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423

  • grid
  • Mohabbat Ka Per
    Priya Anand
    100 90

    Item Code: #KGP-1841

    Availability: In stock

    मोहब्बत का पेड़
    वैसे तो संग्रह की सभी कहानियां प्रेम-कथाएँ ही है, मगर 'मोहब्बत का पेड़' कहानी कई प्रेम-कथाओँ को जीवित कर देती है । इस कहानी में स्त्री का विद्रोही स्वर है, जो मोहब्बत की वकालत करता है और सामंती व्यवस्था को कटघरे में खडा करने की कोशिश करता है । यहाँ गौर करने वाली बात सिर्फ यह है कि जहाँ इस कहानी का अंत होता है, वहीं से एक नई कहानी की शुरुआत होती है । नारी के संघर्ष और यातना की कहानी । यह कहानी प्रिया आनंद की कहानियों का प्रस्थान बिंदु हो सकती है ।...
  • Chhote-Chhote Pankha
    Rekha Rajvanshi
    40 36

    Item Code: #KGP-9284

    Availability: In stock

    छोटे-छोटे पंख

    सुबह-सुबह का सूरज आया
    किरणों ने हमको सहलाया
    उठो-उठो, भई उठो-उठो।

    चिड़ियों ने भी शोर मचाया
    शोर मचाकर, हमें बताया
    ब्रश करो, भई ब्रश करो।

    पत्ते डोले हौले-हौले
    बजा-बजाकर ताली बोले
    नहा लो, भई नहा लो।

    मुन्नू जल्द हुआ तैयार
    दादा जी भी रहे पुकार
    दूध पियो, भई दूध पियो।

    बस करती है पौं-पौं-पौं
    भाग रहे पीछे दोनों
    चलो-चलो, भई चढ़ो-चढ़ो।

    —इसी पुस्तक की एक कविता ‘सुबह का सूरज’
  • Hindi Bhasha Prakriti, Prayog Aur Shikshan
    Hiralal Bachhotia
    200 180

    Item Code: #KGP-714

    Availability: In stock

    भाषा वह है, जिसे हम बोलते हैं। वह हमें उत्तराधिकार में मिली चीज हैं। इसलिए हम उसकी कम परवाह करते हैं। उसकी प्रकृति और प्रकार्य जानने की कोशिश भी कम ही की जाती है। लेकिन हिंदी बोलने और सीखने की इच्छा रखने वालों की संख्या विभिन्न कारणों से निरंतर बढ़ भी रही है। दुनिया-भर में इसके बोलने/सीखने वाले बढ़ रहे हैं। वह दिन भी दूर नहीं, जब हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यताप्राप्त भाषा होगी। अतः हिंदी की प्रयोग संबंधी बारीकी जानने की उत्सुकता बढ़ रही है। भाषा का मुख्य प्रयोजन संप्रेषण है। प्रभावशाली संप्रेषण के लिए भाषा के प्रायोगिक बिंदुओं, ध्वनिव्यवस्था आदि की जानकारी अपेक्षित है। वाक् (स्पीच) घटना (इवंेट) के रूप में घटित होती है। विचार या भाव शब्द का जामा पहने हैं। अतः ध्वनि या उच्चारण के ठीक रहने पर ही सही संप्रेषण घटित होता है। हिंदी भाषा की ध्वनि-व्यवस्था अत्यंत वैज्ञानिक है, जिसकी समझ सही उच्चारण में सहायक होती है। हिंदी की एक विशेषता यह भी है कि हम जैसा बोलते हैं, प्रायः वैसा ही लिखते हैं। अतः थोड़े से प्रयास से भाषा के सही प्रयोग पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है। शिक्षण द्वारा बच्चे भाषा-प्रयोग में महारत हासिल कर सकते हैं। पाठ-अध्यापन भाषा के हर तरह के प्रयोग को सीखने और अभ्यास करने का अवसर देते हैं। इसलिए भाषा की प्रकृति, प्रयोग और शिक्षण में अंतर्संबंध के परिप्रेक्ष्य में यह एक विनम्र प्रयास है।
  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Sangharsh Ki Pratimurti : Aang Saan Su Ki
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-1564

    Availability: In stock

    आंग सान सू की यह नाम एक ऐसी महिला का है, जिसने अपने असाधारण धैर्य और असीमित देशप्रेम की भावना से अपने देश बर्मा को 70 वर्ष की तानाशाही सैन्य सरकार से मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र की स्थापना करके विश्च भर को नारी-शक्ति से परिचित कराया हैं। इस महान् महिला सू की का जीवन कठिन संघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहने के गुण और तानाशाहों की कुटिल प्रताड़नाओँ से भरा रहा है।
    प्रस्तुत पुस्तक 'संघर्ष की प्रतिमूर्ति -- आंग सान सू की : जीवन दर्शन' में आंग सान सू की के जीवन से जुडी घटनाओँ व तथ्यों को सरस, सरल और रोचक भाषाशैली में कलमबद्ध करने का प्रयास किया गया है। अहिंसा को अपना प्रमुख अस्त्र मानने वाली आंग  सान सू की के जीवन पर आधारित यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठक को अवश्य रुचिकर लगेगी।

  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Kahani Samagra : Nasera Sharma(3Vols.)
    Nasera Sharma
    2100 1785

    Item Code: #KGP-375

    Availability: In stock

    प्रख्यात कथा-लेखिका नासिरा शर्मा की कहानियाँ  समकालीन स्त्री रचनाकारों की कहानियों से कई मायनों में अलग और सर्वथा नई परिभाषा गढ़ती हुई नजर आती हैं । उनके यहाँ इनसानी रिश्ते केवल खून से ही नहीं, संवेदनाओं के उन तंतुओं से निर्मित होते हैं, जो इनसानियत के वजूद को बचाए रखने के लिए जारी हैं ।
    पहले खंड की कहानियाँ परिवार, देश-समाज की सीमा को लाँघते हुए ईरान तक की यात्रा कराती हैं । ईरान के अपने प्रवास काल के दौरान लेखिका ने जिस शिद्दत से वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति को आत्मसात् किया, उसको बहुत प्रभावी ढंग से उन्होंने इन कहानियों में अभिव्यक्त भी किया है ।  इस बहाने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों की भी लेखिका शिनाख्त करती हैँ। इस खंड की कई कहानियों में लेखिका अपने अतीत के पन्ने उलटते हुए उन क्षणों को वर्तमान संदर्भों से पुन: जीवंत करने का प्रयत्न करती है, जिन पर समय की बेशुमार परतें चढ़ चुकी हैं । दरअसल इन कहानियों के जरिए लेखिका अपने अतीत में घटित उन सामाजिक-राजनीतिक घटनाओँ की पड़ताल बदले हुए समय में करती हैं, जिनका संबंध वर्तमान से विच्छेद नहीं हुआ है ।
    दूसरे खंड की कहानियाँ इनसान के भीतर मौजूद शैतान को बाहर खींच निकालती हैं। सत्तालोलुपता की हवस में इनसान के हैवान में रूपांतरण की ये कहानियाँ अनेक सवालों को उठाती हैं। धर्म-स्थापना के नाम पर किसी भी प्रकार के अधार्मिक और अमानवीय क्रियाकलापों को जायज़ ठहराने वाली बीमार मानसिकता को भी ये कहानियाँ अनावृत करती हैं। इन कहानियों में समाज के निचले तबके के उन लोगों के दारुण यथार्थ की तस्वीर भी मौजूद है, जो अपना सब कुछ न्योछावर करके किसी भी देश-समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार करते हैं। बावजूद इसके शक्तिसंपन्न और सामंती मानसिकता के लोग उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।
    तीसरे खंड में लेखिका द्वारा पिछले तीन दशक में लिखी गई कहानियाँ सम्मिलित हैं । इनमें कुछ लंबी और कुछ लघु कथाएँ भी हैं । कथानक और घटनाक्रम के आधार पर इस खंड की कहानियाँ पूर्ववर्ती दो खंडों की कहानियों से कूछ अलग नजर आती हैं । इसका कारण यह है कि इस खंड की कहानियों में लेखिका ने अपनी दृष्टि के  विस्तार को थोड़ा संघनित किया है । यही वजह है कि इनमें देश-समाज-राजनीति-इतिहास से जुड़ी कहानियों के स्थान पर इनसानी नस्ल की प्रवृतियों पर आधारित कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं । बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जिनकी आँखें बारीक़ से बारीक रेशे को पकड़ती हैं, जिनके कान महीन से महीन आवाज को सुनते हैं और नाक हलकी से हलकी गंध ग्रहण करती है । ऐसे लेखकों को हम सहस्राक्षी लेखक भी कह सकते हैं । नासिरा शर्मा भी ऐसी ही लेखिका ।
    इनसानी मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण करती ये कहानियाँ लेखिका के भाषा-प्रवाह और ट्रीटमेंट के प्रति सजगता को भी प्रमाणित करती हैं ।
  • Kahin Kuchh Aur
    Ganga Prasad Vimal
    200 180

    Item Code: #KGP-9067

    Availability: In stock


  • Hindu Sanskars (Paperback)
    M.L. Ahuja
    125 113

    Item Code: #KGP-357

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindusanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life. 
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri
    Leeladhar Jaguri
    300 240

    Item Code: #KGP-1871

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Gandhi Ko Samajhane Ka Yahi Samay
    Jagmohan Singh Rajput
    300 240

    Item Code: #KGP-GKSKYS

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी वह महामानव हैं जिनकी प्रासंगिकता हर दौर में बनी रहेगी। व्यवस्थित जीवन जीने के लिए गांधी जी ने जो सूत्र दिएवे उनके व्यक्तित्व की भाँति आज भी उतनी महत्ता रखते हैं जितनी तत्कालीन समय में थी। जीवन के जिस भी क्षेत्र में उन्होंने जो भी अनुभव प्राप्त किएवही अनुभव उन्होंने साररूप में मानव जाति को प्रदान किए। वे जीवन के हर क्षेत्र-चाहे वह शैक्षिक हो या राजनीतिक-के प्रति बहुत गंभीर थे। उनका विचार था कि सामयिक क्रांति के पहले सुषुप्त समाज को जाग्रत करना जरूरी है और ऐसा तभी हो सकता है जब शिक्षा की प्रकाश-किरणें सब तक पहुँचें। इसके लिए उन्होंने वैचारिक चिंतन ही नहीं कियाअपितु व्यावहारिक प्रयोग भी किए।

    गांधी जी का मानना था कि शिक्षा वही उचित है जो बच्चों को उनके उत्तरदायित्व और कर्तव्य का बोध कराए। उनके अनुसार शिक्षा तो वही सही है जो चरित्र का उचित दिशा में निर्माण करे। प्रस्तुत पुस्तक गांधी को समझने का यही समय अपने में गांधी जी द्वारा प्रतिपादित चारित्रिकशैक्षिकसामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों को समाहित किए हुए है। इन मूल्यों में जो विकृति आई हैउसे दूर करने के लिए हमें गांधी को समझना होगा और गांधी को समझने का यही समय उपयुक्त है।

     

    स्वतंत्रता के बाद के सभी शिक्षा संबंधी अधिकांश दस्तावेजों में चरित्र निर्माण तथा मानव मूल्यों की शिक्षा पर बल दिया जाता रहा है। मगर स्थिति पहले से अधिक चिताजनक ही होती जा रही है। गांधी जी के जन्म के 150वें वर्ष में व्यक्तित्व-निर्माण और शिक्षा से व्यक्तित्व-विकास पर गहन विचार-विमर्श के द्वारा एक ऐसी रणनीति तैयार की जानी चाहिए जिसमें सभी की भागीदारी होजो शब्दों में नहींव्यवहार में पारदर्शिता के साथ समाज के अंतिम छोर पर अभी भी प्रतीक्षा कर रहे लोगों पर केंद्रित हो। साथ ही साथ देश इस पर भी बहस करे कि विशेषाधिकार प्राप्त करने की होड़ पर अंकुश कौन लगाएगायह विकृति कहाँ तक पहुँची हैइसका अंदाजा उस खबर से लगाया जा सकता है जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अपने कार्यस्थल तक आने-जाने के लिए एक विशेष मार्ग की माँग की गई थी। एक राज्य सरकार केवल वीआईपीके लिए एक फ्रलाईओवर हवाई अड्डे तक बनाने जा रही थी जिसे जनता ने प्रतिरोध कर रोक दिया था। इस उदाहरण में समस्या की गंभीरता तथा उसके समाधान दोनों ही निहित हैं। यदि इसका सारतत्त्व समझ लिया जाए तो हम सिर उठाकर गांधी को याद करने लायक हो सकेंगे।

  • Kirti Choudhary Ki Kahaniyan
    Kirti Chaudhary
    150 135

    Item Code: #KGP-9087

    Availability: In stock


  • Ajit Kumar : Rachna-Sanchayan
    Ganga Prasad Vimal
    450 405

    Item Code: #KGP-9005

    Availability: In stock

    अजितकुमार: रचना-संचयन
    अजितकुमार अपने समय के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में अग्रणी हैं। उनके लेखन का वैविध्य साबित करता है कि वे अपनी पीढ़ी की सभी विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवियों के बीच कविता के साथ-साथ वे श्रेष्ठ कथाकार हैं। कथाकारों के बीच वे श्रेष्ठ कवि हैं। कवि और कथाकार होने के साथ-साथ वे गंभीर गद्य लेखक हैं। चिंतक, विवेचक और अद्भुत अनुवादक के रूप में उनकी ख्याति सर्वत्र व्याप्त है।
    प्रस्तुत संचयन उनके 80 वर्ष के होने के उपलक्ष्य में तैयार किया गया है। चिर शिशु, चिर किशोर, चिर युवा अजित- कुमार के सृजन में एक साथ कई गुण मिलते हैं। उनमें एक नैसर्गिक विनोदप्रियता है। इस अनोखी आदत के कारण वे सभी वर्गों में लोकप्रिय हैं। उनसे ईषर्या रखने वाले लोग तो उन्हें महिलाओं में ही लोकप्रिय मानते हैं। उनके शत्रुओं का कथन यहाँ ज़्यादा विश्वसनीय लगता है कि उन्होंने स्त्री-रिझावु साहित्य का प्रणयन किया है तथापि स्त्री और पुरुष समान रूप से उनकी रचनाओं के पाठक हैं। कल्पनाशीलता उनकी रचनाओं का आद्य गुण है, किंतु यथार्थ के वे उतने ही बड़े संस्थापक हैं, जितने बड़े वे भाषा के द्वारा वास्तविकता की सजीवता स्थापित करते हैं।
    अजितकुमार के लेखन में समता, असांप्रदायिकता, सौंदर्यवादिता और जनपक्षधरता मौलिक रूप से विद्यमान है। उनका इतिहास-बोध भारतीय उपमहाद्वीप को भौगोलिक और राजनीतिक परिसीमाओं से ज़्यादा उदार घोषित करता है। वे भारत की बहुलता के समर्थक हैं। उनकी रचनाएँ उनकी वैचारिक ऊष्मा की प्रतीक हैं। सृजन के सभी गुणधर्मों का स्पर्श करने वाला अजितकुमार का लेखन परंपरा और आधुनिकता व उत्तर-आधुनिकता के आदर्शों को संकेतित करते हुए सनातनता की अवधारणा को पुष्ट करता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Asghar Wajahat
    Asghar Wajahat
    200 180

    Item Code: #KGP-9304

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    असग़र वजाहत

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार असग़र वजाहत की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘केक’, ‘दिल्ली पहुंचना है’, ‘अपनी-अपनी पत्नियों का सांस्कृतिक विकास’, ‘होज वाज पापा’, ‘तेरह सौ साल का बेबी कैमिल’, ‘शाह आलम कैंप की रूहें’, ‘शीशों का मसीहा कोई नहीं’, ‘जख्म’, ‘मुखमंत्राी और डेमोक्रेसिया’ तथा ‘सत्यमेव जयते’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार असग़र वजाहत की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।

  • Kavi Ne Kaha : Vijendra
    Vijendra
    150 135

    Item Code: #KGP-1874

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विजेन्द्र
    विजेन्द्र हमारे समय के विशिष्ट और बडे समर्थ कवि हैं । उनमें नवीनता के साथ अपनी जातीय स्मृतियों को कविता से कलात्मक ढंग से गूँथने का विरल कौशल है । अतः वे कविता अपने समय की लिखकर अपनी महान् काव्य-परंपरा को भी अपने अंदर सहेजे-समेटे रहते हैं । निराला और त्रिलोचन की परंपरा में उन्हें देखने के पीछे एक तर्क यह भी है कि वे सृजन और व्यवहार को अलग-अलग नहीं मानते । उनका काव्य उनकी जीवनचर्या से अलग नहीं है ।
    विजेन्द्र की काव्य भाषा सदा नए विवाद उठाती रही है, क्योंकि यह लोक-चेतन कवि सदा भाषा के बने-बनाए ढाँचों को तोड़ता रहा है। उनकी भाषा लोक और जनपदों की और सहज भ्रमण करती है । इसलिए उनकी कविता में लोक संस्कृति की विकासोन्मुख छवियों और बिंब बराबर दिखाई पडते हैं । इससे विजेन्द्र की कविता का संसार व्यापक और विस्तृत ही नहीं हुआ, बल्कि उसमें अपने समय के बहुआयामी यथार्थ को कहने की शाक्ति भी पैदा हुई है ।
    विजेन्द्र जैसे कवि की अनन्य सहजता अलग से पहचानी जाती है । इस कवि ने एक लंबी तनाव-भरी संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है । उनके अब तक छपे दस संकलनों की कविताओं को मिलाकर पढ़ने से एक ऐसी रचना-प्रक्रिया से हमारा सामना होता है जो एक साथ बहुआयामी और विकसनशील है । ज्यों-ज्यों कवि उग्र और अनुभव में परिपक्व होता गया है उसकी संवेदना भी त्यों-त्यों अधिक सघन और समृद्ध होती गई है ।
  • Qissa Maujpur Ka (Paperback)
    Jaivardhan
    80

    Item Code: #KGP-1378

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, काम से काम मैं नहीं सोच सकता । 
  • Vyangya Samay : Sharad Joshi (Paperback)
    Sharad Joshi
    225

    Item Code: #KGP-7225

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Sant Kavi Dadu
    Baldev Vanshi
    220 198

    Item Code: #KGP-100

    Availability: In stock

    संत कवि दादू
    श्री दादूजी महाराज की वाणी काव्यमयी है । अतः  महाराज की वाणी काव्य है । श्री दादूजी महाराज और कबीर जी में प्रकृति भेद के कारण दोनों के व्यक्तित्व में स्वभावत: भेद आ गया है । वैसे उनके विचारों और सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है । दोनों ही संत ज्ञानश्रयी  धारा के अग्रणी संत हैं । दोनों का मार्ग भक्तिमार्ग है । दोनों में ही जहाँ हिंदू और मुसलमानी मजहबों की आलोचना की है वहीं दोनों ने भारतीय दार्शनिकों और भक्तों के विचारों को स्वीकार किया है ।
    हम पहले ही कह चुके है कि यद्यपि श्री महाराज ने अपनी वाणी में बार-बार भक्तों और संतों के नामों का आदरपूर्वक संस्मरण किया है, उनकी वाणी में गोरखनाथ, नामदेव, कबीर, पीपा, रैदास आदि के नाम बार-बार आए हैं, किंतु उनकी श्रद्धा कबीर में अधिक है :
    साँचा शब्द कबीर का, मीठा लागे मोय । 
    दादू सुनताँ परम सुख, केता आनंद होय ।
  • Maheep Singh Rachana-Sanchayan
    Mahip Singh
    695 626

    Item Code: #KGP-718

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    225

    Item Code: #KGP-7227

    Availability: In stock

    हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य के शीर्ष रचनाकार के रूप में व्यापक स्वीकृति प्राप्त कर चुके हैं। कथा साहित्य में जो स्थान मुंशी प्रेमचंद का है, व्यंग्य साहित्य में वही प्रतिष्ठा परसाई की है। व्यंग्य को उन्होंने ‘विधिवत विधा’ के रूप में अंगीकार किया। अन्यान्य विधाओं के  बीच व्यंग्य ने जो अकूत यश प्राप्त किया है उसके मूल में परसाई का बहुविधा लेखन ही है। व्यंग्य लेखन के लिए अनिवार्य विशेषताएं उनके व्यक्तित्व में सहज विद्यमान थीं, अपने अनुभव-अध्ययन और अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने विशेषताओं को क्षमता में रूपांतरित किया। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते हुए उन्होंने तात्कालिक मुद्दों पर भी व्यापक सोच के साथ लिखा। आज यह देखकर किसी को आश्चर्य हो सकता है परसाई ने तत्कालीन राजनीति का कितना सघन व तार्किक विश्लेषण अपने लेखन में किया है। राजनीति, समाज, धर्म, संस्कृति, अर्थ आदि के भीतरी स्याह- सफेद का जितना बोध परसाई को था वह बहुत कम लेखकों में संभव हुआ है। किसी लेखक में ‘साहस’ किस सीमा तक सक्रिय हो सकता है, इसके उदाहरण परसाई हैं। अपने मित्र मुक्तिबोध की बात उनके हृदय में सहज समाई थी कि अभिव्यक्ति वेफ खतरे उठाने ही होंगे। स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज और उसके अंतर्विरोधों की पड़ताल करता परसाई का व्यंग्य लेखन हिंदी गद्य साहित्य की स्थायी निधि है। लेख, स्तंभ, कहानी, लघु उपन्यास आदि के रूप में उनकी रचनाएं एक जीवन दर्शन बनकर हमारे साथ चलती हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora
    Sudha Arora
    280 238

    Item Code: #KGP-701

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 200

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Mahaan Deshbhakt Pt. Madan Mohan Malviya
    Rashtra Bandhu
    60

    Item Code: #KGP-1059

    Availability: In stock


  • Parineeta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1353

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है परिणीता और दूसरा है मझली दीदी।
  • Netaji Subhash Chandra Bose : Sooktiyan Evam Sandesh
    Shravan Kumar
    75 68

    Item Code: #KGP-9199

    Availability: In stock

    नेताजी सुभाषचंद्र बोस: सूक्तियां एवं संदेश
    यह हमारा प्रथम कर्तव्य है कि हम स्वतंत्रता की इच्छा पहले अपने-आप में और देशवासियों में जाग्रत करें। यदि हम अपने हृदय की गहराइयों से स्वतंत्रता का नारा लगाना चाहते हैं तब हमें बंधनों की कसक और दासता की चुभन की अनुभूति करनी चाहिए। जब यह भावना तीव्र हो जाएगी तब हम अनुभव करेंगे कि स्वतंत्रता के बिना जीवन जीने के योग्य नहीं है। इस अनुभूति के पश्चात् ही एक ऐसा समय आएगा जब हमारी संपूर्ण आत्मा स्वाधीनता के लिए बेचैन हो उठेगी।

    हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ ही नहीं है, हमारा युद्ध विश्व साम्राज्यवाद के साथ भी है, जिसका एक महत्त्वपूर्ण अंग ब्रिटिश साम्राज्यवाद है। इसलिए हम केवल भारत के लिए ही नहीं लड़ रहे हैं, हम मानवता के लिए लड़ रहे हैं। भारत की मुक्ति मानवता की मुक्ति है।
    -इसी पुस्तक से
  • Maalish Mahapuran (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-514

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    -[इसी पुस्तक से]
  • Sapnon Ka Shahar : Dubai
    Manoj Singh
    260

    Item Code: #KGP-7221

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के कई नाम हो सकते हैं...‘दुबई: वंडर वल्र्ड’, ‘कमर्शियल कैपिटल’, ‘भविष्य का शहर’, ‘एक केस स्टडी’, ‘एक सफल राजतंत्र’, ‘एक विश्व मेला’, ‘एक आधुनिक बाजार’, ‘सिटी आॅफ माॅल्स’... लेकिन मैंने नाम दिया था ‘दुबई: एक मानवीय चमत्कार’...रेगिस्तान में सुंदर बाग-बगीचे और आइसफील्ड किसी चमत्कार से कम नहीं...मगर अंत में नाम रखा गया ‘सपनों का शहर: दुबई’...सपने अकल्पनीय होते हैं, अविश्वसनीय, रहस्य रोमांच से भरपूर और अति सुंदर भी...(इसी पुस्तक से)
  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat
    Bhagwat Rawat
    190 171

    Item Code: #KGP-552

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • 20-Best Stories From Africa
    Prashant Kaushik
    345 259

    Item Code: #KGP-9315

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. African short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Two Skin Woman, Slave Girl, South Winds, Apprentice, Allah’s Will, Green Leaves, this book is a compilation of 20 famous African short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Africa.
  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Kaur
    Ajeet Kaur
    350 315

    Item Code: #KGP-442

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरो वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिड़िया’ , 'चीख एक उकाब की है' तथा 'नया साल'।

    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shivani Ke Kathetar Sahitya Ka Saanskritik Adhyayan
    Sushil Bala
    700 630

    Item Code: #KGP-773

    Availability: In stock

    जिन कुछ लेखकों ने गद्य की विविध् विधओं में अपनी रचनाशीलता से हिंदी को समृद्ध व गौरवान्वित किया है उनमें शिवानी का नाम अग्रगण्य है। कहानीकार व उपन्यासकार के रूप में तो उन्होंने असंख्य पाठकों का मन मोहा ही; निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोकसाहित्य के द्वारा अनेक अनछुए-अनकहे व्यक्तियों-प्रसंगों-स्थानों की आंतरिकता व्यक्त की। स्वाभाविक है ऐसे रचनाकार के मूल्यांकन हेतु धैर्य, लगन और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। कहना न होगा कि सुशील बाला ने ‘शिवानी के कथेतर साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन’ पुस्तक में इन गुणों का परिचय देते हुए विषय का भलीभांति प्रतिपादन किया है। वे भूमिका में लिखती हैं, ‘शिवानी के कथेतर साहित्य में सामाजिक चेतना, नैतिक मान्यताएं, राजनीतिक परिदृश्य इत्यादि सभी बिंदुओं में परंपरागत और नवागत तत्त्वों का रेखांकन किया गया है। आधुनिक, राजनीतिक एवं आर्थिक यथार्थ कथेतर साहित्य का तीव्र स्वर है।’ पुस्तक छह अध्यायों में विभक्त है। इनमें क्रमशः शिवानी के निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोक साहित्य का विवेचन है। पुस्तक के प्रारंभ में शिवानी के कथेतर साहित्य का भलीभांति परिचय दिया गया है।
    पुस्तक की विशेषता यह है कि लेखिका ने उन उज्ज्वल पक्षों को खोज लिया है जो शिवानी के लेखन का आलोक हैं। पाठक सुपरिचित हैं कि वैसे तो शिवानी की रचनाशीलता का अनिवार्य चरित्र है सूक्तिप्रियता। वे वाक्यों का गठन इस तरह करती हैं कि वे सुभाषित में ढल जाते हैं। सुशील बाला ने इस तथ्य को समझते हुए शिवानी के कथेतर साहित्य का अवगाहन किया है। जैसे महाबलिपुरम की मूर्तिकला पर शिवानी लिखती हैं, ‘कौन कह सकता है कि ये सातवीं शताब्दी की बनी मूर्तियां हैं। लगता है अभी-अभी मूर्तिकार यहां से छेनी-हथौड़ी उठाकर विदा हुआ है।’ यह पुस्तक पढ़कर सहजरूपेण समझा जा सकता है कि कथेतर विधाओं में शिवानी का प्रदेय कितना महत्त्वपूर्ण है। अपनी अनूठी भाषा शैली से उन्होंने जो रचना-संसार निर्मित किया, उसका सांगोपांग विवेचन सुशील बाला ने यहां किया है। सामान्य पाठकों और अनुसंधनकर्ताओं के लिए समान रूप से उपयोगी पुस्तक।
  • Swatantra Bharat Mein Proud Shiksha
    Hiralal Bachhotia
    225 203

    Item Code: #KGP-9361

    Availability: In stock

    अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना और सबसे बढ़कर लोकतंत्र में अपनी भूमिका को समझने में एक पढ़ा-लिखा नागरिक या कम से कम एक साक्षर व्यक्ति ही कामयाब हो सकता है। स्वाधीनता आंदोलन के आयामों में हिंदी प्रचार-प्रसार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, भाईचारा आदि समान निरक्षरता को मिटाना भी एक रचनात्मक कार्यक्रम था। बुनियादी तालीम में कार्यानुभव या करके सीखना पर पर्याप्त जोर दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही साक्षरता समाज शिक्षा का अभिन्न अंग बन गया।
    स्वतंत्र भारत में समाज शिक्षा का विस्तार प्रौढ़ शिक्षा के रूप में हुआ और धीरे-धीरे प्रौढ़ शिक्षा ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। इसमें कम से कम कुछ लोगों और समर्पित समूहों के योगदान के साथ पढ़ना सिखाने की परंपरित वर्णमाला पद्धति के स्थान पर नई वैज्ञानिक पद्धति—चित्रा-वर्ण-विधि का अनुसरण कर कम समय में साक्षर बनाने का विकल्प सर्वाधिक सफल रहा और पढ़ना-लिखना सीखने-सिखाने की क्रिया को रोचक गतिविधि बनाने का प्रयत्न किया गया। दुनिया के अन्य देशों में आंदोलन के रूप में ही निरक्षरता पर चोट की गई। क्यूबा आदि के उदाहरणों से हम परिचित ही हैं—भारत में भी कमोबेश यही वातावरण निर्मित हुआ और निरक्षरता से निपटने के अनेक आयाम उद्घाटित हुए। देश में एक सकारात्मक वातावरण बना। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की 14 प्रतिशत साक्षरता केरल में तो शत-प्रतिशत ही हो गई। यह एक लंबी लड़ाई का परिणाम है जिसमें योजनाब; तरीके से आलोचनाओं के बावजूद उत्तरोत्तर उपलब्धियां प्राप्त करने में सफलता मिली। अब सभी जान गए हैं कि विकास सुफल प्राप्त करने, योजनाओं का लाभ लेने में साक्षरता का योगदान कितना जरूरी है। कमोबेश यही स्वतंत्र भारत में प्रौढ़ शिक्षा की उपलब्धता की कहानी है। इसका एक पहलू यह भी रहा कि आम आदमी साक्षरता के सहारे कुछ तो आगे बढ़ा और अपनी मंजिल को पहचान सका।
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Nikka Nimana (Paperback)
    Sushil Kalra
    180

    Item Code: #KGP-427

    Availability: In stock

    ...आजादी के पैरोकार जो जमीन तैयार कर रहे थे उसकी उपजनिक्का निमाणा' के अतिरिक्त और हो ही क्या सकती थी। तिरस्कृत, लांछित, अपमानित चरित्र-एक ऐसा चरित्र जो भ्रष्ट आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रिया का कुल योग है।

    पंजाब का पिण्ड घोपलू उन लाखों गांवों में से एक है जो चीख रहे हैं-हमें पानी दो। खाद दो। बीज और बिजली दो। शिक्षा और संस्कार दो। भूरी, नंबर, मद्दी, वड्डी मां, निक्काया, मेंहदीरत्तो, चाचे कृष्णा, कहां नहीं हैं? भरे पड़े हैं सारे देश में संसद की जड़ों में खाद बनकर जी रहे हैं।

    दरियाई घोड़े की तरह मुंह फाड़े राजतंत्र, देह और दौलत की घोर अमानवीय अराजक परिणति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। मूल्य ह्रास, नैतिक पतन, नारकीय जीवन को गांधी टोपी के नीचे छिपाए, जनता को लगातार रौंदता

    और भटकाता सत्ताधारी वर्ग औरत, शराब और पैसे की त्रिवेणी में सदा सर्वदा पवित्र है! जो इस कला में जितना पारंगत है, उतना ही ऊंचा पद, सत्ता में, उसके लिए सुरक्षित है। निक्का इसी गंगा का शालिग्राम है। लेकिन इस प्रतियोगिता में निक्का एक हद तक ही विजयी होता है। धीरे-धीरे डोर उसके हाथ से छूटती जाती है। वह महज एक मोहरा रह जाता है। उभरता है फिर एक अत्यंत क्रूर, अमानवीय, स्वार्थाध शासक वर्ग। लेकिन साथ-साथ ही एक नियामिका शक्ति भी उभरती है-जनता।

    यथार्थ की तहों तक पहुंचतासृजनात्मक प्रवहमान भाषा का माध्यम और सुस्पष्ट दृष्टि का प्रमाण देने वाला यह उपन्यास निश्चित ही अपने समय का दस्तावेज लगता है।    

  • Aatmvishvas Aur Mitrata Kee Jeet
    A.W.I.C.
    30 27

    Item Code: #kgp-aamkj

    Availability: In stock


  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-771

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    350 263

    Item Code: #KGP-616

    Availability: In stock


  • Kaal Chetna
    Amrita Pritam
    150 120

    Item Code: #KGP-1975

    Availability: In stock

    काल चेतना
    एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
    लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं ।
    सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
    और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का ।
    सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती है
    और चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति ।
    दोनों शक्तियां स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक है ।
    अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,
    इंसान के भीतर पडी पनपती रहती है ।
    यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती है
    और पिता-पितामह के करमों से भी ।'
    हमारे अपने देश में, कई जातियों में
    एक बहीं रहस्यमय बात कही जाती है,
    हर बच्चे के जन्म के समय,
    कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना ।
    इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
    किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
    से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती है
    और आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती 
    मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथा
    बहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मत
    की लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए ।
    पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,
    ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियों
    से न रूठने का संकेत है ।
    यह पुस्तक भी तेरहवीं थाली में कुछ परसने का यत्न है ।
    - अमृता प्रीतम
  • Rashtra Kavi Ka Stri Vimrash
    Prabhakar Shrotiya
    150 135

    Item Code: #KGP-1543

    Availability: In stock

    स्त्री-जागरण और स्त्री-गरिमा को लेकर गुप्त जी ने जो रचनाएं लिखी, वे आज की जरूरत भी हैं, भले ही भिन्न रूप रंग-तेवर में। उन्हांने तभी महसूस कर लिया था कि स्त्री की समस्या सबसे पुरानी, सबसे जटिल लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है। गुप्त जी ने बड़े घर की नारियों से लगाकर साधारण घर-संसार की ऐसी नारियों का सृजन और पुनर्सृजन किया जो समाज के बहुकोणीय स्वरूप को प्रकट करती हैं। उनके माध्यम से गुप्त जी ने समाज, संस्कृति और मानवीय गुणावगुण रेखांकित किए हैं। उनके स्त्री-चरित्रों की विविधता, उनके अभिप्राय और मर्मस्पर्शिता समाज को शील और आचरण का आईना दिखाती है।
    स्त्री-विमर्श और नारी-सशक्तीकरण के युग में आज यदि हम गुप्त जी के नारी-पात्रों पर विचार करते तो हमें उनके माध्यम से उस संघर्ष और विमर्श का पता चलेगा जो बीसवीं शती के दूसरे-तीसरे दशक में कवि कर रहे थे। उनकी संवेदना, उदारता, प्रगतिशीलता और समय को भरोसे में लेकर समयातीत पहल की क्षमता रेखांकित की जानी चाहिए। इससे यह भी प्रकट होता है कि खड़ीबोली हिंदी के जन्मकाल से ही सामाजिक विकास और उन्नयन का वह आंदोलन प्रारंभ हो गया था जिसे हम 70-89 साल बाद उत्तर-आधुनिक विमर्श बना रहे हैं। हमारी भाषा, हमारे संघर्ष की प्रणाली और अभिव्यक्ति-शिल्प भले बदल गया हो, परंतु चिंता के बीज लगभग वे ही हैं। इस तरह देखने पर हिंदी की जीवट और अग्रगामिता का पता चलता है।
    गुप्त जी के स्त्री-चरित्रों और स्त्री-चिंतन पर यह छोटी-सी पुस्तक दरअसल नई उपजाऊं पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
  • Shalmali
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-2006

    Availability: In stock

    शाल्मली
    ० 'शाल्मली' नासिरा शर्मा का एक ऐसा विशिष्ट उपन्यास है, जिसकी जमीन पर नारी का एक अलग और नया ही रूप उभरा है । 'शाल्मली' इसमें परंपरागत नायिका नहीं है, बल्कि यह अपनी मौजूदगी से यह अहसास जगाती है कि परिस्थितियों के साथ व्यक्ति का सरोकार चाहे जितना गहरा हो, पर उसे तोड़ दिए जाने के प्रति मौन स्वीकार नहीं होना चाहिए । 
    ० 'शाल्मली' सेमल के दरख्त की तरह है, जिसका अंश-अंश संसर्ग में आने वाले को जीवन-दान करता है; लेकिन उसका पति नरेश इस सच को स्वीकार करने की जगह अपनी कुंठाओं में जीता है, अपने स्वार्थों को शाल्मली के यथार्थ आचरण से ऊपर समझता है । यह हिसाबी-किताबी जीव है; लेकिन जिंदगी की सच्चाई के साथ इसका समीकरण गलत है ।
    ० 'शाल्मली' एक बडी अफसर है। बावजूद इसके वह बेहद सामान्य है । पति, माता-पिता और सास के साथ उसके रिश्ते सच के नज़दीक है । यहीं उसकी खूबी है कि वह 'नौकरशाह' होते हुए भी, उस वर्ग से कटी हुई है और एक आम भारतीय नारी के यथार्थ को जीती है ।
    ० लेकिन 'शाल्मली' दया और करुणा से डूबी अश्रु बहाने वाली उस नारी का प्रतीक भी नहीं है, जिसे पुरुष-सत्ता की गुलामी में सब कुछ खो देना पड़ता है । वह सामान्य होते हुए भी असाधारण है और चुनौती के तेवर रखती है ।
    ० नासिरा शर्मा ने निश्चय ही यह उपन्यास बडी मेहनत से लिखा है । इसकी भाषा में कविता की लय और दिवार में निरंतरता को उन्होंने बडी खूबी से संवारा है ।
  • Amar Shaheedon Ki Amar Kathayen
    Shyam Lal
    50

    Item Code: #KGP-969

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sanskriti Aur Hindi-Pradesh-1
    Ram Vilas Sharma
    750 600

    Item Code: #KGP-9024

    Availability: In stock

    भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश : 1
    महाभारत और रामायण में सभागारों और बड़े-बड़े भवनों का वर्णन है । वे हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में प्रत्यक्ष है । पाटलिपुत्र एक बड़े साम्राज्य की राजधानी बना । वहां के भवन चीनी यात्री फाहियान ने देखे तो उसने सीधा, ये मनुष्यों के नहीं, देवों के बनाए हुए होंगे । पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा और उज्जयिनी, ये भारत के प्राचीन नगर थे । आज भी ये संसार के ऐसे प्राचीनतम नगर हैं, जिनका इतिहास अब तक अटूट चला आ रहा है । भारतीय संस्कृति का बहुत गहरा संबंध इन चार महानगरों से है । इन नगरों पर ध्यान देते ही यह प्रचलित धारणा खंडित हो जाती है कि भारत ग्राम समाजों का देश है, यहाँ के लोग कला-कौशल में पिछडे हुए थे और हमें उन्हें ग्राम समाजों की ओर लौट जाना चाहिए । ये चारों महानगर विभिन्न युगों में व्यापारिक संबंधों से परस्पर जुड़े रहे हैं । इन्होंने दक्षिण जनपदों के मदुरै आदि नगरों से भी संबंध कायम किया था । मगध से मालवा तक अब जातीय भाषा के रूप में हिन्दी का व्यवहार होता है । नगरों के बिना हिन्दी का यह प्रसार भारत के सबसे बडे जातीय क्षेत्र में असंभव था । इन नगरों के द्वारा हिन्दी प्रदेश के जनपद प्राचीन काल से परस्पर संबद्ध हुए और दक्षिण भारत से उन्होंने अपना संबंध जोड़ा । इसलिए भारत राष्ट्र के निर्माण में और भारतीय संस्कृति के विकास में हिन्दी प्रदेश की निर्णायक भूमिका स्वीकार करनी चाहिए । दक्षिण में तमिलनाडु, उत्तर में कश्मीर, पूर्व में असम और पश्चिम में गुजरात, दूर-दूर के इन प्रदेशों को जोड़ने वाला, इनके बीच स्थित विशाल हिन्दी प्रदेश है । ऋग्वेद, अथर्ववेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, अर्थशास्त्र की रचना यहीं हुई । यहीं कालिदास और भवभूति ने अपने ग्रंथ रचे और मौर्य तथा गुप्त साम्राज्यों की आधारभूमि यही प्रदेश था । उत्तरकाल से दिल्ली, आगरा इस प्रदेश के बहुत बड़े नगर बने । ये व्यापार के बहुत बड़े केंद्र थे और सांस्कृतिक केंद्र भी थे । तुर्कवंशी राजाओं ने यहीं रहकर शताब्दियों तक एक बहुत बड़े राज्य का संचालन किया था । विद्यापति, कबीर, सूरदास, तुलसीदास जैसे कवि इसी क्षेत्र में हुए । इसी प्रदेश में प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन का जन्म हुआ । अपने स्थापत्य सौन्दर्य से संसार को चकित कर देने वाला ताजमहल इसी प्रदेश के आगरा नगर में है । इसलिए इस पुस्तक का नाम भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश है ।
  • Aupacharik Patra-Lekhan
    Om Prakash Singhal
    380 342

    Item Code: #KGP-786

    Availability: In stock

    औपचारिक पत्र-लेखन
    विषय एवं शैली की दृष्टि से पत्रों का एक महत्त्वपूर्ण वर्ग औपचारिक पत्रों का है। औपचारिक पत्र एक प्रकार के दस्तावेज होते हैं। जरूरत पड़ने पर उनका उपयोग साक्ष्य एवं प्रमाण के रूप में किया जाता है। अतएव उन्हें लिखते समय पर्याप्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अब विभिन्न कार्यालयों में नियुक्त हिन्दी पढ़े-लिखे व्यक्तियों से हिन्दी पत्रचार में दक्ष होने की अपेक्षा की जाती है।
    औपचारिक पत्रों के विविध रूपों की  लेखन-शैली का सोदाहरण सैद्धांतिक विवेचन करने वाली पुस्तक का हिन्दी में सर्वथा अभाव है। विषयगत अपेक्षाओं एवं समय की माँग को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक हिन्दी में अपने विषय की पहली पुस्तक है।
    अनुप्रयुक्त हिन्दी के क्षेत्र में एक नया मार्ग प्रशस्त करने के कारण हिन्दी के प्रत्येक जागरूक पाठक और पुस्तकालय के पास इसका होना अनिवार्य है।
  • Postmortem
    Ajeet Kaur
    160 144

    Item Code: #KGP-2048

    Availability: In stock


  • Bharat Ke Mahan Sant
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkms

    Availability: In stock


  • Kammi Or Nanda
    Amrita Pritam
    200 180

    Item Code: #KGP-7836

    Availability: In stock

    कम्मी और नन्दा
    नन्दा यूनिवर्सिटी की बाहरी दीवार के पास
    पहुँची ही थी कि उसने देखा कि दीवार
    के साथ  ढासना लगाकर खडी हुई एक
    औरत ने पैसे मांगने के लिए अपना हाथ
    आगे किया हुआ है—
    वह हाथ नन्दा की तरफ बढ़ता हुआ
    नन्दा की कमीज़ से छू गया... 
    नन्दा ने उस माँगने वाली औरत की तरफ
    देखा—उस औरत का चेहरा उजड़ा
    हुआ था, बाल खुश्क और माथे
    पर बिखरे हुए थे, सिर पर
    एक लीर-सा दुपट्टा थाµपर
    आँखों में एक अजीब सी चमक
    और हसरत थी-नक्श रुले हुए थे,
    बुरे नहीं थे—वह हाथ के नन्दा के
    आगे पसारकर-एकटक नन्दा के
    मुँह को देखे जा रही थी…
    नन्दा उकताई-सी तेज कदमों से घर
    जाने वाली बस क्रो तरफ़ चल दी ।
    लेकिन बस के पायदान पर
    एक पॉव रखा ही था कि
    अचानक नन्दा को खयाल आया—
    'कौन जाने यह माँगने वाली
    औरत ही मेरी माँ हो...'
    -नन्दा का एक सपना
  • Narsi Mehta
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-9291

    Availability: In stock

    नरसी मेहता अपने समय के एक परम भागवत गृहस्थ संत थे। गुजरात की पवित्र भूमि का यह परम सौभाग्य था कि वहां ऐसे भगवान् के प्रेमी संत ने जन्म लिया। उनकी भगवत्भक्ति ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, अपितु समस्त भारत को प्रभावित किया। महात्मा गांधी को नरसी मेहता का निम्न पद बहुत प्रिय था, क्योंकि इसमें वैष्णव होने की जो व्याख्या की गई है, वह मानव-प्रेम का सच्चा संदेश देती है। आज लोग नरसी मेहता के इस पद से बहुत परिचित हैं-
    वैष्णवजन तो तेने कहिए, जे पीड पराई जाणे रे,
    पर दुःखे उपकार करे तोय, मन अभिमान न आणे रे।
    सकल लोक मां सहुन वंदे, निंदा न करे केनी रे,
    वाच काछ मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेनी रे।
    समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जेने मात रे,
    जिव्हा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।
    मोहमाया व्यापे नहिं जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मन मां रे,
    राम नाम शंुताली लागी, सकल तीरथ तेना मन मां रे।
    वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे,
    भणे ‘नरसैयो’ तेनुं दरसन करतां, कुल इकोतेरे तर्या रे।
  • Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal
    Viren Dangwal
    190 171

    Item Code: #KGP-387

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
    वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

  • Karmveer Pt. Sunderlal : Kuch Sansmaran
    Sudhir Vidyarthi
    125 113

    Item Code: #KGP-1964

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Egypt (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7200

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Egyptian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Re’s Story, Isis, Osiris, The Greek Princess, The Shipwrecked Sailor, The Book of Thoth, Egypt’s Great Magician, this book is a compilation of 20 famous Egyptian short stories. 
    Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Egypt.
  • Postmortem (Paperback)
    Ajeet Kaur
    100

    Item Code: #KGP-1310

    Availability: In stock


  • Koi Aur Raasta Tatha Anya Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    200 180

    Item Code: #KGP-731

    Availability: In stock

    कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक
    यह नया नाट्य-संग्रह आपके हाथों में है । एकांकी के बंधनों को तोड़ने वाले इन नौ लघु नाटकों के विषय अलग-अलग हैं।
     'अंक-दृष्टा' जहाँ रामानुजन की जीनियस को रेखांकित करता है तो 'अंतराल के बाद' में बदलते मूल्यों के बीच माँ एवं पुत्र के संवेदनात्मक संबंधी के बदलने की गाथा है । 'दफ्तर में एक दिन' एक सरकारी दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यशैली एवं उबाऊ माहौल को उकेरता है तो 'कोई और रास्ता' संस्कारों से बँधी एक आधुनिक लड़की की संघर्ष-गाथा है । 'फैसला' में नारी- सम्मान का प्रश्च है तो 'लडाई' जाति के बंधनों के विरोध की दास्तान है । 'वापसी' अपनी जड़ों से उखड़ विदेश बसने की आकांक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते युवा पीढी का बयान है तो 'लम्हों ने खता की थी' एड्स के खतरों से आगाह करने की कोशिश है । इसी तरह से 'मेरी-तेरी सबकी गंगा' में गंगा की पौराणिक कथा को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास है ।
    यानी कुल मिलाकर सभी नाटकों का रंग अलग, मिजाज अलग, समस्या अलग है । मामूली लोगों के जीवन के विविध पक्षों को पकड़ते, परखते ये लधु नाटक आपको बाँधेंगे भी, कोंचेंगे भी ।

  • Ath Nadi Katha
    Hari Krishna Devsare
    450 405

    Item Code: #KGP-219

    Availability: In stock

    अथ नदी कथा
    भारत की नदियों की पवित्रता, ऐतिहासिकता, पौराणिकता और उनके गौरवशाली वरदानों से हम सदियों से जुडे है । आम आदमी के लिए, नदी की यह कथा न केवल रोचक हो सकती है, उसके लिए प्रेरक भी हो सकती है। समय के साथ हमने कितनी ही नदियों की गाथाएँ भुला दी हैं। केवल उँगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम ही लोगों को याद हैं। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि भारत को लगभग सभी महत्वपूर्ण? नदियों के सम्मिलित किया जाए। फिर भी क्षेत्रीय महत्त्व की और छोटे यात्रा-पथ वाली नदियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है।
    इस पुस्तक में सम्मिलित नदियों का यथासंभव पौराणिक माहात्य, उनकी पौराणिक एवं लोक- प्रसिद्ध कथाएँ, उनसे संबद्ध ऋषियों, तपस्वियों की कथाएँ दी गई है । इसी के साथ उनकी उत्पत्ति, की कथाएँ, उद्गम स्थल का भौगोलिक महत्त्व और फिर आगे के यात्रा-पथ का वर्णन है। यात्रा-पथ में नदी के दोनों तटों पर बसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं औद्योगिक नगरों के साथ साथ तीर्थों, संगमों, मंदिरों आदि के लोकव्यापी महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है। ये सभी विवरण हमारी भावी पीढ़ी, युवा पीढ़ी और प्रौढ़ों-तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • Suno Manu (Paperback)
    Vishva Mohan Tiwari
    100

    Item Code: #KGP-1488

    Availability: In stock

    सुनो मनु
    आज का युवा तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है, किंतु अपने माता-पिता या दादा-दादी से उचित सलाह न मिल सकने के कारण उसे शीघ्र ही भोगवादी बाज़ार के दलदल में फँस जाने का खतरा रहता है। 
    एक युवक को ऐसे खतरे से बचाने के लिए एक पिता ने होस्टल में रहने वाले अपने पुत्र को लगातार पत्र लिखे, जिससे न केवल उसे वरन् उसकी मित्रमंडली के समुचित विकास में, उन्हें जीवन में सोच-विचार कर आगे बढ़ने में सहायता मिली। 
    उन पत्रों की सफलता का रहस्य था पुत्रा एवं पिता में मित्रवत् व्यवहार। पिता में एक ओर तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक है तथा दूसरी ओर आधुनिकता की पर्याप्त समझ है। 
    पत्रों में पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन-मूल्य संबंधी प्रश्नों पर आपस में विचार- विमर्श है। 
    इस पुस्तक में युवाओं के लिए वे संदेश हैं, जिनसे उनमें इतनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक शक्ति आ सकेगी कि वे भारत को और इसलिए स्वयं को सचमुच ही विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिला सकें। 
  • Kavi Ne Kaha : Arun Kamal (Paperback)
    Arun Kamal
    90

    Item Code: #KGP-1524

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: अरुण कमल
    यहाँ जो कविताएँ संकलित हैं वे मेरी सभी चार प्रकाशित कविता-पुस्तकों एवं आने वाली पुस्तक से ली गई हैं। कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो इन पुस्तकों के बाहर की हैं जो लिखी तो पहले गईं परंतु जिनका समावेश नहीं हो सका। ये कविताएँ मैंने खुद चुनी हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाकी कविताएँ जो यहाँ नहीं हैं वे इनसे हीनतर हैं या उनसे मेरा स्नेह कम है। हो सकता है कुछ लोगों को वे ही अधिक पसंद आवें। चाहिए तो यह कि किसी भी कवि की सभी रचनाओं को यानी पहली से लेकर अब तक एक साथ पढ़ा जाए। तब जाकर चित्र पूरा होता है क्योंकि कोई भी एक कविता अपने में पूरी नहीं होती, उसकी नाल किसी पिछली में होती है और मंजरी आगे बहुत दूर चलकर दिखलाई पड़ती है। इसलिए कई बार ओझल रह जाने वाली कविताएँ ध्यान देने पर बहुत महत्त्वपूर्ण लगती हैं।
  • Kartavya
    Samual Smiles
    240 180

    Item Code: #kgp-krtvya

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Qurratulain Hyder
    Qurratulain Hyder
    260 234

    Item Code: #KGP-833

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कुर्रतुलऐन हैदर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो', 'फोटोग्राफ़र', 'कारमिन', 'पतझड़ की आवाज़', 'जुगनुओं की दुनिया', 'कलंदर', 'कोहरे के पीछे', 'कुलीन', 'डालनवाला' तथा 'यह दाग-दाग उजाला' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कुर्रतुलऐन हैदर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Culture Valture
    Mamta Kalia
    350 280

    Item Code: #KGP-9221

    Availability: In stock

    कल्चर वल्चर
    शीर्षस्थ कथाकार ममता कालिया की प्रत्येक रचना पर उनकी रचनाशीलता के हस्ताक्षर रहते हैं। संवेदना की थाह लेने और भाषा में उसे संभव करने का उनका अपना एक अनूठा ढंग है। ‘कल्चर वल्चर’ ममता कालिया का नवीनतम उपन्यास है। इसके बीज-विचार के संदर्भ में उन्होंने लिखा है, ‘कला, साहित्य व संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनते जा रहे हैं और इसके प्रबंधक, कारोबारी। इनके हाथों में संस्कृति, विकृति बन रही है और साहित्य, वाहित्य।’
    ममता कालिया ने बहुत कुशलता के साथ कोलकाता की पृष्ठभूमि में इस उपन्यास की कथा बुनी है। महत्तर उद्देश्यों को लेकर अस्तित्व में आई एक साहित्यिक- सांस्कृतिक संस्था किस तरह विडंबनाओं, विरूपताओं, अंतर्विरोधें, कपट, कलह, चतुर चाटुकारिता व निजी महत्त्वाकांक्षाओं का तलघर बन जाती है—यह तथ्य ‘कल्चर वल्चर’ में उजागर हुआ है। लेखकीय कौशल यह है कि सारे चरित्र और कथा-प्रसंग कल्पना पर आधारित होते हुए भी अपनी निष्पत्तियों में अत्यंत जीवंत हैं। चाहें तो इस उपन्यास में समकालीनता की पदचाप या अनुगूंज भी सुन सकते हैं। नवीन और सुषमा जैसे चरित्र अपने निहितार्थों के साथ पाठक के चित्त पर अंकित हो जाते हैं। लेखिका ने व्यापक संदर्भों के साथ उन मनोवृत्तियों को टटोला है जो शब्द में सिक्कों की खनक और साहित्य में सरोकारों का शोकगीत सुनना चाहती हैं। ‘कल्चर वल्चर’ भूमंडलीकरण, उद्दंड पूंजी, निरंकुश सोच आदि के आशयों को भी खंगालता है। अपनी प्रांजल व खिलंदड़ी भाषा के लिए ममता कालिया बहुप्रशंसित हैं। यह उपन्यास उनकी रचनात्मक सिद्धि का एक अभिनव आयाम है।
  • Mere Saakshatkaar : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    300 270

    Item Code: #KGP-2038

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : विष्णु प्रभाकर
    गांधीवादी चिंतक, विचारक, लेखक विष्णु प्रभाकर ने जितना साहित्य रचा है, उससे कम बोला भी नहीं कहा जा सकता ।
    सन् '52 में विष्णु जी का पहला साक्षात्कार पदूमसिंह शर्मा 'कमलेश' ने लिया था । उसके बाद अब तक न जाने कितने वार्ताकारों ने विष्णु जी को अपने समय, समाज और यादों के पिटारे को आने पर बाध्य किया है ।
    वार्ताकार अपनी और से कुछ नया, कुछ महत्वपूर्ण जानने ही किसी विशिष्ट जन के पास जाता है, पर क्या हर बार ऐसा हो पाता है कि विशिष्ट जन कुछ अनकहा कह पाया हो ? प्रस्तुत पुस्तक में विष्णु जी के कई ऐसे साक्षात्कार है जिनके जवाबों ने तो पाठकों को चौंकाया ही, जिनके सवालों ने स्वयं विष्णुजी को भी कम हैरत में नहीं डाला । पुस्तक की भूमिका में उन वार्ताकारों का, उनके सवालों का और उनके सरोकारों का उल्लेख करना ही इस बात का पुख्ता  प्रमाण है कि वार्ताकार ने वार्तादाता को कितना मथा ।
    विष्णु प्रभाकर न सिर्फ गांधीवादी लेखक-चिंतक है, वे बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवनीकार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, मसिजीवी, यायावर, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध और साठित्य की विविध विधाओं के सर्जक हैं । स्वाभाविक है, विष्णु जी की वार्ताओं में न केवल हमारा निकट अतीत, विकट वर्तमान और संकटग्रस्त भविष्य उजागर हुआ है, साहित्य के सरोकार, एक लेखक का संधर्ष और साहित्य की धरोहर भी उजागर हुई है ।
    संकलित साक्षात्कार पाठक तक उतना कुछ थोंड़े में पहुंचाने में समर्थ हैं, जितना कुछ कई योगियों में दर्ज करने पर भी न पहुँच पाया होगा ।
  • Gandhivaad Aur Hindi Kavya
    Bhakt Ram Sharma
    225 203

    Item Code: #KGP-890

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी इस शताब्दी के महत्तम व्यक्तियों में गिने जाते हें। उनका चरित और चिंतन तपःपूत है। भारतीय इतिहास में महात्मा बुद्ध के अतिरिक्त ऐसा शक्तिशाली लोकनायक नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व का स्पर्श पाकर ‘कोई कवि बन जाए संभाव्य है’। मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी और भवानीप्रसाद मिश्र जैसी प्रतिभाएं उनके संपर्क में आकर उद्दीप्त हुई हैं। गांधीवादी काव्य की सबसे बड़ी शक्ति उज्जवल भारतीय परंपराओं का स्वीकार है। इन कवियों ने जीवन और काव्य के माध्यम से स्वातंत्र्य-आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। वस्तुतः हिंदी काव्य के इतिहास में गांधी-विचारधारण से प्रभावित रचनाओं के अनुशीलन के बिना तत्कालीन हिंदी साहित्य के विकास-क्रम को सम्यक् परिप्रेक्ष्य में समझना कठिन होगा। गांधी-विचारधारा के फलस्वरूप ही तत्कालीन कवियों ने शुद्ध, सात्त्विक, सुरुचिपूर्ण एवं स्वस्थ दृष्टिकोण संपन्न कृतियों की सृष्टि की। हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखक ऐसे स्वस्थ साहित्य का सम्यक् मूल्यांकन नहीं कर पाए थे। सर्वप्रथम तो गांधी-विचारधारा को आत्मसात करना ही बड़ा दुष्कर कार्य हैं फिर दूसरा उस विचारधारा को काव्य में अनुम्यूत करना और भी कठिन कार्य है। ऐसे गांधीवादी साहित्य का पूर्वाग्रह से मुक्त मूल्यांकन ही इस ग्रंथ की महत्ता एवं मौलिकता है। गांधीवाद काव्य को कहां, कितना, किस रूप में प्रभावित, मुखरित करता है, लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में यही सब जांचा-परखा है।
  • Sant Ravidas Ki Ramkahani
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-732

    Availability: In stock

    'संत रविदास की रामकहानी' कवि देवेन्द्र दीपक की संत  रविदास के जीवन-दर्शन पर अपने किस्म की प्रथम औपन्यासिक रचना है । इसमें सृजन और अध्यात्प चेतना के आस्थाशील आयाम उदघाटित हुए हैं । लेखक ने रविदास के अंतत् से उतरने, उसके चिंतन के मर्म को उकेरने का सफल प्रयास किया है । इसमें संत के मन-आत्म की पारदर्शी निर्मलता तथा हाथ के श्रम के प्रति गहरी आस्था भी व्यक्त  हुई है । अपने समाज के श्रमशील उज्जवल समुदाय को दलित बना दिए जाने की पीडा के साथ भारतीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए सामाजिक न्याय, समता, संवेदना की हितैषी स्थापनाएँ भी हुई है ।
    संत रविदास की वाणी से पौराणिक आख्यानों, भक्ति-ज्ञान-कर्म के योग विषयक विचारों, लोक में व्याप्त पारंपरिक इनके रंरा-रूपों को यथावश्यक प्रयुक्त करके देवेन्द्र दीपक ने एक बड़े अभाव की पूर्ति कर बड़ा काम किया है । भारतभूमि पर बहने वाली पुण्य-सलिला नदियों-गंगा, यमुना, सरस्वती को मानव शरीर से कार्यशील-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से जोड़कर योग-अध्यात्म को तथा राष्ट्रीयता के चिंतन-दर्शन को पुष्ट किया है ।
    वसुधैव कुटुंबकम के वैश्विक विचार को रविदास की समूची वाणी में लक्षित-रेखांकित कर भारतीय अस्मिता एवं लोक-आस्था के प्रति छीजती निष्ठा को पुनः सृजनात्मक आधार प्रदान किया है तो जात-पांत, ऊँच-नीच के सामाजिक संताप को मन और मनोरथ की स्पंदनशीलता, सुचिता, मानवीयता के समक्ष व्यर्थ एवं अमानवीय सिद्ध किया है । भारतीय समाज में फैले धार्मिक पाखंड को निरस्त करती एवं रविदास के ब्रह्मांड व्यापी राम तथा गुरु रामानंद की देशना को रूपायित करती यह रचना अपने काव्यात्मक ललित गद्य के कारण आकर्ष और पठनीय है ।
  • The Transfer
    Vibhuti Narain Rai
    495 446

    Item Code: #KGP-353

    Availability: In stock

    Despite the growing presence of multinationals and the ongoing emphasis on work-culture in the corporate world, if the first preference of the Indian middle classes continues to be government service even today, it is largely related to the pleasures of irresponsibility, idleness, graft, bribery and other forms of corruption. So in the last six decades since independence, government service has turned into a synonym of all the above vices. This is how transfers and postings among the services have become an ‘industry’ which is thriving and flourishing among us more than many others, from government offices to the bungalows of politicians in power.
    The finer details of this ‘industry’, which only an insider can access, are presented to us by this novel with a satire so trenchant and powerful that we begin to look at our bureaucracy during recent years with something close to despair. A delightful reading as it offers, the reader is compelled to begin asking whither we as a nation are headed.
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-7110

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : ShrInaresh Mehta
    Shree Naresh Mehta
    245 221

    Item Code: #KGP-871

    Availability: In stock


  • Shabdon Mein Rahti Hai Vah
    Pushpita Awasthi
    390 351

    Item Code: #KGP-438

    Availability: In stock

    वेद ने प्रकृति को देवता का काव्य कहा है--पश्य देवस्य काव्यम्। इस काव्य के प्रति सबसे ज्यादा लगाव कवियों में होता है। पुष्पिता के इस काव्य-परिसर में अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति है जिसमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमो झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर तथा जाने क्या-क्या एक साथ उपस्थित है। विविध् देशों के प्राकृतिक परिवेश और कलात्मक उत्कर्ष के साथ कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व भी हैं जैसे कवि वालकट या अलेक्सजेंडर महेंद्र आदि। पुष्पिता के मन में भारत की याद भी साथ-साथ चलती है जैसे नाउदर की गायों को देखकर मथुरा, वृंदावन, गोप, गोपी और श्रीकृष्ण की याद या लांगडाईक की नहरों को देखकर बनारस की गलियों की या भारतीय पर्वों, त्योहारों और तिथियों की याद। उसकी व्यापक संवेदनशीलता उसे अनंतरूपात्मक जगत से जोड़े हुए है। इसीलिए वह विश्वव्यापी हिंसा के विरुद्ध  है।
    स्त्रिायां और बच्चे पुष्पिता के खास सरोकार हैं। कवयित्री होने के नाते स्वाभाविक भी है कि वह सैनिकों की गर्भस्थ स्त्रियों की व्यथा तथा अजन्मे शिशुओं के प्रति मां के विछोह और वात्सल्य के मर्म को अधिक तीव्रता से महसूस कर सके। एक ओर स्त्री को नाखून की तरह कुतरते और जोंक की तरह चूसते पुरुष का क्रूर बिंब उसके मन में है तो दूसरी ओर देह ढलने के बाद स्वयं ही अपना ताबूत बनती स्त्री का मार्मिक चित्रा भी। लेकिन इसके साथ ही उसकी प्रेम संबंधी कविताओं में देह का सुगंधित स्वाद और उसका बखान भी है। समय की अपराजेयता में विश्वास करते हुए भी पुष्पिता शब्द की अमरता में भरोसा रखती हैं, जो कभी मरते नहीं, जो मनुष्य की अस्मिता को बचाए रखते हैं। कहना न होगा कि यही कवि में कविता को भी जिंदा रखते हैं। मुझे विश्वास है, काव्यप्रेमी इस संग्रह की कविताओं का स्वागत करेंगे।
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-1
    Kamal Kishore Goyenka
    500 440

    Item Code: #KGP-57

    Availability: In stock

    मंजुल भगत : समग्र कथा-साहित्य (1)
    संपूर्ण उपन्यास
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मंजुल भगत को मैंने कुछ गोष्ठियों में बोलते सुना और संवाद भी किया तो पाया कि वे भारतीय स्त्री का प्रतिरूप है । उनमें भारतीय स्त्री के गहरे संस्कार थे । उनसे मिलना भारत की एक आधुनिक स्त्री से मिलना था । यह स्त्री भारत की संस्कृति और यहाँ  की मिट्टी की उपज थी, जिसमें गहरा अस्तित्व-बोध एवं  स्त्री-स्वातंत्र्य की चेतना थी । उन जैसी संस्कारवान, संकल्पशील, संघर्षरत और संवेदनाओ से परिपूर्ण लेखिका के संपूर्ण कथा-साहित्य के संकलन तथा संपादन का कार्य  करना मेरे लिए गौरव की बात है ।
    मजुल भगत की प्रमुख विधा कहानी है और इसी से वे साहित्य में प्रवेश करती हैं, परंतु उपन्यास के क्षेत्र मैं भी उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा का परिचय दिया और 'अनारो' जैसे उपन्यास की रचना करके देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की ।
    लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    इस समग्र रचना-संसार को पढ़कर कहा जा सकता है  कि साहित्य के प्रति मंजुल भगत की गहरी आस्था थी । लेखिका का दृढ़ विश्वास था कि आने वाले समय में, तमाम अपसंस्कृति एवं अमानवीयकरण के बावजूद उनके उपन्यास और कहानियाँ अवश्य ही पढे जाएंगे । बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्त्री को जानने और समझने के लिए मंजुल भगत का कथा-साहित्य एक प्रामाणिक दस्तावेज है
  • Bengal Shaili Ki Chitrakala
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    400 360

    Item Code: #KGP-9044

    Availability: In stock

    भारत दो चित्रकला शैलियों में बंगाल चित्रकला शैली को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । उसका यह वेश्मिष्ट्रय विगत शती के बंगाल रिनेसां' अर्थात् माक्षतीय नवजागरण से उसकं संबद्ध होने के कारण भी है । बंगाल शैली देशज निजत्व को पल्लवित और विकसित करनेवाली शैली तो थी ही लेकिन, उसमें ऐसे विरोधाभास भी थे जिससे उसकं समसामयिक मूल्यद्देकन ने दो परस्पर विरोधी अभिमत सामने आये। जहा इस शेली के समर्थक कहय-समीक्षकों ने भावनात्मक लगाव रखते हुए इसे अतिश्योक्तिपूर्ण महत्व दिया यहीं दूसरी और अन्य कला-समीक्षकों ने वस्तुनिष्ठ और दिष्टलेषणमृत्मक मूल्यग्रेकन कर इसकी अनेकानेक कमियों व खामियों को भी उजागर जिया, साथ ही कुछ गंभीर आरोप भी लगाये और इसकी उपलब्धियों के सामने ग्रहन-चिहन खडे किये। आज यह शैली इतिहास का विषय बन चुकी है अत: इस अध्ययन में प्रस्तुत है उसका सर्वागीण सष्टमुक विवेचन, जो अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर यता है ।
  • Michal Jackson Ki Topi
    Madhukar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-1931

    Availability: In stock

    माइकल जैक्सन की टोपी
    स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद प्रेमचंद की ग्राम्य चेतना की साहित्यिक विरासत को अपने लेखन के बल पर जिन लेखकों ने जीवित रखा है तथा इमे विकसित किया है उनमें मधुकर सिंह का नाम उल्लेखनीय है । यह कहानीकार न केवल अपनी सामाजिक-राजनितिक  चेतना को अपनी कथाओं में अनुगुंफित करता है बल्कि जीवन की सम्यक् प्रगतिशीलता का आलोक भी उसे गंभीरता से आकर्षित क्रग्या है । इसीलिए उसकी कहानियाँ वंचितों के जीवन की केवल लपट की नहीं, लौ की भी कहानियाँ हैं ।
    अपने कथाकर्म के बारे में मधुकर सिंह का कहना है कि उनकी 'दर्जनो कहानियाँ समाज और इतिहास- विरोधी उन ताकतों से लड़ती हुई मामूली और कमजोर आदमी को चेतना के स्तर पर जागृत करने की कोशिश करती हैं-यानी, इतिहास-विरोधी ताकतों द्वारा सताए जा रहे आदमी को अपनी पहचान कराने की क्षमता भी ये कहानियां रखती है ।'
    मधुकर सिंह के प्रस्तुत कहानी-संग्रह में शामिल दस कहानियां हैं- 'माइकल जैक्सन की टोपी’, 'युग' . ‘नस्ल-दंश', ‘बेली रोड के पत्ते' , 'कउड़ा' , 'कमीना', 'जालिम मिह उसका बाप था', 'कविता भी आदमी', 'सनहा' तथा पोखर नया गाँव' । प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपी ये कहानियाँ इस  बात की प्रमाण है कि यह कथाकार नये भारत के निर्माण के लिए, चेतना-सम्पन्न विचार-पुरुष की तलाश में तन्मय है ।
  • Mrigtrishna
    Shanta Kumar
    560 420

    Item Code: #KGP-1995

    Availability: In stock


  • Rassakashi
    Nisha Bhargva
    300 270

    Item Code: #KGP-9220

    Availability: In stock

    निशा भार्गव हिन्दी की उल्लेखनीय हास्य व्यंग्य कवयित्रियों में अपना मुकाम रखती हैं। कुछ ही कवयित्रियां है जो मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर हास्य व्यंग्य की सृष्टि करती हैं। मेरा मानना है कि उन्होंने काव्य मंचों के माध्यम से और दूरदर्शन, आकाशवाणी में अपने काव्य पाठ से असंख्य श्रोताओं को आनंदित, उल्लसित किया है। इधर उनका नया काव्य संकलन 'रस्साकशी’ के शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है जिसमें उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज और गहन गम्भीर शैली में आज के जीवन में व्याप्त विसंगतियों द्वंद्व को रेखांकित किया है।  जीवन में न्याय और अन्याय के बिच, सत्य और असत्य के बीच सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच जो द्वंद्व चल रहा है उसके बीच रस्साकशी जैसा माहौल बना हुआ है । रस्साकशी के इस माहोल में उत्पन्न तनाव से बचते हुए निशा भार्गव ने सरस, सारगर्भित और जनप्रिय रचनाएं लिखने का उद्यम जिया है उनके इस प्रयास से सदैव सकारात्मक प्रवृतियों की विजय के संकेत मिलते हैं। कविता का उद्देश्य भी लगभग यही है। तमाम निराशाओं-दुराशाओं के बीच आशा की किरण खोज लेना कवि कर्म का सबसे बडा उद्देश्य माना गया है । निशा भार्गव अपने इस प्रयत्न में पूर्णत: सफल हैं। उनमें एक संवेदनशील मन को सकारात्मक भाव से पेश करने का जज्बा हर कोण से दिखाई देता है। मैं उनक लेखन की सफ़लता की कानना करता हू ।
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale (Paperback)
    Chanderkant Deotale
    90

    Item Code: #KGP-1492

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।

    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।

    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
    -चन्द्रकांत देवताले
  • Guleri Rachanawali (Two Vol.)
    Manohar Lal
    1600 1440

    Item Code: #KGP-02

    Availability: In stock

    पं. चंद्रधर  शर्मा गुलेरी उन महान् रचनाकारों और मनीषियों में अग्रगण्य हैं जिन्हें ‘हिंदी का निर्माता’ कहा जाता है। खड़ी बोली हिंदी के प्रारंभिक काल में गुलेरी ने कहानी और निबंध् सहित अनेक विधओं में संवेदना व शिल्प की बुनियाद तैयार की। लेखक, पत्रकार, विमर्शकार, अनुसंधनकर्ता और शास्त्राज्ञ आदि अनेक रूपों में गुलेरी ने भाषा और साहित्य को समृद्ध किया। 
    ‘गुलेरी रचनावली’ (दो खंड) कालजयी साहित्यकार 
    पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा विरचित साहित्य का प्रामाणिक संकलन है। डाॅ. मनोहर लाल ने अत्यंत परिश्रम, विद्वत्ता व निष्ठा के साथ इस रचनावली का संपादन किया है। इसमें कहानी, निबंध्, शोध्, पांडुलिपि विवरण, संस्मरण, साक्षात्कार, पौराणिक विवेचन, लोककला, राजनीति, धर्म, साहित्य समीक्षा, पत्रकारिता, काव्य, जीवन चरित, भूमिका लेखन, भाषा विवेचन, अनुसंधन, इतिहास, पुरातत्त्व, विज्ञान, ललित निबंध्, संपादकीय, पत्र साहित्य में निहित गुलेरी की रचनाओं को संजोया गया है। उनके व्यक्तित्व का विशद विवेचन है। उनके द्वारा संस्कृत और अंग्रेजी में लिखी रचनाएं हैं।
    गुलेरी इस बात के उदाहरण हैं कि किसी लेखक की केवल एक रचना उसे अमरत्व प्रदान कर सकती है। ‘उसने कहा था’ एक ऐसी अपूर्व अविस्मरणीय कहानी, जिसने भारतीय साहित्य में गुलेरी को अक्षय कीर्ति प्रदान की। अज्ञेय के शब्दों में, ‘गुलेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं, पर उन तीनों में से एक ऐसी सर्वांग सुंदर रचना हुई कि कोई भी कहानी संग्रह उसे लिए बिना प्रतिनिध्त्वि का दावा नहीं कर सकता।’ यह कहानी है ‘उसने कहा था।’ नामवर सिंह के अनुसार, ‘गुलेरी जी हिंदी में सिर्फ एक नया गद्य या नई शैली नहीं गढ़ रहे थे बल्कि वे वस्तुतः एक नई चेतना का निर्माण कर रहे थे।’ यह उल्लेखनीय है कि गुलेरी के ‘कछुआ धर्म’ और ‘मारेसि मोहि कुठाउं’ जैसे निबंध् भी अत्यंत प्रसिद्ध  हुए। भाषाविद् और प्राचीन साहित्य के अचूक मर्मज्ञ के रूप में गुलेरी अद्वितीय सि( हुए।
    स्वाभाविक है कि डाॅ. मनोहर लाल द्वारा सुसंपादित ‘गुलेरी रचनावली’ का ऐतिहासिक महत्त्व है। पाठक, आलोचक, शोध्कर्ता—सबके लिए संग्रहणीय। पुस्तकालयों को समृद्ध  करतीं ऐसी पुस्तकें ही राष्ट्रभाषा हिंदी की पहचान हैं।
  • Vastunishth Hindi (Paperback)
    Pooran Chand Tandon
    180

    Item Code: #KGP-7028

    Availability: In stock

    आज वर्तमान समय दौड़ का समय है जहाँ स्पर्धा है, प्रतियोगिता है जिनके चलते सभी विषयों के रूप-उपरूप उनके ही अनुरूप गढ़ा जाने लगा है । यदि आज की प्रतियोगी परीक्षाओं पर दृष्टपात करे तो हम पाते हैं कि विभिन्न परीक्षा-संस्थाओं द्वारा परीक्षार्थी के ज्ञान को मापने के लिए कुछ नए सूत्र ईजाद किये गए है, जिसके अंतर्गत वे कम से कम समय में प्रतिभागी के सकल ज्ञान की परीक्षा ले लेना चाहते हैं । 'कर्मचारी चयन आयोग' हो अथवा 'संघ लोक सेवा आयोग' सभी आज आधुनिक रीति से ज्ञान की परीक्षा ले रहे हैं जिसमें वस्तुनिष्ठ प्रश्नों द्वारा परीक्षा लेना रामबाण सिद्ध हुआ भी है । इसके माध्यम से परीक्षार्थी के समग्र ज्ञान की परीक्षा कुछ ही समय में हो जाती है । वस्तुनिष्ठ प्रश्न व्यवस्था वास्तव में है क्या ? इस पद्धति के अंतर्गत जो भी प्रश्न पूछा जाता है उस प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर होते हैं । उन चारों उत्तरों में से एक ही उत्तर सही होता है । परीक्षार्थी को उस सही उत्तर का चयन करना पड़ता है । 
    स्तर की गरिमा तथा विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण हिंदी साहित्य, काव्यशास्त्र तथा भाषा-विज्ञान से ऐसे प्रश्नों को चुना है जो की परीक्षा एवं ज्ञान दोनों की दृष्टि से सहायक हों । वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के अतिरिक्त अंत में तथ्यात्मक पक्ष के अंतर्गत विद्यार्थियों की सुविधा हेतु प्रश्नों एवं उत्तर को भी आमने-सामने रख गया है । इससे विद्यार्थी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का ज्ञानार्जन तो कर ही सकेंगे, साथ  ही कुछ अन्य तथ्यात्मक पहलुओं से भी अभिज्ञ हो सकेंगे ।
  • Nau Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    120 108

    Item Code: #KGP-2088

    Availability: In stock

    नौ लघु नाटक
    हिंदी में नाट्य-लेखन संस्कृत नाटय-परंपरा और लोक-नाट्य के विविध रूपों से जुड़कर विकसित हुआ हैं । बाद में उस पर ग्रीक त्रासदी, पारसी शैली  और पश्चिमी रंग-शैलियों का असर भी दिखाई देता है ।  मंचीय नाटक बनाम पाठ्य नाटक की बहस भी हिंदी  में होती रही है । इधर हिंदी नाटय-लेखक और हिंदी  रंगमंच अपनी-अपनी दर्पमंडित घोषणाओं के वावजूद एक-दूसरे के पास ही आया है। एकांकी नाटकों-लेखन के विकास के पाशर्व में जहाँ रेडियो की  भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, वहीं स्कूलों एवं कॉलेजों की नाट्य-संस्थाओं द्वारा महसूस की जाने वाली एकांकी नाटकों की ज़रूरत भी एक कारण रही है ।
    अजब बात है कि इधर एकांकी-लेखन कम हुआ है, पर उसकी जगह लघु नाटक एव नुक्कड़ नाटक ने ली है ।
    प्रताप सहगल रंगमंच से जुड़े हुए नाटककार के रूप में विख्यात हैं । उनके नाटक 'रंग बसंती', 'मौत को रात भर नहीं जाती' तथा 'अँधेरे में' आदि के मंचन बार-बार हुए हैं। अपने पिछले नाटक 'अन्वेषक' से उन्हें विशेष ख्याति मिली है ।
    'नौ लघु नाटक' में समय-समय पर लिखे गए नौ लघु नाटक संग्रह के रूप में आ रहे हैं । प्रताप सहगल का नाट्य-लेखन परंपरा एवं प्रयोगशीलता के संतुलन बिंदु पर खडा नजर आता है । अपनी इसी छवि के अनुरूप उनके इन लघु नाटकों में भी कहीं परंपरा की गंध मिलेगी तो कहीं प्रयोगशीलता की ललक । कहीं मूल्यों का भंजक रूप मिलेगा तो कहीं चरित्रों कै भीतर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पेठ। इनमें से अनेक नाटक कई-कई बार मंचित हुए हैं और कई एक प्रकाशित होकर अपना पाठक वर्ग बना चुके हैं ।
    छोटे-छोटे शहरों, कस्बों तथा कॉलेजों एवं स्कूलों की नाट्य-मंडलियों को अच्छे लघु नाटकों की प्राय: तलाश रहती है। इस दृष्टि से भी यह संकलन महत्त्वपूर्ण है और लघु नाटकों के विकास की दृष्टि से भी ।
  • Aacharya Hazari Prasad Dwivedi : Kuchh Sansmaran
    Kamal Kishore Goyenka
    500 375

    Item Code: #KGP-1571

    Availability: In stock

    हजारीप्रसाद द्विवेदी वस्तुत: हिंदी भाषा और साहित्य के आचार्य थे। पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिंदी और बांग्ला आदि भाषाओँ के तलस्पर्शी ज्ञान ने उनके चिंतन व सृजन को विलक्षण आयाम प्रदान किए। शातिनिकेतन से शिवालिक के बीच विस्तृत आचार्य द्विवेदी को कीर्तिकथा हिंदी का गौरव है। आचार्य द्विवेदी के जीवन और कृतित्व पर प्रभूत मात्रा में लिखा गया है। उन्हें आकाज्ञाधर्मी गुरु और व्योमकेश दरवेश कहकर सखोंधित किया गया। 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी : कुछ संस्मरण' इस संदर्भ में एक स्थायी महत्व की पुस्तक है। आचार्य द्विवेदी पर विख्यात व्यक्तित्वों द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण संस्माणों की इस पुस्तक का संपादन सुप्रसिद्ध साहित्यकार कमलकिशोर गोयनका ने किया है। पुस्तक को भूमिका में वे लिखते हैं, 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की किसी लेखक द्वारा जीवनी लिखने या उनके जीवन को जानने को जिज्ञासा जब भी पाठकों के मन में उत्पन्न होगी तब-तब ये संस्मरण उसे आत्मीय-जीवत एवं सार्थक प्रतीत होने के साथ उनको स्मृति को अक्षुष्ण बनाने में सहायक सिद्ध होगे।'
    इस पुस्तक को विशेषता यह है कि द्विवेदी जी का संस्परणात्मक मूल्याकन प्राय: सभी पक्षों से किया गया है। इस अर्थ में इसे आलोचना की आंख से भी पढा जा सकता है। समग्रत: एक विराट व्यक्तित्व और उसके कालजयी कृतित्व का समवेत संस्मरणात्मक अनुशीलन। पठनीय व संग्रहणीय पुस्तक ।
  • Do Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1323

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Dekhana Ek Din
    Dinesh Pathak
    240 216

    Item Code: #KGP-491

    Availability: In stock

    साहित्य में प्रचलित नारों और विमर्शों के शोर-शराबे से अलग अपने एकांत में रचनारत दिनेश पाठक की अधिकांश कहानियां मानव संबंधों व विभिन्न कारणों से उनमें  बनते-बदलते सरोकारों की पड़ताल करती हैं।  
    ‘देखना एक दिन’ संग्रह की कहानियों का मूल स्वर भी इसी भावभूमि के इर्द-गिर्द हैं। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां एक विशेष परिवेश से जुड़ी दिखने के बावजूद संपूर्ण भारतीय समाज के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत करती हैं। बहुआयामी धरातल की इन कहानियों में गांव व कस्बे का जीवन तो है ही, साथ ही उनका संघर्ष, उनका जुझारूपन, उनके सुख-दुःख, उनकी आशा-निराशा, उनके बनते- ध्वस्त होते सपने तथा मूल्य संक्रमण के कारण उत्पन्न मानसिक विचलन और इन सबसे इतर जीवन के प्रति उनकी गहन आस्था व गहरी जिजीविषा है। यही कारण है कि वे पराजित नहीं होते, पराजय के बीच से फिर-फिर उठ खड़े होते हैं। यहां ठेठ ग्रामीण जीवन से निकले पात्र भी हैं जिनके लिए जीवन सदा सोद्देश्य है, आधुनिक जीवनशैली व चकाचौंध के प्रति आसक्त चरित्र भी हैं, राजनीतिज्ञों के दुश्चक्र में फंसकर सामाजिक सरोकारों के योद्धा रूप में विकसित होते-होते अपनी संभावनाओं से भटक जाने वाले व्यक्ति भी हैं तो यहां अपनी अस्मिता को तलाशती और उसके लिए जूझती ऐसी स्त्रियां भी हैं जो अंततः विद्रोह की हद तक जा सकती हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक में कथाकार ने भाषा को किसी उलझाव में डाले बिना अत्यंत सहज-सरल भाषा-शैली में कथ्य को, परिवेश को, चरित्रों को और परिवेशगत बेचैनी व छटपटाहट को पूरी विश्वसनीयता, प्रामाणिकता तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ये कहानियां आदि से अंत तक न केवल अपने पाठकों को बांधे चलती हैं बल्कि उन्हें झकझोरने से भी नहीं चूकतीं।

  • Tale Of A Wasteland (Paperback)
    Phanishwarnath Renu
    495 446

    Item Code: #KGP-338

    Availability: In stock

    Phaneeshwar Nath Renu, a true son of the soil, has created in Parti Parikatha, rendered here in English as ‘Tale of a Wasteland’; a major modern classic through the original genius he brought to bear upon his theme. Renu’s deeply moving cry against an unjust social order coupled with his compassion for men; his freedom from bitterness against the establishment, and his love of common humanity backed by his creation of half a dozen powerful, living authentic figures with whom he peoples his world set against the Wasteland perpetrated by Nature on man sets him apart as a major creative genius who has come to stay. Every reader of this ‘epic in prose’ will feel real life throbbing and pulsating through each page of this book. On its broad canvas, the life of two generations has been inimitably presented by Renu with his exquisite art which creates unforgettable characters through episodes and dialogues in an idiom that shows his power over words. Indeed, no reader, once he has gone through this book, can help missing some of these characters that he has lived with while reading this saga, lighted by Renu’s vision of hope which ‘no depth of despair, no height of cynicism can possibly defeat’.
  • Raai Or Parvat
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-63

    Availability: In stock


  • 101 Amar Kathayen
    Prem Kishore Patakha
    300 240

    Item Code: #KGP-278

    Availability: In stock

    हाँ, शब्द भी महकते हैं और महकते शब्दों की आयु भी अनंत काल तक रहती है । शब्द और फूलों में बस एक ही अंतर नज़र आता है — शब्द महकते हैं तो महकते रहते हैं और फूल कुछ समय के बाद कुम्हला जाते हैं और अपनी महक खो देते हैं । 
    कुछ ऐसे ही महापुरुषों, संतों के विचार-संस्मरण महकती फुलवारी के समान यहाँ संजोकर आपके लिए लाये हैं । शायद किसी शब्द की महक आपका जीवन महका दे । सुगंध बनकर आपके मन और प्राण की वंशी के स्वर फूट पड़ें । 

  • Hum Sab Gunahgar
    Mastram Kapoor
    350 315

    Item Code: #KGP-9027

    Availability: In stock

    हम सब गुनहगार
    लीक से हटकर सोचने वालों ने आशा को नहीं, निराशा को कर्म की प्रेरणा कहा है।
    डॉ. लोहिया ने निराश रहकर काम करते जाने को ही सबसे अच्छा कर्तव्य कहा है।
    फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक एवं दार्शनिक ज्यांपाल सार्त्र ने भी सर्वोत्तम कर्मशक्ति डिस्पेयर की परिभाषा करते हुए कहा है, ‘दि एक्ट विदाउट होप।’
    ‘मा फलेषु कदाचन’ के कथन द्वारा गीता में भी इस सत्य को ही कहने की कोशिश की गई है...
    वर्तमान निराशा के धुँधलके में भविष्य को खोजने का लघु प्रयास यह पुस्तक स्वातंतत्र्योत्तर भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विसंगतियों का भविष्योन्मुख विवेचन है।
  • Rachna Ka Jeevdravya
    Jitendra Shrivastva
    600 510

    Item Code: #KGP-9222

    Availability: In stock

    ‘रचना का जीवद्रव्य’ इस दौर के महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव की नई आलोचना पुस्तक है। इस पुस्तक की परिधि में आपातकाल के बाद की हिंदी कहानी का इतिहास है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन की अद्वितीय आत्मकथा का गहन विश्लेषण भी। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब हैं तो विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर भी। जितेन्द्र जिस बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कविता पर विचार करते हैं, उसी बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कथा साहित्य पर भी। वे आलोचना के औजारों को गड्डमड्ड नहीं करते। उनकी आलोचना में गहरी विचारशीलता है। जितेन्द्र श्रीवास्तव जब भी किसी विषय को उठाते हैं, उसे संपूर्णता में समझने-समझाने का उद्यम करते हुए उसे एक सर्वथा नई ऊंचाई भी देते हैं। यह अकारण नहीं है कि उनकी छवि एक विश्वसनीय आलोचक की है। वे भाषा की ताकत को जानते हैं इसलिए भाषिक पारदर्शिता के घनघोर आग्रही हैं। इस पुस्तक में संकलित आलेख भाषिक ताज़गी के अप्रतिम उदाहरण हैं। यह देखना सुखद है कि जितेन्द्र अपने पाठकों को उलझाते नहीं हैं। वे उन्हें वह मार्ग दिखाते हैं जो बिना किसी भटकाव के रचना के जीवद्रव्य तक ले जाता है। कहना न होगा कि जितेन्द्र श्रीवास्तव के बहुप्रशंसित और बहुउद्धृत आलोचनात्मक आलेखों की यह पुस्तक आलोचना के वर्तमान परिदृश्य को निश्चित रूप से संपन्न बनाएगी। 
  • Mera Sangharsh : Hitler Ki Aatmakatha
    Ramchandra Verma Shastri
    580 406

    Item Code: #KGP-2016

    Availability: In stock

    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा)
    हिटलर की आत्मकथा को हिन्दी में प्रकाशित करने का उद्देश्य उसके उन दोषों को प्रकाशित करना नहीं है, जिनके कारण वह काफी बदनाम हुआ ।  उसकी बदनामी के तीन मुख्य कारण थे--फासिस्टवादी विचारधारा, जातीयतावाद और युद्ध की मानसिकता । इन्हें तीन कारणों से उसे विश्व-मानवता का शत्रु समझा जाता है । किन्तु उसकी राष्ट्रवादी मनोवृति एक ऐसा तत्त्व या, जिसने उसके चरित्र को काफी ऊँचा उठाया।  इसी उम्र राष्ट्रवादी प्रवाह की लपेट में वह दूसरे दोषों का भी शिकार हो गया । यह आत्मकथा उसकी राष्ट्रवाद की इसी भावना को उजागर करती है।  राष्ट्रवाद से अभिप्राय जातीय संकीर्णता नहीं है, बल्कि मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा और असीम गौरव का नाम ही सच्चा राष्ट्रवाद है ।
    अपने देश से प्रेम, उसके प्रति निष्ठा, देशवासी होने का स्वाभिमान, देश के लिए बलिदान की भावना तथा राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की चाह जैसे गुणों की हमारे देश को आज कितनी जरूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं । इसका जीता-जागता उदाहरण हमें हिटलर की प्रस्तुत आत्मकथा में पढ़ने को मिलता है ।
    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा) को हिन्दी में प्रकाशित करने के पीछे हमारा परम उद्देश्य यही है कि इसके अध्ययन-मनन से देशवासियों में सच्चे राष्ट्रवाद की भावना का जन्म हो ।
    हिटलर की इस पुस्तक 'मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्पकथा)' में ऐसे अनेक सन्दर्भ मिलते हैं, जिनसे राजनीति के स्वरूप, राजनीतिज्ञों के आचरण, संसद की भूमिका, शिक्षा के महत्त्व, श्रमिकों एवं साधारण जनमानस की मानसिकता, नौकरशाही, भाग्य एवं प्रकृति, मानवीय मूल्यों और सबसे बढ़कर राष्ट्रीय भावना की महानता आदि का बोध होता है ।
    इस पुस्तक का एक उद्देश्य 'चेतना' है तो उसके साथ-साथ इसका दूसरा उद्देश्य 'चेतावनी' भी है । स्वतन्त्र भारत के युवा वर्ग में राष्ट्रप्रेम की चेतना पैदा करना है । भारतीय समाज में बढ़ रही राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक बुराइयों, राजनीतिक दलों की बढती संख्या, क्रुछ राजनीतिज्ञों में बढ़ता निहित स्वार्थ देश-सेवा के नाम पर परिवार सेवा की प्रवृत्ति, सार्वजनिक जीवन में फैलता भ्रष्टाचार, जैसे-तैसे धन बटोरने की निरन्तर बढती लालसा, धर्म, जाति और भाषा के नाम पर होने वाली व्यापक हिंसा और काम से जी चुराने की मानसिकता आदि कुछ ऐसी बुराइयाँ है, जो समकालीन भारतीय समाज को खोखला कर रहीं हैं। इन्हें रोकने चेतावनी देना इस पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य है । यदि समय रहते इन बुराइयों को न रोका जाता तो 'हिटलर' के पैदा होने की संभावनाएँ बढ़ जाती है । ऐसा हिटलर, जो सम्पूर्ण प्रजातंत्रीय व्यवस्था को उखाड़ फेंके । बुराई को बताना भी बुराई से बचने की प्रेरणा देने का एक माध्यम है । इस रूप में यह पुस्तक हमारे विशाल टेश को चेतावनी देकर उसमें चेतना लाने का प्रयास है।
  • Mahaan Tatvagyani Ashtavakra
    Vinod Kumar Mishra
    295 266

    Item Code: #KGP-148

    Availability: In stock

    महान तत्त्वज्ञानी अष्टावक्र 
    असली ज्ञान शास्त्रों में नहीं है, बल्कि मनुष्य के अंदर है । शास्त्रों की रचना तो मनुष्य ने विभिन्न सन्दर्भों व परिस्थितियों में की है । इनमें विरोधाभास भी मिलेंगे । असली ज्ञान-शक्ति तो मनुष्य के अंदर छिपी है । यदि मनुष्य अपने आपको पहचान ले तो वह परमात्मातुल्य हो जाता है ।
    "परमात्मा किसी सातवें आसमान पर विराजमान नहीं है । यह सारी सृष्टि परमात्मा का ही दृश्य रूप है । इसकी सेवा और विकास ही ईश्वर की सच्ची आराधना है ।"
    "मोक्ष के पश्चात् व्यक्ति किसी दूसरे लोक में नहीं जाता, वह इसी संसार में करता रहता है, पर उनमें लिप्त नहीं होता ।"
    प्रस्तुत पुस्तक में अष्टावक्र के जीवन व दर्शन, जो 'अष्टावक्र गीता' के नाम से प्रसिद्ध है, का रोचक व प्रेरक वर्णन है । लेखक ने इसके वैज्ञानिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला है ।
  • Hindi Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    80

    Item Code: #KGP-1334

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • Vyangya Samay : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    380 342

    Item Code: #KGP-9337

    Availability: In stock

    नरेन्द्र कोहली व्यंग्य साहित्य में कथात्मकता, वैचारिक उदारता और संवेदनात्मक सघनता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न विधाओं के साथ हिंदी व्यंग्य को भी समृद्ध किया है। उनके व्यंग्य लेखन की बहुत बड़ी शक्ति है घटना को अनुभव में रूपांतरित कर लेने की क्षमता। निजी सुख-दुःख से लेकर देश-दुनिया के जाने कितने पक्षों पर उन्होंने लिखा है। वे संप्रेषण का महत्त्व जानते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं पाठकों में पर्याप्त लोकप्रिय हैं। कई बार वैचारिक पक्षध्रता या जड़ता एक लेखक को सीमित कर देती हैं। नरेन्द्र कोहली जड़ता को ‘रचनात्मक दृढ़ता’ से अपदस्थ करने वाले विवेकशील लेखक हैं। राजनीति से जुड़े विषयों में उनका विवेक विशेष रूप से देखा जा सकता है। वे असंगति पर आक्रमण करते हुए भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों को बचाने का प्रस्ताव रखते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में नरेन्द्र कोहली के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Yugdrashta Shivaji
    Shashi Bhushan Singhal
    380 323

    Item Code: #KGP-288

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि ने खूब कहा है—
    ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। 
    कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ 
    महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे।
    आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।
    यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।
    उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।
  • Samagra Naatak : Kusum Kumar
    Kusum Kumar
    1200 840

    Item Code: #KGP-9379

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता के बाद हिंदी नाटक के इतिहास में कुसुम कुमार एक अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। इनके नाटक सुविधाजनक रचनाकर्म नहीं, निरंतर संघर्ष, संताप आदि प्रयोगों का परिणाम हैं। इनमें महज स्त्री-स्वर ही मुखर नहीं हुआ बल्कि अपने समय, समाज और परिवेश के अनिवार्य प्रसंगों से बराबर जूझते नजर आते हैं। 
    समग्र नाटक में संकलित कुसुम कुमार के आठों नाटक समय-समय पर देश भर में चर्चित व प्रशंसित रहे हैं और अनुभवी निर्देशकों द्वारा बार-बार मंचित हुए हैं। ‘रावण-लीला’, ‘संस्कार को नमस्कार’, ‘दिल्ली ऊंचा सुनती है’, ‘सुनो शेफाली’ तथा ‘लश्कर चैक’ आदि ये सभी नाटक अपने साथ एक नवीन कथ्य और परिवेश की खोज करते हुए रचनात्मक परिणाम देते हैं। 
    कुसुम कुमार के नाटकों को श्रेष्ठतम नाटकों में गिना जाता है। इसीलिए इनका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुआ है, जिससे इनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। ये नाटक सामाजिक सरोकारों की कथावस्तु को एक ऐसा ज्वलंत और साथ ही रोचक स्वरूप देते हैं जो दर्शकों को लगातार बांधे रखता है। मानवीय समस्याएं और मानव संबंधों की गहन पड़ताल भी इनके नाटकों की विशेषता है। इनका बहिरंग प्रायः काॅमेडी होते हुए भी, सरोकार बेहद मानवीय और संवेदनशील है। एक ओर यहां समाज में चला आ रहा नाटक के पीछे का नाटक बेनकाब होता है तो दूसरी ओर दमित वर्ग अपनी विशिष्ट पहचान के साथ मुखर होता है। यह कहना आवश्यक है कि इन नाटकों का स्वर और स्वरूप आधुनिक सोच की खुली भाषा और चुस्त संवादों में सहज ग्राह्य और दर्शकों के बीच प्रिय है। 
    डाॅ. कुसुम कुमार के नाटकों का संकलन पाठकों की सुविधा के लिए एक जिल्द में पहली बार प्रकाशित हो रहा है। समग्र नाटक सभी सांस्कृतिक संस्थाओं, नाट्य मंडलियों, अकादमियों, पुस्तकालयों एवं शोधर्थियों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक। 
  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • Vaigyanikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #KGP-921

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Soochana Ka Adhikaar
    Vishv Nath Gupta
    140 126

    Item Code: #KGP-494

    Availability: In stock


  • Kharra Aur Anya Kahaniyan
    Subhash Sharma
    460 414

    Item Code: #KGP-9366

    Availability: In stock

    ‘आजादी! वह भी औरतों की! क्या होती है यह आजादी? इसका रंग क्या होता है? बू क्या होती है? स्वाद क्या होता है? काश, एक बार मिल जाती तो मैं उसे छूकर, सूंघकर, चखकर देखती। फिर उसे पकड़कर कलेजे से भींचकर रोती...।’—प्रस्तुत कहानी संग्रह खर्रा और अन्य कहानियां की कहानी ‘कुहुकि कुहुकि जिया जाय’ की इन पंक्तियों में जो प्रश्नाकुलता है, वह बहुत मूल्यवान है। कोई भी रचना यदि सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की सभी कहानियां समकालीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को बड़े परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के लेखक सुभाष शर्मा यथार्थवादी लेखक हैं। कहानी में कथानक, सामाजिक सरोकार, विवरणधर्मिता और युक्तिसंगत समापन में उनका भरोसा है। यही कारण है कि सुभाष की कहानियां बेहद पठनीय हैं और पाठक की चेतना को झकझोरती हैं।
    इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां व्यवस्था और सत्ता के भीतरी सच को बयान करती हैं। अनेक कहानियां शिक्षा तंत्र के तहखानों को रोशनी में लाती हैं। योग्यता, अवसर और दायित्व का उपहास करती स्थितियों व मनोवृत्तियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ कहानीकार ने उजागर किया है। इस संग्रह में स्त्री के  संघर्षमय संसार को चित्रित किया गया है। बिना किसी विमर्श के जाल में उलझे हुए लेखक ने स्मरणीय कहानियां लिखी हैं।
    ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि बिना लाउड हुए या बिना प्रचारात्मक हुए सुभाष शर्मा ने वर्तमान राजनीति के बहुलांश चरित्र को कहानियों में उतार दिया है। इस चरित्र को चित्रित करने में लेखक की अर्थगर्भित भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘दास्तान-ए-सुबूत’ में लेखक कहता है, ‘पहले कार्यकाल में वह जान गए थे कि खजाना कहां-कहां है। चुनाव, मुकदमा, राजनीतिक षड्यंत्र आदि में जितना खर्च हुआ था, उसकी भरपाई उन्होंने सुपरसोनिक गति से करना शुरू कर दिया।’ ऐसी व्यंजक भाषा में रची गईं ये कहानियां यथार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ निश्चित रूप से एक पठनीय और उल्लेखनीय कहानी संग्रह है।
  • Toro Kara Toro-6 (Paperback)
    Narendra Kohli
    400 340

    Item Code: #KGP-428

    Availability: In stock


  • Katha Samay : Srijan Aur Vimarsh
    Shashi Kala Rai
    245 221

    Item Code: #KGP-905

    Availability: In stock


  • Sannate Se Muthbher
    Ganga Prasad Vimal
    60 54

    Item Code: #KGP-1884

    Availability: In stock

    'सन्नाटे से मुठभेड़' में गंगाप्रसाद विमल की नई कविताएँ संकलित हैं।
    इन कविताओं में समकालीन कविताओं से जो भिन्नता है , उसे रेखांकित करना आसान है । समकालीन कविताओं की एक धारा में पूर्ववर्ती परम्परा का अनुगमन है तो दूसरी धारा में कथन का चमत्कार । इन दोनों धाराओं में ‘भाषा के नये गणित की वह विरल उपस्थिति नहीं है जो सहजता के गुण से अलंकृत 'सन्नाटे से मुठभेड़' में है ।
    केवल शब्दों के संयोजन में कविता पाना आसान नहीं है । अर्थों के सुनियोजित क्रम में भी उसका अनुभावन दुष्कर है । एक सही काव्य विवेक अर्थों के भीतर उपजाने वाले प्रतिसंसार की प्रतीति में है । बाहर की चिंताओं से उपजने वाले त्रास या प्रताड़ में मामूली किस्म का वास्तव अंकित होता है । बीसवीं शताब्दी के हाहाकार को उन विमानवीय स्वरों में ही पहचाना जा सकता है जिसके लिए समकालीन कविताएँ  वास्तविकता की अदेखी धुरियों को अनावृत करने में लगी हैं । बल्कि कहना होगा, अर्थवान कविताएँ अपने समकाल से इसी मायने में विग्रहरत्त है कि वे आद्य जिज्ञासाओं से लेकर वर्तमान की अन्तर्धाराओँ में हस्तक्षेप करती है ।
  • Dr. Ambedkar : Jeevan-Marma
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    280 224

    Item Code: #KGP-1880

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Kuchh Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100 80

    Item Code: #Kgp-kybk

    Availability: In stock


  • Vishnugupta Chanakya
    Virendra Kumar Gupt
    700 560

    Item Code: #KGP-1969

    Availability: In stock

    विष्णुगुप्त चाणक्य
    "वत्स यवन ! मैं सत्यान्वेषी अध्येता और अध्यापक हूँ। यही मेरी मूल वृत्ति और साधना है ।
    इसी सत्य-शोध की साधना के बीच अनायास ही चन्द्रगुप्त मुझे मिला, नंद-वंश के विनाश और नए साम्राज्य के निर्माण का संकल्प मुझे मिला; संकल्प की पूर्ति मिली और इस विशाल आर्य साम्राज्य का महामंत्रित्व मिला । पर सदैव ये सब मेरे लिए माध्यम ही रहे, सत्य ही लक्ष्य रहा ।"
    -(इसी उपन्यास से)
  • Dust Pratinidhi Kahaniyan Ramakant
    Ramakant
    300 270

    Item Code: #KGP-9348

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां  रमाकान्त
    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार रमाकान्त की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘तेवर’, ‘उसकी लड़ाई’, ‘जिंदगी भर का झूठ’, ‘व्यतिक्रम’, ‘क्रेमलिन टाइम’, ‘पेड़ के साथ’, ‘कार्लो हब्शी का संदूक’, ‘भागमनी आएगी’, ‘सड़क, शहीद और नाम’ तथा ‘एक विपरीत कथा’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार रमाकान्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Shubhada (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-204

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है शुभदा और दूसरा है बड़ी दीदी।
  • Mahaan Vyaktitva Jin Par Hamain Garv Hai
    Pravesh Chaturvedi
    480 432

    Item Code: #KGP-448

    Availability: In stock


  • Babu JagJeevan Ram
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bjjr

    Availability: In stock


  • Naani Ki Khichadi
    Manju Kapoor
    60

    Item Code: #KGP-936

    Availability: In stock


  • Naya Vidhaan
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-633

    Availability: In stock


  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Parda Baari
    Kusum Kumar
    190 171

    Item Code: #KGP-39

    Availability: In stock


  • Hashiye Ka Raag (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-7185

    Availability: In stock


  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Shakti Se Shanti
    Atal Bihari Vajpayee
    400 300

    Item Code: #KGP-9021

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति

    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।

    जाइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।

    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है । [इसी पुस्तक से]
  • Bihar Ki Mahan Vibhootiya
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkmv

    Availability: In stock


  • Dhoop Dhalne Ke Baad
    Mahip Singh
    225 203

    Item Code: #KGP-627

    Availability: In stock

    सूरज उगता हैमध्याह्न होता है और फिर ढलना प्रारंभ हो जाता है। मनुष्य जीवनपर्यंत इन स्थितियों से गुजरता रहता है।विभिन्न प्रवृत्तियांपरिवर्तित होती मान्यताएं और अनुभव संपन्नताउसे बहुआयामी बनाती रहती हैं। कभी वह संन्यासी हो जाता हैकभी गृहस्थ।

    संन्यास में महत्त्वाकांक्षा सम्मिलित हो जाती है चुपके से और उसे सामान्य संसारी मनुष्य के स्तर से नीचे खींचती हुई पतन की अतल गहराइयों में ले जाती है। जहां संन्यासी अपराधी बन जाताहै।

    गृहस्थ जीवन में जब सबके सुख एवं हित की भावना जुड़ती है तो सामान्य व्यक्ति सारे सांसारिक कार्यकलाप के बीच भी संत ही होता है। और वे लोग जो सदियों से किसी विशेष जाति में पैदाहोने के कारण मनुष्य से निम्नतर माने जाते रहे हैंजब अपने स्व को पहचानने लगते हैंकैसी छटपटाहट भर जाती है उनमें और कैसे हिंसक परिणाम झेलने पड़ते हैं उन्हें।

    मानव जाति का आधा हिस्सा यानी स्त्री जो अभी तक मनुष्य नहीं मानी जातीअब अपना स्थान और अधिकार पहचानने लगी है और उसके लिए आग्रहशील हो गई है तो कैसे-कैसे उद्वेलनों सेगुजरना पड़ता है उसे।

    इन सब बिंदुओं को समेटता और अपने परिचित परिवेश को एक नए कोण से प्रस्तुत करता है उपन्यास। प्रख्यात कथाकार महीप सिंह की त्रयी का तीसरा उपन्यास है-धूप ढलने के बाद'

  • The Growing Years (Novel)
    Ann Delorme
    395 356

    Item Code: #KGP-339

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.

  • Vibhuti : Samrat Ashok
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-vsa

    Availability: In stock


  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Nasera Sharma : Shabd Aur Samvedana Ki Manobhoomi
    Lalit Shukla
    595 536

    Item Code: #KGP-894

    Availability: In stock

    नासिरा शर्मा : शब्द और संवेदना की मनोभूमि
    प्रस्तुत कृति सुप्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व का विवेचन है। उनका स्थान साहित्य में अब निश्चित हो चुका है। भिन्न-भिन्न मानसिकता के लेखकों के विचार यहाँ एक साथ देखने को मिल जाएँगे। संपादन के इस प्रयास से एक तो लेखिका के विपुल अनुभवों का संसार सामने आता है; दूसरे, अनुभूति की बारीकियों से पाठकों का परिचय होता है। 
    नासिरा शर्मा की लेखनी ज़मीन-ज़मीन का फ़क़ऱ् भली-भाँति पहचानती है। संकलित लेखों से लेखिका की सूझबूझ, विवेक, पात्रोचित भाषा एवं कथा- साहित्य की सरसता की पूरी-पूरी जानकारी मिलती है। पाठक इस तथ्य से बख़ूबी परिचित हो जाता है कि साहित्य का उद्देश्य क्या है। वह इंसानियत की वास्तविक तस्वीर बनाने में कहाँ तक सहायक है। 
    अपने लेखन में लेखिका ने परंपरा से प्राप्त ख़ूबियों, जनजीवन से मिली संघर्ष-गाथाओं एवं जिंदगी की तकलीफ़ों का वास्तविक बयान प्रस्तुत किया है। इस प्रस्तुति से नासिरा शर्मा को जानने-समझने एवं परखने में मदद मिलेगी, विश्वास है।
  • Zane Ajeeb : Nasera Sharma
    Prem Kumar
    275 248

    Item Code: #KGP-281

    Availability: In stock

    ज़ने अजीब : नासिरा शर्मा
    अपनी मनबसी नामी-गिरामी शख़्सियतों के बारे में बहुत कुछ—ख़ूब-ख़ूब जान लेने की चाहत सबमें होती है। पसंदीदा के प्रभाव के बढ़ते-गहराते जाने के क्रम में एक बिंदु वह भी आता है, जब यह चाहत कसकता-सा एक जुनून तक बन जाती है। उस अपने मनभावन के अंदर- बाहर-आसपास से जुड़ी हर छोटी-छिपी बात जानने-सुनने के लिए हम उत्कर्ण-उत्कंठ हो उठते हैं। अगर वह मनभावन कोई कलाकार-साहित्यकार है तो स्थिति और भी विकट एवं दिलचस्प हो जाती है। उसकी रचनाओं के पात्रों, घटनाओं, चित्रों, कथनों के आधार पर हम अपनी- अपनी तरह से उसके निज—नितांत निज की दुनिया की अजब-ग़ज़ब तस्वीरें बनाने लगते हैं—बनाते रहते हैं।
    लेकिन जब कोई बड़ी शख़्सियत—नासिरा शर्मा जैसी लेखिका—अपने स्वभाव, अनुभवों, संवेदनाओं, संबंधों, मान्यताओं, विचारों, अभावों, आघातों, संघर्षों, प्राप्तियों...उससे भी अहम यह कि अपने पात्रों, सरोकारों, इरादों एवं रचित-संभावित रचनाओं के बारे में सहज, स्पष्ट, उत्सुक भाव से रचना करने की तरह कहे-बताए...तो...तो यह पाठक, रचना और साहित्य की दृष्टि से विशिष्ट, उपयोगी और मूल्यवान हो जाता है। तब और भी अधिक—जब हम नासिरा जी के पास-साथ होने के उन क़रीबी क्षणों में यह जानें-महसूस करें कि इस लेखिका के जीने-लिखने-सोचने का अंदाज़ और सोच का आसमान एकदम अलग भी है एवं व्यापक व विराट् भी।
    किसी कलाकार की सृष्टि व कलाकारिता की वीथियों-अमराइयों में उसके साथ चल, गुज़र, देख, सुन, जान पाना अपने आप में भिन्न, सुखद, अधिकतम प्रामाणिक और बेहतरीन क़िस्म का अनुभव होता है। ऐसे इस अनुभव का अहसास-भर पाठक को कराने की मुन्नी-सी एक ख़्वाहिश और कोशिश है यह—ज़ने अजीब: नासिरा शर्मा।
  • Pahiye Ki Vikaas Katha (Paperback)
    Chetan Kumar
    60

    Item Code: #KGP-7089

    Availability: In stock


  • Is Bar Sapne Mein Tatha Anya Kavitayen
    Parmanand Shrivastva
    175 158

    Item Code: #KGP-1898

    Availability: In stock

    इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ परमानंद श्रीवास्तव की काव्ययात्रा से एक ऐसा चयन है, जिसे अपने दर्पण-समय का साक्ष्य कहा जा सके। ‘उजली हँसी के छोर पर’, ‘अगली शताब्दी के बारे में’, ‘चौथा शब्द’ और ‘एक अ-नायक का वृत्तांत’ से मुख्यतः चुनी कविताएँ अनामिका के संपादन में एक समय-संवाद बनाती हैं। प्रेम भी प्रतिरोध के विमर्श में शामिल है। ‘चित्र में स्त्रियाँ’, ‘छिपने की जगह’ जैसी कविताएँ एक नया मुहावरा हासिल करती हैं। परमानंद श्रीवास्तव के लिए कविता एक अकेली दुनिया का हालचाल, जिसे बताना मुश्किल है, तो छिपाना लगभग असंभव। ‘आसिया बानो’, ‘भानु मजूमदार’ जैसे नाम काल्पनिक भी हों तो आत्मा की भीतरी सृष्टि हैं। 
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ स्त्री-उत्पीड़न और साम्प्रदायिक बर्बरता का आख्यान हैं, जिसे कविता अनोखे संवाद-शिल्प में अंकित करती हैं। कविता जैसे एक पटकथा हो, एक लैंडस्केप, एक विस्थापित की डायरी, एक समय-गाथा। ‘एलिना के लिए’ जैसी कविताएँ गहरे भेद खोलने वाली कविताएँ हैं। यहाँ भीतर का त्रासद तनाव प्रकट है तो कोमल मूक अन्तर्ध्वनि भी।
    विस्थापन इन कविताओं का केन्द्रीय सच है। निर्वासन में कवि का आत्मनिर्वासन भी शामिल है।
  • Sangharsh Ki Pratimurti : Aang Saan Su Ki (Paperback)
    M.A. Sameer
    120

    Item Code: #KGP-7078

    Availability: In stock

    आग सान सू की यह नाम एक ऐसी महिला का है, जिसने अपने असाधारण धैर्य और असीमित देशप्रेम को भावना से अपने देश बर्मा को 70 वर्ष की तानाशाही सैन्य सरकार से मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र की स्थापना करके विश्च भर को नारी-शक्ति से परिचित कराया हैं। इस महान् महिला सू की का जीवन कठिन संघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहने के गुण और तानाशाहों की कुटिल प्रताड़नाओँ से भरा रहा है।
    प्रस्तुत पुस्तक 'संघर्ष की प्रतिमूर्ति -- आंग सान सू की : जीवन दर्शन' में आंग सान सू की के जीवन से जुडी घटनाओँ व तथ्यों को सरस, सरल और रोचक भाषाशैली में कलमबद्ध करने का प्रयास किया गया है। अहिंसा को अपना प्रमुख अस्त्र मानने वाली आग सान सू की के जीवन पर आधारित यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठक को अवश्य रुचिकर लगेगी।
  • Netaji Subhash Chandra Boas
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-nscb

    Availability: In stock


  • Ek Aur Dronacharya
    Shanker Shesh
    50

    Item Code: #KGP-7206

    Availability: In stock


  • Anhad Naad
    Pratap Sehgal
    250 225

    Item Code: #KGP-35

    Availability: In stock


  • India's Gift To The Globe : Bhagvad Gita (Education)
    Onkar Singh Dewal
    295 266

    Item Code: #KGP-9017

    Availability: In stock

    India's Gift To The Globe Bhagvad Gita Seen through Educational Lens
    Study of spiritual literatures of the world build our inner strengths for self-transformation and self-re-engineering. Inner strength broadens our outlook, promotes culture of peace and help us to celebrate differences. It also helps us to stand against violence, social evils, political ills and economic imbalances.
    The Bhagvad Gita is the cream of Vedic literature and has inexhaustible spiritual treasure that has guided all people, of different religions, race and times. Regular reading of the Gita promotes positive thinking (be good to all loZHkwr fgrs jrk) rejects negativity (v}s"Vk loZ Hkwrkuke~), promote devi sampada and reject asuri sampada. The Gita guides us to promote collaborative activities (ijLija Hkko;Ur) and work for the social good (yksd laxzg). above all it helps us to improve and uplift ourlselves by our own efforts (m¼jsr vkReuk vkRekue~) and develop manly quality (ikSj"ka u`"kq).
    Sri Kanak Malji Duggar, Chancellor, IASE Deemed University and President, Gandhi Vidya Mandir, Sardar Sahar, prompted me to write it as a resource book for teachers and students of education and human values.
  • Nihatthi Raat Mein
    Indira Mishra
    150 135

    Item Code: #KGP-9134

    Availability: In stock


  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan (Paperback)
    Surendra Tiwari
    450 360

    Item Code: #KGP-391

    Availability: In stock


  • Khilafat
    Govind Mishra
    430 344

    Item Code: #KGP-9374

    Availability: In stock

    ‘‘अब्बा हुजूर! हम पढ़े-लिखे लोग हैं, तो कभी मज़हबी नज़रिये से थोड़ा अलग हटकर भी हमें देखना चाहिए, अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए। दुनिया में मुसलमान जो इस वक्त एक तरह के तूफान में फँसा हुआ है, उसमें हम मुसलमानों ने ही खुद को डाला है...मिडिल ईस्ट की पाक ज़मीं पर इस्लाम के  कितने फिरके  आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, मुसलमान ही मुसलमानों को मार रहे हैं...
    हिन्दुस्तान में जिहादी, हमारे अशरफ जैसे एक-दो ही हुए। यह इसलिए कि यहाँ कितने मज़हब, कितनी जातियाँ, कितने खयालात...कितने-कितने सालों...पहले तो साथ रहने को मजबूर हुए, फिर रहने लगे, रहते-रहते एक दूसरे से लेने-देने सीखने लगे। सदियों की इस ‘चर्निंग’ को हमें पहचानना चाहिए... 
    सऊदी इस्लाम की जगह हिन्दुस्तानी इस्लाम क्यों नहीं...जो हिन्दुस्तान में कुदरतन ईजाद हो चुका है...जिस तरह इतने मज़हब यहाँ साथ रहते हैं, वैसे ही इस्लाम के मुख्तलिफ फिरके मिडिल ईस्ट या कहीं भी क्यों नहीं रह सकते...’’
    इस्लामिक स्टेट...अबूबकर बगदादी की ‘खिलाफत’ के परिवेश पर लिखा गया हिन्दी का पहला उपन्यास...आई.एस. सम्बन्धी विस्तृत जानकारियों के बीच, यहाँ कई अहं सवालों को उठाया गया है, जैसे कि आज अगर इस्लाम को दुनिया अपने सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती को रूप में देख रही है तो क्यों...इस्लाम अमन का मज़हब है या कि जंग का...दूसरे मज़हबों की तरह वक्त के साथ-साथ इस्लाम भी क्यों नहीं बदलता या खुद को बदलने देता... नौजवानों की जि़न्दगी बेहतर बनाने की बजाय वह उन्हें जिहाद की आग में क्यों झोंक देता है, लड़कियों की शिक्षा, आज़ादी...और इस सबके नीचे अन्डरकरैन्ट की तरह कश्मीर की समस्या। 
    कश्मीर की शिया लड़की, सुन्नी लड़का...दोनों में बचपन से प्रेम, उनके निष्कलुष सपने...उल्टी बहती हवा उन्हें किस तरह अपनी जद में ले लेती है और वे किस तरह बाहर निकलने की कोशिश करते हैं...अबूबकर की खिलाफत के खिलाफ उनकी खिलाफत क्या शक्ल इख्तियार करती है... 
    हर बार की तरह गोविन्द मिश्र अपने इस नये उपन्यास में फिर नये परिवेश, नये विषय के साथ प्रस्तुत हैं।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 4 (paperback)
    Shrinivas Vats
    140 112

    Item Code: #GAES-4

    Availability: In stock

    पिछले तीन खंडों पर सुधी पाठकों, विद्वान् समीक्षकों ने ऐसी उत्साहवर्धक बातें कहीं, जिन्हें पढ़-सुनकर मेरा हौसला दुगना बढ़ गया। मैं सहृदयता से उनका आभार प्रकट करता हूँ।
    सतरंगी के सात रंग और उपन्यास के सात खंड। इन सातों खंडों में आपको प्रकाश के सात रंगों की तरह हर बार नया रंग दृष्टिगोचर होगा। जैसे प्रकाश में सात रंग होते हैं वैसे ही साहित्य में नौ रस होते हैं। आप बड़े होकर पढ़ना कि साहित्य के नौ रस कौन से हैं?
    संस्कृत, हिंदी, तमिल, बंगला, मलयालम आदि भाषाओं में रचा गया भारतीय साहित्य इन रसों से भरा हुआ है।
    विष्णु के जीवन में झंझावात तो आते रहे हैं, आगे भी आते रहेंगे। चुलबुला विष्णु उनसे कभी नहीं घबराया, बल्कि हर बार ‘सुपर हीरो’ बनकर उभरा है।
    अंतर्राष्ट्रीय हस्ती होते हुए भी विष्णु को कर्णपुर से बहुत लगाव है। आपकी ही तरह गुल्लू, राधा, विष्णु अपने गाँव, अपने देश को जी-जीन से प्यार करते हैं। सच भी है, भले ही हम चाहे जहाँ रहें अपने प्यारे भारतवर्ष को कभी न भूलें।
    उपन्यास के अगले खंडों में आपको विष्णु के दूसरे अद्भुत साथियों से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। तब तक चैथा खंड पढ़ लीजिए। शीघ्र ही शेष खंड भी आपके हाथों में होंगे।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma
    Tajendra Sharma
    270 243

    Item Code: #KGP-827

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Russia (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-351

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words? 
    In this first in the 20-BEST series, we bring to you short stories and classics from a land that is as enigmatic as intriguing. Russian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious—as well as the equally famous Russian authors. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.  
    With stories like The Bet and Vanka by Chekhov, God sees the truth but waits by Leo Tolstoy, The Queen of Spades by Alexander Pushkin, Her Lover and One Autumn Night by Gorky, The Cloak by Gogol, The Signal by Garshin, this book is a compilation of 20 famous Russian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Russia.  
  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan : Taatvik Vivechan (Paperback)
    Jayanti Prasad Nautiyal
    60

    Item Code: #KGP-7029

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है ।
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • Malyalam Ke Mahaan Kathakaar : Srijan-Samvaad
    Dr. Arsu
    200 180

    Item Code: #KGP-902

    Availability: In stock

    मलयालम के महान कथाकार : सृजन-संवाद
    अन्तर्सबंधों की मजबूती से ही संस्कृति टिकाऊ बनेगी । कला और संस्कृति के माध्यम से ही यह प्रक्रिया संभव  होगी । भाषायी अजनबीपन के कोहरे को मिटाने पर ही मानवीय सोच-संस्कार का क्षितिज विशाल बनेगा ।
    बहरहाल भाषायी कठमुल्लेपन को हटाकर हम हिंदी को सर्वभारतीयता का प्रतीक बनाना चाहते हैं । उसके लिए भाषायी भाईचारा पहले मज़बूत बने । उत्तर-दक्षिण का खुला संवाद इसका एक रास्ता है ।
    यह कृति मलयालमभाषी हिंदी लेखक डॉ० आरसु की साहित्यिक तीर्थयात्रा का परिणाम है । इसके पीछे एक विराट लक्ष्य है । यह भाषायी समन्वय का कार्यक्षेत्र है । सुदूर दक्षिण के प्रांत केरल में रहकर कई साहित्यकारों ने अमर कृतियाँ लिखी हैं । उनकी कृतियां भी राष्ट्र भारती की संपदा हैं ।
    तकषी शिवशंकर पिल्लै, एस०के० पोटटेक्काटट और एम०टी० वासुदेवन नायर को इस भाषा में कृतियां लिखकर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था । उनके समानधर्मी और भी कई कथाकार हैं ।
    सृजन-क्षण की ऊर्जा, उन्मेष और उलझन पर उनके विचारों से अवगत होने के लिए अब हिंदी पाठकों को एक अवसर मिल रहा है । दक्षिण भारत की एक भाषा के साहित्यकारों के साक्षात्कार पहली बार एक अलग पुस्तक के रूप में हिंदी पाठकों को अब मिल रहे हैं ।
    मलयालम के बीस कथाकारों के हृदय की नक्षत्रद्युति यहाँ हिंदी पाठकों को मिलेगी । कुछ विचारबिंदु वे अवश्य आत्मसात् भी कर सकेंगे। हिंदी भेंटवार्ता के शताब्दी प्रसंग में प्रकाशित यह कृति एक कीर्तिमान है । इस कृति के माध्यम से मलयालम और हिंदी हाथ मिलाती हैं । दक्षिण के हृदय को उत्तर समझ रहा है । यह सांस्कृतिक साहित्यिक समन्वय की एक फुलझड़ी है ।
  • Pracheen Bharat Ki Kathayen
    Mangal Dev Upadhyaya
    60 54

    Item Code: #KGP-9108

    Availability: In stock

    ऋषि ने अश्विनी कुमार की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कहिये, आपको क्या चाहिए?’’
    अश्विनीकुमार ने निवेदन किया, ‘‘मधु-विद्या का रहस्य।’’
    ऋषि विस्मय-चकित हो उठे। उनके मुख से विस्मय भरे स्वर में अपने आप निकल पड़ा ‘‘मधु-विद्या का रहस्य!’’
    अश्विनीकुमार ने कहा, ‘‘हां ऋषिश्रेष्ठ, मधु-विद्या का रहस्य। मधु-विद्या के रहस्य से ही हमारा दैन्य दूर हो सकता है, हमारी व्यथाग्नि शान्त हो सकती है।’’
    ऋषि विचारों में डूब गए। उन्होंने सोचते हुए कहा, ‘‘पर मैं मधु-विद्या का रहस्य किसी अन्य पर प्रकट नहीं कर सकता। यदि मै। प्रकट करूंगा तो...।’’
    अश्विनी कुमार बीच में ही बोल उठे, ‘जानते हैं ऋषिश्रेष्इ! यदि आप प्रकट करेंगे, तो देवराज के द्वारा आपको शिरोच्छेद कर दिया जाएगा।’’
    ऋषि ने सोचते हुए कहा, ‘‘हां, यही बात है इस बात को जानते हुए भी आप मुझससे मधु-विद्या का रहस्य प्रकट करने के लिए कह रहे हैं?’’
    -इसी पुस्तक से
  • Kaali Dhar
    Mahesh Katare
    550 413

    Item Code: #KGP-KALI DHAR HB

    Availability: In stock

    जमादारिन की हवेली बीसियों साल से बंद थी। साल में एकाध बार उनका बेटा आगरा से आता। विशेषतः दीपावली से पहले आकर वह दो-चार दिन ठहरता। कलई-चूने से मंदिर की पुताई-सफाई करवाता और लौट जाता। अटारी आकर वह सेठ की हवेली में ही ठहरता। सेठ के लड़केपोते उससे छुआछूत वाला व्यवहार नहीं करते थे। अगली पीढ़ी को हवेली की आवश्यकता न थी। इस बीहड़ में कौन बसतातालों की चाबियाँ सेठ परिवार के पास थीं। हवेली में एक छोटा सा द्वार पीछे बीहड़ों की ओर भी खुलता थाजिसमें से होकर बागियों के गिरोह हफ्रतों हवेली में पड़े रहते और चौमासे अर्थात् बरसात में तो महीनों। सबको पता था। पुलिस की गश्त भी यदा-कदा सामने के द्वार पर जड़े ताले को देखती हुई निकल जाती थी। गिनती का पुलिस-दल डाकुओं से टकराने का खतरा कैसे उठाएबागी भी सामान्यजन को परेशान नहीं करते थे। उनके निशाने पर तो दुश्मनधनवान अथवा मुखबिर आता था। रसद लाने वाले को पूरा पैसा चुकाते थे बागी।

    लाला जी ने सेठ श्रीलाल के वंशजों से संपर्क किया। जमादारिन के पुत्र से अनुमति ली तो ठाकुर ने दाऊ मानसिंह को समस्या का पहलू समझाया। मानसिंह का गिरोह ही उस समय सबसे प्रभावशाली था। वह कड़ाई से बागी-धर्म के नैतिक नियमों का पालन करते थे। कुल मिलाकर आठ दिन में ऊपरी औपचारिकता पूरी हो गई एवं आठ दिन सफाई आदि के जरिये हवेली को बसने योग्य बनाने में लगे। इस तरह अम्मा ठाकुर जमादारिन की हवेली में रहवासी हो गईं। नवाब ठाकुर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लाला भभूती लाल ने कुछ विशेष व्यवस्था भी कर दी। 

    -इसी उपन्यास से। 

  • Vyangya Samay : Sharad Joshi
    Sharad Joshi
    380 342

    Item Code: #KGP-9347

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Krantikari
    Roshan Premyogi
    260 234

    Item Code: #KGP-1943

    Availability: In stock

    क्रांतिकारी
    दलित परिवार में जन्म लेने के कारण सामाजिक अस्पृश्यता और उत्पीड़न का दंश मैंने भी सहा है, इसलिए ‘क्रांतिकारी’ को पढ़ते हुए यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा कि जिस तरह इस उपन्यास में चंद्रशेखर और केवलानंद जैसे सचेत सवर्ण लड़के दलित रामकरन के साथ खड़े हैं, मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हुए ?
    चंद्रशेखर मुख्य पात्र है, जो चाहता है कि इलाके के गाँवों में दलितों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे, वे संगठित हों और बराबरी पर आने के लिए लड़ें। दलितों की लड़ाई में वह अपना एक हाथ गँवा बैठता है। अंत में उसके विचारों की विजय होती है। विजय इस तरह कि दो मेधावी युवा अपने-अपने गाँव यह सोचकर आए थे कि वे यहीं पर रोजगार करेंगे और अपने साथ दलित समाज का भी जीवन-स्तर ऊँचा उठाएँगे। उनकी राह में क्षेत्रीय विधायक काँटा बोते हैं, इसलिए कि यदि रामकरन जैसे हरिजन दलितों के सर्वमान्य नेता बन जाएँगे तो हम सवर्णों का वोट बैंक टूट जाएगा। उधर चंद्रशेखर और रामकरन मिलकर दलितों को यह अहसास कराते हैं कि यदि संगठित और शिक्षित बनोगे तो कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं कर पाएगा।
    ईशावस्या, माला और संध्या जैसे स्त्री-पात्रों को उपन्यास में महत्त्व नहीं मिला है, लेकिन सबकी कमी पूरी कर देती हैं सुन्नरी देवी। उनका संघर्ष समूची दलित स्त्री जाति का संघर्ष है। वे किसी देवी की तरह समाजियों का नेतृत्व सँभालती हैं। दरअसल दलित क्रांति की मशक्कत तीन युवा मिलकर करते हैं, लेकिन जब क्रांति होती है तो वे युवा पीछे रह जाते हैं और सुन्नरी देवी विजय का परचम लहरा देती हैं।  

  • Bharatvanshi : Bhasha Evam Sansriti (Paperback)
    Pushpita Awasthi
    390

    Item Code: #KGP-508

    Availability: In stock

    डॉ.. पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनाकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों, यथा--सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। 
    डॉ. अवस्थी ने इन्हीं पर दशकों तक काम किया। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इसमें प्रवासी भारतीयों के इलाकों की भी छवियां हैं। मूलतः यह कृति उन भारतवंशियों के अंधेरों को रोशनी में लाती है जो बहुत हद तक अलक्षित रहा। 
    भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है। संस्कृति और भाषा का यह गहन-गंभीर अध्ययन कदाचित् पहली बार वैज्ञानिक दृष्टि से सामने आ रहा है। इसमें सृजनशील लेखक और इतिहासविद् की अनूठी जुगलबंदी है। 
    डॉ. अवस्थी ने भारतवंशियों की अलग-अलग धर्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पहचानों में हिंदुस्तानियत की शिनाख्त करते हुए उन तत्त्वों का अन्वेषण किया है जो उन्हें भारतवंशी होने के सांस्कृतिक स्वाभिमान में एकसूत्र करते हैं। यह एकसूत्रता संस्कृति और भाषा की अंतर्तहों में किस तरह अंतर्भुक्त है, इसे अकेले दम पर लेखक ने घूम-घूमकर चिन्हित किया है। वे भारतीय आर्यों और पारसीक आर्यों के सांस्कृतिक और भाषायी इतिहास के रास्तों से वैचारिक यात्रा करती हैं और मोटे तौर पर 19वीं से 20वीं सदी के बीच बनी संस्कृति और भाषा की जड़ों को टटोलकर अपनी स्थापनाओं के लिए रास्ता निर्मित करती हैं। इस प्रक्रिया में वे यूरोपीय उपनिवेशों में भारतवंशियों के तत्कालीन दारुण इतिहास, यातनाओं, यंत्राणाओं के वास्तविक चित्रों को क्रमशः सजीव करती हैं। 
    डॉ. अवस्थी ने संस्कृति और भाषा को उस संजीवनी के रूप में खोजा है जिनके कारण ही भारतवंशियों का जीवन है। ये दोनों उनके प्राण तत्त्व बने हुए हैं। इन्हीं दो तत्त्वों से विश्व में उनकी भारतीय अस्मिता का स्थापन हुआ। यह अस्मिता उन भारतीयों से अलग है जो पिछले 30-40 सालों में प्रवास पर पहुंचे। प्रवासी और अप्रवासी के भेद को, भ्रम को अनावृत्त करती यह किताब एक उपलब्धिकी तरह सामने है।
    भूमंडलीकरण के भयावह आक्रमण के दौर में जबकि संस्कृतियों और भाषाओं, बोलियों और लिपियों को बचाना कठिन होता जा रहा है तब यह एक किताब भाषा एवं संस्कृति को बचाने का मेटाफर रचती है। यही इसका मानीख़ेज हासिल है।
    --लीलाधर  मंडलोई
  • Bhasha-Praudyogiki Evam Bhasha-Prabandhan
    Prof. Surya Prasad Dixit
    550 495

    Item Code: #KGP-738

    Availability: In stock

    भाषा-प्रौद्योगिकी एवं भाषा-प्रबंधन
    हिंदी भाषा-साहित्य को प्रौद्योगिकी रूप में सुगठित करना और प्रबंध-विज्ञान के सहारे संपूर्ण देश में उसे कार्यान्वित करना संप्रति बहुत बड़ी चुनौती है। पहली आवश्यकता यह है कि भाषा-प्रौद्योगिकी का एक व्यावहारिक शास्त्र बनाया जाए और फिर उसकी प्रविधि तथा प्रक्रिया का परिविस्तार किया जाए। भारत की भाषा-समस्या का निराकरण विधवा-विलाप से नहीं होगा, बल्कि वह संभव होगा विधेयात्मक वैकल्पिक परिकल्पनाओं से। ऐसी ही कुछ वृहत्तर परिकल्पनाओं से उपजी है यह पुस्तक।
    इसमें हिंदी की भाषिक प्रकृति तथा संस्कृति पर विचार करते हुए भाषा के विभिन्न चरित्रों की मीमांसा की गई है। राजभाषा, संपर्क-भाषा, शिक्षण-माध्यम-भाषा, संचार-भाषा और कंप्यूटर-भाषा की शक्ति तथा सीमाओं का विश्लेषण करते हुए यहाँ लेखक ने अनुवाद, वेटिंग, अनुसृजन, पारिभाषिक शब्दावली, संकेताक्षर, दुभाषिया प्रविधि, डबिंग, मीडिया-लेखन, संभाषण-कला, रूपांतरण, सर्जनात्मक लेखन, पत्रकारिता, नाट्यांदोलन, प्रचार- साहित्य-लेखन, कोश-निर्माण, ज्ञान-विज्ञानपरक वैचारिक लेखन, देहभाषा, यांत्रिक भाषा, लोक वाङ्मय, शोध समीक्षा, प्राध्यापन, भाषा-शिक्षण, इतिहास-दर्शन, प्रकाशन, परीक्षण, विपणन, संगोष्ठी-संयोजन, लिपि के मानकीकरण, विभाषाओं के संरक्षण तथा इन विचार-बिंदुओं से जुड़े तमाम पक्षों का बारीक विश्लेषण किया है।
    प्रस्तावना, भाषा-प्रौद्योगिकी, भाषा-प्रबंधन और समाहार नामक चार स्तंभों पर आधारित यह कृति हिंदी भाषा-साहित्य का एक नया ढाँचा निर्मित करने हेतु कृतसंकल्प रही है। इसका अनुगमन करते हुए इस ढाँचे को जन-सहभागिता के सहारे भव्य प्रासाद का रूप दिया जा सकता है। यही आह्नान एक-एक अध्याय में किया गया है। अस्तु, यह मात्रा लेखन मात्रा न होकर समग्रतः एक सुनियोजित भाषांदोलन है। एक रचनात्मक महानुष्ठान !
  • Puraan Gatha
    Sudarshan Vashishath
    90 81

    Item Code: #KGP-1842

    Availability: In stock

    पुराण गाथा
    हमारे देश में हिमालय वह भू-भाग है, जहाँ वेद-पुराण रचयिता ऋषि-मुनियों ने वास किया । हमारा पौराणिक साहित्य भी विवित्र है । जितना काल्पनिक लगता है, उतना ही व्यावहारिक है । जितना यथार्थवादी है, उतना ही प्रतीकात्मक भी है । समस्त साहित्य काव्यमय होने के कारण कई बार अतिजशयोक्ति का भ्रम देता है, किंतु कल्पना त्तत्त्व को हटा देने पर एकाग्र यथार्थवादी से जाता है । इस साहित्य में सर्वाधिक यथार्थवादी रचना महाभारत है, जिसमें हर पात्र, हर घटना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है । किसी भी आदर्श पात्र को कहीं पर बक्शा नहीं गया है ।
    प्रस्तुत है, सहज-सरल भाषा में हिमालय क्षेत्र की रोचक गाथाएँ ।
  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (1st Part)
    Govind Rajnish
    1000 900

    Item Code: #KGP-689

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के