Sahachar Hai Samay

Ramdarash Mishra

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9788188121281

सहचर है समय
रामदरश मिश्र का समय को सहचर मानना प्रकारांतर से 'स्व' और 'समय' के संबंधों की द्वंद्वात्मकता और सामंजस्य की ओर संकेत करता है । इस आत्मवृत्त से एक ओर कछार के अंचल में बीते बचपन से लेकर वाराणसी में उच्च शिक्षा, जीविका-संघर्ष, गुजरात-प्रवास, दिल्ली- आगमन, बहुआयामी रचनाशीलता और दिल्ली के साहित्यिक परिवेश से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का जुलूस उमड़ पड़ा है, दूसरी ओर इसी के समानांतर स्वतंत्रता-पूर्व का ग्रामीण परिवेश, स्वतंत्रता और जनतांत्रिक आकांक्षाएँ, व्यवस्था के अंतर्विरोध, अध्यापन-जगत की राजनीति, भारत-पाक युद्ध, आपातकाल, इंदिरा गाँधी का निधन, सिख-विरोधी हिंसा यानी कि पचास वर्षों का जीवंत इतिहास अपनी अनेक विशेषताओं और कुरूपताओं के साथ उभरा है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाकारों और कलाकारों ने आत्मकथाएँ लिखी हैं। अधिकतर चर्चित आत्मकथाओं में काम-संबंधों की सनसनी परोसने या स्वयं को 'अतिविशिष्ट' सिद्ध करने की जो प्रवृत्ति मुखर है, 'सहचर है समय' से उसका अभाव है । अत: यह आकस्मिक नहीं कि रामदरश मिश्र का प्रस्तुत आत्मवृत्त अमृता प्रीतम, हंसा वाडेकर, दुर्गा छोटे, कमला दास और पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि की आत्मकथाओं से अलग किस्म का बन पडा है ।
'सहचर है समय' का प्रस्थान बिंदु जीवन के प्रति गहरी आस्था है । मिश्र जी ने अपने जन्म लेते ही कीड़े-मकोडों के चलते मौत के मुँह में चले जाने और पडोस की एक बुआ के हाथों बनाए जाने का उल्लेख क्रिया है। इस घटना को अर्थविस्तार देते हुए उन्होंने लिखा है :
'मेरी जीवन-यात्रा से कीड़े-मकोड़े भी खूब मिले, लेकिन मुझे उनसे बचाने वाली शक्तियां भी मिलती ही गईं । कीड़े-मकोड़े तो सभी को मिलते हैं, किसी-किसी को तो साफ ही कर जाते हैं, उनकी जिजीविषा, उनके जीवन- मूल्य सभी को चट कर जाते हैं, लेकिन मुझे जिजीविषा मिली है । जीवन के प्रति अगाध विश्वास, निष्ठा और मूल्य मिला है इसीलिए कि कीड़े-मकोडों के बावजूद जीवनदायक कोई न कोई शक्ति, रस मुझे देर-सबेर मिलता ही रहा है ।'
प्रारंभ से ही स्वप्नदर्शिता का जिक्र भी हैं :
'तब कुत्ता पाला था, अब सपने पालता हूँ अपने लिए, समाज के लिए, देश के लिए । वे छीन लिए जाते हैं, छीनकर किसी और को दे दिए जाते है, या तोड़ दिए जाते हैं—अपनों द्वारा भी और दूसरों द्वारा भी। ...लेकिन न जाने क्या है कि मैं टूटा नहीं, बिखरा नहीं, मिट-मिटकर बनता हूँ। गिर-गिरकर उठता गया हूँ, भटक-भटककर रास्ते पर आ गया हूँ।'
सपने पालना, सपनों का टूटना-बिखरना, स्वयं के टूटने की स्थिति, लेकिन जीवनदायक शक्तियों और दृढ़ आस्था के फलस्वरूप आखिरकार सँभल जाना-यही मिश्र जी की अब तक की जीवन-यात्रा है। आज के स्वार्थ-संकुल परिवेश में टूटना-बिखरना किसी संवेदनशील बुद्धिजीवी की अनिवार्य नियति है । लेकिन बिना कुंठित  और निराश हुए अंतत: परिवार के भरेपूरेपन का संतोष महसूसना सबका सौभाग्य नहीं होता ।
मिश्र जी ने अपने आत्मवृत्त का समापन करते हुए लिखा है : 'अनेक सांसारिक अनुपलब्धियों के बावजूद परिवार का यह भरापूरापन हमें मिला है, उससे हम बहुत प्यार करते हैं । जिस किसी शक्ति के कारण हमें यह वरदान मिला है, उसके प्रति हम गहरा आभार व्यक्त करते हैं...।'

Ramdarash Mishra

रामदरश मिश्र

जन्म : 15 अगस्त, 1924 को गोरखपुर (उ० प्र०) जिले के डुमरी गांव में
शिक्षा : एम०ए०, पी-एच०डी०

सर्जनात्पक रचनाएँ : 'पथ के गीत', 'बैरंग-बेनाम चिट्ठियाँ', 'पक गई है धूप’, 'कंधे पर सुरज', 'दिन एक नदी बन गया', 'मेरे प्रिय गीत', 'जुलूस कहाँ जा रहा है?', 'रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कविताएँ', 'आग कुछ नहीं बोलती', 'शब्द सेतु', 'बारिश में भीगते बच्चे', 'ऐसे में जब कभी', 'आम के पत्ते (काव्य-संग्रह) ० 'हंसी ओठ पर आँखें नम हैं', 'बाजार को निकले हैं लोग' (ग़ज़ल-संग्रह) 'पानी के प्राचीर' , 'जल टूटता हुआ', 'बीच का समय', 'सूखता हुआ तालाब', 'अपने लोग', 'रात का सफर', 'आकाश की छत', 'आदिम राग' (बीच का समय), 'बिना दरवाजे का मकान', ‘दूसरा घर', 'थकी हुई सुबह', 'बीस बरस' (उपन्यास) ० 'खाली घर', 'एक यह', 'दिनचर्या', 'सर्पदंश', 'वसंत का एक दिन', 'इकसठ कहानियां', 'अपने लिए', 'मेरी प्रिय कहानियां', 'चर्चित कहानियां', 'श्रेष्ठ आंचलिक कहानियां', 'आज का दिन भी', 'फिर कब आएँगे ?', 'एक कहानी लगातार', 'विदूषक', 'दिन के साथ', 'मेरी तेरह कहानियाँ', 'दस प्रतिनिधि कहानियां', (कहानी-संग्रह) ० 'कितने बजे है', 'बबूल और कैक्टस', 'घर-परिवेश' (ललित निबंध-संग्रह) ० 'तना हुआ इंद्रधनुष', 'भोर का सपना', 'पडोस की खुशबू' (यात्रा-वर्णन) ० 'सहचर है समय', 'फुरसत के दिन' (आत्मकथा) ० 'स्मृतियों के छंद', 'अपने-अपने रास्ते' (संस्मरण) ० 'बूँद-बूँद नदी', 'दर्द की हंसी', 'नदी बहती है' (चुनी हुई रचनाएँ)।

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