Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam

Gopal Rai

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Suhani Books

  • ISBN No: 9788190423250

दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
 दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’

Gopal Rai

गोपाल राय
जन्म: बिहार के बक्सर जिले के एक गाँव चुन्नी में, 13 जुलाई, 1932 
प्रकाशित पुस्तकें: हिंदी कथा-साहित्य और उसके विकास पर पाठकों की रुचि का प्रभाव, हिंदी उपन्यास कोश, हिंदी साहित्याब्द कोश, ‘उपन्यास की पहचान’ श्रृंखला के अंतर्गत महाभोज, दिव्या, मैला आँचल, गोदान: नया परिप्रेक्ष्य, रंगभूमि: पुनर्मूल्यांकन, शेखर: एक जीवनी, अज्ञेय और उनके उपन्यास, हिंदी उपन्यास का इतिहास, उपन्यास की संरचना, हिंदी कहानी का इतिहास  
पुरस्कार: साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली (2008), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना द्वारा पुरस्कृत (1966), उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ द्वारा पुरस्कृत (1972)

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