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Books

  • grid
  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Parv (Paperback)
    Bhairppa
    350 298

    Item Code: #KGP-7195

    Availability: In stock

    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Tukara-Tukara Waqt
    Shashi Sahgal
    60 54

    Item Code: #KGP-1866

    Availability: In stock

    टुकड़ा-टुकड़ा वक्त
    शशि सहगल की कविताओं के केन्द्रीय स्वर को जानने के लिए उनकी एक कविता 'असर' पर नज़र डाले :
    झाड़ा-पोंछा
    दिखने में साफ
    कलफ लगी साडी-सा
    कड़क व्यक्तित्व ओढ
    बाहर जाना अच्छा लगता है ।

    ढ़ीले-ढाले वजूद के
    घर के पायदान पर ही छोड़
    हीन भावना से उबरती हुई देह
    दो कदम बाहर रखते ही
    आत्मविश्वास से भर उठती है
    कलफ़ का असर
    कुछ ऐसा ही होता है ।

    शशि जी की कविताएँ घर के अन्दर की कविताएँ जरूर है, लेकिन वे घर में बंद नहीं हैं और ना ही घर और परिवार के संबंध मात्र ही उनकी कविताओं की सीमा हैं । वे घर से बाहर भी झाँकती है और अपने से बाहर भी । अपने भीतर और बाहर तथा घर के अन्दर और घर से बाहर के द्वन्द्वात्मक रिश्तों की वजह से आई दरारें उनकी कविताओं का विषय बनती हैं । उनके पहले कविता-संग्रह में भी इस संवेदन के पहचान बड़े गहरे स्तर पर रही है । इस कविता-संग्रह में यह संवेदन और भी गहराया है । इसमें कहीं मूल्य तलाशने की उत्कटता भी है, 'बाजार' होते रिश्तों में कहीं खुद को बचाकर रखने की केशिश भी । यही इन कविताओं के शक्ति है ।

  • Nibandhkar Hazari Prasad Diwvedi
    Usha Singhal
    60 54

    Item Code: #KGP-1468

    Availability: In stock

    निबंधकार हजारीप्रसाद द्विवेदी
    शैली विज्ञान के संदर्भ में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध-साहित्य पर अभी तक कोई निरुपाधि या सोपाधि शोधकार्य संभवत: नहीं हुआ है । अत: शैली विज्ञान की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी के निबंधों के सम्यक विश्लेषण का यह पहला प्रयास है ।
    शैलीवैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में किसी कृति के सम्यक विश्लेषण के लिए, आज नानाविध प्रतिमान प्रचलित हैं, जिनमें 'चयन-प्रतिमान' को सभी प्रतिमानों का मूलाधार माना जाता है । प्रस्तुत अध्ययन इसी प्रतिमान को आधार बनाकर किया गया है ।
    आचार्य द्विवेदी ने अपने निबन्धों में किस प्रकार ध्वनि, शब्द, वाक्य, तथा विभिन्न व्याकरणिक कोटियों के सार्थक चयन से कथ्य का चयन किया है, इस पर भी विदुषी आलोचिका डा० उषा सिंहल ने अपनी विश्लेषणपरक दृष्टि केंद्रिय रखी है ।
    यह अध्ययन विद्वत् समाज के लिए आचार्य द्विवेदी के साहित्य के अध्ययन की नई दिशाएँ प्रशस्त करेगा ।
  • Kuchh Kahi Kuchh Ankahi (Paperback)
    Sheela Jhunjhunwala
    245

    Item Code: #KGP-296

    Availability: In stock

    कूछ कही कुछ अनकही
    ...निहायत दिलचस्प शैली, प्रवहमान भाषा-परिवार से लेकर पूरे परिवेश तक से जुडे लोग और स्थितियां...यह किताब शुरु से अंत तक रहस्य/रोमांच/प्रेम/संघर्ष/राजनीती/ परिवार/प्रशासन/टकराव/उपलब्धि और फिर नियति के अनेकानेक खेलों से साक्षात्कार कराती है...
    झुनझुनवाला जी रेवेन्यु डिपार्टमेंट के एक आला अफसर थे । छापे डालने के तनावपूर्ण क्षणों में ये लोग किस-किस तरह के खतरे उठाते हैं…धन की दुनिया से किस तरह के प्रलोभन और हथकंडे काम में लाए जाते है और उस चक्रव्यूह को भेदने में ये लोग क्या-क्या पापड बेलते हैं, यह शायद पहली बार इस किताब से जानने को मिलेगा । समसामयिक राजनीति और शासन तंत्र के अनुभवों पर सटीक टिप्पणियों के साथ-साथ इस पुस्तक से आपातकाल संबंधी कतिपय प्रचलित धारणाओं के बारे में एक नए पहलू से सोचने का मौका भी मिलेगा।
    --कन्हैयालाल नंदन (नई दुनिया से)
    इतनी आसान, इतनी सहज।  ऐसा लगता है कि आप अपने गली-कूचे के बारे से बात कर रहे हैं । चाहे वह कानपुर हो या इलाहाबाद या बंबई, शीलाजी ने अपने समय का अत्यंत जीवंत चित्रण किया है और मुश्किल बातो को भी सरलता से, सहजता से और अपनत्व से कहा है । एक ईमानदार किताब जिसमें से हर क्षण ईमानदारी झलकती दिखाई देती है । -कमलेश्वर
    'कही-अनकही' में बनावट कहीं नहीं है । सब कुछ सहज भाव से कहा गया है । कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि हम कोई उपन्यास पढ़ रहे है, रहस्य-रो,मांच से भरा उपन्यास और कही-कही अंतरंग, आत्मिक क्षणों को दिखाता हुआ गृहस्थ जीवन।  एक क्षण को भी नहीं लगा कि यह वर्णन कृत्रिम है । -विष्णु प्रभाकर
    रूढ़ियों को भेदकर स्वतन्त्रता की चिनगारियों के साथ-साथ परिवार में तालमेल बिठाने जैसी घटनाएं सार्थक संदेश देती हैँ। -डॉ. शेरजंग गर्ग
    ...बहुत कुछ होने के साथ-साथ बेहद इनसानी रिश्तों की झलक । -नासिरा शर्मा
    'कुछ कही कुछ अनकही' एक मर्यादित प्रेम-प्रसंग के बाद जिंदगी की जद्दो-जहद से गुजरते हुए जहां पहुँचती है वहाँ आसपास के लोग भी उसका एक हिस्सा हो जाते हैं । विवरण रोचक, प्रवाहपूर्ण और तथ्यपरक हैँ। आत्मकथा होते हुए भी यह संयमित है, मर्यादित है और आत्म-श्लाया  से परे है । -पदमा सचदेव
    ...रहस्य, रोमांच, तिलिस्म, रोमांस-सब एक जगह इकट्ठा कर दिया गया है। ...मर्यादित जीवन के सिद्धांत को पकडे हुए अपने समय का जीवंत खाका ।
    -वसंत साठे
    ...महानगरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन के दिन-प्रतिदिन की ऊहापोह और जिजीविषा की खोज में आगे बढ़ते जाने की ललक जगह-जगह आभासित होती है। -डॉ. क्षमा गोस्वामी (वागर्थ से)
    ...सभी प्रणय-चित्रों में गरिमापूर्ण और सधी हुई मानसिकता के साथ एक सतत ठहराव है, छिछोरापन या आजकल जैसा उर्च्छाखाल प्रेम नहीं है-वह जो सीमाएं लांघकर बह जाता है । -डॉ. कुसुम अंसल (संचेतना में)
    सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, राग-विराग सबसे मिलकर बना है जीवन और इसी में उसकी संपूर्णता है । तटस्थ भाव से जो इस संपूर्णता की अनुभूति करता है, वही एक सफल संस्मरण-लेखक भी होता है । इस बात का अहसास 'कुछ कहीँ कुछ अनकही' पढ़कर और अधिक हुआ ।...यह पुस्तक अपने समय को ईमानदारी से रेखांकित करती है ।
    -राधेश्याम (दैनिक हिंदुस्तान में)
    स्त्री-विमर्श का यह आत्मवृत्त अपने निजी, वैयक्तिक अनुभवों और अनुभूतियों से गुजरता हुआ सामाजिक- सार्वजनिक दृष्टि को मुकम्मल रूप में हमारे सामने परिभाषित करता है ।
    -लक्ष्मीकांत मुकुल (समकालीन भारतीय साहित्य में)
    पुस्तक ने भारतीय महिला पत्रकार की आंखों से देखे हुए एक बेहद रोचक कालखंड को जिया है । प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक यह रोचकता, रोमांच और कहीं-कहीं रूमानी वासंतीपन लिए हुए है। मार्मिक क्षण भी हैं ।
    -पाञ्चजन्य 
    …कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, पत्र, डायरी आदि अनेक चिताओं से साक्षात्कार कराती एक अत्यंत पठनीय पुस्तक ।
    -रवीन्द्र कालिया
  • Shishu Seekhen Achchhi Baaten-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1106

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Manohar Shyam Joshi (Paperback)
    Manohar Shyam Joshi
    225

    Item Code: #KGP-VS MSJ PB

    Availability: In stock

    मनोहर श्याम जोशी के व्यंग्य बोध का दायरा बड़ा है। उनका अध्ययन बहुआयामी था इसलिए सोच, सरोकार, संरचना का विशेष रूप उनकी रचनाओं में दिखता है। कथाकार और पत्रकार की क्षमताओं से उनका व्यंग्यकार समृद्ध हुआ है। ...यह भी कह सकते हैं कि व्यंग्य की अपूर्व समझ ने उनके कथा साहित्य को अभूतपूर्व बना दिया है। मनोहर श्याम जोशी अपने कथागुरु अमृतलाल नागर की तरह स्वभाव से ही व्यंग्य विशारद थे। किसी भी रचना में किस तरह की व्यंजनाओं की गुंजाइश है, यह जोशी अच्छी तरह जानते थे। इसीलिए उनके उपन्यास बताते हैं कि बिना व्यंग्यधर्मिता  के इनकी रचना असंभव थी। मनुष्य के भीतर लुके-छिपे, भलाई-बुराई करते, गिरते-उठते, बनते-मिटते मनुष्य को उद्घाटित करते हुए जोशी रचनाशीलता के कई प्रतिमान रच डालते हैं। उन्होंने व्यंग्य को यांत्रिक ढंग से न परखा, न विकसित किया। यदि ‘मौलिकता’ शब्द का कोई भी अर्थ बचा है तो उसका प्रयोग मनोहर श्याम जोशी के संदर्भ में निस्संकोच किया जा सकता है। उन्होंने रिपोर्ताज, संस्मरण, नाटक के शिल्प में भी बेमिसाल व्यंग्य लिखे। आज हिंदी व्यंग्य जोशी से बहुत कुछ सीख सकता है। लोकप्रियता को स्तरहीनता का पर्याय मानने वाले पुनर्विचार कर सकते हैं। वे बुद्धिजीवी जो हास्य को हेय मानते हुए किसी ‘विशुद्ध व्यंग्य’ की काल्पनिक स्थिति का गुणगान करते हैं उन्हें मनोहर श्याम जोशी का व्यंग्य संसार बहुत कुछ सिखा सकता है। तमाम भाषाओं के खास तेवर उनकी रचनाओं की रोचकता बढ़ाते हैं। उच्चारण के रूपों और तद्भव या देशज शब्दों के संयोग से उनके जैसा व्यंग्य अन्य कहीं संभव नहीं हो पाया। इस पुस्तक में उनके व्यंग्य लेखन के कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण उदाहरण संजोए गए हैं।

  • Raidas Rachanavali
    Govind Rajnish
    250 213

    Item Code: #KGP-613

    Availability: In stock

    रैदास रचनावली
    संत कवि रविदास की रचनावली पाठ-भेद के विवरण के साथ समग्र रूप से अभी तक नहीं छपी थी । व्रजलाल वर्मा ने पहल जरूर की थी, वैसे वहुत पहले उनकी रचनाओं का संग्रह छपा था । डॉक्टर गोविंद रजनीश ने बड़े परिश्रम से बाद में प्राप्त पाठ-ग्रंथों का अनुशीलन करके रैदास रचनावली का पाठ तैयार किया । इसके साथ ही उन्होंने रैदास के पूर्ववर्ती संत कवियों की रचनाओं के साथ तुलनात्मक अनुशीलन भी प्रस्तुत किया । डॉक्टर रजनीश ने कठिन शब्दों के अर्थ भी दे दिए हैं जिससे इस संतवाणी को समझने में कठिनाई न हो ।
  • Mahaan Yoddha Prithviraaj Chauhan : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    190 171

    Item Code: #KGP-492

    Availability: In stock

    भारतवर्ष के इतिहास में क्षत्रिय राजवंशों की गौरवगाथा इतनी लोमहर्षक है कि उन्हें बारंबार पढ़ने को मन करता है। पौराणिक काल से ही क्षत्रिय वंश ने राष्ट्र और समाज की रक्षा में अपनी तलवार उठाए रखी और अपने कर्तव्य का पालन किया।
    अजमेर चैहान वंश की राजधनी रहा है, जिसके प्रतापी राजा सोमेश्वर चैहान थे। सोमेश्वर चैहान के पुत्र पृथ्वीराज चैहान थे, जिनकी वीरता को आज भारतवर्ष में बड़े गर्व से याद किया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘महान् योद्धा पृथ्वीराज चैहान: जीवन दर्शन’ में पृथ्वीराज चैहान के जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को सरल, सरस व सुबोध् शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  • Aadarsh Saamaanya Hindi (Paperback)
    Vijay Agarwal
    90

    Item Code: #KGP-7105

    Availability: In stock


  • Rashtriya Ekta Aur Hindi
    Vishnu Prabhakar
    250 200

    Item Code: #KGP-9241

    Availability: In stock

    विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक रूपक द्वारा प्रांतीय और राष्ट्रभाषा के संबंध को स्पष्ट करते हुए लिखा था, ‘आधुनिक भारत की संस्कृति एक विकसित शतदल के समान है, जिसका एक-एक दल, एक-एक प्रांतीय भाषा और उसका साहित्य संस्कृति है। किसी एक को मिटा देने से उस कमल की शोभा नष्ट हो जाएगी। हम चाहते हैं कि भारत की सब प्रांतीय बोलियां, जिनमें सुंदर साहित्य की सृष्टि हुई है, अपने-अपने घर में रानी बनकर रहें। प्रांत के जनगण की हार्दिक चिंता की प्रकाश भूमि स्वरूप कविता की भाषा होकर रहे और आधुनिक भाषाओं के हार के मध्य मणि हिंदी भारत-भारती होकर विराजती रहे।’
    इसी बात का प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने इस प्रकार कहा था, ‘हिंदी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में जो लोक ऐक्य बंधन स्थापित कर सकेंगेे, वे ही सच्चे भारत बंधु की संज्ञा पाने योग्य होंगे। अतः हमें हिंदी भाषा में पुस्तकें लिखकर भारत के अधिकांश स्थानों का मंगल साधन करना चाहिए।’
    —इसी पुस्तक से
  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • Das Pranidhini Kahaniyan : S.R. Harnot
    S. R. Harnot
    280 224

    Item Code: #KGP-9333

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Pahiye Ki Vikaas Katha (Paperback)
    Chetan Kumar
    60

    Item Code: #KGP-7089

    Availability: In stock


  • The Luck Of The Jews (Paperback)
    Michael Benanav
    395 296

    Item Code: #KGP-323

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Pratiraksha Aur Saamrik Neeti
    Narendra Mohan
    495 446

    Item Code: #KGP-899

    Availability: In stock

    प्रतिरक्षा व सामरिक नीति
    भारत आज एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है । भारत की मंशा अपनी परमाणु शक्ति  उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों व आत्मरक्षा के लिए है । किसी भी देश की प्रतिरक्षा व सामरिक नीति वर्तमान और भावी खतरों के आयामों के निरंतर विश्लेषण पर आधारित होती है और भारत को भी इन्हीं आधारों को दृष्टिगत रखते हुए अपने को तैयार रखना होगा । निश्चित रूप से भारत के समक्ष पग-पग पर चुनौतियाँ हैं, लेकिन अपनी संकल्पशक्ति से विद्यमान  सभी चुनौतियों का सामना दृढ़ता व आत्मविश्वास से करेंगे । 
    –अटल बिहारी वाजपेयी 

  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Qalandar
    Narendra Mohan
    25 23

    Item Code: #KGP-9102

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi
    Nilesh Raghuvanshi
    240 216

    Item Code: #KGP-7816

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    --मंगलेश डबराल

    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।    
    --केदारनाथ सिंह


  • Bihar Ki Mahan Vibhootiya
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkmv

    Availability: In stock


  • Pride And Prejudice (Novel)
    Jane Austen
    495 446

    Item Code: #KGP-572

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Sanchit Bhukh (Paperback)
    Narendra Kohli
    35

    Item Code: #KGP-7097

    Availability: In stock


  • Sampurna Baal Kavitayen : Sherjung Garg
    Sher Jung Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-469

    Availability: In stock

    हिंदी में सबसे चटख, चुटीली और नटखटपन से भरपूर बाल कविताएँ लिखने वाले डॉ. शेरजंग गर्ग उन उस्ताद बाल कवियों में से हैं, जो उचित ही आज बाल कविता के पर्याय बन चुके हैं। समूची हिंदी बाल कविता के ग्राफ को बदलकर उसके मिजाज में बड़ी तबदीली लाने वाले बाल कवियों की छोटी से छोटी सूची बनाएँ, तो भी उसमें डॉ. शेरजंग गर्ग का नाम जरूर होगा। वे हिंदी बाल कविता में पहली बार वह नटखटपन, चुस्ती और शरारती अंदाज लेकर आए, जिसने हजारों बाल पाठकों को रिझा लिया। उनके ‘गाय’, ‘दादी अम्माँ’, ‘गुड़िया’, ‘ईंट’, ‘चिड़िया’, ‘पवनचक्की’, ‘चूहा-बिल्ली’, ‘उल्लू मियाँ’ और ‘टीचर गुड़िया’ सरीखे खिलंदड़े और चुस्त-दुरुस्त शिशुगीत इस कदर चर्चित हुए कि बच्चों के साथ-साथ बड़े भी उनकी नटखटपन से भरी कोमल भावनाओं के साथ बहे और उनके जरिए फिर से अपने बचपन को जिया। खासकर गाय पर भी ऐसा नटखटपन से भरपूर शिशुगीत लिखा जा सकता है, यह डॉ. शेरजंग गर्ग को पढ़ने के बाद ही समझ में आ सकता है। 
    हिंदी में डॉ. गर्ग के अलबेले शिशुगीतों ने ही पहले-पहल यह करिश्मा किया कि वे बदलते समय और बच्चे के मन, सपने और इच्छाओं से जुड़े और वे हर बच्चे के होंठों पर थिरकते नजर आए। और यही बात उनकी गूँजदार लय वाली अपेक्षाकृत लंबी बाल कविताओं के बारे में कही जा सकती है। ‘खिड़की’, ‘नए साल का गीत’, ‘शरारत का मौसम’, ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’ तथा ‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ डॉ. गर्ग की बिलकुल नए शिल्प में ढली अद्भुत कविताएँ हैं, जिनका कोई जोड़ नहीं है। उनके यहाँ बात कहने का जो उस्तादाना अंदाज और सफाई है, वह देखते ही बनती है। 
    सच तो यह है कि हिंदी में भी विश्वस्तरीय बाल साहित्य मौजूद है, यह डॉ. गर्ग की कविताओं से गुजरते हुए ही पहले-पहल समझ में आता है, और यह भी कि हिंदी में मानक शिशुगीत और बाल कविताएँ कौन सी हैं, जिन्हें सामने रखकर बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। 
    डॉ. शेरजंग गर्ग की बेहद तराशी हुई बाल कविताओं की जादुई लय ही नहीं, उनकी कविताओं में हास्य और व्यंग्य की मीठी गुदगुदी भी बाल पाठकों को रिझाती है और वे एक बार पढ़ने के बाद, कभी उन्हें भूल नहीं पाते। उनके गीतों में जैसी पूर्णता है, वैसी कम-बहुत कम नजर आती है। इस लिहाज से वे अपनी नजीर खुद हैं और उन थोड़े से बाल कवियों में से हैं जिनका कविता पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते हैं कि यह कविता इन्हीं की है।
    डॉ. गर्ग की कविताओं का यह जादुई असर ही है कि एक पूरी पीढ़ी उन्हें गाते-गुनगुनाते हुए बड़ी हुई, तो उनके बच्चे---यानी अगली पीढ़ी भी उनकी जादुई कविताओं की उसी तरह मुरीद है। देश के किसी भी हिस्से में हम जाएँ, डॉ. शेरजंग गर्ग की कविताएँ सबसे ज्यादा बच्चों के होंठों पर नाचती नजर आती हैं। बच्चों के वे सर्वाधिक चहेते और दोस्त कवि हैं।
    डॉ. शेरजंग गर्ग सिर्फ एक बालकवि नहीं, वे बाल कविता का इतिहास रचने वाले दिग्गजों में से हैं। लिहाजा उनकी समूची बाल कविताएँ एक जिल्द में सामने आएँ, यह बरसों से बच्चों की ही नहीं, बाल साहित्य के गंभीर अध्येताओं और शोधार्थियों की भी इच्छा थी। इस पुस्तक के जरिए यह सपना पूरा हो रहा है, यह बाल साहित्य के लिए एक यादगार और ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। आशा है, बच्चे और बाल साहित्यकार ही नहीं, हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक और सहृदय पाठक भी बाल कविता की शिखर उपलब्धियों और कलात्मक लाघव से पूर्ण इस संचयन को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और खूब सराहेंगे।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Savyam Prakash
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-56

    Availability: In stock

    भारतीय श्रमिक तथा वंचित वर्ग के कथा-नायकों को जो सत्कार तथा पक्षधरता स्वयं प्रकाश की कहानियों में मिली है, वैसे उजले उदाहरण समकालीन हिंदी कहानी में गिने-चुने ही हैं । इन वंचित वर्गों के स्वपनों को दुःस्वप्नों में बदलने वाली कुव्यवस्था को यह कथाकार केवल चिन्हीत ही नहीं करता, बल्कि इसके मूल में बसे कुकारणों को पारदर्शी बनाकर दिखाता है तथा उस जाग्रति को भी रेखांकित करता है जो कि अंतत: लोक-चेतना का अनिवार्य तत्त्व है । और खास बात यह है कि इस सबके उदघाटन-प्रकाशन में यहाँ लेखक जीवन के हर स्पंदन और उसके आयामों पर कहानी लिखने को उद्यत दिखाई पाता है । अर्थात् सम्यक् लोकचेतना की 'साक्षरता' इन कहानियों में वर्णित जीवन में यथोचित पिरोई गई है ।
    कहानी की कला की गुणग्राहकता से लबरेज ये कहानियां विचारधारा के प्रचार और सदेश के 'उपलक्ष्य' को मिटाकर व्यवहार के धरातल तक पाठक को सहज ही ले जाती है । पात्रों की आपबीती को जगबीती बनाने का संकल्प यहाँ प्रामाणिक रूप में उपस्थित हुआ है।
    स्वयं प्रकाश द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'नीलकांत का सफर', 'सूरज कब निकलेगा', 'पार्टीशन', 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा ?', 'नैनसी का धूड़ा', 'बलि', 'संहारकर्ता', 'अगले जनम', 'गौरी का गुस्सा' तथा 'संधान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan (Paperback)
    Surendra Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-252

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे। (भूमिका से)
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai
    Ubaid Siddqi
    300 270

    Item Code: #KGP-547

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
  • Hindu Sanskars
    M.L. Ahuja
    395 356

    Item Code: #KGP-768

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindu sanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life.
  • Hilne Lagi Dharti (Stories)
    Shrinivas Vats
    200 160

    Item Code: #KGP-1934

    Availability: In stock

    हिलने लगी धरती
    पंचदेश में शत्रु देश के जासूसों ने विद्रोह करवा दिया । भाट कवि ने राजा नरसिंह के दरबार तक पहुंच बना महामंत्री रुद्रदेव को शक्तिहीन कर दिया। कुछ दिन बाद राज्य में खबर फैल गई कि रुद्रदेव विद्रोहियों के हाथों मारे गए । पर हुआ उलटा । भाट कवि अपनी ही चाल में उलझ गया ।  रुन्द्रदेव तो जिंदा निकले । [गहरी वाला]
    बहेलिये को क्या पता कि जिस पक्षी को उसने पकडा है वह शापित मुनि-कुमार है । बेटे के पैर से परेशान बहेलिये ने देखा, चोंच में जडी-बूटी लिए अनेक पक्षी उसके घर की मुँडेर पर आ बैठे हैं । [बेटे का पैर]
    आलसी हरिया को मिल गए जादुई कुदाल और कुल्हाड़ा । उसने लोगों को डराना शुरू कर दिया । पर मिला क्या ? अपना कुदाल-कुल्हाड़ा ही गँवा बैठा । [मीठे बेर]
    देवपति को कम सुनता था। यह लड़की तुतलाकर बोलती थी। दोनों मिले तो शादी को राजी हो गए। फिर उनकी मुलाकात हुई एक मेंढक से । [मिठाई दो]
    जमींदार के खेत में हल जोतते बेलाराम को पेड़ पर हार मिला । जमींदार ने कहा-“मेरा खेत, मेरा पेड़, अत: हार भी मेरा ।" बेलाराम ने अपनी बात कही तो जमींदार ने अपने कान पकड़ लिए । बोला- "माफ कर दो बेलाराम ।" [घोसले में हार]
    शीतक के बहकावे में आकर माणिक की बेटी सुधा को सब मनहूस समझने लगे । कोई उससे शादी को तैयार न हुआ तो एक पेड़ से उसकी शादी कर दी गई । पर पेड़ पर ऐसा कौन बैठा था, जिससे सारे लोग सुधा के एहसानमंद हो गए ? [घर चलो]
    श्रीनिवास वत्स की ऐसी ही दर्जनों कहानियों को इस पुस्तक से संगृहीत किया गया है । बच्चे तो बच्चे बड़े भी इन्हें पूरा पढ़े  बिना नहीं रह सकेंगे । अनूठे अंदाज, अनूठे ताने-बाने से रची ये रचनाएँ मनोरंजन का खजाना हैं । पढ़कर देखिए तो सही ।
  • Lomad Vesh
    Rameshwar Prem
    60

    Item Code: #KGP-1818

    Availability: In stock

    लोमड़ वेश 
    लोमड़ वेश चरित्रों के माध्यम से ऐसी रंगयात्रा के लिए रंगसमूहों और दर्शकों की भागीदारी का रेखांकन है जो लोकधर्मी नाटकों की विरासत है । बेन जान्सन कृत विश्वप्रसिद्ध नाटयकृति वालापोनि के  कथासूत्रों पर आधारित लोमड़ वेश मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा लोभ, प्रपंच, ईषर्या-द्वेष की परत-दर-परत दो अनावृत्त करते हुए समकालीन रंगभाषा का अप्रतिम उदाहरण है ।
  • Kuchh Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100 80

    Item Code: #Kgp-kybk

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-869

    Availability: In stock

    कहानियां कहानियां होते हुए भी कहीं सच भी होती हैं । बल्कि सच से भी अधिक सच । हिमांशु जोशी की ये कहानियां उसी सच को रेखांकित करती अनाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती हुई कई प्रश्न जगाती हैं ।
    इन रचनाओं की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, इनकी सरलता, सहजता एवं मार्मिकता। सरल शब्दों में बड़ी बात कह देना बड़ा कठिन कार्य है। परंतु हिमांशु जोशी की इस महारत ने आज के अनेक कथाकारों के बीच उनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हैं । शायद इसीलिए ये कहानियां कहानियां  होते हुए भी जिए हुए जीवन के जीवंत अंश-सी लगती हैं । इनमें स्पदित होता यथार्थ, इन्हें सच के इतने निकट ले जाता है कि ये सच का ही पर्याय बन जाती हैं । किसी की अपनी ही जीवन-गाथा के सजीव दृश्य !
    इनमें धुँधलाए गाँव हैं मैले कस्बे, भीड़-भरे महानगर ! दिन-रात हांफते-कांपते, यंत्रवत जीते लोग ! उनके दुःख-सुख । उनकी समस्याएं ! एक नन्हे-से संसार में समाए कई-कई संसार !
    गहन अनुभव एवं अनुभूतियों के ताने-बाने से बुनी  इन रचनाओं के कुछ अलग रंग हैं। अलग राग ।
  • Aadhunik Nibandh
    Shyam Chandra Kapoor
    350 263

    Item Code: #KGP-741

    Availability: In stock


  • Uttar Ghaat Adhura
    Ramashankar Shrivastva
    65 59

    Item Code: #KGP-9069

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    80

    Item Code: #KGP-7002

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ममता कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Is Bar Sapne Mein Tatha Anya Kavitayen
    Parmanand Shrivastva
    175 158

    Item Code: #KGP-1898

    Availability: In stock

    इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ परमानंद श्रीवास्तव की काव्ययात्रा से एक ऐसा चयन है, जिसे अपने दर्पण-समय का साक्ष्य कहा जा सके। ‘उजली हँसी के छोर पर’, ‘अगली शताब्दी के बारे में’, ‘चौथा शब्द’ और ‘एक अ-नायक का वृत्तांत’ से मुख्यतः चुनी कविताएँ अनामिका के संपादन में एक समय-संवाद बनाती हैं। प्रेम भी प्रतिरोध के विमर्श में शामिल है। ‘चित्र में स्त्रियाँ’, ‘छिपने की जगह’ जैसी कविताएँ एक नया मुहावरा हासिल करती हैं। परमानंद श्रीवास्तव के लिए कविता एक अकेली दुनिया का हालचाल, जिसे बताना मुश्किल है, तो छिपाना लगभग असंभव। ‘आसिया बानो’, ‘भानु मजूमदार’ जैसे नाम काल्पनिक भी हों तो आत्मा की भीतरी सृष्टि हैं। 
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ स्त्री-उत्पीड़न और साम्प्रदायिक बर्बरता का आख्यान हैं, जिसे कविता अनोखे संवाद-शिल्प में अंकित करती हैं। कविता जैसे एक पटकथा हो, एक लैंडस्केप, एक विस्थापित की डायरी, एक समय-गाथा। ‘एलिना के लिए’ जैसी कविताएँ गहरे भेद खोलने वाली कविताएँ हैं। यहाँ भीतर का त्रासद तनाव प्रकट है तो कोमल मूक अन्तर्ध्वनि भी।
    विस्थापन इन कविताओं का केन्द्रीय सच है। निर्वासन में कवि का आत्मनिर्वासन भी शामिल है।
  • Zanjeer Bol Uthi
    Jaidi Zafar Raza
    180 162

    Item Code: #KGP-1839

    Availability: In stock

    ज़ंजीर बोल उठी
    घटनाओं का कालक्रम में होना इतिहास नहीं बुनता। हाँ, घटनाएँ जब ठहरकर संवाद की स्थिति बनाती हैं और समय के भाल पर अपना निशान छोड़ जाती हैं तो इतिहास के अंकुर स्वतः फूट पड़ते हैं। डॉ जै़दी के कहानी-संग्रह ‘ज़ंजीर बोल उठी’ की चार-पाँच कहानियाँ शुद्ध ऐतिहासिक हैं। इनमें व्यथा भी है और आक्रोश भी। कारण यह है कि ये अपने समय की ज़मीनी सच्चाई और बुनियादी सवालों को उठाती हैं और तर्क एवं तथ्य की तलाश में वर्तमान से अतीत तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें बौद्धिक संवादों की टकराहटों के बजाय समय की ओट में छुपी विसंगतियों को उधेड़ने की शक्ति है जो सियासी शतरंज की बिसात को उलटने का साहस रखती है। इन कहानियों के तेवर तीखे और तल्ख़ ज़रूर हैं, मगर साथ ही इन कहानियों में संवेदनारूपी सरिता का प्रवाह बड़ी सहज गति से बहता महसूस होता है, जो शब्दों पर विश्वास को बहाल और निराशा को आशा में बदलने में ख़ासा सक्षम है। ये कहानियाँ अपने ईमानदाराना प्रयास के चलते अरसे तक पढ़ने वालों की सोच में अटकी रहेंगी।
  • Rassakashi
    Nisha Bhargva
    300 270

    Item Code: #KGP-9220

    Availability: In stock

    निशा भार्गव हिन्दी की उल्लेखनीय हास्य व्यंग्य कवयित्रियों में अपना मुकाम रखती हैं। कुछ ही कवयित्रियां है जो मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर हास्य व्यंग्य की सृष्टि करती हैं। मेरा मानना है कि उन्होंने काव्य मंचों के माध्यम से और दूरदर्शन, आकाशवाणी में अपने काव्य पाठ से असंख्य श्रोताओं को आनंदित, उल्लसित किया है। इधर उनका नया काव्य संकलन 'रस्साकशी’ के शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है जिसमें उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज और गहन गम्भीर शैली में आज के जीवन में व्याप्त विसंगतियों द्वंद्व को रेखांकित किया है।  जीवन में न्याय और अन्याय के बिच, सत्य और असत्य के बीच सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच जो द्वंद्व चल रहा है उसके बीच रस्साकशी जैसा माहौल बना हुआ है । रस्साकशी के इस माहोल में उत्पन्न तनाव से बचते हुए निशा भार्गव ने सरस, सारगर्भित और जनप्रिय रचनाएं लिखने का उद्यम जिया है उनके इस प्रयास से सदैव सकारात्मक प्रवृतियों की विजय के संकेत मिलते हैं। कविता का उद्देश्य भी लगभग यही है। तमाम निराशाओं-दुराशाओं के बीच आशा की किरण खोज लेना कवि कर्म का सबसे बडा उद्देश्य माना गया है । निशा भार्गव अपने इस प्रयत्न में पूर्णत: सफल हैं। उनमें एक संवेदनशील मन को सकारात्मक भाव से पेश करने का जज्बा हर कोण से दिखाई देता है। मैं उनक लेखन की सफ़लता की कानना करता हू ।
  • Aids : Kya? Kyon? Kaise? (Paperback)
    Kanval Nayan Kapoor
    50

    Item Code: #KGP-7104

    Availability: In stock


  • Dharm Ke Aar-Paar Aurat
    Neelam Kulshreshtha
    450 405

    Item Code: #KGP-310

    Availability: In stock

    धर्म के आर-पार औरत
    मानव जीवन के लिए धार्मिक आस्था व संस्कार दोनों आवश्यक हैं। स्त्रियाँ धर्म के पाखंडी व शोषक स्वरूप का विभिन्न माध्यमों से ज़ोर-शोर से विरोध कर रही हैं। इस पुस्तक में पढ़िए:
    अधिकतर धर्म कैसे पोषित होता है?
    प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने क्यों कहा है, ‘कुरान शुड बी रिवाइज़्ड?’
    समाज में वर्गभेद का आधार पौराणिक पृष्ठभूमि भी है। क्या उसका आधुनिकीकरण आवश्यक है?
    गीता के दसवें अध्याय में स्त्री में अपनी सात विभूतियों की चर्चा करने वाले कृष्ण स्वयं क्या थे?
    सती के चैरों व मेलों पर क्यों प्रतिबंध लगना चाहिए? लड़कियों को कैसी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?
    दक्षिण भारत में स्त्री के गले में पहना एक पोटु (पेंडेंट) वाला मंगलसूत्र उसके शरीर तक जाने का रास्ता था।
    जैन धर्म में भी माना गया है कि पूर्वजन्म में जो कुछ बुरे कार्य करता है, वही स्त्री के रूप में पैदा होता है।
    परिवार को त्यागकर मोक्ष की चाह में भटकना अधिक कठिन है या गृहस्थी का संचालन करना?
    दुनिया को अपनी दृष्टि से देखती स्त्री क्यों स्वीकार करे पौराणिक स्त्री-चरित्रों जैसी नियति?
  • Jahanabad Ka Vilaap
    Moti Bhuvania
    110 99

    Item Code: #KGP-9258

    Availability: In stock

    ‘जहानाबाद का विलाप’ बिहार ही के नहीं, भारतवर्ष के सारे ही दरिद्र, दलित वंशजों का आंतरिक विलाप है, जिनकी असीम दुर्दशाओं मे तथाकथित स्वर्ण-युग से आज तक-स्वतंत्रता के बाद भी, कहीं कोई परिवर्तन नहीं आया है। बल्कि उनकी अर्जित आमदनी के बरअक्स, दिन-प्रतिदिन छलांगों में बहती महंगाई ने अब तो उनकी कमर ही तोड़ दी है। बैसाखियों के सहारे भी चलने-फिरने में मानो उन्हें नितांत असमर्थ बना दिया गया है।
    सुना है, अखबारों में भी पढ़ा है कि स्वतंत्र भारत आर्थिक संपन्नता की ओर तेज से बढ़ रहा है। बढ़ता होगा। उसका एक लघु अंश भी दरिद्र वर्ग तक तो पहुंचा नहीं है, बल्कि उनकी विगत समस्याएं दिन-प्रतिदिन और भी जटिल बनती जा रही हैं, जिसका श्रेय बढ़ती महंगाई और अनुपाततः उनकी घटती आमदनी ही को है। बढ़ती जनसंख्या भी इसका एक कारण तो है, पर अन्य मनोरंजन के अभाव में सिवाय शारीरिक संसर्ग के उनके पास और कोई विकल्प भी तो नहीं है-ऐसे में जनसंख्या तो बढ़नी ही थी, उनकी दरिद्रता में और भी बढ़ौती कर।
    इसमें उन्हें दौषी ठहराकर तो जले पर नमक छिड़कने की सी बात होगी।
  • Vaigyanikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #KGP-921

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Sapanon Ki Neeli Si Lakeer
    Amrita Pritam
    240 180

    Item Code: #KGP-1972

    Availability: In stock

    सपनों की नीली-सी लकीर
    एक वर्जित फल खाने पर 'आदम' और 'हव्वा' को जन्नत से निकाल दिया गया था । इस इतिहास को मैंने एक नज्म में लिखा : "एक शिला थी और एक पत्थर, जिन्होंने वर्जित फल खा लिया, और जब मैली जमीन पर वो पत्थरों की सेज पर सोये तो उन पत्थरों की टक्कर से आग की एक लपट-सी पैदा हुई--बदन में से आग का जन्म हो गया तो पत्थर भी कांप गया, शिला भी कांप गई । समाज की नजर का धुआं ही उनके पास था, उसी की घुट्टी उस आग को दे दी तो पवन की छाया हंसने  लगी---फिर शिला और पत्थर धरती के हवाले हुए और आग की लपट पवन के हवाले और मैं आग की लपट-सी हैरान थी कि मेरे भीतर से यह सपनों के नीली-सी लकीर कहां से निकलती है" यह उस नीली-सी लकीर का तकाजा था कि मैं हर कल्पना को धरती पर उतार लेना चाहती थी--अपनी कलम से भी और अपने कर्म से भी ।
    - अमृता प्रीतम
  • Ila (Paperback)
    Prabhakar Shrotiya
    35

    Item Code: #KGP-1093

    Availability: In stock


  • Sikhon Ka Itihaas (Paperback) (Two Valumes)
    Khushwant Singh
    950 760

    Item Code: #KGP-268

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-595

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
    रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
    रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
    रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
    विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।
  • Ek Vyakti Narendra Kohli (Paperback)
    Narendra Kohli
    80

    Item Code: #KGP-7100

    Availability: In stock


  • Hamare Jeevan Moolya-1
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1145

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap
    Madan Kashyap
    150 135

    Item Code: #KGP-225

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 665

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • Viklango Ke Liye Rojgar
    Vinod Kumar Mishra
    175 158

    Item Code: #KGP-7845

    Availability: In stock

    आम विकलांग कर्मचारी अत्यंत परिश्रम और अनुशासनप्रिय होते हैं । बढ़ते तकनिकी विकाश ने जहाँ विभिन्न कार्यों में शारीरिक श्रम की आवश्यकता को काम किया है वहीँ विकलांगों की कार्यक्षमता को नए-नए सहायक उपकरणों और बेहतर कृत्रिम उपकरणों के जरिये लगातार बढ़ाया है और आगे इसका और विस्तार होगा । 
    बदलते आर्थिक परिवेश में विकलांगों के लिए नयी रोजगार संभावनाओं की विशेष रूप से निजी क्षेत्र में तलाश आवश्यक है । इसके लिए उद्योग जगत, राष्ट्रीय संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और विकलांग युवक-युवतियों को एक जगह आना होगा और इस तरह प्रयास करना होगा ताकि विकलांग व्यक्ति बड़ी संख्या में रोजगार पा सकें और समाज को अपनी योग्यता का लाभ दें । 
  • Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal (Paperback)
    Viren Dangwal
    90

    Item Code: #KGP-1540

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
    वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

  • Bharatratna Se Sammanit Mahaan Vyaktitva
    Dr. Rashmi
    760 684

    Item Code: #KGP-519

    Availability: In stock

    भारतरत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। अति सम्माननीय एवं विशिष्ट व्यक्तियों को राष्ट्रीय सेवा हेतु प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान संपूर्ण व्यक्तित्व व देश के प्रति समग्र समर्पण भावना का आदर करते हुए समर्पित किया जाता है। इस सम्मान से अलंकृत व्यक्ति ‘भारतीय नागरिकता की वरीयता सूची’ में सातवें स्थान पर सुशोभित होते हैं। यह आवश्यक है कि 2 जनवरी, 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा स्थापित ‘भारतरत्न’ सम्मान के विषय में प्रत्येक नागरिक सुपरिचित हो। कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, विचार, उद्योग, लेखन, सार्वजनिक सेवा एवं खेल आदि के क्षेत्रों में ‘भारतरत्न’ से सम्मानित विभूतियों के जीवन तथा कृतित्व से प्रेरणा पाकर कोई भी अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
    अनेक प्रेरक रचनाओं की लेखिका डा. रश्मि ने परिश्रम व निष्ठापूर्वक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पुस्तक का लेखन किया है। सम्मानित व्यक्तित्व के सभी आयामों का परिचय देते हुए उन्होंने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित किया है। प्रथम बार ‘भारतरत्न’ (1954) से अलंकृत चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर 2015 में सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी एवं पं. मदन मोहन मालवीय तक सभी महान् व्यक्तित्वों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी इस पुस्तक में समाहित है।
    राष्ट्रप्रेम, जीवन मूल्य और समर्पित कृतित्व को परिभाषित करती पुस्तक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पठनीय व संग्रहणीय है। सरल-सुगम भाषा तथा प्रवाहपूर्ण शैली इसे अत्यंत रोचक बना देती है।
  • Apna Hi Desh (Paperback)
    Madan Kashyap
    90

    Item Code: #KGP-1301

    Availability: In stock

    यह चर्चित कवि मदन कश्यप का पांचवां संग्रह है। मदन कश्यप आम आदमी का शोषण करने वाले और उसे उसके हक़ से दूर करने वाले तंत्र पर कड़ी नज़र रखते हैं और उसे बेनक़ाब करने का कोई मौका नहीं चूकते। बाज़ार उनके निशाने पर है, जिसने बड़ी बारीकी से मनुष्य को उपभोक्ता में बदलने का अभियान चला रखा है। उसने न सिर्फ सत्ता को अपने चंगुल में ले लिया है बल्कि सामाजिक मूल्यों पर भी गहरा आघात किया है। उसकी कोशिश है कि सब कुछ उसी के रंग में रंग जाए ताकि हर कोई बाज़ार के मुताबिक ही सोचे ‘कुछ ऐसा चल निकला रंगों का खेल कि बेरंग ज़िंदगियों को भी बदरंग करने लगे हैं रंगों के सौदागर/अब हमारी आकांक्षा, हमारे संघर्ष, हमारी करुणा पर कालिख नहीं रंग-बिरंगे रंग पोते जाते हैं।’ बाज़ार कई रूपों में, कई स्तरों पर सक्रिय है। वह एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें कोई विचार न हो, संघर्ष की कोई बात न हो। वह तकलीफ को भी एक उत्सव में बदल देना चाहता है। आज का समय ऐसा है कि ‘जिसमें कोई बहस नहीं/केवल गिरोहबंदियां हैं/मतभेदों के लिए कोई जगह नहीं।’ यह स्थिति बाज़ार ने ही पैदा की है। उसने एक ऐसा नवधनाढ्य वर्ग तैयार किया है जिसका शेष समाज से कोई संवाद नहीं है, किसी और के प्रति उसके भीतर कोई संवेदना भी नहीं है। यह तबका ग़रीबों की त्रासदी में भी अपने लिए मनोरंजन ढूंढ़ता है। उसके लिए निठारी की त्रासदी भी महज़ एक सूचना है, सनसनी से भरी हुई। वह उसे तटस्थ होकर एक रियलिटी शो की तरह देखता है--‘दूर खड़े तालियां बजा रहे थे/भूसंपदा की उछाल से/रातोरात खरबपति बन चुके धनपशु/उन्हें भा रहा था यह रियलिटी शो।’ निठारी की तरह देश की असंख्य ग़रीब बच्चियों का दर्द इस वर्ग को दिखाई नहीं देता। इसे बस अपनी तरक्की और मुनाफे से मतलब है। यह नया सौदागर है, ‘इन्हें सखुए के बीज नहीं पूरा जंगल चाहिए/हड़िया के लिए भात नहीं सारा खेत चाहिए।’ यह वर्ग आज देश का नियंता बना हुआ है। हमारा शासक वर्ग सीधे या परोक्ष रूप से इसकी दलाली में लगा हुआ है। वह इसी के हित के लिए आदिवासियों से जंगल और ज़मीन छीनने पर आमादा है और इसके लिए हिंसा तक का सहारा लेता है। पर विडंबना यह है कि यह सब वह लोकतंत्र का मुखौटा लगाकर करता है--‘महोदय! लूट और हिंसा के अलावा/और क्या बचा है आपके लोकतंत्र में/आपने पहाड़ बेच डाले/नदियां बेच डालीं जंगल बेच दिया...आपको जिसने भी वोट दिया देश चलाने के लिए दिया होगा देश बेचने के लिए तो नहीं।’ दुर्भाग्य से पढ़ा-लिखा और अपने को बुद्धिजीवी कहने वाला मध्यवर्ग भी नवधनाढ्य तबके की नकल करता है और उसमें शामिल होना चाहता है हालांकि ऊपर से वह बदलाव और क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें करता रहता है। इस पर व्यंग्य करते हुए मदन कश्यप कहते हैं--‘आप क्रांति करना नहीं चाहते/लेकिन क्रांति होते देखना चाहते हैं/आपके बारे में सिर्फ यह तय है/कि कुछ भी तय नहीं है।’ पर इन सबके बावजूद कवि में निराशा नहीं है। उसे जनता की ताक़त पर पूरा भरोसा है क्योंकि वह बड़े-बड़े तानाशाहों को उनकी औकात बता देती है--‘लेकिन यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही/खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया/चारों तरपफ से फेंके जाने लगे जूते।’ मदन कश्यप संघर्ष में ही सौंदर्य देखते हैं। वंचितों और पीड़ितों के लिए संघर्ष करती हुई स्त्री उन्हें औरों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है। गुजरात के दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत समाजसेवी तीस्ता सीतलवाड़ के लिए वह कहते हैं--‘जब हवा में तनी तुम्हारी मुट्ठी/तुम सबसे ख़ूबसूरत लगी।’ यह निश्चय ही एक अलग सौंदर्यदृष्टि है जो स्त्री की गरिमा को प्रतिष्ठित करती है। उनका दृढ़ विश्वास है कि कोई समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब वह स्त्री को स्वतंत्रता और सम्मान दे। इस संग्रह की प्रायः सभी कविताएं बदलाव की गहरी आकांक्षा से भरी हुई हैं।
    --संजय कुंदन
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Rameshchandra Shah
    Krishna Dutt Paliwal
    240 216

    Item Code: #KGP-698

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Khushwant Singh (Paperback)
    Khushwant Singh
    80

    Item Code: #KGP1289

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : खुशवंत सिंह 
    किताबघर प्रकाशन की महत्वाकांक्षी कथा-सीरीज़ 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' को विस्तार देते हुए इसे अब अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया है । अर्थात् इस सीरीज़ में अब सभी भारतीय भाषाओँ के शीर्ष कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियां उपलब्ध कराये जाने की योजना है ।
    सीरीज़ के इस नव्यतम सेट में शामिल कथाकार हैं : अमरकान्त, कृष्ण बलदेव वैद, खुशवंत सिंह, गोविन्द मिश्र, ज्ञानरंजन, देवेन्द्र सत्यार्थी, निर्मल वर्मा, प्रतिभा राय, शनी, शेखर जोशी तथा शैलेश मटियानी । विभिन्न भाषाओँ के इन भारतीय कथाकारों ने अपनी सर्जनात्मकता के बल पर स्वयं को आधुनिक कथा के जिस शीर्षस्थ स्थान पर स्थापित किया है वह अपने आप में एक उपलब्धि है । इसी 'उपलब्धि' को एक सीरीज़ के माध्यम से पाठक तक पहुँचाकर हम गौरवान्वित है ।
    इन कहानियों में आदमी के मनुष्य हो जाने की अनुभूतियों के जिस तरलता और सरलता से पिरोया गया है, वह सचमुच एक अदभुत पाठकानुभव है । 
    कहानीकार के कथाकर्म का प्रतिनिधि एवं केंद्रीय स्वर, गहन आत्मीयता से यहाँ सामने लाया गया है । यह कथाकार की अपनी कथाभूमि तो है ही, लगता है, हम सबकी सगी दुनिया भी यही है । टूटती-ढहती और फिर से बनती-सँवरती दुनिया । मानवताकामी शुभेच्छा की यह आकांक्षा ही इस सीरीज़ की वह शक्ति है जो आज के तमाम चालू कथा- सीरीज़ों से इसे अलग खड़ा करती है ।

    तो, प्रस्तुत हैं खुशवंत सिंह की दस प्रतिनिधि क्लानियाँ ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shaani
    Shaani
    200 180

    Item Code: #KGP-29

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार शानी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दोज़खी', 'जहाँपनाह जंगल', 'जली हुई रस्सी', 'जगह दो, रहमत के फरिश्ते आएंगे', डाली नहीं फूलती', 'बिरादरी', 'बोलने वाले जानवर', 'एक नाव के यात्री', 'चहल्लुम' तथा 'युद्ध'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक शानी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Parvat-Gatha
    Hari Krishna Devsare
    425 383

    Item Code: #KGP-617

    Availability: In stock

    पर्वत गाथा
    पर्वतों और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। पर्वतों पर उगने वाले वन, उनसे प्राप्त होने वाले खनिज, वनोपज आदि मनुष्य के उपयोग की वस्तुएँ रही हैं। आज भी आदिवासी और गाँवों के लोग वनोपजों से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। पर्वतों के जंगलों से लकड़ी मिलती है। पर्वतों से देश की जलवायु अत्यधिक प्रभावित होती है। यदि भारत के उत्तर में हिमालय न होता तो मानसूनी हवाएँ सीधे मध्य तथा उत्तरी एशिया में पहुँचकर पानी बरसातीं और भारत एक रेगिस्तान बन जाता। हिमालय पर्वत सर्दियों में उत्तरी एशिया से आने वाली बेहद ठंडी हवाओं से भी भारत की रक्षा करता है।
    पर्वत मनुष्य के जीवन में विभिन्न रूपों में जुड़े रहे हैं और उनका महत्त्व आज भी है। ‘महानता’ के अर्थ में ‘पर्वत’ के अलावा कोई दूसरी उपमा नहीं दी जाती। आज मनुष्य ने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाने में सफलता पा ली है।
    जीवन में सफलता की ऊँचाइयों की तुलना पर्वत शिखरों से की गई है। हमारे देश में अनेक गौरवशाली पर्वत हैं और उनके प्रति लोगों में अटूट आस्था है। उन पर्वतों पर लोग पूजा करते हैं, मेले लगते हैं और मन की मुराद पूरी करते हैं। भारत के ऐसे ही पूज्य, गौरवशाली, इतिहास- प्रसिद्ध और धार्मिक आस्था के प्रतीक पर्वतों की गाथा है यह पुस्तक।

  • Bhartiya Naitik Shiksha : 4
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-267

    Availability: In stock

    नैतिक शिक्षा का प्रत्यक्ष पाठ बचपन में माता-पिता से तथा विद्यालयों में गुरुजनों के सान्निध्य में बैठकर मिलता है । धीरे-धीरे समझ विकसित होने पर धर्म और संस्कृति द्धारा भी हमें नैतिक शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष स्वाध्याय के माध्यम से सीखने को मिलता है । फिर समाज और राष्ट्र के लिए किए गए सेवा-कार्यों के लिए समर्पण के प्रति हमारे मन में जो भावना निरंतर उठती रहती है, उससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी नैतिक शिक्षा के संबंध में धारणा कितनी व्यावहारिक है।
    माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति बढ़ती अश्रद्धा, वैज्ञानिक दुष्टिकोण
    के नाम पर धर्म एव संस्कृति के प्रति घटती निष्ठा ने नैतिक शिक्षा को
    विवादों के घेरे में ला दिया है। सरकार द्वारा पाठयक्रम में भले ही उसे
    पढाने का संकेत दिया जाता रहा है, किन्तु ऐसे कितने शिक्षक एवं
    विधालय है जो इसके प्रति गंभीर हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज एवं
    राष्ट्र में बढ़ती चोरी, लूटमारी, बेईमानी, हिंसा और भ्रष्टाचार के रूप में
    दिखाई देने लगा है।
    घर में माता-पिता को समयाभाव के कारण नैतिक शिक्षा का पाठ पढाने का समय भी नहीं मिलता । अत: विद्यालयों को ही इसका दायित्व संभालना होगा । यह ठीक है कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन एवं परीक्षा- कार्यों की अधिकता के कारण समयाभाव रहता है, किन्तु तीन स्तरों पर यह संभव है…एक तो विषयों के पठन-पाठन के अंतर्गत ही जो नैतिक संदर्भ आते है, उन प्रसंगों का सदुपयोग कर, दूसरे, नैतिक शिक्षा के अन्य कार्यक्रम बनाकर, जैसे-प्रार्थना, पुस्तकालय, पत्रिका, संग्रह-पुस्तिका, दुश्य-श्रव्य सामग्री तथा दिनचर्या आदि सभी माध्यमों का प्रयोग करने का वातावरण  बनाकर।  तीसरे, विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में ऐसे अवसर प्रदान कर जिससे बालको में नैतिक विचारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगे ।
  • Jahaanoon
    Manorma Jafa
    240 216

    Item Code: #KGP-197

    Availability: In stock

    कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

    "क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

    मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

    "अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

    "पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

    "मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

    "भूल गई होगी।"

    "तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

    "क्या मतलब?"

    "मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

    "नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
    —इसी उपन्यास से
  • Lohit
    Anita Sabharwal
    500 375

    Item Code: #KGP-9375

    Availability: In stock

    ‘लोहित’ उपन्यास विचारोत्तेजक कथानक और उत्कृष्ट भाषा-शैली वेफ कारण समकालीन कथा साहित्य में अनूठी संवेदना के साथ अभिव्यक्त होता है। लेखिका अनिता सभरवाल ने देश और व्यक्ति की नियति का जो सघन चित्राण प्रस्तुत किया है वह अद्भुत है। उपन्यास की कथावस्तु असम प्रदेश के परंपरागत जीवन प्रवाह के साथ वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक परिवेश को आत्मसात् कर विकसित हुई है। असम की सामाजिक कुरीतियों (विशेषकर जातिवाद) के कारण उत्पन्न पीढ़ी-संघर्ष का ज्वलंत वर्णन किया गया है। युवा वर्ग के भटकाव का यथार्थस्वरूप रचनाकार ने वहां रहते हुए देखा, अनुभव किया। हितेन और जोयमती जैसे मुख्य चरित्रों के द्वारा लेखिका ने उस रोशनी की तलाश की है जो तनाव, अवसाद, विघटन, हताशा और मोहभंग के घने अंधकार में न्याय, समानता, एकता की उम्मीद जगाती है।
    उल्लेखनीय है कि असम के जन्म से लेकर आज तक उसके प्रत्येक स्पंदन का साक्षी ब्रह्मपुत्र नद इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है। इसे लोहित, लौहित्य, दिहांग, सियांग जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। पौराणिक अवधारणाओं व वर्तमान वैचारिक सक्रियताओं को लोहित कथा एवं आत्मसंवाद के सहमेल से प्रस्तुत करता है। लोहित का आत्मस्वीकार है, ‘मैं क्या करूं? मैं तो कहीं जा भी नहीं सकता। ...यहां के दुःख भी मेरे, सुख भी मेरे। फर्क बस इतना है कि मेरे दुःख किसी को दिखाई नहीं देते।’ अगोचर दुःखों और संघर्षों का पठनीय वर्णन पाठकों के हृदय को छू लेगा, यह विश्वास है। यह मानो ‘असम की आत्मकथा’ ही है।
  • Shake-Up India (Paperback)
    Jayant V. Narlikar
    245 221

    Item Code: #KGP-331

    Availability: In stock

    The need of The Times 
    India has lived over sixty years of its independence, but it still seems to be floating rudderless. It does not know what to accept and what to discard.
    The well known Astrophysicist and science writer Jayant V. Narlikar provides in this significant work well thought out ideas in various life and work-areas for us to take up in right earnest and do the needful to build up the nation as well as our own lives.
    He is a rare Indian who writes science fiction which is closer to the truth. A few of his ideas have already come true. Like the social problems created by the possibility of knowing the sex of the child while in the womb which he wrote up in a story in the 1970s.
    The shake-up and change are caused by The likes of These meteors:
    • ‘India that is Bharat…..’ – Why two names?
    • Get rid of the scientifically rejected superstitions.
    • No more Ramans, Boses, Sahas – Why?
    • Ignoring higher education–Why?
    • Science is significant, develop its temper.
    • Come out of the population trap.
    • Don’t litter, clean up your surroundings, it’s easy.
    • Technology is for the 21 st century.
    • Teach astronomy in schools; it will develop students’ minds.
    • Be professional in achieving your goal.
    • Media must come forward in presenting science to the masses.
    • Take a leaf out of the life of Michael Faraday.
  • Ab Kachhu Kahibe Naahin
    Hazari Prasad Dwivedi
    750 600

    Item Code: #KGP-752

    Availability: In stock


  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Netaji Subhash Chandra Boas
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-nscb

    Availability: In stock


  • Manav Adhikar Aur Ham (Paperback)
    Urmila Jain
    140

    Item Code: #KGP-285

    Availability: In stock

    मानव अधिकार और हम
    हिंदी में प्रति वर्ष एक हज़ार से अधिक पुस्तकें छपती  हैं, पर अभी तक कोई ऐसी पुस्तक मेरे देखने में नहीं  आई है जिससे जन-सामान्य को सहज-सरल भाषा में मानव अधिकार संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके। हिंदी की इस कमी का ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में मानव अधिकार की धारणा सहित अन्य विषयों के संबंध में भी चर्चा की गई है । 
    मानव अधिकार का उल्लंघन कब, कैसे और क्यों  होता है और हो सकना है—इसके कुछ उदाहरण देते हुए यह भी बतलाया गया है कि अधिकांश देश किस प्रकार सैद्धांतिक रूप से तो मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा का समर्थन करते हैं और इसी के आधार पर उन्होंने अपने-अपने देश में तरह-तरह के कानून भी बनाए हैं, पर जहाँ नक उन पर अमल  करने की बात है-इस संबंध में अधिकांश, देशों का रिकॉर्ड बहून ही निराशाजनक है ।
    प्रस्तूत पुस्तक में बाल अधिकार उल्लंघन और बालकों के यौन शोषण का उल्लेख करते हुए बतलाया गया है कि किस प्रकार अपराधियों का दोष सिद्ध होने के बावजूद उनके विरुद्ध कोई ऐसी कार्यवाई नहीं की जाती, उन्हें ऐसा दंड नहीं दिया जाता कि इस प्रकार के अपराधों पर रोक लगे ।
    -उर्मिला जैन

  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Kasrat Karo Dimaag Ki
    Ajay Sharma 'Yatri'
    80

    Item Code: #KGP-9252

    Availability: In stock

    नहीं हमारे सिर पर बाल,
    बड़ी कठोर हमारी खाल।
    शकल हमारी बिलकुल गोल,
    सुन न पाए कोई मेरे बोल।
    अर्थात् कछुआ

    पहेली अर्थात् ऐसी मनभावन गुत्थियां जिन्हें खोलने के खेल में मनुष्य को शुरू से आनंद आता रहा है। आज दूरदर्शन के घनघोर युग में जबकि हमारे बच्चे से दिमाग को पैना करने की सहज स्वाभाविक विधियों को प्रायः छीना जा रहा है, ऐसे में पहेलियों की आवश्यकता न केवल मनोरंजनपूर्ण स्थितियां पैदा करने में सहायक है बल्कि हम सबके और खास तौर पर हमारे बच्चों के मस्तिष्क के चहुंमुखी विकास में परमावश्यक है।
    इन्हीं अपेक्षाओं के साथ प्रस्तुत है यह किताब ‘कसरत करो दिमाग की’, जिसमें लगभग तीन सौ पहेलियों को संजोया गया है। खेल-खेल में ज्ञानवर्द्धन करती ये पहेलियां हमें भारतवर्ष के परंपरागत पशु-पक्षियों, उपकरणों, रिश्तों आदि से भी जोड़ देती है।
    अर्थात् इन पहेलियों में मस्तिष्क की प्रखरता का गुण तो है ही, भारतीयता का बोध भी समाहित है।
    पहेलियों के उत्तर भी पुस्तक में दिए गए हैं।
  • Piya Peer Na Jaani
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-1982

    Availability: In stock

    पिया पीर न जानी
    इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खडे होकर, स्वाधीनना की पचासवीं वर्षगाँठ मनाते हुए भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि भारतीय नारी पूर्णरूपेण स्वतंत्र है ।
    परम्यरा की, रूढियों की, सनातन संस्कारों को अर्गलाएँ आज भी उसके पाँवों को घेरे हुए है । आर्थिक स्वातंत्र्य का झाँसा देकर उसे अर्थार्जन में भी झोंक दिया गया है । अब वह घर और बाहर दोनों तरफ पिसती है--दो-दो हुक्मरानों के आदेशों पर नाचती है । इस मायने में वह सोलहवीं सदी की नारी से भी जादा शोषित और असहाय हो गई है ।
    पर हाँ, इधर कुछ वर्षो में छटपटाने लायक ऊर्जा उसने अपने में भर ली है । इसीलिए कभी-कभी इन बंधनों को तोड़ने में भी वह सफल हो जाती है ।


  • Saagar Aur Uski Apaar Sampada Evam Oorja
    Vinod Kumar Mishra
    240 216

    Item Code: #KGP-128

    Availability: In stock

    सागर और उसकी अपार संपदा एवं ऊर्जा
    सुनामी लहरों ने सागर का प्रलयंकारी रूप उजागर किया । इस प्रक्रिया में द्वीप अपनी जगहों से हिल गए । कई जगह नीचे दबी सामग्री ऊपर आ गई और अनेक जगहों पर बहुमूल्य सामग्री के भंडार लोगों के हाथ लग गए। 
    इस आपदा ने अनायास ही लोगों के मन से सागर के प्रति जिज्ञासा बढा दी । सागर की उत्पत्ति, उसका विकास, उसके विभिन्न पहलुओं के बारे में जानने की आवश्यकता बढ़ गई और बढ़ती आबादी के मद्देनज़र भविष्य में सागर स्थित जैविक व अजैविक संपदा के दोहन और सागा में छिपी प्रचंड ऊर्जा के उपयोग की संभावनाओं की तलाश अनिवार्य हो गई है ।
    हालाँकि कवियों ने सदियों से ग्रंथों से सागर का वर्णन किया है, पर इस पुस्तक में सागर के विभिन्न रूपों का रोचक व उपयोगी वृत्तांत है ।
  • Parineeta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1353

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है परिणीता और दूसरा है मझली दीदी।
  • Mere Saakshaatkaar : Mannu Bhandari
    Mannu Bhandari
    350 315

    Item Code: #KGP-678

    Availability: In stock


  • Paanch Absord Upanyas
    Narendra Kohli
    80 72

    Item Code: #KGP-2084

    Availability: In stock

    पाँच एब्सर्ड उपन्यास
    जब एक उपन्यासकार की कलम, कार्टूनिस्ट की दृष्टि पा जाती है तो एब्सर्ड उपन्यासों की रचना होती है । नरेन्द्र कोहली की इन पाँच रचनाओं में आपको उपन्यास का गठन, व्यंग्य-चित्रकार की पैनी दृष्टि, एक अनोखा अप्रस्तुत विधान, तीखा-करारा व्यंग्य तथा समकालीन जीवन की कुतर्कशीलता अपनी समग्रता में उपलब्ध होगी । सर्वथा नवीन कथ्य, शिल्प, शैली और विधा ! व्यंग्य-लेखन का एक सर्वथा नवीन आयाम ! इन रचनाओं में आपको व्यंग्य अपनी संपूर्ण गंभीरता में मिलेगा और आप समझ पाएँगे कि व्यंग्य हँसाने के साथ-साथ रुला भी सकता है, घावों को कुरेद भी सकता है और व्यक्ति को उसके आक्रोश का जीवन्त साक्षात्कार भी करा सकता है ।
  • Imandaari Ka Swaad
    Harish Kumar 'Amit'
    180 162

    Item Code: #KGP-9367

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Alamshah Khan
    Aalam Shah Khan
    270 243

    Item Code: #KGP-744

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार आलमशाह खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पराई प्यास का सफर', 'आवाज की अरथी', 'मुरादों भरा दिन है', 'दंड-जीवी', 'मेहंदी रचा ताजमहल', 'लोहे का खून', 'तिनके का तूफान', 'पग-बाधा', 'किराए की कोख' तथा 'पंछी करे काम' । संपादक द्वारा लिखी गई पुस्तक की भूमिका के माध्यम से आलमशाह खान की समग्र कथा-यात्रा और उसके महत्त्व से भी सहज ही परिचित हुआ जा सकता है।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक आलमशाह खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Baat Meri Kavita
    Trilochan
    325 293

    Item Code: #KGP-1907

    Availability: In stock

    बात मेरी कविता
    त्रिलोचन भले बोलते न दिख रहे हों, उनकी कविता बोल रही है और बोलती रहेगी--इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता।
    ऐसे सैकड़ों शब्द हैं, जिनका आधुनिक कविता में प्रयोग त्रिलोचन के अलावा किसी ने नहीं किया। हिंदी कविता इसलिए भी उनके प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेगी कि एक ऐसे युग में, जिसमें कविता की शब्द-संपदा लगातार घटती गई है, वह उन बिरलों में से थे, जो इस संपदा में कुछ नया बराबर जोड़ते रहे और इस तरह हिंदी की प्राणधारा को पूर्णतया बनाए रखने की चेष्टा की।
    यह निरी भाषिक विविधता का मामला नहीं है। यह विविधता आती ही है जीवन की उस सहज विपुलता से, जिसके त्रिलोचन एक लगभग ज़िद्दी कवि हैं।
    --अशोक वाजपेयी
    ० 
    त्रिलोचन की कविता में आवेगों की रास तनी रहती है। वह उसे उन्मुक्त नहीं छोड़ते। कविता का स्वर सधा हुआ है। पिच बहुत ऊपर-नीचे नहीं जाता। रोमैंटिक कविता से बने पाठकीय संस्कार के साथ त्रिलोचन की कविता के करीब आना इसलिए कई बार बहुत कठिन होता है। उसे पढ़ने के लिए एक अभ्यास और कविता का एक अलग संस्कार चाहिए। उसमें एक क्लासिकीय काव्य-संयम है। --राजेश जोशी
  • Prerak Prasang
    Sudha Gautam
    160 128

    Item Code: #KGP-9212

    Availability: In stock

    कुछ प्रसंग

    वाणी: अमेरिका में स्वामी विवेकानंद रेल से सफर कर रहे थे। उनके पास बैठे दो युवक स्वामी जी को अंग्रेजी में लगातार अपशब्द कह रहे थे और उनका उपहास उड़ा रहे थे। गंतव्य आने पर विवेकानंद कुली के समान उठाने और पानी लाने के लिए अंग्रेजी में बोले तो युवक घबरा गए। वे बोले, ‘‘आप अंग्रेजी जानते हैं, फिर भी इतनी देर आपने हमारी बातों पर गौर करते हुए भी कुछ नहीं कहा? ऐसा क्यों?’’
    विवेकानंद बोले, ‘‘अपशब्द कहने पर वाणी का व्यर्थ अपव्यय होता है और ऊर्जा नष्ट होती है।’’

    भाई-भतीजावाद: डाॅक्टर जाकिर हुसैन जब देश के राष्ट्रपति थे, तब उन्हें अपने एक संबंधी का पत्र मिला। उस पत्र में कोई कार्य करवाने का अनुरोध था और इसीलिए संबंधी ने पत्र में बार-बार उनका संबंधी और मुसलमान होने की दुहाई दी। उस पत्र को पढ़कर जाकिर हुसैन काफी खिन्न हुए और अपने निजी सहायक से बोले, ‘‘शायद मेरे संबंधी को यह मालूम नहीं है कि मैं अब मुसलमान नहीं रहा, केवल भारतीय हूं। मैं इस पद पर देश-सेवा के लिए हूं, भाई-भतीजावाद के पोषण के लिए नहीं। यदि यह सज्जन सचमुच अपनी योग्यता का दम भरते हैं, तो इन्हें मेरी सहायता की क्या जरूरत है?’’
  • Mere Saakshatkaar : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    350 263

    Item Code: #KGP-616

    Availability: In stock


  • Gujrat : Sahakarita, Samaj Seva
    Neelam Kulshreshtha
    420 357

    Item Code: #KGP-599

    Availability: In stock

    गुजरात गांधी जी, सरदार पटेल, विक्रम साराभाई परिवार, अमूल डेरी, अपनी सहकारिता व औद्योगिक प्रगति के कारण जाना जाता है लेकिन ये बड़े-बड़े नाम हैं । समाज के उत्थान के लिए अनेक लोग अपनी आत्मा में नन्हे-नन्हे दीप संजोए बैठे हैं, गांधी जी के व साहित्यिक मूल्यों को अपने जीवन में जीते हुए । यदि अन्य प्रदेश प्रगति करना चाहते हैं तो इस समृद्धतम प्रदेश गुजरात से संबंधित निम्न बिंदुओं का विश्लेषण करें जिनसे समाज के भौतिक ही नहीं ,मानवता के विकास के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
    ० वडोदरा के महाराजा सयाजीराव तृतीय के शासनकाल की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की जा सकती है। उनकी दी हुई परंपरा के कारण ये शहर 'कलाकारों का मक्का' कहलाता है। लेखिका इसे 'सिटी ऑफ इंटरनेशनल 'सोल्स' कहती हैं ।
    ० गांधी जी की प्रेरणा से भारत  द्वितीय महिला संगठन  'ज्योति संग' की स्थापना हुई व सन् 1920 में एक स्त्री अनुसूइया साराभाई ने टेक्सटाइल मिल की भारत की सर्वप्रथम सबसे वृहद ट्रेड यूनियन संगठित की ।
    ० विश्व भर में लोकप्रिय होती जा रही लोक अदालत को  श्री हरिवल्लभ पारिख ने रंगपुर (क्वांट) स्थित आनंद  निकेतन आश्रम में जन्म दिया  ।
    ० मैग्सेसे पुरस्कार विजेता इला भट्ट की 'सेवा' संस्था सेल्फ एम्प्लॉयड वीमन एसोसिएशन आज़ भी अपनी तरह की विश्व की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है । 
    ० विश्व में संभवतः एकमात्र उदाहरण है यहाँ के शहरों व गांवों में फैला पुस्तकालयों के नेटवर्क का संगठन 'गुजरात पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल' ।
    ० एशिया में सहकारी बैंक अन्योन्य बैंक, महिला सहकारी बैंक व उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करने वाली जागृत ग्राहक संस्था सर्वप्रथम यहीं संगठित हुई ।
    ० डॉ. जी. एम. ओझा ने भारत ही नहीं, एशिया में भी पर्यावरण संरक्षण की संस्था 'इनसोना' सन् 1975 में यहीं स्थापित की ।
    ० श्री सूर्यकांत पटेल का चालीस एकड़ जमीन में बनाया विश्वविख्यात फार्महाउस वडोदरा में है। 
    ० भारत में महाराष्ट्र में दो, सिर्फ गुजरात में ही तीन स्टॉक एक्सचेंज हैं जहाँ सभी राज्यों से अधिक पैसे का निवेश होता है ।
    ० विकलांगों द्वारा संस्था बनाकर विकलांगों की सहायता के उदाहरण अन्य प्रदेशों में दुर्लभ हैं । 
    ०  'गुजराती नी गजी नो तडियो भा तो नथी' इस कहावत का अर्थ जानिए इस पुस्तक से ।
    ० अस्मिता : गुजरात से एक साहित्यिक आंदोलन' इस पुस्तक से जानिए क्यों 'एक्सेल गुप्त इंडस्ट्रीज' में  प्रबंधन व मज़दूरों का कभी झगड़ा नहीं हुआ ।
    ० विश्यविख्वात आर्कीटेक्ट कर्ण ग्रोवर, जिनके हैदराबाद में बनाए सोहराबजी ग्रीन बिजनेस सेंटर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ग्रीन बिल्डिंग घोषित किया गया है, व उनके साथियों द्वारा स्थापित हेरिटेज ट्रस्ट के प्रयासों से चांपानेर को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है । ग्रोवर जी की नई उपलब्धि है कि उनकी बनाई बी एन एमरो बैंक को भी विश्व की पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ इमारत घोषित किया गया है । 
    ० यदि किसी शहर का उत्थान करना है तो वडोदरा की स्वयंसेवी  संस्थाओं ‘बड़ौदा सिटिजंस काउंसिल' व 'यूनाइटेड वे ऑफ बड़ौदा' को समझना होगा ।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chitra Mudgal
    Chitra Mudgal
    240 216

    Item Code: #KGP-619

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चित्रा मुद्गल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'गेंद', 'लेन', 'जिनावर', 'जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं', 'भूख', 'प्रेतयोनि', 'बलि', 'दशरथ का वनवास', 'केंचुल' तथा 'बाघ'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चित्रा मुद्गल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bharat Mein Angrezi : Kya Khoya Kya Paya
    Tulsi Ram Sharma
    250 200

    Item Code: #KGP-9254

    Availability: In stock

    विदेशी भाषा एक नया संदेश और स्फूर्ति लेकर आती है, इस रूप में वरदान होती है। वही भाषा सतारूढ़ होकर हमारी भाषा, चिंतन शैली और जीवन-मूल प्रेरणाओं को विकृत या कुंठित करके हमारी अस्मिता को छीन लेती है, तब अभिशाप बन जाती है। अंग्रेजी को अपनाकर हमने क्या खोया क्या पाया यह लेखा-जोखा इस चर्चा में स्थान-स्थान पर संकेत रूप में उभरकर आता है।
    पुस्तक में भारतीय अंग्रेजी शिक्षा के तीन आयामों पर प्रकाश डाला गया है-
    1. 1793 से 1854 तक अंग्रेजी का प्रतिष्ठापन जिसके सूत्रधार थे चाल्र्स ग्रंाट और मुख्य कलाकार थे लार्ड मकाले।
    2. 1854 से 1947 तक जिसमंे अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार की चर्चा है।
    3. 1947 के पश्चात् आज तक जिसमें अंग्रेजी के प्रभुत्व का छायांकन है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-12

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    380 342

    Item Code: #KGP-9337

    Availability: In stock

    नरेन्द्र कोहली व्यंग्य साहित्य में कथात्मकता, वैचारिक उदारता और संवेदनात्मक सघनता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न विधाओं के साथ हिंदी व्यंग्य को भी समृद्ध किया है। उनके व्यंग्य लेखन की बहुत बड़ी शक्ति है घटना को अनुभव में रूपांतरित कर लेने की क्षमता। निजी सुख-दुःख से लेकर देश-दुनिया के जाने कितने पक्षों पर उन्होंने लिखा है। वे संप्रेषण का महत्त्व जानते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं पाठकों में पर्याप्त लोकप्रिय हैं। कई बार वैचारिक पक्षध्रता या जड़ता एक लेखक को सीमित कर देती हैं। नरेन्द्र कोहली जड़ता को ‘रचनात्मक दृढ़ता’ से अपदस्थ करने वाले विवेकशील लेखक हैं। राजनीति से जुड़े विषयों में उनका विवेक विशेष रूप से देखा जा सकता है। वे असंगति पर आक्रमण करते हुए भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों को बचाने का प्रस्ताव रखते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में नरेन्द्र कोहली के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Is Daur Mein Hamsafar
    Amar Goswami
    350 315

    Item Code: #KGP-1999

    Availability: In stock

    इस दौर में हमसफ़र
    अमर गोस्वामी उन थोड़े से कथाकारों में से है जिनकी कहानियों पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते है कि यह कहानी अमर गोस्वामी ही लिख सकते थे । आज के दौर में जबकि रचनाएँ ही नहीँ, लेखक भी एक-दूसरे की 'जेरोक्स कापियों' से तबदील हो रहे है, अमर गोस्वामी की यह पहचान और कूवत-या कहिए कि रचनात्मक सामर्थ्य काबिलेगौर है । इस सामर्थ्य के बूते ही अपनी लंबी कथा-यात्रा से कभी रचना पर उनका विश्वास डिगा नहीं और वे उन हड़बडिए लेखकों की पाँत में शामिल नहीं हुए, जो सिर्फ चर्चित होने के लिए लिखते है और अपने आसपास की हर चीज, हर संबंध को 'कैश' कर लेते के लिए उतावले दिखते है ।
    इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि  अमर गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘इस दौर में हमसफ़र' उनकी इस लंबी और धीरज-भरी यात्रा का ही स्वाभाविक फ़ल है-और  अमर जी का पहला उपन्यास होते हुए भी, गंभीर चर्चा और विश्लेषण की माँग करता है। ऊपर से देखने पर 'इस दौर में हमसफ़र' भले ही प्रेमचंदीय वर्णनात्पक शैली में लिखा उपन्यास नजर आए, पर थोडा भीतर उतरते ही समझ में आ जाता है फि यह सिर्फ एक उपन्यास ही नहीं, हमारे दौर की एक गहरी और स्तब्ध कर देने वाली 'एक्स-रे पड़ताल' भी है । यह दीगर बात है कि यह लिखा गया है इतनी जानदार भाषा और पुरलुत्फ अंदाज में कि जब तक आप इसे खत्म नहीं कर लेते, यह आपको चैन  नहीं लेने देता । बल्कि उपन्यास खत्म होने के बाद भी लंबे अरसे तक पाठकों का 'हमसफ़र' बना रहता है ।
    इसकी वजह शायद यह है कि एक उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी नई कथा-प्रविधियों के दास नहीं है और उन्हें उथले रूप से जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ टाँक लेने को हरगिज पसंद नहीं करते । उनके यहाँ जो कुछ है, वह अपने ठेठ मौलिक अंदाज में है और अमर गोस्वामी का निहायत अपना है । इसीलिए वे बगैर दिखावटी स्त्री-विमर्श के शोर-शराबे के, अनन्या के रूप से हमें एक ऐसी विलक्षण और शक्तिशाली स्त्री से मिलवाते हैं जो अपनी बेबनाव शख्सियत से अति आधुनिक ही नहीं, 'नई पीढी की नई नारी’ लगती है, जिसकी धमक आगे आने वाले युगों में और ज्यादा साफ सुनी जा सकेगी । अनन्या के मित्र और सहयात्री के
    रूप में अनिरुद्ध बागची का 'विचलन' या हार, सिर्फ उसी की हार नहीं, आधुनिकता के उन तमाम नकली प्रत्ययों की हार भी है जो आधुनिकता को सिर्फ 'देह-भोग के सुख' तक सीमित कर देना चाहते हैं । अनन्या  के माई मधुसूदन के चेहरे में मुझे तो जगह-जगह स्वयं अमर गोस्वामी का दर्द से तिलपिलाता चेहरा नजर आया । यह दीगर बात है कि मधुसूदन की कहानी अपनी है, और वह अमर जी की नहीं, अपनी ही राह पर आगे बढ़ता दिखाई देता है ।
    ‘इस दौर में हमसफ़र' में आधुनिकता की 'विकृत' और 'रचनात्मक' दोनों ही शक्लें है और अपने पुरे विश्वसनीय रूप से है । इस लिहाज से यह एक ऐसा उपन्यास भी है जिसे कई किस्म के 'कंफ्यूज़न' और मतिभ्रम-भरे आज के समाज से सही दिशा की ओर  इशारा करने वाली एक पहल के रूप में भी देखा जा सकता है । हाँ, यह जरूर है कि अमर गोस्वामी कहीं-कहीं ज्यादा खुल गए है और जहाँ सिर्फ इशारों से काम चल सकता था, वहाँ भी 'रस' लेते नजर आते है । शायद महानगरीय समाज के 'रंगीन विकारों, की ओर ध्यानाकर्षण की यह उनकी अपनी शैली हो ।
    उपन्यास के अंत में मधुसूदन और हेमंती ही नहीं, शर्वाणी की चोट झेलकर अंतत: फिर से सागरिका की ओर मुड़ा शांतनु जिस नए समाज की नींव रखना चाहता है, उसमें मूल्यों के उपहास वाली 'मजावादी' दुष्टि नहीं, बल्कि विडंबनाओं को पहचानकर उनके  बीच से रास्ता खोजती 'मनुष्य की जय-यात्रा' का अगला पडाव नजर आ सकता है ।
    'इस दौर से हमसफ़र' में बेहद तीव्र गति और हलचल है तो विचारों का तेज संघर्ष भी । लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ये तेज बहसें दिल्ली से मीरजापुर और चुनार तक फैली उपन्यास की प्रदीर्घ कथा का एक सहज हिस्सा बनकर आती हैं । दिल्ली जैसे महानगरों की बनिस्बत छोटे शहरों, कस्बों में अब भी इंसानी संवेदना और आर्द्रता कैसे बनी हुई है, इसकी परख उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी जगह-जगह करवाते हैं । कोई हैरत की बात नहीं कि इसी कोशिश में वे डॉ० प्रशांत सिन्हा जैसे बड़े कद के इंसान से हमें रू-ब-रू होने का मौका देते हैं, जिनके आगे सारी महानगरीय भभ्भड़ और चमक-दमक फीकी लगती है ।
    अलबता अमर गोस्वामी 'इस दौर में हमसफ़र' को एक उपन्यास के साथ-साथ सहज ही बहुरंगी छवियों और गतियों वाले हमारे दौर का 'एक विशद समाजशास्त्रीय अध्ययन' भी बना सके-यह एक बडी सफलता है । अपने पहले ही उपन्यास से अमर गोस्वामी आज के महत्वपूर्ण रचनाकारों की पाँत में आ गए हैं, यह बात उनकी रचनात्मक सामर्थ्य के प्रति मन में 'आश्वस्ति' के साथ-साथ आदर भी पैदा करती है ।
  • Bharat Ke Mahan Sant
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkms

    Availability: In stock


  • Interview (Hindi Interviews)
    Majda Asad
    60 54

    Item Code: #KGP-2022

    Availability: In stock

    इंटरव्यू
    इस किताब में इंटरव्यू विधा, उसके विकास और विभिन्न व्यक्तियों से वार्तालाप को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।
    लेखिका ने बातचीत के माध्यम से विभिन्न वर्गों के विशिष्ट व्यक्तियों से साक्षात्कार कराया है । प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ-साथ समाज-सेवा से लगे सामान्य व्यक्तियों की विशेषताओं का निरूपण किया गया है । राजनीति, साहित्य, कला और समाज-सेवा से संबंधित व्यक्तियों के इंटरव्यू लिये गये हैं । उपराष्ट्रपति, केन्दीय मंत्री, साहित्यकार, संगीताचार्य, गाइड और रसोइया एक साथ नजर आते हैं । इन सबसे बडे आत्मीय ढंग से बातचीत कर इनके व्यक्तित्व को बहुत सहज ढंग से उजागर किया गया है । यह भी स्पष्ट रूप से बताया है कि अपनी-अपनी जगह पर हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और समाज में अपना विशेष स्थान रखता है । यह पुस्तक दो हिस्सों में विभाजित है । पहले खंड में व्यक्तिगत इंटरव्यू है । दूसरे में विषयगत, जिसके अन्तर्गत किसी एक विषय पर अनेक व्यक्तियों से बातचीत कर उनके विचार प्रस्तुत किये गये हैं । सन् 1971 से लेकर 1991 तक लिये गये इंटरव्यू यहाँ संकलित है । इनमें से अधिकांश समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । बातचीत के दौरान व्यक्तित्व तो उभरा ही, साथ ही बहुत-से रोचक प्रसंग भी उभरकर सामने आये हैं जो पाठको के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध होंगे ।  यह पुस्तक अपने ढंग का अनूठा प्रयास है । इंटरव्यू विधा में अपना विशेष स्थान रखती है । पाठको द्वारा इसका स्वागत होगा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma (Paperback)
    Nirmal Verma
    100

    Item Code: #KGP-1263

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : निर्मल वर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाडी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Uttar Aadhuniktavaad Ki Or
    Krishna Dutt Paliwal
    400 360

    Item Code: #KGP-836

    Availability: In stock

    हिंदी में उत्तर आधुनिकतावाद की चर्चा को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। अब आप उसे मुंह बिचकाकर खारिज नहीं कर सकते। हिंदी में लगभग दो दशकों से यह चर्चा जारी है और गुजराती, बंगाली आदि में इससे भी पहले। हिंदी के माक्र्सवादियों ने शुरू-शुरू में ‘उत्तर आधुनिक’ चिंतन को लेकर कितना हाय-तौबा किया। अब हालत यह है कि ल्योतार, देरिदा, मिशेलफूको, बौद्रिया, पाल डी मान, सुसान सोंटाग, इहाव हसन, एडवर्ड सईद आदि के बिना अपनी बात पूरी नहीं कर पाते। और फ्रैंकफुर्त स्कूल तो माई-बाप बन गया है। दरअसल, उत्तर आधुनिकता ने ‘नवजागरण’ तथा ‘इनलाइटेनमेंट’ की विरुद्ध सीधा संघर्ष किया। उत्तर आधुनिकतावाद ने ‘तर्क’ की यूरापीय पद्धति को नकारते हुए अर्थहीन सिद्ध कर दिया है। उत्तर आधुनिकतवाद ने घोषणा की है कि वह सांस्कृतिक बहुलतावाद, बहुवचनवाद, हर तरह के वैविध्यवाद का समर्थन करता है और जो दबाए गए हैं उन पर (नारी-विमर्श, दलित-विमर्श पर) नए सिरे से विचार करने की तमन्ना रखता है। ज्ञान के क्षेत्रों में आए विकास-प्रगति के अंतःसूत्रों में ‘आधुनिकता’ का रुतबा कम हुआ है। फिर फूको ने इतिहास के संदर्भ में सोचकर कहा कि अन्य इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों ने ‘डिफरेन्स’, ‘डी मिस्टीफाई’ और ‘डिसकंटीन्युटी’ के कारकों की खोज पर ध्यान दिया हैं इतिहास और राजनीति में ‘अदर’ या अन्य की खोज बढ़ी है तथा ‘अदर’ को उपेक्षितों के सरोकारों के कंेद्र में रखने से नया केंद्रवाद बना है। बाजारवाद की अर्थव्यवस्था ने हर माल चालू, हर माल बिकाऊ की नई भूमि तैयार की है। आज उत्तर आधुनिकतावाद आकाश की तरह व्यापक धारणा है, जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। हां, थोड़ा-बहुत समझा भर जा सकता है। 
  • Mere Saakshaatkaar : Mridula Sinha
    Mridula Sinha
    300 270

    Item Code: #KGP-9346

    Availability: In stock

    रचनाकार का मन स्वयं में एक रहस्य है। मन में निहित भावनाएं, संकल्पनाएं, स्वीकृतियां, असहमतियां, प्रार्थनाएं आदि किस विध में या किस शिल्प में व्यक्त होंगी यह एक अबूझ तथ्य है। विद्वानों का ऐसा कहना है कि जब कोई रचनाकार को अपने प्रश्नों से उकसाता है तब मन को प्रकट होने का एक भिन्न प्रयोजन मिल जाता है। ‘किताबघर प्रकाशन’ की बहुचर्चित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला ‘मेरे साक्षात्कार’ के इस संकलन में सुप्रसिद्ध  रचनाकार मृदुला सिन्हा ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पक्षों पर बात की है। उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत, अनुभव व्यापक और चिंतन बहुमुखी है, इसलिए उनके उत्तर जीवन व समय की गहराइयों में प्रवेश कर जाते हैं।
    एक प्रश्न के उत्तर में मृदुला सिन्हा कहती हैं, ‘साधारण से साधारण नारी बहुत कुछ दे जाती है और उसका यह देना ही मुझे आंदोलित करता है और मेरे साहित्य के लिए प्रेरणादायी प्रसंग बनता है। सामाजिक समस्याओं को सूचीबद्ध कर देना ही साहित्यकार का काम नहीं है। उसी समस्याग्रस्त समाज व्यवहार से समस्याओं का निदान ढूंढ़कर भी प्रस्तुत करना साहित्य का उद्देश्य है।’ स्पष्ट है कि वे वितर्कों या कुतर्कों की उलझनों से दूर रहकर समाज के सकारात्मक विश्लेषण में रुचि रखती हैं। उनको तुलसीदास के इस कथन पर भरोसा है—‘छूटहि मल कि मलहि के धेये, घृत कि पाव कोउ बारि बिलोये।’
    मृदुला सिन्हा के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं। केवल लेखक के रूप में नहीं सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक चिंतक, महिला हित संरक्षक आदि के रूप में भी उन्होंने अपनी प्रखर पहचान बनाई है। कहानी, उपन्यास, कविता और ललित निबंध को वे जितना साहित्य में रचती हैं, उससे अधिक जीवन में जीती हैं। इसीलिए पाठक उनकी रचनाओं और बातों में अद्भुत प्रवाह महसूस करता है।
    ‘मेरे साक्षात्कार’ के अंतर्गत मृदुला सिन्हा ने जिन तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी है, उनका संबंध व्यापक भारतीय समाज से है। इस अर्थ में ये साक्षात्कार ज्ञानप्रद और प्रेरक हैं।
  • Bachchon Ke Chhah Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1383

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 

  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-241

    Availability: In stock

    यजुर्वेद : युवाओं के लिए 
    'वेद : युवाओं के लिए' ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक 'यजुर्वेद : युवाओं के लिए' प्रस्तुत है । इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अंतर्गत समाहित किया गया है । ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ-धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है । यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है । यह 'कर्म' यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है । पारम्परिक दृष्टि से 'यज्ञ' का सीमित अर्थ होता है — अग्नि में आहुति देना । परन्तु 'यज्ञ' का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण भाव मुख्य रहता है । अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यघ के अंतर्गत आ जाते हैं । 
    इन मन्त्रों ऐसा यघ, दीघार्यु व धन-सम्पति तथा सुरक्षादि पाने  प्रार्थनाएं हैं । क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं । धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है । यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद के बढ़ावा मिलता है । बल्ह के कारन एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदुषण होता है । आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है । शांति, विश्रांति और आनंद की चाह है सबको । वह कैसे मिले ? यही मंत्र निर्देश करते हैं । 'विश्व-शांति' के लिए किया जाने वाला 'शांतिपाठ' इसी वेद की देन है । 
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो 'मन के युवा हैं' तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं । 
  • Paarijat (Novel)
    Nasera Sharma
    795 557

    Item Code: #KGP-778

    Availability: In stock


  • Swatantarata Sangharsh Ka Itihaas_100
    Hazari Prasad Dwivedi
    100 90

    Item Code: #KGP-1061

    Availability: In stock

    स्व. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक गं्रथों द्वारा हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की है। उन्होंने जहां एक तरफ अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना की वहीं दूसरी तरफ शोधपरक ग्रंथों की। निबंध-लेखन के क्षेत्रा में भी उन्होंने ललित निबंधों के सृजन द्वारा हिंदी को अत्यंत सुंदर निबंध दिए। प्रस्तुत पुस्तक स्व. आचार्य द्विवेदी के चिंतन को समझने में एक महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करती है। सैकड़ों साल की गुलामी से सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ था। भारत के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। जागरूक एवं संवेदनशील साहित्यकार इस घटना की उपेक्षा नहीं कर सकता था। स्व. आचार्य जी ने स्वतंत्रता-संघर्ष के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसमें नामांे की भरमार नहीं है। यह उनकी अपनी दृष्टि थी। इस पुस्तक का रचनाकाल सन् 1948 के बरी है। इसमें हमने किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया है। नई पीढ़ी को हमारी यह एक विनम्र भेंट है।
    —मुकुंद द्विवेदी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh (Paperback)
    Mahip Singh
    80

    Item Code: #KGP-7016

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : महीप सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maharishi Dayanand Saraswati Aur Stree-Vimarsh
    Dr. Meena Sharma
    165 149

    Item Code: #KGP-1243

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती और स्त्री-विमर्श
    महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श में वैचारिकता से अधिक रचनात्मकता है। अपनी रचनात्मकता के कारण उसकी मूल्यवत्ता एवं सार्थकता है। मूल्य और सार्थकता की तलाश हर युग में होती है। आज के स्त्री-विमर्श की दिशाहीनता की स्थिति एवं चुनौतियों के आलोक में दिशा-निर्देशक के रूप में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श, बल्कि यूँ कहें कि स्त्री के दयानंदीय विमर्श की आवश्यकता कल से अधिक आज है। इतिहास में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श की जो भूमिका थी, वर्तमान में स्त्री-विमर्श की उस भूमिका को इतिहास-बोध के साथ युगानुरूप विस्तार दिया जा सकता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maitreyi Pushpa
    Maitreyi Pushpa
    280 252

    Item Code: #KGP-2073

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फैसला', 'तुम किसकी हो बिन्नी', 'उज्रदारी', 'छुटकारा', 'गोमा हँसती है', 'बिछुड़े हुए', 'पगला गई है भागवती', 'ताला खुला है पापा', 'रिजक' तथा 'राय प्रवीण' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vishaad Math
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-54

    Availability: In stock

    जब मुगलों का राज्य समाप्त होने पर आया था तब बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा था। उस समय बंकिमचंद्र चटर्जी नेआनंद मठ' लिखा था। जब अँगरेजों का राज्य समाप्त होने पर आया तब फिर बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा। उसका वर्णन करते हुए मैंने इसीलिए इस पुस्तक कोविषाद मठ' नाम दिया।

    प्रस्तुत उपन्यास तत्कालीन जनता का सच्चा इतिहास है। इसमें एक भी अत्युक्ति नहींकहीं भी जबर्दस्ती अकाल की भीषणता को गढ़ने के लिए कोई मनगढंत कहानी नहीं। जो कुछ हैयदिसामान्य रूप से दिमाग मेंबहुत अमानुषिक होने के कारणआसानी से नहीं बैठतातब भी अविश्वास की निर्बलता दिखाकर ही इतिहास को भी तो फुसलाया नहीं जा सकता।

    विषाद मठहमारे भारतीय साहित्य की महान् परंपरा की एक छोटी-सी कड़ी है। जीवन अपार हैअपार वेदना भी हैकिंतु यह शृंखला भी अपना स्थायी महत्त्व रखती है।

    -रांगेय राघव


  • Anmol Vichaar
    Sudha Gautam
    300 270

    Item Code: #KGP-9029

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक अनमोल विचार में सुश्री सुधा गौतम ने अनेक महापुरुषों और धार्मिक ग्रंथों से अनमोल विचार संकलित किए हैं । उदाहरण के लिए—

    जिसने अपनी इच्छाओं का दमन करके मन पर विजय और शांति पा ली है, वह राजा हो या रंक, उसे जगत् में सुख ही सुख है । —हितोपदेश 

    इच्छा से दु:ख आता  इच्छा से भय आता है । जो इच्छाओं से मुक्त है, वह न दु:ख जानता है, न भय । -महात्मा बुद्ध 

    यदि तुम सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने के आकाँक्षी हो तो सबसे नीचे से चढ़ना प्रारंभ करों । -साइरल

    अधूरा काम और अपराजित शत्रु—ये दोनों बिना बुझी आग की चिंगारियों की तरह हैं । वे मौका पाकर बैठ जाएँगे और उस लापरवाह आदमी को आ दबाएँगे । -चाणक्य

    कायर लोग अपनी मृत्यु के पहले भी कई बार मरते हैं, परंतु वीर पुरुष मृत्यु का एक बार ही अभिनंदन करते हैं। -शेक्सपियर

    जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है, उसने मानो सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर ली । -वेदव्यास

    जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने ही ऊपर झेल लेता है, वही दूसरों के क्रोध से बच सकता है । वही अपने जीवन को सुखी बना सकता है। -सुकरात 

    ज्यों-ज्यों मनुष्य बूढा होता जाता है, त्यों-त्यों जीवन से प्रेम और मृत्यु से भयभीत होता जाता है । -जवाहरलाल नेहरू 

    दयालु पुरुष धन्य हैं, क्योंकि वे ही भगवान की दया को प्राप्त कर सकेंगे । -ईसा मसीह

    परोपकार-रहित मनुष्य के जीवन को धिक्कार है, क्योंकि उससे तो पशु ही धन्य हैं, जिनका चमडा भी दूसरों के काम में आता है । -विनोबा भावे 

    किसी के गुणों की प्रशंसा करने में अपना समय मत खोओ, उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करों । -कार्ल मार्क्स 

    जो मनुष्य निश्चित कार्यों को छोडकर अनिश्चित के पीछे दौड़ता है, उसके निश्चित कार्य भी नष्ट हो जाते है, अनिश्चित तो नष्ट ही हुआ रहता है । -चाणक्य 

    मनुष्य को अपने कमाए हुए धन से तब तक कोई तृप्ति नहीं होनी चाहिए, जब तक उनमें से कोई नेक काम करना न शुरु कर दे । -भगवन महावीर 

    वे राजा धन्य हैं जो पुत्रों के समान पुरवासियों को अपने सामने पूर्ण सुखी देखकर रात को चैन से सोते है । -राजतरंगिणी 

    कुटिल मत बनो, किसी भी व्यक्ति के साथ कुटिलता, धोखेबाजी और मक्कारी का व्यवहार मत करो । सभी के साथ सभ्यता, नम्रता, भद्रता और श्रेष्ठता का व्यवहार करो । -यजुर्वेद 

    माता के आँचल और घर के कोने से बड़ा ही अंतर होता है—एक तो शीतल जल का सागर होता है, दूसरा मरुभूमि । -प्रेमचंद 

    यह मानना कि हम कुछ नहीं कर सकते, सबसे बडी कायरता है । इसे त्यागो और पुरुषार्थ को जागृत करों । फिर देखोगे कि तुम्हारी उन्नति तुम्हारे हाथ में है । -मुनि गणेशवर्णी
  • Ved Kya Hain ?
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-8002

    Availability: In stock

    पुस्तक के प्रारम्भ में यह बताने की कोशिश की गई है कि वेद का अर्थ क्या है तथा वेदों का निर्माण कब हुआ । फिर चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के बारे में अलग-अलग बताया है कि उनमें से प्रत्येक में क्या-क्या है। इसके साथ ही यह भी बताया है की प्रत्येक वेद के चार भाग हैं —संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद । फिर इन चारों भागों के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है।
    इसके उपरांत वेदांगों के बारे में जानकारी दी गयी है । वेदांग छह हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र । इन छह वेदांगों के बारे में पुस्तक में सविस्तार चर्चा की गयी है । 
    चारों वेदों के आलावा चार उपवेद भी हैं । ये हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व वेद तथा स्थापत्य वेद । इनके बारे में भी आवश्यक जानकारी पुस्तक में दी गयी है ।
  • Postmortem (Paperback)
    Ajeet Kaur
    100

    Item Code: #KGP-1310

    Availability: In stock


  • Ath Nadi Katha
    Hari Krishna Devsare
    450 405

    Item Code: #KGP-219

    Availability: In stock

    अथ नदी कथा
    भारत की नदियों की पवित्रता, ऐतिहासिकता, पौराणिकता और उनके गौरवशाली वरदानों से हम सदियों से जुडे है । आम आदमी के लिए, नदी की यह कथा न केवल रोचक हो सकती है, उसके लिए प्रेरक भी हो सकती है। समय के साथ हमने कितनी ही नदियों की गाथाएँ भुला दी हैं। केवल उँगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम ही लोगों को याद हैं। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि भारत को लगभग सभी महत्वपूर्ण? नदियों के सम्मिलित किया जाए। फिर भी क्षेत्रीय महत्त्व की और छोटे यात्रा-पथ वाली नदियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है।
    इस पुस्तक में सम्मिलित नदियों का यथासंभव पौराणिक माहात्य, उनकी पौराणिक एवं लोक- प्रसिद्ध कथाएँ, उनसे संबद्ध ऋषियों, तपस्वियों की कथाएँ दी गई है । इसी के साथ उनकी उत्पत्ति, की कथाएँ, उद्गम स्थल का भौगोलिक महत्त्व और फिर आगे के यात्रा-पथ का वर्णन है। यात्रा-पथ में नदी के दोनों तटों पर बसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं औद्योगिक नगरों के साथ साथ तीर्थों, संगमों, मंदिरों आदि के लोकव्यापी महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है। ये सभी विवरण हमारी भावी पीढ़ी, युवा पीढ़ी और प्रौढ़ों-तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • Arya Samaj Ki Paanch Vibhutiyan (Paperback)
    Ashok Kaushik
    50

    Item Code: #KGP-7047

    Availability: In stock

    देश के निर्माण एवं उत्थान में आर्यसमाज के आरंभ से लेकर अब तक शतशः आत्माएं अपना सर्वस्व त्याग चुकी हैं। वे महात्मा धन्य हैं जो परिवार, जाति, देश, धर्म तथा संस्कृति के लिए आत्मत्याग करते हैं। जाति अथवा समाज ऐसे त्यागी-तपस्वी पूर्वजों का स्मरण एवं अनुसरण कर ही आगे बढ़ते हैं। महापुरुषों की जीवनियां भावी पीढ़ी को सदा ही प्रेरित करते आए हैं, उनमें महर्षि दयानंद, स्वामी श्रद्धानन्द, धर्मवीर पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी तथा महात्मा हंसराज वर्तमान शती एवं पीढ़ी के लिए विशेष उल्लेखनीय हैं।
    ‘आर्यसमाज की पांच विभूतियां’ में इन्हीं पांच महापुरुषों की संक्षिप्त जीवनी संकलित की गई है। प्रस्तुत पुस्तक आर्य किशोरों की शिक्षा को ध्यान में रखकर विशेष रूप से लिखी गई है। उन्नीसवीं शती के अंत में आर्यसमाज की स्थापना तथा सत्यार्थप्रकाश की रचना से युगपुरुष दयानन्द ने जो जागृति देशवासियों में उत्पन्न की है, ‘स्त्री शूद्रौ नाधीयाताम्’ का प्रत्याख्यान जिस सरलता एवं आधिकारिक रूप में स्वामी जी ने अपनी रचनाओं में किया है, वर्ण-व्यवस्था एवं मूर्तिपूजा के विषय में स्वामी जी ने जो विचार व्यक्त किए हैं, उन सबका समावेश इस जीवनी में बड़े सुंदर ढंग से किया गया है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya
    Ravindra Kalia
    180 162

    Item Code: #KGP-74

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jharkhand Ki Sanskritik Dharohar Saraikela Chhau
    Yogendra Prasad
    190 171

    Item Code: #KGP-398

    Availability: In stock

    झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर सरायकेला छऊ
    सरायकेला छऊ झारखंड की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है। इस नृत्य में मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि बिना संवाद के ही नर्तक पूरी कथा समझा देते हैं। इसकी ताल और गति लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
    सरायकेला छऊ 1930 के दशक से ही कलाप्रेमियों के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र रहा है। चाहे कला संस्कृति से जुड़ी हस्ती हो, बुद्धिजीवी या फिर राजनीति से ताल्लुक रखने वाली शख्सियत–सभी इस छऊ नृत्य के कायल रहे हैं। इंदिरा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘इटरनल इंडिया’ में सरायकेला छऊ को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। सरायकेला राजपरिवार ने भी इस कला के संरक्षण और संवर्द्धन में अपनी विशेष भूमिका का निर्वाह किया है। इस अनमोल कला के महत्त्व को देखते हुए राज्य सरकार प्रत्येक वर्ष चैत्र पर्व के अवसर पर ‘छऊ महोत्सव’ का आयोजन करने लगी है।
    इस नृत्य ने अपने चारू प्रदर्शन से न सिर्फ देश के कोने-कोने में अपितु विदेशों में भी अपनी धाक जमाई है। 1938 में यहाँ के कलाकारों ने इंग्लैंड, इटली, फ्रांस आदि देशों में इस कला का प्रदर्शन किया और अब तो यह भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों का अभिन्न अंग बन चुकी है। इस कला से प्रभावित होकर विदेशों से भी लोग यहाँ प्रशिक्षण के लिए आते हैं।
    भारत सरकार ने भी इस कला का सम्मान किया है। अब तक इस नृत्य से जुड़े छह कलाकारों को ‘पद्मश्री’ से नवाजा जा चुका है। झारखंड की इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत के महत्त्व को देखते हुए सन् 2010 में यूनेस्को ने सरायकेला छऊ को ‘इंटेजिबल कल्चरल हैरिटेज’ की सूची में शामिल कर लिया है। झारखंड राज्य तथा भारतवर्ष की लोकसंस्कृति में सरायकेला छऊ नृत्य शैली गौरवमयी स्थान रखती है।                  
  • Tale Of A Wasteland (Paperback)
    Phanishwarnath Renu
    495 446

    Item Code: #KGP-338

    Availability: In stock

    Phaneeshwar Nath Renu, a true son of the soil, has created in Parti Parikatha, rendered here in English as ‘Tale of a Wasteland’; a major modern classic through the original genius he brought to bear upon his theme. Renu’s deeply moving cry against an unjust social order coupled with his compassion for men; his freedom from bitterness against the establishment, and his love of common humanity backed by his creation of half a dozen powerful, living authentic figures with whom he peoples his world set against the Wasteland perpetrated by Nature on man sets him apart as a major creative genius who has come to stay. Every reader of this ‘epic in prose’ will feel real life throbbing and pulsating through each page of this book. On its broad canvas, the life of two generations has been inimitably presented by Renu with his exquisite art which creates unforgettable characters through episodes and dialogues in an idiom that shows his power over words. Indeed, no reader, once he has gone through this book, can help missing some of these characters that he has lived with while reading this saga, lighted by Renu’s vision of hope which ‘no depth of despair, no height of cynicism can possibly defeat’.
  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 825

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Wuthering Heights (Paperback)
    Emily Bronte
    125

    Item Code: #KGP-348

    Availability: In stock

    A snowstorm evening. A moorland farmhouse. A visitor from south England on a recuperation trip. And a nightmare featuring the ghost of the earlier occupant of the farmhouse—trying to get in.
    Wuthering Heights and its chambers have stood the test of time and temperaments of the illustrious Earnshaws and the dark-skinned orphan Heathcliff. Through this classic romance, Emily Bronte takes us to the rebellious young Catherine Earnshaw, who with time, grows into an opinionated, treacherous woman in love with two men. And to Heathcliff, adoration and hatred for Catherine is the stuff classics are made of. All this while two illustrious families fall prey to the perfect scheming of the dark-skinned lunatic orphan! Will her love win or will it be his hatred?
    With love, betrayal, rivalry, and revenge at its heart, this saga of the moorland farmhouse has everything that awakens the base humane emotions. Realistically real with its vivid imagery, Wuthering Heights—166 years later too lives on, because love still drives the world, and revenge still destroys it.
  • Himalaya Gaatha-4 (Samaj-Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    400 360

    Item Code: #KGP-795

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-4 (समाज-संस्कृति)
    स्वर्ग की कल्पना एक ऊँचे स्थान पर की गई है । पृथ्वी के स्वर्ग पर्वतों पर स्थित थे । हमारे पुराणों से भूगोल वर्णन के समय जिन स्थानों पर स्वर्ग बताए गए हैं, वे सभी पर्वतों पर थे । शंकर का प्रिय कैलास, कुबेर की अलकापुरी, इंद्र की इन्द्रपुरी, सब ऊँचे स्थानों पर अवस्थित थे । गंधमादन पर्वत, कैलास पर्वत तथा मेरु पर्वत के चारों और शीतांत आदि केसर पर्वतों का वर्णन मिलता है, जहाँ धार्मिक पुरुष वास करते थे । ये संपूर्ण स्थान पृथ्वी के स्वर्ग कहलाते थे । इन पर विजय पाने के लिए सभी देव, दानव और मानव प्रयत्न करते रहते ।
    पर्वतवासियों से मैदानी सभ्यता का संघर्ष होता रहा । आर्यों ने पर्वतों पर विजय पाने के लिए अनेक प्रयास किए । उन्हें परास्त किया और बार-बार पर्वतों की ओर धकेला । इस सबके बाबजूद भी पार्वती संस्कृति अपने मूल रूप में बनी रही और अनेक बाहरी प्रभावों के बाद आज भी अपने आदि रूप से संरक्षित मिलती है ।
    हिमाचल प्रदेश के अनेक भूखड़ों से आज भी वे परंपराएँ विद्यमान हैं, जो एकदम आदि परंपराएँ कही जा सकती है । प्रकृति पूजा में आकाश, भूमि, जल, पाषाण, वनस्पति पूजा  आज भी की जाती है । कुछ परंपराएँ गोपनीय ढंग से निभाई जाती हैं, जो अधिक महत्वपूर्ण है ।
    आज समाज, पर्वतीय समाज की प्रमुख विशेषता रही है । आज भी जनजातीय समाज जाति और वर्गविहीन है ।
    आज संस्कृति पर लेखन कम होता जा रहा है । संस्कृति पर लेखनी बताने वाली में वशिष्ठ एक बिरले साहित्यकार है, जिन्होंने गहरे में जाकर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से समाज का एक चित्र प्रस्तुत किया है । परंपरा की एक अमूल्य थाती शनै:- शनै: समाप्त हो रही है । इसे पिछडी सभ्यता का द्योतक माना जा रहा है। ऐसे में यह कार्य और भी मह्रत्वपूर्ण हो जाता है।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत चौथे खंड मेँ समाज और संस्कृति की सूक्ष्म मान्यताओं, लोकविश्वासों, रीति-रिवाजों और संस्कारगत परंपराओं पर ऐसी दुर्लभ सामग्री दी जा रही है, जो अब मिटने के कगार पर है ।
  • Insaani Nasl
    Nasera Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-800

    Availability: In stock

    इनसानी नस्ल
    इस संग्रह की सभी कहानियाँ बड़ी सादगी से जीवन के यथार्थ को सामने रखती हैं। अंतर्धारा में एक आग्रह अवश्य महसूस होता है कि इनसान ने अपने ‘स्वयं’ को जीना छोड़ दिया है। वह अपने अंदर यात्रा करने की जगह बाहर की भौतिक दुनिया के कोलाहल में भटकता जा रहा है, जो उसकी सारी सहजता को ख़त्म कर उससे सुख के सारे क्षण छीनता जा रहा है। कभी-कभी ऐसा भी संकेत मिलता है कि वह पाषाण युग की प्रवृत्तियों की तरफ़ अकारण बढ़ रहा है, जो सारी उपलब्धियों के बावजूद उसको वह ‘चैन’ नहीं दे पा रही हैं, जिसका वह सही हक़दार है। आखि़र यह इनसानी नस्ल, जो एक-दूसरे की उत्पत्ति की सिलसिलेवार कड़ी है, वह वास्तव में चाहती क्या है ? एक-दूसरे से हाथ मिला मानव-शृंखला को मज़बूत बनाना या फिर एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर अलगाव की भूमिका निभाना ? यह अलगाव हमें सभ्यता के किस मोड़ पर ले जाएगा ? अलगाव की इस मानसिकता से मुक्त होकर इनसान एक नए युग का सूत्रपात क्यों नहीं कर सकता ? क्या वह आने वाली नस्ल की ख़ातिर जीवन से निरंतर ग़ायब होते जा रहे ‘चैन’ को पाने के लिए कुछ नहीं करेगा ? क्या वह अपने अंदर की यात्रा कर इनसानियत के आलोकित क्षितिजों को छूना नहीं चाहेगा ? इन्हीं सवालों से जूझती ये कहानियाँ आज के इनसान के दिल व दिमाग़ की टकराहट की साक्षी हैं, जो अनेक बुनियादी सवालों से साक्षात्कार करती नज़र आती हैं।
  • Soochana Ka Adhikaar (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1438

    Availability: In stock


  • Aaviskaron Ki Kahaniyan
    Maitreyi Pushpa
    60

    Item Code: #KGP-979

    Availability: In stock


  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7210

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Deevaar Ke Us Paar
    Shanta Kumar
    200 180

    Item Code: #KGP-1965

    Availability: In stock

    दीवार के उस पार
    इस पुस्तक से एक कैदी ने जेल से भोगे अपने मूक कष्टों को शब्द दिए हैँ। यह कैदी मेरे जीवन की आशा हैं- मेरे पति, जिन्होंने अपने जीवन से दो बार जेल की घोर यातनाएँ झेली है और अँधेरों के पार कुछ देखने की लगातार कोशिश की है । एक बार उन्हें 1953 में और दूसरी बार 1973 में जेल जाना पडा । उनका सहानुभूति-भरा हृदय और सृजनात्मक मानस उन्हें उन दिनो लिखने के लिए विवश करता रहा और उन्होंने कुछ कहानियों, उपन्यास, कविताएं  और जेल-संस्मरण लिखे ।
    ये संस्मरण जेल से उनके जीवन को दर्शन है-उसके लिए जो कभी जेल न गया हो-भगवान् ऐसा अवसर कभी दे भी न-ये अनुभव अत्यंत रोमांचक और हृदयविदारक होंगे ।
  • Sitaron Ke Akshar Aur Kirno Ki Bhasha
    Amrita Pritam
    250 200

    Item Code: #KGP-1974

    Availability: In stock

    यूँ तो कुदरत की यह इबारत कई तरह के
    कागजों पर लिखी मिलती है-

    इन्सान के हाथ-पैरों से लेकर उसके नख-शिख को
    भी वह कागजों की तरह इस्तेमाल
    करती है और धूप-छांव की हर गर्दिश में से
    गुजरती हुई वह पशुओं-पंछियों 
    की आवाजों तक को भी अपने कागज बना लेती
    है । पर उसके विज्ञान को
    एक खास पहलू से जानने के लिए, मैंने
    सिर्फ वह कागज चुने-
    इन्सान की सोई हुई आँखो के सपने, जिन पर
    कुदरत की लिखी हुई इबारत
    को हर इंसान देखता है, पर पढने में
    समर्थ नहीं होता ... 

  • Sahitya : Vividh Vidhayen
    Shashi Sahgal
    240 216

    Item Code: #KGP-755

    Availability: In stock

    साहित्य: विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Su-Raaj
    Himanshu Joshi
    80 72

    Item Code: #KGP-2105

    Availability: In stock

    सु-राज
    तीन अलग-अलग उपन्यासिकाएँ होने के बावजूद, कहीं ये एक ही तसवीर में समाई तीन अलग-अलग तसवीरें हैं। रूप, रंग, भावभूमि और निरूपण, सब अलग- अलग हैं। अलग-अलग हैं इनकी पृष्ठभूमियाँ । हिमालय का कुमाऊँनी क्षेत्र है, तराई की अभिशप्त धरा और पश्चिमी नेपाल का अत्यंत पिछड़ा अंचल । अनेक अंतर्विरोध हैं, परन्तु इन भिन्नताओं के बावजूद भी कहीं घोर अभिन्नता । यों अभाव, अन्याय से उपजा मानव-मात्र का संत्रास सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र समान है । यंत्रणाएँ समान हैं ! रूप और आकार में अंतर हो सकता है, परन्तु मनुष्य, सर्वत्र मनुष्य ही है, उसकी वेदना भी सर्वत्र उसी की वेदना है । उसे देश, काल, रूप, रंग, धर्म, भाषा से विभाजित नहीं किया जा सकता ।
    संघर्षरत 'सु-राज' के गांगि 'का हों, या अन्याय की आग में धधकता 'अंधेरा और' का परसिया या 'काँछा' उपन्यासिका का नायक सुदूर नेपाल का अनाथ श्रमिक शिशु काँछा, अपने अस्तित्व के लिए जूझते ये पात्र, मात्र पात्र ही नहीं, तिल-तिल मरकर कहीं अपने समय के 'काल-पात्र' भी हैं ।
    साहित्य में हिमांशु जोशी ने नए-नए प्रयोग किए हैं, उनका एक उदाहरण है यह कृति, जो अतिशय द्रावक ही नहीं, दाहक भी है।
  • Guru-Dakshina
    Sanjiv Jaiswal
    300 270

    Item Code: #KGP-784

    Availability: In stock

    गुरु-दक्षिणा
    "सर, आप चाहते थे कि मैं केवल दो रातों के लिए आपके पास आ जाऊं लेकिन आपका बेटा पूरी जिंदगी के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता है," दीपा ने एक-एक  शब्द पर जोर देते हुए कहा ।
    सड़ाक...सड़ाक...सड़ाक...जैसे नंगी पीठ पर चाबुक पड़ रहे हों। प्रो. कुमार का सर्वांग कांप उठा। उन्होंने कभी स्वप्न में भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी।  दीपा ने एक झटके में उनके चेहरे का नकाब नोच डाला था। अपने बेटे के सामने ही उन्हें नंगा कर दिया था। उनका चेहरा सफेद पड़ गया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सारा रक्त चूस लिया है।
    अवाक तो प्रकाश भी रह गया था। चंद क्षणों तक तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करें। फिर उसने दीपा की बाहों को पकड़ झिंझोड़ते हुए कहा, "दीपा, तुम होश में तो हो। तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो?"
    "अच्छी तरह मालूम है लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे डैडी रिसर्च पूरी कराने के लिए मुझसे क्या गुरु-दक्षिणा मांग रहे थे । यदि सत्य उजागर किए बिना मैं तुमसे शादी कर लेती तब तुम्हारे डैडी जिंदगी भर मुझसे आंखें न मिला पाते । वे भले ही गुरु का धर्म भूल गए हों लेकिन मैं शिष्या का धर्म नहीं भूली हूँ। इसलिए अपनी बहू के सामने आजीवन जलील होने की जलालत से मैं उन्हें मुक्ति देती हूँ। यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी ।"

    -इसी संग्रह से
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar (Paperback)
    Vishnu Nagar
    100

    Item Code: #KGP-1390

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।


  • Netaji Subhash Chandra Bose : Sooktiyan Evam Sandesh
    Shravan Kumar
    75 68

    Item Code: #KGP-9199

    Availability: In stock

    नेताजी सुभाषचंद्र बोस: सूक्तियां एवं संदेश
    यह हमारा प्रथम कर्तव्य है कि हम स्वतंत्रता की इच्छा पहले अपने-आप में और देशवासियों में जाग्रत करें। यदि हम अपने हृदय की गहराइयों से स्वतंत्रता का नारा लगाना चाहते हैं तब हमें बंधनों की कसक और दासता की चुभन की अनुभूति करनी चाहिए। जब यह भावना तीव्र हो जाएगी तब हम अनुभव करेंगे कि स्वतंत्रता के बिना जीवन जीने के योग्य नहीं है। इस अनुभूति के पश्चात् ही एक ऐसा समय आएगा जब हमारी संपूर्ण आत्मा स्वाधीनता के लिए बेचैन हो उठेगी।

    हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ ही नहीं है, हमारा युद्ध विश्व साम्राज्यवाद के साथ भी है, जिसका एक महत्त्वपूर्ण अंग ब्रिटिश साम्राज्यवाद है। इसलिए हम केवल भारत के लिए ही नहीं लड़ रहे हैं, हम मानवता के लिए लड़ रहे हैं। भारत की मुक्ति मानवता की मुक्ति है।
    -इसी पुस्तक से
  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Path Ke Daavedaar
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-866

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Roya Nahin Tha Yaksh
    Hari Ram Meena
    140 126

    Item Code: #KGP-1847

    Availability: In stock


  • Tremontana
    Urmila Jain
    320 256

    Item Code: #KGP-9371

    Availability: In stock

    गैबरील गार्सिया मार्कवेज की कहानियों के अनुवाद का संग्रह ट्रेमोण्टाना उत्सवी तथा जीवन की विलक्षणताओं से भरपूर है। ये कहानियां मार्कवेज की उदारता तथा पात्रों को महसूस करने से अपनी ताकत बटोरती हैं जो अच्छी भी हैं, खराब भी और अशिष्ट भी पर निर्दोष हैं। तभी तो मार्कवेज की गणना शताब्दी के स्मरणीय लेखकों में की जाती है और उन्हें किसी भी भाषा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लेखक माना जाता है। उन्हें 1982 में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। पाठक निश्चित ही इन कहानियों को पढ़कर प्रमुदित होंगे।
  • Antyakshari Kosh
    Laxmi Narayan Garg
    700 525

    Item Code: #KGP-233

    Availability: In stock


  • Rangey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-151

    Availability: In stock

    रंगे ग़ज़ल
    यह एक अनूठा दस्तावेज है, जिसे एक प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।  इस संकलन की कुछ गज़लें जहां अपनी परम्पराओं के साथ नजर आयेंगी, वहीं कुछ ग़ज़लों का रूप रूढियों और परम्पराओं से हटकर जमाने के नयेपन को छूता नजर आयेगा ।
    इस संकलन में पुराने शाइरों की ग़ज़लों के साथ ही कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी सम्मिलित की गयी हैं, जो आज लोगों के दिलों में अपनी जगह बना रहे हैं तथा ग़ज़ल के प्रगतिवादी स्वरूप को नयी दिशा ध्यान कर रहे हैं । इन शाइरों में प्रमुख हैं-डा० बशीर 'बद्र', निदा फाजली, अख्तर शीरानी, ताहिर अली 'ताहिर', यूसुफ हसन, मुनीर नियाजी, मुजफ्फर हनफी, परवीन 'शाकिर', शोहरत बुखारी, शह्रयार, महकूर ‘खिजां', जिगर श्योपुरी, तस्नीम सिद्दीकी, अहमद 'कमाल', जफर 'इक्बाल', खालिद अहमद, जावेद शाहीँ, कतील शिफ़ाई, कर्रार 'नूरी', 'जोश' मलीहाबादी, साहिर होशियारपुरी, निश्तर खानकाही, मजीद अमजद, कुमार 'पाशी' और गुलशन मदान आदि ।
  • Toro Kara Toro-5 (Sandesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-667

    Availability: In stock


  • Hindi Ghazal, Yaani…
    Dixit Dankauri
    190 171

    Item Code: #KGP-9086

    Availability: In stock


  • Sakshatkar Samvad Aur Vartayen
    Rajendra Yadav
    275 248

    Item Code: #KGP-779

    Availability: In stock


  • Mori Ki Int
    Madan Dikshit
    150 135

    Item Code: #KGP-9073

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-4 (Nirdesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-740

    Availability: In stock


  • Naath Siddhon Ki Rachnayen
    Hazari Prasad Dwivedi
    295 266

    Item Code: #KGP-209

    Availability: In stock


  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche
    Jigar Muradabadi
    250 225

    Item Code: #KGP-98

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून की रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Million Dollar Note Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    125 113

    Item Code: #KGP-283

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात हैं ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Mere Saakshatkaar : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    195 176

    Item Code: #KGP-739

    Availability: In stock


  • Nayi Kavita Ki Bhasik Sanrachana
    Sarita Vaidya
    125 113

    Item Code: #KGP-9295

    Availability: In stock

    प्रस्तुत ग्रंथ में साहित्य विश्लेषण की संरचनावादी पद्धति को आधार मानकर ‘भाषिक संरचना’ को परिभाषित किया गया है, यह मानते हुए कि एक साहित्यिक कृति साधारण भाषा से निकली हुई एक विशिष्ट भाषिक सरंचना है, जो अपने-आप में स्वनियमित और संपूर्ण होती है। भाषिक संरचना के संघटक तत्व और कुछ ऐसे प्रतिमान निर्धारित करने का प्रयास किया गया है, जिनके द्वारा कृति की भाषा की राह से गुजरते हुए उसका वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा सकता है। अतः इस प्रकार कृति के रूप से वस्तु तक, शैली से विषय तक, भाषा से विचार तक तथा संरचना से संवेदना तक पहुंचा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह ग्रंथ काव्यभाषा का विभिन्न समीक्षात्मक व भाषा संबंधी दृष्टिकोणों का अध्ययन-विश्लेषण करते हुए ‘नयी कविता’, परवर्ती कविता अथवा किसी भी देश-काल से सम्बद्ध कविता की समझ के लिए एक नवीन वस्तुनिष्ठ दृष्टि प्रदान कर सकता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar (Paperback)
    Ramdhari Singh Diwakar
    125

    Item Code: #KGP-7007

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : रामधारी सिंह दिवाकर
    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिल्लेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न अपना है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भा दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।
    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।
    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार','खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानो', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock

    ”भारत का वह एक प्रान्त था, प्रान्त की वह राजधानी थी, राजधानी का वह क्लब था। देखें तो पूरा देश ही था... क्योंकि अफसर जो यहाँ आते थे, वे देश के कोने-कोने से थे।“...
    ”ये जो खेल रहे हैं...आला सर्विस के हैं, बाहर और यहाँ खेल में भी वे स्टार हैं। यहाँ से जाकर कुर्सी पर बैठ जायेंगे, सरकार हो जायेंगे। सरकारी खाल ओढ़े बैठे। उस खोल के भीतर सब छिपा रहता है, जो यहाँ खेल में झलक जाता है क्योंकि खेल में भीतर की प्रवृत्तियाँ बाहर आये बिना नहीं रहतीं।
    स्टार...जो ये खुद को लगाते हैं, या जंगल चर रहे जानवर, किसिम-किसिम के जानवर...ये क्या हैं...गधा सोच रहा था।“
    प्रशासन के इस जंगल में हाथी, हिरन, ऊँट, घोड़ा, खच्चर, तेंदुआ, रीछ, बायसन, बन्दर तो हैं ही, बारहसींगा, नीलगाय और शिपांजी भी हैं। सबसे ऊपर है शेर-सीनियर। वह जाल भी खूब दिखाई देता है जो उनकी उछलकूद अनायास ही बुनती होती है। यह है ‘अरण्य-तंत्र’, गोविन्द मिश्र का ग्यारहवाँ उपन्यास, जिसमें वे जैसे अपनी रूढ़ि (अगर उसे रूढ़ि कहा जा सकता है तो)-संवेदनात्मक गाम्भीर्य-को तोड़ व्यंग्य और खिलंदड़ेपन पर उतर आये दिखते हैं। यहाँ यथार्थ को देखा गया है तो हास्य की खिड़की से। फिर भी ‘अरण्य-तंत्र’ न व्यंग्य है, न व्यंग्यात्मक उपन्यास। अपनी मंशा में यह लेखक के दूसरे उपन्यासों की तरह ही बेहद गम्भीर है।
    ”बायीं तरफ़ की सिन्थैटिक कोर्ट-कोर्ट नं. 2 के ठीक ऊपर लॉन के किनारे कभी दो बड़े पेड़ थे, जिनमें से एक पहली कोर्ट बनाने के लिए जो खुदाई हुई थी उसके दौरान बलि चढ़ गया। दायीं तरफ़ की कोर्ट-कोर्ट नं. 1 के आखिरी छोर पर भी दो बड़े पेड़ थे-जुड़वाँ, एक हल्के गुलाबी रंग के फूलों वाला, एक हल्के बैगनी रंग के फूलों वाला। उनमें से एक कोर्ट नं. 1 के तैयार होने के बाद शेर-सीनियर की सनक और सियार-पाँड़े की चापलूसी में ढेर हो गया। तो बड़े पेड़ अब दो ही बचे थे...एक इस तरफ़, एक उस तरफ़...
    दो वे पेड़ अलग-थलग पड़े, अकेले थे, उदास...भयभीत भी।“ 
  • Badalte Rang
    Ram Swaroop Arora
    150 135

    Item Code: #KGP-1826

    Availability: In stock

    बदलते रंग
    समय परिवर्तनशील है। समयानुसार सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य जाति की जीवन शैली एवं संस्कृति भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही है। जो जीवन पद्धति, सभ्यता-संस्कृति आज से कुछ ही वर्ष पूर्व तक थी, वह आज परिवर्तित होकर कहाँ की कहाँ पहुँच गई है। हमारा राष्ट्र कालचक्र के प्रवाह से एक नए युग की ओर बढ़ रहा है। कहा नहीं जा सकता कि परिवर्तन का यह रंग उसे किस प्रकार के विकास की ओर ले जाएगा अथवा पतन के गर्त में पहुँचा देगा। इक्कीसवीं शताब्दी का कालक्रम इसका साक्षी होगा।
    प्रस्तुत संग्रह में कुछ कहानियाँ भारतीय स्वतंत्रता के भूले-बिसरे क्रांतिकारियों के जीवन-वृत्त से, कुछ सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन, निजी अनुभव एवं राजस्थान के ग्रामीण कृषि संबंधी कार्यकलापों से तथा कतिपय कथागल्पों से संबंधित हैं, जो हमारे आसपास के जनजीवन पर गहन प्रभाव डालती हैं।
    विद्वान् पाठक इन्हें पढ़कर विचार करें कि हम, हमारा राष्ट्र व समाज तब कहाँ थे और आज कहाँ आ पहुँचे हैं ? क्या हमारा वास्तविक विकास हुआ है ? या अब तक विकास के नाम पर किया गया समस्त कार्य एक छलावा मात्र है तथा अनैतिक, भ्रष्ट एवं पतन की ओर ले जाने वाले कार्यों का एक पुलिंदा है ? मैं अपनी बुद्धि-कल्पना एवं भावनाओं के अनुरूप जो कुछ लिख सका, वह सब आपकी सेवा में समर्पित है।               
    --रामस्वरूप अरोड़ा
  • Shiksha Ki Gatisheelta : Avrodh, Navachar Evam Sambhavnayen
    Jagmohan Singh Rajput
    520 468

    Item Code: #KGP-426

    Availability: In stock

    शिक्षा की गतिशीलता : अवरोध, नवाचार एवं संभावनाएं 
    हमारा समाज शिक्षा से अनेक प्रकार की अपेक्षाएं रखता है, मुख्य रूप से यह की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता बढ़ा सकेगी - ऐसी इच्छा प्रत्येक व्यक्ति के मानल में सदा बनती है । आज यह सर्वमान्य है कि शिक्षा को सभी तक पहुंचना है, उसके लिए समाज तथा सरकार दोनों को लगातार प्रयास करना है और 21वीं सदी में कोई भी व्यक्ति शिक्षा के प्रभाव-क्षेत्र बाहर रहकर सामान्य जीवनयापन नहीं कर सकता । अब सामान्य परिवार भी यह समझने लगे हैं की शिक्षा व्यक्ति के मानवीय गुणों व मूल्यों के विकास में सबसे अधिक योगदान कर सकती है । 
    प्रस्तुत पुस्तक में सारे लेख सामान्यजन को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं । ये लेखन के सरे देश में शिक्षाविदों से लेकर अध्यापकों, पालकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बच्चों के साथ लगातार जारी रहे संवाद के आधार पर लिखे गए हैं । यह प्रयास लगातार रहा है कि शिक्षा में रुचि लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति उन्हें पढ़कर चिन्तन-मनन कर सके और अपना विचार परिपक्व कर सके । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash
    Uday Prakash
    395 316

    Item Code: #KGP-904

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ekant Ke Eshan
    Ram Niranjan Sharma 'Thimaun'
    140 119

    Item Code: #KGP-9200

    Availability: In stock

    प्रस्तुत निबंध-संग्रह ‘एकांत के क्षण’ चार-पांच वर्षों का प्रयास है। एकांत के क्षणों में विचार करते हुए हर एक निबंध का जन्म हुआ तथा मैंने उसे तत्काल भाषा की पोशाक पहनाई। इनमें से कई निबंध पत्र-पत्रिकाओं में भी छपे तथा पाठकों के द्वारा मुझे प्रोत्साहन भी प्राप्त हुआ। इस कृति एक निबंध ‘दक्षिण भारत की नर्सें’ को सफल निबंधकार स्व. डाॅ. प्रभाकर माचवे ने बहुत पसंद किया था तथा अपने स्नेहाशीष से मुझे गौरवांवित किया था। उनके उस स्नेहाशीष के कारण ही मुझे मेरी क्षमता का आभास हुआ और मैं इस दिशा में चल पड़ा।
    पिछले पांच दशकों में मैंने जो कुछ देखा है, पढ़ा है, सुना है और जो कुछ भोगा है वही सब कुछ इन निबंधों में आपको मिलेगा। स्पष्ट है कि लेखक समाज में जो कुछ देखता है या सुनता है उसे अपनी शैली की वेशभूषा पहनाकर पाठकों के समक्ष रख देता है। मैंने भी यही किया है।
    जीवन-भर संस्कृत का विद्यार्थी रहा हूं तथा गीताध्यायी भी रहा हूं अतः संस्कृत की सूक्तियों से मोह छूट नहीं पाता और यही कारण है कि इन निबंधों में संस्कृत-सूक्तियां आपको यत्र-पत्र नजर आएंगी। राजस्थान तथा राजस्थानी भाषा का आभास भी आपको हो सकता है, क्योंकि मैं राजस्थानी हूं।
    —रामनिरंजन शर्मा ‘ठिमाऊ’
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj
    Rituraaj
    150 135

    Item Code: #KGP-224

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही हैं । बहुराष्ट्रीय निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे हैं और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है; वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कम दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते हैं और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Katha Ki Afwah
    Chaitanya Trivedi
    280 224

    Item Code: #KKA

    Availability: In stock

    ‘उल्लास’ संग्रह की ‘खुलता बंद घर’ एवं ‘जूते और कालीन’ के जरिए चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा सृजन की नई ऊचाइयों पर बात कर सकते हैं। कविता, कहानी और व्यंग्य को फेंटकर चैतन्य अपनी लघु कथाओं को सबसे अलग खड़ा कर लेते हैं।  इन कथाओं में एक व्यक्ति, अपनी स्वतंत्र चेतना के साथ निरंतर निरुपाय परिस्थितियों का सामना करता जान पड़ता है। पाठक को एक अतिरिक्त आस्वाद के साथ आत्ममनोरंजन भी प्राप्त हो सके ऐसा प्रयास करती हैं ये लघुकथाएँ। सार्थक साहित्य का पैमाना भी यही है कि वह कागज पर संपन्न होने के बाद पाठक के मन में फिर से शुरू हो और कुछ नया रचे। कुछ ऐसा ही चैतन्य के इस नए लघुकथा संग्रह कथा की अफवाह में पाएंगे। 
  • Puraskrit Bachchon Ki Gaurav Gathayen
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-319

    Availability: In stock

    जिस तरह हर इंसान के भीतर एक बच्चा छिपा होता है, उसी तरह हर बच्चे के अंदर भी एक जिम्मेदार नागरिक का भाव रहता है। परिस्थिति आने पर बच्चे की उम्र से परे यह भाव परिलक्षित भी हो उठता है। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित बच्चों के भीतर भी यही जिम्मेदारी नजर आती है। बालपन में भी दूसरों के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा देना इन बच्चों के भीतर छिपे जिम्मेदार नागरिक की पहचान ही तो है। 
    आज जबकि ‘बड़े’ अपनी जिम्मेदारियां भूलते जा रहे हैं या समय आने पर उनसे बच निकलने का प्रयास करते हैं, बच्चों में जिम्मेदारी का यह भाव न केवल सराहनीय बल्कि अनुकरणीय भी है। हमारा यह भी फर्ज बनता हे कि बच्चों के प्रयास को समाज के सामने लाएं। शायद यही वजह है कि अब तो मुझे ही साल जनवरी माह के तीसरे सप्ताह में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से मुलाकात का इंतजार रहने लगा है। 
    इस पुस्तक को तैयार करने में सक्रिय सहयोग देने के लिए मैं अपने साले साहब विनोद गुप्ता का विशेष आभार प्रकट करना चाहूंगा। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अपने स्थानांतरण के चलते उनके सहयोग कि बिना मेरे लिए यह पुस्तक तैयार कर पाना निस्संदेह मुश्किल था।
    —संजीव गुप्ता 
  • Sarhad Paar Ki Bisaten
    Kanhiya Lal Nandan
    180 162

    Item Code: #KGP-9195

    Availability: In stock

    महानायकों की मुसीबत यह होती है कि उन्हें एक साइकिलबाज की तरह कर समय पैडल चलाते रहना पड़ता है, क्योंकि पैडल रुका नहीं कि सवार लुढ़का। बल्कि आगे जाने के लिए उसे पैडल मारने में मेजी से काम लेना होता है, वरना चढ़ाई की दौड़ में उसके पिछड़ जाने का खतरा भी रहता है।
    ये आलेख एक तरह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण हैं, जो लगातार घूमते चक्रव्यूह के माध्यम से अपने समय की तस्वीर पेश करते हैं। एक संक्षिप्त कालखंड अपने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों को दृष्टि में रखकर आकार लेता दिखाई दे, यही इन आलेखों की सार्थकता है। किसी भी देश के इतिहास में दो-चार साल का समय कोई बड़ी अहमियत नहीं रखता, लेकिन उन दो-चार सालों के घटनाक्रम को काटकर समूचे इतिहास-क्रम को समझा भी नहीं जा सकता। ये आलेख उस इतिहास-क्रम को समझने में मदद करेंगे, ऐसा विश्वास है।
  • Helen Keller
    Vinod Kumar Mishra
    350 315

    Item Code: #KGP-240

    Availability: In stock


  • Hum Yahan The
    Madhu Kankria
    590 472

    Item Code: #KGP-9351

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • Namvar Singh Ka Aalochna-Karm : Ek Punah Paath
    Bharat Yayavar
    250 225

    Item Code: #KGP-791

    Availability: In stock

    नामवर सिंह की लिखित आलोचना की पुस्तकें काफी पुरानी हो गयी हैं, फिर भी उनका गहन अवगाहन करने के  बाद यह कहा जा सकता है कि उनमें आज भी कई नई उद्भावनाएं और स्थापनाएं ऐसी हैं, जिनमें नयापन है और भावी आलोचकों के लिए वे प्रेरक हैं । उनकी पुनर्व्याख्या और पुनर्विश्लेषण की काफी गुंजाइश है । नामवर सिंह ने अपने वरिष्ठ आलोचकों की तुलना में कम लिखा है, पर गुणवत्ता की दृष्टि से  वे महान कृतियाँ हैं । तथ्यपरक, समावेशी और जनपक्षधरता से युक्त उनकी आलोचना बहुआयामी है । उनकी आलोचना आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक है । पुरानी होकर भी उसमे ताजापन है । वह साहित्य की अनगिनत अनसुलझी गुत्थियों  को सुलझाती है और साहित्य-पथ में रोशनी दिखती है । 
  • Kaagaz Ki Naav
    Nasera Sharma
    595 446

    Item Code: #KGP-472

    Availability: In stock

    नासिरा शर्मा हिंदी कथा साहित्य में अपनी अनूठी रचनाओं के लिए सुप्रसिद्ध हैं। उनकी कथा रचनाएं समय और समाज की भीतरी तहों में छिपी सच्चाइयां प्रकट करने के लिए पढ़ी व सराही जाती हैं। ‘काग़ज़ की नाव’ नासिरा शर्मा का नया और विशिष्ट उपन्यास है। यह उपन्यास बिहार में रहने वाले उन परिवारों का वृत्तांत है, जिनके घर से कोई न कोई पुरुष खाड़ी मुल्कों में नौकरी करने गया हुआ है। वतन से दूर रहने वाले यहां छोड़ जाते हैं बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक का भरा-पूरा संसार। खाड़ी मुल्कों से आने वाले रुपए...और रिश्तों के अंधेरे उजाले। ‘काग़ज़ की नाव’ शीर्षक एक रूपक बन जाता है, यानी ज़रूरतों और ज़िम्मेदारियों के समंदर को चंद रुपयों के सहारे पार करने की कोशिश।
    उपन्यास महजबीं और अमजद की बड़ी बेटी महलकष के पारिवारिक तनाव को केंद्र में रखकर विकसित हुआ है। महलकष के ससुर ज़हूर और ख़ाविन्द ज़ाकिर के बीच भावनाओं का जो चित्रण है वह पढ़ने योग्य है। मुख्य कथा के साथ भोलानाथ, कैलाश, बिंदू, सुधा, कांता, राजेश, त्रिसुलिया, क्रांति झा और मुक्ति झा आदि चरित्रों की बेहद मानीख़ेज़ उपकथाएं हैं।
    सबसे मार्मिक गाथा है मलकषनूर की। मलकषनूर यानी प्रकाश की देवी। मलकषनूर अपने अस्तित्व की रोशनी तलाश कर रही है, उन अंधेरों के बीच जो सदियों से औरत के नसीब का हिस्सा बने हुए हैं। मलकषनूर की इस तलाश का अंजाम क्या है, इसे लिखते हुए नासिरा शर्मा ने विमर्श और वृत्तांत की ऊंचाइयों को छू लिया है।
    नासिरा शर्मा यथार्थ के पथरीले परिदृश्य में उम्मीद की हरी दूब बखूबी पहचान लेती हैं। किस्सागोई उनका हुनर है। उनके पास बेहद रवां दवां भाषा है। सोने पर सुहागा यह कि इस उपन्यास में तो भोजपुरी भी खिली हुई है।
    ‘काग़ज़ की नाव’ ज़िंदगी और इनसानियत के प्रति हमारे यकीन को पुख़्ता करने वाला बेहद ख़ास उपन्यास है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai
    Hari Shankar Parsai
    200 180

    Item Code: #KGP-9305

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Antarctica Abhiyan
    Hridya Nath Dutta
    425 383

    Item Code: #KGP-891

    Availability: In stock

    अंटार्कटिका अभियान
    हमारी पृथ्वी असंख्य रत्नों और अनेक रहस्यों से भरी हुई है । प्रकृति ने भी इसे सजाने-सँवारने के लिए अनुपम सौंदर्य लुटाया है । इंसान हमेशा से ही पृथ्वी के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए प्रयत्नशील रहा है । अपने ज्ञान में वृद्धि के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में अधिक से अधिक दोहन भी इसका मूल कारण है । बरक्स इसके पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग अब भी इंसान के द्वारा पूरी तरह जाना-समझा नहीं गया है । अंटार्कटिका क्षेत्र भी उन्हीं भागों में से एक है ।
    कहने की ज़रूरत नहीं कि अंटार्कटिका एक ऐसा भूभाग है, जो अपने अद्भुत सौंदर्य, स्वच्छ वातावरण, शुद्ध जल के अकूत  भंडार की वजह से हमेशा से वैज्ञानिको और पर्यावरणविदों के आकर्षण का केंद्र रहा है । समय-समय पर पूरे विश्व से वैज्ञानिको के दल वहां जाकर शोध और अध्ययन करते रहते है । कई देशों ने वहाँ अपने स्टेशन भी स्थापित किए हैं । गर्व की बात है कि इस मुहिम से भारत भी किसी से पीछे नहीं है ।
    भारतीय वैज्ञानिकों के अनेक दल कई बार अंटार्कटिका जाकर यहीं के वातावरण पर शोध करते रहे है । ऐसे ही अंटार्कटिका अभियान दलों में तीन बार डॉ० हृदयनाथ दत्ता और दो बार डॉ० जसवंत सिंह भी शामिल होकर कई शोध-कार्यों में हिस्सा ले चुके है । लगभग दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी उन अद्भुत यात्राओं के संस्मरणों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करने की इच्छा जाहिर की; लेकिन उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों और वहाँ की विशेषताओं को उन्होंने लिपिबद्ध तो कर दिया है, लेकिन पुस्तक के रूप में आने से पहले इसके संपादन की आवश्यकता है । फलस्वरूप यह जिम्मेदारी उन्होंने मुझे सोप दी । पुस्तक के संपादन के दौरान मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इसमें वैज्ञानिकता के साथ ही रोचकता भी बनी रहे । इस प्रयत्न में मैं कहाँ तक सफल हुआ यह तो पाठक ही तय करेंगे, लेकिन इतना निश्चित है कि यह पुस्तक अंटार्कटिका को जानने-समझने और उससे जुडे असंख्य रोचक तथ्यों से परिचित कराएगी । साथ ही भविष्य में उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय खतरों के प्रति आगाह भी करेगी ।
  • Saanch Kahoon To…
    Prabhakar Shrotiya
    35 32

    Item Code: #KGP-9105

    Availability: In stock

    'साँच कहूँ तो' राजस्थानी रासो-कथा पर आधारित स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक नया लीला-नाटक है । इसमें धारा-नरेश भोज परमार की पुत्री राजमती और अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव के विवाह, वियोग एवं पुनर्मिलन की मार्मिक कथा को मारवाड़ और मालवा की लोक-रंग-परम्परा की रंगत के कल्पनाशील प्रयोग से एक दिलचस्प मौलिक नाटक का रूप प्रदान किया गया है ।
    यह नाटक आधुनिक भारतीय रंग मुहावरे की रचनात्मक खोज में लगे प्रतिभावान साहसी रंगकर्मियों को न केवल अपनी ओर आकृष्ट कोमा बल्कि समकालीन हिन्दी नाटय-लेखन एवं रंगकर्म के लिए एक महत्वपूर्ण रचना भी सिद्ध होगा । 
    -जयदेव तनेजा

  • Bhartiya Sant Parampara
    Baldev Vanshi
    500 450

    Item Code: #KGP-750

    Availability: In stock

    भारतीय संत परंपरा
    भावी विश्व का सच्चा विकास आर्थिक भूमंडलीकरण के साथ-साथ नैतिक-आध्यात्मिक चेतना को समाहित कर पूर्ण व संतुलित बनाया जा सकता है। आज भारत तथा समूचे विश्व को केवल संत ही बचा सकते हैं, क्योंकि वे केवल मनुष्य की नैतिक-आध्यात्मिक चेतना के प्रति बद्ध हैं, किन्हीं धर्मग्रंथों, संप्रदायों से नहीं।
    महात्मा बुद्ध ने जो उपदेश दिए वे आधुनिक मानवता के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं, बल्कि वे उत्तरोत्तर अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। लोभ, मोह, घृणा की आग में व्यक्ति, समूह और देश जल-झुलस रहे हैं। सभी जगह जड़वाद, भौतिकवाद के परिणामस्वरूप भोगवाद, तृष्णा, लिप्सा, संग्रह की असीम लालसा के वशीभूत जगत् जलता हुआ जंगल बन चुका है। इनसे बचने के उपदेश तथागत ने दिए थे। बौद्ध संस्कृति का यह सार्वभौम आधार सब देशों-समाजों को ग्राह्य, प्रीतिकर एवं स्पृहणीय लगेगा। फ्रांस के दार्शनिक बर्गसां, जर्मनी के दार्शनिक कांट ने इसे तात्त्विक दृष्टि से उपयोगी बताया है तो चेतनाद्वैतवादी ब्रेडले ने बुद्ध के तर्कवाद-विज्ञानवाद को युग-व्याधियों का उपयुक्त निदान माना है। 
    महात्मा बुद्ध के मूल उपदेशों में प्रज्ञा, शील, ध्यान पातंजलि के ध्यान-योग के अति निकट हैं तो मध्ययुगीन संतों की वाणी में इन्हीं का विस्तार है। अतः ‘भारतीय संत परंपरा’ वर्तमान विश्व मानव के लिए अमृततुल्य है।
  • Raakshas
    Shanker Shesh
    75 68

    Item Code: #KGP-9107

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Vigyan Ka Itihaas
    Dyanand Pant
    400 320

    Item Code: #KGP-748

    Availability: In stock

    विज्ञान का इतिहास
    विज्ञान की अद्भुत प्रगति विश्व-भर के चिंतकों और कर्मठों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफलन है। धर्म, देश, जाति, भाषा आदि की सीमाएँ विज्ञान को बाँध न सकीं। प्रस्तुत पुस्तक में इसी सार्वभौम विज्ञान की समग्र गाथा का रोचक वर्णन है। आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव की विलक्षण उपलब्धियों वाली इस विश्वव्यापी बौद्धिक यात्रा का लेखा-जोखा बिना पूर्वग्रहों के प्रस्तुत करने और पाश्चात्य लेखकों के पक्षपातपूर्ण प्रतिपादन का पर्दाफाश करने का लेखक का प्रयत्न सराहनीय है।
    जनसाधारण सुलभ भाषा और रोचक शैली में लिखी अपने विषय की हिंदी की यह प्रथम मौलिक पुस्तक ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ पाठक में चिंतन और तर्क की वैज्ञानिक विधि के विकास में भी सहायक होगी।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    150 135

    Item Code: #KGP-1872

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।
  • Aadhunik Bhartiya Nayee Kavita
    Krishna Dutt Paliwal
    490 368

    Item Code: #KGP-9006

    Availability: In stock

    हिंदी आलोचना में ऐसे स्मरणीय नाम अत्यल्प हैं जिन्होंने अपनी पहचान निर्मित करते हुए संदर्भित विधा को भी नई चमक प्रदान की हो। जिन्हें परंपरा में पैठना आता हो और जिनकी दृष्टि आधुनिकता के चाक-चिक्य में सार्थक आलोक को खोज लेती हो। प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल एक ऐसे ही धीर-गंभीर अध्येता रहे, जिन्होंने वैचारिक उखाड़- पछाड़ के बीच अपनी सैद्धांतिक दृढ़ता को बनाए रखा। प्रायः लोकप्रियता और छवि-निर्माण के लिए कुछ लोग जिन निराधर फार्मूलों पर भरोसा करते हैं, प्रो. पालीवाल ने उनकी ओर कभी देखा तक नहीं। पूरी निष्ठा के साथ भारतीय रचनाकारों पर आलोचनात्मक चिंतन उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता का एक प्रबल प्रमाण है।
    प्रस्तुत पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ में प्रो. पालीवाल के आलोचक ने एक नयी छलांग लगाई है। उन्होंने अपने विशाल अध्ययन, गहन अन्वेषण और सुदीर्घ आलोचनात्मक अनुभव का निदर्शन करते हुए इस पुस्तक के आलेख लिखे हैं। इन्हें पढ़ने और बूझने के लिए सर्वप्रथम ‘भारतीयता’ की प्रशस्त अवधरणा को हृदयंगम करना आवश्यक है। अपने समस्त लेखकीय कर्म में प्रो. पालीवाल ने राष्ट्र, राष्ट्रीयता, अस्मिता, सभ्यता, संस्कृति, भारतीयता आदि पर भांति-भांति से विचार किया है। विशेषता यह है कि वे किसी भी विचार, व्यक्ति या अवधरणा से न आतंकित होते हैं, न ग्रस्त! भारतीय या अभारतीय लेखक चिंतक कितना ही नामचीन क्यों न हो, यदि उसकी तर्कपद्धति दूषित है तो पालीवाल उसे खंडित करने में क्षण भर भी देर नहीं लगाते। वे भारतीयता की सर्वमान्य विशेषताएं विश्लेषित करने के साथ-साथ उन लक्षणों का भी उल्लेख करते हैं जिन्होंने इस महादेश की मानसिकता को मनुष्यता के लिए सर्वाधिक अनुकूल बना रखा है।
    प्रो. पालीवाल जब ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ पर विचार करते हैं तो वे ‘भारतीय मनीषा के प्राण तत्त्वों का अन्वेषण’ अपना लक्ष्य बनाते हैं। उनके शब्दों में, "मूलतः भारतीय सृजन का अर्थ है--भारत के रचनाशील मानस की सामूहिक चेतना...जिसका निर्माण हजारों वर्षों से संचित अनुभूतियों और विचारों की गहन संश्लिष्टता से हुआ है। एक विशेष प्रकार की सौंदर्याभिरुचियां इस सृजन के भाव एवं रूप तत्त्व में विद्यमान हैं। बाहरी प्रभावों की अनुगूंज सुनाई पड़ने पर भी यह सृजन हमारे चिंतन की मौलिकता, सत्य के रूढ़ि-मुक्त रूप की झलक और मानव गरिमा को स्वीकृति का दस्तावेज कहा जा सकता है।"
    पुस्तक दो खंडों में संयोजित है। खंड एक में आधुनिकता के प्रथम उन्मेष से ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ की प्रयोगशील व प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति तक का सटीक विश्लेषण है। खंड दो भारतीय भाषाओं के शिखर रचनाकारों पर केंद्रित है। माइकेल मधुसूदन दत्त, सुब्रह्मण्य भारती, वल्लतोल, काजी नजरुल इस्लाम, मैथिलीशरण गुप्त, अज्ञेय व कुमार आशान की रचनाओं का इतना प्रमाण पुष्ट पाठ अन्यत्रा दुर्लभ है।
    समग्रतः इस कृति से गुजरते हुए एक महत्त्वपूर्ण आलोचक प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल की व्यापक आलोचना-दृष्टि का दर्शन होता है। अपने विषय पर एक विप्लव विशिष्ट ग्रंथ। पठनीय और संग्रहणीय।
  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock

    उर्दू की प्रख्यात लेखिका इस्मत चुगताई द्वारा मुस्लिम इतिहास की उस महान् गाथा का कलमबंद बयान, जो विश्व की करुणतम मानवीय गाथाओं में विशिष्ट स्थान रखती है। यह गाथा है मानव के बुनियादी अधिकार के लिए अडिग संघर्ष, अदम्य शौर्य और अद्भुत बलिदान की-कर्बला ! पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब के नवासे और हज़रत अली के सुपुत्र इमाम हुसैन के सपरिवार जौहर और शहादत की हृदयद्रावक दास्तान। फ़र्ज़ और हक की सत्ता के विरुद्ध जद्दोजहद की एक महान् गाथा ! इसी दास्तान ने उर्दू साहित्य की बेमिसाल धरोहर-अनीस और दबीर के मर्सियों को जन्म