Hansbalaka

Acharya Janki Vallabh Shastri

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789381467046

हंसबलाका
‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य को आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की अन्यतम देन है। इसका प्रथम प्रकाशन 1982 ई. में हुआ था। प्रकाशित होने पर हिंदी समाज में इसका व्यापक स्वागत हुआ। प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय आदि महान् लेखकों के जीवन और साहित्य को तथा स्वयं अपने जीवन को नए ढंग से देखने का यह प्रयास अपने तरह का अकेला है। यह मात्र संस्मरण की पुस्तक भर नहीं है। यहाँ हिंदी के सांस्कृतिक गद्य का ऐसा रूप है, जिसमें हमारी परंपरा और समय दोनों अपने सबसे उदात्त रूप में प्रस्तुत हुए हैं। इन संस्मरणों में प्राचीन भारत की गूँज-अनुगूँज तो है ही, आधुनिक सांस्कृतिक जगत् की यथार्थ चेतना भी है। ‘हंसबलाका’ के संस्मरणों से गुजरते हुए हम आलोच्य व्यक्ति को तो नए रूप में देखते ही हैं, अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सर्वथा नए रूप में पाते हैं। बिना किसी दुविधा के कहा जा सकता है कि ‘हंसबलाका’ के प्रकाशन से हिंदी संस्मरण साहित्य का सबसे पुष्ट और प्रखर रूप सामने आता है। ‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य का सर्वोच्च शिखर है।

Acharya Janki Vallabh Shastri

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का जन्म गया (बिहार) जिला के मैगरा नामक गाँव में (माघ शुक्ल द्वितीया) 1916 ई. में तथा निधन 7 अप्रैल, 2011 को मुजफ्फरपुर (बिहार) में हुआ। 
संस्कृत में ‘काकली’ नामक काव्य-संग्रह के साथ साहित्य जगत् में प्रवेश करने वाले शास्त्री जी निराला की प्रेरणा से हिंदी में आए। संस्कृत साहित्य और भारतीय वांगमय के प्रखर और प्रकांड विद्वान् शास्त्री जी ने हिंदी कविता और गद्य में तीन दर्जन से ऊपर पुस्तकें लिखीं। ‘रूप अरूप’, ‘तीर तरंग’, ‘अवंतिका’, ‘शिप्रा’, ‘मेघगीत’, ‘उत्पलदल’, ‘संगम’, ‘राधा’ (महाकाव्य) आदि उनकी प्रसिद्ध काव्य-पुस्तकें हैं। कविता के अतिरिक्त आलोचना, संस्मरण, उपन्यास, कहानी, गीतिनाट्य आदि विधाओं में भी शास्त्री जी की दर्जन-भर से ऊपर पुस्तकें हैं। ‘कालिदास’ उनका प्रसिद्ध उपन्यास है, जो अपनी तरह का हिंदी का अकेला उपन्यास है। ‘हंसबलाका’ उनके लिखे संस्मरणों की ऐसी पुस्तक है, जिसकी दूसरी मिसाल हिंदी में शायद ही मिले। ‘राजेन्द्र शिखर सम्मान’ तथा ‘भारत भारती’ आदि सम्मानों से सम्मानित शास्त्री जी छायावादोत्तर युग के ऐसे विलक्षण कवि-लेखक थे, जिनका साहित्य उस युग में प्रचलित ‘वादों’ के लिए चुनौती है।


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