Shiksha : Maanaviya Samvednayen Evam Sarokar

Jagmohan Singh Rajput

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-85054-18-1

‘शिक्षा: मानवीय संवेदनाएँ एवं सरोकार’ में वर्ष 2011 के बाद विभिन्न आयामों पर लिखे गए लेख शामिल किए गए हैं। अधिकांश शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर वर्तमान स्थिति तथा उसमें परिवर्तन की आवश्यकता तथा संभावित समाधानों की चर्चा करते हैं। इस संग्रह में ऐसे लेख भी रखे गए हैं जो सीधे-सीधे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ते नहीं लगते थे। उन्हें रखा इसलिए गया था कि शिक्षा व्यवस्था को केवल विभागीय या मंत्रलय स्तर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए। समाज के हर पक्ष तथा परिवर्तन का शिक्षा व्यवस्था से जीवंत जुड़ाव है। इसमें आर्थिक, सांस्कृतिक तथा नैतिकता के परिवर्तन भी प्रमुखता से आते हैं। राष्ट्रीयता तथा वैश्विकता के हर आयाम से शिक्षा स्पष्ट रूप से जुड़ती है। विकास और प्रगति की गति शिक्षा की गतिशीलता तथा परिपूर्णता पर ही निर्भर करती है। भारत की कृषि व्यवस्था में आई शिथिलता से लेकर सिलिकान वैली में युवा भारतीयों द्वारा नाम कमाया जाना शिक्षा की गुणवत्ता की श्रेष्ठता या कमजोरी से ही जुड़ते हैं। हिंसा, अविश्वास, शोषण, आतंकवाद, पंथिक उन्माद जैसी विभीषिकाओं ने विश्व में असुरक्षा की स्थिति पैदा की है। इसका समाधान भी शिक्षा की सुदृढ़ता, गुणवत्ता तथा नैतिकता को आत्मसात् कराने की क्षमता पर ही निर्भर करेगा।
इसी पृष्ठभूमि में इस पुस्तक में लेखों को शामिल किया गया है। इसमें समस्याएँ वर्णित हैं, व्यक्तियों के योगदान भी निहित हैं, भाषा की बातें हैं, अध्यापकों पर विवेचन हैं, माता-पिता, संस्कारों, मूल्य शिक्षा, शिक्षा के मूल अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन की चर्चा है और प्रयास यह रहा है कि सभी महत्त्वपूर्ण पक्ष पाठक के सामने उभरकर आ जाएँ। वे अपेक्षाएँ भी उभरी हैं जो सामान्यजन की अवधारणा में शिक्षा को प्रभावित करती हैं। 

Jagmohan Singh Rajput

जगमोहन सिंह राजपूत
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सन् 1943 में जन्मे 
प्रो०  जगमोहन सिंह राजपूत ने प्रयाग विश्वविद्यालय से भौतिकी में शोध-उपाधि अर्जित कर सन् 2002 में शिक्षा 
में डी० लिट्०  की मानद उपाधि प्राप्त की। उनके भौतिकी के शोधपत्रों ने उन्हें सन् 1974 में प्रोफेसर-पद पर नियुक्ति दिलाई। भारत सरकार में संयुक्त शिक्षा सलाहकार (1989-94), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्, एन० सी०  टी० ई०  के अध्यक्ष (1994-99) व एन० सी० ई० आर० टी०  के निदेशक (1999-2004) पदों पर रहे प्रो०  राजपूत अपने कार्यों के लिए सराहे गए तथा आलोचनाओं से कभी दूर नहीं रहे। बी० एड०  पत्राचार के पाठ्यक्रमों को नियंत्रित करने तथा दो वर्षीय बी० एड०  पाठ्यक्रमों को प्रारंभ कर उन्होंने अध्यापक शिक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम परिवर्तन के लिए जो दृढ़ता तथा आत्मविश्वास उन्होंने पाँच वर्षों में अपने विरोधियों को निरुत्तर करने में दिखाया उसकी सराहना विरोधियों ने भी की। अनुशासन, समयपालन तथा कार्य में गुणवत्ता लाने के सजग पक्षधर प्रो०  राजपूत ने अनेक विषयों पर शोध कराए और पुस्तकें लिखी हैं। इनमें कविताओं की पुस्तक भी शामिल है। इधर के वर्षों में उन्होंने हिंदी तथा अंग्रेजी में सैकड़ों लेख लिखने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र लिखे तथा अतिथि संपादक रहे। श्रेष्ठ शोध तथा नवाचार के लिए यूनेस्को ने उन्हें सन् 2004 में जॉन एमोस कोमेनियस पदक के लिए चुना। वे मूल्यों की शिक्षा, सामाजिक सद्भाव तथा शिक्षा में सभी धर्मों के मूलभूत तत्त्वों की जानकारी के पक्षधर हैं।

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