Filter selection

Author
Price

423

  • grid
  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 264

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Mere Saakshatkaar : Shiv Murti
    Shivmurti
    380 323

    Item Code: #KGP-745

    Availability: In stock


  • Million Dollar Note Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    125

    Item Code: #KGP-283

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात हैं ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Sant Kavi Dadu
    Baldev Vanshi
    220

    Item Code: #KGP-100

    Availability: In stock

    संत कवि दादू
    श्री दादूजी महाराज की वाणी काव्यमयी है । अतः  महाराज की वाणी काव्य है । श्री दादूजी महाराज और कबीर जी में प्रकृति भेद के कारण दोनों के व्यक्तित्व में स्वभावत: भेद आ गया है । वैसे उनके विचारों और सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है । दोनों ही संत ज्ञानश्रयी  धारा के अग्रणी संत हैं । दोनों का मार्ग भक्तिमार्ग है । दोनों में ही जहाँ हिंदू और मुसलमानी मजहबों की आलोचना की है वहीं दोनों ने भारतीय दार्शनिकों और भक्तों के विचारों को स्वीकार किया है ।
    हम पहले ही कह चुके है कि यद्यपि श्री महाराज ने अपनी वाणी में बार-बार भक्तों और संतों के नामों का आदरपूर्वक संस्मरण किया है, उनकी वाणी में गोरखनाथ, नामदेव, कबीर, पीपा, रैदास आदि के नाम बार-बार आए हैं, किंतु उनकी श्रद्धा कबीर में अधिक है :
    साँचा शब्द कबीर का, मीठा लागे मोय । 
    दादू सुनताँ परम सुख, केता आनंद होय ।
  • Nasha Jeevan Ka Saar Nahin
    Jagat Ram Arya
    50

    Item Code: #KGP-1228

    Availability: In stock

    नशा करने वाला अपना मनुष्यत्व खो बैठता है, स्वास्थ्य व पैसे की बरबादी कर गृह-कलह को जन्म देता है और समाज में अपनी प्रतिष्ठा भी गंवा बैठता है। जिस दिन से व्यक्ति नशा करने लगता है, समझिए कि उसी दिन से वह अपने विनाश का मार्ग प्रशस्त कर लेता है। अगर बीच ही में समय रहते संभलकर वह नशे से किनारा कर लेता है तब तो ठीक है वरना यह मार्ग अंततः उसे दुर्दशा और दुर्गति के कंटीले रास्तों पर घसीटता हुआ मौत के अंधेरे गहरे गर्त में धकेल देता है। इस पुस्तक में नशाखोरी के दुष्परिणामों को उजागर करने और उनसे बचने से संबंधित एक प्रेरणादायी, शिक्षाप्रद कथा है।
    —जगतराम आर्य
  • Vaigyanik Sahitya Ke Anuvaad Ki Samashyayen Aur Unka Samadhan
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    400 300

    Item Code: #KGP-9385

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का है। पूरा विश्व विज्ञान की उपलब्धियों, क्षमताओं, संभावनाओं और आवश्यकताओं से चमत्कृत है। विज्ञान की तमाम शाखाओं-प्रशाखाओं का अध्ययन करने के लिए जो पाठ्य सामग्री तैयार होती है वह मूलतः अनुवाद पर ही निर्भर है।
    जाहिर है कि वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद अत्यंत विशिष्ट होता है। अत्यंत कठिन भी। निश्चित पारिभाषिक शब्दावली, सुनिश्चित अर्थबोध, व्यापक संकेत पद्धति आदि के कारण वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद करते समय किसी को भी सूचना और ज्ञान के साथ सटीक शब्दावली का अभ्यास होना अपेक्षित है। प्रस्तुत पुस्तक ‘वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की समस्याएं और उनका समाधन’ में इसी विषय के अनेक पक्षों पर विचार किया गया है। यह वस्तुतः प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की सामग्री की हिंदी में अनुवाद की समस्याओं का लेखा-जोखा है। प्रस्तुत पुस्तक का संपादन डाॅ. भोलानाथ तिवारी तथा वैश्विक मान्यता प्राप्त विद्वान् डाॅ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने किया है। इसमें विषय वेफ अनेक अधिकारी विद्वानों के लेख शामिल हैं।
    संपादक के शब्दों में, ‘जब भी वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद किया जाता है तो प्रायः हमें कुछ शब्द नए बनाने पड़ते हैं या संस्कृत से या स्रोत भाषा अंग्रेजी से या अन्य भाषाओं, बोलियों से लेने पड़ते हैं। इस तरह हमारी भाषा की वैज्ञानिक शब्दावली में वृद्धि होती है...।’ एक बेहद जरूरी पुस्तक।
  • Mere Saakshatkaar : Devendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    200

    Item Code: #KGP-548

    Availability: In stock


  • Rachna Ka Jeevdravya
    Jitendra Shrivastva
    600 450

    Item Code: #KGP-9222

    Availability: In stock

    ‘रचना का जीवद्रव्य’ इस दौर के महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव की नई आलोचना पुस्तक है। इस पुस्तक की परिधि में आपातकाल के बाद की हिंदी कहानी का इतिहास है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन की अद्वितीय आत्मकथा का गहन विश्लेषण भी। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब हैं तो विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर भी। जितेन्द्र जिस बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कविता पर विचार करते हैं, उसी बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कथा साहित्य पर भी। वे आलोचना के औजारों को गड्डमड्ड नहीं करते। उनकी आलोचना में गहरी विचारशीलता है। जितेन्द्र श्रीवास्तव जब भी किसी विषय को उठाते हैं, उसे संपूर्णता में समझने-समझाने का उद्यम करते हुए उसे एक सर्वथा नई ऊंचाई भी देते हैं। यह अकारण नहीं है कि उनकी छवि एक विश्वसनीय आलोचक की है। वे भाषा की ताकत को जानते हैं इसलिए भाषिक पारदर्शिता के घनघोर आग्रही हैं। इस पुस्तक में संकलित आलेख भाषिक ताज़गी के अप्रतिम उदाहरण हैं। यह देखना सुखद है कि जितेन्द्र अपने पाठकों को उलझाते नहीं हैं। वे उन्हें वह मार्ग दिखाते हैं जो बिना किसी भटकाव के रचना के जीवद्रव्य तक ले जाता है। कहना न होगा कि जितेन्द्र श्रीवास्तव के बहुप्रशंसित और बहुउद्धृत आलोचनात्मक आलेखों की यह पुस्तक आलोचना के वर्तमान परिदृश्य को निश्चित रूप से संपन्न बनाएगी। 
  • Piya Peer Na Jaani
    Malti Joshi
    200

    Item Code: #KGP-1982

    Availability: In stock

    पिया पीर न जानी
    इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खडे होकर, स्वाधीनना की पचासवीं वर्षगाँठ मनाते हुए भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि भारतीय नारी पूर्णरूपेण स्वतंत्र है ।
    परम्यरा की, रूढियों की, सनातन संस्कारों को अर्गलाएँ आज भी उसके पाँवों को घेरे हुए है । आर्थिक स्वातंत्र्य का झाँसा देकर उसे अर्थार्जन में भी झोंक दिया गया है । अब वह घर और बाहर दोनों तरफ पिसती है--दो-दो हुक्मरानों के आदेशों पर नाचती है । इस मायने में वह सोलहवीं सदी की नारी से भी जादा शोषित और असहाय हो गई है ।
    पर हाँ, इधर कुछ वर्षो में छटपटाने लायक ऊर्जा उसने अपने में भर ली है । इसीलिए कभी-कभी इन बंधनों को तोड़ने में भी वह सफल हो जाती है ।


  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat (Paperback)
    Bhagwat Rawat
    90

    Item Code: #KGP-1379

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamleshwar
    Kamleshwar
    200

    Item Code: #KGP-736

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमलेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "कोहरा', 'राजा निरबंसिया', 'चप्पल', 'गर्मियों के दिन', 'खोई हुई दिशाएँ', 'नीली झील', 'इंतजार', 'दिल्ली में एक मौत' , 'मांस का दरिया' तथा 'बयान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमलेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-2 (Paperback)
    Bhagwan Singh
    200 170

    Item Code: #KGP-7231

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"

    आज सच और झूठ के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है। भगवान सिंह इसमें अपना पाठ और पक्ष रखते हैं। वे वर्तमान राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि परिस्थितियों से उठ रहे सवालों से मुठभेड़ करते हैं। तात्कालिक घटनाओं को खँगालकर वे कोई जीवन-मूल्य या ऐतिहासिक सत्य सामने रख देते हैं। असहिष्णुता, आजादी, देशभक्ति, भारतमाता की संकल्पना, राजनीति का सांप्रदायिक कारोबार जैसे आयोजित-प्रायोजित प्रश्नों के बीच यह पुस्तक एक प्रकाश स्तंभ है। संवाद की अत्यंत पठनीय शैली में लिखे गए इसके आलेख आमने-सामने बैठकर की जाने वाली बातचीत का सुख भी देते हैं। उस हरेक पाठक के लिए एक अपरिहार्य पुस्तक जो वर्तमान की विशेषताओं और विरूपताओं दोनों को समझना चाहता है। 
  • Peeth Peechhe Ki Duniya
    Neelam Chaturvedi
    200 180

    Item Code: #KGP-1833

    Availability: In stock

    पीठ पीछे की दुनिया
    कहानियां अब भावहीन हो जाना चाहती हैं। बहुत सारी आशाओं, सपनों और कसमों से जरा अलग हटकर। सांस लेना चाहती हैं। सीमाओं के परे पढ़ने वाले के अंतर्मन में पैठने वाली। नीलम की कहानियां सहजता से यह सब करती हैं। उन्होंने बातचीत की भाषा को इसके लिए चुना है। बोलने वाली भाषा। जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखें। हू ब हू।
    नीलम की कहानियां व्यंग्य का सहारा लेकर किसी चरित्र को उधेड़ती नहीं हैं। वे संबंधों को अनेक स्तरों तक ले जाने के लिए हैं। उनका ताप दफ्तरों में धीमे-धीमे सांस ले रहे लोगों को उकसाता है। बहुरंगी और मानवीय चरित्र अपने आप को कितना विचित्र बना डालने के लिए आतुर है। कहानियां यह इंगित करती हैं। पीठ पीछे की निस्संग दुनिया को देख पाना नीलम ने संभव किया है।
    संबंध जब बोझ बन जाते हैं तब नैतिकता घुलने लगती है। नीलम ने बहुत साहस से, अनेक कहानियों से इसे हम तक पहुंचाया है। यहां मध्यम संगीत की अनुगूंजें हैं। जैसे जीने का विश्वास। अदम्य। अचूक। प्रेम की टूटती डोर में, अवसाद में भी यह कला, आकर्षण की ओर ले जाती है।
    यह कहानी-संग्रह नए कथा क्षेत्र में सादगी, विस्तार और अनुपम अनुभवों से हमें संपन्न बनाता है।
  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid (Paperback)
    M.A. Sameer
    250 213

    Item Code: #KGP-7209

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Teen Taal
    Sanjay Kundan
    335 268

    Item Code: #KGP-9340

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध कथाकार संजय कुंदन का नवीनतम उपन्यास तीन ताल समकालीन यथार्थ को उसके समुचित कद में चित्रित करती रचना है। संजय अपने लेखन में जनप्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। व्यवस्था और सत्ता के अंतर्विरोध वे कलात्मक कुशलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं।
    ‘तीन ताल’ के केंद्र में तीन चरित्रा हैं—सुमित, पारुल और अभिषेक। उनमें मित्राता की अद्भुत लय है। सुमित पत्रकारिता के संकटों का सामना कर रहा है, पारुल अपनी सार्थकता हासिल करने के लिए छटपटा रही है और अभिषेक एक बड़ी कंपनी में काम करते हुए पाखंड का नग्न रूप देख रहा है। इन व्यक्तियों, संघर्षों के साथ देश-समाज की ज्वलंत समस्याएं गुंथी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार। इसने राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति को पंगु-सा कर दिया है। संजय एक स्थान पर लिखते हैं—‘लड़ाइयां चल रही थीं। छोटी-बड़ी कितनी लड़ाइयां। हो सकता है ये सब मिलकर एक दिन बड़ी लड़ाई का रूप ले लें। इसलिए संघर्ष रुकना नहीं चाहिए।’ क्योंकि तभी ‘नीला निरभ्र आकाश’ और ‘एक महीन चंपई-सी रेखा’ दिखने की संभावना निर्मित हो सकती है।
    यह उपन्यास रोचक कथानक के साथ कई जरूरी सवालों से भी गुजरता है। ध्वस्त होती पत्रकारिता, इंटेलेक्चुअल दलाल, भीषण बेरोजगारी, एनजीओ की लूटपाट, जनजागरूकता और काॅमर्स के बीच मारक संघर्ष, स्त्राी-पुरुष संबंधों का तनाव, योग्यता की उपेक्षा...आदि-इत्यादि। सवालों के साथ समाधन के लिए उठ खड़ा एक जन आंदोलन भी है, जिसकी अगुआई ‘छोटे गांधी’ ने की। एक हालिया इतिहास भी इस रचना में दर्ज है।
    संजय कुंदन सच को सूक्तियों में बयान करते हैं। जैसे—‘अब नौकरी का अर्थ है व्यक्ति का अनुकूलन बाजार के प्रति।’ ऐसे ही यथार्थ का मुकाबला करने के लिए ‘तीन ताल’ नाट्यदल का गठन होता है। उद्देश्य है जनजागरण। क्योंकि भविष्य संकटों से घिरा है। उपन्यासकार लिखता है—‘मुझे तो डर है कि एक दिन सब कुछ काॅरपोरेट के हाथ में हो जाएगा।’ इसलिए चेतना में ‘नवगति नवलय ताल छंद नव’ की आवश्यकता है। यानी, एक नया स्वप्न!
    ‘तीन ताल’ एक नए स्वप्न की शुरुआत है।
  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-771

    Availability: In stock


  • Vikalang Vibhutiyon Ki Jeevan Gaathayen
    Vinod Kumar Mishra
    700 560

    Item Code: #KGP-38

    Availability: In stock


  • Rigveda Yuvaon Ke Liye
    A.W.I.C.
    400 320

    Item Code: #Kgp-rykl

    Availability: In stock


  • The Great Gatsby (Paperback)
    F. Scott Fitzgerald
    99

    Item Code: #KGP-1134

    Availability: In stock

    Nick Carraway, the narrator of the novel, takes us back to the spring in 1922, when Wall Street was booming, and bootleggers were in business due to the alcohol ban. Nick travels to New York from the mid-west in order to become a bondsman. He takes residence in West Egg, next to a huge mansion which belongs to a mysterious Mr. Gatsby.  Nick is reacquainted with Daisy and Tom Buchanan, a wealthy couple who lives across the bay from him. Nick befriends Gatsby, who is revealed to be infatuated with Daisy. Nick arranges for them to meet, and they began to have an affair.  Tom, who is also having an affair with a married woman, confronts Daisy and Tom, and Daisy is forced to return to Tom. As Daisy and Gatsby drive off afterwards, they run over and kill Myrtle Wilson, Tom's mistress. Tom lies to Myrtle's husband, and tells him that Gatsby was the driver, when in reality, Daisy was driving. Wilson shoots Gatsby at his home afterwards, and then commits suicide. Nick is disillusioned with the life he planned for in New York, and returns west to his home town.
    Nick reflects that just as Gatsby's dream of Daisy was corrupted by money and dishonesty, the American dream of happiness and individualism has disintegrated into the mere pursuit of wealth. Though Gatsby's power to transform his dreams into reality is what makes him “great,” Nick reflects that the era of dreaming—both Gatsby's dream and the American dream—is over.
  • Kya Haal Sunaavaan
    Narendra Mohan
    390 351

    Item Code: #KGP-696

    Availability: In stock


  • Rang Aakash Mein Shabd
    Narendra Mohan
    1500 1200

    Item Code: #KGP-674

    Availability: In stock

    रंग आकाश में शब्द नरेन्द्र मोहन और शामा की एक ऐसी अपूर्व संस्कृति है जिसमें रंग और शब्द, चित्र और कविता परस्पर जुडे होते हुए भी अपना एक मौलिक उत्कर्ष रचते है । यहीं एक साथ कई सौंदर्य-छवियां, रंग-रेखाएँ और शब्द प्रकाशमान हैं। हिंदी में, भारतीय कविता में इसे अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग माना जा सकता है ।
    कविता और चित्र यहाँ विंब-प्रतिबिंब रूप ने आमने-सामने नहीं हैं, साथ-साथ हैं । उनमें अनुपात बैठाना या अर्थों-आशयों की समांतरता दूँढ़ना दोनों कलाओं को कमतर आँकना होगा, हालाँकि दोनों ने छिपे रचना-सूत्रों की खोज की जा सकती है । दरअसल, कविता और कला संबंधी यह एक बिलकूल नई तरह का अंतरावलंबन है । चित्रों  के रंग-संकेत, छवियां और छायाएँ यहाँ कविता के अंतरंग का हिस्सा बनी हैं।
    चित्र के संवेदन धरातलों और सौंदर्य-रूपों को, अमूर्तन में लिपटी हुई रंग-रेखाओं के शिल्प को अपनी संवेदना में ढाल कवि ने यहाँ अपनी कल्पना शक्ति से कविता के शब्द में रचा है। चित्रों की रंग-गतियों में प्राकृतिक बिंबो और दृश्यावलियों में झाँकने की चित्रकार की ललक को, रंगों की कंपकंपाहट और थरथराहट को, दौड़ते भागते रंगों में लिपटी उदासी, पीड़ा, खामोशी और खोए हुए वजूद को कवि ने कविता की लय, बिंब-विधान और संरचना का हिस्सा बना दिया है । चित्रों के रंग कवि को अँधेरे ने लपटों की तरह उठते दिखे हैं । ऐसा भी लगा जैसे अँधेरे का एक उफनता समुद्र हो जिसकी उत्ताल तरंगें आग से दीप्त हों। ऐसे ही किसी क्षण में उसे महसूस हुआ :
    रंगों के पीछे आग है
    और रेखाएँ चुप नहीं है


  • Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam
    Gopal Rai
    425 361

    Item Code: #KGP-259

    Availability: In stock

    दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
    प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
     दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
    दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
    ‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
    वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’
  • Chandragiri Ke Kinare
    Sara Aboobkar
    75

    Item Code: #KGP-1958

    Availability: In stock


  • Aadarsh Ghar-Parivaar Aur Mahilayen
    Sudha Gautam
    180

    Item Code: #KGP-187

    Availability: In stock

    'आदर्श घर-परिवार और महिलाएँ' पुस्तक में सुधा गौतम ने अपने अनुभवों के आधार पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी है, उनमें से कुछ शीर्षकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है, यह पुस्तक महिलाओं के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होगी :
    ० जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
    ० छोटी-छोटी बातों से न हो परेशान
    ० बाँधे रखें पति को
    ० कड़वी यादे भुला दें
    ० जब आप फोटो खिंचवाने जाएं
    ० आप और आपकी शारीरिक गठन
    ० आप और आपका परिधान
    ० आप और आपकी नींद
    ० वर्तमान में जीना सीखें
    ० यदि आपके घर में नौकर है
    ० आप और आपकी खरीदारी
    ० आप और आपके घर के कीड़े-मकोड़े
    ० आपकी बढती उम्र और आप
    ० बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए
    ० जब आप सफर पर जाएं
    ० जब आपके मेहमान आपके घर आएं
    ० आप और आपकी सेहत
    ० बच्चों के लिए नाश्ता 
    ० चमकदार त्वचा के लिए
    ० खूबसूरत होंठों के लिए
    ० त्वचा में निखार के लिए
    ० गर्मियों में आपका मेकअप
    ० मुँहासों से छुटकारा
    ० खूबसूरत बालों के लिए
    ० आपकी गर्दन रहे सुंदर
    ० धूप का चश्मा
    ० आप और आपके गहने
    ० आपके घर का फर्श
    ० महिलाएँ और रसोई
    ० आपके गरम कपडे
    ० कैसे छुड़ाएँ कपडों के दाग
    ० अपने बच्चों के मित्र बनिए
    ० जब बच्चा स्कूल जाने लगे
    ० जिद्दी बच्चा
    ० माँ-बेटी का रिश्ता
    ० बच्चे कैसे बनाएं अपनी अलग पहचान
    ० बच्चे अपना काम स्वयं करें
    ० बच्चे भोजन बेकार न करें
    ० शरारती बच्चों को कैसे सुधारें
    ० बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए
    ० जब आपका बच्चा आपसे दूर रहे
    ० छात्र और परीक्षा
    ० बच्चे कैसे रहें परीक्षा के दिनों में  तनावमुक्त
    ० कैसे लिखे प्रश्नों के उत्तर
    ० कैसे मिले परीक्षा में सफलता
    ० आपका कंप्यूटर
    ० आप और आपके छोटे बच्चे
    ० बच्चों की छोटी-मोटी तकलीफें
    ० घरेलू दवाइयाँ
    ० छोटी-छोटी काम की बातें

  • Zindgi Ka Zaayaka
    Sadiq
    180

    Item Code: #KGP-196

    Availability: In stock

    जिंदगी का जायका 
    पिछले कई वर्षों से मैं हिंदी ही में ग़ज़लें लिख रहा हूँ। बीच में कभी-कभार यूँ भी होता है कि उर्दू में ग़ज़ल हो जाती है। 1999 की एक रात जब कुछ लिखने का मूड बना और मैंने एक ग़ज़ल लिखी जो हास्य-व्यंग्य से भरपूर थी। फिर उसी मूड में कई दिन तक ऐसी ही ग़ज़लें लिखता रहा। ये ग़ज़लें लिखकर मुझे एक अजीब-सा संतोष मिलता था और ख़ुशी होती थी। ऐसा लगता था कि मैं अपने और अपने समय के बारे में ईमानदारी, सच्चाई और निर्भीकता के साथ वह सभी कुछ लिखता जा रहा हूँ जो कि मुझे लिखना चाहिए। मैंने जब इसका ज़िक्र कमलेश्वर जी से किया तो उन्होंने ‘दैनिक भास्कर’ के रविवारीय परिशिष्ट में हर हफ्ते उनके प्रकाशन का सिलसिला शुरू कर दिया। प्रचलित ग़ज़ल से पृथक् और विशेष पहचान बनाने के लिए ‘हज़ल’ शीर्षक दिया गया और इस तरह काफी समय तक मेरी हज़लें ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित होती रहीं और मैं उनमें प्रत्यक्ष रूप से अपने समय का इतिहास रकम करता रहा। फिर अचानक वह मूड ख़त्म हो गया। सिर्फ छपने के लिए लिखते रहना मैंने पसंद नहीं किया। कुछ समय बाद फिर मूड बना तो फिर बहुत-सी ‘ग़ज़लें’ लिख डालीं, जो ‘जिंदगी का ज़ायका’ में शामिल हैं।
    -सादिक
  • Virajbahu (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1246

    Availability: In stock


  • Hashiye Ka Raag
    Sushil Sidharth
    300 240

    Item Code: #KGP-9334

    Availability: In stock


  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Toro Kara Toro-2 (Sadhna)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-763

    Availability: In stock


  • Ek Kiran : Sau Jhaniyan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    195 176

    Item Code: #KGP-676

    Availability: In stock


  • Sikhon Ka Itihaas (Paperback) (Two Valumes)
    Khushwant Singh
    950 760

    Item Code: #KGP-268

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shriniwas Vats
    Shrinivas Vats
    200 180

    Item Code: #Dpks

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ibbar Rabbi (Paperback)
    Ibaar Rabbi
    90

    Item Code: #KGP-1406

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : इब्बार रब्बी
    बचपन में महाभारत और प्रेमचंद होने का भ्रम, किशोर अवस्था में छंदों की कुंज गली में भटकने का भ्रम, फिर व्यक्तिवाद की दलदल में डुबकियां । लगातार भ्रमों और कल्पना-लोक में जीने का स्वभाव । क्या आज भी किसी स्वप्न-लोक के नए मायालोक में ही खड़ा हूं? यह मेरा नया भ्रम है या विचार और रचनात्मकता की विकास-यात्रा? क्या  पता । कितनी बार बदलूं।
    नया सपना है शमशेर और नागार्जुन दोनों  महाकवियों का महामिलन । इनकी काव्यदृष्टि और रचनात्मकता एक ही जगह संभव कर पाऊं । जटिल और सरल का समन्वय, कला और इतिवृत्तात्पकता एक साथ । ध्वनि का अभिधा के साथ पाणिग्रहण ।  नीम की छांह में उगे पीले गुलाबों की खुशबू से नाए रसायन, नए रंग और नई गंध जन्म लें । गुलाबों की शफ्फाक नभ-सी क्यारी में बीजों-सी दबी निबोलियां । इस नई मिट्टी और खाद से उगने वाले फूल, लताएं और वनस्पतियां बनें मेरी कविता ।
  • Roma Putri Ke Naam
    Shyam Singh Shashi
    300 240

    Item Code: #KGP-9355

    Availability: In stock

    श्याम सिंह शशि ने अनेक विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है। वहां की जीवन स्थिति, प्रकृति, संस्कृति और मनःस्थिति का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व भारत छोड़कर गए रोमा समुदाय पर विशेष लेखन किया है। तीन करोड़ यायावर भारतवंशी रोमा समुदायों की जीवन पद्धति का उनको विशेषज्ञ माना जाता है। रोमा पुत्री के नाम उनकी विशेषज्ञता का एक और रचनात्मक चरण है।
    आत्माख्यान-यायावरी उपन्यास ‘रोमा पुत्री के नाम’ 
    श्याम सिंह शशि की रचनाशीलता का नया आयाम है। लेखक के शब्दों में, "...यह यायावरी उपन्यास कलेवर में भले ही बहुत बड़ा न लगे किंतु इसमें एक अनूठी दुनिया है जो यथार्थ की अद्भुत यात्रा है। कला और साहित्य का सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में यायावरी प्रस्तुतीकरण है। मेरे नए-पुराने यात्रा-विवरणों की अनकही कथा है।य् लेखक ने परम घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भी इस संदर्भ में स्मरण किया है। इस उपन्यास को मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत भारतवंशी रोमा समाज का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
    यह उपन्यास रोमा पुत्री कैथी की मार्मिक और रोचक दास्तान है। यूक्रेन के कीव नगर में जन्मी, वारसा शहर में पली-बढ़ी, जर्मनी के बर्लिन महानगर में युवती हुई कैथी की दास्तान जो यायावर है और चित्रकार है। कैथी का जीवन उकेरते हुए लेखक ने विश्व के बीच रोमा समुदाय के आत्मसंघर्ष को अंकित किया है। इस समुदाय के मन में अपने प्रति हुए निरंतर अन्याय के लिए अत्यंत आक्रोश है। विशेषकर हिटलर के रक्तशुद्धता वाले कांड के लिए। रोमा भारत को ‘बारोथान’ कहते हैं—‘बड़ा स्थान’। यहां आते रहना उनको भाता है। फिर भी, उनका जीवन एक रहस्य है। कैथी के संदर्भ में लेखक कहता है, फ्रोमा पुत्री कितने मूड्स हैं तुम्हारी कला में, तुम्हारे जीवन में!"
    हिंदी में अपनी तरह का यह अन्यतम उपन्यास है। एक जीवित यायावर समुदाय के जीवन-समुद्र का अवगाहन करती एक अत्यंत पठनीय रचना।
  • Sau Baal Kavitayen
    Atri Garg
    90

    Item Code: #KGP-1450

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhukar Singh
    Madhukar Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-14

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मधुकर सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'तक्षक', 'अगनुकापड़', 'उसका सपना', 'हरिजन सेवक', 'दुश्मन', 'कवि भुनेसर मास्टर', 'भाई का जख्म', 'लहू पुकारे आदमी', 'सत्ताचारी' तथा 'माई' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मधुकर सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Yugdrashta Shivaji
    Shashi Bhushan Singhal
    380 304

    Item Code: #KGP-288

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि ने खूब कहा है—
    ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। 
    कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ 
    महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे।
    आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।
    यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।
    उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-5)
    Shyam Singh Shashi
    600 450

    Item Code: #KGP-892

    Availability: In stock


  • Yahin Kahin Hoti Thi Zindagi
    Ajeet Kaur
    300 240

    Item Code: #KGP-9218

    Availability: In stock

    अजीत कौर की अपनी एक खास ‘कहन’ है, जिसके कारण उनकी कहानियां बहुत सादगी के साथ व्यक्त होती हैं और पाठकों की संवेदना में स्थान बना लेती हैं। ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ उनका नया कहानी संग्रह है। पंजाबी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां विषयवस्तु से नयापन लिए हैं और शिल्प के एतबार से पाठक को अजब सी राहत देती हैं। एक एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है, न केवल पठनीयता से समृद्ध है बल्कि एक दार्शनिक वैचारिक संपदा से भी संपन्न है। अजीत कौर की रचनात्मक सुघड़ता तो सर्वोपरि है ही।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
    Govind Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-170

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गोविन्द मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'जनतंत्र', 'फांस', 'सिर्फ इतनी रोशनी', 'सुनंदो की खोली', 'खुद के खिलाफ', 'युद्ध', 'खाक इतिहास', 'पगला बाबा', 'वरणांजलि' तथा 'मायकल लोबो' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-12

    Availability: In stock


  • Godhooli (Paperback)
    Bhairppa
    150

    Item Code: #KGP-1414

    Availability: In stock

    गोधूलि
    ‘वंशवृक्ष’, ‘उल्लंघन’ तथा ‘पर्व’ जैसे महान् उपन्यासों के यशस्वी कृतिकार श्री भैरप्पा के श्रेष्ठतम उपन्यासों में है—‘गोधूलि’। कर्नाटक के ग्रामीण अंचल के माध्यम से भैरप्पा ने भारतीय अस्मिता की पहचान को ‘गोधूलि’ में सांस्कारिक गौरव के साथ उभारा है।
    प्रामाणिकता के साथ निर्लिप्तता भैरप्पा के लेखन की विशेषता है, जो ‘गोधूलि’ में उभरकर सामने आई है। ‘गोधूलि’ के कई संस्करण कन्नड़ में निकल चुके हैं। कन्नड़ तथा हिंदी में यह उपन्यास फिल्माया भी जा चुका है।
    गोधूलि’ जीवन के प्रति आस्था और मूल्यों के संघर्ष का संकेत है।
  • Hamaaraa Lakshy : Laaney Hain Leelakamal
    Dr. Ramesh Kuntal Megh
    750 525

    Item Code: #KGP-683

    Availability: In stock

    हमारा लक्ष्य: लाने हैं लीलाकमल
    चैबीसेक लेखों-आलेखों-मोनोग्राफों वाली इस किताब में समग्र ‘संस्कृति पैटर्न’ के समावेश के संग-संग सौंदर्यबोधशास्त्र, मिथक-आलेखकारी एवं (यत्र-तत्र) देहभाषा का भी मिलयन हुआ है। इसमें दोनों सरोकार शामिल हैं–क्या (लक्ष्य) हैं तथा (कला-साहित्य, समाजविज्ञान-संस्कृति के लीलाकमल) कैसे होने चाहिए! आप भी उन्हें लें तथा स्वीकारें-परखें।
    इसीलिए इसमें विभिन्न ज्ञानानुशासनों के पारिभाषिकों तथा विविधआयामी संप्रेषणों का सहारा लिया गया है, जिससे ज्ञान तथा पद्धति की नई दिशाएँ भी परिलक्षित 
    हुई हैं।
    पढ़ते हुए हम-आप मरुतों के वाक् अक्षरों के साथ ऊँचे दूर तक उड़ें, मिथक के ‘स्वप्न समय’ से आधुनिक रिनासाँ के यात्रिक बनें, प्रसाद के ‘आँसू’ की नामलुकी प्रिया-रमणियों का साक्षात्कार करें, चंपा के ‘आकाशदीप’ के साथ कथासागर में यात्राएँ करें, वागीश्वर चित्रानुरागी आचार्य शुक्ल के कई सृजन-रहस्य पहचानें, मल्लिका साराभाई के नृत्य, त्रिलोचन के व्यक्तित्व तथा तालास्थल की अजीब प्रतिभा की शिनाख्त करें, मामल्लपुरम् से लेकर मेगासिटी चंडीगढ़ के वास्तुशिल्प और नगर-निवेश का आकल्प जाँचे तथा साहित्य की समसामयिक समाजशास्त्रीय चुनौतियों का भी आगाज करें।
    इस तरह ऐसे सही प्रश्नों के सही उत्तरों का निर्णय तो आपको ही करना है—असहमति अथवा समर्थन द्वारा।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare (Paperback)
    Vishnu Khare
    80

    Item Code: #KGP-1322

    Availability: In stock

    मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
    विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
    विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
    -नंदकिशोर नवल
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Akhilesh (Paperback)
    Sushil Sidharth
    250 213

    Item Code: #KGP-7191

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : अखिलेश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, श्रृंखला तथा अँधेरा।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अखिलेश   की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    200

    Item Code: #KGP-2079

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नरेन्द्र कोहली ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'परिणति', 'किरचें', 'दृष्टि -देश में एकाएक', 'शटल', 'नमक का कैदी', 'निचले फ्लैट में', 'नींद आने तक', 'संचित भूख', 'संकट' तथा 'छवि' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Us Desh Ka Yaaron Kaya Kahana
    Manohar Shyam Joshi
    345 276

    Item Code: #KGP-554

    Availability: In stock

    उस देश का यारो क्या कहना
     हिंदी की तमाम अनसुलझी बहसों में से एक यह  भी रही है की व्यंग्य को विधा माना जाय कि वस्तु ? मनोहर जोशी के यहाँ व्यंग्य एक दृष्टि या दृष्टिकोण, एक धजा या अदा की शक्ल अख्तियार  करता है। वे किसी भी स्थिति और व्यक्ति को, विधा और वस्तु को, पवित्र या अस्पृश्य  नहीं मानते । जिस तरह वे अपने को, उसी तरह और सब कुछ को धो-धाकर ठिकाने लगा देने में यकीन करते है । यही उनका कथा है यहीं उनका शिल्प ।
    कोई गुब्बारा दिखा नहीं कि मश्जो उसमें पिन चुभोने के लिए बेताब हो उठते है, गोकि वे इसे बडी तरतीब और तरकीब से करते हैं-- कुछ इस तरह कि वह भड़ाक से न फूटे, हवा धीरे-धीरे फुस्स करती निकले । गुब्बारे को अच्छी बरह पिचकाकर ही मश्जो चैन पाते हैं, जो उनकी ममता का सूचक है या निर्ममता का, यह अपने-आप में विवाद का विषय हो सकता है ।
    हिन्दी व्यंग्य-लेखन के आरंभिक उदाहरण और प्रतिमान यदि शिवशंभु के चिट्ठों में देखे जा सकते हैं तो उनके लगभग सौ वर्षों बाद लिखित 'नेताजी-कक्काजी संवाद' हमें एक बार फिर समय और समाज के आमने-सामने लाते है । तब इस विडंबना की ओर ध्यान जाए बिना नहीँ रहता कि चीजे और स्थितियां जितनी बदलती है, उतनी ही वे पहले जैसी रहती है ।
    इसलिए, लार्ड कर्जन और नैताजी और मुंगेरीलाल एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू जैसे नजर आएँ नो क्या आश्चर्य ।
    यह समझ चुकने के बाद केवल जीना ही समझना बाकी बचना है कि तिथियों, नामों और प्रसंगों के बासीपन के बावजूद, उनके पीछे मौजूद बहुत कुछ तरोताजा बना रहता है । मश्जो उसे कई तरह से झलकाते हैं, यहाँ तक कि छद्म गंभीरता के आवरण में छिपाकर भी ।
    हिन्दी ये एक समय अनेक तात्कालिक कारणों से जिस तरह 'एकांकी' का विस्फोट हुआ था, उसी तरह पत्रकारिता के पिछले दौर में 'व्यंग्य' की भरपूऱ खेती हुई है । कोई चाहे तो इस 'बम्पर क्राप' को 'स्वाधीनता के पचास वर्षों की देन' भी कह सकता है और उम्मीद बाँधी जा सकती है कि जश्न के इस मौके पर संसद का जो विशेष अधिवेशन हुआ था, उसके अनन्तर 'शान्तं पापम्’ नामक एक नया सीरियल शुरु होगा । वह मात्र पचास दिनों का होकर न रह जाय,
    बल्कि आगामी पचास वर्षों तक चलता हुआ, स्वाधिनता का शतक भी धूमधाम से मना सके, इस गुन्ताड़े में हमारे सुपर स्क्रिप्ट-राइटर मश्जो  इन दिनों-बाकी सभी हास्य-व्यंग्यकारों सहित- लगे हुए है ।
    यही वह वजह है कि सूचना मुझ जैसे मुहर्रमी व्यक्ति को देनी पड़ रही है कि आत्मसाक्षात्कार से लेकर आत्मधिक्कार  क्या आत्मशोधन तक की तमाम संभावित छवियों को समेटने वाली उस अखंड राष्ट्रीय गाथा के एल धमाकेदार ट्रेलर की भाँति अब आपके सामने पेश है--'उस देश का यारो क्या कहना ।'
    -अजितकुमार
  • Bhartiya Rajneeti Mein Modi Factor Tatha Anya Prasang (Paperback)
    Bhagwan Singh
    300 240

    Item Code: #KGP-7230

    Availability: In stock

    भगवान सिंह हमारे समय के ऐसे चिंतक हैं जिन्होंने दलगत राजनीति से दूर रहकर संपूर्ण राजनीतिक विवेक के साथ  समकालीन भारतीय सत्ता और व्यवस्था का तार्किक विश्लेषण किया है। उनकी यह नई पुस्तक भारतीय राजनीति में मोदी फैक्टर तथा अन्य प्रसंग एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विमर्श को व्यक्त करती है।
    बिना किसी राजनीतिक व्यक्तित्व का नामोल्लेख किए यह कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति का चरित्र बहुत बदल गया है। सत्तापक्ष और विपक्ष की अनवरत सक्रियताएं कभी देश की आर्थिक स्थिति का विवेचन करती हैं और कभी सांस्कृतिक संदर्भों पर बहस छेड़ती हैं।
    इस विवेचन और बहस को अत्यंत गतिशील बनाने का श्रेय भारतीय राजनीति के नए सत्ता समीकरणों को है। जाहिर है जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व राष्ट्र को मिला है तब से ऐसी बहुत सारी बातें उभरकर सामने आई हैं जो वर्षों से सुप्तावस्था में थीं। वे प्रश्न जो एक ‘मौन मंत्रणा’ के तहत जाने किन तहखानों में छिपा दिए गए थे। भगवान सिंह ने एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति को केंद्रीयता देते हुए राजनीतिक और सामाजिक परिवेश पर बहस छेड़ी है। यह उल्लेखनीय है कि भगवान सिंह कभी भी एकांगी चिंतन नहीं करते। वे तथ्यों और तर्कों के साथ अपनी बात रखते हैं। एक प्रसंग में लिखते हैं, ‘वह अवसर की समानता की नींव डाल रहा है। अपनी भाषा के माध्यम से ही सारे कामकाज के लिए अभियान चला रहा है और तुम समानता की बात करते हुए अंग्रेजी के हिमायती और स्वभाषा शिक्षा और समान अवसर वेफ विरोधी रहे हो।’
    पुस्तक को पढ़ते हुए समकालीन परिवेश में चारों ओर फैले वे सवाल दस्तक देने लगते हैं जिनका उत्तर देना आज एक बुद्धिजीवी का दायित्व है। कहना होगा कि भगवान सिंह ने तुलनात्मक प्रविधि का इस्तेमाल करते हुए संवादधर्मिता के साथ इस दायित्व का निर्वाह किया है। भारत और भारतीयता में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह एक अनिवार्य पुस्तक है।
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    1200 996

    Item Code: #KGP-607

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खण्डों में)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है।
  • Mere Saakshatkaar : Manager Pandey
    Manager Pandey
    125

    Item Code: #KGP-541

    Availability: In stock


  • Agyey : Kavi-Karm Ka Sankat
    Krishna Dutt Paliwal
    565 452

    Item Code: #KGP-710

    Availability: In stock

    अज्ञेय: कवि-कर्म का संकट
    प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी विमर्शों को हिंदी में स्थापित करने वाले आलोचकों में अग्रणी हैं।
    लगभग चार दशकों से बौद्धिक-सांस्कृतिक विमर्शों में उनकी हिस्सेदारी का एक अविस्मरणीय संदर्भ है। वे सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, भवानी भाई, गिरिजा- कुमार माथुर, मनोहर श्याम जोशी, निर्मल वर्मा के साथ-साथ मैथिलीशरण गुप्त और अज्ञेय से निरंतर संवाद करते रहे हैं। उनका विचार है कि यह समय आलोचना की परंपरागत पद्धतियों से हटकर नए विमर्शों में अर्थ-उत्पादन की बहुलार्थक प्रक्रिया से जुड़ने का है। आज ये विमर्श न केवल निर्णायक होने लगे हैं, बल्कि नई बौद्धिक चुनौतियों से जुड़कर वर्तमान की माँग हैं। पुराना आधुनिकतावाद का ‘आलोचना’ पद अब अपनी प्रामाणिकता खोकर संदिग्ध हो गया है। विनिर्मितिवादी पाठ-प्रविधियों ने हिंदी में ‘नव्य समीक्षा’ से हमेशा के लिए हाथ जोड़ लिए हैं।                     

    अज्ञेय के कवि-कर्म के संकट पर विमर्श करते हुए उनका ‘टेक्स्ट’ ही सामने रहा है--किसी पुरानी थियरी के चक्कर में लेखक नहीं पड़ा। उनके ‘पाठ’ की पढ़त में ध्यान रखा है कि पाठ स्वायत्त एवं आत्मनिर्भर नहीं होता। अर्थग्रहण की प्रक्रिया अंतहीन है। उसे किसी विचारधारा की प्रतिबद्धता के नाम पर जेल में नहीं डाला जा सकता। यहाँ एक पाठक-मन ने ‘पाठ’ से अपनी तरह की अर्थ-मीमांसा करने का अरमान रखा है। मूलतः यह पुस्तक ‘पाठकवादी आलोचना’ (रीडर ओरिएंटिड क्रिटिसिज्म) का साहित्यिक प्रवाह है, जिसमें प्रतिमानों-मूल्यों को ऊपर से थोपने का प्रयास नहीं है। यहाँ तो ‘पाठ’ को ‘पाठक’ ही अर्थ देता रहा है। 
    बीसवीं शताब्दी की बीज अवधारणा है--स्वाधीनता। अज्ञेय इसी अवधारणा को धारण करने वाले हिंदी के आधुनिक सृजन और चिंतन क्षेत्र में शीर्ष सर्जक रहे हैं। उन जैसा स्वाधीन और विद्रोही चिंतक किसी साहित्य को मुश्किल से ही नसीब हो पाता है। अज्ञेय अपनी परंपरा, भाषा, संस्कृति, समय और बोध को नया मोड़ देने वाले अनथक रचनाकार हैं। नई काव्य-प्रवृत्तियों की पैरवी करते हुए उन्होंने अनेक नवीन स्थापनाएँ की हैं, जिन पर आज भी विवाद-संवाद का सिलसिला जारी है। अज्ञेय ने जो लिखा वह आज भी हमारे कवि-कर्म की चुनौती है तथा रचना-तर्क को समझने की स्थिति।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Narsi Mehta
    Hari Krishna Devsare
    150

    Item Code: #KGP-9291

    Availability: In stock

    नरसी मेहता अपने समय के एक परम भागवत गृहस्थ संत थे। गुजरात की पवित्र भूमि का यह परम सौभाग्य था कि वहां ऐसे भगवान् के प्रेमी संत ने जन्म लिया। उनकी भगवत्भक्ति ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, अपितु समस्त भारत को प्रभावित किया। महात्मा गांधी को नरसी मेहता का निम्न पद बहुत प्रिय था, क्योंकि इसमें वैष्णव होने की जो व्याख्या की गई है, वह मानव-प्रेम का सच्चा संदेश देती है। आज लोग नरसी मेहता के इस पद से बहुत परिचित हैं-
    वैष्णवजन तो तेने कहिए, जे पीड पराई जाणे रे,
    पर दुःखे उपकार करे तोय, मन अभिमान न आणे रे।
    सकल लोक मां सहुन वंदे, निंदा न करे केनी रे,
    वाच काछ मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेनी रे।
    समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जेने मात रे,
    जिव्हा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।
    मोहमाया व्यापे नहिं जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मन मां रे,
    राम नाम शंुताली लागी, सकल तीरथ तेना मन मां रे।
    वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे,
    भणे ‘नरसैयो’ तेनुं दरसन करतां, कुल इकोतेरे तर्या रे।
  • Navak Ke Teer
    Sharad Joshi
    390 312

    Item Code: #KGP-21

    Availability: In stock

    नावक के तीर
    मैं धर्मयुग छोड़कर कलकत्ता गया । 'रविवार’ का प्रकाशन प्रारम्भ हो रहा था । वहीं पहुँचते ही मैंने पहला पत्र शरद जी को लिखा था : शरद जी, समय आ गया है । अब आप शुरू हो जाइये । आपकी यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि आपको हिंदी वालों ने नियमित स्तंभ लिखने का मौका नहीं दिया । शाद जी ने सहमति का पत्र तो भेजा, पर साथ ही यह भी जड़ दिया कि प्यारे, अब मैं देनिक स्तंभ के बारे में सोच रहा हूँ । कोई साहसी संपादक मिल ही नहीं रहा है ।  बहरहाल, उनका स्तंभ चालू हुआ । हमारी संपादकीय टीम ने काफी बहस-मुबाहसे के बाद तय दिया कि स्तंभ का नाम 'नावक के तीर' होना चहिए । बिहारी से साभार । उनका पहला लेख था-अथ गणेशाय नम: और स्तंभ का नाम छपा था-नाविक के तीर । पहला अंक बाजार में आते ही शरद जी की घबराहट-भरी चिट्ठी आयी--"भैया, नाविक नहीं नावक । अपना अज्ञान मुझ पर क्यों थोप रहे हो ।" खैर । कॉलम चला और खूब चला । पाठक प्रमुदित थे और कई व्यंग्यकार निराश। 
    मुझे गर्व की अनुभूति कभी-कभी होती रहती है कि हिन्दी व्यंग्य-लेखन की इस विजय-यात्रा में बतौर दर्शक ही, मेरी भी एक विनम्र भूमिका रही है ।
    --सुरेन्द्र प्रताप सिंह
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan (Paperback)
    Mannu Bhandari
    150

    Item Code: #KGP-1426

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है। 
  • Hum Yahan The
    Madhu Kankria
    590 413

    Item Code: #KGP-9351

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • Ek Koi Aur
    Amrik Singh 'Deep'
    250 225

    Item Code: #KGP-863

    Availability: In stock

    एक कोई और
    सुपरिचित कथाकार अमरीक सिंह दीप के अब तक पांच कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक वाक्य में कहा जाए तो दीप जी मानवीय समाज में पसरती पाशविकता और इंसानी रिश्तों में समाती संवेदनशून्यता के प्रति चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियां अधिकतर मनुष्यता के पक्ष में ही नहीं खड़ी दिखाई देतीं, बल्कि अमानवीय व्यवहार का मुखर विरोध भी करती हैं। उनके छठे कहानी-संग्रह ‘एक कोई और’ की कहानियां भी लेखक के इसी मनोभाव से उपजी हैं। भले ही इन कहानियों के कथानक, देशकाल, पात्र और कथोपकथन एक-दूसरे से भिन्न हैं, लेकिन इन सभी के मूल में आदर्श मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का स्वर सुनाई पड़ता है।
    इस संग्रह की कहानियां कुछ मायनों में दीप जी की पूर्ववर्ती कहानियों से अलग नज़र आती हैं। यानी ये कहानियां, कहानी के बने-बनाए फॉर्मेट से अलग खुद अपना आकार-प्रकार, गति और दिशा तय करती हैं। कुछ कहानियां तो अपने अंतिम सोपान तक पहुंचते-पहुंचते चौंकाती भी हैं। मिसाल के तौर पर कहानी ‘बर्फ़’ में एक मां का अपनी बेटी के प्रेमी के पास जाकर उसे मां बनाने का आग्रह करना, रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ती दिखती है। यहां पर याद आती है लेखक की एक और क्लासिक कहानी ‘देहदान’, जो पारंपरिक इंसानी रिश्तों को परिस्थितिवश नए ढंग से रचती है।
    इस संग्रह का आना इसलिए भी सुखद है, क्योंकि उम्र के सात दशक स्पर्श करने की दहलीज़ पर खड़े अमरीक सिंह पूरी ऊर्जा के साथ रचनारत हैं और धूल-धुएं और मेहनतकशों के शहर कानपुर की साहित्यिक रचनाशीलता में लगातार इज़ाफ़ा भी कर रहे हैं।
  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 618

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • Mera Jamak Vapas Do (Paperback)
    Vidya Sagar Nautiyal
    150

    Item Code: #KGP-7073

    Availability: In stock


  • Divangat Vriksh Ka Geet
    Jagmohan Singh Rajput
    125

    Item Code: #KGP-1568

    Availability: In stock

    दिवंगत वृक्ष का गीत
    जीवन के कई धु्रवांतों पर अपनी बौद्धिक उपस्थिति और प्रशासनिक दक्षता रेखांकित कर चुकने के बाद अकस्मात् एक अजनबी की तरह कविता के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति जताना, प्रत्येक उस भावाकुल मन की लाचारी होगी जो मानता हो कि जीवन न तो बुद्धि-व्यवसाय है, न ही कोरा भाव-विलास ही। कविता की कला को भी काव्य-विवेक की जरूरत पड़ती है जैसे कि भावावेगों के विस्फोट को जीवन-विवेक की। इन कविताओं में यह ‘विवेक’ साफ-साफ अनुभव किया जा सकता है।
    यथार्थ, शास्त्रीय यथार्थ, पंजीकृत और सूचीबद्ध यथार्थ के पार के यथार्थ का सीधा-सच्चा बयान करती ये कविताएँ उस संवेदनशील चित्त की देन हैं जो प्रत्येक पल सचेत और भाव- प्रखर रहा है। कविता अंततः भाव-प्रखरता ही तो है। व्यक्ति, समाज, समय और राजनीति का प्रति-अक्स रचती ये रचनाएँ उस कवि की कृतियाँ हैं, जो मूलतः सर्जक होकर भी अपने इस दावे की घोषणा नहीं ही करता रहा है। हिंदी कविता के पाठक ही तय करेंगे कि दावे का यह हक उसका बनता है या नहीं।
    मेरे भरोसे की ये कविताएँ उन जीवन-सत्यों और अनुभवों से लदी-फँदी हैं, जिन्हें तमाम जाने-पहचाने समकालीन कवियों ने औसत और मामूली समझकर दरकिनार कर दिया था। या फिर उनके देखने लायक अनुभव नहीं थे ये। जगमोहन सिंह राजपूत ने ज्यादातर मनमौज में आकर कहते-कहते कुछ ऐसा कह डाला है, जिसे कविता के सिवाय और कुछ भी कहना मुश्किल है। कहने में अपनी बेइंतहा सादगी, कथ्यों में असंदिग्ध भरोसेमंदी और रूपाकार में जानी-पहचानी नैसर्गिकता के चलते ये कविताएँ न तो वाम हैं, न दक्षिण। फिर भी, अगर कहना ही पड़े तो यही कि लोकपरकता ही इनका असली चरित्र है। भाषा, उसके मुहावरे और अभिव्यक्ति में भी ये उसी लोक की हैं जो किसी को भी अपने स्पर्श से कवि बना डालता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-1346

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ: मालती जोशी
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मालती जोशी के प्रतिनिधि कथा-संसार में नारी-विमर्श और उसकी अस्मिता के नाम पर लिखी जा रही तथाकथित आधुनिक नायिकाओं के चटपटे नारी-पात्र नहीं हैं, वरंच वहाँ निरूपण है ऐसी नारियों का, जो सचमुच हमारे परिवार, समाज और देश की स्त्री की रूपरेखाओं का चित्रण और निर्धारण करती है । दैनंदिन स्तर पर आज मध्यवर्गीय नारी सुबह-दोपहर-शाम जिन भभूकों में फंसी है, वहाँ अनिवार्यतः मानसिक उद्वेलन तथा वैचारिक उत्तेजन के दृश्य-परिदृश्य निर्मित होते हैं और इन्हीं की संतुलित सृजन-विसर्जन की प्रक्रिया मालती जोशी की कहानियों का प्रमुख बढ़ा-तत्त्व है ।
    इक्लीसवीं सदी के इस सदिच्छा काल में जब पारिवारिक भारतीय नारी अपनी इच्छा, क्रिया और ज्ञान-शक्ति के माध्यम से अपने स्वभाव की प्रवृत्ति को अक्षुण्ण रखते हुए, एक विकासशील परिपक्वता की ओर अग्रसर है, ऐसे में आवश्यक है कि जीवन की मनोहरता को बचाने से परिवार की यह प्रमुखतम इकाई सुदृढ़ रहे । पर रहे तो कैसे? इसी आधार को बुनती ये कहानियां पाठक-समाज की आश्वस्ति हैं  और संदेश भी ।
    मालती जोशी द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियां' हैँ-'बेटे की मां', 'सांस-सांस पर पहरा बैठा', 'प्रतिदान', 'कोख का दर्प', 'मोह-भंग', 'आउट साइडर', 'प्रॉब्लम चाइल्ड', 'उसने नहीं कहा', 'आस्था के आयाम’ तथा 'प्यार के दो पल बहुत है'।
  • Main Or Mera Man
    Dr. Sharad Nagar
    480 384

    Item Code: #KGP-7851

    Availability: In stock

    मैं और मेरा मन जीवन के एक विलक्षण साधक और रसिक की कलम से निकली हुई यादों, बातों, दास्तानों और दस्तावेज़ों का अनूठा सम्मिश्रण है। इस पुस्तक में हम मिलते हैं एक ऐसे सर्जक से जो अपनी गहरी से गहरी तकलीफें भूलने की कोशिश करता तथा तमाम जगहों और लोगों को दिए हुए अपने वायदों को निभाता हुआ उनके इतिहास और भूगोल को, उनकी बातों और वि़फस्सों को जिलाए रखने के काम में पूरे यव़फीन और मोहब्बत से जुटकर अपने जीने की ख़ुराक ढूँढ़ता है।
    डॉ. शरद नागर के मन में समाए इन लोगों और लोकों के किस्सों में हमें मिलते हैं घने पारिवारिक रिश्ते, गली-मोहल्लों के यादगार चित्रा और चरित्रा तथा अनदेखे पूर्वज। साथ ही हमें मिलती हैं बीसवीं सदी के सामाजिक इतिहास की कुछ ऐसी बारीकियाँ जिनके आज की पाठ्यपुस्तकों में पहुँचने की नौबत ही नहीं आती-जैसे, 1918 के इन्फ्ऱलूएन्ज़ा के प्रकोप की दिल को दहला देने वाली यादें; आगरा में बसे गुजराती नागरों के मोहल्लों-टोलों की भूली-बिसरी आवाज़ें; आज़ादी की जंग के दौर में मिले सृजन और सौहार्द के संस्कार; मैकॉले की नीति का शिक्षा और सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव; समाज के बदलते उसूलों और खुलती-कसती बेड़ियों के बीच औरतों की स्थिति ही नहीं, बल्कि उनका श्रम, उनकी रचनात्मकता, उनकी जंग; तथा भारतीय रंगमंच के इतिहास से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
    शरद जी एक साहित्यकार और ज़िंदगी तथा समाज की तहों में गहरे उतरकर रमने वाले आराधक और कलाकार के रूप में अमृतलाल नागर के बहुत बड़े उपासक थे। इस पुस्तक में प्रस्तुत उनका लेखन अमृतलाल नागर जी को लेखक और पिता के रूप में बड़े निराले ढंग से जिलाता है। हम न केवल लेखक बनने से जुड़ी अमृतलाल नागर जी की निजी और उनके परिवार की अनेक संघर्ष यात्राओं को पहचान पाते हैं बल्कि आज़ादी के पहले के तीन दशकों में और आज़ादी के बाद के चार दशकों में साहित्य और रंगमंच समाज से किस व़फदर गुँथकर अपनी दिशाएँ खोज रहे थे, उसका अहसास भी हमें ख़ूब होता है।
  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena
    Naresh Saxena
    190 171

    Item Code: #KGP-446

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब
  • Saundarya-Meemansa
    V.K. Gokak
    90

    Item Code: #KGP-9126

    Availability: In stock

    "सौंदर्य-मीमांसा" कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक डॉ० वी० के० गोकाक की कन्नड़ कृति 'काव्य-मीमांसे' का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में सौंदर्यशास्त्र पर यह अपने ढंग की पुस्तक होगी ओर निश्चय ही मोंदृवंशद्रस्व के अध्येताओं को इस पुस्तक से काफी सहायता मिलेगी । गोकाक ने विशेष भाषण-माला के अन्तर्गत सौंदर्यशास्त्र पर भाषण दिए थे । 'कला-स्वरूप', 'ध्वनि तथा प्रतिध्वनि', 'रस या जीवन-दृष्टि'–इन लेखों में लेखक ने भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना त्तत्वों के आधार पर विचार करके अपने मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । डॉ. गोकाक स्वयं कन्नड़ और अंग्रेजी के कवि, उपन्यासकार और श्रेष्ठ आलोचक हैं। गोकाक के पास जीवन का व्यापक अनुभव और अंग्रेजी साहित्य का अपार पांडित्य है । दार्शनिक मनोवृति से वस्तु को तटस्थ दृष्टि से देखकर उसके सत्य को परखने की जिज्ञासा उनमें है । इन लेखों में उन्होंने साहित्या, कला, धर्म के  तत्यों के आराधक होकर सौंदर्य के तत्तवों का साक्षात्कार किया है। नि:संदेह यह कृति भारतीय काव्यशास्त्र को लेखक की अमूल्य देन है। इस अनुवाद में यदि त्रुटियाँ मिल जाएँ तो समझिए यह मेरी कमजोरी है ।
    डॉ. टी. आर० भट्ट

  • Mere Saakshatkaar : Ramnika Gupta
    Ramnika Gupta
    240 216

    Item Code: #KGP-623

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Egypt (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7200

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Egyptian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Re’s Story, Isis, Osiris, The Greek Princess, The Shipwrecked Sailor, The Book of Thoth, Egypt’s Great Magician, this book is a compilation of 20 famous Egyptian short stories. 
    Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Egypt.
  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-1313

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]
  • Mayaram Ki Maya (Paperback)
    Jaivardhan
    80

    Item Code: #KGP-1368

    Availability: In stock

    ‘मायाराम की माया’ नाटक का केंद्रबिंदु मनुष्य है। सृष्टि के असंख्य जीवों में से मनुष्य एक ऐसा जीव है, जो ईश्वर की सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है। जिज्ञासा कहें या फितरत, कभी-कीाी मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व को ललकारता दिखाई देता है। उसका मन नाना प्रकार के विकारों से भरा पड़ा है।
    यही कारण है कि मनुष्य सोचता कुछ है, दिखता कुछ है और करता कुछ और है। समय आने पर प्रगाढ़ संबंधों को भी भूल जाता है। इस संसार में जन्म देने वाले ईश्वर की कृतज्ञता और श्रद्धा को भूल जाता है। ब्रह्मलोक में इसी बात पर चर्चा चल रही है कि क्या मनुष्य इस पृथ्वी लोक का सबसे सीधा जीव है? इस बात को प्रमाणित करने के लिए पृथ्वीलो से ‘मायाराम’ नाम के व्यक्ति को ब्रह्मलोक में लाया जाता है। 
    -जयवर्धन

    ‘मायाराम की माया’ को मैं फार्स की श्रेणी में ही रखना चाहूंगा। इस नाटक की स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों की बुनावट जयवर्धन ने फैंटेसी के अंदाज में की है। बाह्य यथार्थ से कोसों दूर, लेकिन आंतरिक यथार्थ के बहुत करीब और नाटक के अंत में ब्रह्मा का नारद से यह कहना ‘‘आप ठीक कह रहे हैं मुनिवर। एक इंसान की गलती की सजा समस्त इंसान को देना ठीक नहीं होगा। यह सृष्टि है। सृष्टि का चक्र सदा चलता रहेगा। हां, भविष्य में इंसान को बनाते समय इंसानियत थोड़ा ज्यादा डालनी होगी।’’
    -प्रताप सहगल
  • The Great Horizon (Biography)
    Debabrata Dasgupta
    345 286

    Item Code: #KGP-342

    Availability: In stock

    The Great Horizon is a biographical novel on Sir Alexander Fleming, a Scottish biologist and pharmacologist. His best-known discoveries are the discovery of the enzyme lysozyme and the antibiotic substance penicillin from the mold Penicillium notatum, for which he shared the Nobel Prize in Physiology or Medicine in 1945 with Howard Florey and Ernst Chain.
    Discovery of penicillin has come naturally as a life-giver to mankind. Disease-torn distressed humans have got a means of longevity through this life-saver. It has contributed in no less measure, to the average human longevity crossing the figure of seventies. The bright rays of the antibiotics have dispersed the dark clouds of sickness and diseases, which overcast the sky of human destiny. All this has been made possible due to the physician named Alexander Fleming who discovered it in 1928 and unfolded a new horizon.
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Pride And Prejudice (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-347

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Gulloo Aur Ek Satrangi (Part 3)
    Shrinivas Vats
    280 224

    Item Code: #KGP-567

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Mein Bhi Aurat Hoon
    Ansuya Tyagi
    245 221

    Item Code: #KGP-183

    Availability: In stock

    मैं भी औरत हूँ
    ‘हे भगवान् ! ओंकार चुप क्यों हो गया है ? क्या अब वापस वही स्थिति आ पहुँची है, जिससे मैं अब तक डरती आई हूँ ? जिस सच्चाई को जानकर पिछले दो पुरुष--नकुल व सौरभ--मुझे छोड़कर चले गए थे--एक प्रकार से मुझे ठुकराकर--बल्कि सौरभ ने तो अपनी पौरुष की कमी ही मेरे सिर पर थोप दी थी, मुझे ही दोषी ठहरा दिया था--पर ओंकार तो मुझसे शादी कर चुका है। क्या वह अब मुझसे तलाक लेने की सोचेगा ? कितनी जगहँसाई होगी, यदि कोर्ट में यह केस गया तो। सब मुझ पर कितना हँसेंगे ! कहेंगे, अरे, जब भगवान् ने ही तुझे इस लायक नहीं बनाया तो क्यों इच्छा रखती है वैवाहिक जीवन जीने की ! क्या संन्यासिनें इस दुनिया में नहीं रहतीं ? विधवाएँ नहीं रहतीं ? क्या कामक्रीड़ा इतनी अधिक महती आवश्यकता बन गई, जो इसने पूरी सच्चाई अपने होने वाले जीवनसाथी को भी नहीं बताई ? क्या पता, मीडिया इस बात को बहुत अधिक उछाल दे ! आखिर उन्हें तो एक चटपटा मसाला चाहिए लोगों को आकर्षित करने का। जिस बात को मैं इतने वर्षों से छुपाती आई हूँ, वही दुनिया के सामने मुझे नंगा कर देगी। इस नग्न सच्चाई को जानकर लोग मेरे माता-पिता को कितनी दयनीय दृष्टि से देखेंगे ! ओह ! इस वृद्धावस्था में क्या मेरे पापा, मेरे दादा जी ऐसी बातें सहन कर पाएँगे ?’
    (इसी पुस्तक से)
  • Hindi Vyangya Ki Dharmik Pustak : Harishankar Parsai
    Prem Janmejai
    480 360

    Item Code: #KGP-9358

    Availability: In stock

    डाॅ. प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित पुस्तक हिंदी व्यंग्य की धर्मिक पुस्तक: हरिशंकर परसाई अत्यंत मूल्यवान है।
    प्रेम जनमेजय हिंदी व्यंग्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार और इस विध के सबसे बड़े संपादक के रूप में सुप्रसिद्ध हो चुके हैं। उनके लेखन में साहित्य अपनी गरिमा के साथ विकसित होता है। अध्ययन और अनुभव के सहमेल से उनका रचनात्मक व आलोचनात्मक लेखन विशिष्ट बन गया है। प्रेम जनमेजय की एक बहुत बड़ी और अनुकरणीय विशेषता है—अपनी परंपरा के श्रेष्ठ रचनाकारों के कृतित्व को संजोना; उन रचनाकारों पर आलोचना पुस्तक संपादित करना। ...यह काम वे लगातार करते रहे हैं। उनसे अपेक्षाएं बहुत रहती हैं। हर बार की तरह इस किताब में भी वे अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं।
    यह किताब प्रेम जनमेजय के संपादकीय विवेक का परिचय देती है। इसमें परसाई का महत्त्व है, मूल्यांकन है। उनके व्यक्तित्व पर आलेख हैं। इसमें शामिल मुख्य लेखक हैं—राजेन्द्र यादव, सूर्यबाला, नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी, विश्वनाथ त्रिपाठी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, नरेन्द्र कोहली, शिव शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, अतुल चतुर्वेदी आदि। पुस्तक इन खंडों में संयोजित है—संपादकीय, चिंतन, स्मृतियों में, परसाई से बातचीत। परसाई पर पहले भी अच्छी सामग्री प्रकाशित हो चुकी है। यह पुस्तक उसमें गुणात्मक वृद्धि है। शीर्षक ही बताता है कि प्रेम जनमेजय किसी भी रचनाकार को धार्मिक पुस्तक की तरह अनालोचनीय, अन्यतम, मानवेतर और आसमानी नहीं मानते। शीर्षक में गहरा व्यंग्य है। जिन लोगों ने परसाई को पठनीय के स्थान पर पूजनीय बना रखा है, यह वाक्य उन पर तंज करता है।
    पुस्तक में शामिल साक्षात्कार में परसाई और प्रेम जनमेजय की बातचीत है। इसमें कुछ प्रश्नकर्ता और भी हैं। परसाई कहते हैं, ‘व्यंग्य का प्रयोजन एक चेतना जागृत करता है कि जो गलत है उसे बदलना है। बदलने के लिए साहित्य के अलावा बहुत सी चीजें हैं। राजनीतिक दल हैं, ट्रेंड  यूनियन हैं। परंतु व्यंग्य उनकी तरफ संकेत तो करेगा ही। व्यंग्य सिर्फ पोलिटिकल ही नहीं, रचनात्मक भी है।’ परसाई के मूल्यांकन के लिए यह एक अनिवार्य किताब है।
  • Kokh
    Roshan Premyogi
    300 255

    Item Code: #KGP-287

    Availability: In stock

    कोख
    सन् 1984 से एक किशोरी एक राजा की हवश का शिकार बनती है । उसकी कोख से जन्मे बच्चे के मन से करीब 25 साल बाद अपने सांवले रंग और नयन-नक्श को लेकर संदेह पैदा होता है । सदेह पुख्ता होता है तो वह पिता से लड़ता है अपनी माँ के लिए ।
    उपन्यास में तीन महिला पात्र हैं । इनमें मधुरिमा सिंह ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया । वह पहले मुझे सौतेली मां की तरह लगी, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती  गई, वह धरती की तरह धैर्यवान और समुद्र की तरह गरमाहट से भरपूर मां लगी । आई.ए.एस. प्रभुनाथ सिंह  पहले खलनायक लगते हैं, लेकिन जब कहानी खुलती है तो तमाम पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते है । शैलजा तो बहुत ही प्यारी और समझदार लड़की है, वह सीमान्त को बिखरने से बचाती है । दरअसल शैलजा खंड-खंड होकर नष्ट होने को तत्पर कुछ लोगों को फिर से एक परिवार बनने के लिए प्रेरित करती है । देखा जाए तो अपने व्यक्तित्व से शैलजा ही इस उपन्यास को बडा बनाती है । उसके प्यार को थोड़ा और स्पेस मिलना चाहिए था ।
    गायत्री देवी का संघर्ष और दंश मन को झकझोर देता है । कहानी अंत तक बांधे रखती है मन को, लेकिन यह थोड़ा अजीब लगता है कि गायत्री देवी के दंश को लेखक ने बेटे के प्यार और नैतिकता के बोझ तले दबा दिया, वैसे यह पुरुषप्रधान समाज की रीति है ।
  • Aalaap-Vilaap
    Rajendra Laharia
    150

    Item Code: #KGP-298

    Availability: In stock

    आलाप-विलाप
    कथाकार राजेन्द्र लहरिया के उपन्यास अपने समय से मुठभेड़ करते कथ्य के साथ ही मर्म को छुने वाले होते हैं और उनका शिल्प भी नव्यता से भरा और पाठकीय जिज्ञासा को उकसाने वाला होता है । वे अपने उपन्यासों को 'कहानी' की तरह साधते हैं, जहाँ कुछ भी फालतू होने  (लिखने) की गुंजाइश नहीं होती । 'आलाप-विलाप' भी इसका अपवाद नहीं है । बकौल लेखक, 'सकेतों की 'भाषा मनुष्य हमेशा से समझता आया है । कोई कहानी या उपन्यास लिखते वक्त मेरा ध्यान इस बात पर हमेशा बना रहता है कि मेरा काम यदि एक शब्द लिखने से चलता है तो अनावश्यक दस शब्द क्यों लिखूं! शब्दों की फिजूलख़र्ची तो कई तरह के नुकसान करती है... 
    'आलाप-विलाप' के बारे में एक सुधी पाठक की राय द्रष्टव्य है : 'कथाकार राजेन्द्र लहरिया का लपन्यास 'आलाप-विलाप' मार्मिकता से भरा व मूलत: राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छदमों को उदूघाटित करता है। जीवन की भयावह स्थितियों इस उपन्यास को जीवंत कथ्य देती है । छोटे-छोटे उपकथानकों में परिवेश की  पीड़ाओं के झकझोरने वाले वर्णन इसके प्रभाव को सघन करते हैं। हमारे समय की एक प्रमुख समस्या नक्सलवाद के उभार और उसकी वजहों को भी इस उपन्यास में देखा-पहचाना और समझा जा सकता है । प्रशासनिक और सांस्कृतिक-साहित्यिक छदमों और पाखंडों की लीलाएँ गरीब, कमजोर और संवेदनशील व्यक्तियों तथा तबकों को क्या-क्या नचाती हैं, इसका-दिलचस्प और बेधक दिग्दर्शन इस उपन्यास में है। और खास बात यह है कि  अँधेरे समय और स्याह चरित्रों के बीच भी उम्मीद की  कौंध से भरे कुछ ऐसे उजले चरित्र यह उपन्यास हमें देता  है, जो लड़ाई को बेहद कठिन समझते हुए भी अविचल  रूप से संघर्ष करते है, और इसलिए उनकी हार भी हमें  निराशावाद की ओर नहीं ले जाती । वह इस छोटे से उपन्यास  की बड़ी खुबी है... 
    कहा जा सकता है कि 'आलाप-विलाप' आकार से लघु, मगर सरोकार में बडा उपन्यास है ।
  • Vyangya Samay : Sharad Joshi (Paperback)
    Sharad Joshi
    225 191

    Item Code: #KGP-7225

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Aise Hamaare Harda
    Pradeep Pant
    350 280

    Item Code: #KGP-587

    Availability: In stock


  • Jangal Ke Jeev-Jantu (Paperback)
    Ramesh Bedi
    200

    Item Code: #KGP-178

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi (part 7)
    Shrinivas Vats
    340 272

    Item Code: #KGP-GAES-7

    Availability: In stock

    प्रिय बाल पाठको!

     

    आपने इस उपन्यास के  छह खंडों को जिस तत्परता से पढ़ाउनका लेखन भी उतनी ही तत्परता से हुआ है। लेखन के  दौरान कई अनूठे अनुभव हुए। ऐसी ही एक घटना का उल्लेख यहाँ करना चाहूँगा। 

    ग्रीष्म ऋतु थी। तिनके  चोंच में दबाए पक्षियों का एक जोड़ा घोंसला बनाने के  लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में इधार-उधार भटक रहा था। बरामदे में कुर्सी पर बैठा मैं उन्हें काफ़ी देर तक निहारता रहा। वे शायद यह सोचकर शांत बैठ गए कि यह व्यक्ति उठे तो बात बने।

     

    हुआ भी ऐसा ही। ज्यों ही मैं उठकर अंदर कमरे में गयावे उड़कर बरामदे में उस टाँड़ पर  बैठे जहाँ मेरा निजी सामान रखा रहता था। मसलन संदूकचीकिताबों के बंडलदवा की पुरानी शीशियाँ  डिब्बे।

     

    संभवतः परिंदे इस स्थान का पहले कई बार मुआयना कर चुके होंगे। तभी तो तिनके  एकत्र करने से पूर्व आश्वस्त हो गए थे कि घोंसले के  लिए यह एकदम सही स्थान है। घोंसला बनानेअंडे देने के  लिए उनकी दृष्टि में वही स्थान सर्वोत्तम हो सकता था जहाँ बिल्ली या अन्य हिंसक जीव  पहुँच सके।

     

    इस प्रयोजन के लिए यह स्थान सर्वोत्तम था। पशु-पक्षियों से ही नहींवर्षासर्दीगर्मी तीनों ऋतुओं के प्रतिकूल मौसम में भी यहाँ उनकी संतति सुरक्षित रह सकती थी। खैरमैंने इस ओर अधिक ध्यान  नहीं दिया और अपने नित्य प्रति के कार्यों से निवृत्त हो मैं कार्यालय चला गया। घर वापसी तक सूर्यास्त हो चुका था। ऐसे में मेरी अनुपस्थिति में यह बरामदा दिन भर निर्जन रहा। खग-युगल के लिए तब यह जगह किसी अभयारण्य से कम  थी।

    अस्तुकिताबों के बंडल के पीछे कब उनका नीड़ पूरा हुआ और कब मादा पक्षी ने उसमें अंडे दे दिएमुझे पता तक नहीं चल पाया। संभव थामुझे पता चलता तो मैं घोंसला  बनने देता। जाहिर है तिनकों से गंदगी फैलाती और पंछियों की बीट गिरने से किताबें खराब हो जातीं।


    एक दिन जब मैं बरामदे में पहुँचा तो टाँड़ पर उस पक्षी को बैठे देख मेरा माथा ठनका। मैंने सीढ़ी लगाई और यह देखने के लिए ऊपर चढ़ा कि माजरा क्या हैमेरा अंदाजा सही निकला। घोंसले में मादा ने दो अंडे दिए थे और उन्हें सेने के लिए वह उन पर बैठी थी। मुझे सीढ़ी पर चढ़ा देख नर पक्षी डरकर भाग गया। मादा वहीं बैठी रही। मैंने उसे डंडे से डराया। वह बड़ी मुश्किल से वहाँ से हटी। घोंसले में अंडे देख मैं नीचे उतर आया। मुझे समझ नहीं  रहा थाक्या करूँघोंसले को तोड़ना एवं अंडों को बाहर फेंकना  मेरी आस्था के विरुध था। यदि इन्हें वहीं रहने दूँ तो विष्टा एवं टूटे पंखों की गंदगी की कल्पना मात्र से अभी मितलाई आने लगी थी। हाँघोंसले में अंडे नहीं होते तो मैं अपनी संवेदनशीलता से समझौता  करते हुए सभी तिनके बाहर फ़ेंक देता।

     

    किंकर्तव्यविमूढ़ मैं कुछ  निर्णय लेताइससे पहले मादा पक्षी पुनः वहाँ  बैठी। इस बार वह यह सोचकर आई थी कि चाहे जो हो जाए उठूँगी नहीं। उसकी भाव-भंगिमाओं और मातृत्व के सम्मुख मैंने आत्मसमर्पण कर दिया।

     

    दो-तीन दिन बाद अंडों से चूजे निकल आए। अब स्थिति यह हो गई कि नीचे आसन पर बैठा मैं लेखन की कोशिश करता और ऊपर दोनों पक्षी बारी-बारी से चुग्गा लाने के  लिए उड़ान भरते। जब मादा जाती तो नर बच्चों को अपने पंखों की गरमाहट का अहसास देता और जब नर जाता तो मादा उनके पास रहती थी।

     

    यह सिलसिला दो-ढाई माह तक चलता रहा। इस दौरान नीचे बैठे हुए मेरा ध्यान साहित्य-सृजन में कम पक्षियों की चुहलबाजी देखने में ज्यादा बीतता था। हर रोज खगशावकों को बड़े होते देखनामाँ की चोंच से पहले चुग्गा पाने की होड़ में एक-दूसरे को धकेलते खगशावकों की प्रतिद्वंद्विता बरबस मेरा ध्यान बँटा देती। खग परिवार वहाँ रहने का इतना अभ्यस्त हो गया किउसे मनुष्य की उपस्थिति से अब कोई फर्क  नहीं पड़ता था। मेरी उपस्थिति में भी वह उतना हीनिर्भय रहता जितना अनुपस्थिति में।

     

    मैं चाहता था जल्दी से इनके  बच्चे बड़े हों और ये यहाँ से उड़ जाएँ। इसीलिए मैं उन्हें दाने डालता और पानी का बर्तन भी रखवा दिया। इसका परिणाम यह निकला कि मेरे वहाँ आते ही वे मुझसे दानों की अपेक्षा करने लगते। मुझे लगा वे मेरे भाव  इशारे समझ रहे हैं। तदनुसार प्रतिक्रियास्वरूप उनका आहार-व्यवहार देख मुझे लगता वे प्रत्युत्तर में कुछ समझा भी रहे हैं।

     

    उन्हीं दिनों मैं बृहद् बाल उपन्यास लेखन की शुरुआत करने का मन बना चुका था। इस उपन्यास के नायक गुल्लू का चरित्र तो मेरे मस्तिष्क में काफ़ी समय से घूम रहा था लेकिन उसके मित्र के पात्र का निर्णय अभी नहीं कर पाया था। अब इन अर्ध-पालतू पक्षियों को देख सतरंगीपक्षी की कल्पना मन में आकार लेने लगी।

     

    जिस दिन उपन्यास का पहला खंड पूरा हुआ। उस दिन मादा पक्षी के  व्यवहार में मुझे कुछ परिवर्तन लगा। वह धीरे से उड़ी और मुँडेर पर जाकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद उसका एक बच्चा भी उसी के पीछे उड़ान भरकर मुँडेर तक जा पहुँचा। उस खगशावक ने पहली बार बरामदे से बाहर की दुनिया देखी थी। आनंदित  होकर उसने पुनः पंख खोले और लंबी उड़ान भर सामने हवेली के छज्जे पर पहुँच गया। दूसरा बच्चा अभी घोंसले में ही था। वह पहले बच्चे की अपेक्षा थोड़ा कमजोर था। मादा पुनः आईदूसरे बच्चे को कुछ समझाया। परिणामतः शाम होने से पहले वह भी उड़ान भर गया। मैं दफ्तर से लौटा। बेटे ने बताया, ”पक्षी घोंसला छोड़कर चले गए।वियोग की एक मद्धिम-सी लहर के बावजूद मैंने राहत की साँस ली। मेरी किताबों के बंडल उनकी बीट  टूटे पंखों के गिरने से खराब हो गए थे। समय बीता। दीपावली आने वाली थी। मैंने निर्णय किया टाँड़ की सफ़ाई कर दूँ। एक सुबह ज्यों ही मैं उठाफि़र वहाँ मादा पक्षी को बैठे देखा। संभव है अपने पुराने घर को देखने आई होयह सोच मैंने उस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया था। मेरे मुँह से बस इतना ही निकला कि अब ये इस घर को अधिक दिन नहीं देख पाएँगे। मैंने घोंसले को नष्ट करने का निर्णय ले लिया था।

     

    अगले रविवार को झाड़ू लेकर जब मैं सीढ़ी पर चढ़ा तो देखकर हैरान थावहाँ पुनः अंडे रखे थे तथा मादा पक्षी उन पर बैठी थी।

     

    मैंने माथा पीट लिया। मुझे क्रोधित होते देख मेरी पत्नी ने कहा, ”नहींघोंसला मत तोड़ना। आप पक्षी को सिर्फ  पक्षी की दृष्टि से नहींप्रसव के दौर से गुजर रही मादा की नजर से देखिए।“ सृजन मेरी सबसे बड़ी कमजोरी रही है। प्रकृति में हो रहे अंकुरण के  सम्मुख विध्वंश की बातमैं नहीं सोच सकता था। आदिकवि का स्वर ‘मा निषाद---काम मोहितम् मेरे कानों में गूँजने लगा। मैं नीचे उतर आया। यह सोचकर कि दो-तीन माह तक फि़र पंखों की फ़ड़फ़ड़ाहट झेलनी पड़ेगी।

     

    धीरे-धीरे उपन्यास का दूसरा खंड भी पूरा हो गया। नए खगशावक उड़ना सीख उड़ गए। मैंने घोंसला नहीं तोड़ा। हाँबरामदे के द्वार पर चिक लगाकर उसे ढाँप दिया।

     

    उपन्यास के तीसरे खंड की शुरुआत हो चुकी थी परंतु लेखन की गति काफ़ी धाीमी हो गई। पहले जब मैं पक्षियों को देखताअंतर्मन में नए विचार जागृत हो उठते। अब कथानक आगे नहीं बढ़ रहा था। मुझे पक्षियों की कमी खलने लगी। मन उदास हो उठा। कुछ ही दिन बीते कि यकायक एक दिन मैंने पक्षियों को पुकारा। चिक के अगल-बगल खाली स्थान से पक्षी अंदर घुस गए। मैंने देखा तो चिक को हटा दिया। अब परिंदे आसानी से -जा सकते थे। समय के साथ खग-युगल ने वहाँ एक जोड़ी बच्चे और पैदा किए। मैंने इस टाँड़ पर छह बच्चों को बड़े होते देखा था। इस दौर में एक के बाद एक इस बाल उपन्यास के छह खंड पूरे होते गए। मैंने मन से मान लिया था कि परिंदे वाले इस उपन्यास के पूर्ण होने तक घोंसले को अब नहीं हटाऊँगा।

     

    अब मैं उपन्यास के समापक खंड पर कार्य कर रहा था। उपन्यास लगभग पूरा होने वाला था। पक्षियों को  जाने कैसे  इसका आभास हो गया। उस दिन वे उड़े तो फि़र कभी बरामदे की तरफ़ लौटकर नहीं आए।

     

    सोचता हुए शायद नीड़ नष्ट  करने के कारण उस खग-परिवार की मेरे प्रति शुभकामनाएँ रहीं जो उपन्यास आकार ले पाया अन्यथा पहली बार ही घोंसला तोड़ देने पर संभव था कि उपन्यास में निराले सतरंगी पक्षी की कल्पना मस्तिष्क में   पाती। तब सतरंगी जैसे अनूठे पात्र के बिना उपन्यास कैसा बनताइस कृति के पाठक स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। अस्तुसंपूर्ण उपन्यास पर अपनी प्रतिक्रिया देना मत भूलना।

  • Khanabadosh (Paper Back)
    Ajeet Kaur
    160 144

    Item Code: #Kbh

    Availability: In stock


  • Sachitra Yogasan
    Om Prakash Sharma
    495 347

    Item Code: #KGP-615

    Availability: In stock

    भारत सदा से ऋषि-मुनियों, योगियों और दार्शनिकों का देश रहा है। यहां के निवासी सदा ही ज्ञान की खोज में लगे रहे हैं। आज नाना प्रकार की नई-नई सुविधएं मौजूद हैं, फिर भी व्यक्ति अधूरा, अतृप्त और अशांत है। उसका मन आज भी दुविधा में पड़ा है। नई पीढ़ी दिशाहीन हो गई लगती है। आत्महत्या करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अनेक भारतीय असफल रहकर पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाते जा रहे हैं। वे भूल चुके हैं कि हम उन ऋषियों की संतान हैं, जिनके ज्ञान का डंका कभी पूरे विश्व में बजता था।
    इस ऋषि-परंपरा में महर्षि पतंजलि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके द्वारा प्रतिपादित योग-दर्शन के परिणामों को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी स्तब्ध रह गए हैं।
    महर्षि पतंजलि ने विश्व-भर के प्राणियों के जीवनकाल का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात् चैरासी लाख योगासनों का चुनाव किया और विकारों से बचकर सुखी एवं त्यागमयी जीवन जीने की विधि खोज निकाली।
    योगासन के धीरे-धीरे अभ्यास से आप गंभीर बीमारियों से भी बच सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक महर्षि पतंजलि द्वारा निरूपित सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    190 171

    Item Code: #KGP-444

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।
  • Gopal Krishna Gokhale : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    120

    Item Code: #KGP-482

    Availability: In stock

    जिस समय हमारी यह भारतभूमि अंग्रेजों के अत्याचारों, प्रताड़नाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी उस समय देश के अनेक वीर सपूतों ने या तो अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के मान-प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा की या जीवन भर देश के लोगों को देश की आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहे। उन्हीं वीर सपूतों में से एक वीर सपूत थे—गोपालकृष्ण गोखले। गोखले जी ने उस समय न केवल इस देश के युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया बल्कि अपना संपूर्ण जीवन देश को आजादी दिलाने के प्रयासों में ही न्योछावर कर दिया।
  • Naya Vidhaan
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-633

    Availability: In stock


  • Paarijat (Novel)
    Nasera Sharma
    795 596

    Item Code: #KGP-778

    Availability: In stock


  • 1857 : Samar Gaatha
    Sudrashan Kumar Chetan
    100

    Item Code: #Kgp-sg

    Availability: In stock


  • Parvatiya Sanskriti Main Shiv Shakti
    Sudarshan Vashishath
    460 368

    Item Code: #KGP-9360

    Availability: In stock

    शिव और शक्ति आदि देव रहे हैं हमारी संस्कृति के। हर पर्वत शिखर शिव का प्रतीक है तो हर घाटी में देवी पार्वती अपने अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। किन्नर कैलास और मणिमहेश की कठिन यात्राएँ प्रसिद्ध हैं जो शिव के मूल स्थान की खोज में हजारों फुट की ऊँचाई तक हर वर्ष की जाती हैं। उधर पुराने समय में मणिकर्ण पहुँच पाना भी सुगम नहीं था। हालाँकि मंडी राज्य में प्रमुख देवता माधोराव रहे हैं किंतु यहाँ महाशिवरात्रि का उत्सव सात दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। वैद्यनाथ धाम, प्रसिद्ध शिव मंदिर मसरूर आदि ऐसे स्थान हैं जो पुरातन काल से शिव उपासना के सिद्धपीठ बने हुए हैं।
    यदि हिमाचल प्रदेश का ऊपरी भाग देव भूमि है तो निचला क्षेत्र ‘देवी भूमि’ है जहाँ शक्ति अपने अनेक रूपों में विद्यमान है। शक्ति की स्थापना चंडीगढ़ से आरंभ हो जाती है जहाँ चंडी मंदिर है। उसके साथ ही प्रसिद्ध मनसा देवी और फिर कालका। उससे ऊपर तो समस्त भूभाग देवीमय हो गया है। श्री नैना देवी, चिंतपूर्णी माता, श्री ज्वालामाई, वजे्रश्वरी, चामुंडा—न जाने कितने ही स्थान हैं जहाँ देवी किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इस ओर कामाक्षा देवी, भीमाकाली तो उस ओर लक्षणा देवी और आदिशक्ति।
    हिमालय के इस पर्वतीय क्षेत्र में एक सशक्त देव परंपरा की व्यवस्था है। यहाँ देवी और देवता को सामान्यतः ‘देउ या देवता’ ही संबोधित किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में देवता का संस्थान बहुत शक्तिशाली है जो सामाजिक जीवन के हर पहलू को नियोजित करता है। धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक; कोई भी क्षेत्र हो, देव का संस्थान उसे संचालित करता है। हर देवता का अपना क्षेत्रा होता है जिसे ‘शासन’ कहा जाता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में शिव व शक्ति के प्रमुख व प्रसिद्ध स्थानों के अलावा कुछेक ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों के देवों को भी सम्मिलित करने का प्रयास किया गया है।
  • Doobte Waqt (Paperback)
    Dixit Dankauri
    200

    Item Code: #KGP-7053

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।
    -मोईन अख्तर अंसारी
  • Grameen Samaj(Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    290 261

    Item Code: #KGP-206

    Availability: In stock


  • The Story Of My Experiments With Truth (Paperback)
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    250 225

    Item Code: #KGP-349

    Availability: In stock

    A face we see all around us… everyday, even if we do not visit government offices. Teachings people swear by and entertained to in films. We still see his style being imitated in the political circles—that is Mohandas Karamchand Gandhi. One of the influencers of the millennium, the ‘half naked’ Indian man who shook the mightiest empire of the modern world, has a story to tell—his story. 
    An autobiography of Gandhi, the book starts with his birth, and ends with his experiences till 1921. The original manuscript was written in weekly installments in Gujarati by Gandhi, and was published weekly in his journal Navjivan from 1925 to 1929. It was later translated by Mahadev Desai in English, which too was published in installments in his other journal Young India.
    Unlike most autobiographies or biographies, Gandhi’s autobiography speaks about his fears, regrets, failures, struggles, and all that went through his mind while initiating and going through the experiments he conducted, in his and his immediate family’s lives. Gandhi hides nothing from his readers; he wants his experiences and experiments to reach out to people so that their life becomes worth living.
    Gandhi, through his lucid and simple style of writing, honest opinions, and candid narrations, takes us to the man who was ‘mahatma’ in his thoughts and actions.    
  • The Mother Of All Books (Paperback)
    Rajni Arun Kumar
    99

    Item Code: #KGP-1451

    Availability: In stock

    Sense has been banned from discotheque, multiplex, several restaurants, shopping mall, plane and many other places of recreation*. And this was even before the baby was born... Yes, Sense was expecting... A baby...
    To make things worse, she has to contend with having no permanent address, a set of friends who think nothing of scrutinising her like a specimen under a microscope, and relatives who mean well. Then there’s the journey of re-discovering her constantly changing body, which for anyone who has crossed puberty is not in the least pleasant – now it’s cold, now it isn’t; now it’s fat, no, it isn’t; now it fits, Ha! Now it doesn’t! All very confusing... For someone who has prided on knowing her mind since she was three, this was allgoing horribly wrong.
    Come due date, and Sense, as usual has managed to get herself into a pickle and is once again, very nearly banned from the hospital*! Can the Baa-lamb (who has the patienceof a saint) and Sense’s parents (whose understanding parallels the Dalai Lama) guide her through these tumultuous times? Will the little one survive Sense’s adventures unscathed? And what other adventures are in store for Sense and family in this journey called Motherhood? 
    *She staunchly insists this is through no fault of hers and blames it squarely on extenuating circumstances.
  • Tabdeel Nigahein
    Maitreyi Pushpa
    300 255

    Item Code: #KGP-396

    Availability: In stock

    तबदील निगाहें
    किसी भी व्यक्ति, विषय या कृति के संबंध में जो सिद्धांत, मान्यताएं और अवधारणाएं, वर्षों या सदियों पहले सही मान ली गई थीं, जरूरी नहीं कि हर युग में उनको उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समय और परिस्थितियों से उपजे सवाल, उसे अपने मानकों पर कसते हैं। हालांकि सच यह भी है कि साहित्य और समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताओं और प्रतिमानों को खंडित करने का साहस यदा-कदा ही किया जाता है, क्योंकि बहुजन के दबाव और विरोध को सहकर अपनी बात कहने से प्रायः बुद्धिजीवी लोग बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बावजूद इसके कुछ रचनाकार अपवाद रहे हैं।
    सच को पूरे साहस से कहने वाली रचनाकारों में सम्मिलित मैत्रेयी पुष्पा ने इस पुस्तक के संकलित लेखों में कुछ ऐसा ही प्रयास किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गोदान’, ‘चित्रालेखा’, ‘धु्रवस्वामिनी’, ‘त्यागपत्र’, ‘मैला आंचल’ और ‘राग दरबारी’ जैसी अपने समय की कालजयी रचनाओं को बिलकुल अलग निगाह से देखतीं और उसके स्त्री-पात्रों के मन में सोए पड़े सवालों को उघाड़कर उन्होंने एक नई बहस को आधार प्रदान किया है। इन कृतियों के संदर्भ में लेखिका द्वारा उठाए गए सवाल, न केवल पढ़ने वाले को बेचैन कर सकते हैं बल्कि इन्हें नए तरह से तबदील निगाहों के जरिए पुनर्मूल्यांकित करने की मांग भी करते हैं। 
    कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके और कुछ अवसरों पर दिए गए इन वक्तव्यों में मैत्रेयी पुष्पा के भीतर की आलोचकीय दृष्टि भी सघन रूप से प्रकट हुई है। बनी-बनाई धारणाओं और अपनी कूपमंडूकता में आनंदित रहने वाले आलोचकों के लिए यह पुस्तक एक सबक की तरह हो सकती है।
    –विज्ञान भूषण
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mridula Garg
    Mridula Garg
    195 176

    Item Code: #KGP-212

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मृदुला गर्ग  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'ग्लेशियर से', 'टोपी' , 'शहर के नाम', 'उधार की हवा', 'वह मैं ही थी', 'उर्फ सैम', 'मंजूर-नामंजूर', 'इक्कीसवीं सदी का पेड़', 'वो दूसरी' तथा 'जूते का जोड़, गोभी का तोड़' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मृदुला गर्ग की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-2
    Kamal Kishore Goyenka
    950 760

    Item Code: #KGP-58

    Availability: In stock


  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock

    नये सिरे से
    गोविन्द मिश्र की पहली कहानी ‘नये पुराने मां-बाप' ‘माध्यम' (इलाहाबाद : संपादक बालकृष्ण राव), 1965 में प्रकाशित हुई थी। लिख वे इसके पहले से रहे थे। इस तरह कहानियां लिखते हुए गोविन्द मिश्र को लगभग पचास वर्ष होने को आ रहे हैं। प्रस्तुत संग्रह में उनकी 2010 तक की नई कहानियां हैं, जो पिछले किसी संग्रह में नहीं आई हैं। यहां वे जैसे कहानी को नये सिरे से पकड़ने चले हैं। पहले जो लेखक कभी कोई जीवन-स्थिति, व्यक्ति की भीतरी जटिलता, समाज के नासूर, जीवन के खूबसूरत रंग जैसी चीजों से कहानी पकड़ता दिखा था, वह यहां बिलकुल फर्क ढंग से चला है। पिछले इतने सारे वर्षों में अर्जित परिपक्वता में, जैसे-कला, शिल्प, भाषायी सौष्ठव जैसी चीजें ही घुलकर खो गई हैं। कहा भी जाता है कि सर्वोच्च कला वह है जहां कला ही तिरोहित हो जाती है। रह जाती है तो सिर्फ स्वाभाविकता, जिसके रास्ते जीवन कला में सरक जाता है; कलाकृति जीवन की आकृति नहीं, साक्षात् जीवन दीखती है।
    करीब-करीब इन सभी कहानियों में दर्द की एक खिड़की है, जिसके पार जीवन है, अपनी गति से पल-पल सरकता हुआ।...उस खिड़की से उदासीन जिसके रास्ते जीवन दिखाई देता है। जीवन जो है, वह बदलता नहीं...लेकिन दर्द से उठतीं कुलबुलाहटें हैं उसे बदलने की। और तेज आवाज है स्त्रियों की, जिनमें कछ नया कर गुज़रने, कोई रास्ता ढूंढ़ने और दिखाने की बेचैनी है चाहे वह ‘तुम हो' कि सुषमा हो या ‘छाया', ‘मोहलत’ और ‘प्रेमसंतान' की ‘वह'। गोविन्द मिश्र जो अकसर अपने पात्रों को ‘यह' या ‘वह' कहकर अनाम छोड़ देते हैं तो शायद इस आशय से कि भले ही दर्द की वह दास्तान खास हो, पर वह है आम ही...और यह तार फिर उसी स्वाभाविकता से जुड़ता है, जहां कलाहीनता ही सर्वोच्च कला है।
  • The 10-Pound Shred (Paperback)
    Tommy Europe
    295

    Item Code: #KGP-346

    Availability: In stock

    The 10-Pound Shred lets you bring Tommy Europe's tough-love, bootcamp-style workouts home. In just 31 days, Tommy will take you from flab to fit, helping you shed 10 poundsor more in the process. Each day has complete, easy-to- understand exercise instructions with step-by-step photos. There's no complicated flipping around to figure out what you need to be doing–and no free breaks, either! You don't need fancy equipment or even a gym membership–just a good pair of shoes and the willingness to get moving. There's also a nutritious, flexible meal plan designed to help you set a new, lifelong pattern of healthy eating. And through it all, Tommy's there with his signature blend of drill sergeant and inspiring friend, pushing you to reach higher, go faster and shred a little harder.
    Whether you have a wedding coming up, want to look great at the beach or just want to have more energy, Tommy will help you lose those 10 pounds. You're going to sweat, you're going to hurt–but you're going to love the results. So stop making excuses, put down that cupcake and pick up The 10-Pound Shred.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ballabh Dobhal (Paperback)
    Ballabh Dobhal
    90

    Item Code: #KGP-1460

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : बल्लभ डोभाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बल्लभ डोभाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उतरा हुआ', 'जय जगदीश हरे', 'चुनाव चक्रम्', 'काठ की टेबुल', 'दूर का दर्शन', 'दर्द अपनेपन का', 'तन का देश : मन का देश', 'खेड़ा गांव', 'बुलडोजर' तथा 'समाधान'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बल्लभ डोभाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 500

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Khiraki Khulane Ke Baad
    Nilesh Raghuvanshi
    250 200

    Item Code: #KGP-9339

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी में अपनी ही कविता और घर-संसार के लिए एक उत्सुक आलोचनात्मक रवैया बना रहा है।

    नीलेश जादुई फंतासी की जगह घर.परिवार, बच्चे का जन्म, प्रसव के दर्द आदि को काव्य विशय बनाती हैं और उन्हें सादगी का मर्म जानने में ही कविता अकसर सहायक होती है। राजनीति प्रकट न हो, पर नीलेश इस हद तक समय से बेखबर नहीं हैं कि राजनीति उनके लिए सपाट झूठ और गलत शब्द हो। इस तरह नीलेश रघुवंशी को पढ़ना एक भरोसेमंद साथी को पढ़ना है। उनकी कविताएँ इधर की कविता में आए ठहराव, कीमियागिरी या उसके उलट सरलतावाद के विरुद्ध नया प्रस्थान हैं। स्त्रीवाद को विमर्श बनाए बगैर नीलेश रघुवंशी के यहाँ संघर्शरत स्त्री है, जो जटिल समय को ‘क्लीषे’ नहीं बनने देती।

    कविता अप्रत्याषित की खोज नहीं है-मामूलीपन के खटराग में औसतपन का प्रतिकार है। नीलेश गंजबासौदा की जनपदीय, कस्बाई चेतना से लबरेज लंबी कविताओं में वृत्तांत रचती हैं और भीतर.बाहर के सफरनामे को इस तरह संभव करती हैं कि ‘देखना’ क्रिया ‘जानना’ क्रिया से अभिन्न है। 

    आज जब कविता विचारधारा से ऊबकर शहरी भद्रलोक की कविता हो गई है, नीलेश किसान जीवन का वृत्तांत लिख रही हैं।

    यही समय है जब किसान आत्महत्या कर रहे हैं और मीडिया पर्यटन की डाॅक्यूमेंट्री बना रहा है। यहाँ किसान जीवन की त्रासदी है, तो तंत्र का शगल भी है और फिर ‘बाइट’!

    यह है बदला हुआ समय, जहाँ क्रूरता भी प्रदर्शन  प्रिय है। बीच.बीच में अनकहा छोड़कर वे कहे का  मर्म खोल जाती हैं। विस्तार और संक्षेप का कोलाज  हैं-नीलेश की कविताएँ। उनका वैविध्य चकित  करता है। 

    घर.गिरस्ती, हाट.बाजार, सफर और समय की अनंतता के बीच नीलेश रघुवंशी कब ‘पर्सनल’ को ‘पाॅलिटिकल’ बना देंगी, कहना मुष्किल है। वे पर्यटक की निगाह से चीजों को नहीं देखतीं-जीवनअरण्य में धँसती हैं और स्त्री मुक्ति के साथ सामाजिक मुक्ति के लिए विकल.व्यग्र होती हैं।

    नीलेश रघुवंशी ‘घर निकासी’ में प्रगीतात्मकता का सार्थक उपयोग कर सकीं। ‘पानी का स्वाद’ की कविताओं में काव्य फलक का विस्तार दिखा। ‘अंतिम पंक्ति’ की आधी कविताएँ आख्यानमूलक हैं। कहीं लैंडस्केप, कहीं दृष्य.श्रव्य का कोलाज, कहीं कथा.कहानी।

    नीलेश रघुवंशी की कविता में नई खिड़कियाँ खुल रही हैं।

    नीलेश की तद्भवता सिर्फ भाशायी खेल नहीं है, वह उनकी अपनी भाशायी अस्मिता है, जो सीधे संस्कृति से छनकर आती है।

    वही कविता, वही जीवन श्रेश्ठ है जो विस्थापन को अतिक्रमित करता है। इस अवधारणा को नीलेश की कविताएँ चरितार्थ करती हैं। वे पुराने प्रतिमानों को खारिज करती हैं और सामाजिकता को ही राजनीतिक विमर्श में ढालती हैं।

    कविता का लोकरंग विस्थापन का प्रतिवाद है। स्थानीयता नीलेश की काव्यात्मकता का मुख्य ध्रुवक है। गंजबासौदा की धूल भी नीलेश के लिए कविता है। यह कविता का प्रकृत देशज ठाठ है। खुद से भिड़ने की ताकत।

    परमानंद श्रीवास्तव के लेख से कुछ अंश
     

  • Svasthya Evam Chikitsa (Paperback)
    Dr. Rakesh Singh
    160

    Item Code: #KGP-369

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Bhartiya Bhaashaaon Ki Shreshtha Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    260 221

    Item Code: #KGP-73

    Availability: In stock

    भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियां 
    प्रस्तुत संकलन में भारत की सोलह प्रमुख भाषाओं की सोलह प्रतिनिधि कहानियां समाविष्ट की गई हैं । कश्मीर से कन्याकुमारी तक का परिवेश किसी हद तक इनमें प्रतिबिंबित हुआ है । ये कहानियां हमें मात्र छूती-छेड़ती ही नहीं, बल्कि हँसाती, गुदगुदाती और कहीं-कहीं रुलाती भी हैं । साथ ही बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करती हैं ।
    इनमें भारत के स्थूल स्वरूप का प्रतिबिंबन ही नहीँ, भारत की अंतश्वेतना का स्पंदन भी मिलेगा और भारत की माटी की गंध भी ।
    क्या है भारत ? क्या है उसकी अस्मिता की पहचान ? क्या हैं उसकी खूबियाँ ? खूबियों के साथ-साथ खामियां भी। यथार्थ के धरातल पर अंकित ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर इन जीती-जागती, बोलती-बतियाती कालजयी कृतियों में अनायास उपलब्ध हुए बिना नहीं रहेंगे ।
    इनमें अतीत या वर्तमान ही नहीं, भविष्य का अंधकार से उबरता उजास भी है । अपने समग्र रूप में एक बृहुत् समाज, जो कहीं एक देश का ही नहीं, महादेश की पर्याय  भी बन जाता है। ये साधारण-सी कहानियां अपने में  अनेक असाधारण संसार सहेजे हैं ।
  • 20-Best Stories From Africa (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7202

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. African short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Two Skin Woman, Slave Girl, South Winds, Apprentice, Allah’s Will, Green Leaves, this book is a compilation of 20 famous African short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Africa.
  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Mere Saakshatkaar : Nagarjun
    Nagaarjun
    300 249

    Item Code: #KGP-15

    Availability: In stock


  • Sahitya : Vividh Vidhayen (Paperback)
    Shashi Sahgal
    100

    Item Code: #KGP-1354

    Availability: In stock

    साहित्य : विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar
    Laxman Prasad
    595 446

    Item Code: #KGP-726

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Toro Kara Toro-1 (Paperback)
    Narendra Kohli
    400 340

    Item Code: #KGP-7041

    Availability: In stock


  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी' से-
    वह औरत जो तमाम उम्र एक कसी हुई रस्सी पर बाजीगरनी की तरह अपने बोझ का संतुलन कायम रखने की कोशिश में सारी ताकत और समूची एकाग्रता खर्च करती हुई चलती रही थी, आज ज़मीन पर खडी थी । रस्सी के दोनों सिरे कभी उनके सास-ससुर और खाविंद के दरम्यान तने रहे थे, कभी उनके खाविंद और बच्चों के दरम्यान । बहुत बरसों से एक सिरा भाइया जी के वजूद से बँधा था और दूसरा सिरा बड़े मामा जी के साथ । भाइया जी नहीं रहे तो रस्सी कड़क करके टूट गई । भाभी जी चक्कर खाकर ज़मीन पर आ गिरी । ज़मीन पर खडे होना तो वह भूल ही गई थीं ।  लडखड़ाती, काँपती, चकराती, हिचकोले खाती वह नए सिरे से छोटे बच्चे की तरह ज़मीन पर खडी होना सीखेंगी । शायद छोटे मामा जी का हाथ पकड़कर यह पैर बढाना सीखेंगी । पर फिलहाल तो वह चारों खाने चित गिरी पडी थीं ।
    भाइया जी नहीं रहे, तो बड़े मामा जी भी चले जाएँ-चले जाएँ..
    और उन्होंने दो-दो पुरानी सोने की चूडियों अपने हाथों से उतारी । उठीं और वे चारों चूडियाँ मामा जी के कोट की जेब में डाल दी, "बस, यही है मेरे पास । इसे ले ले और चला जा । पैंशनों वाले चले गए । रोटी खत्म । चूल्हा बुझ गया । तोड़ दिया है मैंने चूल्हा । तोड़ दिया है । तूने सुना ? चूल्हा तोड़ दिया है मैंने । चला जा । ”
    हिंदी और पंजाबी में समान रूप से रचनारत, साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार की मानव-मन के सच को उकेरती कहानियों का नया संग्रह ।

  • Kuch Lekh Kuch Bhashan (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    250 225

    Item Code: #KGP-7025

    Availability: In stock


  • Shankar Dev
    Hari Krishna Devsare
    60 45

    Item Code: #KGP-9290

    Availability: In stock

    असम में भागवत धर्म का प्रचार करने वाले शंकरदेव को ‘महात्मा’ और ‘महापुरुष’ की उपाधियों से अलंकृत कर आज भी स्मरण किया जाता है। उन्होंने जिस वैष्णव धर्म का प्रवर्तन किया था, वह ‘महापुरुषीय धर्म’ कहलाता है। उनके असाधारण व्यक्तित्व के बारे में उनके शिष्य माधवदेव ने लिखा था-
    श्रीमत शंकर गौर कलेवर, चन्द्रर येन आभास।
    बृहस्पति सम पंडित उत्तम, येन सुर प्रकास।।
    पद्मपुष्प समवदनप्रकाशे, सुंदर ईषत हांसि।
    गंभीर वचन मधु येन स्त्रवे, नयन पंकज पासि।।

  • Kavi Ne Kaha : Rituraj (Paperback)
    Rituraaj
    80

    Item Code: #KGP-1236

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही है । बहुराष्ट्रीय  निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे है और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है। वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कप दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते है और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar
    Ramdhari Singh Diwakar
    250 225

    Item Code: #KGP-8006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    रामधारी सिंह दिवाकर

    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।

    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।

    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार', 'खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानी', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पुल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।

    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Pride And Prejudice (Novel)
    Jane Austen
    495 396

    Item Code: #KGP-572

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Ghanchakkar
    Nisha Bhargva
    225 203

    Item Code: #KGP-1805

    Availability: In stock

    व्यंग्य-लेखन की प्रवृत्ति आधुनिक युग की देन है। पिछले चंद दशकों में समाज में विषमताओं, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं, विसंगतियों, स्वार्थपरता का जो सैलाब आया है वह अभूतपूर्व है। ऐसी परिस्थितियों में स्वाभाविक है कि जागरूक लेखक व्यंग्य की ओर उन्मुख हो । यहाँ इस ओर संकेत करना भी आवश्यक है कि व्यंग्य-साहिंत्य के क्षेत्र में लेखिकाओं की उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज नहीं हो पाईं। गिनी-चुनी हास्य-व्यंग्य को बहुचर्चित कवयित्रियों में निशा भार्गव का नाम विशेष रूप से उभरकर आया है।
    निशा भार्गव की कविताओं में हास्य-व्यंग्य के साथ ही एक अतिरिक्त तत्त्व भी विद्यमान है। उनकी कविता में तीखे प्रहार के साथ ही अच्छे संस्कार की पैरवी भी मौजूद है । उनकी कविताओं में सामाजिक, परिवारिक, राजनीतिक आडम्बरों को तो निपुणता के साथ बेनकाब किया ही गया है, स्वस्थ समाज के निर्माण का आह्वान भी किया गया है। उनकी रचनाएं ठोस सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत हैं।
  • Ek Yug Ke Baad
    Pushpa Rahi
    40 36

    Item Code: #KGP-1891

    Availability: In stock

    एक युग के बाद
    पुष्पा राही के गीतों में सुख-दुःख, आशा-निराशा, अन्धकार-प्रकाश, संयोग-वियोग, व्यथा-वेदना, मिथ्या मोह, दम्भ, पाखंड सबका वर्णन मिलता है । कुछ गीत इतने मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं कि उन्हें पढते समय जीवन के अनेक तथ्य नेत्रों के सामने उदघाटित होने लगते है ।
    इन गीतो की एक विशेषता है नूतन बिम्बों का निर्माण । दर्द के मोती, रेशमी सुख, शोर की कालिख, उलझनों का झाड, नींद की कमजोर आँखे, विषमताएं रोग-सी, अंधेरे दर्द के साए, मीठी-मीठी इच्छा आदि प्रयोग गीत को संवेदन के स्तर पर बहुत मार्मिक बना देते हैं । कवयित्री अपनी अनुभूतियों और परिवेश की हलचल को ही लिखना चाहती है । दूसरों से उधार लेकर कुछ भी कहने में उसकी रुचि नहीं है ।
    एक युग के बाद में संकलित गीत उच्चस्तरीय होने के साथ काव्य की भावभूमि पर अपनी छाप छोड़ते है । कोहरेभरे प्रभात से निकालकर चन्दन वन की शीतल छाया में हमें भ्रमण का अवसर देते हैं । प्यार के वृत्त में घुमते हुए हम सन्नाटे के पार पहुँच जाते है ।
  • Face Your Fears (Self-Help)
    David Tolin
    695 521

    Item Code: #KGP-355

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • Munna Ro Raha Hai
    Prahlad Shree Mali
    280 238

    Item Code: #KGP-590

    Availability: In stock

    "सच कहूं तो इन नेता-अफसरों के चरित्र और आचरण ने मेरा मनोबल बढ़ाया है। जैसे औलाद नालायक निकल जाए तो समझदार मां-बाप खुद में नई ताकत पैदा कर लेते हैं अपनी सार-संभाल की। वैसे ही जब मैंने यह देखा कि इन नेता-मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों से देश-समाज और नागरिक का भला होना मुश्किल है, तो बस अपना मनोबल ऊंचा कर लिया। रही बात आशा-चिंता की तो यदि आप आशा-अपेक्षा रखेंगे तो चिंता होगी ही। साथ ही दुःख भी मिलेगा। मेरे खयाल से पति-पत्नी या संतान से हमेशा किसी को मनचाहा सुख नहीं मिलता। इसके लिए तो मन को मनाकर संतोष रखना पड़ता है। मेरे दादा की छह संतानें थीं। चार लड़के, दो लड़कियां। बेचारे उनके पीछे अपना पूरा जीवन घिसते रहे। न बेटों ने सुख दिया, न बेटियों ने चैन। पर इसमें उनका भी क्या दोष! वे सब भी तो अपनी-अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाने की खींचतान में लगे हुए थे। यही हाल मेरे पिताजी का रहा। उन्हें न तो मैं कोई सुख दे पाया, न मेरा भाई। और यह अकेले मेरी नहीं, लगभग हर घर की कहानी है। फिर भला मैं अपने बेटे से कोई सुख पाने की अपेक्षा रखने की नादानी क्यों करूं!"
    -इसी पुस्तक से  
  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 338

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • Reverse Your Thoughts Reverse Your Diseases (Paperback)
    Anil Bhatnagar
    245 221

    Item Code: #KGP-337

    Availability: In stock

    Like an artist who expresses herself on canvas with colors, our thoughts do so on the canvas of life (health included). Health or diseases, therefore, do not come by chance; they are created through our mental processes—though unknowingly.
    As per Psychoneuroimmunology, a new branch of science that studies the mind-body connection, the thoughts and emotions that we choose get instantly transformed into chemicals. These chemicals are, effectively, either self- administered injections of ‘slow poisons’ or of ‘healing medicines’ that eventually freeze into and become our physical states, i.e. the way we feel physically in our bodies—dis-eased or eased (i.e., healthy).
    Reverse Your Thoughts, Reverse Your Diseases is your guide to retrace your path back towards health from diseases through the same route whence these came from, i.e. through the route of your thoughts, emotions, beliefs and imagination. The book shares with you symptoms, emotional causes, metaphysical reasons, affirmations and dietary suggestions for averting and curing over 150 diseases . . . along with power-packed strategies for liberating you from corrosive thoughts and emotions.
  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap
    M.A. Sameer
    250 200

    Item Code: #KGP-9331

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Hansbalaka
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    675 506

    Item Code: #KGP-882

    Availability: In stock

    हंसबलाका
    ‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य को आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की अन्यतम देन है। इसका प्रथम प्रकाशन 1982 ई. में हुआ था। प्रकाशित होने पर हिंदी समाज में इसका व्यापक स्वागत हुआ। प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय आदि महान् लेखकों के जीवन और साहित्य को तथा स्वयं अपने जीवन को नए ढंग से देखने का यह प्रयास अपने तरह का अकेला है। यह मात्र संस्मरण की पुस्तक भर नहीं है। यहाँ हिंदी के सांस्कृतिक गद्य का ऐसा रूप है, जिसमें हमारी परंपरा और समय दोनों अपने सबसे उदात्त रूप में प्रस्तुत हुए हैं। इन संस्मरणों में प्राचीन भारत की गूँज-अनुगूँज तो है ही, आधुनिक सांस्कृतिक जगत् की यथार्थ चेतना भी है। ‘हंसबलाका’ के संस्मरणों से गुजरते हुए हम आलोच्य व्यक्ति को तो नए रूप में देखते ही हैं, अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सर्वथा नए रूप में पाते हैं। बिना किसी दुविधा के कहा जा सकता है कि ‘हंसबलाका’ के प्रकाशन से हिंदी संस्मरण साहित्य का सबसे पुष्ट और प्रखर रूप सामने आता है। ‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य का सर्वोच्च शिखर है।
  • Teen Laghu Upanyas : Mamta Kalia
    Mamta Kalia
    300 240

    Item Code: #KGP-9080

    Availability: In stock


  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 476

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Path Pragya
    Veena Sinha
    300 240

    Item Code: #KGP-171

    Availability: In stock

    ‘पथ प्रज्ञा' श्रीमती वीणा सिन्हा की एक उल्लेखनीय औपन्यासिक कृति है। प्रागैतिहासिक काल की एक प्रचलित कथा का पुनर्पाठ करती लेखिका ने ‘पथ प्रज्ञा' माधवी के माध्यम से समाज के नियंताओं द्वारा नारी-शोषण की अद्यतन प्रवृत्ति का सूत्र पकड़ा है। वैदिक राजाओं के यहाँ और आश्रमों में व्याप्त नारी-शोषण की कथा इस उपन्यास के केन्द्र में है। यहाँ उदात्त कर्मों के लिए समर्पित दिखने वाले ऋषि आश्रमों के नियंता हैं। ययाति जैसे दानवीर एवं ऋषियों का सम्मान करने वाले धर्म-प्रवण यशस्वी राजा हैं। गालव अपने गुरु विश्वामित्र को गुरुदक्षिणा दे सके, इसके लिए अपनी पुत्री माधवी को देह के उपयोग का आदेश देने वाले ययाति हैं। राजा के इस मनमाने आदेश पर शास्त्र-सम्मति की मुहर लगाने वाली दरबारी व्यवस्था है। राजकन्या की देह को एक समयावधि तक भोग कर एक यशस्वी पुत्र एवं गुरुदक्षिणा का एक अंश वसूलने वाले स्वयं ऋषि विश्वामित्र भी हैं।
    इस उपन्यास की देह में भोग-विलास में डूबे रहने वाले हर्यश्व से लेकर एकपत्नीनिष्ठ दिवोदास और सच्चे प्रेमी तथा शास्त्र-सम्मत कर्म करने वाले उशीनर जैसे अयोध्या, काशी और भोजनगर राज्यों के राजा चित्रित हैं। मगर यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि माधवी की देह का एक निश्चित अवधि तक शुल्क देकर भोग करना इन तीनों ही राज्यों में नियमविरुद्ध नहीं है। नारी-शोषण के इस सनातन रूप को लेखिका मानो आज की तिथि में शपथ-पत्र की तरह प्रस्तुत करती है। सत्य-संरक्षण की ऐसी विश्वसनीयता समकालीन लेखन में दुर्लभ है। इसीलिए इस उपन्यास को एक उल्लेखनीय कृति कहा गया है।
    इस उपन्यास में स्त्री-पुरुष के स्थूल और सूक्ष्म स्तर के परस्पर संबंधों, व्यष्टि-समष्टि तथा व्यक्ति और राज्य के रिश्तों एवं ज्योतिष और दर्शन जैसे गूढ़ विषयों पर सार्थक और पारिभाषिक वार्तालाप इस कृति का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
    उपन्यास के अंत में माधवी द्वारा लिया गया निर्णय समाज द्वारा नारी के अपपाठ की एक प्रतिक्रिया है जहाँ माधवी सक्रिय नहीं, सार्थक होती है।
    और अंत में यह भी कि वैदिक काल के सूक्ष्म और गहन अध्ययन-विश्लेषण के कारण ही लेखिका ने भाषा में संस्कृतनिष्ठता तथा बाणभट्ट के जैसे भाषा-लालित्य का समावेश करके उसे युगानुरूप बनाने की चेष्टा की है।

  • Mahadevi Verma Ki Vishvadrishti
    Tomoko Kikuchi
    300 270

    Item Code: #KGP-647

    Availability: In stock

    महादेवी वर्मा की विश्वदृष्टि
    सामान्यतः महादेवी वर्मा की ख्याति रहस्यवादी कवयित्री के रूप में काफी समय तक स्थिर रही। उन पर लगाए जाने वाले पलायनवाद के आरोप का युक्तिसंगत खंडन करके महादेवी के साहित्य में प्रकट मानवीय दृष्टिकोण को सामने लाने के लिए इस पुस्तक में उनकी विश्वदृष्टि पर गहरा अध्ययन हुआ है।
    महादेवी के साहित्य को अधिक गहनता के साथ समझने के लिए उनके जीवन का सूक्ष्म विवेचन अनिवार्य है, अतः उनके व्यक्तिगत अनुभव के साथ उनके जीवन पर बौद्ध धर्म, संस्कृत काव्य, स्वाधीनता आंदोलन, गांधी, तत्कालीन समाज, संस्कृति, छायावाद आदि के प्रभाव के बारे में भी विचार किया गया है। इस पुस्तक में महादेवी की सभी साहित्यिक विधाओं का विश्लेषण हुआ है, जैसे कविता, गद्य, पत्रिका के साथ महादेवी द्वारा चयनित और अनूदित संस्कृत काव्य का भी विस्तार से विवेचन हुआ है। महादेवी की अब तक असंकलित ‘अबला’ और ‘विधवा’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविताओं को हिंदी जगत् के सामने लाने का प्रयास भी हुआ है।
    महादेवी वर्मा का एक आश्चर्यजनक व्यक्तित्व है, जिन्होंने एक ही समय में अनेक भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है, जैसे साहित्यकार, संपादिका, कॉलेज की प्रधानाचार्या, समाज-सेविका इत्यादि। महादेवी के जीवन के उन विभिन्न पहलुओं से एक ही उद्देश्य और एक ही प्रेरणा पाई जाती है। उनका कहना है—"सब स्त्रियों में जागृति उत्पन्न करने, उन्हें अभाव का अनुभव कराने का भार विदूषियों पर है और बहुत समय तक रहेगा।" असल में इस पुस्तक में अभिव्यक्त सभी व्याख्याएँ यह प्रमाणित करने का प्रयास है कि महादेवी अपने साहित्य के माध्यम से एक तो स्त्रियों के मन में अन्यायपूर्ण स्थिति के प्रति प्रश्नचिह्न लगाने की प्रेरणा देती हैं और दूसरा, स्त्रियों को अपनी स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने की शक्ति तथा साहस प्रदान करती हैं।

  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए