Antarvartayen

Kanhiya Lal Nandan

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9788188466856

प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित लगभग सभी बातचीतें किसी न किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के माध्यम से पहले भी पाठकों के सन्मुख आ चुकी हैं, लेकिन समवेत रूप में दिनकर और अज्ञेय से लेकर कामतानाथ तक कई पीढ़ियों के रचनाकारों के अंतरंग मन में पैठा जा सके और उस पैठ के ज़रिए साहित्यिक जिज्ञासुओं की प्रश्नाकुल उत्कंठाएँ शांत हो सकें, इस दृष्टि से इस पुस्तक का विशेष महत्त्व मैं मानता रहा हूँ । फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, चित्रकार कृष्ण हेब्बार और छायाकार रघु राय भी बातचीत के इस समवेत क्रम में सम्मिलित कर लिए गए हैं ताकि संवेदना के धरातल पर अनेक माध्यमों से जुड़े हुए लोगों की एकसूत्रता की प्रतिच्छवि भी आँकी जा सके ।
कोई भी रचनाकार अपने युग को सिर्फ अपनी विधा के चश्मे से नहीं देखता । यह अगर कहानीकार है तो उसके साथ-साथ एक संघर्ष करता हुआ सामाजिक प्राणी भी है; जो कि ट्रेन-यात्रा में टिकट के लिए धक्के खाता भी हो सकता है, समाज में फैली किसी बुराई विशेष के प्रति एक आदमी की तरह सोच भी सकता है और उसकी प्रतिक्रिया में हिस्सेदार भी हो सकता है । रचनाकार को उसके समूचे रंगों में टटोलने की इसी जद्दोजहद से मैंने इन बातचीतों के क्रम में कुछ ऐसे ढंग से यह बार सवाल रखे हैं जो पूर्वापर संबंध के साथ असंगत दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उस बातचीत के समूचे प्रभाव में मुख्य उद्देश्य यहीं रहा है कि यह रचनाकार अपने मन के अछूते पहलुओं को पाठकों के सामने खोले; खासकर ऐसे पहलू जिन पर बहुत कम प्रकाश पड़ा है ।
इस पुस्तक में सम्मिलित सभी रचनाकार व्यक्तित्व मुझे अंतरंग आत्मीयता प्रदान करते रहे हैं । संबंधों की यह अंतरंग आत्मीयता मेरी इन सभी बातचीतों का मूल आधार रही है । शायद इसीलिए जब-जब ये बातचीतें पहली बार प्रकाश में आई हैं, मुझे इनकी शैली के लिए पाठकों का अतिरिक्त स्नेह मिलता रहा है ।
-कन्हैयालाल नंदन


Kanhiya Lal Nandan

डॉ. कन्हैयालाल नन्दन का जन्म सन् 1933 में, उ.प्र. के फतेहपुर जिले के एक गांव परसदेपुर में हुआ । आपने डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से बी.ए., प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. और भावनगर यूनिवर्सिटी से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की । चार वर्ष तक मुम्बई विश्वविद्यालय के कॉलेजों में हिंदी अध्यापन के बाद सन् 1961 से 1972 तक टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह के 'धर्मयुग' में सहायक संपादक रहे; सन् 1972 से क्रमश: 'पराग', 'सारिका' और 'दिनमान' का संपादन किया और तीन वर्ष 'नवभारत टाइम्स' में फीचर संपादक रहे । छह वर्ष तक हिंदी 'संडे मेल' के प्रधान संपादक रह चुकने के बाद सन 1995 से 'इंडसइंड मीडिया' में डाइरेक्टर और 'इनटाइम' न्यूज़ चैनल के प्रधान नियामक रहे । भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की पत्रिका 'गगनांचल' का संपादन भी कई वर्षों तक किया । 'नूतन सवेरा' के सलाहकार संपादक भी रहे ।

तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें 'लुकुआ का शाहनामा, 'घाट-घाट का पानी', 'अंतरंग', 'नाट्यपरिवेश', 'आग के रंग', 'अमृता शेरगिल', 'समय की दहलीज़', 'सरहद पार की बिसातें' और 'धार के आरपार' बहुचर्चित । 'श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन' तथा 'द अर्थ हैज़ नो कार्नर्स' एवं 'ए डिप्लोमैटिक सजर्न (अंग्रेजी) का संपादन । सुप्रसिद्ध 'लोहिया पुरस्कार' एवं 'परिवार पुरस्कार' जैसे पुरस्कारों से पुरस्कृत, 'पद्मश्री' से अलंकृत और 'नेहरू फेलोशिप' से सम्मानित ।

स्मृति-शेष : 25 सितंबर, 2010

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