Gandhi Ko Samajhane Ka Yahi Samay

Jagmohan Singh Rajput

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  • Year: 2019

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-942160-3-2

महात्मा गांधी वह महामानव हैं जिनकी प्रासंगिकता हर दौर में बनी रहेगी। व्यवस्थित जीवन जीने के लिए गांधी जी ने जो सूत्र दिएवे उनके व्यक्तित्व की भाँति आज भी उतनी महत्ता रखते हैं जितनी तत्कालीन समय में थी। जीवन के जिस भी क्षेत्र में उन्होंने जो भी अनुभव प्राप्त किएवही अनुभव उन्होंने साररूप में मानव जाति को प्रदान किए। वे जीवन के हर क्षेत्र-चाहे वह शैक्षिक हो या राजनीतिक-के प्रति बहुत गंभीर थे। उनका विचार था कि सामयिक क्रांति के पहले सुषुप्त समाज को जाग्रत करना जरूरी है और ऐसा तभी हो सकता है जब शिक्षा की प्रकाश-किरणें सब तक पहुँचें। इसके लिए उन्होंने वैचारिक चिंतन ही नहीं कियाअपितु व्यावहारिक प्रयोग भी किए।

गांधी जी का मानना था कि शिक्षा वही उचित है जो बच्चों को उनके उत्तरदायित्व और कर्तव्य का बोध कराए। उनके अनुसार शिक्षा तो वही सही है जो चरित्र का उचित दिशा में निर्माण करे। प्रस्तुत पुस्तक गांधी को समझने का यही समय अपने में गांधी जी द्वारा प्रतिपादित चारित्रिकशैक्षिकसामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों को समाहित किए हुए है। इन मूल्यों में जो विकृति आई हैउसे दूर करने के लिए हमें गांधी को समझना होगा और गांधी को समझने का यही समय उपयुक्त है।

 

स्वतंत्रता के बाद के सभी शिक्षा संबंधी अधिकांश दस्तावेजों में चरित्र निर्माण तथा मानव मूल्यों की शिक्षा पर बल दिया जाता रहा है। मगर स्थिति पहले से अधिक चिताजनक ही होती जा रही है। गांधी जी के जन्म के 150वें वर्ष में व्यक्तित्व-निर्माण और शिक्षा से व्यक्तित्व-विकास पर गहन विचार-विमर्श के द्वारा एक ऐसी रणनीति तैयार की जानी चाहिए जिसमें सभी की भागीदारी होजो शब्दों में नहींव्यवहार में पारदर्शिता के साथ समाज के अंतिम छोर पर अभी भी प्रतीक्षा कर रहे लोगों पर केंद्रित हो। साथ ही साथ देश इस पर भी बहस करे कि विशेषाधिकार प्राप्त करने की होड़ पर अंकुश कौन लगाएगायह विकृति कहाँ तक पहुँची हैइसका अंदाजा उस खबर से लगाया जा सकता है जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अपने कार्यस्थल तक आने-जाने के लिए एक विशेष मार्ग की माँग की गई थी। एक राज्य सरकार केवल वीआईपीके लिए एक फ्रलाईओवर हवाई अड्डे तक बनाने जा रही थी जिसे जनता ने प्रतिरोध कर रोक दिया था। इस उदाहरण में समस्या की गंभीरता तथा उसके समाधान दोनों ही निहित हैं। यदि इसका सारतत्त्व समझ लिया जाए तो हम सिर उठाकर गांधी को याद करने लायक हो सकेंगे।

Jagmohan Singh Rajput

जगमोहन सिंह राजपूत
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सन् 1943 में जन्मे 
प्रो०  जगमोहन सिंह राजपूत ने प्रयाग विश्वविद्यालय से भौतिकी में शोध-उपाधि अर्जित कर सन् 2002 में शिक्षा 
में डी० लिट्०  की मानद उपाधि प्राप्त की। उनके भौतिकी के शोधपत्रों ने उन्हें सन् 1974 में प्रोफेसर-पद पर नियुक्ति दिलाई। भारत सरकार में संयुक्त शिक्षा सलाहकार (1989-94), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्, एन० सी०  टी० ई०  के अध्यक्ष (1994-99) व एन० सी० ई० आर० टी०  के निदेशक (1999-2004) पदों पर रहे प्रो०  राजपूत अपने कार्यों के लिए सराहे गए तथा आलोचनाओं से कभी दूर नहीं रहे। बी० एड०  पत्राचार के पाठ्यक्रमों को नियंत्रित करने तथा दो वर्षीय बी० एड०  पाठ्यक्रमों को प्रारंभ कर उन्होंने अध्यापक शिक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम परिवर्तन के लिए जो दृढ़ता तथा आत्मविश्वास उन्होंने पाँच वर्षों में अपने विरोधियों को निरुत्तर करने में दिखाया उसकी सराहना विरोधियों ने भी की। अनुशासन, समयपालन तथा कार्य में गुणवत्ता लाने के सजग पक्षधर प्रो०  राजपूत ने अनेक विषयों पर शोध कराए और पुस्तकें लिखी हैं। इनमें कविताओं की पुस्तक भी शामिल है। इधर के वर्षों में उन्होंने हिंदी तथा अंग्रेजी में सैकड़ों लेख लिखने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र लिखे तथा अतिथि संपादक रहे। श्रेष्ठ शोध तथा नवाचार के लिए यूनेस्को ने उन्हें सन् 2004 में जॉन एमोस कोमेनियस पदक के लिए चुना। वे मूल्यों की शिक्षा, सामाजिक सद्भाव तथा शिक्षा में सभी धर्मों के मूलभूत तत्त्वों की जानकारी के पक्षधर हैं।

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