Saabja Patra Katha Kahe

Shiv Prasad Singh

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  • Year: 1996

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-7016-300-8

यह धरती कितना देती है!
अगम अथाह समुद्रों से परिवेष्टित, धु्रव उत्तर में शिव के अट्टहास की उजली ज्योति जहां श्वेत बर्फ में ढंकी है हिमालय की मुकुटमाला-कोच्चि में अरब सागर का निनाद है, सह्याद्रि की पर्वत-श्रृंखलाओं की कड़ी सीमा से छिटककर एक तनी हुई तलवार की तरह लगती है केरल धरणी-बैंगलूर दक्षिण की सुगंधि की मंजूषा और फिर योगिराज श्रीअरविन्द का आश्रम जो बंगाल की खाड़ी का अमूल्य उपहार है सम्पूर्ण मानवता के नाम और ओडीसा, ओड्र, कलिंग अथवा उत्कल जो प्रस्तर मुलायम काष्ठ में बदलने की कला जानता है, एकाश्म पर रचता है युग्म मूर्तियों को मायाजाल।
सभी कुछ एक साथ एक छोटी-सी पुस्तिका में!
क्या यह संभव है?
शायद नहीं।
पर असंभव को भाषा की लचीली बांहों में बांधना शिवप्रसाद सिंह का प्रिय कर्म है
आप सुनिये वह कथा जिसे पत्थरों ने गाया, धरती ने फलसों के बहाने उगाया और पकी फसल को काटती दरांती ने फुसफुसाया। 

Shiv Prasad Singh


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