Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramesh Bakshi

Ramesh Bakshi

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170166856

हिंदी के विवादास्पद एवं विख्यात कथाकार रमेश बक्षी की दस प्रतिनिधि कहानियों का यह संचयन कथाकार की उस दुनिया का साक्ष्य भी है, जिससे पैठकर वह असंभव कथ्यों को पाठक वर्ग के समक्ष उदघाटित एवं प्रकाशित करता है । आत्मबोध से उपजी इन कहानियों से लेखक का जो आत्मज्ञान झसता है, वह समकालीन स्त्री-पुरुष संबंधों के संसार को नई परिभाषा, व्याख्या और नैतिकता में रूपायित करने का समुन्नत कथा-उपक्रम है, जिसे सम्यक अर्थों में हम प्रगतिशील कथाक्रम के वर्ग से रख सकते हैं ।
ये कहानियाँ किसी विरक्त, त्यागी या सन्यासी व्यक्तित्व के विषयमुक्त होने के कथा-चित्र, नहीं है, बल्कि संबंधों के बीच पनपते उपद्रवों का सामना करते चरित्रों की सच्चाइयां है । समकालीन समाज ने अपने जीने के लिए जिस परिवेश की सृष्टि कर ली है, उसमें क्या ठोस है, क्या खोखला तथा क्या मान्य और क्या त्याज्य है-इन विषयों पर बेधक संकेत और संदेश इन कहानियों के मूल में समाहित और प्रवाहित हैं ।
रमेश बक्षी की सजग कथाकार-दृष्टि को समेटे जिन दस कहानियों को यहीं प्रस्तुत किया जा रहा है, वे हैं- 'मेज़ पर टिकी हुई कुहनियाँ', 'जिनके स्थान ढहते हैं....', 'एक अमूर्त तकसीफ', 'राख', 'खाली', 'आम-नीम-बरगद', 'पैरोडी', 'थर्मस  में कैद कुनकुना पानी', 'अगले मुहर्रम की तैयारी' और 'उतर' । संकलन के प्रस्तोता डॉ. बलदेव वंशी ने अपने इस समकालीन लेखक की कहानियों पर विस्तृत एवं आत्मीय टिप्पणी भी प्रस्तुत की है ।
आशा है हिंदी कथा-जगत का संवेदनशील पाठक-समाज अपने समय के इस महत्त्वपूर्ण कथाकार को किताबघर प्रकाशन की महत्त्वाकांक्षी  कथा-श्रृंखला 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' की एक कड़ी के रूप में पाकर निश्चय ही संतुष्ट होगा ।

Ramesh Bakshi

रमेश बक्षी
जन्म : 15 अगस्त, 1936
शिक्षा : एम०ए०, हिंदी (इंदौर कॉलिज, म०प्र०) के बाद भोपाल के हमीदिया कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त । बाद में गुना चले गए । साहित्यिक लेखन की शुरुआत आकाशवाणी, इंदौर से की । बाद में 'ज्ञानोदय' के संपादक होकर कलकत्ता चले गए । 1968 में 'ज्ञानोदय' छोड़कर दिल्ली पहुँचे । लघु पत्रिका 'आवेश' का संपादन । 1968 में प्रथम अंक प्रकाशित। इसके बाद 'शंकर्स गोली' (हिंदी) का संपादन किया ।
दिल्ली में अपने निवास पर ही 'टैरेस थियेटर' चलाया, जिसमें नेशनल स्कूल ऑव ड्रामा के छात्र-छात्राएँ भी बड़ी संख्या में आते, परस्पर मिल-जुलकर नाट्य-प्रस्तुतियाँ एवं शिक्षण-प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलाते।
प्रमुख कृतियाँ : हम तिनके (1963), किस्से ऊपर किस्सा (1964), अट्ठारह सूरज के पौधे (1966), बैसाखियों वाली इमारत (1967), चलता हुआ लावा (1971), खुले आम (1975) [उपन्यास]; मेज़ पर टिकी हुई कुहनियां (1963), कटती हुई जमीन (1954), दुहरी जिंदगी (1954), पिता-दर-पिता (1967), एक अमूर्त तकलीफ (1973), मेरी प्रिय कहानियां (1975) [कहानी-संग्रह]; देवयानी का कहना है (1973), तीसरा हाथी (1974), वामाचार (1975), छोटे नाटक (1976), एक नाटककार (1976), कसे हुए तार (1978), खाली जेब (1989) [नाटक]; बाहर आए हुए लोग (1976) [साहित्य दर्शन]
सत्ताईस डाउन (1975) [फिल्म]; पिता-दर-पिता, जिनके मकान ढहते हैं...., सुबह की चाय [टेली नाटक] सफर-दर-सफर, किसन चाचा के किस्से [दूरदर्शन धारावाहिक]; अभी नहीं, फिल्म [टेली फ़िल्म]; गुस्ताखी माफ (1981), अपने-जपने लतीफे [व्यंग्य]; बूमरेग [कविताएँ]; हँसत नाटक-बच्चे नाटक [बाल-साहित्य]; तिली-तितली [बाल-कहानियाँ] भुवनेश्वर की चुनी हुई रचनाएँ, हिंदी कहानी का मध्यग्रेतर [संपादन]
स्मृति-शेष : 17 अक्टूबर, 1992

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