Paanch Rang Naatak

Pratap Sehgal

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170165194

पाँच रंग नाटक
हिंदी में अच्छे नाटकों की कमी की दुहाई हमेशा दी जाती है । अच्छे नाटकों की कमी विश्व की किस भाषा में नहीं है, इसलिए हिंदी को अपवाद मानना सही नहीं है । यह भी सच है कि हिंदी रंगमंच के विकास एवं विस्तार के साथ-साथ नाटकों की कमी गहरे  स्तर पर खलने लगी तो विदेशी एवं हिंदीतर भारतीय भाषाओँ के नाटकों के अनुवाद/रूपांतर का प्रचलन बढा । यह प्रक्रिया स्वस्भाविक  ही है । रंगमंच के विकास ने हिंदी के कई लेखकों को अपनी ओर आकृष्ट किया और साहित्य की अन्य विधाओं में लिखने वाले नाट्य-लेखन में प्रवृत्त हुए ।  इस तरह से हिंदी के नाटक भी हुए और हिंदीतर भाषाओं के भी । 
प्रताप सहगल कविता से नाटक की और प्रवृत्त हुए है और उन्होंने
नाट्य-लेखन को रंगमंच से जोड़कर ही देखा है, इसलिए उनके
नाटकों में नाटकीय गत्यात्मकता, नाटकीय बिम्ब और नाटकीय
शब्द भरपूर मिलता है । उनका मानना है कि नाटक के संवादों में
अभिनय-कला को उजागर करने की जगह जरूर होनी चाहिए । 
गत दो दशकों में उन्होंने नाटक के विविध रूपों को अपने 'संप्रेष्य' का माध्यम बनाया है । प्रस्तुत 'पाँच रंग नाटक' उनके विपुल नाट्य-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । यहीं 'अन्वेषक' हैं 'रंग बसंतो', 'मौत क्यों रात भर नहीं आती', 'अँधेरे में’ तथा 'नहीं कोई अंत'--पाँच नाटक मौजूद हैं।
'अन्वेषक' को जहाँ विज्ञान-नाटक नाम से एक नई नाट्य-धारा की शुरुआत माना जा रहा है, वहीं 'रंग बसंती' भगतसिंह के जीवन एवं समय को ब्रेख्तियन रंग-शैली की परंपरा में नाट्यांकित  करता है । 'मोत क्यों रात पर नहीं आती' फार्स और यथार्थ का मिला-जुला प्रारूप है तो 'नहीं कोई अंत’ यथार्थवादी नाटकों की श्रेणी में रखा जा सकता है । 'अँधेरे में' नाटक में तो ब्लैक कॉमेडी निहित है ही ।
अपनी अलग-अलग भंगिमाओं एवं प्रस्तावनाओं के कारण ये सभी नाटक देश के विभिन्न छोटे-बड़े नगरों में बार-बार  खेले गए है और इन्होंने कई बहसों, विवादों और संवादों को जन्म दिया है । अब वे पांचों रंग नाटक एक ही जिल्द में, ताकि इधर-उधर भटना न पड़े ।

Pratap Sehgal

प्रताप सहगल
जन्म : 10 मई, 1945
प्रकाशित रचनाएँ :- कविता-संग्रह : 'सवाल अब भी मौजूद है', 'आदिम आग', 'अँधेरे में देखना', 'इस तरह से', 'नचिकेतास ओडिसी', 'छवियाँ और छवियाँ', मुक्तिद्वार के सामने  ० नाटक : 'अन्वेषक', 'रंग बसंती', 'नहीं कोई अंत', 'मौत क्यों रात- भर नहीं आती', 'चार रूपांत',  'नौ लघु नाटक',  'पाँच रंग नाटक', 'अपनी-अपनी भूमिका', 
'कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक है', 'कोई और रास्ता', 'मेरे श्रेष्ठ लघु नाटक', 'अंधेरे में' (पीटर शेफर के नाटक ब्लैक कॉमेडी का रूपांतर), 'किस्सा तीन गुलाबों का' (बल्गेरियन नाटक का अनुवाद), 'छू मंतर' (बाल नाटक), 'दस बाल नाटक', 'दो बाल नाटक' ०  उपन्यास : 'अनहद नाद', 'प्रियकांत' ० कहानी-संग्रह : 'अब तक', 'मछली-मछली  कितना पानी' ० आलोचना : 'समय के सवाल', 'रंग चिंतन', 'समय के निशान', ० विविध : 'अंशतः' (चुनिंदा रचनाओं का संग्रह)
सम्मान एवं पुरस्कार : साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली ० सौहार्द सम्मान, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ० मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ० 'रंग बसंती' पर साहित्य कला परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार ० 'अपनी-अपनी भूमिका' शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत  ० 'आदिम आग' व 'अनहद नाद' हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत ० राजभाषा सम्मान, भारत सरकार एवं हिंदीसेवी राजभाषा सम्मान रोटरी क्लब, दिल्ली

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