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428

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  • Bhagwan Mahaveer
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-127

    Availability: In stock

    भगवान महावीर विश्व के उन महापुरुषों में थे, जो मानव-श्रेणी से ऊपर उठकर देव-कोटि में पहुंच जाते हैं । भगवान महावीर के उपदेशों, सिद्धांतों और शिक्षाओं को लोगों ने हृदय से स्वीकार किया । वे अहिंसा के साक्षात् अवतार थे । उनका हृदय करुणा से आपूरित था । वे मानव मात्र के कल्याण के लिए विश्व-बंधुत्व के भाव को जन-जन  तक पहुंचना चाहते थे ।
    आज़ विश्व से चारों ओर हिंसा का तांडव फैला है । सर्वत्र मार-काट मची है । एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करने की घात लगाए रहता है। ऐसी दशा में भगवान महावीर की शिक्षाएँ बहुत ही उपयोगी हैं। उनका बताया हुआ शांति का मार्ग सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है । वे जन-जन में अहिंसा, सत्य, करुणा और प्रेम की उदात्त भावनाएँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं । 
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान महावीर के जीवन-परिचय के साथ-साथ उनके सिद्धांतो, उपदेशों और शिक्षाओं का भी उल्लेख किया गया है । समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उनकी शिक्षाओं पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
    विश्वास है कि पाठक-समूह भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों से प्रेरणा लेकर पूरे समाज का जीवन सुखी बना सकेगा ।
  • Toro Kara Toro-1 (Paperback)
    Narendra Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-7041

    Availability: In stock


  • Halahal
    Dhirendra Aasthana
    180 162

    Item Code: #KGP-1952

    Availability: In stock

    हलाहल
    धीरेन्द्र अस्थाना ने अपने साथी रचनाकारों की तुलना से कम लिखा है; लेकिन जो भी लिखा है, उसका हिंदी के व्यापक पाठक समाज में बेहद ममता और ललक के साथ स्वागत हुआ है । गहरी, मर्मस्पर्शी और अनेक आयामी भाषा के कुशल शिल्पी धीरेन्द्र अस्थाना का नाम उन रचनाकारों से लिया जाता है, जो लेखन को बेहद गंभीरता से लेते हैं और किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं रहते । यही कारण है कि उनका लेखन उत्पादन नहीं, सृजन की श्रेणी में खडा मिलता है । लिखे जाने के क्रम में 'हलाहल' उनका दूसरा उपन्यास है । पहली बार सन् 1988 में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पढ़ना रचनात्मकता की उस ताकत से हमारा साक्षात्कार कराता है, जिसे मुहावरे की भाषा में 'पुनर्नवा' कहते है । स्त्री-पुरुष संबंधों की एक बेहद पेचीदी स्थिति में उलझ गए इस उपन्यास के नायक की त्रासदी और वेदना इसका सतही सत्य है । अपने गोरे अर्थों में यह उपन्यास उन प्रतिकूलताओं को उजागर करता हैं, जिनमें फैलकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति 'नारसिसस' हो जाने के अभिशाप की तरफ फिसल जाता है, क्योंकि उसे सहेजने-संवारने के लिए एक तिनका तक प्रकट नहीं हो पाता । हिंदी के अत्यंत चर्चित और बहुपठित लेखक उदय प्रकाश ने कभी लिखा था 'धीरेन्द्र अस्थाना एक तटस्थ निर्ममता और निर्वेग संयम के साथ अपने भीतरी संसार के समूचे अंतर्द्वद्वों  के बखान के लिए बाहरी दुनिया में उसका समरूप प्रति संसार तलाशते हैं । ऐसे 'कोरिलेटिव' को अजित करना समकालीन लेखन में रचनात्मक उपलब्धि मानी जानी चाहिए ।'
  • Kavi Ne Kaha : Anamika
    Anamika
    200 170

    Item Code: #KGP-223

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।
  • Neeraj Ke Prem Geet
    Gopal Das Neeraj
    200 180

    Item Code: #KGP-59

    Availability: In stock

    नीरज के प्रेमगीत

    लड़खड़ाते हो उमर के पांव,
    जब न कोई दे सफ़र में साथ,
    बुझ गए हो राह के चिराग़
    और सब तरफ़ हो काली रात,
    तब जो चुनता है डगर के खार-वह प्यार है ।

    ० 

    प्यार में गुजर गया जो पल वह
    पूरी एक सदी से कम नहीं है,
    जो विदा के क्षण नयन से छलका
    अश्रु वो नदी से कम नहीं है,
    ताज से न यूँ लजाओ
    आओं मेरे पास आओ
    मांग भरूं फूलों से तुम्हारी
    जितने पल हैं प्यार करो 
    हर तरह सिंगार करो,
    जाने कब हो कूच की तैयारी !

    ० 

    कौन श्रृंगार पूरा यहाँ कर सका ?
    सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
    हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
    बीना जो भी बजी सो अधूरी बजी,
    हम अधुरे, अधूरा हमारा सृजन,
    पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ
    काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
    बिंब का मूक प्रतिबिंब छल जाएगा ।

    [इसी पुस्तक से ]
  • Gai Jhulani Toot
    Usha Kiran Khan
    270 243

    Item Code: #KGP-9364

    Availability: In stock

    उषाकिरण खान हिंदी की ऐसी रचनाकार हैं जिन्हें असंख्य पाठकों का साथ मिला है। वे चालू फैशन की ओर या प्रायोजित विमर्श की ओर कभी नहीं जातीं। उनके  पास बेशुमार कहानियां हैं जो पाठकों को व्यापक संवेदना से जोड़ती हैं।
    उषाकिरण खान का यह नया उपन्यास गई झुलनी टूट उनकी प्रसिद्धि को एक कदम आगे लेकर जाता है। इसमें उन्होंने एक सीधा-सादा मगर मार्मिक सवाल उठाया है, 
    ‘...जीवन केवल संग-साथ नहीं है। संग-साथ है तो वंचना क्यों है?’ इस रचना में उन्होंने सामान्य भारतीय परिवेश में एक स्त्री की जीवन-दशा का मार्मिक चित्रण किया है। वे अपने अनुभवों का इतना विस्तार करती हैं जैसे पूरा उपन्यास उनके आसपास जीवित किसी पात्र की दास्तान है। वे धरती की ध्वनियों को सुनती हैं और जीवन की जय-पराजय महसूस करती हैं।
    अथाह संघर्षों के बीच भी उषाकिरण खान जिजीविषा का संदेश देती हैं, ‘किसी एक व्यक्ति के सुख से न तो खेतों में हरियाली छा जाती है, न उसके दुःख के ताप से खेत, नदियां, तालाब सूख जाते हैं। जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोरें लेने लगता है तब भी चेहरे पर मुस्कान रखना पड़ता है सामने की पौध के लिए।’
    लोकजुड़ाव उषाकिरण खान की शक्ति है। यह उपन्यास सिद्ध करता है कि वे मैथिली और हिंदी की अद्वितीय कथाकार हैं। ऐसी कथाकार जिन्होंने नारी मन को पहचाना है और बिना स्त्री-विमर्श के कुलीन झंझट में पड़े उसके मन की सच्चाइयों को व्यक्त किया है। इसमें विशेषता यह है कि उपन्यास जीवन की सहजता को कहीं से खंडित नहीं करता और न ही यह लगता है कि अमुक कथा प्रसंग या पात्र गढ़कर पेश किया गया है। प्रस्तुत उपन्यास ‘भारतीय उपन्यास’ का एक प्रतिनिधि रूप है। इसमें जीवन-जगत् की अनुपम अनुगूंज है।
  • Krantikaariyon Ke Geet (Paperback)
    Chandrika Prasad Sharma
    120

    Item Code: #KGP-113

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    225

    Item Code: #KGP-7227

    Availability: In stock

    हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य के शीर्ष रचनाकार के रूप में व्यापक स्वीकृति प्राप्त कर चुके हैं। कथा साहित्य में जो स्थान मुंशी प्रेमचंद का है, व्यंग्य साहित्य में वही प्रतिष्ठा परसाई की है। व्यंग्य को उन्होंने ‘विधिवत विधा’ के रूप में अंगीकार किया। अन्यान्य विधाओं के  बीच व्यंग्य ने जो अकूत यश प्राप्त किया है उसके मूल में परसाई का बहुविधा लेखन ही है। व्यंग्य लेखन के लिए अनिवार्य विशेषताएं उनके व्यक्तित्व में सहज विद्यमान थीं, अपने अनुभव-अध्ययन और अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने विशेषताओं को क्षमता में रूपांतरित किया। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते हुए उन्होंने तात्कालिक मुद्दों पर भी व्यापक सोच के साथ लिखा। आज यह देखकर किसी को आश्चर्य हो सकता है परसाई ने तत्कालीन राजनीति का कितना सघन व तार्किक विश्लेषण अपने लेखन में किया है। राजनीति, समाज, धर्म, संस्कृति, अर्थ आदि के भीतरी स्याह- सफेद का जितना बोध परसाई को था वह बहुत कम लेखकों में संभव हुआ है। किसी लेखक में ‘साहस’ किस सीमा तक सक्रिय हो सकता है, इसके उदाहरण परसाई हैं। अपने मित्र मुक्तिबोध की बात उनके हृदय में सहज समाई थी कि अभिव्यक्ति वेफ खतरे उठाने ही होंगे। स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज और उसके अंतर्विरोधों की पड़ताल करता परसाई का व्यंग्य लेखन हिंदी गद्य साहित्य की स्थायी निधि है। लेख, स्तंभ, कहानी, लघु उपन्यास आदि के रूप में उनकी रचनाएं एक जीवन दर्शन बनकर हमारे साथ चलती हैं।
  • Raastrakavi Maithili Sharan Gupta Aur Saaket
    Prof. Surya Prasad Dixit
    300 270

    Item Code: #KGP-9136

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और साकेत 
    राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का काव्य परिमाण तथा स्तर, दोनों दृष्टियों से महत् है और अद्यावधि प्रासंगिक भी । गुप्त जी ने पारंपरिक वस्तु-शिल्प का नवीकरण किया, ख़डीबोली को काव्योपम बनाया, पुराख्यानों को आधुनिकता-बोध से जोड़ा और कविता को जन-संवाद की दिशा में मोडा । उन्होंने वाचिक परंपरा का पुनरारंभ करके स्वातंत्र्य-समर की कालावधि में एक विशिष्ट कोटि का जन-प्रबोधन किया । उनका जैसा विशद रचना-संसार किसी अन्य आधुनिक कवि का नहीं है ।
    'साकेत' गुप्त जी की सर्वोच्च सिद्धि है। उसके समतुल्य प्रबंधपदुता, कथ्य-कौशल और भाव-संपदा बहुत कम महाकाव्यों में प्राप्य है ।
    'साकेत' पर अनेक समीक्षाएं प्रकाशित हुई है, किन्तु उसके मूल प्रतिपाद्य को अब तक परखा-पहचाना नहीँ जा सका था । इस ग्रंथ के प्रणेता प्रो० दीक्षित की स्थापना है कि यह एक अंचल विशेष (साकेत) को नायक-पद पर प्रतिष्ठित कर रचा गया महाकाव्य है, जिसे आंचलिक प्रबंध की संज्ञा दी जा सकती है । 'साकेत' एक ओर रामोपासकों का दिव्या धाम है और दूसरी ओर राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना, पुरातत्त्व एवं उच्च उदात्त भारतीय आदर्शों से अभिमपिडत पुण्यभूमि भी, अत: वैष्णव भक्त, साथ ही राष्ट्रकवि गुप्त जी की पूर्ण तदात्म परिणति इसमें फलित हुई है ।
    यह समीक्षा जितनी मौलिक है, उतनी ही परीक्षोपयोगी भी। इसे अपने जीवनकाल में स्वयं राष्ट्रकवि ने भावविभोर होकर सराहा था । वस्तुत: सूक्ष्म, सुविचारित, संयत कृति समीक्षा है यह ।
  • Na Dainyam Na Palaynam
    Atal Bihari Vajpayee
    160 144

    Item Code: #KGP-33

    Availability: In stock

    सचाई यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकती । ऐसी राजनीति, जिसमें प्राय: प्रतिदिन भाषण देना जरूरी है और भाषण भी ऐसा जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके, तो फिर कविता की एकान्त साधना के लिए समय और वातावरण ही कहीं मिल पाता है । मैंने जो थोडी-सी कविताएँ लिखी है, वे परिस्थिति-सापेक्ष हैं  और आसपास की दुनिया को प्रतिबिम्बित करती हैं ।
    अपने कवि के प्रति ईमानदार रहने के लिए मुझे काफी कीमत चुकानी पडी है, किन्तु कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच मेल बिठाने का मैं निरन्तर प्रयास करता रहा हूँ । कभी-कभी इच्छा होती है कि सब कुछ छोड़-छाड़कर वहीँ एकान्त में पढ़ने, लिखने और चिन्तन करने में अपने को खो दूँ, किन्तु ऐसा नहीं कर पाता ।
    मैं यह भी जानता हूँ कि मेरे पाठक मेरी कविता के प्रेमी इसलिए हैं कि वे इस बात से खुश है कि मैं राजनीति के रेगिस्तान में रोते हुए भी, अपने हृदय में छोटी-सी स्नेह-सलिला बहाए रखता हूँ ।
    --अटल बिहारी वाजपेयी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Priyamvada
    Usha Priyamvda
    300 270

    Item Code: #KGP-628

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषा प्रियंवदा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'जिंदगी और गुलाब के फूल', 'वापसी', 'छुट्टी का दिन', 'जाले', 'एक कोई दूसरा', 'झूठा दर्पण', 'सागर पार का संगीत', 'चांदनी में बर्फ पर', 'शून्य' तथा 'आधा शहर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषा प्रियंवदा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें
  • Papa, Muskuraiye Na! (Paperback)
    Prahlad Shree Mali
    100

    Item Code: #KGP-1486

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    -इसी पुस्तक से
  • Datta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150

    Item Code: #KGP-202

    Availability: In stock


  • Shankhnaad
    Raj Budhiraja
    140 126

    Item Code: #KGP-118

    Availability: In stock

    शंखनाद
    "गांधी जी अगर राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे । महर्षि जी हमारी राष्ट्रीय  प्रवृत्ति और स्वाधीनता आंदोलन के आद्य-प्रवर्तक थे। गांधी जी उन्हीं के पदचिन्हों  पर चले । यदि महर्षि हमें मार्ग न दिखाते तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान हो जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता।" —अनंतशायनम् आयंगर
    "महर्षि दयानंद भारतमाता के उन प्रसिद्ध और उच्च आत्माओं में से थे, जिनका नाम संसार के इतिहास से सदैव चमकते हुए सितारों की तरह प्रकाशित रहेगा । वे भारतमाता के उन सपूतों में से हैं, जिनके व्यक्तित्व पर जितना भी अभिमान किया जाए थोड़ा है ।  नेपोलियन और सिकंदर जैसे अनेक सम्राट एवं विजेता संसार में हो चूके है, परंतु स्वामी जी उन सबसे बढ़कर थे ।" —खदीजा बेगम
    “बहुत-से लोग महर्षि दयानंद को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं, परंतु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेश प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान और स्वराज्य की घोषणा—यह सब बहुत पहले से देश को दिया है ।" —विट्ठलभाई पटेल
  • Aisa Satyavrat Ne Nahin Chacha Tha
    Raj Kumar Gautam
    60 54

    Item Code: #KGP-2100

    Availability: In stock

    ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था
    सदी के इस कठिन और जटिल समय में हिन्दी के जिन युवा लेखकों ने उपन्यास लिखे हैं उनके बीच राजकुमार गौतम की 'उपस्थिति' महत्वपूर्ण और 'निजी' ढंग से हुई है । अपनी सादगी, संवेदनशीलता और आयासहीन शिल्प के लिए चर्चित राजकुमार गौतम का कहानीकार 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में एक प्रौढ़, अनुभवी लेकिन जोखिम उठने वाले मछुआरे की तरह उतरा है । प्रतिकूलताओं और असभ्य जीवन स्थितियों के उछाल मारते, सिर पटकते पागल समुद्र की अतल गहराई में दुबली आस्था और संघर्ष की जो 'मछली' राजकुमार ने पकड़ी है और अपने नायक सत्यव्रत को सौंपी है उसके लिए इस उपन्यास को बहुत देर तक और दूर तक एक चमत्कार की तरह याद किया जाएगा ।
    नामहीन-व्यक्तित्वहीन केंद्रीय चरित्रों के मौजूदा ममय में इस उपन्यास का 'सत्यव्रत’ वापसी है उस नामधारी व्यक्तित्व की जिसका लोप छठे दशक के उत्तरार्द्ध से आरंभ हुआ था । 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में राजकुमार ने यथार्थ के स्तर-दर-स्तर उदघाटित करने के लिए जो अनेक आयामों वाली तीखी भाषा 'खोजी' है और प्रतिकुलताओं से लडते- भिड़ते लहूलुहान आदमी की गहरी त्रासदी, उदासी, करुणा और अंतर्द्वन्द्व को 'उभारने' के लिए जिस 'अंडरकरेंट' की तरह बहते 'सटायर' को चुना है वह मौजूदा समय में लिखी जा रही इकहरी और एकायामी रचनाओं के 'भब्भड़' में एक गहरा रचनात्मक सुख प्रदान करता है । भाषा के स्तर पर एक घटना के रूप में रेखांकित किया जा सकने वाला यह उपन्यास कथ्य के स्तर पर आज के आदमी की तकलीफदेह साँसो की गवाही तो है ही, यह गवाही है उसके टूटकर भी न टूटने की जिद और आकांक्षा की भी ।
  • Gardish Ke Din
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-794

    Availability: In stock

    गर्दिश के दिन
    ‘गर्दिश के दिन’ बारह भारतीय लेखकों के अपने आत्मकथ्य हैं--केवल उनकी अपनी भीतरी दुनिया के नहीं बल्कि बाहर की दुनिया से जुड़ने और लड़ने के दौरान जो कुछ उन्होंने अनुभव किया है और रचनात्मक संघर्ष के जिस दौर से वे लगातार गुज़रे हैं--उसी सिलसिले का एक आत्मिक और समयगत कथन इन रचनाओं का आधार है।
    इस गर्दिश से सभी गुज़रे हैं--और अभी बहुत से संघर्षशील लेखकों को इससे गुज़रना पड़ेगा, उन लेखकों को खास तौर से जो ‘ललित-लेखन’ 
    के पक्षधर नहीं हैं बल्कि दलित लेखन के लिए प्रतिबद्ध हैं।
    यह ऐसे ही भारतीय लेखकों की अपनी गर्दिश की विवरण-भरी कहानियां हैं।
    ‘सारिका’ के संपादन-काल में यह धारावाही स्तंभ प्रकाशित करना मेरे लिए अपने समकालीन लेखकों के माध्यम से समय की धड़कन को पहचानने का ‘कुतुबनुमा’ रहा है--जिससे मुझे दृष्टि भी मिलती रही है और मैं अपने समकालीनों से देश की हर भाषा की आत्मीय आवाज़ का साक्ष्य पाता रहा हूं और भारतीय युवा रचना की पहचान का जायज़ा भी लेता रहा हूं।
    --कमलेश्वर
  • Main Jasdev Singh Bol Raha Hoon
    Jasdev Singh
    480 432

    Item Code: #KGP-40

    Availability: In stock


  • Puraskrit Bacchon Ki Prerak Sahasi Kathayen
    Sanjiv Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-9352

    Availability: In stock

    मित्रो, ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ प्राप्त बच्चों की कहानियों पर आधारित  शृंखला की सातवीं पुस्तक के साथ एक बार मैं फिर आपसे मुखातिब हूं। आपसे मिल रहे प्यार और प्रतिक्रिया  के बलबूते एक और किताब तैयार करने का उत्साह मिला। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह किताब भी आप सभी को पसंद आएगी। बाल पाठकों की रुचि को देखते हुए इस बार इसमें चित्रों को भी खास तवज्जो दी गई है।
    वैसे तो बहादुर बच्चों की कहानियां हमेशा ही रोमांचित और प्रेरित करती हैं, लेकिन आज जबकि समाज में संवेदना खत्म होती जा रही है तो ये और भी प्रासंगिक हो गई हैं। यह देखकर बहुत ही दुःख होता है कि किसी को विपत्ति में देखकर आज लोग पीड़ित की मदद करने की बजाय उसका वीडियो बनाने और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने में लग जाते हैं। यह भविष्य वेफ लिए अच्छा संकेत नहीं है। हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि विपत्ति किसी  के भी साथ कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। आज जो किसी और वेफ साथ घटित हो रहा है, कल को हमारे साथ भी हो सकता है।
    जरा सोचिए...अगर ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ पाने वाले बच्चों ने भी इसी संवेदनहीनता का परिचय दिया होता तो क्या होता! इन बच्चों ने तो दूसरों की जान बचाने  के लिए अपनी और अपनों की भी परवाह नहीं की। उम्मीद करता हूं कि वर्ष 2016 वेफ लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  के हाथों पुरस्कृत इन बच्चों की कहानियां हमारे समाज में इस संवेदना को बनाए रखने में मददगार साबित होंगी और बच्चों व युवाओं को प्रोत्साहित करेंगी।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं : तीन
    अगर बीसवीं सदी के श्रेष्ठ लघुकथा-लेखकों की सूची बनानी पड़े तो उसमें एनॉ उन्नी का नाम किसी भी कीमत पर रखना ही पड़ेगा। हिंदी लघुकथा को एक विशिष्टता प्रेमचंद ने सौंपी तो दूसरी राजेंद्र यादव ने, तीसरी युगल, विष्णु नागर, पृथ्वीराज अरोड़ा और सुदर्शन वशिष्ठ ने, चौथी चित्रा मुद्गल और शशांक ने और पांचवीं उन्नी, पवन एवं चैतन्य त्रिवेदी ने और छठी अर्चना वर्मा, मालचंद तथा मुकेश वर्मा ने। लघुकथा को भाषा और भाव की जो गरिमा उन्नी सौंपते हैं, वह हिंदी में दुर्लभ है, शायद अद्वितीय, पर यह अद्वितीयता न तो रावी जैसी है, न जयशंकर प्रसाद या शशांक जैसी, जिनकी परंपरा संभव नहीं लगती, लेकिन उन्नी की लघुकथाओं की परंपरा बन सकती है, प्रेमचंद की तरह। अद्वितीय होना उस दोधारी तलवार पर चलने की तरह है, जिससे आपकी अपनी काया भी तराश दी जा सकती है। वह आपकी शक्ति हो सकती है और सीमा भी। जयशंकर प्रसाद, रावी और शशांक की लघुकथाओं की अद्वितीयता उन्हें सीमित कर देती है, जबकि प्रेमचंद, राजेंद्र यादव, सुदर्शन वशिष्ठ और चित्रा मुद्गल की अद्वितीयता उनके कथा-लेखन के सीमाहीन विस्तार की राहें खोल देती है। शशांक की लघुकथाएं अपनी परंपरा को छेंककर खड़ी हो जाती हैं, उनकी कहानियों की तरह। प्रारंभ में प्रियंवद की कहानियां भी ऐसी ही लगती थीं, लेकिन प्रियंवद ने अपनी उस अद्वितीयता की सीमाओं को खंड-खंड कर ‘बोधिवृक्ष’ जैसी कहानियों के जरिए खुद को सीमाहीन विस्तार में ले जाने वाली अद्वितीयता सौंपी है। ऐसी बात लेकिन कोई पाठक तब तक दावे से नहीं कह सकता, जब तक वह हिंदी के दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ‘पाठ-कुपाठ’ न कर ले। आज प्रायः हर कोई स्वीकार कर चला है कि यह समय लघुकथा का समय है। इसीलिए प्रस्तुत संचयन सर्व-संग्रह की साधु-वृत्ति से संचालित होकर संपादित हुआ है, लेकिन इक्कीसवीं सदी में आकर अब लग रहा है कि घना बजने वाले थोथे चनों को छांट देने का समय आ गया है, जिसकी शुरुआत प्रस्तुत संचयन के संपादकीय और संकलित आलोचनात्मक आलेखों से कर दी गई है यानी हिंदी लघुकथा की बीसवीं सदी का समग्र अवलोकन-सिंहावलोकन।
  • Aawara
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    175 158

    Item Code: #KGP-436

    Availability: In stock

    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का समाज-अध्ययन बड़ा प्रखर था। उन्होंने गरीबी में उसकी संपूर्ण भयावहता को बाल्यावस्था में ही भोगा था, अतः उग्र जी ‘आवारा’ नाटक में पूरी तरह सपफल सामाजिक नाटककार प्रतीत होते हैं। ‘उग्र’ का यह नाटक उस अभिनंदनीय योजना का पावन-प्रेरक स्मृति-चिन्ह बन आज भी विजयपताका की तरह यशगान करता पफहरा रहा है। सभ्य, समृद्ध समाज और उसमें कलाकार की दयनीय स्थिति, जमींदार की क्रूरता व जालसाजी का बिलकुल नग्न चित्रण है। 
    लाली-दयाराम की निश्छल प्लेटोनिक मनोवैज्ञानिक प्रेमगाथा को भी ‘उग्र’ ने जीवन के घिनौने पाशविक प्रेम-व्यवहारों से अलग-थलग चित्रित कर मर्मस्पर्शी और हृदयद्रावक बना दिया है।
    आलोचकों ने इस नाटक को स्वाभाविक माना था किंतु समसामयिक प्रगतिशील नाट्य रचनाओं में नई धारा और नूतन अभिव्यक्ति के अभाव का अनुभव कर उग्र ने सामाजिक जीवन में कला का स्वरूप निखारने के लिए नाटक में प्रचलित और रुचिकर शैली का अनुगमन किया है।
    ‘उग्र’ ने अपने लेखन-जीवन का आरंभ ही नाटकों से किया था। उनका पहला ही नाटक ‘महात्मा ईसा’ हिंदी का अत्यंत सफल और चर्चित नाटक रहा था।
    ‘चुंबन’, ‘गंगा का बेटा’, ‘अन्नदाता’, ‘माधव महाराज महान’ उनकी अन्य लोकप्रिय नाट्य कृतियां रही हैं। उपन्यास और भारी-भरकम संपादकीय से समय निकालकर ‘उग्र’ ने एकांकी और प्रहसन की भी रचना की है।
    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ रचित नाटक ‘आवारा’ में सामान्य सहायक पात्रों के अलावा छह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्र हैं, नाटक तैंतीस दृश्यों तथा तीन अंकों 
    में समायोजित है। पहले अंक में आठ, दूसरे में अठारह व तीसरे अंक में सात दृश्य हैं। ‘नाटक’ में ‘उग्र’ द्वारा प्रणीत गीत भी समायोजित हैं जो कथानक व वातावरण को सजीव बनाते हैं। गीत-नाट्य की यह पद्धति लोक-नाट्य परंपरा की-सी है। कथानक में प्रायः जो घटनाएं मंच पर नहीं दिखाई जातीं उनकी सूचना व वातावरण की मार्मिकता को और गहन बनाए रखने के लिए या कभी-कभी उसके प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करने के लिए गायन पद्धति उपयोगी सिद्ध होती है।
    प्रस्तुत नाटक ‘आवारा’ में बूढ़े भिखारी बुद्धूराम की बेटी लाली और क्रूर जमींदार के छोटे भाई दयाराम को प्रमुख पात्र के रूप में चित्रित कर हमारी सामाजिक मान्यताओं और परिस्थितियों पर सामयिक, तीखा और तीव्र व्यंग्य किया गया है। आज हिंदी में ‘उग्र’ नहीं रहे, न वैसे गुण-ग्राहक पाठक, मगर ‘उग्र’ का अकल्पनीय नाटक ‘आवारा’ आज भी उग्र की अपनी अद्भुत शैली ‘उग्र-शैली’  की याद दिलाता है।
  • Kaalchiti
    Shekhar Mallik
    350 315

    Item Code: #KGP-9320

    Availability: In stock

    यह उपन्यास है...
    उस हौसले और हिम्मत के लिए, 
    जो अपने हक के लिए लड़ती है...
    उस आदिम, जीवट, 
    अथक संघर्षशीलता के लिए...
    उस इनकलाबी भावना के लिए, 
    जो हर दौर में जिंदा होती है...
    सत्ता पोषित हिंसा के खिलाफ...
    जन-विमुख, भ्रष्ट सत्ता और 
    काॅरपोरेट गठबंधन के खिलाफ...
    उस आततायी सत्ता के खिलाफ...
    जो सोनी सोरी जैसों के खिलाफ 
    घृणित षड्यंत्र रचती है!
    निर्धन, निहत्थे, शांतिप्रिय आदिम 
    मनुष्यों का संहार करने वाली
    राजनीति के खिलाफ...!

    प्रस्तुत उपन्यास अर्ध गल्प और अर्ध समकालीन यथार्थ! क्योंकि चाहे कथा और पात्रा काल्पनिक हों, कुछ घटनाएँ वास्तविकता पर आधारित हैं। पहाड़-पानी और वन एवं भूमि सहित सामान्य मनुष्यों पर बलपूर्वक अधिकार करना अनैतिक है। केवल आम जन के समसामयिक उत्पीड़न को व्यक्त करना और ऐसे हिंड्ड कृत्यों की निंदा करना ही इस रचना का एकमात्र ध्येय है। जनजातीय समुदायों, मूलवासियों और आदिम संस्कृतियों पर इस दौर में हो रहे सत्ता-पोषित दमन का प्रतिवाद करना प्रत्येक विवेकशील नागरिक का कर्तव्य है। यह गद्य-पुस्तक सर्वमान्य मानवाधिकारों, सच्चे लोकतंत्र के पक्ष में और मनुष्य की स्वतंत्रता के हनन के सभी प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध है।
  • Dehri Bhai Vides
    Rajendra Yadav
    400 360

    Item Code: #KGP-70

    Availability: In stock

    इस ग्रंथ में संकलित सभी आत्मकथांश और आत्मकथ्य किसी न किसी स्तर की प्रतिष्ठित और स्थापित, जानी-मानी लेखिकाओं का योगदान है। सत्य है कि आत्मकथा उन लोगों की अभिव्यक्ति का सीधा औजार बन चुकी है जो अभी तक हाशिए पर रहते आए हैं और स्वयं अपने इतिहास से भी अपरिचित हैं। इतिहास में दाखिल होने के लिए भाषा में अंकित होना जरूरी है। किसी भी इच्छित और आयोजित परिवर्तन के लिए इतिहास के प्रति जागरूकता और नियति के लिए चुनौती स्वयं अनिवार्य हो जाती है। जो अपना इतिहास आज रचना शुरू कर रहे हैं उनके लिए सबसे सुगम और शीघ्र तरीका स्वयं अपने जीवन को ‘कथंत’ और ‘पठंत’ में बदलना है। इस संदर्भ में आत्मकथा, अभिव्यक्ति के एक साहित्यिक प्रकार की अपेक्षा राजनीतिक-सामाजिक दस्तावेज के रूप में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसके सहारे जूलिएट मिशेल के शब्दों में ‘पर्सनल इज पोलिटिकल’ का विमर्श रचा जाता है। यहां वह ‘व्यक्ति वैशिष्ट्यवाद’ का अगला उदाहरण नहीं, एक समूचे समुदाय के सामान्य जीवन की उन यातनाओं और यंत्रणाओं का नमूना है जो हर जीवन में समान रूप से मौजूद होने के बावजूद एक गोपनीयतारक्षी चुप्पी की साजिश के तहत हर व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग अतः व्यक्तिगत बनी रहती है।

    इस ‘व्यक्तिगत’ यंत्रणा के गुणनफल की सामूहिक-सामुदायिक यातना के रूप में पहचान ही परिवर्तन के लिए राजनीतिक संघर्ष की पहली सीढ़ी है।

    यहां प्रस्तुत आत्मकथांशों और आत्मकथ्यों के संकलन के पीछे यही आशा सक्रिय है, पंद्रह विशिष्ट स्त्रियों द्वारा अपने होने की दास्तान दर्ज करने की कोशिश में छिपी व्यक्तिगत यंत्रणाओं में सामुदायिक यातना की तसवीर खोज निकालने की आशा।...हिंदी में अभी तो यह एक शुरुआत भर है।

  • Jayvardhan Ke Teen Natak (Paperback)
    Jaivardhan
    180

    Item Code: #KGP-7233

    Availability: In stock


  • Saahasi Bachche : Anokhe Karname
    Sanjiv Gupta
    250 225

    Item Code: #KGP-243

    Availability: In stock


  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    275 220

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Sansaar Ki Shreshtha Kahaniyan (Paperback)
    Gyanchand Jain
    150

    Item Code: #KGP-05

    Availability: In stock

    संसार की श्रेष्ठ कहानियां
    कहानी-लेखन विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में प्रचुर परिमाण में होता आया है । उसने विश्व-साहित्य के इतिहास से अपनी एक खास जगह बनाई है। कहानी चाहे राजा-रानी के ऐश्वर्य और विलासितापूर्ण जीवन पर रची गई हो या शासन-सत्ता की बनती-बिगड़ती छवि को अंकित करती हो, वह घोर अराजकता और  असामाजिकता का चित्रण करती हो या भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के गर्त में दूबे हुए राजनीतिज्ञों का नग्न चित्र उतारती हो; देश-काल की व्यथा-कथा कहती हो या उसकी खुशहाली बयान करती हो-अंतत: होती वह आईने की तरह निर्दोष है । एकदम यथार्थ और कटु सत्य ।
    कहानियां चाहे मार्क टूवेन, जेम्स ज्वाएस, मैन्सफील्ड ने लिखी हों या बालज़क, मोपासां ने; लियो टाल्सटाय, चेखव, गोर्की ने लिखी हों या लुई जी पिरानडेलो, मारिसन, ए०ई० कोपर्ड ने; अनातोले फ्रांस, रोमानोफ  ने लिखी हों या एडवर्ड डेक्कर, हरमैन हेजरमैन्स ने, जेसिंन्टो पिकोन, कारेल कापेक, वानगी पामर ने लिखी हो या जेकब वासरमैन, मिक्सजथ, इमानोव ने; बजार्न्सन, आइजक पेरेज, लू शुन ने लिखी हो या प्रेमचंद, गुलेरी और मंटो ने-सबने अपने इर्द-गिर्द के समाज का और स्वयं भोगे हुए यथार्थ का अंकन किया है ।
    प्रस्तुत संकलन में ऊपर चर्चित अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्व-भर के लेखकों की तीस चुनिंदा कहानियां सम्मितित हैं। ये कहानियां अपने-जपने देश-काल की सामाजि- कार्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों की अंतरंग झाँकियाँ प्रस्तुत करती हैं । ये विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में पढी गई और इन्होंने लोकप्रियता के उच्चतम शिखरों को छुआ । संकलन की अंतिम चार कहानियों (एक चीनी, दो हिंदी, एक उर्दू) के अतिरिक्त शेष सभी का रूपांतरण हिंदी के वरिष्ट साहित्यकार श्री ज्ञानचंद जैन ने अत्यंत सरल और सहज ग्राह्य भाषा- शैली में किया है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma (Paperback)
    Nirmal Verma
    100

    Item Code: #KGP-1263

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : निर्मल वर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाडी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Akasmaat Kuchh Kavitayen
    Surendra Pant
    160 144

    Item Code: #KGP-9336

    Availability: In stock

    हिंदी कवियों ने अपने काव्य-मुहावरों को यदि रसिकतापूर्ण काव्यरूपों से श्रृंगारित किया है तो कुछ कवियों ने कविताओं को चीखने की स्वतंत्रता भी दी है। मगर इस संगह की कविताओं में पाठक पाएंगे कि कवि का सरोकार बृहत्तर मानवता की उपस्थिति करने में कई बार वह संप्रेषणीयता की रूप-सज्जा की भी परवाह नहीं करता। व्यापक जनहितों की आकांक्षाओं के बीच से अंकुरित इन कविताओं को सच्चे ईश्वर, खरे अध्यात्म तथा खनकदार वर्तमान की चाहत है, जो भोले-भाले लोक को उसकी निष्कपटता लौटा सके। ‘मदर टेरेसा’ पर केंद्रित कविता को पढ़कर हमें कवि की मानवगत अवधारणाओं का समूचा अहसास होता है।
    पुलिस विभाग के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ‘संवेदनशील’ पद का निर्वहन करते हुए यह कवि समाज और राजनीति की ‘रणनीति’ में लाखों-लाख हंसते-रोते हैवानों-इंसानों के परम-चरम अनुभवों का साक्षी रहा है, इसीलिए ये कविताएं हमारे समय और समाज की धाराओं-उपधाराओं के रूप में कवि के सामने ‘पेशी’ पाकर शब्दांकित होती हैं। संभवतः इस अनुभवबहुलता ने कवि को किसी इकहरे विषय का मर्मज्ञ न रहने देकर, सर्वत्र का प्रवक्ता कवि भी बना दिया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस विविधता के बावजूद कवि का ध्यान अपने देश, संस्कृति और जन पर लगभग प्रत्येक कविता मंे कंेद्रीकृत हुआ है।
    कहना न होगा कि इन कविताओं के नए तेवर का आगमन भले ही अकस्मात् रूप में हुआ है, मगर निश्चित ही इनका सृजन गहरी विचारशीलता के बाद ही संभव हुआ होगा।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar
    Ramdhari Singh Diwakar
    250 225

    Item Code: #KGP-8006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    रामधारी सिंह दिवाकर

    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।

    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।

    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार', 'खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानी', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पुल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।

    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Anveshak
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1914

    Availability: In stock

    अन्वेषक
    महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम अतीत की ओर मुँह करके खडे को जाएँ और खडे रहें। हाथ में अतीत का झंडा उठा लें और गौरव को मीनारों पर चढ़कर खुद को बडा महसूस करें। महत्वपूर्ण यह है कि अतीत को खँगालें, अतीत की मीनारों को ओर देखें, पर अपने पैरों तले को जमीन न छोड़ें।
    'अन्वेषक' को रचना का मूल बिंदु यहीँ से शुरु होता है। इसी अर्थ में यह नाट्य-रचना पाँचवीं शती के उत्तरार्द्ध में हुए आर्यभट और उसके अन्वेषणों के बहाने समकालीन प्रश्नों यर विचार करती है। प्रगतिकामी और प्रतिगामी शक्तियों के बीच को रहे संघर्ष को नाटकीय तनावों के साथ अभिव्यक्त करती है। अवरोधकारी और अंधविश्वासी शक्तियों के सामने क्रांतिकारी अन्वेषण करने वाले किसी भी अन्वेषक को जिस मानसिक यातना से गुजरना पड़ सकता है और अंततः  उसकी क्या नियति हो सकती है इस सवाल पर भी यह नाटक गौर करता है।
    इतिहास नाटक की पृष्ठभूमि है इसलिए यह ऐतिहासिक नाटक नहीं है। इसका मकसद की जानकारी देना भी नहीं, बल्कि इतिहास के एक कालखंड, उस कालखंड में जन्मे आर्यभट के अन्वेषणों के बहाने परिवर्तन-, शक्तियों के संघर्ष को रेखाकित करना है। इसी के साथ जुड़ते है प्रेम, ईष्यों, स्मृहा, देश-प्रेम और वैज्ञानिक-टैम्पर से जुडे तमाम सवाल । 
    इन अर्थों में 'अन्वेषक' हिंदी नाटकों की उस परंपरा को आगे बढाता है जो प्रसाद से शुरू होकर मोहन राकेश में बदल जाती है। यहीं इतिहास पर उतना आग्रह नहीं, जितना प्रसाद को था पर नाटय-व्यापार पर आग्रह है। इतिहास के महीन तंतु को एक प्रभावी नाटक में रचने की क्षमता यहाँ साफ झलकती है। आशा है प्रताप सहगल का यह नाटक रंगकर्मियों  एवं नाट्य प्रेमियों की अदम्य रंग-पिपासा को एक सीमा तक अवश्य ही शांत करेगा।

  • 20-Best Stories From Scandinavia
    Prashant Kaushik
    395 356

    Item Code: #KGP-9314

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics  from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Scandinavian short stories  are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious.  A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup  of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new  world on each page.

    With stories like Shortshanks, Priest and The Clerk, Golden Castle in the Air,  Two Stepsisters, Princess on the Glass Hill, Master-smith, this book is a compilation of 20 famous Scandinavian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Scandinavia.
  • Meethi Neem (Paperback)
    Kusum Kumar
    240

    Item Code: #KGP-389

    Availability: In stock


  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Media Aur Hindi Sahitya
    Raj Kishore
    250 225

    Item Code: #KGP-303

    Availability: In stock

    मीडिया और हिंदी साहित्य
    मीडिया और साहित्य का रिश्ता बिगड़ चुका है। इसमें संदेह नहीं कि आदर्श या लक्ष्य की दृष्टि से दोनों की मूल संवेदना एक है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को शिक्षित करना और सभ्यता के स्तर को ऊँचा उठाना है। दोनों भाषा में ही काम करते हैं, जो एक सामाजिक घटना है। इसके बावजूद आज मीडिया और साहित्य के बीच गहरी होती हुई खाई दिखाई देती है। यह खाई चिंताजनक इसलिए है कि मीडिया की पैठ और लोकप्रियता अधिक होने के कारण जनसाधारण के संस्कारों और रुचियों का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। दूसरी तरफ, साहित्य की दुनिया संकुचित होती जाती है और उसकी संवेदना का सामाजिक विस्तार नहीं हो पाता। इस तरह, संस्कृति की दुहरी क्षति होती है।...
    जहाँ तक साहित्य और मीडिया के रिश्ते का सवाल है, हिंदी का मामला न केवल कुछ ज्यादा निराशाजनक है, बल्कि ज्यादा पेचीदा भी है। साधारण जनता से सीधे जुडे़ होने के कारण हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की सामाजिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। संस्कृति की दृष्टि से हिंदी का संसार एक विकासमान संसार है। हिंदी प्रदेशों में साक्षरता का स्तर हाल ही में बढ़ा है और पढ़ने तथा जानने की भूख जगी है। मीडिया का काम इस भूख को सुरुचि-संपन्नता के साथ तृप्त करना है और व्यक्ति के सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकारों को मजबूत करना है। कुछ समय पहले तक स्थिति जैसी भी थी, बहुत अधिक असंतोषजनक नहीं थी। मीडिया में लेखकों का मान था और साहित्य के लिए कुछ सम्मानजनक स्थान हमेशा सुरक्षित रहता था, लेकिन आज नौबत यह है कि दोनों के बीच अलंघ्य दूरी पैदा हो चुकी है। ऐसे में सामाजिक दबाव का रास्ता ही असरदार हो सकता है। 
  • Yahaan Se Kahin Bhi
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2092

    Availability: In stock

    यहाँ से कहीं भी
    'सफ़री झोले में' के बाद 'यहाँ से कहीं भी' अजितकुमार की यात्राओं का दूसरा संग्रह है । उनकी कविता ही नहीं, समीक्षा-कहानी-उपन्यास संरमरणादि के भी पाठक जानते है कि अजितकुमार विधाओं की जकड़बंदी म नहीं फंसते। लेखन उनके लिए कोई समर-भूमि नहीं, जहाँ जिरह-बख्तर से लेख वे लगातार तलवार  भाँजने रहें या अंतरिक्ष-यात्री का लबादा ओढ़ लंबे सफ़र पर निकल पडे ।  वह उनके लिए संवाद का सरल माध्यम है, कभी-कभी तो अपने-आप में ही संवाद का।  एक रंग के भीतर मौजूद तमाम रंग जैसे इंद्रधनुष में बिखर उठते है, कुछ-कुछ वैसा ही दृश्य— डायरी, टीप, रेखाचित्र, आत्मकथा, रपट, वार्ता जैसे  बहुत कुछ को झलकाता यात्रावृत्तों में मिलेगा।  जटिल या सरल, वह दृश्य जैसा भी है— यदि आपके लिए भी प्रीतिकर हुआ तो इम कामना की संभावना रहेगी कि जैसे उनके यात्रा-दिन बहुरे, वैसे आपके भी बहुरें । 

  • Akshar-Kundali
    Amrita Pritam
    260 234

    Item Code: #KGP-1977

    Availability: In stock

    अक्षर-कुण्डली
    'पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे'-
    यह तो महाचैत्तन्य का अनुभव है ।
    इसके लिए तो मीरा हो जाना होता है ।
    लेकिन जब एक जिज्ञासु ऐसी मंजिल के
    सम्भावना अपने में नहीं देख माता,
    तब भी, मैं मानती हूँ कि उसके
    कान उस रास्ते के ओर लगे रहते है-
    जहाँ, दूर से मीरा के पाँव में बँधे
    हुए घुँघरू- उस पुरे रास्ते को तरंगित
    कर रहे होते है ।
    यह पुस्तक 'अक्षर-कुण्डली' मेरी किसी प्राप्ति की गाथा नहीं है । यह तो एक जिज्ञासु मन की अवस्था है, जिसे कभी-कभी किसी पवन के झोंके मेँ, मिली हुई मीरा के घुंघरुओं की ध्वनि सुनाई देती है... 
    -अमृता प्रीतम
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Krishan Baldev Vaid
    Krishna Baldev Vaid
    70 63

    Item Code: #KGP-9056

    Availability: In stock


  • Satta Ke Aar-paar
    Vishnu Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9106

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    —इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Tiger Tantra (Novel)
    Ganga Prasad Vimal
    425 383

    Item Code: #KGP-872

    Availability: In stock

    A first ever Novel on an Untouched Subject
    The Tantra, its cults and practices have always attracted attention worldwide due to its strange disciplines and various hidden secrets. Chiefly because of its use of esoteric practices— in acquiring siddhis (supernatural powers), spiritual perfection and other material gains—Tantra came to be regarded as anti-social and unethical, forcing it to go underground.
    The present novel explores an unusual aspect of the tantric discipline, which makes it quite interesting. The author has taken up a subject inherent to the sub-culture of the Himalayan regions to which he belongs, and tried to weave it into a quite probable story, realistic as well as readable.
    ‘Tiger Tantra’ or the Tantra which changes the practitioner into a tiger or Bokshu and makes him immortal, lies buried under the ruins of a temple in the village of Jaled, the centre of an isolated Tantric Peeth in the Himalayan region.
    A scholar in search of the Tiger Tantra visits the village, to uncover the secret and to find the hidden mantra, finds a swami engaged in some strange practices . . . and the story unfolds in its fantastic dimensions . . . till the virgin offers herself to the scholar to corrupt the swami’s sadhana.
  • Kavi Ne Kaha : Vishwanath Prasad Tiwari (Paperback)
    Vishwanath Prasad Tiwari
    90

    Item Code: #KGP-1361

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    मेरी कविताओं में ऐसे शब्द, बिंब या प्रतीक अधिक हैं जो भोगते हुए या जूझते हुए मनुष्य से संबंधित है । मैं गरीब देहाती दुनिया से जाया हुं और मेरे शुरू के बीस वर्ष उस अनाथ साधनहीन मनुष्य के बीच गुजरे जिसे बार-बार अपमानित होते, यातनाएं सहते देखा है । मेरी कविताओं में 'हत्या' और उससे मिलती-जुलती शब्दावली में जो आतंक है, वह मेरे बालमन पर पडे प्रभावों की ही प्रतिक्रिया है । मेरी कविताओं में 'अंधकार' और 'रात' के बिंब भी अधिक हैं जो एक अनार मेरे अकेलेपन की अतृप्ति को व्यक्त करते है तो दूसरी खार उस अंधकारमय दबाव को जिसे आज का साधनहीन मनुष्य भोग रहा है । मेरी कविताओं में पहाडी परिवेश अधिक मिलेगा । पहाड़ के प्रति मेरा गहरा आकर्षण है और मृत्यु-भय से आतंकित होते हुए भी मैंने पहाडी यात्राएं बहुत की हैं । हिमालय का परिवेश मेरी प्रेम कविताओं में कहीँ-कहीं प्रेमिका के साथ एकाकार हो गया है । कुछ शब्दों के सदंर्भ से प्रयोक्ता और ग्रहीता के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है । अपनी कविताओं के प्रसंग में कहूं तो उनमें 'इतिहास', 'धारा', 'अंधकार', 'घाटी', 'जंगल', 'पहाड़' आदि अनेक शब्द अपना विशिष्ट अर्थ रखते है ।
    'बेहतर दुनिया के लिए' और 'आखर अनंत' नामक संग्रहों की बहुत-सी समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी है । इन संग्रहों के बारे में अपनी ओर से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इनमें मेरी रचनात्मक भाषा  परित्कृत हुई है और कविताओं को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मिला है । आत्मीय  का भी और लोक जा भी ।

  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    140

    Item Code: #KGP-7020

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।   
  • Aagaami Ateet (Paperback)
    Kamleshwar
    70

    Item Code: #KGP-7068

    Availability: In stock


  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen, Kuchh Purush (Paperback)
    Khushwant Singh
    100

    Item Code: #KGP-1458

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Jangal Se Shahar Tak
    Rajendra Avasthi
    260 234

    Item Code: #KGP-9099

    Availability: In stock

    जंगल से शहर तक
    अपने को मैं सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे मध्य प्रदेश और बस्तर से लेकर पूरे देश के आदिवासियों के बीच काम करने, रहने और उनके जीवन को गहराई से समझने का अवसर मिला है। मुझे बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ था कि आज की दुनिया से अलग इनकी अपनी जिंदगी है और उस जिंदगी के प्रति कभी उन्होंने शिकायत नहीं की। उनके लिए जो कुछ संभव था, कई तरह किया गया। बस्तर उस समय के मध्य प्रदेश का ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा जिला था। जगदलपुर इसका मुख्यालय आज भी है। इतने बड़े क्षेत्र को संभालना आसान नहीं है। मैं कृतज्ञता ज्ञापन करूंगा कि जगदलपुर अब ढाई जिलों में कंट गया है। धीरे-धीरे अब वहां सुधार हो रहा है और वहां के निवासियों की उन्नति के लिए सरकार प्रयत्नशील है। यही बात नागा, गोंड़, टोडा, कोरकू, उराव, खोंड इत्यादि क्षेत्रों की है। मुझे याद है कि एक समय इनके बीच में पहुंचना बहुत कठिन था। स्थिति अब बदल गई है और वे प्रसन्नतापूर्वक इस समूचे देश के अंग हैं। यह ज्ञान उन्हें हो रहा है।
    मैंने कुछ भी चीज कल्पना से नहीं लिखी। इनके बीच में इनका बनकर, रहकर मैंने काम किया है। सारी व्यस्तताओं के बावजूद मुझे जंगलों में घूमनो हमेशा पसंद रहा है। कहा जा सकता है कि मैं जंगली भी हूं और शहरी भी।
    इतिहास, साहितय-जीवन, देश और काल का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। वह अपने अतीत के माध्यम से आज का चित्र प्रस्तुत करता है।
    —राजेन्द्र अवस्थी
  • Mere Saakshatkaar : Ashok Vajpeyi
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-2037

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अशोक वाजपेयी
    देश के सर्वाधिक विवादास्पद संस्कृतिकर्मी, कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी गत तीन दशकों से हिन्दी साहित्य और संस्कृति के परिदृश्य पर छाए हुए हैं। कविता और आलोचना के साथ-साथ समय साहित्य और कलाओं के प्रति बहुलतावाद के पक्षधर श्री वाजपेयी पर अब तक जितने वैचारिक हमले हुए हैं, वे यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि उनको भूलकर स्वातंत्र्योत्तर साहित्य की बहस अधुरी रहेगी ।
    'मेरे साक्षात्कार' श्रृंखला की यह पुस्तक उन तमाम आरोपों और बहसों का एक दस्तावेज है जो गत तीस वर्षों में होती रहीं है । इनमें अशोक वाजपेयी ने बहुत सफाई से अपने पर लगाए जाते रहे आरोपों का खंडन किया है और साहित्य की सार्थक भूमिका को रेखांक्ति किया है । बातचीत में शामिल मुद्दे वहीं है जो वर्षो से साहित्यिक परिदृश्य पर उठते रहे है । इन मुद्दों में कला और साहित्य की स्वायत्तता तथा उसकी प्रजातांत्रिकता, कलादृष्टियों की लोकतांत्रिकता का सम्मान, साहित्य की समाज-सापेक्षता, कलावाद की जरूरत, कविता और विचार का द्वंद्व , उत्तर-आधुनिकता की उपादेयता और जीवन में साहित्य के सरोकार जैसे मुद्दे इस पुस्तक में बसी मुस्तैदी से उठाये गए है जिनका सटीक, सार्थक और दोटूक ज़वाब देते हुए अशोक वाजपेयी ने अपनी संघर्ष-यात्रा की सार्थकता प्रमाणित की है । पशिचमी अवधारणओं पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने वाले कथित आलोचकों को भी वे करारा झटका देते है जब कहते है कि 'उत्तर- आधुनिकता भरत में प्राक आधुनिकता है ।'
    अशोक बाजपेयी हिन्दी ही नहीं देश के दो-तीन ऐसे आलोचकों- भावकों में हैं जिनके लिए कलाओं का भी उतना ही मूल्य है जितना कि साहित्य का । पुस्तक में कई स्थलों पर संगीत, नृत्य, रूपंकर आदि कलाओँ पर बात करते हुए श्री वाजपेयी ने कलाओं की पारस्परिक्ता और मित्रता के कई ऐसे सूत्रों का भी खुलासा किया है जिनकी चर्चा हाल में अधिक मुखर हुई है । कहना चाहिए कि यह पुस्तक अपनी बेबाकी और उपादेयता के कारण उन सबको पसंद आएगी जो साहित्य को महज़ हथियार नहीं, संख्या भी मानते हैं ।
  • Sun Mutiyare
    Santosh Shelja
    450 405

    Item Code: #KGP-133

    Availability: In stock

    सुन मुटियारे
    ‘सुन मुटियारे’ उपन्यास उस तरुणी (मुटियार) की कहानी है, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी ‘बंटवारे’ से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे...जब खेतों में भरपूर अनाज था और दिलों में भरपूर प्यार था...जब ‘पंज दरिया’ की धरती गाती-नाचती रहती थी।
    कथानक की धुरी तो है ‘मुटियार’, लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक भरा-पूरा परिवार है, समाज है, जिसमें विविध पात्र हैं—गाँव के भी, शहर के भी। उनकी हँसी और आँसू, समस्याएँ और समाधन, सुख और दुःख—सब कुछ ऐसे साथ जुड़ा चला आता है, जैसे कवि के शब्दों में—‘जस केले के पात में छुपे पात दर पात।’ इस प्रकार कथानक का मुख्य पात्र एक नहीं रहता, बल्कि अनके पात्रों के रूप में प्रकट होता हैं अतएव यह कहानी जीवन के विराट् पट पर रंग-बिरंगे धगों से बुनी रंगीन चादर ‘फुलकारी’ की तरह उभरती है। इसका एक सिरा पंजाब के गाँव से जुड़ा है तो दूसरा राजधानी के महानगर से। इसीलिए कहानी में गाँव के लोकगीत और पंजाबी भाषा के शब्द स्वयमेव ही आ गए हैं, जैसे सावन की घटाओं के साथ मोर का नृत्य और कोयल की कुहुक आ जाती है।
  • Manch Andhere Mein
    Narendra Mohan
    120 108

    Item Code: #KGP-1915

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Sant Meeranbai Aur Unki Padaavali
    Baldev Vanshi
    295 266

    Item Code: #KGP-168

    Availability: In stock

    संत मीराँबाई और उनकी पदावली
    मीराँबाई  की गति अपने मूल की ओर है । बीज-भाव की ओर है । भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्त्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई । अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है ।
    मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चटूटानें  राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढती चली गई । वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रम-क्रम तोड़ती चली गई । राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान ममाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकीं और मुक्त हो गई । इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया । तभी मीराँ, मीराँ बनी ।
  • Aise Hamaare Harda
    Pradeep Pant
    350 315

    Item Code: #KGP-587

    Availability: In stock


  • Utho Annapoorna Saath Chalen
    Usha Mahajan
    100 90

    Item Code: #KGP-9127

    Availability: In stock

    दांपत्य दो समान व्यक्तियों एकीकरण का नाम है। दंपति का संधिविच्छेद करें तो बनता है दम् (घर) $ पति। अर्थात् दोनों ही घर के बराबर के पति हैं। लेकिन कितनी समानता है हमारे समाज में आज भी पति और पत्नी के स्तर में? किस प्रवृत्ति का प्रतीक है सत्तर के दशक से दहेज-हत्याएं कही जाने वाली शादीशुदा औरतों की अप्राकृतिक मौतों का दौर? क्या कारण हैं हिंदू समाज में दांपत्य-संबंधों में बढ़ती दरारों के? जिस समाज मंे स्त्री के लिए पति परमेश्वर के समान माना जाता है, वहीं दिल्ली-मद्रास जैसे महानगरों में डेढ़ से दो हजार कुंवारी लड़कियां हर माह डाॅक्टरों से गर्भपात करवाती हैं, सगे पिता अपनी मासूम बेटियों का यौन-शोषण करते हैं। सेक्स विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से मिलंे, तो वे बताते हैं कि पहले पुरुषों के ही अवैध संबंध हुआ करते थे, पर अब औरतें भी उनके मुकाबले में विवाहेत्तर और विवाह-पूर्व संबंध रख रही हैं। अदालतों में जाकर देखें तो अनगिनत दंपति एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गाली-गलौज करते और यहां तक कि जूते-चप्पल चलाते भी आपको मिल जाएंगे।
  • Chhoo Mantar
    Pratap Sehgal
    100

    Item Code: #KGP-958

    Availability: In stock


  • Amar Shaheedon Ki Amar Kathayen
    Shyam Lal
    50

    Item Code: #KGP-969

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajee Seth
    Raji Seth
    230 207

    Item Code: #KGP-798

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी...?', 'अपने दायरे', 'ठहरो, इन्तजार हुसैन', 'उतनी दूर' तथा 'यह कहानी नहीं'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजी सेठ की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Nidhi Maharaj
    Pradeep Anshu
    35 32

    Item Code: #KGP-2060

    Availability: In stock

    निधि महाराज
    निधि महाराज अमृता प्रीतम के उपन्यास 'कोरे कागज' के शक्ति-बिन्दु हैं । उपन्यास के सभी किरदार अपनी खोई हुई दिशा को उसी शक्ति-बिन्दु से पाते हैं ।
    लेकिन एक गीता है, जो जिंदगी के अन्याय को झेलती हुई जब गंगा की शरण ले लेती है, तो उसकी व्याकुल आत्मा उपन्यास में खामोश बनी रहती है। 
    श्री प्रदीप अंशु निधि महाराज के शक्ति-स्थल से उतरकर एक मर्म को इस तरह पा गए है कि गीता की मुक्ति के लिए भी वह निधि महाराज को ही समर्थ पाते हैं... और जहाँ काल-अंतर मिट जाता है, वहीं खडे होकर श्री प्रदीप अंशु ने  जो  अंतर-ध्वनि सुनी है--उसी का   कि ब्यौरा यह पुस्तक है--'निधि महाराज' ।
    यह लेखन की एक ऐसी विद्या  है, जो आज तक साहित्य का अंग नही बनी थी और प्रदीप अंशु इसी विद्या  को पहली बार साहित्य से लाए हैं।
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-7039

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    [इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]

  • Parvatiya Sanskriti Main Shiv Shakti
    Sudarshan Vashishath
    460 414

    Item Code: #KGP-9360

    Availability: In stock

    शिव और शक्ति आदि देव रहे हैं हमारी संस्कृति के। हर पर्वत शिखर शिव का प्रतीक है तो हर घाटी में देवी पार्वती अपने अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। किन्नर कैलास और मणिमहेश की कठिन यात्राएँ प्रसिद्ध हैं जो शिव के मूल स्थान की खोज में हजारों फुट की ऊँचाई तक हर वर्ष की जाती हैं। उधर पुराने समय में मणिकर्ण पहुँच पाना भी सुगम नहीं था। हालाँकि मंडी राज्य में प्रमुख देवता माधोराव रहे हैं किंतु यहाँ महाशिवरात्रि का उत्सव सात दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। वैद्यनाथ धाम, प्रसिद्ध शिव मंदिर मसरूर आदि ऐसे स्थान हैं जो पुरातन काल से शिव उपासना के सिद्धपीठ बने हुए हैं।
    यदि हिमाचल प्रदेश का ऊपरी भाग देव भूमि है तो निचला क्षेत्र ‘देवी भूमि’ है जहाँ शक्ति अपने अनेक रूपों में विद्यमान है। शक्ति की स्थापना चंडीगढ़ से आरंभ हो जाती है जहाँ चंडी मंदिर है। उसके साथ ही प्रसिद्ध मनसा देवी और फिर कालका। उससे ऊपर तो समस्त भूभाग देवीमय हो गया है। श्री नैना देवी, चिंतपूर्णी माता, श्री ज्वालामाई, वजे्रश्वरी, चामुंडा—न जाने कितने ही स्थान हैं जहाँ देवी किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इस ओर कामाक्षा देवी, भीमाकाली तो उस ओर लक्षणा देवी और आदिशक्ति।
    हिमालय के इस पर्वतीय क्षेत्र में एक सशक्त देव परंपरा की व्यवस्था है। यहाँ देवी और देवता को सामान्यतः ‘देउ या देवता’ ही संबोधित किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में देवता का संस्थान बहुत शक्तिशाली है जो सामाजिक जीवन के हर पहलू को नियोजित करता है। धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक; कोई भी क्षेत्र हो, देव का संस्थान उसे संचालित करता है। हर देवता का अपना क्षेत्रा होता है जिसे ‘शासन’ कहा जाता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में शिव व शक्ति के प्रमुख व प्रसिद्ध स्थानों के अलावा कुछेक ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों के देवों को भी सम्मिलित करने का प्रयास किया गया है।
  • Dharm Ke Aar-Paar Aurat
    Neelam Kulshreshtha
    450 405

    Item Code: #KGP-310

    Availability: In stock

    धर्म के आर-पार औरत
    मानव जीवन के लिए धार्मिक आस्था व संस्कार दोनों आवश्यक हैं। स्त्रियाँ धर्म के पाखंडी व शोषक स्वरूप का विभिन्न माध्यमों से ज़ोर-शोर से विरोध कर रही हैं। इस पुस्तक में पढ़िए:
    अधिकतर धर्म कैसे पोषित होता है?
    प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने क्यों कहा है, ‘कुरान शुड बी रिवाइज़्ड?’
    समाज में वर्गभेद का आधार पौराणिक पृष्ठभूमि भी है। क्या उसका आधुनिकीकरण आवश्यक है?
    गीता के दसवें अध्याय में स्त्री में अपनी सात विभूतियों की चर्चा करने वाले कृष्ण स्वयं क्या थे?
    सती के चैरों व मेलों पर क्यों प्रतिबंध लगना चाहिए? लड़कियों को कैसी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?
    दक्षिण भारत में स्त्री के गले में पहना एक पोटु (पेंडेंट) वाला मंगलसूत्र उसके शरीर तक जाने का रास्ता था।
    जैन धर्म में भी माना गया है कि पूर्वजन्म में जो कुछ बुरे कार्य करता है, वही स्त्री के रूप में पैदा होता है।
    परिवार को त्यागकर मोक्ष की चाह में भटकना अधिक कठिन है या गृहस्थी का संचालन करना?
    दुनिया को अपनी दृष्टि से देखती स्त्री क्यों स्वीकार करे पौराणिक स्त्री-चरित्रों जैसी नियति?
  • Sant Tiruvalluvar
    Hari Krishna Devsare
    120 108

    Item Code: #KGP-9325

    Availability: In stock

    संत वळ्ळूवर
    हे दरिद्रता के आराधक-
    सहज पुजारी
    दिव्य तुम्हारा, बंधा नहीं है उन शब्दों में
    कोई वाणी तुमको व्यक्त नहीं कर पाई अब तक-
    यह संसार, परिवर्तनशील हे, सभी मत्य हैं
    किंतु तुम्हारी सुकीर्ति अमर है
    क्योंकि तुम हो विश्व मानव के चारण
    वन प्रांतर के ताड़-पत्र सी
    निःसृत ध्वनि से
    भरा हुआ है जिसका अंतर, हे वळ्ळुवर
    इन कुरलों में भरा हुआ है
    आदि सत्य, पूरा भविष्य, पूरा आगत ही
    सुख का स्वप्नातीत सत्य सब
    जन्म जन्मांतर के रहस्य-क्रम बंदी है
    यह चिंतन को क्षेत्र
    तुम विराट हो, तुम व्यापक हो
    जो शाश्वत स्वर प्रतिगुंजित है
    सहज पदों में,
    वे उज्ज्वत हें, परिच्छेद सब
    सदा रहेंगे शाश्वत
    अनुगायक होकर मनुष्य के;
    जो रहस्य है, भरा कुरल में
    शब्द-रंध्र में भाव संधि में
    सागर का उद्वेलन जिसमें
    नभ में छाए श्यामल घन में (भी दिखते तुम)
    दूर-दूर तक तुम प्रतिगुंजित
    दूर-दूर तक, अणु-अणु क्रम में
    व्याप्त तुम्हारे गीतों के स्वर
    विश्व की मानवता के तुम पथबंधु,
    निष्कलंक आत्म-द्रष्टा!

    -डाॅ जी. यू. पोप (हिंदी अनुवाद: एन. सुंदरम)
  • Badalate Ahsaas
    Birsen Jain Saral
    225 203

    Item Code: #KGP-9384

    Availability: In stock

    बदलते अहसास

    जीवन की कहानियों की भूमि प्रायः परिवार होता है। इस अर्थ में बीरसेन जैन पारिवारिक परिवेश की कहानियों के कहानीकार हैं। परिवार के भीतर के जीवंत दृश्य, स्थितियाँ, तनाव, अलगाव और अकेले रह जाने की पीड़ा से भरे पात्रों को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वह प्रकारांतर से अपनी कहानियों के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि दूसरों के जीवन से प्रेरणा लेकर हम चाहें तो अपना जीवन सफल, संतोषमय व सुखी बना सकते हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक बदलते अहसास की सातों कहानियाँ अपने आसपास के परिवेश से निकली हैं। यहाँ हम परिवार और समाज के परिवर्तित होते स्वरूप के बीच कथा-चरित्रों पर पड़ते प्रभाव को अनुभव कर सकते हैं। सच पूछें, तो ये कहानियाँ एक नया जीवन बनाने की प्रेरणा देती हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप अनुभव करेंगे कि इनकी आवाज कहीं आपके भीतर भी दबी पड़ी है। कारण यह है कि यहाँ मनुष्य के अनेक रूपों के मध्य दरकते संबंध ही नहीं, पश्चात्ताप के आँसू भी नजर आएँगे। कहानीकार की यह विशेषता है कि वह उन स्थितियों को भी उजागर करता है जो समाज का स्याह चेहरा सामने रखती हैं।
  • Aalochana Ka Naya Paath
    Gopeshwar Singh
    425 319

    Item Code: #KGP-757

    Availability: In stock

    आलोचना का नया पाठ-नई पीढ़ी के गंभीर और दृष्टिसंपन्न आलोचक गोपेश्वर सिंह की नई आलोचना पुस्तक है। इसके जरिए लेखक हिंदी आलोचना के पुराने पाठ को न सिर्फ नए पाठ में बदलने का आलोचनात्मक संघर्ष करता है, बल्कि उसकी नई भूमिका की जमीन भी तैयार करता है। पठनीयता के गुणों से युक्त साहित्य में पाठक की दिलचस्पी पैदा करने वाली यह आलोचना पुस्तक हिंदी आलोचना में आते नए बदलाव का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
    गोपेश्वर सिंह की रुचि एकांगी नहीं। उनकी आलोचनात्मक पहुँच समग्रतावादी है। मध्य काल से लेकर आधुनिक काल तक, कथा-साहित्य से लेकर कविता तक तथा साहित्य से लेकर समाज तक सभी इनकी रुचि के क्षेत्रा हैं। ऐसे समय में जब आलोचना में गतिरोध का शोर मचाया जा रहा है और जब आलोचक किसी खास विधा या काल तक सीमित होते जा रहे हैं, तब गोपेश्वर सिंह जैसे बहुआयामी सोच वाले नए और गंभीर आलोचक की उपस्थिति आश्वस्त करती है कि आलोचना में गतिरोध का प्रश्न बेमानी है।
    हिंदी आलोचना को प्रगतिवाद और आधुनिकतावाद के शीतयुद्धकालीन दुराग्रही प्रत्ययों की छाया से बाहर निकालना गोपेश्वर सिंह के आलोचनात्मक लेखन की मूल प्रतिज्ञा है। इसलिए यथार्थवाद या रूपवाद जैसे पदों और पक्षों से वे आलोचना को मुक्त करते हैं और उसे नए विमर्शों की रोशनी में ले जाते हैं, लेकिन विमर्शों की अतिरेकी परिणति से उसे बचाते भी हैं।
    ‘आलोचना का नया पाठ’--शीर्षक यह पुस्तक सैद्धांतिकियों के आतंक से मुक्त व्यावहारिक आलोचना का ऐसा पाठ है, जो--भाषा, दृष्टि और शैली--हर तरह से नया है।
  • Jodadighi Ke Choudhary
    Pramath Nath Vishi
    125 113

    Item Code: #KGP-2010

    Availability: In stock

    जोड़ादीघी के चौधरी
    बंगला के लब्धप्रतिष्ठ ठषप्यासकार प्रमथनाथ  विशी के इम उपन्याम को बंगला साहित्य में  विशिष्ट स्थान प्राप्त  ।
    इम ऐतिहासिक उपन्याम में लेखन ने ईस्ट  इंडिया कम्पनी के दौर से बंगाल के जमीदारों  की जघन्यताओं का हृदय-द्रावक चिंब प्रस्तुत किया है । पारम्परिक हिंसा-प्रतिहिंसा, प्रतिशोध  एवं पलासी के युद्ध में बंगाल की दारुण अंतरंग  व्यवस्था की रोमांचपूर्ण गाथा इस उपन्याम्र का आधार है.... 
    आज के सन्दर्भ में यह उपन्यास इसलिए भी, महत्वपूर्ण  कि इसमें उस शास्त्रग्राही बंगाल के अतीत की वह झाँकी मिलती है जो हम आज प्रत्यश्न बंगला देश की मुक्तिवाहिनी में  देख रहे  है ।
  • Zanjeer Bol Uthi
    Jaidi Zafar Raza
    180 162

    Item Code: #KGP-1839

    Availability: In stock

    ज़ंजीर बोल उठी
    घटनाओं का कालक्रम में होना इतिहास नहीं बुनता। हाँ, घटनाएँ जब ठहरकर संवाद की स्थिति बनाती हैं और समय के भाल पर अपना निशान छोड़ जाती हैं तो इतिहास के अंकुर स्वतः फूट पड़ते हैं। डॉ जै़दी के कहानी-संग्रह ‘ज़ंजीर बोल उठी’ की चार-पाँच कहानियाँ शुद्ध ऐतिहासिक हैं। इनमें व्यथा भी है और आक्रोश भी। कारण यह है कि ये अपने समय की ज़मीनी सच्चाई और बुनियादी सवालों को उठाती हैं और तर्क एवं तथ्य की तलाश में वर्तमान से अतीत तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें बौद्धिक संवादों की टकराहटों के बजाय समय की ओट में छुपी विसंगतियों को उधेड़ने की शक्ति है जो सियासी शतरंज की बिसात को उलटने का साहस रखती है। इन कहानियों के तेवर तीखे और तल्ख़ ज़रूर हैं, मगर साथ ही इन कहानियों में संवेदनारूपी सरिता का प्रवाह बड़ी सहज गति से बहता महसूस होता है, जो शब्दों पर विश्वास को बहाल और निराशा को आशा में बदलने में ख़ासा सक्षम है। ये कहानियाँ अपने ईमानदाराना प्रयास के चलते अरसे तक पढ़ने वालों की सोच में अटकी रहेंगी।
  • Mushkil Kaam (Paperback)
    Asghar Wajahat
    90

    Item Code: #KGP-1454

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Kanak Chadi
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1980

    Availability: In stock

    कनक छड़ी
    'धन्नो के कान उसकी तरफ़ लगे थे,
    किन्तु मन ? 
    मन तो आज जैसे हजार  आँखों से 
    उन तसवीरों को देख रहा था,
    जो उसके स्मृति-पट पर
    उभर रही थीं ।
    उनमें तारा ही तारा थी…
    कभी बेरियों से बेर तोड़ते हुए
    कभी शटापू खेलते हुए
    कभी को खेतों में कोयल संग
    कूककर भागते हुए 
    कभी ढोलक की थाप पर गाते हुए
    कभी 'तीयों' के गोल में
    थिरकती तारा नजर आती
    कभी ब्याह के सुर्ख जोड़े में सजी हुई
    लजाती-मुस्कराती दिखती
    उसकी आँसुओं में डूबी छवि के साथ
    यह सिनेमा रील टूट जाती । 
    [इसी उपन्यास से]
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj (Paperback)
    Rituraaj
    80

    Item Code: #KGP-1236

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही है । बहुराष्ट्रीय  निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे है और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है। वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कप दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते है और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Swastha Aswastha Log
    Hridyesh
    300 255

    Item Code: #KGP-9354

    Availability: In stock

    स्वस्थ अस्वस्थ लोग हृदयेश का बारहवां उपन्यास है। उपन्यास का असल मूल्यांकन तत्त्व उसकी काया का विस्तार या दीर्घता न होकर उसकी गहराई है जो प्रस्तुत उपन्यास में है—यथेष्ट है। हृदयेश अपने कथानक को अपने सुपरिचित परिवेश से उठाते ही नहीं हैं उसी के ताने-बाने से उसको बुनते, गूंथते और रचते हैं। इस उपन्यास में भी उनका अपना कस्बेनुमा शहर शाहजहांपुर है जो उनका धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र रहा है। सुविज्ञों की मान्यता है कि उपन्यास जहां और जिस समय की गाथा कहता है वही उसका देशकाल है। उपन्यास की विशिष्टता इसमें है कि वह क्या स्वस्थ है और क्या अस्वस्थ इसको विभिन्न कोणों व तमाम संभव रंगों व शेड्स के परिप्रेक्ष्य में देखता व परिभाषित करता हुआ मूल कथ्य के स्वर और संदेश का सफर दूर तक करता-कराता है, अपने देशकाल से भी परे जाकर।
    ‘मैला आंचल’ जैसे कालजयी उपन्यास के रचयिता रेणु का मानना था, ‘साहित्यकार को चाहिए कि वह अपने परिवेश को संपूर्णता और ईमानदारी से जिए। वह अपने परिवेश से हार्दिक प्रेम रखे क्योंकि इसी के द्वारा वह अपनी जरूरत के मुताबिक खाद प्राप्त करता है। इस प्रेम का मतलब यह कदापि नहीं है कि वह अपने संदर्भों की विषमताओं और असंगतियों पर दृष्टिपात न करे। वह परिवेश से प्रेम इसलिए करे कि वह उसके मूल्यों के साथ ही उसकी विषमताओं और असंगतियों से खुलकर और गहरा परिचय प्राप्त कर सके। दोनों प्रकार के चित्रण का औचित्य ही साहित्यिक ईमानदारी कहा जाएगा। लेखक के संप्रेषण में ईमानदारी है तो रचना सशक्त होगी ही होगी।’ संप्रेषण की इस ईमानदारी पर (विशेष संदर्भ कथ्य का भाग बना कवि सम्मेलन की फूहड़ता और भदेसपन) प्रस्तुत उपन्यास सौ टंच खरा उतरता है।
    उपन्यास की विशिष्टता यह भी है कि इसका अंत पूरे उपन्यास में सकारथ उजास भर देता है।
  • Gopal Krishna Gokhale : Jeevan Darshan
    Gaurav Chauhan
    200 180

    Item Code: #KGP-670

    Availability: In stock

    जिस समय हमारी यह भारतभूमि अंग्रेजों के अत्याचारों, प्रताड़नाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी उस समय देश के अनेक वीर सपूतों ने या तो अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के मान-प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा की या जीवन भर देश के लोगों को देश की आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहे। उन्हीं वीर सपूतों में से एक वीर सपूत थे—गोपालकृष्ण गोखले। गोखले जी ने उस समय न केवल इस देश के युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया बल्कि अपना संपूर्ण जीवन देश को आजादी दिलाने के प्रयासों में ही न्योछावर कर दिया।
  • Anton Chekhov Ki Kahaniyan (Paperback)
    Pramila Gupta
    160 152

    Item Code: #KGP-ACKK PB

    Availability: In stock

    अंतोन चेखव (1860-1904) की गणना न केवल रूसी साहित्य में अपितु विश्व साहित्य के शीर्ष कथाकारों में होती है। अपने छोटे से जीवन में उन्होंने रूसी भाषा में चार नाटक व अगणित कालजयी कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियाँ व नाटक साहित्य संपूर्ण विश्व के समालोचकों व समीक्षकों की दृष्टि में अप्रतिम हैं। वे पेशे से चिकित्सक थे। प्रारंभ में उन्होंने पढ़ाई का खर्चा निकालने के लिए लिखना शुरू किया। बाद में वे पूर्ण रूप से साहित्य को समर्पित हो गए। उनका  कहना था कि चिकित्सा उनकी धर्मपत्नी है तो साहित्य उनकी प्रेमिका। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था एवं आमजन की पीड़ा का सजीव चित्रण पाठकों को अभिभूत कर देता है। हिंदी साहित्यप्रेमी अंतोन चेखव के विपुल साहित्य का रसास्वादन करने के लिए सदैव लालायित रहते हैं। उनके साहित्य का हिंदी भाषा में आनंद लेने का एकमात्र विकल्प अनुवाद है। अनुवादक उनके साहित्य को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का यथासंभव प्रयास कर रहे हैं। अंतोन चेखव के समग्र साहित्य को भाषांतरित कर पाना दुष्कर कार्य है। चुनिंदा कहानियों का हिंदी अनुवाद करने का विनम्र प्रयास किया है। चेखव के विशद साहित्य में से कुछ कहानियों का चयन करना सरल नहीं। उनकी प्रत्येक कहानी विशिष्ट है। अतः स्वरुचि के आधार पर कहानियाँ चयनित की हैं। आशान्वित हूँ कि सुधी पाठकों को ये कहानियाँ पसंद आएँगी। - प्रमीला गुप्ता

  • Pratidin (3 Vols.)
    Sharad Joshi
    1350 1215

    Item Code: #KGP-859

    Availability: In stock

    प्रतिदिन (तीन खंड)
    शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
    सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
    शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
    आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी
  • Parvat-Gatha
    Hari Krishna Devsare
    425 383

    Item Code: #KGP-617

    Availability: In stock

    पर्वत गाथा
    पर्वतों और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। पर्वतों पर उगने वाले वन, उनसे प्राप्त होने वाले खनिज, वनोपज आदि मनुष्य के उपयोग की वस्तुएँ रही हैं। आज भी आदिवासी और गाँवों के लोग वनोपजों से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। पर्वतों के जंगलों से लकड़ी मिलती है। पर्वतों से देश की जलवायु अत्यधिक प्रभावित होती है। यदि भारत के उत्तर में हिमालय न होता तो मानसूनी हवाएँ सीधे मध्य तथा उत्तरी एशिया में पहुँचकर पानी बरसातीं और भारत एक रेगिस्तान बन जाता। हिमालय पर्वत सर्दियों में उत्तरी एशिया से आने वाली बेहद ठंडी हवाओं से भी भारत की रक्षा करता है।
    पर्वत मनुष्य के जीवन में विभिन्न रूपों में जुड़े रहे हैं और उनका महत्त्व आज भी है। ‘महानता’ के अर्थ में ‘पर्वत’ के अलावा कोई दूसरी उपमा नहीं दी जाती। आज मनुष्य ने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाने में सफलता पा ली है।
    जीवन में सफलता की ऊँचाइयों की तुलना पर्वत शिखरों से की गई है। हमारे देश में अनेक गौरवशाली पर्वत हैं और उनके प्रति लोगों में अटूट आस्था है। उन पर्वतों पर लोग पूजा करते हैं, मेले लगते हैं और मन की मुराद पूरी करते हैं। भारत के ऐसे ही पूज्य, गौरवशाली, इतिहास- प्रसिद्ध और धार्मिक आस्था के प्रतीक पर्वतों की गाथा है यह पुस्तक।

  • Sapanon Ki Neeli Si Lakeer
    Amrita Pritam
    240 216

    Item Code: #KGP-1972

    Availability: In stock

    सपनों की नीली-सी लकीर
    एक वर्जित फल खाने पर 'आदम' और 'हव्वा' को जन्नत से निकाल दिया गया था । इस इतिहास को मैंने एक नज्म में लिखा : "एक शिला थी और एक पत्थर, जिन्होंने वर्जित फल खा लिया, और जब मैली जमीन पर वो पत्थरों की सेज पर सोये तो उन पत्थरों की टक्कर से आग की एक लपट-सी पैदा हुई--बदन में से आग का जन्म हो गया तो पत्थर भी कांप गया, शिला भी कांप गई । समाज की नजर का धुआं ही उनके पास था, उसी की घुट्टी उस आग को दे दी तो पवन की छाया हंसने  लगी---फिर शिला और पत्थर धरती के हवाले हुए और आग की लपट पवन के हवाले और मैं आग की लपट-सी हैरान थी कि मेरे भीतर से यह सपनों के नीली-सी लकीर कहां से निकलती है" यह उस नीली-सी लकीर का तकाजा था कि मैं हर कल्पना को धरती पर उतार लेना चाहती थी--अपनी कलम से भी और अपने कर्म से भी ।
    - अमृता प्रीतम
  • Sachitra Rashtriya Pratik Evam Gaurav Kosh
    GLOBAL VISION PRESS
    495 446

    Item Code: #KGP-2108

    Availability: In stock


  • Khushboo Ka Libas
    Kanhiya Lal Nandan
    1500 1350

    Item Code: #KGP-907

    Availability: In stock


  • Maitreyi Uwach
    Sushil Sidharth
    500 425

    Item Code: #KGP-MU HB

    Availability: In stock

    मैत्रेयी पुष्पा को पढ़ते हुए मुंशी प्रेमचंद का वह अविस्मरणीय भाषण याद आता रहता है जिसमें उन्होंने सौंदर्य का मेयार बदलने का आह्नान किया था। मनोरंजन और बेचैनी केबीच एक निर्णायक रेखा खींची थी। मैत्रेयी ने सौंदर्य की व्याख्या नहीं कीउसका मेयार बदल दिया। ऐसे कथानक और पात्र कथा साहित्य में आए कि कुलीनतंत्र में भगदड़ मच गई।अनुभवों की रेशमी चादरों में लिपटे लोग भरोसा नहीं कर पाए कि यह जीवन इसी देश का हैये पात्र इसी समाज के हैं। कायदनमैत्रेयी की रचनाओं का समाजशास्त्रीय अध्ययनहोना चाहिए।

    इस अध्ययन में इस पुस्तक में संग्रहीत 39 संवाद अनेक अर्थों में उपयोगी साबित होंगे। यहां मैत्रेयी उवाच की एक ऐसी छटा देखने को मिलेगी जिसमें उनका लेखकविचारकएक्टिविस्ट और स्त्री विमर्शकार खुलकर बात करता है। इससे प्रश्नकर्ताओं और मैत्रेयी जी के बीच एक ऐसी विचारधारा बही है जिसमें पाठक भी स्वयं को रससिक्त पाएंगे।


  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock

    ”भारत का वह एक प्रान्त था, प्रान्त की वह राजधानी थी, राजधानी का वह क्लब था। देखें तो पूरा देश ही था... क्योंकि अफसर जो यहाँ आते थे, वे देश के कोने-कोने से थे।“...
    ”ये जो खेल रहे हैं...आला सर्विस के हैं, बाहर और यहाँ खेल में भी वे स्टार हैं। यहाँ से जाकर कुर्सी पर बैठ जायेंगे, सरकार हो जायेंगे। सरकारी खाल ओढ़े बैठे। उस खोल के भीतर सब छिपा रहता है, जो यहाँ खेल में झलक जाता है क्योंकि खेल में भीतर की प्रवृत्तियाँ बाहर आये बिना नहीं रहतीं।
    स्टार...जो ये खुद को लगाते हैं, या जंगल चर रहे जानवर, किसिम-किसिम के जानवर...ये क्या हैं...गधा सोच रहा था।“
    प्रशासन के इस जंगल में हाथी, हिरन, ऊँट, घोड़ा, खच्चर, तेंदुआ, रीछ, बायसन, बन्दर तो हैं ही, बारहसींगा, नीलगाय और शिपांजी भी हैं। सबसे ऊपर है शेर-सीनियर। वह जाल भी खूब दिखाई देता है जो उनकी उछलकूद अनायास ही बुनती होती है। यह है ‘अरण्य-तंत्र’, गोविन्द मिश्र का ग्यारहवाँ उपन्यास, जिसमें वे जैसे अपनी रूढ़ि (अगर उसे रूढ़ि कहा जा सकता है तो)-संवेदनात्मक गाम्भीर्य-को तोड़ व्यंग्य और खिलंदड़ेपन पर उतर आये दिखते हैं। यहाँ यथार्थ को देखा गया है तो हास्य की खिड़की से। फिर भी ‘अरण्य-तंत्र’ न व्यंग्य है, न व्यंग्यात्मक उपन्यास। अपनी मंशा में यह लेखक के दूसरे उपन्यासों की तरह ही बेहद गम्भीर है।
    ”बायीं तरफ़ की सिन्थैटिक कोर्ट-कोर्ट नं. 2 के ठीक ऊपर लॉन के किनारे कभी दो बड़े पेड़ थे, जिनमें से एक पहली कोर्ट बनाने के लिए जो खुदाई हुई थी उसके दौरान बलि चढ़ गया। दायीं तरफ़ की कोर्ट-कोर्ट नं. 1 के आखिरी छोर पर भी दो बड़े पेड़ थे-जुड़वाँ, एक हल्के गुलाबी रंग के फूलों वाला, एक हल्के बैगनी रंग के फूलों वाला। उनमें से एक कोर्ट नं. 1 के तैयार होने के बाद शेर-सीनियर की सनक और सियार-पाँड़े की चापलूसी में ढेर हो गया। तो बड़े पेड़ अब दो ही बचे थे...एक इस तरफ़, एक उस तरफ़...
    दो वे पेड़ अलग-थलग पड़े, अकेले थे, उदास...भयभीत भी।“ 
  • Manvadhikar Ki Aseemit Sarhadein
    Pushpa Sinha
    250 225

    Item Code: #KGP-565

    Availability: In stock

    इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म  एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।
    लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थान विशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है। तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें।
    मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है।
    अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है, यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।
  • Grih Daah (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    100

    Item Code: #KGP-1370

    Availability: In stock


  • Ab Bhi Ashesh
    Om Bharti
    175 158

    Item Code: #KGP-390

    Availability: In stock

    अब भी अशेष
    जाने-माने वरिष्ट कवि ओम भारती का यह पाँचवाँ कविता-संग्रह है । आठवें दशक से ही या कवि अपनी पृथक पहचान के लिए सजग रहा है । इस किताब में उसकी रचनात्मकता का बढ़ा हुआ क्षेतिज़ फलक ही नहीं, ऊर्ध्व विस्तार भी सुस्पष्ट है । यह संग्रह दर संग्रह उत्कृर्ष का कवि हैं, हर नयी प्रस्तुति से 'परफेक्शन' की और दृढ़ता से बढ़ता हुआ कवि ।
    ओम भारती जितना हिंदी की जातीय काव्यसरणी में हैं, उतना ही उससे बाहर भी । आधुनिकता एवं विखंडन को नयी अर्थवत्ता देने में वे भावुकता का निषेध करते हैं । यह उस तरह की कविता है, जो अपने अंतिम निष्कर्ष में सारे जीवन को ही कविता के रूप से लेती हैं । इसमें कवि स्वयं ही अपना अन्यीकरण करता चलता है ।
    आज देशकाल में जो अनर्गल, अवांछनीय और अनय चल रहा है, यहाँ उसका सक्षम संयमित प्रतिरोध है । चीजों की एक भली-सी अनायासता है । यूँ भी ओम भारती अपनी कविता के लिए समकालीनों से भिन्न तथा नवीन वस्तु चुनते रहे हैं । 'द्वार घंटी का बटन’, 'थाली', 'रहचूँ झूला', "झाड़फानूस थे वे', 'जूते' इत्यादि कविताएं, जो इस जिल्द में बंधी हैं, पाठकों को इधर की कविता के एक उत्सुक और उत्तरदायी रकबे में ले जाएंगी ।
    'अब भी अशेष' संकलन जीवन-द्रव्य से पुष्ट कविताई लिए है । जीवन-जगत् की छोटी-बड़ी चीजों में, उनकी साधारणता से भी ओम भारती अतिरिक्त एवं बड़ा अर्थ भरते रहे हैं । यह काम वे निजी और नये भाषायी रजिस्टर में करते हैं । हर अगली लिखत में वे जैसे स्वयं को भी नया करते चलते है । पुस्तक की शीर्षक-कविता काव्य-पाठ पर एक दिलचस्प वृष्टि है, जो कविता के संप्रेषित होने पर एक ईमानदार संदेह करती है ।
    पाठक इन रचनाओं से एक गीताभा लक्षित करेंगे, छंदाभास  देखेंगे, जो आज की कविता को शिष्ट प्राण और विशिष्ट रंग से भर देता है । कवि रूमानिया को झटक देता है, एक 'लिरिकल’ धोखे को झटका देता है । 'सांसत घर' छोटी-सी कविता है, जिसमें एक 'सिम्फनी' तत्सम शब्दों की है, एक तदभव पदों की, एक उदात्त विचारों की, ना एक लहुलुहान शब्दों के होने की सिम्फनी भी है । मानों चार तारों पर लरजता स्वर-संगम है । 'बारिश' में जैसे एक 'सिंनेमैटिक ग्लो’ है  ।
  • Hirni Ke Liye
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1906

    Availability: In stock

    हिरनी के लिए
    अजितकुमार का यह पांचवां कविता-संग्रह 'हिरनी के लिए' इस अर्थ में पिछले संग्रहों से भिन्न है कि जहाँ उनमें किसिम-किसिम की कविताएँ थीं, यहाँ केवल प्रेम- कविताएँ है । पर जितने अंशों में प्रेम 'विशुद्ध' से कुछ कम या अधिक एक 'मिश्रित' अनुभव है, ये कविताएँ दुख-तकलीफ, आशा-आकांक्षा-उदासी-मजबूरी आदि के भी अनुभव से जुडी नजर आएँगी ।
    वैसे तो, मैकबेथ की भाँति, कइयों के लिए, समूचा जीवन ही 'सन्निपातग्रस्त ज्वर' होता है; यहाँ, इस संग्रह की संक्षिप्त भूमिका में कवि ने जिसे अपनी 'कांजेनिटल' अर्थात 'जन्मजात' मुसीबत बताया है, उससे छुटकारा जब मिलेगा, तब मिलेगा' ...  'कड़ुवे घूंट से कि मीठी गोली से, ज्वर, देर या सबेर, कभी-न-कभी टूटेगा । रहा सन्निपात, उसके थमने या बढने का ग्राफ सामने रहे, इस लिहाज से, कवि ने पिछले संग्रहों की भी एक-एक कविता पुस्तक के अंत में नत्थी कर दी है ।
    हमें आशा है कि जिन्हें उपचार या पथ्य की आवश्यकता न हो, ऐसे पाठक भी इन कविताओं में निहित सजीवता से प्रमाणित होंगे और स्फूर्ति पाएँगे ।
  • Na Dainyam Na Palaynam (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    120 108

    Item Code: #KGP-1428

    Availability: In stock


  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah (Vol.-2)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    650 585

    Item Code: #KGP-603

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Sakshatkar Samvad Aur Vartayen
    Rajendra Yadav
    275 248

    Item Code: #KGP-779

    Availability: In stock


  • Shiksha Ki Gatisheelta : Avrodh, Navachar Evam Sambhavnayen
    Jagmohan Singh Rajput
    520 468

    Item Code: #KGP-426

    Availability: In stock

    शिक्षा की गतिशीलता : अवरोध, नवाचार एवं संभावनाएं 
    हमारा समाज शिक्षा से अनेक प्रकार की अपेक्षाएं रखता है, मुख्य रूप से यह की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता बढ़ा सकेगी - ऐसी इच्छा प्रत्येक व्यक्ति के मानल में सदा बनती है । आज यह सर्वमान्य है कि शिक्षा को सभी तक पहुंचना है, उसके लिए समाज तथा सरकार दोनों को लगातार प्रयास करना है और 21वीं सदी में कोई भी व्यक्ति शिक्षा के प्रभाव-क्षेत्र बाहर रहकर सामान्य जीवनयापन नहीं कर सकता । अब सामान्य परिवार भी यह समझने लगे हैं की शिक्षा व्यक्ति के मानवीय गुणों व मूल्यों के विकास में सबसे अधिक योगदान कर सकती है । 
    प्रस्तुत पुस्तक में सारे लेख सामान्यजन को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं । ये लेखन के सरे देश में शिक्षाविदों से लेकर अध्यापकों, पालकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बच्चों के साथ लगातार जारी रहे संवाद के आधार पर लिखे गए हैं । यह प्रयास लगातार रहा है कि शिक्षा में रुचि लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति उन्हें पढ़कर चिन्तन-मनन कर सके और अपना विचार परिपक्व कर सके । 
  • Meri Pratinidhi Kahaniyan
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1949

    Availability: In stock

    मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ
    राकेश के घर पर जैसे आँसुओं का समंदर ही उमड़ आया था। सुदर्शना को उस समुद्र में डूबते जहाज-सा वह ताबूत दिखाई दिया, जिसमें उसका ‘सब कुछ’ था। आज उसे न माँ-बाप की ममता बाँध सकी, न ही सास-ससुर की लाज रोक सकी। आँधी की तरह वह आगे बढ़ी और ससुर के साथ खड़ी हो गई, "मैं भी कंधा दूँगी।"
    दुल्हन-सी सजी सुदर्शना को देख सैनिक भी हक्के-बक्के रह गए। सब चौंक उठे, "क्या कहती है लाड़ी ? पगला गई है ? ऐसा भी कभी हुआ है आज तक ?"
    जवाब में सुदर्शना ने और कसकर अरथी को पकड़ लिया। उसकी चुप्पी जैसे बोल उठी, ‘आज तक ऐसा शहीद भी न हुआ था कभी। मैंने बचपन से हर पल जिसका साथ दिया, आज उसकी अंतिम यात्रा में साथ कैसे छोड़ दूँ ?’
    अरथी उठाकर लोग चल पडे़। ‘कारगिल का शहीद राकेश अमर रहे!’ के घोष से गूँज उठा धरती-आकाश।
    तभी वह रुक गई, "ठहरो, जरा...स्वेटर...स्वेटर..."
    उसने माँ की ओर देखते हुए पुकारा। माँ तीर की तरह आगे आई और एक नया बुना स्वेटर लाकर उसे दे दिया। उसने उसे खोला और बड़े प्यार से अपने पति की छाती पर सजा दिया। बोली, "तुमने चिट्ठी में लिखा था। मैंने तैयार कर रखा है। इसे पहनकर जाओ। अब ठंड न लगेगी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी ‘स्वेटर’ से]
  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar (Paperback)
    Laxman Prasad
    260

    Item Code: #KGP-51

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Ullanghan (Paperback)
    Bhairav Prasad Gupt
    190

    Item Code: #KGP-1544

    Availability: In stock

    डॉ. एस.एल. भैरप्पा
    (जन्म: 1934)
    पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
    ‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। 
    केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
    देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।
  • Subhash : Ek Khoj (Paperback)
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    295

    Item Code: #KGP-464

    Availability: In stock

    आज भी वह प्रश्न अपनी जगह पर है और प्रायः तब तक रहेगा जब तक उसका हल नहीं हो जाता कि सुभाषा द्वितीय विश्व समर के अंत हो जाने पर हवाई दुर्घटना में गोलोकवासी नहीं हुए तो कहां गए? क्यों शाहनवाज खां और खोसला आयोग की रिपोर्ट रद्द हुई? क्यों यह प्रश्न ठंडे बस्ते मं डालने की साजिश चलती रही? इसके पीछे कौन लोग थे और हैं? अब मैंने यह जानना चाहा है कि उन पर क्या हो रहा है? इस दृष्टि से मैंने भारत-भ्रमण किया। भारत के अनेक महानगरों, नगरों आदि का दौरा किया। उनमंे वे नगर विशिष्ट थे, जिनका संबंध आज भी नेताजी से है। अनेक स्थानों पर मेरे व्याख्यान हुए।
    अंत में प्रायः मुझसे यह प्रश्न किया गया कि क्या सुभाषा की मृत्यु हवाई दुर्घटना से जापान जाते समय हुई थी? कतिपय जगह यह थी पूछा गया कि क्यों अनेक बार नेताजी के जीवित होने और भारत में प्रकट होने का प्रसंग सुखर््िायों में रहा? इसमें कितना सत्य है? मैंने अपने व्याख्यानों में नेताजी की मृत्यु की चर्चा कहीं भी नहीं की थी। फिर भी श्रोताओं की रुचि इस प्रसंग में बराबर सामने आती रही। 
    आइए, अब इस जटिल प्रश्न पर हम और आप आमने-सामने बैठें और इस बहस को तब तक जारी रखें, जब तक किसी तह तक नहीं पहुंच जाएं। 
    —राजेन्द्रमोहन भटनागर
  • Kashmir : Raat Ke Baad
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-843

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से बहुत गहरा लगाव था । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कश्मीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कश्मीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    150 135

    Item Code: #KGP-30

    Availability: In stock

    किताबघर प्रकाशन की महत्वाकांक्षी कथा-सीरीज़ 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' को विस्तार देते हुए इसे अब अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया है । अर्थात् इस सीरीज़ में अब सभी भारतीय भाषाओँ के शीर्ष कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियां उपलब्ध कराये जाने की योजना है ।
    सीरीज़ के इस नव्यतम सेट में शामिल कथाकार हैं : अमरकान्त, कृष्ण बलदेव वैद, खुशवंत सिंह, गोविन्द मिश्र, ज्ञानरंजन, देवेन्द्र सत्यार्थी, निर्मल वर्मा, प्रतिभा राय, शनी, शेखर जोशी तथा शैलेश मटियानी । विभिन्न भाषाओँ के इन भारतीय कथाकारों ने अपनी सर्जनात्मकता के बल पर स्वयं को आधुनिक कथा के जिस शीर्षस्थ स्थान पर स्थापित किया है वह अपने आप में एक उपलब्धि है । इसी 'उपलब्धि' को एक सीरीज़ के माध्यम से पाठक तक पहुँचाकर हम गौरवान्वित है ।
    यह सुखद संयोग है कि आजादी के पावन स्वर्ण जयंती  के शुभ अवसर पर देश का विशाल पाठक वर्ग इन कथाओं के माध्यम से मनुष्य और परिवेश के नितांत नये रूपों और अप्रकाशित छवियों को पा सकेगा । इन कहानियों में आदमी के मनुष्य हो जाने की अनुभूतियों के जिस तरलता और सरलता से पिरोया गया है, वह सचमुच एक अदभुत पाठकानुभव है । 
    कहानीकार के कथाकर्म का प्रतिनिधि एवं केंद्रीय स्वर, गहन आत्मीयता से यहाँ सामने लाया गया है । यह कथाकार की अपनी कथाभूमि तो है ही, लगता है, हम सबकी सगी दुनिया भी यही है । टूटती-ढहती और फिर से बनती-सँवरती दुनिया । मानवताकामी शुभेच्छा की यह आकांक्षा ही इस सीरीज़ की वह शक्ति है जो आज के तमाम चालू कथा- सीरीज़ों से इसे अलग खड़ा करती है ।
    तो, प्रस्तुत है खुशवंत सिंह की दस प्रतिनिधि कहानियाँ  ।
  • Vartmaan Ki Dhool
    Govind Prasad
    250 225

    Item Code: #KGP-658

    Availability: In stock

    ‘वर्तमान की धूल’ गोबिन्द प्रसाद का तीसरा काव्य संग्रह है जो एक छोटे से अंतराल के बाद आ रहा है। इस संग्रह के पाठक सहज ही लक्ष्य करेंगे कि इस कवि का अपना एक अलग रंग है जो सबसे पहले उसकी भाषा की बनावट में दिखाई पड़ता है और बेशक अनुभवों के संसार में भी। मेरा ध्यान सबसे पहले जिस बात ने आकृष्ट किया वह यह है कि इस कवि ने हिंदी और उर्दू काव्य भाषा की बहुत सी दूरियाँ ध्वस्त कर दी हैं। और इस तरह एक नई काव्य-भाषा बनती हुई दिखती है। इसे गोबिन्द प्रसाद की एक काव्यगत सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। यह वह परंपरा है जिसकी शुरुआत कभी शमशेर ने की थी और गोबिन्द प्रसाद इसे आज की ज़रूरत के मुताबिक एक नए अंदाज़़ में आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं । पर केवल इतनी सी बात से इस संग्रह की विशेषता प्रकट नहीं होती। असल में यहाँ गोबिन्द प्रसाद एक गहरी घुलावट वाली रूमानियत के समानांतर एक विलक्षण राजनीतिक चेतना को भी बेबाक ढंग से व्यक्त कर सके हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है’ शीर्षक कविता जिसकी आरंभिक दो पंक्तियाँ हमारे समय की एक बहुत बड़ी राजनीतिक गुत्थी को खोलती जान पड़ती हैं-- 
    किस देश में कल क्या होगा
    अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है।
    यह पूरी कविता इतने बेबाक ढंग से लिखी गई है कि अलग से हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। यह गोबिन्द प्रसाद के कवि से हमारा नया परिचय है जो इन्हें उनकी पिछली कृतियों से अलग करता है। एक और छोटी सी राजनीतिक कविता पर मेरा ध्यान गया जिसका शीर्षक है ‘क्रांति की जेबों में’। यह एक गहरी चोट करने वाली व्यंग्य की कविता है जो शाब्दिक क्रांति के आडंबर पर चोट करती है। इस दृष्टि से इस कविता का अध्ययन दिलचस्प हो सकता है। 
    इस संग्रह की कई छोटी कविताएँ आधुनिक प्रेम की विसंगतियों को खोलती दिखाई पड़ती हैं। कुल मिलाकर यह संग्रह अनुभव के विभिन्न आयामों से गुज़रता हुआ--जिसमें कुछ विदेशी पृष्ठभूमि के अनुभव भी शामिल हैं--एक भरी-पूरी दुनिया का फलक हमारे सामने रखता है। मैं आज की हिंदी कविता के एक पाठक के रूप में यह पूरे बलाघात के साथ कह सकता हूँ कि संग्रहों की भीड़ में गोबिन्द प्रसाद का यह नया काव्य प्रस्थान अलग से लक्षित किया जाएगा।
  • Godhooli
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-669

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh
    Shravan Kumar
    795 596

    Item Code: #KGP-596

    Availability: In stock


  • Udaanein Oonchi Oonchi
    Krishna Agnihotri
    350 315

    Item Code: #KGP-9377

    Availability: In stock

    कृष्णा अग्निहोत्री वरिष्ठ रचनाकार हैं उन्होंने कहानी, उपन्यास तथा आत्मकथा आदि विधाओं में अपने लेखन से पाठकों को प्रभावित किया हैं उनकी सर्वोपरि विशेषता है-स्पष्टता, पठनीयता और बेबाकी। यह कहानी संग्रह पढ़ते हुए पाठक अनुभव करेंगे कि जीवन के साथ रचना का भी एक लंबा अनुभव यहां आकार ले रहा है।
    इन कहानियों में जीवन के विविध आयाम व परिवेश हैं। आदिवासी भी कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। उल्लेखनीय यह है कि प्रत्येक कहानी अपनी विशेष मौलिकता से पूर्ण है। भाषा सरल पर ग्राह्य एवं अर्थपूर्ण है। समस्त लेखन मनोरंजन के साथ सोद्देश्यपूर्ण सार्थकता से भरपूर व संवेदनाओं की कसौटी पर खरा है।
  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190 171

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    200 180

    Item Code: #KGP-2078

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "संपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sampoorn Baal Vigyan Kathayen
    Hari Krishna Devsare
    600 480

    Item Code: #KGP-824

    Availability: In stock

    जो बच्चे परीकथाएँ, भूत-प्रेतों की कहानियाँ आदि पढ़ते हैं, उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण जागृत होने में बाधा पड़ सकती है, क्योंकि वे अंधविश्वासी अधिक बन सकते हैं। और हमारे देश में अंधविश्वास ने अपनी जड़ें कितनी गहरी जमा रखी हैं कि यह वे लोग अच्छी तरह जानते हैं, जो विज्ञान-प्रसारक हैं। इसलिए मैं ऐसे बच्चों को सलाह दूँगा कि वे विज्ञान कथाएँ अवश्य पढ़ें, क्योंकि जब हम विज्ञान की नजर से कुछ पढ़ते हैं तो समझ में आ जाता है कि संभव क्या है, असंभव क्या है। विज्ञान कथाएँ उन्हें नई दृष्टि, नई सोच और भविष्य की सार्थक कल्पना देती हैं।"
    बच्चों के लिए डॉ. हरिकृष्ण देवसरे विगत पचास वर्षों से विज्ञान लेखन कर रहे हैं। विज्ञान कथा लेखन में डॉ. देवसरे का प्रशस्य योगदान रहा है। आपके कई बाल विज्ञान उपन्यास ‘होटल का रहस्य’, ‘ला-वेनी’ आदि बहुत लोकप्रिय हुए। यहाँ उनकी संपूर्ण बाल विज्ञान कथाएँ प्रस्तुत हैं।  आशा है, यह प्रस्तुति सभी वर्ग के पाठकों के लिए रुचिकर और पठनीय सिद्ध होगी।
  • Naya Gyan Ki Anokhi Baatein
    Vishv Nath Gupta
    250 200

    Item Code: #KGP-9237

    Availability: In stock

    ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। किसी ने कहा भी है कि ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ’। यह सच है कि जो जितना गहराई में जाएगा, उसे उतना ही ज्यादा मिलेगा।
    इस पुस्तक में जो बातें बतलाई गई हैं उनके बारे में हमारे बाल और किशोर पाठक कुछ-कुछ जानते भी होंगे, लेकिन बाल और किशोर मन में बहुत जिज्ञासा भरी रहती है, वह बहुत कुछ जानने और समझने को उत्सुक व इच्छुक रहता है। इस पुस्तक में जिन विषयों के बारे में लिखा गया है, उनके बारे में उन्हें कुछ नई बातें मालूम होंगी। इससे उनकी जिज्ञासा बढ़ेगी और उनमें और ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा जागृत होगी। वे और पढ़ेंगे तथा और ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यही इस पुस्तक का उद्देश्य है।
    -विश्वनाथ गुप्त
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    150 135

    Item Code: #KGP-75

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shubhada
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    270 243

    Item Code: #KGP-574

    Availability: In stock


  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    1200 1080

    Item Code: #KGP-607

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खण्डों में)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है।
  • Vaksh Shila
    Sunil Gangopadhyaya
    90 81

    Item Code: #KGP-2008

    Availability: In stock

    वक्ष-शिला
    'वक्ष-शिला' पढ़ने का अर्थ है एक पुरे इतिहास से गुजरना । सातवें दशक  में पश्चिम बंगाल, बिहार आदि राज्यों में नक्सलवाद की जो तीव्र आंधी, चली थी, उसमें जिस तरह हजारों युवकों को बलि चढी थी, उसका साक्षी इतिहास है और उस इतिहास का एक अंश है यह उपन्यास । प्रसिद्ध बांग्ला क्याकार सुनील गंगोपाध्याय ने उस समय को, उस काल की स्थितियों को, युवा मन की भावनाओं को, राजनीति को लेकर इस उपन्यास का जो रोचक ताना-बाना बुना है, वह अदभुत है । यह उपन्यास प्रमाणित करता है कि एक औपन्यासिक जाते के माध्यम से किसी विशेष कालखंड को कितनी गहनता से प्रस्तुत किया जा सकता है ।
    'नक्सलवाद' वैचारिक धरातल पर बहुत सारे प्रश्न छोड़ गया है, आज भी हम उन प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं निकले हैं, किंतु इस उपन्यास में अनेक प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सबत्ते हैं जो उस आंदोलन को समझने में मदद करते हैं ।
    अनूठी शैली, रोचक भाषा और नये धरातल पर खडी कथा के कारण यह उपन्यास अपना एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ता है ।
  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

    Availability: In stock


  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jivan Darshan
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-809

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    425 383

    Item Code: #KGP-248

    Availability: In stock

    अथर्ववेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की अन्तिम कड़ी ‘अथर्ववेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें अथर्ववेद के 120 मन्त्रों को दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। अथर्ववेद की विषयवस्तु अत्यन्त रोचक तथा विविधता लिए हुए है। यही नहीं--ज्ञान, शिक्षा तथा गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर भी यहाँ प्रकाश डाला गया है। परिवार में अतिथि की महत्ता का उल्लेख हुआ है तो अन्य पारिवारिक सम्बन्धों की समरसता का महत्त्व बताया गया है। शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य दोनों ही जीवन में रहते हैं। अथर्ववेद का यथार्थवाद दोनों का वर्णन भी करता है तथा अशुभ से, पाप से मुक्ति की राह बताता है, प्रायश्चित्त का विधान भी करता है।
    यद्यपि व्यक्तिगत सौख्य के लिए यहाँ शत्रुनाशविषयक मन्त्र भी हैं तथा कुछ जादू-टोने जैसी क्रियाएँ भी वर्णित हैं परन्तु तब भी समष्टिगत कल्याण की उपेक्षा नहीं हुई है। आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ होने के नाते यहाँ रोगों के नाम, लक्षण तथा उपचार विधियाँ वर्णित हैं। इन विधियों की विविधता व्यक्त करती है कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद के ऋषि कितना सजग थे। वनस्पतियों, औषधियों के नाम, उनके गुण तथा रोग-विशेष में उनके उपचारात्मक प्रयोग भी बहुधा वर्णित हुए हैं।
    राजनीति पर यहाँ विशिष्ट सामग्री उपलब्ध है। राजा, उसकी सेना, अस्त्र-शस्त्र, युद्धनीति और शत्रुनाशपरक प्रार्थनाओं का अपना महत्त्व है। विभिन्न वृक्ष, लताओं, वनादि के वर्णन तथा जल, वायु को सम्बोधित सूक्तों से पर्यावरण- विषयक चिन्तन झलकता है। ‘भूमिसूक्त’ में प्रथम बार ‘धरती माँ’ का उल्लेख है--‘माता भूमिः पुत्रोअह पृथिव्याः’--‘भूमि माता है मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।’ यह माता-पुत्र के गहन सम्बन्ध धरती का पर्यावरण संरक्षण करता है तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए सन्नद्ध भी करता है। सबके भीतर दिव्यता है, सब प्रेमभाव से जुड़े हैं, जुड़े रहें। विश्व संरक्षण, विश्व कल्याण के तत्त्व सत्य, ऋत, दीक्षा, ज्ञान, तप, यज्ञादि हैं। आतंक हिंसा से जूझते विश्व में अभयता का साम्राज्य हो--यही कामना व्यक्त हुई है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो ‘मन से युवा’ हैं तथा प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को आधुनिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Prourh Shiksharthion Ki Shiksha-Prapti Ke Vaataavaran Ke Ghatak Tatva
    Naseem Ahmed
    140 126

    Item Code: #KGP-9129

    Availability: In stock

    यह पुस्तक ‘दिल्ली में एक शहरी स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण को निर्धारित करने वाले तत्त्वों के अध्ययन’ विषय पर लेख के पी-एच.डी. के सोध-प्रबंध का परिणाम है। इस प्रयास पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने डाॅक्टर आॅफ फिलाॅसफी (पी-एच.डी.) की उपाधि प्रदान की है।
    पुस्तक ‘प्रौढ़ शिक्षार्थियों’ की ‘शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण’ तथा विशिष्टताओं की अवधारणा को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित करती है। भारत के संदर्भ में शहरी स्लम बस्तियों में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण की रूपरेखा को पुस्तक में दर्शाया गया है। एक स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की विशिष्टताआं तथा शिक्षा-प्राप्ति के आसपास के वातावरण के संदर्भ में उन्हें विस्तार से समझने के लिए पुस्तक उपयोगी है। इस प्रकार की समझ प्रौढ़ों में साक्षरता को बढ़ावा देने के प्रयासों का सफल बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई संभावनाओं को उत्पन्न करने में सहायक होगी।
    साथ ही शहरी क्षेत्रों में सामान्य रूप से तथा शहरी स्लम बस्तियों के वातावरण में विशेष रूप से साक्षरता तथा प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों की योजना बनाने और उसका प्रबंध करने की प्रक्रिया के लिए यह उपयोगी सूचनाओं की एक स्रोत-पुस्तिका भी हो सकती है।
  • Nasha Jeevan Ka Saar Nahin
    Jagat Ram Arya
    50

    Item Code: #KGP-1228

    Availability: In stock

    नशा करने वाला अपना मनुष्यत्व खो बैठता है, स्वास्थ्य व पैसे की बरबादी कर गृह-कलह को जन्म देता है और समाज में अपनी प्रतिष्ठा भी गंवा बैठता है। जिस दिन से व्यक्ति नशा करने लगता है, समझिए कि उसी दिन से वह अपने विनाश का मार्ग प्रशस्त कर लेता है। अगर बीच ही में समय रहते संभलकर वह नशे से किनारा कर लेता है तब तो ठीक है वरना यह मार्ग अंततः उसे दुर्दशा और दुर्गति के कंटीले रास्तों पर घसीटता हुआ मौत के अंधेरे गहरे गर्त में धकेल देता है। इस पुस्तक में नशाखोरी के दुष्परिणामों को उजागर करने और उनसे बचने से संबंधित एक प्रेरणादायी, शिक्षाप्रद कथा है।
    —जगतराम आर्य
  • Main Or Mera Man
    Dr. Sharad Nagar
    480 432

    Item Code: #KGP-7851

    Availability: In stock

    मैं और मेरा मन जीवन के एक विलक्षण साधक और रसिक की कलम से निकली हुई यादों, बातों, दास्तानों और दस्तावेज़ों का अनूठा सम्मिश्रण है। इस पुस्तक में हम मिलते हैं एक ऐसे सर्जक से जो अपनी गहरी से गहरी तकलीफें भूलने की कोशिश करता तथा तमाम जगहों और लोगों को दिए हुए अपने वायदों को निभाता हुआ उनके इतिहास और भूगोल को, उनकी बातों और वि़फस्सों को जिलाए रखने के काम में पूरे यव़फीन और मोहब्बत से जुटकर अपने जीने की ख़ुराक ढूँढ़ता है।
    डॉ. शरद नागर के मन में समाए इन लोगों और लोकों के किस्सों में हमें मिलते हैं घने पारिवारिक रिश्ते, गली-मोहल्लों के यादगार चित्रा और चरित्रा तथा अनदेखे पूर्वज। साथ ही हमें मिलती हैं बीसवीं सदी के सामाजिक इतिहास की कुछ ऐसी बारीकियाँ जिनके आज की पाठ्यपुस्तकों में पहुँचने की नौबत ही नहीं आती-जैसे, 1918 के इन्फ्ऱलूएन्ज़ा के प्रकोप की दिल को दहला देने वाली यादें; आगरा में बसे गुजराती नागरों के मोहल्लों-टोलों की भूली-बिसरी आवाज़ें; आज़ादी की जंग के दौर में मिले सृजन और सौहार्द के संस्कार; मैकॉले की नीति का शिक्षा और सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव; समाज के बदलते उसूलों और खुलती-कसती बेड़ियों के बीच औरतों की स्थिति ही नहीं, बल्कि उनका श्रम, उनकी रचनात्मकता, उनकी जंग; तथा भारतीय रंगमंच के इतिहास से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
    शरद जी एक साहित्यकार और ज़िंदगी तथा समाज की तहों में गहरे उतरकर रमने वाले आराधक और कलाकार के रूप में अमृतलाल नागर के बहुत बड़े उपासक थे। इस पुस्तक में प्रस्तुत उनका लेखन अमृतलाल नागर जी को लेखक और पिता के रूप में बड़े निराले ढंग से जिलाता है। हम न केवल लेखक बनने से जुड़ी अमृतलाल नागर जी की निजी और उनके परिवार की अनेक संघर्ष यात्राओं को पहचान पाते हैं बल्कि आज़ादी के पहले के तीन दशकों में और आज़ादी के बाद के चार दशकों में साहित्य और रंगमंच समाज से किस व़फदर गुँथकर अपनी दिशाएँ खोज रहे थे, उसका अहसास भी हमें ख़ूब होता है।
  • Vidrohini Shabri
    Hiralal Bachhotia
    100 90

    Item Code: #KGP-1854

    Availability: In stock

    विद्रोहिणी शबरी 
    जन्मजात विद्रोहिणी शबरी का विद्रोह जड़-परंपराओं और रूढियों के खिलाफ था । शबरी ने एक तरह से अतीत को या उस अतीत को जो हिंसा पर टिका था, को ललकारा था । वह आतंक के रावण के खिलाफ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी । शबरी ने नारी के रक्षिता माने जाने पर भी उँगली उठाई तो तरुणी शबरी पर भी जिसने देखा उसी ने उँगली उठाई थी । लेकिन शबरी अपने रास्ते चलती रही और जा पहुंची पंपा सरोवर क्षेत्र में । कठोर यथार्थ की रगड़ से उत्पन्न आदर्श ही शबरी का प्राप्तव्य बना और यह आदर्श शस्य श्यामल राम के रूप में परिकल्पित हुआ। मुग्धमना शबरी उसी राम के लिए प्रतीक्षारत रही । राम उद्धारक नहीं, शबरी के लिए मीत बनकर प्रकट हुए थे। केवट, निषाद के साथ राम के व्यवहार ने शबरी को ऐसा ही आश्वासन दिया था । राम का सबके प्रति समता भाव ही शबरी के लिए वरेण्य था । शबरी की वृष्टि में राम ने मानव-गरिमा की प्रतिष्ठा कर एक नई पहल की धी। शबरी अपनी इसी आस्था पर आरूढ राम के लिए प्रतीक्षारत रही । प्रतीक्षा के क्षणों को काटने के लिए शबरी बेर के पेडों का रोपण और फलो का संचयन करती रही । शबरी अरण्य संस्कृति की प्रतिरूप प्रकृति के संरक्षण में संलग्न रही। शबरी ने शूर्पणखा प्रकरण में अमर्यादित नारी को वरेण्य नहीं माना । इसीलिए राम ने हाथ उठाकर कहा था-शबरी प्रतिरूप है नवधा भक्ति का । इसीलिए शबरी सामान्य से असामान्य या असाधारण बन गई और राम के हृदय में मूर्ति के समान विराजित रही । यही शबरी की आस्था की विजय थी । शबरी ने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर राम को जनकनंदिनी को खोजने के संकेत दिए थे । इसमें सुग्रीव-हनुमान मिलन के पूर्व संकेत भी शामिल थे । भावी आपदाओं की ज्वालाओं को शांत करने हेतु सांत्वना नीर उड़ेलते रहना ही शबरी का प्राप्तव्य बना रहा ।
  • Antarmilan Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 280

    Item Code: #KGP-754

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    प्रस्तुत कहानियाँ मैंने विशाल भारतीय पौराणिक साहित्य में से चुनी हैं। इनको मैंने इसलिए लिखा कि इनमें मुझे इतिहास की बहुत-सी गुत्थियाँ सुलझती मिलीं। हमारी संस्कृति में एक ही स्रोत की प्रेरणा नहींहै। महाभारत युद्ध के बाद से गौतम बुद्ध तक, फिर गौतम बुद्ध से गुप्त सम्राटों के काल तक, निरंतर भारत में जातियों का अंतर्मिलन चला। इन दो दौरों में-
    पहली बार-आर्य, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, गरुड़, पिशाच, असुर तथा अनेक जातियाँ परस्पर घुल-मिल गईं। इनके मिलन से इनके देवता भी परस्पर मिल गए। विष्णु, शिव, गरुड़, पार्वती, वासुकि, कुबेर, पुलस्त्य, वृत्र, शाक्त इत्यादि भी परस्पर मैत्री भाव से स्थित हुए।
    दूसरी बार-भारत में यवन, शक, कुषाण, पहलव इत्यादि जातियाँ आईं, जो भी भारत में घुल-मिल गईं।
    यहाँ मैंने पहले दौर के अंतर्मिलन को प्रकट करने वाली कथाएँ रखी हैं, जो प्रकट करती हैं कि हिंदू धर्म कितनी व्यापक भूमि पर बना था।
    -रांगेय राघव

  • Videshi Mahilaon Ka Bharatprem
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-7809

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘विदेशी महिलाओं का भारतप्रेम’ उन महिलाओं के विषय में लिखी गई है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतभूमि की तथा भारत के लोगों की तन मन धन से सेवा एवं सहायता की। चाहे वे कोक्को सोमा हों या उनकी बेटी तोशिको, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सेवा की। इसी क्रम में आगे श्रीमती एनीबेसेंट, मारग्रेट कजिंस और एमिली शैंकल के नाम भी उल्लेखनीय हैं। इन महिलाओं ने जन्म भले ही भारतभूमि पर न लिया हो, लेकिन उनके भारतप्रेम को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनका भारत से घनिष्ठ संबंध है। उनके द्वारा दिए गए अविस्मरणीय योगदान को इस पुस्तक में सरल, सरस और रोचक शैली में उल्लिखित किया गया है। 
  • Ek Kiran : Sau Jhaniyan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    195 176

    Item Code: #KGP-676

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Gian Ranjan
    Gyanranjan
    160 144

    Item Code: #KGP-27

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ज्ञानरंजन ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शेष होते हुए', 'पिता', 'फैंस के इधर और उधर', 'छलाँग', 'यात्रा', 'संबंध', 'घंटा', 'बहिर्गमन', 'अमरूद का पेड़' तथा 'अनुभव' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ज्ञानरंजन की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chhajju Ram Dinmani Tatha Anya Kahaniyan
    Mohan Thapliyal
    60 54

    Item Code: #KGP-1929

    Availability: In stock

    छज्जूराम दिनमणि तथा अन्य कहानियाँ
    मोहन थपलियाल ऐसे कहानीकार हैं, जिनके लिखने की रफ्तार बहुत धीमी है, फिर भी कम छपने के बावजूद वह उल्लेखनीय कथाकार बने रहे है । इनकी कहानियों में ग्रामीण और शहरी परिवेश का अदभुत संयोजन दिखाई देता है । निम्न-मध्य और गरीब तबके के लोग इन कहानियों के मुख्य पात्र हैं, जिनके साथ समकालीन समाज की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों की ऐतिहासिकता भी बराबर मौजूद है । जहाँ तक कथ्य और शिल्प का ताल्लुक है, ये कहानियाँ अवसर पारंपरिक ढांचे का निषेध करती हैं। कहीं-कहीं एक नए डिक्शन की तलाश भी इनमें है- 'शवासन' इसी तरह का मंजर पैदा करती है । यथार्थ और फंतासी का ताना-बाना मोहन थपलियाल की कहानियों में एक अलग जादूगरी पैदा करता है, लेकिन यह जादूगरी किसी चकमे या चमत्कार को दिखाने के लिए न होकर पात्रों व परिस्थितियों की हकीका जानने में मददगार सिद्ध होती है । द्वंहात्पक दर्शन को पहचान देने वाली ये कहानियाँ व्यक्ति की निजी लडाई को समाज की व्यापक लडाई से जोडना अपना फर्ज समझती है । यह अलग बात है कि यह मकसद पाने के लिए ऊँचे-ऊँचे आदर्शों, जोशीले नारों और बड़बोले भाषणों का इस्तेमाल प्रत्यक्षत: लेखक ने कहीं नहीं किया है । शायद इस संदर्भ में लेखक बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की इस उक्ति --'हमने उनके दुख के नहीं, दुख के कारणों के बारे में बात की' --का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहता है । दुख के कारण और सामाजिक विसंगतियों की गहरी पड़ताल इस संग्रह की तमाम कहानियों में मौजूद है । बतौर बानगी ‘एक वक्त की रोटी' और 'छज्जूराम दिनमणि' देखी जा सकती है । दुख की घडी की टिक-टिक दोनों जगह समान है भले ही सामाजिक परिवेश बिलकुल भिन्न । लेकिन इस संग्रह को वहानियों का अंतिम लक्ष्य दुख और नैराश्य न होकर पाठक के मन में बेहतर भविष्य के लिए एक जीती-जागती उम्मीद भरना है ।
  • Makka, Kauva Aur Kavi Tatha Anya Kavitayen
    Ramesh Chandra Diwedi
    140 126

    Item Code: #KGP-289

    Availability: In stock


  • Saagar Aur Uski Apaar Sampada Evam Oorja
    Vinod Kumar Mishra
    240 216

    Item Code: #KGP-128

    Availability: In stock

    सागर और उसकी अपार संपदा एवं ऊर्जा
    सुनामी लहरों ने सागर का प्रलयंकारी रूप उजागर किया । इस प्रक्रिया में द्वीप अपनी जगहों से हिल गए । कई जगह नीचे दबी सामग्री ऊपर आ गई और अनेक जगहों पर बहुमूल्य सामग्री के भंडार लोगों के हाथ लग गए। 
    इस आपदा ने अनायास ही लोगों के मन से सागर के प्रति जिज्ञासा बढा दी । सागर की उत्पत्ति, उसका विकास, उसके विभिन्न पहलुओं के बारे में जानने की आवश्यकता बढ़ गई और बढ़ती आबादी के मद्देनज़र भविष्य में सागर स्थित जैविक व अजैविक संपदा के दोहन और सागा में छिपी प्रचंड ऊर्जा के उपयोग की संभावनाओं की तलाश अनिवार्य हो गई है ।
    हालाँकि कवियों ने सदियों से ग्रंथों से सागर का वर्णन किया है, पर इस पुस्तक में सागर के विभिन्न रूपों का रोचक व उपयोगी वृत्तांत है ।
  • Suno Manu (Paperback)
    Vishva Mohan Tiwari
    100

    Item Code: #KGP-1488

    Availability: In stock

    सुनो मनु
    आज का युवा तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है, किंतु अपने माता-पिता या दादा-दादी से उचित सलाह न मिल सकने के कारण उसे शीघ्र ही भोगवादी बाज़ार के दलदल में फँस जाने का खतरा रहता है। 
    एक युवक को ऐसे खतरे से बचाने के लिए एक पिता ने होस्टल में रहने वाले अपने पुत्र को लगातार पत्र लिखे, जिससे न केवल उसे वरन् उसकी मित्रमंडली के समुचित विकास में, उन्हें जीवन में सोच-विचार कर आगे बढ़ने में सहायता मिली। 
    उन पत्रों की सफलता का रहस्य था पुत्रा एवं पिता में मित्रवत् व्यवहार। पिता में एक ओर तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक है तथा दूसरी ओर आधुनिकता की पर्याप्त समझ है। 
    पत्रों में पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन-मूल्य संबंधी प्रश्नों पर आपस में विचार- विमर्श है। 
    इस पुस्तक में युवाओं के लिए वे संदेश हैं, जिनसे उनमें इतनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक शक्ति आ सकेगी कि वे भारत को और इसलिए स्वयं को सचमुच ही विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिला सकें। 
  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Vishva Mohan Tiwari
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar
    Kamal Kumar
    230 207

    Item Code: #KGP-688

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Pooran Chandra Joshi
    Pooran Chandra Joshi
    150 135

    Item Code: #KGP-2031

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : पूरनचन्द्र जोशी
    वरिष्ठ समाजशास्वी प्रोफेरुवृर फूनचद्ध जोशी के साथ पिछले बीस वर्षों के सऊक्षात्कार इस स्थापन में पाठकों के लिए प्रस्तुत है । यह संकलन वास्तव में साक्षात्कार के माध्यम से आजादी की आधी सदी में भारतीय समाज की दूरगामी महत्त्व की प्रक्रियाओं और परिवर्तनों, उनके अंतर्सबंधों और अंतर्द्धंद्वों, उपलब्धियों और संभावनाओं, आग्रहों और अवरोधों पर प्रकाश डालता है । साथ ही बीसवीं सदी के अंत और इक्लीसवीं सदी की पूर्व संध्या पर नए गतिशील क्षितिजों और दिशाओं का भी संकेत देता है । यह अकादमिक समाज के लिए नई दृष्टि और व्याख्याएँ प्रस्तुत करता है, तो जिज्ञासु और प्रबुद्ध नागरिको के लिए भारत के बदलते परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य को भी आलोकित करता है ।
    यह संकलन यदि नई दृष्टि और जानकारी देता है तो पाठकों को अपने लिए सोचने को प्रेरित भी करता है और उनमें अपने दायित्व का बोध भी जाता है ।
    'मेरे साक्षात्कार' में योगदान उन श्रेष्ठ पत्रकारों और लेखकों का भी है जो विचारशील प्रश्चकर्ताओं के रूप में प्रोफेसर जोशी की बहुआयामी दृष्टि और वर्तमान भारत की समस्याओं पर उनकी गहरी सोच और चिंतन-प्रकिया को पाठकों तक सम्प्रेषण। में सफल हुए हैं।
    पुस्तक तीन खंडों में विभाजित है : ( 1) आधी सदी का सफर, (2) नई चुनौतियां नया एजेंडा, (3) कुछ वक्तव्य । प्रथम दो खंडों में प्रोफेसर जोशी से साक्षात्कार प्रश्न और उत्तर क्या प्रस्तुतियों के रूप में दिए गए है । तीसरे खंड में कुछ महत्त्वपूर्ण सामयिक विषयों पर प्रोफेसर जोशी के विचार कुछ वक्तव्यों के रूप में प्रस्तुत है ।
  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Marxwadi Jeevan-Drishti Aur Rangey Raghav
    Madhuresh
    350 315

    Item Code: #KGP-700

    Availability: In stock

    श्री मधुरेश ने निःसंग मेध से रांगेय राघव के विषय में इस भ्रांति का भी निराकरण किया है कि रांगेय राघव ‘नस्लवादी’ थे। यह भयंकर आरोप डॉ. रामविलास शर्मा ने लगाया था। मधुरेश जी का यह मत मान्य है कि उस समय तक और आज तक, भारत के प्रागैतिहासिक युग (मोहन जोदड़ो) के विषय में निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है और यह कि रांगेय राघव का ध्यान सर्वत्र ‘व्यवस्था’ पर केंद्रित रहता था और मानव शोषण और अत्याचार के विरोध पर तथा मानवतावादी प्रवाह की खोज पर। इसीलिए द्रविड़ों पर आर्य अत्याचार हो या मुसलमानों पर आंग्ल-आक्रमण हो, वह सर्वत्र हृदय से आक्रांत, शोषित, दमित के साथ रहते हैं और जालिमों का विरोध करते हैं, चाहे जुल्मी आर्य हो या अनार्य, यवन हो या ब्राह्मण, मुसलमान हो या कम्युनिस्ट। सर्वत्र राघव ने मानव-न्याय का परिचय दिया है। —डॉ. विश्वंभर नाथ उपाध्याय
    माकर्सवादी आलोचक के रूप में केवल मधुरेश ने उनके महत्त्व को रेखांकित किया, 1987 में जब उन्होंने साहित्य अकादेमी के लिए मोनोग्राफ लिखा ‘रांगेय राघव’। इस मोनोग्राफ में उन्होंने बाकायदे एक अध्याय लिखा ‘हिंदी की माकर्सवादी आलोचना और रांगेय राघव’। उनका मानना था कि ‘सन् ’45 से ’55 तक का काल हिंदी की माकर्सवादी आलोचना में प्रखर विवादों का काल रहा है और इन विवादों के आपसी अंतर्विरोध ही वस्तुतः हिंदी क्षेत्र में प्रगतिवादी आंदोलन के विघटन और माकर्सवादी आलोचना में भयंकर गतिरोध के कारण भी बने। यह दौर माकर्सवादी हिंदी आलोचना में ऐसी भयावह उग्रता और विनाशकारी उच्छेदवाद का दौर रहा है जिसमें अपने निकट वर्तमान में प्रगतिवादी साहित्य के निर्माण और विकास की संभावनाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहकर बेहद गलत मुद्दों पर सारी बहस को केंद्रित कर दिया है।’
  • Kavi Ne Kaha : Vijendra (Paperback)
    Vijendra
    120

    Item Code: #KGP-7022

    Availability: In stock


  • Sitaron Ke Sanket
    Amrita Pritam
    240 216

    Item Code: #KGP-1970

    Availability: In stock

    अमृता प्रीतम द्वारा समय-समय पर देखे हुए सपनों की जो व्याख्याएँ प्रसिद्ध स्वप्न विज्ञानवेत्ता एवं ज्योतिषाचार्य श्री राज ने अमृता जी भेंटवार्त्ता के दौरान की थीं, उन्हीं का लेखा-जोखा प्रस्तुत पुस्तक 'सितारों के संकेत’ में दर्ज है। सितारों के हिसाब से और ग्रहचाल की गणनानुसार अमृता जी के सपनों 'से मम्बन्धित जन्म-कुंडलियाँ भी पुस्तक में अंकित हैं जिनमें आचार्य राज का विशाल ज्योतिष-ज्ञान उजागर होता है। अमृताजी ने आचार्य जी के साथ हुई समस्त भेंटवार्त्ताओं को अपनी चिर-परिचित भाषा-शैली में औपन्यासिक गति से लेखनीबद्ध किया है।
    भक्ति योग, साधना योग, ज्ञान योग और कर्म योग की व्याख्या में उतरते हुए आचार्य राज, सितारों के संकेत देखकर जो कहते रहे, अमृता प्रीतम की कलम से उसी का ब्योरा यह पुस्तक है। 
    साथ ही जन्म-जन्म के गाथा को भी कुछ पहचानने की कोशिश है । पूर्व जन्म को कुण्डली से भी जो संकेत मिलते हैं, वे किस तरह एक आधार-शिला बनते है, इस गहराई को लिए हुए यह पुस्तक अनंत शक्तियों के दर्शन में उतरती है।

  • Betava Bahati Rahee
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-2004

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati (Paperback)
    Gyanendrapati
    90

    Item Code: #KGP-1409

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर! 

  • Chhor
    Bhairppa
    400 360

    Item Code: #KGP-886

    Availability: In stock

    छोर
    कुशाग्र बुद्धि अमृता ने चाची के कुचक्र की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया और अपनी पढ़ाई-लिखाई में ही व्यस्त रही। कुछ समय उपरांत पिता भी स्वर्गवासी हुए और तब घर-परिवार तथा व्यापार पर चाची का वर्चस्व स्थापित हो गया। अमृता की संपत्ति धीरे-धीरे और भीतर ही भीतर चाची तथा उसके बच्चों की ओर खिसकने लगी। अमृता की संपत्ति पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चाची ने अमृता को बहला-फुसलाकर उसका ब्याह अपने छोटे भाई से करा दिया।
    हालात को स्वीकार करके मजबूर अमृता एक कॉलिज में अध्यापन करने लगी और अपने दो बच्चों के साथ बागान से दूर पिता की एक पुरानी कोठी में रहने लगी। वहीं उसकी मुलाकात वास्तुकार सोमशेखर से हुई जो बंबई छोड़कर मैसूर आ गया था। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होने लगे। इस बीच अमृता को चाची के कुचक्रों का भी आभास होने लगा। परिस्थितियों ने उसके स्वभाव में अजीब चिड़चिड़ापन, जीवन के प्रति अरुचि, कुंठा और विकर्षण को जन्म दिया। उसे जीवन बेमानी लगने लगा किंतु बेटों के प्रति मोह और सोमशेखर के प्रति अस्पष्ट आकर्षण उसे बार-बार आत्महत्या की कगार से लौटा लाता। अमृता की जिंदगी में जीवन और मृत्यु की ऊहापोह, उसकी कुंठा ही उसकी जिंदगी के दो छोर हैं जिनके बीच वह बार-बार झोंटे खाती रहती है।
    यह उपन्यास रोचक होने के साथ-साथ एक विशेष मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ पैदा करता है। जो यथार्थ के साथ-साथ विचित्र भी हो गई हैं। यहाँ है भैरप्पा की कल्पनामय यथार्थ शैली का अद्भुत चमत्कार!
  • Sarhad Paar Ki Bisaten
    Kanhiya Lal Nandan
    180 162

    Item Code: #KGP-9195

    Availability: In stock

    महानायकों की मुसीबत यह होती है कि उन्हें एक साइकिलबाज की तरह कर समय पैडल चलाते रहना पड़ता है, क्योंकि पैडल रुका नहीं कि सवार लुढ़का। बल्कि आगे जाने के लिए उसे पैडल मारने में मेजी से काम लेना होता है, वरना चढ़ाई की दौड़ में उसके पिछड़ जाने का खतरा भी रहता है।
    ये आलेख एक तरह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण हैं, जो लगातार घूमते चक्रव्यूह के माध्यम से अपने समय की तस्वीर पेश करते हैं। एक संक्षिप्त कालखंड अपने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों को दृष्टि में रखकर आकार लेता दिखाई दे, यही इन आलेखों की सार्थकता है। किसी भी देश के इतिहास में दो-चार साल का समय कोई बड़ी अहमियत नहीं रखता, लेकिन उन दो-चार सालों के घटनाक्रम को काटकर समूचे इतिहास-क्रम को समझा भी नहीं जा सकता। ये आलेख उस इतिहास-क्रम को समझने में मदद करेंगे, ऐसा विश्वास है।
  • Khabrein Aur Anya Kavitayen
    Ganga Prasad Vimal
    175 158

    Item Code: #KGP-546

    Availability: In stock

    "खबरें और अन्य कविताएँ' एक ऐसे प्रयोगधर्मी कवि का नया प्रधान है, जो हमारे सामने पाँच दृष्टियों से एक विषय को विस्तार देकर जनोन्मुखी विषादों की गहरी सच्चाइयों से परिचय कराता है । पाँच दृष्टियाँ ही क्यों? एक सहज सवाल उभरता है । हमारे पंचेंद्रिय ज्ञान की परिसीमाओं में उनका अलग-अलग रूप क्या हो--इसे जानना भी रोचक हो सकता है, परंतु इसका परिदर्शन हम कविताओं के स्वायत्तम संसार में जाकर ही कर पाएंगे । यह बोध का परिदर्शन है, परंतु आज के समय में पाँच के कई अर्थ हैं--हम किस-किस सोपान से क्या-क्या या सकते हैं यह बहुत हम पर निर्भर करता है और यहीं से बहस शुरू हो जाती है कि कवि के पास से कविता या सृजेता के पास से सृजन उसी क्षण दूसरों की सम्मति हो जाती है जिस क्षण वह स्वांत: सुखाय की निजता से मुक्त होता है ।
  • Sapnon Ko Saakaar Kiya
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-578

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में ऐसे व्यक्तियों की सच्ची कहानियां हैं, जिन्होंने अपने जीवन में ऐसे काम किए, जिनसे आम आदमी को लाभ हुआ था, जिनसे आम आदमी को प्रेरणा मिल सकती है । इन व्यक्तियों ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कठियाइयों का भी सामना किया, लेकिन उनका डटकर मुकाबला किया । इनमे से अधिकांश के पास सीमित साधन थे, फिर भी लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में उनके कदम रुके नहीं, बल्कि आगे ही बढ़ते गए । अंत में उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त किया । साथ ही अपने सपनों को भी साकार किया । 
    जिन व्यक्तयों की ये जीवनियां हैं, उनके बारे में किशोर पाठक बहुत कम जानते होंगे । इनमे से कुछ को तो वे केवल उनके नाम या काम से ही जानते होंगे । लेकिन जब वे उनके बारे में पढ़ेंगे तो न केवल उन्होंने नई जानकारी मिलेगी, बल्कि कुछ वैसे ही लोकहितकारी काम करने की प्रेरणा भी मिलेगी । यही पुस्तक का उद्देश्य है । 
    —विश्वनाथ गुप्त 
  • Aalaap-Vilaap
    Rajendra Laharia
    150 135

    Item Code: #KGP-298

    Availability: In stock

    आलाप-विलाप
    कथाकार राजेन्द्र लहरिया के उपन्यास अपने समय से मुठभेड़ करते कथ्य के साथ ही मर्म को छुने वाले होते हैं और उनका शिल्प भी नव्यता से भरा और पाठकीय जिज्ञासा को उकसाने वाला होता है । वे अपने उपन्यासों को 'कहानी' की तरह साधते हैं, जहाँ कुछ भी फालतू होने  (लिखने) की गुंजाइश नहीं होती । 'आलाप-विलाप' भी इसका अपवाद नहीं है । बकौल लेखक, 'सकेतों की 'भाषा मनुष्य हमेशा से समझता आया है । कोई कहानी या उपन्यास लिखते वक्त मेरा ध्यान इस बात पर हमेशा बना रहता है कि मेरा काम यदि एक शब्द लिखने से चलता है तो अनावश्यक दस शब्द क्यों लिखूं! शब्दों की फिजूलख़र्ची तो कई तरह के नुकसान करती है... 
    'आलाप-विलाप' के बारे में एक सुधी पाठक की राय द्रष्टव्य है : 'कथाकार राजेन्द्र लहरिया का लपन्यास 'आलाप-विलाप' मार्मिकता से भरा व मूलत: राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छदमों को उदूघाटित करता है। जीवन की भयावह स्थितियों इस उपन्यास को जीवंत कथ्य देती है । छोटे-छोटे उपकथानकों में परिवेश की  पीड़ाओं के झकझोरने वाले वर्णन इसके प्रभाव को सघन करते हैं। हमारे समय की एक प्रमुख समस्या नक्सलवाद के उभार और उसकी वजहों को भी इस उपन्यास में देखा-पहचाना और समझा जा सकता है । प्रशासनिक और सांस्कृतिक-साहित्यिक छदमों और पाखंडों की लीलाएँ गरीब, कमजोर और संवेदनशील व्यक्तियों तथा तबकों को क्या-क्या नचाती हैं, इसका-दिलचस्प और बेधक दिग्दर्शन इस उपन्यास में है। और खास बात यह है कि  अँधेरे समय और स्याह चरित्रों के बीच भी उम्मीद की  कौंध से भरे कुछ ऐसे उजले चरित्र यह उपन्यास हमें देता  है, जो लड़ाई को बेहद कठिन समझते हुए भी अविचल  रूप से संघर्ष करते है, और इसलिए उनकी हार भी हमें  निराशावाद की ओर नहीं ले जाती । वह इस छोटे से उपन्यास  की बड़ी खुबी है... 
    कहा जा सकता है कि 'आलाप-विलाप' आकार से लघु, मगर सरोकार में बडा उपन्यास है ।
  • Ibne Mariyam
    Nasera Sharma
    240 216

    Item Code: #KGP-17

    Availability: In stock

    इब्ने मरियम 
    'इब्ने मरियम' की कहानियाँ निश्चय ही यह प्रमाणित करने में सक्षम हैं कि नासिरा शर्मा का रचनात्मक कैनवास व्यापक है । वह किसी भी तरह अपने दायरों में सिमटी-सिकुड़ी एकरसता में डूबी कहानियां नहीं लिखतीं । उनके पास वास्तव में एक ‘जहांनुमा' आईना है, जिसमें वह दुनिया-जहान को देखती है । उनकी कहानियों का भूगोल  किसी शहर, प्रान्त या देशों की सरहदों में कैद नहीं है, बल्कि उनके पास आर-पार और दूर-दूर तक देखने वाली दृष्टि है और यह दृष्टि सही मायनों में मानवीय है, भाईचारे का पैगाम देने वाली है । और भी कहें तो 'विश्व मानवता' का इतिहास रचने वाली है । वह इनके माध्यम से कहना चाहती हैं कि भाषा, प्रांत, धर्म, जाति, देश, सरहद, फौज, गोला-बारूद जैसा सबकुछ केवल अपनी कुंठाओं को बचाने और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के हथियार है, जो कभी भी सफल नहीं हो सकते । सर्वोपरि सिर्फ इंसान है और उसकी इंसानियत है, जिसे सात तालों में  भी कैद नहीं किया जा सकता । वह बहुत दूर तक देखती हैं और आत्मसात का अपने व्यापक कैनवास पर 'पेष्ट' करती है । इस रूप में उनके लिए सबसे अलग और सफल कथाकार होने का दावा किया जा सकता है ।
  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Chhuttiyan
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2095

    Availability: In stock

    छुट्टियाँ
    पूरी मनाली एक अनपढी पुस्तक की भांति सामने खुली थी । इसे कितनी ही बार पढ़ो, हर बार यह बिलकुल ताजी, अनछुई-सी जान पड़ेगी, विद्रोही जी ने सोचा । फिर मीरा को इशारे से बताया, “वह देख रही हो—नीचे, सामने, उधर दूर पर, वो पतली-सी सड़क । हाँ, हाँ, वही, जिस पर अभी एक मोटर आती दिखाई दी थी । वह कुल्लू-मनाली सड़क है । उसी से होकर कल शाम हम यहीं पहुँचे थे... " 
    सफ़रनामे, कहानी, कविता, फंतासी, रपट और व्यंग्य आदि विधाओं को अपने  में घुलाती-मिलाती अजितकुमार की यह प्रथम औपन्यासिक रचना 'छुट्टियाँ' उसी अर्थ में एक उपन्यास है, जिसमें अजितकुमार के लिए 'कविता के रूप में प्रस्तुत प्रत्येक रचना कविता है और वह भी कविता है जो भले ही उस रूप में न प्रस्तुत की गई हो पर किसी को कविता प्रतीत हो ।'
    साहित्यिक विधाओं की परस्पर घुसपैठ के इस युग में, जब उपन्यास की अलग पहचान गुम हो चली हो और वह ऐतिहासिक, सामाजिक, जासूसी, फुटपाथी आदि शिकंजों में फाँस दिया गया हो. 'छुट्टियां' प्रमुखत: कुतूहल पर आधारित है, बावजूद इस भय के कि हिंदी के अतिवृद्ध और अकालवृद्ध परिवेश में, उसे बालोपयोगी या किशोरोपयोगी समझ लिया जाएगा ।
  • Aadarsh Ghar-Parivaar Aur Mahilayen
    Sudha Gautam
    180 162

    Item Code: #KGP-187

    Availability: In stock

    'आदर्श घर-परिवार और महिलाएँ' पुस्तक में सुधा गौतम ने अपने अनुभवों के आधार पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी है, उनमें से कुछ शीर्षकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है, यह पुस्तक महिलाओं के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होगी :
    ० जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
    ० छोटी-छोटी बातों से न हो परेशान
    ० बाँधे रखें पति को
    ० कड़वी यादे भुला दें
    ० जब आप फोटो खिंचवाने जाएं
    ० आप और आपकी शारीरिक गठन
    ० आप और आपका परिधान
    ० आप और आपकी नींद
    ० वर्तमान में जीना सीखें
    ० यदि आपके घर में नौकर है
    ० आप और आपकी खरीदारी
    ० आप और आपके घर के कीड़े-मकोड़े
    ० आपकी बढती उम्र और आप
    ० बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए
    ० जब आप सफर पर जाएं
    ० जब आपके मेहमान आपके घर आएं
    ० आप और आपकी सेहत
    ० बच्चों के लिए नाश्ता 
    ० चमकदार त्वचा के लिए
    ० खूबसूरत होंठों के लिए
    ० त्वचा में निखार के लिए
    ० गर्मियों में आपका मेकअप
    ० मुँहासों से छुटकारा
    ० खूबसूरत बालों के लिए
    ० आपकी गर्दन रहे सुंदर
    ० धूप का चश्मा
    ० आप और आपके गहने
    ० आपके घर का फर्श
    ० महिलाएँ और रसोई
    ० आपके गरम कपडे
    ० कैसे छुड़ाएँ कपडों के दाग
    ० अपने बच्चों के मित्र बनिए
    ० जब बच्चा स्कूल जाने लगे
    ० जिद्दी बच्चा
    ० माँ-बेटी का रिश्ता
    ० बच्चे कैसे बनाएं अपनी अलग पहचान
    ० बच्चे अपना काम स्वयं करें
    ० बच्चे भोजन बेकार न करें
    ० शरारती बच्चों को कैसे सुधारें
    ० बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए
    ० जब आपका बच्चा आपसे दूर रहे
    ० छात्र और परीक्षा
    ० बच्चे कैसे रहें परीक्षा के दिनों में  तनावमुक्त
    ० कैसे लिखे प्रश्नों के उत्तर
    ० कैसे मिले परीक्षा में सफलता
    ० आपका कंप्यूटर
    ० आप और आपके छोटे बच्चे
    ० बच्चों की छोटी-मोटी तकलीफें
    ० घरेलू दवाइयाँ
    ० छोटी-छोटी काम की बातें

  • Chaanda Sethani
    Yadvendra Sharma Chandra
    125 113

    Item Code: #KGP-2042

    Availability: In stock

    'चाँदा सेठानी' के लिखने की प्रेरणा मुझे अपने इस समाज की सेठानियों से मिलने के बाद मिली । जब उन्होंने अपने जीवन के सत्यों को उजागर किया तो मेरे विचारों में जोर का कंपन हुआ । लगा कि इन सेठानियों के त्याग, तप, संयम और सच के कारण ही राजस्थानी लोगों ने देश के धन्नासेठों में अपने नाम लिखाए । पूर्वी देशों की यातनापूर्ण कठिन यात्राएँ, संकट और संस्कृति व वहाँ की भाषा को अजानकारी, सभी परिस्थितियों में राजस्थानी लोगों ने अदम्य साहस का परिचय दिया । आरंभिक पीढ़ी के त्रासदपूर्ण जीवन का शुभ फल दूसरी पीढ़ी को मिला और यह फल पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा । यहीं कारण है कि चाहे बिरला हो, चाहे गोयनका, पोद्दार हो चाहे सोमानी, दम्माणी हो, चाहे डागा, सब के सब अब समृद्धि के शिखर को छू रहे हैं ।
    पाँच से दस सालों तक की यात्राएँ की परदेश में गांव जमाने का संघर्ष । अपनी जवान पत्नियों का त्याग! क्या यह तपस्या नहीं ? और उन पत्नियों का तप तो और भी महान् लगता है, जिन्होंने सूखे प्रांतर की तपती रेत और उसके असह्य ठंडेपन का सूखी रोटियाँ और मोठ-बाजारी के खिचड़े को खाकर सहा ओर सहज जीवन जिया ।
    -लेखक
  • 20-Best Stories From Turkey (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7203

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folkstales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Turkish short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Prince Ahmed, Storm Fiend, Deceiver and the Thief, Fortuneteller, Shah Jussuf, Forlorn Princess, this book is a compilation of 20 famous Turkish short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Turkey.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ballabh Dobhal
    Ballabh Dobhal
    170 153

    Item Code: #KGP-451

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बल्लभ डोभाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उतरा हुआ', 'जय जगदीश हरे', 'चुनाव चक्रम्', 'काठ की टेबुल', 'दूर का दर्शन', 'दर्द अपनेपन का', 'तन का देश : मन का देश', 'खेड़ा गांव', 'बुलडोजर' तथा 'समाधान'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बल्लभ डोभाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bayabaan Mein Bahaar
    Urmila Shirish
    450 405

    Item Code: #KGP-594

    Availability: In stock


  • Naath Siddhon Ki Rachnayen
    Hazari Prasad Dwivedi
    295 266

    Item Code: #KGP-209

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan Alpana Mishra (Paperback)
    Alpana Mishra
    225

    Item Code: #KGP-7223

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां अल्पना मिश्र

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अल्पना मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भीतर का वक्त’, ‘कथा के गैरजरूरी प्रदेश में’, ‘मिड डे मील’, ‘बेतरतीब’, ‘उनकी व्यस्तता’, ‘बेदखल’, ‘भय’, ‘उपस्थिति’, ‘मुक्ति-प्रसंग’ तथा ‘छावनी में बेघर’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अल्पना मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    160

    Item Code: #KGP-481

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।

  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    250 225

    Item Code: #KGP-16

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अमृता प्रीतम
    पंजाबी और भारत के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में से एक, अमृता प्रीतम के साक्षात्कारों की यह किताब हमें उस अमृता से मिलाती है, जिसकी जात उसके ज़माने के हर दु:ख का आईना है । यह दु:ख चाहे निजी हो या दुनिया के किसी भी समाज में किसी भी इंसान का । यह भी ज़रूरी नहीं कि इसका संबंध उसके समय से हो । अत्याचार दूर कहीं अतीत में भी किसी के साथ हुआ हो, तो वह युगों और सदियों के फासले पर भी उसकी पीड़ा अपने भीतर महसूस करती है । इसी तरह अपने गम में उन्हें अपना साथी मानकर उनसे अपना दर्द बाँटती है । समकालीन साहित्यकारों के साथ, इतिहास के साथ, सूफियों के साथ अमृता ने जो बातचीत की है, उसमें समय या सोच का कोई फासला कहीं प्रतीत नहीं होता । यह किताब अमृता के जीवन के समस्त पहलुओं को अपने में समेटे हुए है । और आगाज़ से अंजाम तक अमृता के जीवन और सृजन का आईना बनकर अब आपके हाथों में है ।
  • Shesh Parichay (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    200

    Item Code: #KGP-155

    Availability: In stock


  • Nikka Nimana (Paperback)
    Sushil Kalra
    180

    Item Code: #KGP-427

    Availability: In stock

    ...आजादी के पैरोकार जो जमीन तैयार कर रहे थे उसकी उपजनिक्का निमाणा' के अतिरिक्त और हो ही क्या सकती थी। तिरस्कृत, लांछित, अपमानित चरित्र-एक ऐसा चरित्र जो भ्रष्ट आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रिया का कुल योग है।

    पंजाब का पिण्ड घोपलू उन लाखों गांवों में से एक है जो चीख रहे हैं-हमें पानी दो। खाद दो। बीज और बिजली दो। शिक्षा और संस्कार दो। भूरी, नंबर, मद्दी, वड्डी मां, निक्काया, मेंहदीरत्तो, चाचे कृष्णा, कहां नहीं हैं? भरे पड़े हैं सारे देश में संसद की जड़ों में खाद बनकर जी रहे हैं।

    दरियाई घोड़े की तरह मुंह फाड़े राजतंत्र, देह और दौलत की घोर अमानवीय अराजक परिणति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। मूल्य ह्रास, नैतिक पतन, नारकीय जीवन को गांधी टोपी के नीचे छिपाए, जनता को लगातार रौंदता

    और भटकाता सत्ताधारी वर्ग औरत, शराब और पैसे की त्रिवेणी में सदा सर्वदा पवित्र है! जो इस कला में जितना पारंगत है, उतना ही ऊंचा पद, सत्ता में, उसके लिए सुरक्षित है। निक्का इसी गंगा का शालिग्राम है। लेकिन इस प्रतियोगिता में निक्का एक हद तक ही विजयी होता है। धीरे-धीरे डोर उसके हाथ से छूटती जाती है। वह महज एक मोहरा रह जाता है। उभरता है फिर एक अत्यंत क्रूर, अमानवीय, स्वार्थाध शासक वर्ग। लेकिन साथ-साथ ही एक नियामिका शक्ति भी उभरती है-जनता।

    यथार्थ की तहों तक पहुंचतासृजनात्मक प्रवहमान भाषा का माध्यम और सुस्पष्ट दृष्टि का प्रमाण देने वाला यह उपन्यास निश्चित ही अपने समय का दस्तावेज लगता है।    

  • Mere Saakshatkaar : Shiv Prasad Singh
    Shiv Prasad Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2024

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : शिवप्रसाद सिंह
    शिवप्रसाद सिंह स्वीकार करते हैं कि "मैं भाव और रूप को अपनी क्षमता पर बाँध सकने की कोशिश में कुछ भी उठा नहीं रखता । उनका यह भी मानना है कि सत्य तो साक्षात् देखा होने पर भी भाषा की गुंजलक में अँट नहीं पाता । अधूरे सपने पूरे मानसिक ताप में जब पिघलते हैं तो सही क्षण पहचानकर उन्हें भी में डालना, शीतल करना और फिर बाहर निकालकर चमक दे देना कलाकार की तपस्या है । उसकी डाई (साँचा) विश्व के किसी भी अन्य कथाकार-रचनाकार से मेल नहीं खाती, न तो कहीं से कोई सादृश्य ही रखती है, यहीं वैयक्तिक स्वतन्त्रता रचनाकार की निजी धरोहर और यही उसके मन की प्रतिबद्धता भी ।
    साक्षात्कारों में अक्सर प्रस्तुतकर्ता की अपनी समझ रूपायित होती है, पर जो पाठक प्रश्न के साथ जुड़े हो उन्हें उत्तर से भी जुड़ना लाजिम नही है । शिवप्रसाद सिंह कहते है कि प्रेमबंधन को चटकाकर तोड़ने पर गाँठ पड़ना अनिवार्य है । जुड़ना बिना ग्रंथि के संभव नहीं होता, पर इससे धीरे-धीरे धागा छोटा होता रहता है । उसे अगर पहली स्थिति में लाना हो तो गांठें खोलिए और तब वह धागा वस्तु-जगत को प्रेम की डोर से बाँध लेगा ।
    यह नई पुस्तक साक्षात्कारों पर केंद्रित है जिसमें उनके समवयस्क या नई पीढी, समकालीन पीढी से जुड़े रचनाकारों, पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर है । शायद इनमें से कोई प्रश्न आपका भी हो, तो उत्तर पर सोचिए--
  • Ramcharitmanas Sandarbha Samagra
    Lalit Shukla
    325 293

    Item Code: #KGP-238

    Availability: In stock

    रामचरितमानस संदर्भ समग्र
    ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अमर एवं अद्वितीय कृति है। प्रबंध-काव्य के गुणों से ओतप्रोत यह प्रस्तुति भारतीय संस्कृति और मानवोचित लोकानुभव की संदेशवाहिका बनी हुई है। यह अनेक प्रचलित और गूढ़ संदर्भों से युक्त है। इस रचना से उन्हीं संदर्भों को व्याख्यायित और सरलीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। 
    हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि इस प्रस्तुति से ‘रामचरितमानस’ के अनुरागियों और अध्येताओं  को कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। लोकभाषा अवधी और देवभाषा संस्कृत के अनेक मार्मिक संदर्भों का सरल रूप यहाँ दिया गया है। 
    यह कृति न तो टीका है और न कोश है। यह अपनी पृथक् शैली की प्रस्तुति है, जो हिंदी और ‘मानस के पाठकों के सामने पहली बार आ रही है। सचमुच महाकवि की यह साहित्यिक यात्रा पाठकों का पाथेय है।’ मानस उसका अमिट स्मारक है।
  • Parinti (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7101

    Availability: In stock


  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Mukti-Dwar Ke Saamne
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-540

    Availability: In stock

    ‘मुक्ति-द्वार के सामने’ की कविताएं लगभग पिछले पंद्रह वर्षों में लिखी गई कविताएं हैं। मुक्ति-द्वार शब्द हमारी मनीषा के उन संस्कारों से जुड़ा हुआ है जो धर्म के साथ संपृक्त हैं। और अध्यात्म की व्याख्या भी अकसर धर्म से जोड़कर ही की जाती है। लेकिन इन कविताओं का संसार उस धर्मिक कर्मकांडी संस्कारों से दूर-दूर तक नहीं जुड़ता। इन कविताओं का अध्यात्म छायावादी अध्यात्म भी नहीं बल्कि इस दुनिया के गोचर से जुड़ा हुआ अध्यात्म है। अगोचर के प्रति अनावश्यक रूप से संलग्न रहकर समय व्यर्थ करने में प्रताप सहगल विश्वास नहीं करते। उनका विश्वास बच्चे, फूल, नदी और उन तमाम चीजों में है जो गोचर होते हुए भी एक विस्मय-जगत् की रचना करते हैं। ये कविताएं वस्तुतः उसी विस्मय- जगत् में प्रवेश करती हैं। एक नितांत निजी अनुभव को प्रताप कविता का मूल मानते हैं और उस निजी अनुभव के सामाजिक विस्तार को कविता का श्रेय। कुछ कविताओं में राजनीतिक, सामाजिक संदर्भ और आशय भी साफ नजर आते हैं। उन संदर्भों के सहारे ही कवि अपने आशय स्पष्ट करता है और इन आशयों में भी उन संदर्भों के पीछे छिपी अमानवीयता से भी वह मुक्ति की कामना करता चलता है।
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    220 198

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Sikh Dharma Darshan Ke Mool Tattva
    Satayendra Pal Singh
    195 176

    Item Code: #KGP-305

    Availability: In stock

    सिख धर्म दर्शन के मूल तत्त्व
    सदियों से भ्रमित समाज को परमात्मा से मिलन का एक सरल और सहज मार्ग दिखाकर सिख गुरु साहिबान ने धर्म की एक अभिनव दृष्टि प्रदान की। जीवन को विनम्रता, प्रेम, सेवा, समर्पण और संतुष्टि का पर्याय बनाने, परमात्मा के हुक्म के अधीन चलने का संदेश दिया। इससे समाज में अद्भुत चेतना जाग्रत हुई और शोषित, पीड़ित हृदयों में आशा का प्रकाश भर उठा। सिख गुरु साहिबान द्वारा बताया गया मार्ग जितना सरल है उतना ही कठिन भी है।
    उस मार्ग की सरलता और सहजता क्या है और कैसे साहस व समर्पण की आवश्यकता है, इसका उत्तर खोजने के लिए इस पुस्तक का आद्योपांत पठन अपरिहार्य है।
    सिख धर्म दर्शन पर हिंदी में मूल रूप से लिखी गई यह पहली पुस्तक है, जो धर्म के मर्म तक ले जाती है और उसे अपनाने हेतु प्रेरित करती है।
  • Nahin Koi Ant
    Pratap Sehgal
    80 72

    Item Code: #KGP-1300

    Availability: In stock


  • Pracheen Bharat Ki Neetiyan
    Acharya Dina Nath Sidhantalankar
    450 405

    Item Code: #KGP-851

    Availability: In stock

    प्राचीन भारत की नीतियाँ
    हमारे आर्यावर्त्त देश में जनतंत्र और लोकतंत्र चलाने के लिए कैसी नीतियाँ थीं, उसके बाद कैसी नीतियाँ रहीं और अब कौन-सी नीतियाँ हैं, इस दिशा में इस ग्रंथ के संपादन एवं प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण प्रयास किया गया है। विद्वान् सुधी लेखक ने युक्ति, तर्क, औचित्य और वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की दृष्टि से इस ग्रंथ में उन सब संदर्भों को अलग कर दिया है, जो भेदसूचक, ऊंच-नीच द्योतक और समाज के किसी भी वर्ग के प्रति तनिक भी घृणा, विषमता व हीनतासूचक हैं।
    इस ग्रंथ के संकलन के लिए भारतीय दर्शनशास्त्रों का गहराई से अध्ययन किया गया है और उसमें वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में उन ही सर्वोपयोगी नीतियों का संकलन किया है, जो समय और औचित्य की दृष्टि से आज की परिस्थितियों में भी उतनी ही तर्कसंगत और मूल्यवान हैं, जितनी प्राचीन युग में थीं। 
    देश की स्वतंत्रता के बाद अंतर्देशीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति-निर्धारण में मानवीय पक्ष को ही हमारे राष्ट्र-नायकों ने सामने रखा। किसी एक वर्ग, जाति, संप्रदाय अथवा धर्म के वर्चस्व के स्थान पर उसे समानता का प्रबल आधार प्रदान किया। इसके लिए हमने चार आदर्श अपनाए। प्रथम है–लोकतंत्र, द्वितीय है—समाजवाद, तृतीय है–धर्म-निरपेक्षता और चैथा है गुट-निरपेक्षता। इस नीति-निर्धारण में हमें सबसे बड़ी सहायता भारतीय वाङ्मय की अमूल्य निधि से मिली है। हम यदि अपने प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध जीवन-मूल्यों का आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन कर सकें तो समाज उनसे लाभ उठा सकता है।
    इस परिपेक्ष्य में यह ग्रंथ नेताओं, प्रशासकों और आज के प्रबुद्ध पाठक-वर्ग के लिए विशेष स्फूर्तिप्रद होता हुआ भारत के नव-समाज-निर्माण के लिए दिशा-निर्देश करने में अनवरत उपयोगी सिद्ध होगा।
  • Ek Aur Chandrakanta : 1
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-9040

    Availability: In stock

    एक और चन्द्रकान्ता-1
    भारतीय दूरदर्शन के इतिहास में 'चन्द्रकान्ता' सीरियल है जो लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया है, इसका श्रेय हिन्दी के अग्रणी उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री को जाता है क्योंकि 'चन्द्रकान्ता' सीरियल के सुप्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर का मानना है कि इसकी प्रेरणा उन्होंने खत्री जी से ही ग्रहण की है । खत्रीजी की प्रेरणा के महादान से संपन्न इस शीर्ष कथाकार ने जिम प्रकार उपन्यास से सीरियल को अलग किया था, उसी तरह सीरियल से एक और चन्द्रकान्ता की इस महागाथा को अलग करके प्रस्तुत किया है ।
    'एक और चन्द्रकान्ता' के इस पाठ में हिन्दी पाठक एक बार फिर से अपनी भाषा तथा कथा के आदर्श तथा गौरवमयी अनुभव से गुजर सकेगा । कहा जा सकता है कि हिन्दी में यह रचना के स्तर पर एक प्रयोग भी है । लेखक के अनुसार यह “भाषायी स्तर पर एक विनम्र प्रयास है ताकि हिन्दी अधिकतम आम-फ़हम बन सके ।" हिन्दी कथा-परंपरा में किस्सागोई की मोहिनी को पुन: अवतरित करने में लेखक के भाषागत सरोकार और उपकार का यह औपन्यासिक वृत्तांत अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। 
    चमत्कार, ऐयारी, फंतासी, बाधाएँ, कर्तव्य, दोस्ती, युद्ध-पराक्रम, नमकहरामी, बगावत, प्रतिरोध, साजिश, मक्कारी, तांत्रिक एवं शैतानी शक्तियाँ, वासना, वफादारी तथा अंधसत्ता आदि को बखानती और परत-दर-परत खुलती-बंद होती अनेक कथा-उपकथाओं को इस उपन्यास-श्रृंखला ने मात्र प्यार-मोहब्बत की दास्तान को ही नहीं बखाना गया है बल्कि इस दास्तान के बहाने लेखक ने अपने देश और समाज की झाडा-तलाशी ली है ।  यही कारण है कि कुंवर  वीरेन्द्रसिंह और राजकुमारी चन्द्रकान्ता की उद्याम प्रेमकथा को बारंबार स्थगित करते हुए लेखक को दो देशों की परस्पर शत्रुता के बीच संधि की कोशिश को शिरोधार्य करता प्रतीत होता है तो वहीं भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोह को प्रतिच्छाया वाली उप