Shiksha Mein Moolyon Ke Sarokar

Jagmohan Singh Rajput

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  • Year: 2017

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-82114-12-3

प्रस्तुत पुस्तक में सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं तथा संबंधों में हो रहे बदलाव को देखने और परखने के लिए आवश्यक दृष्टिकोण परिवर्तन क्यों और कैसे संभव है, इसे समझने का प्रयास किया गया है । इसके बाद शैक्षिक पाठ्यक्रम पर समग्रता से निगाह डालते हुए पाठ्यक्रम परिवर्तन की आवश्यकता तथा उसके मूल तत्त्वों पर चर्चा की गयी है । इसमें उस प्रकार की पाठ्यसामग्री के सम्बन्ध में भी चर्चा हैं, जो पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध है तथा जिसमें अन्य मूल्यों के साथ परिवार तथा पीढ़ियों के संबंधों के विभिन्न पक्षों पर विवेचना की जा सकती है – केवल उसे पहचानने तथा विद्यार्थियों को उचित समय पर तथा उचित विधि से इंगित करने की आवश्यकता होती है । यदि वह नहीं है या काम है तो अध्यापक कैसे तथा किन स्रोतों से उसे ढूंढ़ सकता है तथा शिक्षण में शामिल कर सकता है । 

Jagmohan Singh Rajput

जगमोहन सिंह राजपूत
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सन् 1943 में जन्मे 
प्रो०  जगमोहन सिंह राजपूत ने प्रयाग विश्वविद्यालय से भौतिकी में शोध-उपाधि अर्जित कर सन् 2002 में शिक्षा 
में डी० लिट्०  की मानद उपाधि प्राप्त की। उनके भौतिकी के शोधपत्रों ने उन्हें सन् 1974 में प्रोफेसर-पद पर नियुक्ति दिलाई। भारत सरकार में संयुक्त शिक्षा सलाहकार (1989-94), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्, एन० सी०  टी० ई०  के अध्यक्ष (1994-99) व एन० सी० ई० आर० टी०  के निदेशक (1999-2004) पदों पर रहे प्रो०  राजपूत अपने कार्यों के लिए सराहे गए तथा आलोचनाओं से कभी दूर नहीं रहे। बी० एड०  पत्राचार के पाठ्यक्रमों को नियंत्रित करने तथा दो वर्षीय बी० एड०  पाठ्यक्रमों को प्रारंभ कर उन्होंने अध्यापक शिक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम परिवर्तन के लिए जो दृढ़ता तथा आत्मविश्वास उन्होंने पाँच वर्षों में अपने विरोधियों को निरुत्तर करने में दिखाया उसकी सराहना विरोधियों ने भी की। अनुशासन, समयपालन तथा कार्य में गुणवत्ता लाने के सजग पक्षधर प्रो०  राजपूत ने अनेक विषयों पर शोध कराए और पुस्तकें लिखी हैं। इनमें कविताओं की पुस्तक भी शामिल है। इधर के वर्षों में उन्होंने हिंदी तथा अंग्रेजी में सैकड़ों लेख लिखने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र लिखे तथा अतिथि संपादक रहे। श्रेष्ठ शोध तथा नवाचार के लिए यूनेस्को ने उन्हें सन् 2004 में जॉन एमोस कोमेनियस पदक के लिए चुना। वे मूल्यों की शिक्षा, सामाजिक सद्भाव तथा शिक्षा में सभी धर्मों के मूलभूत तत्त्वों की जानकारी के पक्षधर हैं।

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