Adakara Madhubala : Dard Bhari Jeevan Katha

Shashi Kant Kinikar

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789383233946

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग में कुछ नायिकाओं ने दर्शकों के दिल में एक विशिष्ट स्थान बना लिया था, उनमें से प्रमुख कलाकार मधुबाला अपनी सुंदरता, अपने मुस्कराते चेहरे व विभिन्न तरह के रोल करने के कारण दर्शकों की चहेती कलाकार थीं, विशेषकर जो फिल्म जगत् को पसंद करते थे।
मधुबाला का जन्म 1933 में और देहांत 1969 में हुआ था। मधुबाला ने मात्र 9 वर्ष की आयु से ही अभिनय करना शुरू कर दिया और तो और लड़कपन में ही फिल्मों में नायिका का रोल करना शुरू कर दिया था। सन् 1950 और 1960 के दशकों में मधुबाला ने उस समय के सारे मुख्य अभिनेताओं के साथ अभिनय किया। मधुबाला इस युग में अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर थीं और इसी युग को भारतीय सिनेमा का स्वर्णकाल कहा जाता है।
मधुबाला का जीवन उनकी सुंदरता और मुस्कराहट की तरह अच्छा नहीं था। सारा दिन फिल्मों में कार्य करने के बाद भी उन्हें अपने बड़े परिवार को पालने के लिए कार्य करना पड़ता था। अपने बड़े परिवार में वह अकेली जीविका कमाने वाली सदस्य थी और सबका ठीक प्रकार से पालन-पोषण करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती थीं जिस कारण वह बहुत दुखी रहा करती थीं।
दिलीप कुमार, जो उस समय के शोकाकुल अभिनय के सम्राट माने जाते थे, से प्रेम व कलाकार किशोर कुमार से विवाह दोनों ही विफल रहे। इन विफलताओं ने उनकी पीड़ा को और बढ़ा दिया था। इस सबके अतिरिक्त वह बालपन से ही बहुत दुर्बल थीं और इसी शारीरिक दुर्बलता के कारण भी उन्होंने बहुत कष्ट झेले। शायद इन सब कारणों के होते उनका देहांत इतनी छोटी आयु में हो गया।
मधुबाला का स्वयं का जीवन भी एक फिल्म की पटकथा के समान ही था। प्रख्यात लेखक शशिकांत किणीकर ने इस पुस्तक में मधुबाला का जीवन-दर्शन बहुत ही निपुणता से प्रस्तुत किया है जो पाठकों के दिलों को छू लेगा।

Shashi Kant Kinikar

शशिकांत पिछले साठ वर्षों से फिल्मी पत्रकारिता से—हिंदी, मराठी व अंग्रेजी में—जुड़े हुए हैं। उन्होंने जिज्ञासावश, भारतीय सिनेमा की शुरू की मूक फिल्मों पर बहुत खोजकर समीक्षा की। उन्होंने अपनी खोज में लिखा है कि भारतीय फिल्म के पहले निर्माता दादासाहेब फालके नहीं अपितु दादासाहेब तोरणी थे। उनका कहना है कि दादासाहेब तोरणी की फिल्म ‘पुण्डलिका’ 1912 में निर्मित हुई जब कि दादासाहेब फालके की फिल्म ‘राजा हरीशचन्द्र’ 1913 में आई। 
श्री किणीकर ने अब तक लगभग तीस पुस्तकें, अधिकतर मराठी और अंग्रेजी में लिखी हैं। 
उनमें कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी, गुजराती व मलयालम में अनुवाद भी हुआ है। 
उनकी मराठी पुस्तक ‘मधुबाला’ इतनी लोकप्रिय हुई कि उसके अब तक चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और ‘अदाकारा मधुबाला: दर्दभरी जीवन कथा’  उसी का अनुवाद है जो पहली बार हिंदी भाषा में प्रस्तुत है।

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