रखने की अपेक्षा अधिक आसान होता है।
    जलवायु विज्ञान के अध्ययन में प्रमुख रुचि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्यों पर होती है जो जीवन के प्राकृतिक वातावरण के तत्वों के रूप में पाए जाते हैं। इन तथ्यों के पीछे छिपे हुए भौतिक कारणों का निरीक्षण भी अध्ययन का एक बहुमूल्य एवं रोचक विषय है, परंतु इसको एक अधीन विषय के रूप में ही मानना चाहिए। जलवायु विज्ञान इस प्रकार से मौसम विज्ञान से भिन्न है क्योंकि मौसम विज्ञान एक ऐसा भौतिक विज्ञान है जो मूल रूप से उन भौतिक प्रक्रमों से संबंधित है, जो वायुमंडल में पृथ्वी की सतह से ऊपर स्तर तक चलते रहते हैं।
  • Jo Nahin Hai
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-1899

    Availability: In stock

    जो नहीं है
    यह मृत्यु और अनुपस्थिति की एक अद्वितीय पुस्तक है । राग और विराग का पारंपरिक द्वैत यहाँ समाप्त है । अवसाद और आसक्ति पडोसी है । यह जीवन से विरक्ति की नहीं, अनुरक्ति की पोथी है ।  मृत्यु मनुष्य का एक चिरन्तन सरोकार है और चूँकि कविता मनुष्य के बुनियादी सरोकारों को हर समय में खोज़ती-सहेजतो है, वह आदिकाल से एक स्थायी कवियमय भी है ।   विचार- शीलता और गहरी ऐन्द्रियता के साथ अशोक वाजपेयी ने  अपनी कविता में वह एकान्त खोजा-रचा है जिसमें मनुष्य का यह चरम प्रश्न हमारे समय के अनुरूप सघन मार्मिकता और बेचैनी के साथ विन्यस्त हुआ है
    यहाँ मृत्यु या अनुपस्थिति कोई दार्शनिक प्रत्यय न होकर उपस्थिति है । वह नश्वरता की ठोस सचाई का अधिग्रहण करते हुए अनश्वरता का सपना देखने वाली कविता है-अपने गहरे अवसाद के बावजूद वह जीने से विरत नहीं करती । बल्कि उस पर मँडराती नश्वरता की छाया जीने की प्रक्रिया को अधिक समुत्सुक और उत्कट करती चलती है
    दैनन्दिन जीवन से लेकर भारतीय मिथ के अनेक बिम्बो और छवियों को अशोक वाजपेयी ने मृत्यु को समझने-सहने  की युक्तियों के रूप में इस्तेमाल किया है । उनकी गीति-सम्वेदना यहाँ महाकाव्यात्मक आकाश को चरितार्थ करती है और उन्हें फिर एक रूढ हो गये द्वैत से अलग एक संग्रथित और परिपक्व कवि सिद्ध करती है
    यहीं किसी तरह की बेझिलता और दुर्बोधता नहीं, पारदर्शी लेकिन ऐंद्रिक चिंतन है, कविता सोचती-विचारती है पर अपनी ही ऐंद्रिक प्रक्रिया से । 
  • Shankhnaad
    Raj Budhiraja
    140 126

    Item Code: #KGP-118

    Availability: In stock

    शंखनाद
    "गांधी जी अगर राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे । महर्षि जी हमारी राष्ट्रीय  प्रवृत्ति और स्वाधीनता आंदोलन के आद्य-प्रवर्तक थे। गांधी जी उन्हीं के पदचिन्हों  पर चले । यदि महर्षि हमें मार्ग न दिखाते तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान हो जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता।" —अनंतशायनम् आयंगर
    "महर्षि दयानंद भारतमाता के उन प्रसिद्ध और उच्च आत्माओं में से थे, जिनका नाम संसार के इतिहास से सदैव चमकते हुए सितारों की तरह प्रकाशित रहेगा । वे भारतमाता के उन सपूतों में से हैं, जिनके व्यक्तित्व पर जितना भी अभिमान किया जाए थोड़ा है ।  नेपोलियन और सिकंदर जैसे अनेक सम्राट एवं विजेता संसार में हो चूके है, परंतु स्वामी जी उन सबसे बढ़कर थे ।" —खदीजा बेगम
    “बहुत-से लोग महर्षि दयानंद को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं, परंतु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेश प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान और स्वराज्य की घोषणा—यह सब बहुत पहले से देश को दिया है ।" —विट्ठलभाई पटेल
  • Kuch Lekh Kuch Bhashan (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    250 200

    Item Code: #KGP-7025

    Availability: In stock


  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Atal Bihari Vajpayee
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj (Paperback)
    Rituraaj
    80

    Item Code: #KGP-1236

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही है । बहुराष्ट्रीय  निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे है और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है। वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कप दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते है और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Krantikari
    Roshan Premyogi
    260 234

    Item Code: #KGP-1943

    Availability: In stock

    क्रांतिकारी
    दलित परिवार में जन्म लेने के कारण सामाजिक अस्पृश्यता और उत्पीड़न का दंश मैंने भी सहा है, इसलिए ‘क्रांतिकारी’ को पढ़ते हुए यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा कि जिस तरह इस उपन्यास में चंद्रशेखर और केवलानंद जैसे सचेत सवर्ण लड़के दलित रामकरन के साथ खड़े हैं, मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हुए ?
    चंद्रशेखर मुख्य पात्र है, जो चाहता है कि इलाके के गाँवों में दलितों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे, वे संगठित हों और बराबरी पर आने के लिए लड़ें। दलितों की लड़ाई में वह अपना एक हाथ गँवा बैठता है। अंत में उसके विचारों की विजय होती है। विजय इस तरह कि दो मेधावी युवा अपने-अपने गाँव यह सोचकर आए थे कि वे यहीं पर रोजगार करेंगे और अपने साथ दलित समाज का भी जीवन-स्तर ऊँचा उठाएँगे। उनकी राह में क्षेत्रीय विधायक काँटा बोते हैं, इसलिए कि यदि रामकरन जैसे हरिजन दलितों के सर्वमान्य नेता बन जाएँगे तो हम सवर्णों का वोट बैंक टूट जाएगा। उधर चंद्रशेखर और रामकरन मिलकर दलितों को यह अहसास कराते हैं कि यदि संगठित और शिक्षित बनोगे तो कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं कर पाएगा।
    ईशावस्या, माला और संध्या जैसे स्त्री-पात्रों को उपन्यास में महत्त्व नहीं मिला है, लेकिन सबकी कमी पूरी कर देती हैं सुन्नरी देवी। उनका संघर्ष समूची दलित स्त्री जाति का संघर्ष है। वे किसी देवी की तरह समाजियों का नेतृत्व सँभालती हैं। दरअसल दलित क्रांति की मशक्कत तीन युवा मिलकर करते हैं, लेकिन जब क्रांति होती है तो वे युवा पीछे रह जाते हैं और सुन्नरी देवी विजय का परचम लहरा देती हैं।  

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh (Paperback)
    Mahip Singh
    80

    Item Code: #KGP-7016

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : महीप सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं : तीन
    अगर बीसवीं सदी के श्रेष्ठ लघुकथा-लेखकों की सूची बनानी पड़े तो उसमें एनॉ उन्नी का नाम किसी भी कीमत पर रखना ही पड़ेगा। हिंदी लघुकथा को एक विशिष्टता प्रेमचंद ने सौंपी तो दूसरी राजेंद्र यादव ने, तीसरी युगल, विष्णु नागर, पृथ्वीराज अरोड़ा और सुदर्शन वशिष्ठ ने, चौथी चित्रा मुद्गल और शशांक ने और पांचवीं उन्नी, पवन एवं चैतन्य त्रिवेदी ने और छठी अर्चना वर्मा, मालचंद तथा मुकेश वर्मा ने। लघुकथा को भाषा और भाव की जो गरिमा उन्नी सौंपते हैं, वह हिंदी में दुर्लभ है, शायद अद्वितीय, पर यह अद्वितीयता न तो रावी जैसी है, न जयशंकर प्रसाद या शशांक जैसी, जिनकी परंपरा संभव नहीं लगती, लेकिन उन्नी की लघुकथाओं की परंपरा बन सकती है, प्रेमचंद की तरह। अद्वितीय होना उस दोधारी तलवार पर चलने की तरह है, जिससे आपकी अपनी काया भी तराश दी जा सकती है। वह आपकी शक्ति हो सकती है और सीमा भी। जयशंकर प्रसाद, रावी और शशांक की लघुकथाओं की अद्वितीयता उन्हें सीमित कर देती है, जबकि प्रेमचंद, राजेंद्र यादव, सुदर्शन वशिष्ठ और चित्रा मुद्गल की अद्वितीयता उनके कथा-लेखन के सीमाहीन विस्तार की राहें खोल देती है। शशांक की लघुकथाएं अपनी परंपरा को छेंककर खड़ी हो जाती हैं, उनकी कहानियों की तरह। प्रारंभ में प्रियंवद की कहानियां भी ऐसी ही लगती थीं, लेकिन प्रियंवद ने अपनी उस अद्वितीयता की सीमाओं को खंड-खंड कर ‘बोधिवृक्ष’ जैसी कहानियों के जरिए खुद को सीमाहीन विस्तार में ले जाने वाली अद्वितीयता सौंपी है। ऐसी बात लेकिन कोई पाठक तब तक दावे से नहीं कह सकता, जब तक वह हिंदी के दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ‘पाठ-कुपाठ’ न कर ले। आज प्रायः हर कोई स्वीकार कर चला है कि यह समय लघुकथा का समय है। इसीलिए प्रस्तुत संचयन सर्व-संग्रह की साधु-वृत्ति से संचालित होकर संपादित हुआ है, लेकिन इक्कीसवीं सदी में आकर अब लग रहा है कि घना बजने वाले थोथे चनों को छांट देने का समय आ गया है, जिसकी शुरुआत प्रस्तुत संचयन के संपादकीय और संकलित आलोचनात्मक आलेखों से कर दी गई है यानी हिंदी लघुकथा की बीसवीं सदी का समग्र अवलोकन-सिंहावलोकन।
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-7039

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    [इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]

  • Kamleshwar Rachana-Sanchayan
    Ganga Prasad Vimal
    850 723

    Item Code: #KGP-797

    Availability: In stock

    कमलेश्वर : रचना-संचयन

    कमलेश्वर हिंदी कहानी केखास तौर से बीसवीं शताब्दी केशीर्ष कथाकारों में अग्रणी हैं। उनमें हम एक साथ प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु के गुणधर्मों का विकास देख सकते हैं।उनकी ‘नीली झीलया ‘मुरदों की दुनियाजैसी बेजोड़ कहानियां को हम उनके किस्सागो होने और एक मिशनरी की मानिंद शब्दों से प्रतिरोध कायम करने के सक्षम उदाहरणों कीकड़ी का एहसास कराने वाली प्रक्रिया से लैस देख सकते हैं। कमलेश्वर सही मायनों में एक सामाजिक प्रवक्ता थे। वे बेखौफ अपनी बात कहने के लिए सृजनशील पद्धति के भीप्रणेता थे। आपातकाल के दिनों में वही पहले संपादक थेजिन्होंने ‘सारिकामें सरकारी पक्ष के बहिष्कार की एक नई पद्धति खोजी थी। उन्होंने ‘सारिकाके पन्नों के उन अंशों कोसरकारी बाबुओं द्वारा काली स्याही से ढककर सेंसर करने पर अपना प्रतिरोध ज़ाहिर किया