Kavi Ne Kaha : Rituraj

Rituraaj

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  • Year: 2008

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788189859824

कवि ने कहा : ऋतुराज
ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही हैं । बहुराष्ट्रीय निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे हैं और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है; वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कम दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते हैं और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।

Rituraaj

ऋतुराज
वसंत पंचमी, 1940 को राजस्थान में जन्मे ऋतुराज ने अपनी आजीविका के लिए कोई चालीस वर्षों तक अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया । फिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर चीन के चाहना रेडियों इंटरनेशनल से बतौर भाषा-विशेषज्ञ तीन वर्षों तक नौकरी की ।
इनके अब तक के प्रकाशित संग्रह हैं 'मैं आंगिरस' (1964), 'एक मरणधर्मा और अन्य' (1967), 'कितना थोड़ा वक्त' (1970), 'पुल पर पानी' (1981), 'अबेकस' (1982), 'नहीं प्रबोधचंद्रोदय' ( 1984), 'सूरत निरत' (1987), 'लीला मुखारबिंद' (2002), 'आशा नाम नदी' (2007) ।
सुधीन्द्र, मीराँ, सोमदत्त परिमल, पहल, बिहारी तथा सुब्रह्मण्य भारती हिंदीसेवी सम्मान से सम्मानित हो चुके हैँ ।

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