Mere Saakshaatkaar : Mridula Sinha

Mridula Sinha

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  • Year: 2017

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-934394-9-4

रचनाकार का मन स्वयं में एक रहस्य है। मन में निहित भावनाएं, संकल्पनाएं, स्वीकृतियां, असहमतियां, प्रार्थनाएं आदि किस विध में या किस शिल्प में व्यक्त होंगी यह एक अबूझ तथ्य है। विद्वानों का ऐसा कहना है कि जब कोई रचनाकार को अपने प्रश्नों से उकसाता है तब मन को प्रकट होने का एक भिन्न प्रयोजन मिल जाता है। ‘किताबघर प्रकाशन’ की बहुचर्चित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला ‘मेरे साक्षात्कार’ के इस संकलन में सुप्रसिद्ध  रचनाकार मृदुला सिन्हा ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पक्षों पर बात की है। उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत, अनुभव व्यापक और चिंतन बहुमुखी है, इसलिए उनके उत्तर जीवन व समय की गहराइयों में प्रवेश कर जाते हैं।
एक प्रश्न के उत्तर में मृदुला सिन्हा कहती हैं, ‘साधारण से साधारण नारी बहुत कुछ दे जाती है और उसका यह देना ही मुझे आंदोलित करता है और मेरे साहित्य के लिए प्रेरणादायी प्रसंग बनता है। सामाजिक समस्याओं को सूचीबद्ध कर देना ही साहित्यकार का काम नहीं है। उसी समस्याग्रस्त समाज व्यवहार से समस्याओं का निदान ढूंढ़कर भी प्रस्तुत करना साहित्य का उद्देश्य है।’ स्पष्ट है कि वे वितर्कों या कुतर्कों की उलझनों से दूर रहकर समाज के सकारात्मक विश्लेषण में रुचि रखती हैं। उनको तुलसीदास के इस कथन पर भरोसा है—‘छूटहि मल कि मलहि के धेये, घृत कि पाव कोउ बारि बिलोये।’
मृदुला सिन्हा के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं। केवल लेखक के रूप में नहीं सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक चिंतक, महिला हित संरक्षक आदि के रूप में भी उन्होंने अपनी प्रखर पहचान बनाई है। कहानी, उपन्यास, कविता और ललित निबंध को वे जितना साहित्य में रचती हैं, उससे अधिक जीवन में जीती हैं। इसीलिए पाठक उनकी रचनाओं और बातों में अद्भुत प्रवाह महसूस करता है।
‘मेरे साक्षात्कार’ के अंतर्गत मृदुला सिन्हा ने जिन तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी है, उनका संबंध व्यापक भारतीय समाज से है। इस अर्थ में ये साक्षात्कार ज्ञानप्रद और प्रेरक हैं।

Mridula Sinha

मृदुला सिन्हा 
27 नवंबर, 1942 (सीता राम विवाह पंचमी, मार्गशीर्ष माह), छपरा गांव (बिहार) के एक मध्यम परिवार में जन्म। गांव के प्रथम शिक्षित पिता की अंतिम संतान लेखिका की जीवन यात्रा बड़ों की गोद और कंधों से उतरकर पिता जी के टमटम और रिक्शा पर सवारी से प्रारंभ हुई। आठ वर्ष की उम्र में छात्रावासीय विद्यालय में प्रवेश। 16 वर्ष की आयु में ससुराल पहुंचकर (1959) बैलगाड़ी की यात्रा, पति के मंत्री बनने पर 1971 में पहली बार हवाई जहाज की सवारी।
1956-57 से प्रारंभ हुई लेखनी की यात्रा कभी रुकती, कभी थमती रही। शैशवावस्था में उठते-गिरते रहने के समान। 1964 से लेखन प्रारंभ। 1977 में पहली कहानी ‘कादंबिनी’ पत्रिका में छपी। तब से लेखनी भी सक्रिय हुई। विभिन्न विधाओं में लेखकीय यात्रा निरंतर चलती रही। गांव-गरीब की कहानियां हैं, तो राजघरानों की भी। रधिया की कहानी है तो रजिया और एलिजा की भी। लेखनी ने सीता, सावित्री, मंदोदरी के जीवन को खंगाला है, उनमें से आधुनिक बेटियों के लिए जीवन संबल ढूंढ़ा है तो जल, थल और नभ पर पांव रख रही आज की ओजस्विनियों की गाथाओं का भी गान लिपिबद्ध किया है।
लोकसंस्कारों और लोकसाहित्य में स्त्री की शक्ति-सामर्थ्य ढूंढ़ती लेखनी, उनमें भारतीय संस्कृति के अथाह सूत्र पाकर धन्य-धन्य हुई है। लेखिका अपनी जीवन यात्रा पगडंडी से प्रारंभ करके आज गोवा के राजभवन में पहुंची हैं। लेखनी की निरंतरता जारी है।

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