Anaam Yatraayen

Ashok Jairath

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  • Year: 2009

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 9788189982249

जीवन एक सफर और हमें निरंतर इस सफर में चलते रहना है । जो चलता रहा, वह जीता रहा और जो बैठ गया, सो बैठ गया । अकसर लोग यात्राओं से घबराते है । कई कारण हैं -आर्थिक अभाव साथ की कमी या वैसे ही मन नहीं करता, आलस्य में स्चा-बसा मन बस आराम करना चाहता है । हमारा शरीर 'हड्ड हराम' हैं, वह आराम चाहता है, पर जितना ही इसे माँजा जाए, उतना ही यह निखरता है ।
हिमालयी श्रृंखलाएं, हिममंडित शिखर व्यक्ति को बार-बार बुलाते हैं । इनके ऊपर गूंजते संगीत के स्वर और लोककाथाएं आत्मविभोर कर देती हैं और इनके अजस्र जलस्रोत जहां नैसर्गिक परिवेश को जन्म देते है, वहीं पर थके हुए मन और शरीर को संबल देते है ।
लेखक ने पश्चिमी हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र व अनेक हिमानियों के साथ-साथ दूसरे दुर्गम इलाकों की साहसिक यात्राएं की हैं, जिनका विशद विवरण इस पुस्तक के रूप में पाठकों को सौंपा जा रहा है । ये यात्राएं कूमाऊं-गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय एव सांस्कृतिक क्षेत्रों से ही संबंधित हैं, मात्र द्वारकापुरी की यात्रा को छोड़कर । यात्राओं का निरंतर सिलसिला लेखक के अलमोड़ा में प्रवास के दौरान शुरू हुआ, जब सारे उत्तरांचल के साथ हिमानियों को भी ट्रेक किया गया, जहाँ हिमालियाई संस्कृति को बहुत करीब से देखकर स्वयं लेखक हिमालियाई हो आया था ।
इन ब्योरों के साथ ही उन सभी साथियों-सहयोगियों और मार्गदर्शक का सीधा-सहज और बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन भी दिया जा रहा है, जो इन संस्मरणों को और भी मनोरंजक और दिलचस्प बना देता है । आशा है, ये सभी संस्मरण/यात्राओं का वर्णन पाठकों को अच्छा लगेगा ।

Ashok Jairath

अशोक जेरथ 

जन्म  : 16 मार्च, 1946, जम्मू ।
शिक्षा : जम्मू, चडीगढ़ और भुवनेश्वर में हुई ।

हिंदी, अंग्रेजी और डोगरी कै प्रतिष्ठित रचनाकार।
केंद्रीय विद्यालय में अध्यापन शुरू कर कुछ समय तक सरकारी कॉलेजों में प्रवक्ता के तौर पर कार्य कर अंतत: ने०ह०यु० विश्वविधालय, शिलांग में बतौर रीडर नियुक्त हुए । पर संप्रेषण में रुचि उन्हें आकाशवाणी में खींच लाई, जहां विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए अंतत: वरिष्ठ केंद्र निदेशक के रूप में कार्य किया । संप्रति : पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन और हिमालयी अध्ययन केंद्र के स्थापन में कार्यरत ।
अब तक 43 कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं । देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाएं और समाचार-पत्र डॉ० जेरथ की रचनाएं प्रकाशित करते रहते है ।
'धरती अपनी-अपनी' तथा 'रजत शिखरों के रूपहले स्वर' को केंद्रीय  हिंदी निदेशालय ने क्रमश वर्ष 1982 तथा 1995 में पुरस्कृत किया तो सन् 1983 में साहित्य अकादेमी की ओर से राष्ट्रीय वृत्ति से सम्मानित किया गया । वर्ष 2003 में जम्मू-कश्मीर अकादेमी द्वारा उनके कविता-संग्रह 'अंततः' को सर्वश्रेष्ठ कृति के तौर पर पुरस्कृत किया गया तो अगले ही वर्ष उनकी कृति 'यह आकाशवाणी है' को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने वर्ष 2004 की हिंदी पत्रकारिता में सर्वश्रेष्ठ कृति मानते हुए बहुचर्चित भारतेंदु हरिशचंद्र पुरस्कार से सम्मानित किया  । इन पुरस्कारों के अलावा राष्ट्रीय स्तर की अनेक चर्चित संस्थाओं द्वारा डों० जेरथ को उनके लेखन के लिए सम्मानित किया गया है ।

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