Dus Pratinidhi Kahaniyan : Phanishwar Nath Renu

Phanishwarnath Renu

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789381467015

'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रसप्रिया', 'नैना जोगिन', 'तीर्थोदक', 'तॉबे एकता चलो रे', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'पुरानी कहानी : नया पाठ', 'भित्तिचित्र की मयूरि, 'आत्म-साक्षी', 'एक आदिम रात्रि की महक' तथा 'तीसरी कसम, अर्थात् मारे गए गुलफाम'  ।
हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

Phanishwarnath Renu

फणीश्वरनाथ रेणु
जन्म : 4 मार्च, 1921
जन्म-स्थान : औराही-हिंगना नामक गांव, जिला पूर्णिया (बिहार)
हिंदी कथा-साहित्य में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण  रचनाकार । दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत । राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी । 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्राम से एक प्रमुख सेनानी की भूमिका निभाई । 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहां की सशस्त्र क्रांति और राजनीति में जीवंत योगदान।  1952-53 से दीर्घकालीन रोगग्रस्तता । इसके बाद राजनीति की अपेक्षा साहित्य-सृजन की ओर अधिकाधिक झुकाव । 1954 में पहले किन्तु बहुचर्चित उपन्यास 'मैला आँचल' का प्रकाशन। कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज आदि विधाओं में भी लिखा। व्यक्ति और कृतिकार- दोनों ही रूपों से अप्रतिम। जीवन के सन्ध्याकाल में राजनीतिक आंदोलन से पुनः गहरा जुड़ाव । जे०पी० के साथ पुलिस दमन के शिकार हुए, तत्पश्चात् जेल गए । सत्ता के दमनचक्र के विरोध में पद्मश्री का त्याग ।

स्मृति-शेष : 11 अप्रैल, 1977

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