Sarhad Paar Ki Bisaten

Kanhiya Lal Nandan

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  • Year: 2008

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-89859-01-5

महानायकों की मुसीबत यह होती है कि उन्हें एक साइकिलबाज की तरह कर समय पैडल चलाते रहना पड़ता है, क्योंकि पैडल रुका नहीं कि सवार लुढ़का। बल्कि आगे जाने के लिए उसे पैडल मारने में मेजी से काम लेना होता है, वरना चढ़ाई की दौड़ में उसके पिछड़ जाने का खतरा भी रहता है।
ये आलेख एक तरह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण हैं, जो लगातार घूमते चक्रव्यूह के माध्यम से अपने समय की तस्वीर पेश करते हैं। एक संक्षिप्त कालखंड अपने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों को दृष्टि में रखकर आकार लेता दिखाई दे, यही इन आलेखों की सार्थकता है। किसी भी देश के इतिहास में दो-चार साल का समय कोई बड़ी अहमियत नहीं रखता, लेकिन उन दो-चार सालों के घटनाक्रम को काटकर समूचे इतिहास-क्रम को समझा भी नहीं जा सकता। ये आलेख उस इतिहास-क्रम को समझने में मदद करेंगे, ऐसा विश्वास है।

Kanhiya Lal Nandan

डॉ. कन्हैयालाल नन्दन का जन्म सन् 1933 में, उ.प्र. के फतेहपुर जिले के एक गांव परसदेपुर में हुआ । आपने डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से बी.ए., प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. और भावनगर यूनिवर्सिटी से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की । चार वर्ष तक मुम्बई विश्वविद्यालय के कॉलेजों में हिंदी अध्यापन के बाद सन् 1961 से 1972 तक टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह के 'धर्मयुग' में सहायक संपादक रहे; सन् 1972 से क्रमश: 'पराग', 'सारिका' और 'दिनमान' का संपादन किया और तीन वर्ष 'नवभारत टाइम्स' में फीचर संपादक रहे । छह वर्ष तक हिंदी 'संडे मेल' के प्रधान संपादक रह चुकने के बाद सन 1995 से 'इंडसइंड मीडिया' में डाइरेक्टर और 'इनटाइम' न्यूज़ चैनल के प्रधान नियामक रहे । भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की पत्रिका 'गगनांचल' का संपादन भी कई वर्षों तक किया । 'नूतन सवेरा' के सलाहकार संपादक भी रहे ।

तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें 'लुकुआ का शाहनामा, 'घाट-घाट का पानी', 'अंतरंग', 'नाट्यपरिवेश', 'आग के रंग', 'अमृता शेरगिल', 'समय की दहलीज़', 'सरहद पार की बिसातें' और 'धार के आरपार' बहुचर्चित । 'श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन' तथा 'द अर्थ हैज़ नो कार्नर्स' एवं 'ए डिप्लोमैटिक सजर्न (अंग्रेजी) का संपादन । सुप्रसिद्ध 'लोहिया पुरस्कार' एवं 'परिवार पुरस्कार' जैसे पुरस्कारों से पुरस्कृत, 'पद्मश्री' से अलंकृत और 'नेहरू फेलोशिप' से सम्मानित ।

स्मृति-शेष : 25 सितंबर, 2010

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