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423

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  • The Kindling Touch (Paperback)
    Debabrata Dasgupta
    195 166

    Item Code: #KGP-330

    Availability: In stock

    t is not all to describe Madame Curie simply as a devoted scientist; she is a radiant milestone in the realm of modern science. Her whole life carries a divine message. The life that nurtured her, gave her feed for the mind and body, was not at all strewn with flowers. Rather, feelings of want, insecurity and doubts tried to strangle her like the tentacles of an octopus. In the dark, deep jungle of uncertainties that was her early life, where there were chances of slippage at every step, she had ventured forward with resolution and courage and finally reached her glorious destination.
  • Ek Nirvasit Maharaja (Paperback)
    Navtej Sarna
    200

    Item Code: #KGP-311

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Nayi Chunouti : Naya Avasar
    Atal Bihari Vajpayee
    400 320

    Item Code: #KGP-1920

    Availability: In stock

    नयी चुनौती : नया अवसर
    नयी शताब्दी युवकों की शताब्दी है । हजारों साल से चला आ रहा भारत आज युवा राष्ट्र बन गया है । हमारी कुल आबादी में लगभग सत्तर प्रतिशत लोग ऐसे है, जिनकी आयु पैंतीस वर्ष से क्रम है । ये युवक भी युवतियाँ पहले की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वाकांक्षी, जागरूक और सक्रिय है । वे न केवल बड़ी-बड़ी कल्पनाएँ ही करते हैं, बल्कि उन्हें साकार करने के लिए जी-तोड़ मेहनत भी करते हैं ।
    भारत की युवा पीढी से मुझे पूरा विश्वास है । हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम अपने युवक-युवतियों की पूरी-पूरी सहायता करे, ताकि वे अपना भविष्य बनाने के साथ-साथ देश का भविष्य भी बना सके ।
    भारत आगे बढ़ रहा है । आत्मविश्वास से भरा भारत प्रगति की और अग्रसर है । एक ऐसा भाल, जो सभी तरह की विषम परिस्थितियों में उसी तरह विजयी होने के लिए कृतसंकल्प है, जिस तरह से हमरे बहादुर जवानों तथा वायु सैनिकों ने दुश्मन की फ़ौज़ को खदेड़ दिया था । कारगिल युद्ध तथा उससे पहले की सभी लड़ाइयों के वीर सेनानियों के प्रति हमारे हृदय में जो कृतज्ञता का भाव है, वह सदा प्रज्वलित रहेगा । देश उनका सदैव ऋणी रहेगा । -[इसी पुस्तक से]
  • Ek Kiran : Sau Jhaniyan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    195 176

    Item Code: #KGP-676

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Asghar Wajahat
    Asghar Wajahat
    200 170

    Item Code: #KGP-9304

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    असग़र वजाहत

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार असग़र वजाहत की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘केक’, ‘दिल्ली पहुंचना है’, ‘अपनी-अपनी पत्नियों का सांस्कृतिक विकास’, ‘होज वाज पापा’, ‘तेरह सौ साल का बेबी कैमिल’, ‘शाह आलम कैंप की रूहें’, ‘शीशों का मसीहा कोई नहीं’, ‘जख्म’, ‘मुखमंत्राी और डेमोक्रेसिया’ तथा ‘सत्यमेव जयते’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार असग़र वजाहत की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।

  • Mere Saakshatkaar : Devendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    200

    Item Code: #KGP-548

    Availability: In stock


  • Chintan Karen Chintamukt Rahen (Paperback)
    Swed Marten
    80

    Item Code: #KGP-1248

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं । 
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    190 171

    Item Code: #KGP-444

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।
  • Yahin Kahin Hoti Thi Zindagi
    Ajeet Kaur
    300 240

    Item Code: #KGP-9218

    Availability: In stock

    अजीत कौर की अपनी एक खास ‘कहन’ है, जिसके कारण उनकी कहानियां बहुत सादगी के साथ व्यक्त होती हैं और पाठकों की संवेदना में स्थान बना लेती हैं। ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ उनका नया कहानी संग्रह है। पंजाबी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां विषयवस्तु से नयापन लिए हैं और शिल्प के एतबार से पाठक को अजब सी राहत देती हैं। एक एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है, न केवल पठनीयता से समृद्ध है बल्कि एक दार्शनिक वैचारिक संपदा से भी संपन्न है। अजीत कौर की रचनात्मक सुघड़ता तो सर्वोपरि है ही।
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Bazmey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    200

    Item Code: #KGP-165

    Availability: In stock

    बज्मे-ग़ज़ल
    उर्दू अदब में ग़ज़ल का क्षेत्र जितना व्यापक है, उतनी ही बडी तादाद उन शाइरों की भी  जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाया ।
    गजल शब्द के अर्थ से आज लगभग सभी परिचित है, लेकिन आज के परिवेश में ग़ज़ल की परिभाषा बदली हुई दिखाई दे रही है । इस संकलन को तैयार करते हुए यह प्रयास रहा है कि ग़ज़ल के शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त, इसके बदले हुए रूप को भी पाठकों के सन्मुख रखा जाये। इसीलिए 'बज्मे-गजल' में संगृहीत ग़ज़लें कभी परम्पराओं में बंधी नज़र आयेंगी, तो कभी इनका रूप आज़ के ज़माने को छूता हुआ दिखाई देगा ।
    उर्दू गजल आज जिस बुलन्दी पर पहुंच चुकी है, साहित्य की किसी दूसरी विधा का यहा तक पहुंच पाना शायद सम्भव नहीं; क्योंकि  गजल कहीं नहीँ जाती, बल्कि खुद-ब-खुद हो जाती है । ग़ज़ल सिर्फ इल्तिजा ही नहीं करती, ऐलान भी करती है, समझोता करना ही नहीं सिखाती, अधिकार प्राप्त करने के लिए लड़ना भी सिखाती है तथा सिर्फ फूल ही नहीं, अंगारे बरसाने का हौंसला भी देती है ।
    इस संकलन से जहां अनेक पुराने शाइरों की गज़लें दी जा रही हैं, वहीं कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी मौजूद हैं, जो आज लोगों के दिलों में घर कर रहे हैं।
  • Teesara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    180

    Item Code: #KGP-301

    Availability: In stock


  • Uttar Aadhuniktavaad Ki Or
    Krishna Dutt Paliwal
    400 320

    Item Code: #KGP-836

    Availability: In stock

    हिंदी में उत्तर आधुनिकतावाद की चर्चा को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। अब आप उसे मुंह बिचकाकर खारिज नहीं कर सकते। हिंदी में लगभग दो दशकों से यह चर्चा जारी है और गुजराती, बंगाली आदि में इससे भी पहले। हिंदी के माक्र्सवादियों ने शुरू-शुरू में ‘उत्तर आधुनिक’ चिंतन को लेकर कितना हाय-तौबा किया। अब हालत यह है कि ल्योतार, देरिदा, मिशेलफूको, बौद्रिया, पाल डी मान, सुसान सोंटाग, इहाव हसन, एडवर्ड सईद आदि के बिना अपनी बात पूरी नहीं कर पाते। और फ्रैंकफुर्त स्कूल तो माई-बाप बन गया है। दरअसल, उत्तर आधुनिकता ने ‘नवजागरण’ तथा ‘इनलाइटेनमेंट’ की विरुद्ध सीधा संघर्ष किया। उत्तर आधुनिकतावाद ने ‘तर्क’ की यूरापीय पद्धति को नकारते हुए अर्थहीन सिद्ध कर दिया है। उत्तर आधुनिकतवाद ने घोषणा की है कि वह सांस्कृतिक बहुलतावाद, बहुवचनवाद, हर तरह के वैविध्यवाद का समर्थन करता है और जो दबाए गए हैं उन पर (नारी-विमर्श, दलित-विमर्श पर) नए सिरे से विचार करने की तमन्ना रखता है। ज्ञान के क्षेत्रों में आए विकास-प्रगति के अंतःसूत्रों में ‘आधुनिकता’ का रुतबा कम हुआ है। फिर फूको ने इतिहास के संदर्भ में सोचकर कहा कि अन्य इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों ने ‘डिफरेन्स’, ‘डी मिस्टीफाई’ और ‘डिसकंटीन्युटी’ के कारकों की खोज पर ध्यान दिया हैं इतिहास और राजनीति में ‘अदर’ या अन्य की खोज बढ़ी है तथा ‘अदर’ को उपेक्षितों के सरोकारों के कंेद्र में रखने से नया केंद्रवाद बना है। बाजारवाद की अर्थव्यवस्था ने हर माल चालू, हर माल बिकाऊ की नई भूमि तैयार की है। आज उत्तर आधुनिकतावाद आकाश की तरह व्यापक धारणा है, जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। हां, थोड़ा-बहुत समझा भर जा सकता है। 
  • Himalaya Gaatha-3 (Janjati Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    600 510

    Item Code: #KGP-639

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-3 (जनजाति संस्कृति)
    न जाने कब फहराने लगीं धर्म पताकाएँ हिमप्रदेश के बीहडों में । कब बौद्ध मंत्र भोटी में गूँजने लगे । तथागत कब महाविरोचन, अक्षोभ्य, अमिताभ, अमोधसिद्धि बने । कब आए पदूमसम्भव, रत्नभद्र । इस अभियान में कौन भिक्षु त्यागी हुए । और बौद्ध  वाड़मय से पहले गुफाओं मेँ कौन लोग वास करते थे । क्या कहते हैं, हजारों वर्ष से भी पुराने ताबो मठ के पास चट्टानों पर खुदे गुफा चित्र । ये बाते अभी पूर्णतया स्पष्ट नहीं है । इतिहास ग्लेशियर में छिपी नदी की तरह है ।
    तथापि ए० एच० फ्रेंके तथा दुची जैसे यूरोपीय विद्वानो ने खोले हैं । आज तक इन्हीं का अनुसरण करते जाए शोधकर्ता । हिमालय की संस्कृति पर गंभीरता से मौलिक कार्य नहीं हुआ । कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाई है । 'आँखिन देखी’ के आधार पर संस्मरण, यात्रा और कथात्मक शैली में वर्णन इन का गुण है । सरल, सुरुचिपूर्ण और स्पष्ट भाषा में रोचकता के साथ गंभीर पहलुओं का विवेचन, वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।
    संस्कृति पर लिखने वाले ऐसे बिरले साहित्यकारों में है वशिष्ठ । जो अपनी यायावर प्रवृति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते है । संस्कृति को बहुत करीब से देखा, परखा, समझा और फिर लिखा है । किन्नौर के अंतिम गांव छितकुल और नसज्ञा से लेकर चम्बा के साच दर्रे से होकर सुदूर पांगी तक पैदल यात्राओं के बाद यहाँ की अनूठी संस्कृति पर लेखनी चलाई है ।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत तीसरे खंड में हिमाचल के किन्नौर, लाहौल स्थिति और पांगी-भरमौर जैसे दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों की संस्कृति पर अछूती सामग्री दी जा रही है ।
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    425 340

    Item Code: #KGP-248

    Availability: In stock

    अथर्ववेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की अन्तिम कड़ी ‘अथर्ववेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें अथर्ववेद के 120 मन्त्रों को दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। अथर्ववेद की विषयवस्तु अत्यन्त रोचक तथा विविधता लिए हुए है। यही नहीं--ज्ञान, शिक्षा तथा गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर भी यहाँ प्रकाश डाला गया है। परिवार में अतिथि की महत्ता का उल्लेख हुआ है तो अन्य पारिवारिक सम्बन्धों की समरसता का महत्त्व बताया गया है। शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य दोनों ही जीवन में रहते हैं। अथर्ववेद का यथार्थवाद दोनों का वर्णन भी करता है तथा अशुभ से, पाप से मुक्ति की राह बताता है, प्रायश्चित्त का विधान भी करता है।
    यद्यपि व्यक्तिगत सौख्य के लिए यहाँ शत्रुनाशविषयक मन्त्र भी हैं तथा कुछ जादू-टोने जैसी क्रियाएँ भी वर्णित हैं परन्तु तब भी समष्टिगत कल्याण की उपेक्षा नहीं हुई है। आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ होने के नाते यहाँ रोगों के नाम, लक्षण तथा उपचार विधियाँ वर्णित हैं। इन विधियों की विविधता व्यक्त करती है कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद के ऋषि कितना सजग थे। वनस्पतियों, औषधियों के नाम, उनके गुण तथा रोग-विशेष में उनके उपचारात्मक प्रयोग भी बहुधा वर्णित हुए हैं।
    राजनीति पर यहाँ विशिष्ट सामग्री उपलब्ध है। राजा, उसकी सेना, अस्त्र-शस्त्र, युद्धनीति और शत्रुनाशपरक प्रार्थनाओं का अपना महत्त्व है। विभिन्न वृक्ष, लताओं, वनादि के वर्णन तथा जल, वायु को सम्बोधित सूक्तों से पर्यावरण- विषयक चिन्तन झलकता है। ‘भूमिसूक्त’ में प्रथम बार ‘धरती माँ’ का उल्लेख है--‘माता भूमिः पुत्रोअह पृथिव्याः’--‘भूमि माता है मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।’ यह माता-पुत्र के गहन सम्बन्ध धरती का पर्यावरण संरक्षण करता है तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए सन्नद्ध भी करता है। सबके भीतर दिव्यता है, सब प्रेमभाव से जुड़े हैं, जुड़े रहें। विश्व संरक्षण, विश्व कल्याण के तत्त्व सत्य, ऋत, दीक्षा, ज्ञान, तप, यज्ञादि हैं। आतंक हिंसा से जूझते विश्व में अभयता का साम्राज्य हो--यही कामना व्यक्त हुई है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो ‘मन से युवा’ हैं तथा प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को आधुनिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Naav Doobne Se Nahin Darati
    Leena Malhotra
    200 180

    Item Code: #KGP-423

    Availability: In stock

    कभी-कभी तो ऐसा लगता है, प्रगतिशील कवियों ने बात-बात पर तन जाने वाली जो बेटियाँ साहित्य को दीं, बड़ी होकर वे सब लीना-जैसी (मीठी फटकार लगाने और सात्त्विक आक्रोश दिखाने में निपुण) स्त्री-कवि बन गईं। 
    लीना और फटकार? एक झलक में बात बनती नहीं जान पड़ती! इतनी संजीदा लड़की और फटकार? ये तो भरमुँह किसी से बोलतीं भी नहीं। ये नहीं बोलतीं पर इनकी कविताएँ तो बोलती हैं न-आपके मन पर पड़ी सब चट्टानों की आखिरी परत तक से इनका दो-टूक संवाद हो जाता है, और उनकी फॉसिलों में दबके पड़े स्नेह के सोते एकदम से फूट जाते हैं। 
    एक महीन अर्थ में प्रायः सारी कविताएँ राजनीतिक हैं-हर अन्याय को तमाशे की तरह देखते, आपके ही भीतर छुपे उस टुच्चे आदमी को धता बतातीं कविताएँ जिसे एक प्रगतिसिद्ध कवि बरजता रहा था: कभी अभिधा, कभी व्यंजना, कभी लक्षणा में! लीना में व्यंजना का स्वर अधिक प्रबल है और सबसे बड़ी बात ये है कि शायद ही कहीं वे इकहरी होती हैं! लीना-जैसी सांद्र ऐंद्रिकता की प्रेम- कविताएँ भी कम ही स्त्री-कवियों ने लिखी हैं। स्त्री-नागरिकता और स्त्री-फैंटेसी के अनेक रंग आपको इस संग्रह में एक साथ मिलेंगे।  
    -अनामिका
  • Udaanein Oonchi Oonchi
    Krishna Agnihotri
    350 280

    Item Code: #KGP-9377

    Availability: In stock

    कृष्णा अग्निहोत्री वरिष्ठ रचनाकार हैं उन्होंने कहानी, उपन्यास तथा आत्मकथा आदि विधाओं में अपने लेखन से पाठकों को प्रभावित किया हैं उनकी सर्वोपरि विशेषता है-स्पष्टता, पठनीयता और बेबाकी। यह कहानी संग्रह पढ़ते हुए पाठक अनुभव करेंगे कि जीवन के साथ रचना का भी एक लंबा अनुभव यहां आकार ले रहा है।
    इन कहानियों में जीवन के विविध आयाम व परिवेश हैं। आदिवासी भी कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। उल्लेखनीय यह है कि प्रत्येक कहानी अपनी विशेष मौलिकता से पूर्ण है। भाषा सरल पर ग्राह्य एवं अर्थपूर्ण है। समस्त लेखन मनोरंजन के साथ सोद्देश्यपूर्ण सार्थकता से भरपूर व संवेदनाओं की कसौटी पर खरा है।
  • Agyey Se Saakshatkaar
    Krishna Dutt Paliwal
    495 396

    Item Code: #KGP-9004

    Availability: In stock

    अज्ञेय से साक्षात्कार
    सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन से लिए गए ये साक्षात्कार पिछले पाँच दशकों के दौरान की उनकी वैचारिक यात्रा को प्रस्तुत करते हैं। अज्ञेय की गणना भारतीय भाषाओं के मूर्धन्य रचनाकारों, संपादकों और आलोचनात्मक निबंधकारों में होती है। हिंदी साहित्य के आधुनिक मूर्तिभंजक अलीकी रचनाकारों में उन्होंने अपने सृजन-मुहावरे से युग-प्रवर्तन किया है। साहित्य जगत् में रवीन्द्रनाथ और टी० एस० इलियट की तरह उनके सृजन और चिंतन का युगांतरकारी महत्त्व है। उनके रचना-कर्म से परिचित प्रबुद्ध पाठक जानते हैं कि जैसे उन्होंने कविता को नए मोड़, नया बौद्धिक मुहावरा दिया, वैसे ही उन्होंने उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना, डायरी, यात्रावृत्त, पत्रकारिता तथा इंटरव्यू आदि विधाओं में एक अभिनव क्रांति की है।
    अज्ञेय अपने समय के विवाद-पुरुष और विवाद- नायक रहे हैं। सबसे ज्यादा विवाद-संवाद ‘तारसप्तक’ तथा ‘सप्तकों’ की भूमिकाओं को लेकर हुआ। पिछले साठ-पैंसठ वर्षों में शायद ही कोई ‘भूमिका’ इतनी विचारोत्तेजक और नए विवादों को जन्म देने वाली रही हो-जितनी कि ‘तारसप्तक’ की भूमिका। कवि-कर्म से संबंधित जितनी अवधारणाएँ, चिंतन और वाद-विवाद पिछले छह दशकों में पैदा हुए हैं उनका केंद्र ‘तारसप्तक’ ही है। ‘प्रयोग’, ‘परंपरा’, ‘आधुनिकता’, ‘काव्य-सत्य’, ‘जटिल संवेदना’, ‘काव्यानुभूति’, ‘काव्य-भाषा’, ‘काव्य- प्रतीक’, ‘काव्य-बिंब और लय’ आदि को लेकर तमाम बहसें उठ खड़ी हुईं। उनका उत्तर अज्ञेय को निबंध लिखकर या ‘साक्षात्कार’ देकर देना पड़ा। कथा-साहित्य में ‘शेखर: एक जीवनी’ को लेकर तो तूफान ही खड़ा हो गया। इस उपन्यास की प्रतियाँ जगह-जगह जलाई गईं, लेकिन अज्ञेय न रुके, न झुके और कथा-साहित्य में नए से नए प्रयोग किए।
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    140

    Item Code: #KGP-7020

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।   
  • Aashcharya Ki Tarah Khula Hai Sansar
    Nilesh Raghuvanshi
    290 247

    Item Code: #KGP-551

    Availability: In stock

    आश्चर्य की तरह खुला है संसार 
    आधुनिक कवियों में अशोक वाजपेयी अरसे से प्रेम के एकाधिकारी कवि बने हुए हैं और यह उत्सवता सत्तर पार की उनकी शब्दचर्या में भी उतना ही दखल रखती है जितना कभी उनके युवा समय में। सच कहें तो प्रेम का कवि कभी बूढ़ा नहीं होता। वे कभी यह नहीं भूलना चाहते कि जीवन राग-अनुराग, सौन्दर्यबोध और सौष्ठवता का प्रफुल्ल विस्तार है।
    अशोक वाजपेयी के यहाँ प्रेम का यूटोपियाई स्वप्न नहीं देखा गया है बल्कि वह उनके लेखे जीवन का अध्यात्म है। उसे भाषा में खोजना व्यर्थ है क्योंकि वह शब्दों के बीच की चुप्पियों में/चाहत के अर्धविरामों में/संकोच के विरामों में/प्रेम की असम्भव संस्कृत में बसता है। रति से उनकी कविता की अनुरक्ति पुरानी है। रतिमुक्त प्रेम के बारे में कविता लिखना आसान है जबकि रति के रूपक रचना कठिन। अशोक वाजपेयी ने रति के सुघर और शिष्ट विन्यास में सफलता पाई है। इसीलिए कविता की लम्बी पारी खेलने वाले वाजपेयी के प्रेम और रति के रूपकों को भाषा के नेपथ्य में कौंधती अन्तध्र्वनियों में ही महसूस किया जा सकता है।
    कविता व ललित कलाओं के भव्य भुवन में रमते हुए अशोक वाजपेयी को कोई अर्धशती से ऊपर होने को आए। सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़ने वाला वह युवा अब अपनी परिपक्व वयस् में है। उसकी कविता एक अकेले की सृष्टि लगती है जहाँ वह सदियों से कवि-परंपरा को गाता चला आ रहा है। यह कवि अज्ञेय की तरह सुरुचिवान है तो श्रीकांत वर्मा की तरह स्मृतिसंपन्न। मुक्तिबोध के प्रति उसमें अनन्य अनुराग और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है। गोष्ठियों-सभाओं-अनुष्ठानों- महफिलों का यह निर्विकल्प नायक शब्दों का कुशल कारीगर है। वह देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण की तरह जैसे अनंत समय से आदि कवि का ऋण अदा कर रहा है।
    अशोक वाजपेयी की कविता की तहें वैसे ही खुलती हैं, जैसे आश्चर्य की तरह खुलता है संसार। उन्हें पढ़ते हुए अकसर लगता है कि हम कविता की किसी साफ-सुथरी कालोनी से होकर गुजर रहे हैं जहाँ की आबोहवा हमारे निर्मल चित्त को एक नई आनुभूतिक बयार से भर रही है। यह नया रचने की उत्कंठा है जो उनसे कहलवाती है: मैं उम्मीद को दूसरे नाम से पुकारना चाहता हूँ/मैं इस गहरी कामना को एक उपयुक्त संज्ञा देना चाहता हूँ/मैं पलटता हूँ कामना का कोश/एक नया शब्द पाने के लिए। जो कवि अपनी माँ को महसूस करते हुए लिख सकता है: तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं, तुम्हारे होठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है, तुम्हारी उँगलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं-वह अपनी कविता को सदैव नई बोली, नए स्पर्श देने के लिए प्रतिश्रुत रहेगा, इसमें संशय नहीं। अशोक वाजपेयी की कविताएँ-प्रेम कविताएँ बार-बार एक नया शब्द पाने, रचने और गढ़ने का उद्यम हैं।
    यह संग्रह अशोक वाजपेयी की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shailesh Matiyani
    Shailesh Matiyani
    180 162

    Item Code: #KGP-9181

    Availability: In stock

    अब वह सड़क पर था और उसकी आंखें रामचन्दर हलवाई के कारीगर के जलेबी बनाते हाथ के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थीं और भूख इतनी तीखी हो चुकी थी कि वह बदहवासी अनुभव कर रहा था। अपनी इस तरह की बदहवासी से रामखिलावन को डर लगता है। ऐसे में अक्सर उसे-चोरी सूझती है और इसी में वह कई बार बुरी तरह पिट भी चुका है।
    इस बार खाट पकड़ लेने से पहले तक उसकी मां कई घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने की नौकरी करती रही थी। कभी-कभार उसे भी साथ ले जाती वह। मौका ताड़कर घर के बच्चों की रंगीन किताबें पलटने लगता और अपनी पूर्व-स्मृति से काम लेता, जोर से पढ़ता-लौ-औ-ट-पौ-औ-ट-तो वह कैसे चोंककर देखती थी? खिलावन का यह अक्षरज्ञान उसमें एक आलोक उत्पन्न करता मालूम पड़ता था।
    फटे-पुराने कपड़ों के अलावा, बचा-खुचा खाना और त्योहारों पर कभी पूरी-मिठाई। लगभग डेढ़ महीने से मां काम पर नहीं जा पाई, ए.जी. आफिस वाले शुक्ला साहब के यहां। अकेले गया था वह। किसी बड़ीह चीज के लिए गुंजाइश नहीं रहती। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त शुक्लाइन उसके पूरे जिस्म पर अपनी भैंगों आंखों को उंगलियों की तरह फिराती रहती हैं। बरतन धोते में सिर्फ दो छोअी चम्मचें उसने जांघिये की जेब में डाल ली थीं, हालांकि खुद उसके दिमाग में ही कुछ तय नहीं था कि उनका वह क्या उपयोग कर पाएगा। जाने की उतावली में वह ‘बहूजी, हम जाइत हैं’, की आवाज लगाने के साथ-साथ, तेजी से दरवाजे तक पहुंच गया था। तभी शुक्लाइन का चटख लाल चूड़ियों से भरा पंजा उसके जांघिये की जेब पर पड़ा था और बदहवासी में उसके मुंह से चीख निकल गई थी।
    -इस पुस्तक की ‘चील’ कहानी से
  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • The Luck Of The Jews (Novel)
    Michael Benanav
    595 476

    Item Code: #KGP-893

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Grih Daah (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    100

    Item Code: #KGP-1370

    Availability: In stock


  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Kaali Dhar
    Mahesh Katare
    550 440

    Item Code: #KGP-KALI DHAR HB

    Availability: In stock

    जमादारिन की हवेली बीसियों साल से बंद थी। साल में एकाध बार उनका बेटा आगरा से आता। विशेषतः दीपावली से पहले आकर वह दो-चार दिन ठहरता। कलई-चूने से मंदिर की पुताई-सफाई करवाता और लौट जाता। अटारी आकर वह सेठ की हवेली में ही ठहरता। सेठ के लड़केपोते उससे छुआछूत वाला व्यवहार नहीं करते थे। अगली पीढ़ी को हवेली की आवश्यकता न थी। इस बीहड़ में कौन बसतातालों की चाबियाँ सेठ परिवार के पास थीं। हवेली में एक छोटा सा द्वार पीछे बीहड़ों की ओर भी खुलता थाजिसमें से होकर बागियों के गिरोह हफ्रतों हवेली में पड़े रहते और चौमासे अर्थात् बरसात में तो महीनों। सबको पता था। पुलिस की गश्त भी यदा-कदा सामने के द्वार पर जड़े ताले को देखती हुई निकल जाती थी। गिनती का पुलिस-दल डाकुओं से टकराने का खतरा कैसे उठाएबागी भी सामान्यजन को परेशान नहीं करते थे। उनके निशाने पर तो दुश्मनधनवान अथवा मुखबिर आता था। रसद लाने वाले को पूरा पैसा चुकाते थे बागी।

    लाला जी ने सेठ श्रीलाल के वंशजों से संपर्क किया। जमादारिन के पुत्र से अनुमति ली तो ठाकुर ने दाऊ मानसिंह को समस्या का पहलू समझाया। मानसिंह का गिरोह ही उस समय सबसे प्रभावशाली था। वह कड़ाई से बागी-धर्म के नैतिक नियमों का पालन करते थे। कुल मिलाकर आठ दिन में ऊपरी औपचारिकता पूरी हो गई एवं आठ दिन सफाई आदि के जरिये हवेली को बसने योग्य बनाने में लगे। इस तरह अम्मा ठाकुर जमादारिन की हवेली में रहवासी हो गईं। नवाब ठाकुर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लाला भभूती लाल ने कुछ विशेष व्यवस्था भी कर दी। 

    -इसी उपन्यास से। 

  • Kavi Ne Kaha : Vishwanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    190 171

    Item Code: #KGP-386

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    मेरी कविताओं में ऐसे शब्द, बिंब या प्रतीक अधिक हैं जो भोगते हुए या जूझते हुए मनुष्य से संबंधित है । मैं गरीब देहाती दुनिया से जाया हुं और मेरे शुरू के बीस वर्ष उस अनाथ साधनहीन मनुष्य के बीच गुजरे जिसे बार-बार अपमानित होते, यातनाएं सहते देखा है । मेरी कविताओं में 'हत्या' और उससे मिलती-जुलती शब्दावली में जो आतंक है, वह मेरे बालमन पर पडे प्रभावों की ही प्रतिक्रिया है । मेरी कविताओं में 'अंधकार' और 'रात' के बिंब भी अधिक हैं जो एक अनार मेरे अकेलेपन की अतृप्ति को व्यक्त करते है तो दूसरी खार उस अंधकारमय दबाव को जिसे आज का साधनहीन मनुष्य भोग रहा है । मेरी कविताओं में पहाडी परिवेश अधिक मिलेगा । पहाड़ के प्रति मेरा गहरा आकर्षण है और मृत्यु-भय से आतंकित होते हुए भी मैंने पहाडी यात्राएं बहुत की हैं । हिमालय का परिवेश मेरी प्रेम कविताओं में कहीँ-कहीं प्रेमिका के साथ एकाकार हो गया है । कुछ शब्दों के सदंर्भ से प्रयोक्ता और ग्रहीता के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है । अपनी कविताओं के प्रसंग में कहूं तो उनमें 'इतिहास', 'धारा', 'अंधकार', 'घाटी', 'जंगल', 'पहाड़' आदि अनेक शब्द अपना विशिष्ट अर्थ रखते है ।
    'बेहतर दुनिया के लिए' और 'आखर अनंत' नामक संग्रहों की बहुत-सी समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी है । इन संग्रहों के बारे में अपनी ओर से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इनमें मेरी रचनात्मक भाषा  परित्कृत हुई है और कविताओं को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मिला है । आत्मीय का भी और लोक का भी ।
  • Maalish Mahapuran
    Sushil Sidharth
    300 255

    Item Code: #KGP-782

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    [इसी पुस्तक से]
  • Jodadighi Ke Choudhary
    Pramath Nath Vishi
    125

    Item Code: #KGP-2010

    Availability: In stock

    जोड़ादीघी के चौधरी
    बंगला के लब्धप्रतिष्ठ ठषप्यासकार प्रमथनाथ  विशी के इम उपन्याम को बंगला साहित्य में  विशिष्ट स्थान प्राप्त  ।
    इम ऐतिहासिक उपन्याम में लेखन ने ईस्ट  इंडिया कम्पनी के दौर से बंगाल के जमीदारों  की जघन्यताओं का हृदय-द्रावक चिंब प्रस्तुत किया है । पारम्परिक हिंसा-प्रतिहिंसा, प्रतिशोध  एवं पलासी के युद्ध में बंगाल की दारुण अंतरंग  व्यवस्था की रोमांचपूर्ण गाथा इस उपन्याम्र का आधार है.... 
    आज के सन्दर्भ में यह उपन्यास इसलिए भी, महत्वपूर्ण  कि इसमें उस शास्त्रग्राही बंगाल के अतीत की वह झाँकी मिलती है जो हम आज प्रत्यश्न बंगला देश की मुक्तिवाहिनी में  देख रहे  है ।
  • Paisa Aapka Bhavishya Aapka (Paperback)
    Ajay Shukla
    175 158

    Item Code: #KGP-7220

    Availability: In stock

    ‘अर्थ’ (धन) इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसे ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ में शामिल किया गया है। कोई भी युग हो, कोई भी देश, कोई भी सभ्यता हो या कोई भी संस्कृति—रुपयों के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन रहा है। आज तो चारों ओर पैसे का बोलबाला है। उसकी चमक और खनक के सामने सब फीका है। ...और यह जरूरी भी है कि सुखपूर्वक जीवन की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास यथेष्ट पैसा हो।
    प्रश्न है कि पैसा किस तरह बचाया और बढ़ाया जाए। सीमित आय वालों को ‘मनी मैनेजमेंट’ सिखाने के लिए ही अजय शुक्ला ने पैसा आपका भविष्य आपका नामक पुस्तक लिखी। आसान भाषा और दिलचस्प शैली में यह पुस्तक पाठकों को बताती है कि छोटी-छोटी बचतों और कुछ सावधानियों से भविष्य के लिए पैसा बचाया जा सकता है। बुढ़ापे में जब कमाने की शक्ति नहीं रहती, अनेक तरह की हारी-बीमारी घेर लेती हैं और कई बार जब अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं तब बचाया हुआ पैसा ही काम आता है। किसी ने कहा है कि पैसा भगवान् तो नहीं है, पर भगवान् से कम भी नहीं है।
    प्रस्तुत पुस्तक को जिन अध्यायों में संयोजित किया गया, वे हैं—बचत प्रबंधन, बीमा, इंटरनेट का प्रयोग, मुद्रास्फीति, आयकर, निवेश के मूल सिद्धान्त, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, निवेश के साधन, स्वर्ण में निवेश, घर/प्राॅपर्टी में निवेश, पोर्टफोलियो बनाना, वसीयतनामा, रिटायरमेंट प्रबंधन। इन अध्यायों को पढ़कर सुखी, निश्चिंत  व धन संपन्न भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
  • Mere Saakshatkaar : Rajendra Yadav
    Rajendra Yadav
    300 249

    Item Code: #KGP-858

    Availability: In stock


  • Shiksha Mein Moolyon Ke Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    340 272

    Item Code: #KGP-896

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं तथा संबंधों में हो रहे बदलाव को देखने और परखने के लिए आवश्यक दृष्टिकोण परिवर्तन क्यों और कैसे संभव है, इसे समझने का प्रयास किया गया है । इसके बाद शैक्षिक पाठ्यक्रम पर समग्रता से निगाह डालते हुए पाठ्यक्रम परिवर्तन की आवश्यकता तथा उसके मूल तत्त्वों पर चर्चा की गयी है । इसमें उस प्रकार की पाठ्यसामग्री के सम्बन्ध में भी चर्चा हैं, जो पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध है तथा जिसमें अन्य मूल्यों के साथ परिवार तथा पीढ़ियों के संबंधों के विभिन्न पक्षों पर विवेचना की जा सकती है – केवल उसे पहचानने तथा विद्यार्थियों को उचित समय पर तथा उचित विधि से इंगित करने की आवश्यकता होती है । यदि वह नहीं है या काम है तो अध्यापक कैसे तथा किन स्रोतों से उसे ढूंढ़ सकता है तथा शिक्षण में शामिल कर सकता है । 
  • Malyalam Ke Mahaan Kathakaar : Srijan-Samvaad
    Dr. Arsu
    200

    Item Code: #KGP-902

    Availability: In stock

    मलयालम के महान कथाकार : सृजन-संवाद
    अन्तर्सबंधों की मजबूती से ही संस्कृति टिकाऊ बनेगी । कला और संस्कृति के माध्यम से ही यह प्रक्रिया संभव  होगी । भाषायी अजनबीपन के कोहरे को मिटाने पर ही मानवीय सोच-संस्कार का क्षितिज विशाल बनेगा ।
    बहरहाल भाषायी कठमुल्लेपन को हटाकर हम हिंदी को सर्वभारतीयता का प्रतीक बनाना चाहते हैं । उसके लिए भाषायी भाईचारा पहले मज़बूत बने । उत्तर-दक्षिण का खुला संवाद इसका एक रास्ता है ।
    यह कृति मलयालमभाषी हिंदी लेखक डॉ० आरसु की साहित्यिक तीर्थयात्रा का परिणाम है । इसके पीछे एक विराट लक्ष्य है । यह भाषायी समन्वय का कार्यक्षेत्र है । सुदूर दक्षिण के प्रांत केरल में रहकर कई साहित्यकारों ने अमर कृतियाँ लिखी हैं । उनकी कृतियां भी राष्ट्र भारती की संपदा हैं ।
    तकषी शिवशंकर पिल्लै, एस०के० पोटटेक्काटट और एम०टी० वासुदेवन नायर को इस भाषा में कृतियां लिखकर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था । उनके समानधर्मी और भी कई कथाकार हैं ।
    सृजन-क्षण की ऊर्जा, उन्मेष और उलझन पर उनके विचारों से अवगत होने के लिए अब हिंदी पाठकों को एक अवसर मिल रहा है । दक्षिण भारत की एक भाषा के साहित्यकारों के साक्षात्कार पहली बार एक अलग पुस्तक के रूप में हिंदी पाठकों को अब मिल रहे हैं ।
    मलयालम के बीस कथाकारों के हृदय की नक्षत्रद्युति यहाँ हिंदी पाठकों को मिलेगी । कुछ विचारबिंदु वे अवश्य आत्मसात् भी कर सकेंगे। हिंदी भेंटवार्ता के शताब्दी प्रसंग में प्रकाशित यह कृति एक कीर्तिमान है । इस कृति के माध्यम से मलयालम और हिंदी हाथ मिलाती हैं । दक्षिण के हृदय को उत्तर समझ रहा है । यह सांस्कृतिक साहित्यिक समन्वय की एक फुलझड़ी है ।
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Meethi Neem (Paperback)
    Kusum Kumar
    240 216

    Item Code: #KGP-389

    Availability: In stock


  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh (Paperback)
    Kedarnath Singh
    90

    Item Code: #KGP-1307

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रहीं है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Vajpayee Rachna-Sankalan (Set Of 7 Books)
    Atal Bihari Vajpayee
    1420 1136

    Item Code: #KGP-7235

    Availability: In stock

    वाजपेयी रचना-संकलन 
    7 चर्चित एवं प्रमुख वैचारिक पुस्तकें
  • Mera Jamak Vapas Do (Paperback)
    Vidya Sagar Nautiyal
    150

    Item Code: #KGP-7073

    Availability: In stock


  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-2
    Balram
    350 298

    Item Code: #KGP-832

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-2
    जैसी लघुकथाओं की कल्पनाएं और कामनाएं हम आठवें-नवें दशक में करते रहे, वैसी लघुकथाएं लिखते रहे हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ, मध्य प्रदेश के पवन शर्मा और उन्नी, उत्तर प्रदेश के असग़र वजाहत, गंभीरसिंह पालनी, पंजाब के तरसेम गुजराल और कमलेश भारतीय, बिहार के चंद्रमोहन प्रधान, जम्मू के ओम गोस्वामी, राजस्थान के मोहरसिंह यादव, हसन जमाल और महाराष्ट्र के दामोदर खड़से, लेकिन कितना क्रूर मजाक हुआ हिंदी लघुकथा के साथ कि लघुकथा के स्वयंभू मसीहाओं ने इन तेजस्वी कथाकारों की लघुकथाओं पर प्रायः नजर ही नहीं डाली, डाली भी तो उन पर चर्चा नहीं की और चर्चा की भी तो निगेटिव। कई कथाकारों को ‘बाहरी’ कहकर उनके लघुकथा-लेखन को खारिज करने की कोशिश की। इन सशक्त लेखकों की लघुकथाओं के सामने उनकी लघुकथाएं रखते ही उनकी अल्पप्राणता उजागर हो गई, लेकिन अब अच्छे और सच्चे रचनाकारों की लघु- कथाओं के इस संकलन में आ जाने से उन पर चर्चा और समीक्षा के क्रम को रोका नहीं जा सकेगा। अब प्रेमचंद, प्रसाद एवं राजेंद्र यादव जैसे कहानीकारों की भी लघुकथाएं हमारे सामने हैं। उन अल्पप्राण प्रतिभाओं के कारण ही शायद कोई भला आदमी इधर आने और काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, लेकिन बीसवीं सदी के बीतते न बीतते प्रमुख कथाकारों की लघुकथाओं के प्रस्तुत संचयन को देखकर पाठक कह सकते हैं : कौन कहां कितने पानी में, सबकी है पहचान मुझे। ऐसी बातें कहने के लिए बाध्य कर देने वाले कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ की यादगार लघुकथा ‘पहाड़ पर कटहल’ पढ़कर एक पुरानी बात सही जान पड़ने लगी है कि महान् रचनाएं ही आलोचक को लुभाती हैं और वही उसे प्रेरित करती हैं कि वह उनका विश्लेषण करे, रचनात्मकता की हर संभव ऊंचाई के संदर्भ में उन्हें देखे-परखे और पाठकों को बताए कि कौन लेखक कितना बड़ा है, दूसरे उससे छोटे, और कितने छोटे, बल्कि नगण्य क्यों हैं? प्रस्तुत संचयन हिंदी लघुकथा की आलोचना के मान-प्रतिमान गढ़ने लायक बहुत-सी उत्तम रचनाओं का ऐसा दुर्लभ खजाना है, जो हिंदी में इससे पहले कभी भी और कहीं भी उपलब्ध नहीं था। उम्मीद है कि पाठक इसे संजोकर रखेंगे अपने पास, अपने साथ।
  • Khabar
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    1150 805

    Item Code: #KGP-584

    Availability: In stock

    अपने कथ्य को कम शब्दों में रखना वंद्योपाध्याय की विशेषता है। वह अकारण शब्दों को विस्तृत नहीं होने देते। जब वह जगदंबा द्वारा पत्नी पर मार-काट सामने लाते हैं, जबान को बहुत फैलने नहीं देते। कथा में परेशान विनायक सामने आता है। उपन्यास में जब कथा आगे चलती है, अलग किस्म के अनेक पात्र सामने आ जाते हैं। उपन्यास में असंख्य पात्र हैं। इन्हीं से उपन्यास अपना आकार पाता है। कथा के असंख्य चरित्र आते और जाते हैं, और वे फिर आ जाते हैं। विनायक के बाद मुख्य चरित्र है नैना। दूसरे तमाम बिहारीपुर के लोगों के माफिक वह एक औरत है, जो सबसे अलग है। अंत में विनायक का एकदम चले जाना एक विराट् घटना है। हम महसूस करते हैं बिहारीपुर की हंसी अब हलकी हो गई। बस, बिहारीपुर फिर भी इसी तरह चलता रहता है।
    -द टाइम्स ऑफ इंडिया

    उपन्यास की घटनाएं रोचक ढंग से सामने आती हैं। ‘मालगुडी डेज़’ की तरह उपन्यास आगे और पीछे जाता रहता है। उपन्यास के तमाम पात्र अपने-अपने तरीके से सामने तो आते हैं, लेकिन कई बातें एकदम अलग हैं। उपन्यास के प्रत्येक अंश में कई बातें एकदम नहीं होतीं, जिससे कथा एकदम बदल जाती है। दूरदर्शन के धारावाहिक ‘नुक्कड़’ में भी इसी तरह बनती और टूटती है। 
    -इंडियन एक्सप्रेस

    खबर
     की तमाम बातें स्थानीय भाषा और लहजे पर सामने आती हैं। कथा में कुछ लोग तो मेहनतकश हैं, कुछ भंगी हैं, कुछ हैं स्थानीय गुंडे और शराबी। गरीबी की मार लोगों पर इतनी ज्यादा है कि वे चटपटी बातों के अलावा कुछ और देख या सुन नहीं पाते। उपन्यास के पात्र परशुराम वैद्य और मुरारी डॉक्टर अपने हिसाब से काम कर रहे हैं। विनायक के कर्म को छोटा करने के लिए वे जब तब मिलते और सोचते रहते हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र विनायक जो एक श्रम संगठन का नेता है और होम्योपैथी का डॉक्टर। कोई ध्यान नहीं देता। विनायक का भद्र आचरण उसे बहुत दूर शायद ले नहीं जाता। वो बिहारीपुर के कौशल्या भवन के बीच अपने परिचय के साथ बहुत कुछ देखता रहता है। लेखक एक शहर के तमाम गरीबों पर अलग-अलग अनुभव प्राप्त करता रहता है। अपने अनुभव से वो देखता है एक नया संसार।
    -संडे

    इस उपन्यास के भीतर असंख्य चरित्र, तमाम घटनाएं और बिहारीपुर के ढेर सारे लोग और उनकी कथाएं हैं। इसके भीतर तमाम लोग किसी न किसी बहाने कथा में आते रहते हैं। कथा के बीच विद्यानिवास तिवारी जो एक प्राथमिक स्कूल का शिक्षक है और संभवतः एक ज्योतिषी भी। पात्र की बेटी जानकी एक शराबी के प्रेम में डूब जाती है। वह एक पहलवान भी है। नाम है लुक्का। जिस पर कोई न कोई जुड़ा हुआ है। उसमें कोई गांजे का दम भरता है। साथ हैं भोलानाथ गिरी। आगे है नौरंगीलाल अपने ढंग से चलने वाला ‘एडवोकेट साहिब’, जो एक जिले की कचहरी में एक छोटा-मोटा क्लर्क-भर है, जिसकी तमाम बातें घड़ी के पेंडुलम की तरह हिलती रहती हैं। इसका एक केंद्रीय चरित्र विनायक तमाम पात्रों और घटनाओं को देखता रहता है। और उसके बाद आती है नैना, मेम के चरित्र में जो उपन्यास को अपने ढंग से गढ़ती और तोड़ती रहती है। यह उपन्यास अलग-अलग घटनाओं को जिस प्रकार संजोता है वो एक अभूतपूर्व अनुभव है।           
    -इंडियन रिव्यू ऑफ बुक्स

  • Yug Pravartak Swami Dayanand
    Lala Lajpat Rai
    290 261

    Item Code: #KGP-815

    Availability: In stock


  • Anandmay Jeevan Kaise Payen
    Swed Marten
    200

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Om Prakash Valmiki
    Om Prakash Valmiki
    175

    Item Code: #KGP-432

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : ओमप्रकाश वाल्मीकि
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘बैल की खाल’, ‘अम्मा’, ‘बंधुआ लोकतंत्रा’, ‘पीटर मिश्रा’, ‘शवयात्रा’, ‘छतरी’, ‘घुसपैठिए’, ‘प्रमोशन’, ‘बपतिस्मा’ तथा ‘पच्चीस चैका डेढ़ सौ’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    250 225

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh (Paperback)
    Mohan Rakesh
    90

    Item Code: #KGP-1359

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मोहन राकेश
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकु' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Veerendra Mishra : Geet-Samagra-(4 Vols.)
    Pradeep Pant
    2500 1875

    Item Code: #KGP-816

    Availability: In stock

    वीरेन्द्र मिश्र : गीत-समग्र (4 भागों में)
    नई कविता के आगमन के साथ काव्य-जगत् का पूरा परिदृश्य बदल गया । कारण कि छंदमुक्त कविता ने गीत को सबसे अधिक प्रभावित किया । यद्यपि नई कविता के अनेक कवियों ने स्वयं भी गीतो की रचना की और छंदों का सहारा लिया, किंतु नई कविता के उदय के साथ ही गीत की उपेक्षा भी आरंभ हो गई । गीत के उपेक्षित होने के अपने कारण भी थे । जैसे कि गीत के नाम पर तुकबंदी हावी होती गई, गीत प्रायः रूमानियत तक सिमट गया, उसने अपने को मंच या कवि-सम्मेलनों तक सीमित कर लिया । कालांतर में नई कविता के बाद जो कविता सामने आई, उसके चलते गीत और भी उपेक्षित हुआ, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नई कविता के बाद की छंदमुक्त कविता प्राय: नई कविता की रूढि बनकर रह गई और आज तो ऐसी अधिकांश कविताएँ कवियों के सपाट वक्तव्य सरीखी प्रतीत होती हैं । बहरहाल कविता के रूप-स्वरूप के परिवर्तन के दौर में कुछेक कवि समस्त ऊर्जा और सर्जनात्मकता के साथ गीतों की रचना करते रहे । वीरेन्द्र मिश्र ऐसे ही कवियों में है, बल्कि वे गीतों के प्रमुख और अत्यंत स्मरणीय रचनाकार हैं। इसका मुख्य कारण है उनकी गहरी सामाजिक संलग्नता और प्रगतिशील सोच, जिस वजह से वे किशोर वय से युवावस्था की ओर बढ़ने के दौर में बंगाल के भीषण अकाल पर सशक्त छांदिक रचना प्रस्तुत कर सके । उन्होंने जहाँ एक ओर मछुआरों, कामगारों, मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दु:खों और हर्ष-विषाद पर सार्थक गीत लिखे, वहीं एशिया के नव-स्ततंत्र राष्ट्रों पर मंडराते युद्ध के खतरे, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और विश्व-शांति के प्रश्नों को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया । साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में प्रदूषण आदि भी उनकी चिंत्ता के केंद्र में थे । बडे पैमाने पर उन्होंने गीतों के माध्यम से विसंगतियों पर व्यंग्य किए, जबकि गीत से व्यंग्य का इस्तेमाल अधिकांश कवियों के यहाँ बहिष्कृत-सा  ही रहा है । अदभुत शब्द-संयोजन, असंख्य छांदिक प्रयोग, संगीतात्मकता आदि ऐसे उपकरण है, जिन्होंने उनके गीतों को उजास ही । वीरेन्द्र मिश्र की गीत-यात्रा सही अर्थों से अप्रतिम हैं ।
  • Safed Parde Par
    Ramesh Chandra Shah
    150 135

    Item Code: #KGP-1244

    Availability: In stock

    सफेद परदे पर
    उफ कैसे भंवर में आ फंसा हूँ मैं, अपनी ही करनी से ! किसने कहा था यह बखेडा मोल लेने को  बहुत शौक चढा था ना अकेले रहने का? फँसावट नग रही थी बेटा-बहू की गिरस्ती और पोते की माया? अच्छा वानप्रस्थ है यह तुम्हारा, जिससे तुम्हें एक ओर दत्ता-दंपति का सहारा चाहिए और दूसरी ओर रामरतिया का । उधर बेटा-बहू परेशान, इधर बेटी अलग परेशान । क्या अधिकार था तुम्हें उन बेचारों को इस तरह सारी दुनिया के सामने अकारण अपराधी बना देने का?
    ० 
    उन्हें पता भी नहीं चला, कब वह योगिनी महामाया अपनी जगह से उठकर उनके पास आकर खडी हो गई और उनके सिर को, सिर के बालों की जडों को हौले-हौले सहलाने लगी ।… उनकी आँखे पूरी तरह मुँद गई । एक अदभुत शीतल करेंट-सी उनके मस्तक को भेदकर बूँद-बूँद रिसती हुई पोर-पोर में पसर रही है... क्या वे सचमुच होश में है? हैं, तभी न ऐसे अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं, जैसा सुख उनकी स्नायुओं ने अब तक कभी नहीं जाना...

    तुमने कहा था आप क्यों पूछ रहे हैं बाबूजी? क्या मेरी कहानी की किताब लिखना चाहते हैं ? मैं बुरी तरह चौक गया था तुम्हारे मुँह से यह सुनकर । तुम्हें कैसे लगा रामरती, कि मैं  तुम्हारी कहानी लिख सकता हूँ? पहली बार मुझे इलहाम जैसा हुआ कि हर आदमी की यह सबसे बड़ी, सबसे गहरी चाहत होती होगी कि कोई उसे सचमुच पूरा-पूरा समझे और न्याय करे ऐसा न्याय, जो और कोई नहीं कर सकता। सिर्फ लेखक नाम का प्राणी कर सकता है । लेखक, जो भगवान् की तरह लंबा इंतजार भी नहीं कराता । इसी जनम में, इसी शरीर और मन से निवास करने वाली जीवात्मा का एक्स-रे निकाल के रख सकता है ।
    (इसी उपन्यास से)

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghava (Paperback)
    Rangey Raghav
    140

    Item Code: #KGP-461

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रांगेय राघव 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hindi Shikshan : Sankalpana Aur Prayog
    Hiralal Bachhotia
    150

    Item Code: #KGP-1105

    Availability: In stock

    हिंदी शिक्षण: संकल्पना और प्रयोग
    प्रायः हिंदी भाषा और हिंदी की साहित्यिक शैली को एक माना जाता रहा है। इसमें भेद कर तदनुसार शिक्षण की आवश्यकता के संदर्भ में साहित्येतर अभिव्यक्तियों और शैलियों के सक्षम प्रयोग की निपुणता प्राप्त करना अपेक्षित है। इस दृष्टि से ‘हिंदी-शिक्षण: संकलपना और प्रयोग’ में विधियों आदि की अवधारणा के साथ उसके प्रायोगिक रूपों को प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। प्रारंभिक स्तर पर विशेष रूप से हिंदीतर भाषी शिक्षार्थी के लिए शैक्षिक-भाषायी कार्यकलापों (भूमिका-निर्वाह आदि) के माध्यम से भिन्न-भिन्न संदर्भों में बोलने का अभ्यास, कैसे पढ़ाएं के अंतर्गत परिवेश निर्माण, वाचन, कथ्य या विषयवस्तु का विश्लेषण, रूपांतरण, स्थानात्ति, बोध प्रश्न आदि पर विचार तथा उनके अभ्यासपरक उदाहरणों के माध्यम से अध्यापन हेतु विविध आयाम प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। 
  • G-male Express
    Alka Sinha
    300 240

    Item Code: #KGP-9376

    Availability: In stock

    बदलते समय के साथ वैचारिक मुठभेड़ करता यह उपन्यास पाठक को एक ऐसी दुनिया से रूबरू कराता है जो उसे चैंकाती है कि ये पात्र, ये परिवेश उसके लिए अपरिचित तो नहीं थे मगर वे उसे उस तरह से पहचान क्यों नहीं पाए? देवेन त्रिपाठी को मिली डायरी की तरह ही हमारी जिंदगी की किताब भी अनेक प्रकार के कोड्स से भरी है जिसे सभी अपनी-अपनी तरह से डिकोड करते हैं। इसीलिए उसे जानने और समझने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। 
    स्कूल-काॅलेज की जिंदगी के बीच पनपते अबोध प्रेम की मासूमियत को चित्रित करता यह उपन्यास जब उसमें हो रही सौदेबाजी को उजागर करता है तब सारा तिलिस्म टूट जाता है और सवाल उठता है कि अगर दैहिक सुख के बिना प्रेम अधूरा है तो क्या यौन-सुख हासिल करना ही प्रेम की परिणति है? क्या स्त्री के लिए इस सुख की कामना करना अनैतिक है? सवाल यह भी है कि महज गर्भ धारण न करने से ही स्त्री की यौन-शुचिता प्रमाणित हो जाती है तो पुरुष की शुचिता कैसे प्रमाणित की जाए? पैसों की खातिर यौन-सुख देने वाली स्त्रियाँ अगर वेश्याएं हैं तो स्त्रियों को काम-संतुष्टि बेचने वाले पुरुषों को कौन सी संज्ञा दी जाए? इन सभी पहलुओं पर शोधपरक चिंतन करता यह उपन्यास स्त्रियों की काम-भावना की स्वीकृति का प्रश्न उठाने के साथ-साथ स्त्री-पुरुष की यौन-शुचिता को बराबरी पर विश्लेषित करने की भी मांग करता है क्योंकि बेलगाम संबंधों से पैदा हुई जटिलताओं को समझे बिना ‘आधुनिक’ होने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता है।
    यह कृति निम्नतम से उच्चतम की एक ऐसी चेतना-यात्रा है जो बुद्धत्व अथवा महामानव में रूपांतरण का दावा करने के बदले पाठक को सही मायने में जाग्रत करती है।
  • Triya Hath (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    160

    Item Code: #KGP-7046

    Availability: In stock


  • Shakti Se Shanti
    Atal Bihari Vajpayee
    400 320

    Item Code: #KGP-9021

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति

    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।

    जाइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।

    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है । [इसी पुस्तक से]
  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Doosara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    200 180

    Item Code: #KGP-775

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 500

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Chasing Maya (Novel)
    Rohan Gagoi
    395 328

    Item Code: #KGP-606

    Availability: In stock

    Better jobs, bigger salaries, expensive cars, exclusive homes, exotic vacations, shopping abroad, admiration and jealousy of peers... What more can you expect from life! Or, may be, you can…! Come; explore your truth with ‘Chasing Maya’!
    ‘Chasing Maya’ is about thirty-two-year old Siddhartha Kumar, who in spite of his evident material success finds himself trapped in the grip of mediocrity – the distress and despair of being no different from millions of others in this world. Bemused, he sets on a quest to rediscover the zeal that once fuelled his dreams and passion and comes across with situations and people that lead him to astounding revelations.
    Share the anxiety, live the excitement and experience the magical transcendence as ‘Chasing Maya’ takes you on an incredible journey that every human soul instinctively seeks to undertake but only a negligible few truly succeed to accomplish!
  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Sant Meeranbai Aur Unki Padaavali
    Baldev Vanshi
    295 251

    Item Code: #KGP-168

    Availability: In stock

    संत मीराँबाई और उनकी पदावली
    मीराँबाई  की गति अपने मूल की ओर है । बीज-भाव की ओर है । भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्त्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई । अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है ।
    मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चटूटानें  राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढती चली गई । वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रम-क्रम तोड़ती चली गई । राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान ममाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकीं और मुक्त हो गई । इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया । तभी मीराँ, मीराँ बनी ।
  • Krantikari
    Roshan Premyogi
    260 221

    Item Code: #KGP-1943

    Availability: In stock

    क्रांतिकारी
    दलित परिवार में जन्म लेने के कारण सामाजिक अस्पृश्यता और उत्पीड़न का दंश मैंने भी सहा है, इसलिए ‘क्रांतिकारी’ को पढ़ते हुए यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा कि जिस तरह इस उपन्यास में चंद्रशेखर और केवलानंद जैसे सचेत सवर्ण लड़के दलित रामकरन के साथ खड़े हैं, मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हुए ?
    चंद्रशेखर मुख्य पात्र है, जो चाहता है कि इलाके के गाँवों में दलितों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे, वे संगठित हों और बराबरी पर आने के लिए लड़ें। दलितों की लड़ाई में वह अपना एक हाथ गँवा बैठता है। अंत में उसके विचारों की विजय होती है। विजय इस तरह कि दो मेधावी युवा अपने-अपने गाँव यह सोचकर आए थे कि वे यहीं पर रोजगार करेंगे और अपने साथ दलित समाज का भी जीवन-स्तर ऊँचा उठाएँगे। उनकी राह में क्षेत्रीय विधायक काँटा बोते हैं, इसलिए कि यदि रामकरन जैसे हरिजन दलितों के सर्वमान्य नेता बन जाएँगे तो हम सवर्णों का वोट बैंक टूट जाएगा। उधर चंद्रशेखर और रामकरन मिलकर दलितों को यह अहसास कराते हैं कि यदि संगठित और शिक्षित बनोगे तो कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं कर पाएगा।
    ईशावस्या, माला और संध्या जैसे स्त्री-पात्रों को उपन्यास में महत्त्व नहीं मिला है, लेकिन सबकी कमी पूरी कर देती हैं सुन्नरी देवी। उनका संघर्ष समूची दलित स्त्री जाति का संघर्ष है। वे किसी देवी की तरह समाजियों का नेतृत्व सँभालती हैं। दरअसल दलित क्रांति की मशक्कत तीन युवा मिलकर करते हैं, लेकिन जब क्रांति होती है तो वे युवा पीछे रह जाते हैं और सुन्नरी देवी विजय का परचम लहरा देती हैं।  

  • Mere Saakshaatkaar : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    190

    Item Code: #KGP-173

    Availability: In stock


  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-2 (Paperback)
    Bhagwan Singh
    200 170

    Item Code: #KGP-7231

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"

    आज सच और झूठ के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है। भगवान सिंह इसमें अपना पाठ और पक्ष रखते हैं। वे वर्तमान राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि परिस्थितियों से उठ रहे सवालों से मुठभेड़ करते हैं। तात्कालिक घटनाओं को खँगालकर वे कोई जीवन-मूल्य या ऐतिहासिक सत्य सामने रख देते हैं। असहिष्णुता, आजादी, देशभक्ति, भारतमाता की संकल्पना, राजनीति का सांप्रदायिक कारोबार जैसे आयोजित-प्रायोजित प्रश्नों के बीच यह पुस्तक एक प्रकाश स्तंभ है। संवाद की अत्यंत पठनीय शैली में लिखे गए इसके आलेख आमने-सामने बैठकर की जाने वाली बातचीत का सुख भी देते हैं। उस हरेक पाठक के लिए एक अपरिहार्य पुस्तक जो वर्तमान की विशेषताओं और विरूपताओं दोनों को समझना चाहता है। 
  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal
    Indira Mishra
    390 324

    Item Code: #KGP-734

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
  • Mere Chuninda Geet
    Bharat Bhushan
    500 400

    Item Code: #KGP-188

    Availability: In stock


  • Dhoop Dhalne Ke Baad
    Mahip Singh
    225 203

    Item Code: #KGP-627

    Availability: In stock

    सूरज उगता हैमध्याह्न होता है और फिर ढलना प्रारंभ हो जाता है। मनुष्य जीवनपर्यंत इन स्थितियों से गुजरता रहता है।विभिन्न प्रवृत्तियांपरिवर्तित होती मान्यताएं और अनुभव संपन्नताउसे बहुआयामी बनाती रहती हैं। कभी वह संन्यासी हो जाता हैकभी गृहस्थ।

    संन्यास में महत्त्वाकांक्षा सम्मिलित हो जाती है चुपके से और उसे सामान्य संसारी मनुष्य के स्तर से नीचे खींचती हुई पतन की अतल गहराइयों में ले जाती है। जहां संन्यासी अपराधी बन जाताहै।

    गृहस्थ जीवन में जब सबके सुख एवं हित की भावना जुड़ती है तो सामान्य व्यक्ति सारे सांसारिक कार्यकलाप के बीच भी संत ही होता है। और वे लोग जो सदियों से किसी विशेष जाति में पैदाहोने के कारण मनुष्य से निम्नतर माने जाते रहे हैंजब अपने स्व को पहचानने लगते हैंकैसी छटपटाहट भर जाती है उनमें और कैसे हिंसक परिणाम झेलने पड़ते हैं उन्हें।

    मानव जाति का आधा हिस्सा यानी स्त्री जो अभी तक मनुष्य नहीं मानी जातीअब अपना स्थान और अधिकार पहचानने लगी है और उसके लिए आग्रहशील हो गई है तो कैसे-कैसे उद्वेलनों सेगुजरना पड़ता है उसे।

    इन सब बिंदुओं को समेटता और अपने परिचित परिवेश को एक नए कोण से प्रस्तुत करता है उपन्यास। प्रख्यात कथाकार महीप सिंह की त्रयी का तीसरा उपन्यास है-धूप ढलने के बाद'

  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Sine Sitaron Ke Anchhuye Prasang
    Sheela Jhunjhunwala
    200

    Item Code: #KGP-69

    Availability: In stock


  • The Lost Identity (Novel)
    Troy Bond
    745 559

    Item Code: #KGP-341

    Availability: In stock

    After the tragic death of his son, all the American wants is to live a quiet life in a sleepy tourist town in northern Italy. But his solace is shattered when British agents locate him to break the news that his friend from college, Oxford Professor Paul Ross, was killed in a car bombing.
    The agents believe Dr. Ross was murdered after he discovered the “Text of Akbar”, a mysterious collection of 2,000-year-old Sanskrit fragments, which could hold the key to the entire Christian faith.
    To find Dr. Ross’s killer, the agents want the expat to assume the identity of his dead friend at an auction of rare books soon to be held at a faraway palace in India. The last Maharaja of Naipurna is hosting a group of religion scholars from around the world for this chance-of-a- lifetime event.
    Out of sympathy for Dr. Ross’s widow, the expat reluctantly agrees to travel to the remote desert city where his three-day assignment spirals into a nightmare of danger and intrigue.
    Arriving at the grim and sinister Ganesha’s Palace, the new Dr. Ross is a marked man. He’s in far more danger than he anticipated when he learns his fellow guests at the palace are consumed with being the first to acquire the Text of Akbar . . . and one of them will gladly kill for that chance.

  • Vipradas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-1404

    Availability: In stock


  • Pranaam Kapila (Paperback)
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-1547

    Availability: In stock

    खंड 'अ' के कवि 
    डॉ. अब्दुल ज़ब्बार, अयोध्या प्रसाद ‘हरिऔध’, अरविंद कुमार तिवारी, अशोक जमनानी, आशाराम त्रिपाठी, इस्माइल मेरठी, कमलेश मौर्य ‘मृदु’, काका हाथरसी, कुंकुम गुप्ता, डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र, कृष्ण गोपाल रस्तोगी, डॉ. कृष्ण मुरारी शर्मा, गणेशदत्त सारस्वत, पं. गांगेय नरोत्तम शास्त्री, पं. गिरिमोहन गुरु, गिरीश ‘पंकज’, चकबस्त, छीत स्वामी, जगदीश किंजल्क, डॉ. जयकुमार ‘जलज’, जयकुमार जैन ‘प्रवीण’, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, तुलसीदास, दिनेश ‘प्रभात’, दिवाकर वर्मा, डॉ. दुर्गेश दीक्षित, आचार्य धर्मेन्द्र, नरहरि, नरेन्द्र गोयल, नारायणदास चतुर्वेदी, परमानंद, डॉ. परशुराम शुक्ल, डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’, प्रकाश वैश्य, प्रताप नारायण मिश्र, प्रद्युम्ननाथ तिवारी ‘करुणेश’, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, प्रेमनारायण त्रिपाठी ‘प्रेम’ , आचार्य भगवत प्रसाद दुबे, भोजराज पटेल, डॉ. मनोहरलाल गोयल, महावीर प्रसाद ‘मधुप’, मुंशीराम शर्मा ‘सोम’, मुक्ति कुमार मिश्र, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. योगेश्वर प्रसाद सिंह ‘योगेश’, रघुनंदन शर्मा, रमेश कुमार शर्मा, रमेशचंद्र खरे, पं. राजेन्द्र तिवारी, डॉ. रानी कमलेश अग्रवाल, महात्मा रामचंद्रवीर महाराज, रामदास मालवीय, आचार्य रामनाथ ‘सुमन’, डॉ. रामप्रकाश अग्रवाल, रामस्वरूप दास, डॉ. राष्ट्रबंधु, लाला भगवानदीन, लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘विश्वबंधु’, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त ‘किंकर’, लेखराम चिले ‘नि:शंक’, वागीश ‘दिनकर’, विजय लक्ष्मी ‘विभा’, डॉ. विमल कुमार पाठक, विमला अग्रवाल, वियोगी हरि, डॉ. शरद नारायण खरे, शिवदीप ‘कनक’, श्याम नारायण पांडेय, श्रीकृष्ण मित्र, श्रीकृष्ण शर्मा, श्रीकृष्ण ‘सरल’, डॉ. श्रीराम परिहार, सुदर्शन ‘चक्र’, सुधेश जैन, डॉ. सुशीला आर्य, सूरदास, हनुमान प्रसाद पोद्दार,  पद्मश्री डॉ. हरिशंकर शर्मा, हरिश्चंद्र टाँटिया, हरीश दुबे
  • Shivani Ka Katha Sahitya Yug-Parivesh-Sanskriti Ka Sandarbh
    Sushil Bala
    1100 770

    Item Code: #KGP-743

    Availability: In stock

    कोई भी सक्षम रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से युग-परिवेश-संस्कृति की विभिन्न व विशिष्ट छवियां निर्मित करता है। इन छवियों में उसकी वैचारिकी तथा भावसंपदा समाहित होती है। शिवानी के प्रचुर कथा साहित्य को पढ़ते हुए इस तथ्य का अनुभव शब्द-शब्द में किया जा सकता है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘शिवानी का कथा साहित्य: युग-परिवेश- संस्कृति का संदर्भ’ में सुशील बाला ने अत्यंत लोकप्रिय लेखिका शिवानी के कथा-संदर्भ रेखांकित किए हैं। शिवानी अपनी परिनिष्ठित अभिरुचियों के लिए जानी जाती हैं। विशद वैदुष्य की गरिमा से आलोकित उनकी रचना-शैली एक अलग मार्ग का अन्वेषण करती रही। वे भारतीयता को समझकर उसे व्यापक मानवता के हित में व्याख्यायित करती रहीं। सुशील बाला ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही लिखा है कि ‘वे क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, जातिवाद, भाषावाद, सांप्रदायिकता जैसी देश को खंडित करने वाली नकारात्मक वृत्तियों का प्रबल विरोध कर सौहार्दपूर्ण वातावरण को उद्घाटित करती हैं।’ यह सच है कि शिवानी के कथा साहित्य में मानव मनोविज्ञान की उपस्थिति का विश्लेषण करते हुए उसमें सकारात्मक सोच के अनेक आयाम तलाशे जा सकते हैं। 
    चैदह अध्यायों में विभाजित प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने व्यवस्थित ढंग से शिवानी के व्यक्तित्व के नियामक तत्त्वों को रेखांकित करते हुए उनके रचना-परिवेश को उद्घाटित किया है। इसके पश्चात् उन्होंने शिवानी के कथा साहित्य (कहानी व उपन्यास) में पारिवारिक स्थिति, सामाजिक चेतना, नारी की स्थिति, राजनीतिक परिदृश्य, आर्थिक पक्ष, धर्मिक मान्यताएं और जीवन-दृष्टि, नैतिक मान्यताएं, कला साहित्य और ज्ञान-विज्ञान, प्राकृतिक परिवेश एवं भाषा का आलोचनात्मक अनुसंधन किया है। सुशील बाला के पास उपयुक्त भाषा है, जिस कारण पाठक तक उनका मंतव्य पहुंच जाता है। यह पुस्तक शिवानी पर केंद्रित आलोचनात्मक लेखन की नई संभावनाएं खोलती है। आज जब नए-नए संदर्भों में साहित्य का मूल्यांकन किया जा रहा है तब इस पुस्तक का विशेष महत्त्व है। यह निश्चित रूप से एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Na Dainyam Na Palaynam
    Atal Bihari Vajpayee
    160

    Item Code: #KGP-33

    Availability: In stock

    सचाई यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकती । ऐसी राजनीति, जिसमें प्राय: प्रतिदिन भाषण देना जरूरी है और भाषण भी ऐसा जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके, तो फिर कविता की एकान्त साधना के लिए समय और वातावरण ही कहीं मिल पाता है । मैंने जो थोडी-सी कविताएँ लिखी है, वे परिस्थिति-सापेक्ष हैं  और आसपास की दुनिया को प्रतिबिम्बित करती हैं ।
    अपने कवि के प्रति ईमानदार रहने के लिए मुझे काफी कीमत चुकानी पडी है, किन्तु कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच मेल बिठाने का मैं निरन्तर प्रयास करता रहा हूँ । कभी-कभी इच्छा होती है कि सब कुछ छोड़-छाड़कर वहीँ एकान्त में पढ़ने, लिखने और चिन्तन करने में अपने को खो दूँ, किन्तु ऐसा नहीं कर पाता ।
    मैं यह भी जानता हूँ कि मेरे पाठक मेरी कविता के प्रेमी इसलिए हैं कि वे इस बात से खुश है कि मैं राजनीति के रेगिस्तान में रोते हुए भी, अपने हृदय में छोटी-सी स्नेह-सलिला बहाए रखता हूँ ।
    --अटल बिहारी वाजपेयी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar (Paperback)
    Ramdhari Singh Diwakar
    125

    Item Code: #KGP-7007

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : रामधारी सिंह दिवाकर
    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिल्लेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न अपना है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भा दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।
    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।
    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार','खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानो', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan
    Sudha Arora
    400 340

    Item Code: #KGP-909

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है।
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj
    Rituraaj
    150

    Item Code: #KGP-224

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही हैं । बहुराष्ट्रीय निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे हैं और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है; वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कम दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते हैं और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Ek Na Ek Din
    Rajni Gupt
    600 480

    Item Code: #KGP-220

    Availability: In stock

    पिछले कुछ वर्षों में स्त्री-पुरुष संबंधों के असमंजन और असमंजसग्रस्त अवसाद का स्वरूप कुछ बदला है-विशेषकर शहरी मध्यवर्ग के उन परिवारों मेंजहाँ स्त्रियाँ शिक्षित हैंपरिवार के बाहर भी एक बंधु-परिवार (Family of Friends) जिनका है ! वहाँ एक कलाकारअफसरशिक्षक के रूप में इनकी मान्यता हैसम्मान भीनई कहानी के ज़माने की बीमार (‘परिंदे'), बेचारी (‘एक कमज़ोर लड़की की कहानी’, ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है'), बिंदास (‘मचाचा') औरआसानी से बरगलाई जा सकने वाली टाइपिस्ट/पी०ए० (‘आधे-अधूरे’) बालाओं के ज़माने लदेअब जो कथा-नायिकाएँ हैं-कृति या अनन्या की पीढ़ी की-उनका अपना एक अलग प्रभामंडल है-एक प्रेमी का स्थानापन्न वहाँ कईप्रशंसक हो गए हैं। पर कभी-कभी वे चाहे-अनचाहे एक नई तरह की समस्या खड़ी कर जाते हैं-घर मेंऔर बाहर भीखब्तुलहवास पति के अहं पर चोट कर उसे और अधिक खूँखार बना देते हैंकई तरह की ठोस और फोकीअसुरक्षाएँ गढ़ते हैं उसके भीतरतरह-तरह के प्रवाद फैलाते हैंकई दफा अनुचित प्रस्तावों की मूक श्रृंखला से स्लो-पेस में बलात्कार की ऊभ-चूभ पैदा करते हैं और मुसीबत की घड़ी ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। चूँकि वे ‘दोस्त' (?) होते हैं या सहकर्मी यानी कि आस्तीन का साँप-उन्हें उस तरह झटका जाना संभव नहीं होता जैसे प्रकट दुश्मन को झटक सकते हैं। कुल मिलाकर स्थिति ‘तार से गिरेखजूर में अटकेवाली बनती है बेटे कुछ दिनों तकमाँ से सहानुभूति रखते हैंफिर उनकी अपनी एक दुनिया हो जाती है। हाँबेटियों का सखी-भाव अक्सर अंत तक बना रहता हैमित्रबहन या बेटी के रूप में स्त्री का अवलंब स्त्री ही बनती है या उसको खुद ही अपनी सहेली बनजीना होता है।

    तो घर-बाहर-दोनों जगह स्त्री के दुःख के टाँके महीन हुए हैंकई बार खुली आँख से दीखते भी नहींतभी लोग उन्हें ‘खाती-पीतीसुख से ऊबी और बेकार बेचैन महिलाओं का शगलकहते हैंरजनी एक स्त्री-लेंस लेकर सामने आती हैंऔर भूमंडलीकरण (नहींभूमंडीकरणके बाद की पीढ़ी के चौहान साहब और राजीव जैसे फर्राटेदारनो-नॉन्सेसरॉबटनुमा पुरुषों को भी आईना दिखाती हुई उनसे पूछना चाहती हैं कि रैट रेस जीतकर भी चूहा चूहा ही रह जाता है,आदमी तो नहीं हो जाताकंप्यूटर की दुनिया हो या कला-जगत्-स्त्रियों को अपने पाए का और किंचित् विशिष्ट ‘मनुष्यसमझे बिना पुरुष भी आधे मशीन और आधे पशु ही बने रहेंगेदोहरे मानदंड पूँछ की तरह कभी तो झड़ेंगे ही!

    जहाँ तक बच्चों का सवाल है, ‘आपका बंटीभी बड़ा हो गया हैतनावग्रस्त परिवारों में या अकेली माँओं के संरक्षण में पलते बच्चों का मानसिक धरातलउनकी परिपक्वता और (कभी-कभीकटुता भी प्रश्नविकल बंटियों से तोकाफी अधिक होने लगी है।

    पारिवारिक जीवन के इन सब ‘बड़ेकिंतु ‘सूक्ष्मपरिवर्तनों का सजग साक्ष्य वहन करती रजनी की सरल-सहज भाषा रिश्तों के बीच पसरी ‘कच्चे-पके आमों की खट्टी बास’ कई मांसल बिंबों और सूक्ष्म विवरणों में पकड़ती है।उपन्यास में ‘घोरबाइरे’ की बिमोला और ' डॉल्स हाउसकी नोरा के आत्मसंघर्ष का एक नया चरण आपके सामने खुलता चला जाता है...!!

    -अनामिका    
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mridula Garg (Paperback)
    Mridula Garg
    120

    Item Code: #KGP-7015

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मृदुला गर्ग
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मृदुला गर्ग  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'ग्लेशियर से', 'टोपी' , 'शहर के नाम', 'उधार की हवा', 'वह मैं ही थी', 'उर्फ सैम', 'मंजूर-नामंजूर', 'इक्कीसवीं सदी का पेड़', 'वो दूसरी' तथा 'जूते का जोड़', 'गोभी का तोड़' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मृदुला गर्ग की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan (Paperback)
    Mannu Bhandari
    150

    Item Code: #KGP-1426

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar (Paperback)
    Ajit Kumar
    90

    Item Code: #KGP-1384

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजितकुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'उपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma (Paperback)
    Tajendra Sharma
    170

    Item Code: #KGP-441

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : तेजेन्द्र शर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maitreyi Pushpa : Rachna Sanchayan
    Sushil Sidharth
    950 713

    Item Code: #KGP-1580

    Availability: In stock

    मैत्रेयी पुष्पा ने कथा साहित्य में एक नए अध्याय की शुरुआत की। बुंदेलखंड के परिवेश और स्वतंत्रचेता परिवार से मिली ऊर्जा ने उनको जीवन की समझ दी। परिस्थितियों ने उन्हेंस्वावलंबी बनायामुसीबतों ने हिम्मत दी। जब वे लिखने की दुनिया में आईं तो उनके पास जो अनुभव थे वे किसी समकालीन लेखक के पास नहीं थे। मध्यवर्गीय मनुहारोंमेंझूला झूलते कथा साहित्य की पींगें रुक गईं जब इदन्नममआया। इस उपन्यास का प्रकाशन एक युगांतर जैसा है। इसके बाद चाकअल्मा कबूतरीकही ईसुरी फागआदिउपन्यासों और कई लंबी कहानियों से उन्होंने रचना का ठाठ उलट दिया। हिंदी नई चाल में ढलीके जोड़ पर कहा जा सकता है कि कथा साहित्य नई चाल में ढला।

    मैत्रेयी पुष्पा को पढ़ते हुए मुंशी प्रेमचंद का वह अविस्मरणीय भाषण याद आता रहता है जिसमें उन्होंने सौंदर्य का मेयार बदलने का आवाहन किया था। मैत्रेयी ने सौंदर्य कीव्याख्या नहीं कीउसका मेयार बदल दिया। ऐसे कथानक और पात्र कथा साहित्य में आए कि कुलीनतंत्र में भगदड़ मच गई। अनुभवों की रेशमी चादरों में लिपटे लोग भरोसा नहींकर पाए कि यह जीवन इसी देश का हैये पात्र इसी समाज के हैं।

    मैत्रेयी पुष्पा : रचना संचयनसाहित्य के अपार पाठकों के लिए है। उनके लिएजिनके लिए मैत्रेयी ने रचना और जीवन में निरंतर संघर्ष किया है। यह रचनात्मक संघर्ष अभीसमाप्त नहीं हुआ है।
  • Bharatvanshi : Bhasha Evam Sansriti (Paperback)
    Pushpita Awasthi
    390 332

    Item Code: #KGP-508

    Availability: In stock

    डॉ.. पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनाकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों, यथा--सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। 
    डॉ. अवस्थी ने इन्हीं पर दशकों तक काम किया। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इसमें प्रवासी भारतीयों के इलाकों की भी छवियां हैं। मूलतः यह कृति उन भारतवंशियों के अंधेरों को रोशनी में लाती है जो बहुत हद तक अलक्षित रहा। 
    भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है। संस्कृति और भाषा का यह गहन-गंभीर अध्ययन कदाचित् पहली बार वैज्ञानिक दृष्टि से सामने आ रहा है। इसमें सृजनशील लेखक और इतिहासविद् की अनूठी जुगलबंदी है। 
    डॉ. अवस्थी ने भारतवंशियों की अलग-अलग धर्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पहचानों में हिंदुस्तानियत की शिनाख्त करते हुए उन तत्त्वों का अन्वेषण किया है जो उन्हें भारतवंशी होने के सांस्कृतिक स्वाभिमान में एकसूत्र करते हैं। यह एकसूत्रता संस्कृति और भाषा की अंतर्तहों में किस तरह अंतर्भुक्त है, इसे अकेले दम पर लेखक ने घूम-घूमकर चिन्हित किया है। वे भारतीय आर्यों और पारसीक आर्यों के सांस्कृतिक और भाषायी इतिहास के रास्तों से वैचारिक यात्रा करती हैं और मोटे तौर पर 19वीं से 20वीं सदी के बीच बनी संस्कृति और भाषा की जड़ों को टटोलकर अपनी स्थापनाओं के लिए रास्ता निर्मित करती हैं। इस प्रक्रिया में वे यूरोपीय उपनिवेशों में भारतवंशियों के तत्कालीन दारुण इतिहास, यातनाओं, यंत्राणाओं के वास्तविक चित्रों को क्रमशः सजीव करती हैं। 
    डॉ. अवस्थी ने संस्कृति और भाषा को उस संजीवनी के रूप में खोजा है जिनके कारण ही भारतवंशियों का जीवन है। ये दोनों उनके प्राण तत्त्व बने हुए हैं। इन्हीं दो तत्त्वों से विश्व में उनकी भारतीय अस्मिता का स्थापन हुआ। यह अस्मिता उन भारतीयों से अलग है जो पिछले 30-40 सालों में प्रवास पर पहुंचे। प्रवासी और अप्रवासी के भेद को, भ्रम को अनावृत्त करती यह किताब एक उपलब्धिकी तरह सामने है।
    भूमंडलीकरण के भयावह आक्रमण के दौर में जबकि संस्कृतियों और भाषाओं, बोलियों और लिपियों को बचाना कठिन होता जा रहा है तब यह एक किताब भाषा एवं संस्कृति को बचाने का मेटाफर रचती है। यही इसका मानीख़ेज हासिल है।
    --लीलाधर  मंडलोई
  • Jal Jo Jeevan Hai
    Harish Chandra Vyas
    300 249

    Item Code: #KGP-520

    Availability: In stock

    जल, जो जीवन है 
    विश्व-स्टार पर गहराते जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्षा 2003 को 'अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ जल वर्ष' घोषित किया है । यही भारत सहित दुनिया के देशों ने अपना रवैया नहीं बदला तो जल विभिन्न देशों में तनाव और जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता का विषय बने बगैर नहीं रह सकता। अतः जल-संसाधनों के प्रति सचेत होने की परम आवश्यकता है । 'जल, जो जीवन है' का सर्जन लेखक ने दो प्रतिमानों को सामने रखकर किया है— प्रथम, जल-संकट की गंभीरता के बारे में जागरूकता में वृद्धि करना और द्वितीय इस समस्या के निदान व समाधान हेतु सर्जनात्मक सुझाव पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना। 
    प्रस्तुत पुस्तक में जल से संबंधित उभरते समस्त संकटों तथा उनके समाधान हेरु सरल भाषा में जानकारी प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया गया है। 
  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Anton Chekhov Ki Kahaniyan
    Pramila Gupta
    300 240

    Item Code: #KGP-ACKK HB

    Availability: In stock

    अंतोन चेखव (1860-1904) की गणना न केवल रूसी साहित्य में अपितु विश्व साहित्य के शीर्ष कथाकारों में होती है। अपने छोटे से जीवन में उन्होंने रूसी भाषा में चार नाटक व अगणित कालजयी कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियाँ व नाटक साहित्य संपूर्ण विश्व के समालोचकों व समीक्षकों की दृष्टि में अप्रतिम हैं। वे पेशे से चिकित्सक थे। प्रारंभ में उन्होंने पढ़ाई का खर्चा निकालने के लिए लिखना शुरू किया। बाद में वे पूर्ण रूप से साहित्य को समर्पित हो गए। उनका कहना था कि चिकित्सा उनकी धर्मपत्नी है तो साहित्य उनकी प्रेमिका। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था एवं आमजन की पीड़ा का सजीव चित्रण पाठकों को अभिभूत कर देता है।

    हिंदी साहित्यप्रेमी अंतोन चेखव के विपुल साहित्य का रसास्वादन करने के लिए सदैव लालायित रहते हैं। उनके साहित्य का हिंदी भाषा में आनंद लेने का एकमात्र विकल्प अनुवाद है। अनुवादक उनके साहित्य को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का यथासंभव प्रयास कर रहे हैं। अंतोन चेखव के समग्र साहित्य को भाषांतरित कर पाना दुष्कर कार्य है। चुनिंदा कहानियों का हिंदी अनुवाद करने का विनम्र प्रयास किया है। चेखव के विशद साहित्य में से कुछ कहानियों का चयन करना सरल नहीं। उनकी प्रत्येक कहानी विशिष्ट है। अतः स्वरुचि के आधार पर कहानियाँ चयनित की हैं। आशान्वित हूँ कि सुधी पाठकों को ये कहानियाँ पसंद आएँगी।

  • Vikalp
    Sukhdev Prasad Dubey
    1100 770

    Item Code: #KGP-653

    Availability: In stock

    बीसवीं शताब्दी ने मनुष्य को आजादी दी, लेकिन उसकी आत्मा छीन ली। आत्मविहीन होकर मनुष्य अपना सब कुछ, जो आत्मीय था, को छोड़कर बाहर भागने लगा। ऐसा ही एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मा, अति महत्त्वाकांक्षी युवक बड़ा आदमी बनने के स्वप्न का पीछा करते हुए देश का सब कुछ बिसराकर अमेरिका भाग जाता है और वहीं का होकर रह जाता है। जैसा कि 70 के दशक में अनेक युवक करने लगे थे।
    15 वर्ष बाद अचानक, अपने पिता द्वारा आत्मदाह कर लेने की खबर उसे वहां का सब कुछ छोड़कर गांव ले आती है और वह फिर से यहां सबसे जुड़ने लगा था, जिसे वह छोड़कर गया था। तभी फिर अचानक विदेश से आई एक बुरी खबर, उसे विदेश ले जाती है। जहां उसकी पत्नी की विलासिता और लापरवाही से हुई पुत्र की मृत्यु, उसे इतना दुखित करती है कि वह अपनी पत्नी को ही 14 वर्ष जेल करवा के सदा के लिए यह सोचकर देश लौट आता है कि महान् देशों में भी महानता कहां मिलती है।
    और फिर शुरू होता है, उसके संघर्ष का एक लंबा सिलसिलाµघर, परिवार, गांव बस्ती, देश तथा उसके अपने प्रेम को, न्याय दिलवाने और उनकी गरिमा लौटाने की उसकी योग्यता को सिद्ध कर दिखाने की परीक्षा का-लेकिन विशृंखल समाज, भ्रष्ट सत्ता और संवेदनहीन अक्षम नौकरशाही उससे समर्पण कराने में लग जाते हैं। वह घबराकर विकल्पों के पीछे दौड़ता-भागता थक जाता है-क्या शैतान के समक्ष समर्पण कर दे? क्या इस अनिश्चितता, अराजकता और अंत के आतंक से वह हार मान ले? आधुनिक युग की अतिबुद्धिवादी पीढ़ियों के सामने यही सवाल है-क्या मनुष्यता को, जो अनंत का गुणांश है, चंद मनुष्यों के हाथों अंत हो जाने दें।
    विकल्प? क्रांति-न हिंसक, न अहिंसक-आत्मक्रांति!
    नर्मदांचल की प्रकृति और नियति के कोमल-कठोर प्रश्नों से गुंथी, एक अनुप्रेरक प्रेम-कथा जो मानवीय संबंधों के आदर्श एवं यथार्थ के अनछुए पक्षों को उजागर करती हुई, अनुभूत तथ्यों एवं कथ्यों से रोमांचित करती है रोष भी पैदा करती है, और होश भी जगाती है।
  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    160

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Kashmkash (Paperback)
    Manoj Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-378

    Availability: In stock


  • Rang Aakash Mein Shabd
    Narendra Mohan
    1500 1200

    Item Code: #KGP-674

    Availability: In stock

    रंग आकाश में शब्द नरेन्द्र मोहन और शामा की एक ऐसी अपूर्व संस्कृति है जिसमें रंग और शब्द, चित्र और कविता परस्पर जुडे होते हुए भी अपना एक मौलिक उत्कर्ष रचते है । यहीं एक साथ कई सौंदर्य-छवियां, रंग-रेखाएँ और शब्द प्रकाशमान हैं। हिंदी में, भारतीय कविता में इसे अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग माना जा सकता है ।
    कविता और चित्र यहाँ विंब-प्रतिबिंब रूप ने आमने-सामने नहीं हैं, साथ-साथ हैं । उनमें अनुपात बैठाना या अर्थों-आशयों की समांतरता दूँढ़ना दोनों कलाओं को कमतर आँकना होगा, हालाँकि दोनों ने छिपे रचना-सूत्रों की खोज की जा सकती है । दरअसल, कविता और कला संबंधी यह एक बिलकूल नई तरह का अंतरावलंबन है । चित्रों  के रंग-संकेत, छवियां और छायाएँ यहाँ कविता के अंतरंग का हिस्सा बनी हैं।
    चित्र के संवेदन धरातलों और सौंदर्य-रूपों को, अमूर्तन में लिपटी हुई रंग-रेखाओं के शिल्प को अपनी संवेदना में ढाल कवि ने यहाँ अपनी कल्पना शक्ति से कविता के शब्द में रचा है। चित्रों की रंग-गतियों में प्राकृतिक बिंबो और दृश्यावलियों में झाँकने की चित्रकार की ललक को, रंगों की कंपकंपाहट और थरथराहट को, दौड़ते भागते रंगों में लिपटी उदासी, पीड़ा, खामोशी और खोए हुए वजूद को कवि ने कविता की लय, बिंब-विधान और संरचना का हिस्सा बना दिया है । चित्रों के रंग कवि को अँधेरे ने लपटों की तरह उठते दिखे हैं । ऐसा भी लगा जैसे अँधेरे का एक उफनता समुद्र हो जिसकी उत्ताल तरंगें आग से दीप्त हों। ऐसे ही किसी क्षण में उसे महसूस हुआ :
    रंगों के पीछे आग है
    और रेखाएँ चुप नहीं है


  • Halahal
    Dhirendra Aasthana
    180

    Item Code: #KGP-1952

    Availability: In stock

    हलाहल
    धीरेन्द्र अस्थाना ने अपने साथी रचनाकारों की तुलना से कम लिखा है; लेकिन जो भी लिखा है, उसका हिंदी के व्यापक पाठक समाज में बेहद ममता और ललक के साथ स्वागत हुआ है । गहरी, मर्मस्पर्शी और अनेक आयामी भाषा के कुशल शिल्पी धीरेन्द्र अस्थाना का नाम उन रचनाकारों से लिया जाता है, जो लेखन को बेहद गंभीरता से लेते हैं और किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं रहते । यही कारण है कि उनका लेखन उत्पादन नहीं, सृजन की श्रेणी में खडा मिलता है । लिखे जाने के क्रम में 'हलाहल' उनका दूसरा उपन्यास है । पहली बार सन् 1988 में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पढ़ना रचनात्मकता की उस ताकत से हमारा साक्षात्कार कराता है, जिसे मुहावरे की भाषा में 'पुनर्नवा' कहते है । स्त्री-पुरुष संबंधों की एक बेहद पेचीदी स्थिति में उलझ गए इस उपन्यास के नायक की त्रासदी और वेदना इसका सतही सत्य है । अपने गोरे अर्थों में यह उपन्यास उन प्रतिकूलताओं को उजागर करता हैं, जिनमें फैलकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति 'नारसिसस' हो जाने के अभिशाप की तरफ फिसल जाता है, क्योंकि उसे सहेजने-संवारने के लिए एक तिनका तक प्रकट नहीं हो पाता । हिंदी के अत्यंत चर्चित और बहुपठित लेखक उदय प्रकाश ने कभी लिखा था 'धीरेन्द्र अस्थाना एक तटस्थ निर्ममता और निर्वेग संयम के साथ अपने भीतरी संसार के समूचे अंतर्द्वद्वों  के बखान के लिए बाहरी दुनिया में उसका समरूप प्रति संसार तलाशते हैं । ऐसे 'कोरिलेटिव' को अजित करना समकालीन लेखन में रचनात्मक उपलब्धि मानी जानी चाहिए ।'
  • Maitreyi Uwach
    Sushil Sidharth
    500 400

    Item Code: #KGP-MU HB

    Availability: In stock

    मैत्रेयी पुष्पा को पढ़ते हुए मुंशी प्रेमचंद का वह अविस्मरणीय भाषण याद आता रहता है जिसमें उन्होंने सौंदर्य का मेयार बदलने का आह्नान किया था। मनोरंजन और बेचैनी केबीच एक निर्णायक रेखा खींची थी। मैत्रेयी ने सौंदर्य की व्याख्या नहीं कीउसका मेयार बदल दिया। ऐसे कथानक और पात्र कथा साहित्य में आए कि कुलीनतंत्र में भगदड़ मच गई।अनुभवों की रेशमी चादरों में लिपटे लोग भरोसा नहीं कर पाए कि यह जीवन इसी देश का हैये पात्र इसी समाज के हैं। कायदनमैत्रेयी की रचनाओं का समाजशास्त्रीय अध्ययनहोना चाहिए।

    इस अध्ययन में इस पुस्तक में संग्रहीत 39 संवाद अनेक अर्थों में उपयोगी साबित होंगे। यहां मैत्रेयी उवाच की एक ऐसी छटा देखने को मिलेगी जिसमें उनका लेखकविचारकएक्टिविस्ट और स्त्री विमर्शकार खुलकर बात करता है। इससे प्रश्नकर्ताओं और मैत्रेयी जी के बीच एक ऐसी विचारधारा बही है जिसमें पाठक भी स्वयं को रससिक्त पाएंगे।


  • Phir Palash Dahke Hain
    Kanhiya Lal Vajpayee
    150

    Item Code: #KGP-164

    Availability: In stock

    फिर पलाश दहके हैं
    गीतकार कन्हैया लाल वाजपेयी आपको गली, नगर, क़स्बा, चौबारों, किसी नदी के पास अथवा सूखे तट पर, कहीं भी सहज और सामान्य रूप से गाता-गुनगुनाता घूमता मिल सकता है । मिलने को तो बाजार में भी मिल जाएगा, लेकिन बाजार में बेच सकने के लिए इसके पास कुछ है नहीं-
    हम खाली जेबों में 
    बाजार लिए घूमे... । 
    का यह गायक बाजार में मिल जाने पर भी-
    नयनों की चितवन 
    अधरों की लाली
    फूलों की मुस्कानों' का गाहक हूँ । 
    जैसे ग्राहक के ही रूप में अपना परिचय देता महसूस होगा ।
    इन कन्हैया लाल वाजपेयी ने अपनी अब तक की भिन्न-भिन्न 'मूड' (मानसिकताओं) को गीत-  यात्राओं में अपने जो चरण-चिह्न छोडे हैं वे राजमहल से लेकर गलियों, चौबारों, घाटियों और नदी तटों तक बिलकुल साफ, गहरे और स्पष्ट हैं ।

  • Pratiraksha Aur Saamrik Neeti
    Narendra Mohan
    495 371

    Item Code: #KGP-899

    Availability: In stock

    प्रतिरक्षा व सामरिक नीति
    भारत आज एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है । भारत की मंशा अपनी परमाणु शक्ति  उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों व आत्मरक्षा के लिए है । किसी भी देश की प्रतिरक्षा व सामरिक नीति वर्तमान और भावी खतरों के आयामों के निरंतर विश्लेषण पर आधारित होती है और भारत को भी इन्हीं आधारों को दृष्टिगत रखते हुए अपने को तैयार रखना होगा । निश्चित रूप से भारत के समक्ष पग-पग पर चुनौतियाँ हैं, लेकिन अपनी संकल्पशक्ति से विद्यमान  सभी चुनौतियों का सामना दृढ़ता व आत्मविश्वास से करेंगे । 
    –अटल बिहारी वाजपेयी 

  • Shankhnaad
    Raj Budhiraja
    140

    Item Code: #KGP-118

    Availability: In stock

    शंखनाद
    "गांधी जी अगर राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे । महर्षि जी हमारी राष्ट्रीय  प्रवृत्ति और स्वाधीनता आंदोलन के आद्य-प्रवर्तक थे। गांधी जी उन्हीं के पदचिन्हों  पर चले । यदि महर्षि हमें मार्ग न दिखाते तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान हो जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता।" —अनंतशायनम् आयंगर
    "महर्षि दयानंद भारतमाता के उन प्रसिद्ध और उच्च आत्माओं में से थे, जिनका नाम संसार के इतिहास से सदैव चमकते हुए सितारों की तरह प्रकाशित रहेगा । वे भारतमाता के उन सपूतों में से हैं, जिनके व्यक्तित्व पर जितना भी अभिमान किया जाए थोड़ा है ।  नेपोलियन और सिकंदर जैसे अनेक सम्राट एवं विजेता संसार में हो चूके है, परंतु स्वामी जी उन सबसे बढ़कर थे ।" —खदीजा बेगम
    “बहुत-से लोग महर्षि दयानंद को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं, परंतु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेश प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान और स्वराज्य की घोषणा—यह सब बहुत पहले से देश को दिया है ।" —विट्ठलभाई पटेल
  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-241

    Availability: In stock

    यजुर्वेद : युवाओं के लिए 
    'वेद : युवाओं के लिए' ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक 'यजुर्वेद : युवाओं के लिए' प्रस्तुत है । इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अंतर्गत समाहित किया गया है । ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ-धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है । यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है । यह 'कर्म' यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है । पारम्परिक दृष्टि से 'यज्ञ' का सीमित अर्थ होता है — अग्नि में आहुति देना । परन्तु 'यज्ञ' का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण भाव मुख्य रहता है । अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यघ के अंतर्गत आ जाते हैं । 
    इन मन्त्रों ऐसा यघ, दीघार्यु व धन-सम्पति तथा सुरक्षादि पाने  प्रार्थनाएं हैं । क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं । धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है । यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद के बढ़ावा मिलता है । बल्ह के कारन एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदुषण होता है । आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है । शांति, विश्रांति और आनंद की चाह है सबको । वह कैसे मिले ? यही मंत्र निर्देश करते हैं । 'विश्व-शांति' के लिए किया जाने वाला 'शांतिपाठ' इसी वेद की देन है । 
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो 'मन के युवा हैं' तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं । 
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-1
    Kamal Kishore Goyenka
    500 400

    Item Code: #KGP-57

    Availability: In stock

    मंजुल भगत : समग्र कथा-साहित्य (1)
    संपूर्ण उपन्यास
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मंजुल भगत को मैंने कुछ गोष्ठियों में बोलते सुना और संवाद भी किया तो पाया कि वे भारतीय स्त्री का प्रतिरूप है । उनमें भारतीय स्त्री के गहरे संस्कार थे । उनसे मिलना भारत की एक आधुनिक स्त्री से मिलना था । यह स्त्री भारत की संस्कृति और यहाँ  की मिट्टी की उपज थी, जिसमें गहरा अस्तित्व-बोध एवं  स्त्री-स्वातंत्र्य की चेतना थी । उन जैसी संस्कारवान, संकल्पशील, संघर्षरत और संवेदनाओ से परिपूर्ण लेखिका के संपूर्ण कथा-साहित्य के संकलन तथा संपादन का कार्य  करना मेरे लिए गौरव की बात है ।
    मजुल भगत की प्रमुख विधा कहानी है और इसी से वे साहित्य में प्रवेश करती हैं, परंतु उपन्यास के क्षेत्र मैं भी उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा का परिचय दिया और 'अनारो' जैसे उपन्यास की रचना करके देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की ।
    लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    इस समग्र रचना-संसार को पढ़कर कहा जा सकता है  कि साहित्य के प्रति मंजुल भगत की गहरी आस्था थी । लेखिका का दृढ़ विश्वास था कि आने वाले समय में, तमाम अपसंस्कृति एवं अमानवीयकरण के बावजूद उनके उपन्यास और कहानियाँ अवश्य ही पढे जाएंगे । बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्त्री को जानने और समझने के लिए मंजुल भगत का कथा-साहित्य एक प्रामाणिक दस्तावेज है
  • Chasing Maya (Paperback)
    Rohan Gagoi
    150

    Item Code: #KGP-335

    Availability: In stock

    Better jobs, bigger salaries, expensive cars, exclusive homes, exotic vacations, shopping abroad, admiration and jealousy of peers... What more can you expect from life! Or, may be, you can…! Come; explore your truth with ‘Chasing Maya’!
    ‘Chasing Maya’ is about thirty-two-year old Siddhartha Kumar, who in spite of his evident material success finds himself trapped in the grip of mediocrity – the distress and despair of being no different from millions of others in this world. Bemused, he sets on a quest to rediscover the zeal that once fuelled his dreams and passion and comes across with situations and people that lead him to astounding revelations.
    Share the anxiety, live the excitement and experience the magical transcendence as ‘Chasing Maya’ takes you on an incredible journey that every human soul instinctively seeks to undertake but only a negligible few truly succeed to accomplish!
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh
    Shravan Kumar
    995 746

    Item Code: #KGP-596

    Availability: In stock


  • The Story Of My Experiments With Truth (Paperback)
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    250 225

    Item Code: #KGP-349

    Availability: In stock

    A face we see all around us… everyday, even if we do not visit government offices. Teachings people swear by and entertained to in films. We still see his style being imitated in the political circles—that is Mohandas Karamchand Gandhi. One of the influencers of the millennium, the ‘half naked’ Indian man who shook the mightiest empire of the modern world, has a story to tell—his story. 
    An autobiography of Gandhi, the book starts with his birth, and ends with his experiences till 1921. The original manuscript was written in weekly installments in Gujarati by Gandhi, and was published weekly in his journal Navjivan from 1925 to 1929. It was later translated by Mahadev Desai in English, which too was published in installments in his other journal Young India.
    Unlike most autobiographies or biographies, Gandhi’s autobiography speaks about his fears, regrets, failures, struggles, and all that went through his mind while initiating and going through the experiments he conducted, in his and his immediate family’s lives. Gandhi hides nothing from his readers; he wants his experiences and experiments to reach out to people so that their life becomes worth living.
    Gandhi, through his lucid and simple style of writing, honest opinions, and candid narrations, takes us to the man who was ‘mahatma’ in his thoughts and actions.    
  • Shubhada
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    270 230

    Item Code: #KGP-574

    Availability: In stock


  • Roma Putri Ke Naam
    Shyam Singh Shashi
    300 240

    Item Code: #KGP-9355

    Availability: In stock

    श्याम सिंह शशि ने अनेक विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है। वहां की जीवन स्थिति, प्रकृति, संस्कृति और मनःस्थिति का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व भारत छोड़कर गए रोमा समुदाय पर विशेष लेखन किया है। तीन करोड़ यायावर भारतवंशी रोमा समुदायों की जीवन पद्धति का उनको विशेषज्ञ माना जाता है। रोमा पुत्री के नाम उनकी विशेषज्ञता का एक और रचनात्मक चरण है।
    आत्माख्यान-यायावरी उपन्यास ‘रोमा पुत्री के नाम’ 
    श्याम सिंह शशि की रचनाशीलता का नया आयाम है। लेखक के शब्दों में, "...यह यायावरी उपन्यास कलेवर में भले ही बहुत बड़ा न लगे किंतु इसमें एक अनूठी दुनिया है जो यथार्थ की अद्भुत यात्रा है। कला और साहित्य का सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में यायावरी प्रस्तुतीकरण है। मेरे नए-पुराने यात्रा-विवरणों की अनकही कथा है।य् लेखक ने परम घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भी इस संदर्भ में स्मरण किया है। इस उपन्यास को मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत भारतवंशी रोमा समाज का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
    यह उपन्यास रोमा पुत्री कैथी की मार्मिक और रोचक दास्तान है। यूक्रेन के कीव नगर में जन्मी, वारसा शहर में पली-बढ़ी, जर्मनी के बर्लिन महानगर में युवती हुई कैथी की दास्तान जो यायावर है और चित्रकार है। कैथी का जीवन उकेरते हुए लेखक ने विश्व के बीच रोमा समुदाय के आत्मसंघर्ष को अंकित किया है। इस समुदाय के मन में अपने प्रति हुए निरंतर अन्याय के लिए अत्यंत आक्रोश है। विशेषकर हिटलर के रक्तशुद्धता वाले कांड के लिए। रोमा भारत को ‘बारोथान’ कहते हैं—‘बड़ा स्थान’। यहां आते रहना उनको भाता है। फिर भी, उनका जीवन एक रहस्य है। कैथी के संदर्भ में लेखक कहता है, फ्रोमा पुत्री कितने मूड्स हैं तुम्हारी कला में, तुम्हारे जीवन में!"
    हिंदी में अपनी तरह का यह अन्यतम उपन्यास है। एक जीवित यायावर समुदाय के जीवन-समुद्र का अवगाहन करती एक अत्यंत पठनीय रचना।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhukar Singh
    Madhukar Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-14

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मधुकर सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'तक्षक', 'अगनुकापड़', 'उसका सपना', 'हरिजन सेवक', 'दुश्मन', 'कवि भुनेसर मास्टर', 'भाई का जख्म', 'लहू पुकारे आदमी', 'सत्ताचारी' तथा 'माई' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मधुकर सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan (Paperback)
    Surendra Tiwari
    350 291

    Item Code: #KGP-252

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे। (भूमिका से)
  • Kissa Maujpur Ka
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1819

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, कम से कम मैं नहीं सोच सकता ।
  • Nai-Naveli Paheliyan
    Kulbhushan Lal Makhija
    80

    Item Code: #KGP-952

    Availability: In stock


  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-4
    Balram
    350 291

    Item Code: #KGP-826

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-4
    समकालीन लघुकथाओं से गुजरते हुए इधर जिस खास बात पर ध्यान अटक गया है, वह है ‘लघुकथा में प्रवेश कर रहे काव्य-तत्त्व’। लघुकथा के इतिहास पर गौर करें तो पता चलेगा कि इस विधा के अंकुरण-काल में ही प्रेमचंद ने इसे गद्य-काव्य और कहानी के बीच की विधा कह दिया था, जिसका उल्लेख कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने अपने लघुकथा-संग्रह ‘आकाश के तारे, धरती के फूल’ की भूमिका में किया है। प्रेमचंद के अनुसार ‘लघुकथा में गद्य-काव्य का चित्र और कहानी का चरित्र होता है’। अज्ञेय इसे ‘छोटी कहानी’ कहते थे तो कमल गुप्त ने ‘लघुकहानी’ का झंडा फहरा रखा है और विनायक अपनी लघुकहानियों के लिए अलग से पहचाने जाते हैं। बालेंदुशेखर तिवारी, हरीश नवल, प्रेम जनमेजय और दामोदर दत्त दीक्षित आदि लघु-व्यंग्य के शामियाने तले गुफ्तगू करते रहे हैं। महेश दर्पण का संग्रह ‘लघुकहानी-संग्रह’ के रूप में छपा है, न कि लघुकथा-संग्रह के रूप में। मुकेश वर्मा की ऐसी रचनाओं को विष्णु नागर ने ‘छोटी कहानियां’ कहते हुए इस समय को छोटी कहानी का समय कहा है और हममें से अधिसंख्य लोग मुकेश वर्मा की छोटी कहानियों को उच्चस्तरीय लघुकथा के नमूने कहेंगे। उदय प्रकाश अपनी ऐसी रचनाओं को किस्से, छोटे किस्से कहकर पुकारना पसंद करते हैं अर्थात् छोटी कथा-रचनाओं की अहमियत तो निर्विवाद है, विवाद सिर्फ नाम पर है और काम सभी छोटी कथाएं प्रायः एक ही करती हैं : पाठक पर त्वरित प्रभाव, जैसे तुरंता भोजन, पाठक की मानसिक तृप्ति। परम। पाठक को परम मानसिक तृप्ति देने वाला चैतन्य त्रिवेदी का लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ बीसवीं सदी की ढलती शाम में लोकार्पित हुआ तो विष्णु प्रभाकर से लेकर राजकुमार गौतम तक प्रायः सभी पीढ़ियों के लोग उस पर लट्टू हो गए और कमलेश्वर ने तो कह ही दिया कि आज लघुकथा एक विधा के रूप में स्थापित हो गई। उसी विधा की एक सदी की संघर्ष-यात्रा का प्रतीक-वृत्तांत पाठकों को सौंपकर अब हम आश्वस्त हैं कि इस कारवां में मुकेश वर्मा जैसे सिद्ध नाम दिन-प्रतिदिन जुड़ते चले जाएंगे और अंततः एक दिन कहानी और उपन्यास जैसी प्रतिष्ठा लघुकथा को भी हासिल हो जाएगी।
  • Hindi Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    150

    Item Code: #KGP-61

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Vikalang Vibhutiyon Ki Jeevan Gaathayen
    Vinod Kumar Mishra
    700 560

    Item Code: #KGP-38

    Availability: In stock


  • Tinku Chala Nana Ke Ghar
    Anju Sandal
    60

    Item Code: #KGP-927

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Rituraj (Paperback)
    Rituraaj
    80

    Item Code: #KGP-1236

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही है । बहुराष्ट्रीय  निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे है और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है। वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कप दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते है और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Face Your Fears (Self-Help)
    David Tolin
    695 521

    Item Code: #KGP-355

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • Manikin Aur Anya Kahaniyan
    Gouri Shankar Raina
    200 170

    Item Code: #KGP-MKAAK

    Availability: In stock

    आधुनिक संवेदना की अलग-अलग मिज़ाज की इन कहानियों में मानवीय स्थिति की सच्चाइयों को विषय-भूमि बनाकर जीवन की विभिन्न स्थितियों में व्यक्ति की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं की प्रस्तुति की गई है। मानवीय संबंधों के संक्रमित यथार्थ को पकड़ने की कोशिश भी इन कथाओं में नज़र आती है। कहीं-कहीं ये तीखे रंगों के साथ उपस्थित होती हैं और कथा-दृष्टि के नए धरातल उभरते दिखाई देते हैं।

    कथाकार ने कहानी-लेखन की अपनी यात्रा में सभी मंज़िलें खुद चलकर तय की हैं और अपनी कुछ कहानियों को अन्य भाषाओं में विशेषकर जर्मन (यू टर्न), स्पानी (हाइवे), तेगु मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी तथा उर्दू में अनूदित होकर मुख़्तलिफ़ समाजों के विभिन्न पाठकों तक जाने दी है।

    आलोचकों का मानना है कि गौरीशंकर रैणा आधुनिक जीवन का एक प्रामाणिक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं और एक किस्सागो का रचना-व्यक्तित्व उनकी कहानियों से उभरता है।

  • Postmortem (Paperback)
    Ajeet Kaur
    100

    Item Code: #KGP-1310

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    230 207

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 213

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 416

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Qabra Tatha Anya Kahaniyan
    Raj Kumar Gautam
    150

    Item Code: #KGP-1845

    Availability: In stock


  • Himalaya Gaatha (2) Parv-Utsav
    Sudarshan Vashishath
    300 240

    Item Code: #KGP-167

    Availability: In stock


  • Lomad Vesh
    Rameshwar Prem
    60

    Item Code: #KGP-1818

    Availability: In stock

    लोमड़ वेश 
    लोमड़ वेश चरित्रों के माध्यम से ऐसी रंगयात्रा के लिए रंगसमूहों और दर्शकों की भागीदारी का रेखांकन है जो लोकधर्मी नाटकों की विरासत है । बेन जान्सन कृत विश्वप्रसिद्ध नाटयकृति वालापोनि के  कथासूत्रों पर आधारित लोमड़ वेश मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा लोभ, प्रपंच, ईषर्या-द्वेष की परत-दर-परत दो अनावृत्त करते हुए समकालीन रंगभाषा का अप्रतिम उदाहरण है ।
  • Mere Saakshatkaar : Ramnika Gupta
    Ramnika Gupta
    240 216

    Item Code: #KGP-623

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar (Paperback)
    Kamal Kumar
    130

    Item Code: #KGP-412

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कमल कुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rigveda Yuvaon Ke Liye
    A.W.I.C.
    400 320

    Item Code: #Kgp-rykl

    Availability: In stock


  • Brunch Tatha Anya Kahaniyan
    Shailendra Sagar
    225

    Item Code: #KGP-452

    Availability: In stock

    सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार शैलेन्द्र सागर के इस संग्रह में आज की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते उभरती सामाजिक-सांस्कृतिक टूट-फूट के तहत जटिल विसंगतियों के दुष्चक्र में फंसे पात्रों की कहानियां दर्ज हैं। अधिकांश कहानियों में स्त्री-पुरुष की परंपरागत छवियों के बरक्स उपभोक्तावादी दौर में बुनते-घुनते संबंधें में दिनोदिन पसरते तनावों, अलगावों और नए पनपते रिश्तों की ऐसी अलक्षित सच्चाइयां पूरी प्रामाणिकता के साथ नजर आती हैं जहां पुराने समय की रूढ़ भूमिकाएं धूमिल हैं और बाजारवाद के बदलते दौर में रिश्ते पहले से ज्यादा जटिल, यथार्थपरक और अवसरवादी होते जा रहे हैं। घर-परिवार से लेकर बाहर की दुनिया में संघर्षरत पात्रों की उद्विग्नता, बेचैनी और संवेदना के क्षरित होने की दास्तां यहां पूरी बेबाकी से उकेरी गई है। सच तो यह है कि संक्रमण के इस संवेदनहीन समय में निष्प्रभ पड़ते संबंधें की बारीकी से पड़ताल करती ये कहानियां आश्वस्त करती हैं कि अचूक अवसरवाद की अंदरूनी चालों को समझने के लिए हमें संवेदना संसार में लौटना पड़ेगा जहां आपको दरारों के बीच दिखेगी मुस्कराहट, अनकही टकराहटों के बीच दिखेगी मनुष्यता और हताशा के बीच कहीं से खिल उठेंगी आशा-उल्लास की कोंपलें भी...।
    विडंबनापूर्ण स्थितियों से उबरने के लिए रिश्तों की कोमलता को बचाए रखने की मुहिम छेड़ती हैं ये कहानियां...
  • The Story Of My Experiments With Truth (Autobiography)
    Mahtma Gandhi
    795 557

    Item Code: #KGP-576

    Availability: In stock

    A face we see all around us… everyday, even if we do not visit government offices. Teachings people swear by and entertained to in films. We still see his style being imitated in the political circles—that is Mohandas Karamchand Gandhi. One of the influencers of the millennium, the ‘half naked’ Indian man who shook the mightiest empire of the modern world, has a story to tell—his story. 
    An autobiography of Gandhi, the book starts with his birth, and ends with his experiences till 1921. The original manuscript was written in weekly installments in Gujarati by Gandhi, and was published weekly in his journal Navjivan from 1925 to 1929. It was later translated by Mahadev Desai in English, which too was published in installments in his other journal Young India.
    Unlike most autobiographies or biographies, Gandhi’s autobiography speaks about his fears, regrets, failures, struggles, and all that went through his mind while initiating and going through the experiments he conducted, in his and his immediate family’s lives. Gandhi hides nothing from his readers; he wants his experiences and experiments to reach out to people so that their life becomes worth living.
    Gandhi, through his lucid and simple style of writing, honest opinions, and candid narrations, takes us to the man who was ‘mahatma’ in his thoughts and actions.   
  • Hindi Vyakaran : Paaribhaasik Shabdkosh
    Ramraj Pal Dwivedi
    600 480

    Item Code: #KGP-2056

    Availability: In stock

    हिन्दी-व्याकरण : पारिभाषिक शब्दकोश
    हिन्दी की मानकता पर विचार बहुत विलम्ब से शुरू हुआ। दशकों तक एकाधिक हिन्दियाँ चलती रहीं। व्याकरण किस ‘हिन्दी’ के आधार पर बने, किसका नियमन करे, किससे उदाहरण ले, किस रूप की संस्तुति करे—यह तनाव उसे बरसों सालता रहा। छिटपुट अपवादों को छोड़ आज हिन्दी की मानकता प्रायः थिर हो चुकी है। हिन्दी-व्याकरण की पारिभाषिक शब्दावली भी एकरूपता एवं स्थैर्य की प्रक्रिया में है। शोधों एवं अन्तरभाषीय सम्बन्धों के परिणामस्वरूप नये-नये तथ्य एवं शब्द आ रहे हैं, पुराने छीज रहे हैं। शब्दशास्त्र का नियम ही है यह। प्रस्तुत ग्रंथ में स्थिर हो चुके एवं नवागत सभी शब्द दिए गए हैं। विवेचन में, यथासम्भव, बहुमान्य शब्द लिया गया है। मूल शब्द के साथ ही भेदोपभेद भी गिना दिए गए हैं; अन्यत्र उन भेदों-प्रभेदों को भी मूल शब्द की भाँति ही विवेचित किया गया है।
    प्रस्तुत कोश को अद्यतन बनाने के लिए हिन्दी-व्याकरण की परिधि के इधर-उधर मँडराते अनेकानेक पारिभाषिक शब्दों को प्रथम बार समेटने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार निर्धारक, भाषाभेद, मात्रा, रंजक क्रिया, विरामचिन्ह (मुख्यतः योजक चिन्ह), व्याकरणिक कोटियाँ, शून्य प्रत्यय, हिन्दी अक्षर, हिन्दी ध्वनियाँ आदि हिन्दी-व्याकरण के अनिवार्य अंग, जो अब तक दूर-दूर छिटके पड़े थे, कोश की सीमा का आदर करते हुए, एक ही जगह विवेचित किए गए हैं। हिन्दी में यह पहली बार हुआ है जो इस ‘कोश’ का वैशेष्य है।
  • Aashcharya Ki Tarah Khula Hai Sansar (Paperback)
    Ashok Vajpayee
    190

    Item Code: #KGP-407

    Availability: In stock

    आश्चर्य की तरह खुला है संसार 
    आधुनिक कवियों में अशोक वाजपेयी अरसे से प्रेम के एकाधिकारी कवि बने हुए हैं और यह उत्सवता सत्तर पार की उनकी शब्दचर्या में भी उतना ही दखल रखती है जितना कभी उनके युवा समय में। सच कहें तो प्रेम का कवि कभी बूढ़ा नहीं होता। वे कभी यह नहीं भूलना चाहते कि जीवन राग-अनुराग, सौन्दर्यबोध और सौष्ठवता का प्रफुल्ल विस्तार है।
    अशोक वाजपेयी के यहाँ प्रेम का यूटोपियाई स्वप्न नहीं देखा गया है बल्कि वह उनके लेखे जीवन का अध्यात्म है। उसे भाषा में खोजना व्यर्थ है क्योंकि वह शब्दों के बीच की चुप्पियों में/चाहत के अर्धविरामों में/संकोच के विरामों में/प्रेम की असम्भव संस्कृत में बसता है। रति से उनकी कविता की अनुरक्ति पुरानी है। रतिमुक्त प्रेम के बारे में कविता लिखना आसान है जबकि रति के रूपक रचना कठिन। अशोक वाजपेयी ने रति के सुघर और शिष्ट विन्यास में सफलता पाई है। इसीलिए कविता की लम्बी पारी खेलने वाले वाजपेयी के प्रेम और रति के रूपकों को भाषा के नेपथ्य में कौंधती अन्तध्र्वनियों में ही महसूस किया जा सकता है।
    कविता व ललित कलाओं के भव्य भुवन में रमते हुए अशोक वाजपेयी को कोई अर्धशती से ऊपर होने को आए। सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़ने वाला वह युवा अब अपनी परिपक्व वयस् में है। उसकी कविता एक अकेले की सृष्टि लगती है जहाँ वह सदियों से कवि-परंपरा को गाता चला आ रहा है। यह कवि अज्ञेय की तरह सुरुचिवान है तो श्रीकांत वर्मा की तरह स्मृतिसंपन्न। मुक्तिबोध के प्रति उसमें अनन्य अनुराग और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है। गोष्ठियों-सभाओं-अनुष्ठानों- महफिलों का यह निर्विकल्प नायक शब्दों का कुशल कारीगर है। वह देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण की तरह जैसे अनंत समय से आदि कवि का ऋण अदा कर रहा है।
    अशोक वाजपेयी की कविता की तहें वैसे ही खुलती हैं, जैसे आश्चर्य की तरह खुलता है संसार। उन्हें पढ़ते हुए अकसर लगता है कि हम कविता की किसी साफ-सुथरी कालोनी से होकर गुजर रहे हैं जहाँ की आबोहवा हमारे निर्मल चित्त को एक नई आनुभूतिक बयार से भर रही है। यह नया रचने की उत्कंठा है जो उनसे कहलवाती है: मैं उम्मीद को दूसरे नाम से पुकारना चाहता हूँ/मैं इस गहरी कामना को एक उपयुक्त संज्ञा देना चाहता हूँ/मैं पलटता हूँ कामना का कोश/एक नया शब्द पाने के लिए। जो कवि अपनी माँ को महसूस करते हुए लिख सकता है: तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं, तुम्हारे होठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है, तुम्हारी उँगलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं-वह अपनी कविता को सदैव नई बोली, नए स्पर्श देने के लिए प्रतिश्रुत रहेगा, इसमें संशय नहीं। अशोक वाजपेयी की कविताएँ-प्रेम कविताएँ बार-बार एक नया शब्द पाने, रचने और गढ़ने का उद्यम हैं।
    यह संग्रह अशोक वाजपेयी की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Naya Vidhaan (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    120

    Item Code: #KGP-203

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak) (Paperback)
    Narendra Kohli
    350 301

    Item Code: #KGP-50

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 476

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Mere Saakshatkaar : Nagarjun
    Nagaarjun
    300 249

    Item Code: #KGP-15

    Availability: In stock


  • She (Paperback)
    Dixy Gandhi
    245 196

    Item Code: #KGP-332

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times

    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.
  • Bayaan
    Kamleshwar
    200

    Item Code: #KGP-684

    Availability: In stock

    बयान

    इस संग्रह में ‘बयान के साथ कमलेश्वर की वे सभी कहानियाँ संगृहीत हैंजिन्हें कहानीकार की विशिष्ट उपलब्धियों के रूप में सभी ने स्वीकारा और सराहा है।

    नई कहानी आंदोलनके प्रमुख प्रवर्तक और प्रखर प्रवक्ता एवं ‘समांतर लेखन’ आंदोलन के प्रथम पुरुष के रूप में कमलेश्वर ने आम आदमी के साथ अपने लेखन को जोड़ा और अपनी रचनाओं में उसे सशक्त अभिव्यक्ति दी।

    आज़ादी मुबारक’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘राजा निरबंसिया’, ‘मांस का दरिया’, ‘कस्बे का आदमी’, ‘खोई हुई दिशाएँ’, ‘जार्ज पंचम की नाक’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘इतने अच्छे दिन', ‘रावल की रेल’, ‘कोहरा’, ‘समग्र कहानियाँके बाद ‘बयानकमलेश्वर द्वारा आम आदमी की अभिव्यक्ति की सशक्त सनद है।