Mere Saakshatkaar : Leeladhar Jaguri

Leeladhar Jaguri

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  • Year: 2008

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170165545

मेरे साक्षात्कार : लीलाधर जगूडी
हर दशा में इंटरव्यू ज्यादातर बोलकर ही देने होते हैं और अमूमन यह सुकून रहता है कि जो बोला गया है, वह लिख लिया गया है या अंकित हो गया है; क्योंकि एक लेखक शायद बोलकर उतना अलग नहीं हो सकता जितना लिखे जाने के बाद अलग हो सकता है । अलग होना माने मुकर जाना नहीं बल्कि रचनात्मक रूप में अपनी किसी विचाराभिव्यक्ति से मुक्त होना है । मुझे कभी-कभी पूरा ब्रह्मांड भागता हुआ टेप लगता है और इसमें ग्रह-नक्षत्रों की आपसी दूरी और दिन-रात भी बड़े-बड़े पॉज की तरह दिखाई देते हैं । इतने सारे अवकाश के बावजूद धूलकणों की तरह मूझे भी कहीं अंकित होने के लिए अपने लायक स्पेस की खोज करनी होती है ।
सोचना और बोलना एकसाथ हो जाए तो सोच के बोलों की भी सार्थकता और बढ़ जाए । सोच की बोली-भाषा, लिखी और सँजोई जाए तो विचार की भी टहनियाँ व फुनगियाँ स्पष्ट होती चली जाती हैं ।
बोलना भले ही अकेले भी हो उकता है, लेकिन वह बोलना कम बड़बड़ाना ज्यादा होता है । अपने बोले हुए को आलोचनाविहीन होकर खुद ही सुनना, उस एक ही बोलने-सुनने वाले को और भी अकेला कर  देता है । इसलिए बोले हुए को सुनने वाला और लिखे हुए को पढ़ने वाला कोई दूसरा जरूर चाहिए ।
शब्द की चित्रात्मवक्ता लिपि से लेकर अर्थरंजन तक फैली दिखती है । अंतर्सगीत, नृत्य, नाट्य और रंगबोध भी शब्द के व्यवितत्व की विशेषताएँ हैं । इसीलिए शब्दों को जितने प्रकार की वाक्य संगतियों में  जितनी बार लिखते हैं उतनी बार जाने हुए को फिर से जानने का और अनजाने को पहली बार जानने का मौका मिलता है ।
कभी यह भी लगता है कि लिखना और बोलना दोनों ही, जो कुछ अब तक अनुभव किया, आत्मसात किया--उसी की पुनर्रचना है । जो अच्छा बोलना जानते हैं कभी-कभी उनका बोलना ही लिखने जैसा हो  जाता है । शरद ऋतु की प्रवाहपूर्ण स्वच्छ नदी के जल में विस्तार के साथ-साथ गहराई भी साफ दिखाई देती है । फर्क इतना ही है कि लिए हुए में पकड़े जाने का डर है; बोले हुए को बोलने वाला भी दुबारा नहीं पकड़ सकता ।

Leeladhar Jaguri

लीलाधर जगूड़ी
जन्म: 1 जुलाई 1940, धंगण गाँव, टिहरी (उत्तराखंड)।
ग्यारह वर्ष की अवस्था में घर से भागकर अनेक शहरों और प्रांतों में कई प्रकार की जीविकाएँ करते हुए शालाग्रस्त शिक्षा के अनियमित क्रम के बाद हिंदी साहित्य में एम. ए.। फौज (गढ़वाल राइफल) में सिपाही। लिखने-पढ़ने की उत्कट चाह के कारण तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन को फौज से मुक्ति के लिए प्रार्थनापत्रा भेजा, फलतः छुटकारा। 1970 के 13 सितंबर को भयंकर प्राकृतिक त्रासदी में परिवार के सात लोगों की एक साथ मृत्यु। 1966-80 तक शासकीय विद्यालयों में शिक्षण- कार्य और बचे हुए परिवार का पुनर्वास उत्तरकाशी में।
1980 में पर्वतीय क्षेत्र में प्रौढ़ों के लिए लिखी ‘हमारे आखर’ (प्रवेशिका) तथा ‘कहानी के आखर’ पाठ्यपुस्तकें साक्षरता निकेतन, लखनऊ से प्रकाशित। राजस्थान के कवियों के संकलन ‘लगभग जीवन’ का संपादन। अखिल भारतीय भाषाओं की नाट्यालेख प्रतियोगिता में 1984 में ‘पाँच बेटे’ नाटक पर प्रथम पुरस्कार तथा फिल्म निर्माण। मराठी, पंजाबी, मलयालम, बाँग्ला, उड़िया, उर्दू आदि भारतीय भाषाओं में तथा रूसी, अंग्रेजी, जर्मन, जापानी और पोलिश आदि विदेशी भाषाओं में कविताओं के अनुवाद।
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उ.प्र. की मासिक पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश’ तथा नए राज्य उत्तरांचल की प्रथम पत्रिका ‘उत्तरांचल दर्शन’ का संपादन। सेवानिवृत्ति के बाद उत्तरांचल के प्रथम सूचना सलाहकार रहे तथा उत्तराखंड संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद के प्रथम उपाध्यक्ष।
प्रकाशित कविता-संग्रह: ‘शंखमुखी शिखरों पर’ नाटक जारी है’, ‘इस यात्रा में’, ‘रात अब भी मौजूद है’, ‘बची हुई पृथ्वी’, ‘घबराए हुए शब्द’, ‘भय भी शक्ति देता है’, ‘अनुभव के आकाश में चाँद’, ‘महाकाव्य के बिना’, ‘ईश्वर की अध्यक्षता में’ और अब ‘ख़बर का मुँह विज्ञापन से ढका है’।
गद्य: मेरे साक्षात्कार के लिए।
सम्मान: रघुवीर सहाय सम्मान, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता द्वारा सम्मानित। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के नामित पुरस्कार सहित अन्य सम्मान। ‘अनुभव के आकाश में चाँद’ के लिए 1997 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। 2004 में पद्मश्री से अलंकृत।

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