Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhairav Prasad Gupt

Bhairav Prasad Gupt

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  • Year: 2008

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788189859978

'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भैरवप्रसाद गुप्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'घुरहुआ', 'धनिया की साड़ी', 'कदन के नीचे', 'चाय का प्याला', 'चरम बिंदु' , 'पियानो और सोने का पिंजड़ा', 'अपरिचय का घेरा','चुपचाप', 'मंगली की टिकुली' तथा 'श्रम' ।
हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भैरवप्रसाद गुप्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

Bhairav Prasad Gupt

भैरवप्रसाद गुप्त
भैरवप्रसाद गुप्त का जन्म 7 जुलाई, 1918 को सिवानकला गाँव (बलिया उ०प्र०) से हुआ । स्कूली शिक्षा के दौरान उनका रुझान लेखन की और हुआ । अपने शिक्षक रघुनाथ राय की प्रेरणा से गुप्त जी कहानी-लेखन की ओर प्रवृत्त हुए । उच्च शिक्षा के लिए जब वे इर्विंग कॉलेज, इलाहाबाद आए तो यहीं जगदीशचन्द्र माथुर, शिवदान सिंह चौहान जैसे लेखकों एवं आलोचकों के संपर्क और साहित्यिक-राजनीतिक परिवेश में उनके रचनात्मक संस्कारों को दिशा मिली । सन् 1940 में वे गांधीजी की प्रेरणा से राजगोपालाचारी के साथ मद्रास पहुंचे और यहीं हिंदी प्रचारक महाविद्यालय में अध्यापन करने लगे । बाद में कानपुर के मज़दूर नेता अर्जुन अरोड़ा से उनका संपर्क हुआ और सन् 1944 में वे माया प्रेस, इलाहाबाद से जुड़ गए । गुप्त जी अपने अन्य समकालीनों की तरह आर्य समाज और गांधीवादी राजनीति की राह से वामपंथी राजनीति की ओर आए थे । सन् 1948 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और तमाम विघटन एवं विभाजन के बावजूद इससे संबद्ध रहे ।
'शोले' उपन्यास (1946) से अपनी रचना-यात्रा शुरू  करने वाले भैरवप्रसाद गुप्त ने प्रगतिवादी आंदोलन की अंतिम कड़ी के बतौर प्रेमचंद की तरह शहर और गाँव दोनों को अपनी रचना का केंद्र बनाया और मानवीय शोषण के छदम रूपों को उधेड़कर वर्गहीन समाज के निर्माण की राह तैयार की । नई कहानी के लिए उन्होंने अपने संपादन में निकलने वाली पत्रिकाओं-'कहानी' और ‘नई कहानियाँ' द्वारा नई प्रतिभाओं को मंच दिया । गुप्त जी ने समाज के बुनयादी वर्गों-किसान और मजदुर-को केंद्र में रखकर 'मशाल',  'गंगा मैया' (1952), 'सत्ती मैया का चौरा' (1959) और 'धरती' (1962) जैसी महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक कृतियों की रचना की। गुप्त जी के कूल चौदह उपन्यास, बारह कहानी-संग्रह और दो अन्य कृतियां प्रकाशित हैं । उनकी अन्य प्रभुख कृतियाँ हैं-'अंतिम अध्याय' (1970), 'नौजवान' (1974), 'भाग्य देवता' (1992) और 'छोटी-सी शुरुआत’ (1977) ।
स्मृषि-शेष : 5 अप्रैल, 1995 को अलीगढ़ में ।

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