Vrinda

Shanta Kumar

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  • Year: 2018

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170167747

वृन्दा
"मैं वृन्दा के बिना अपने होने की कल्पना भी नहीं करता । अब कैसे जिऊँगा और क्यों जिऊँगा ? अब मुझे भी कोई रोक नहीं सकता---पर हाँ वृन्दा, जाने से पहले तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ--काना चाहता हूँ... "  शास्त्री जी कुछ संभलकर खडे हो गए ।
सब उत्सुकता से उनकी और देखने लगे ।
वृन्दा की ओर देखकर शास्त्री जी बोले--“मुझे जीवन के अंतिम क्षण तक एक दु:ख कचोटता रहेगा कि तुमने 'गीता' पढी तो सही, पर केवल शब्द ही पढे तुम 'गीता' को जीवन में जी न सकी । तुम हमेँ छोड़कर जा रही हो, यह आघात तो है ही; पर उससे भी बड़ा आघात मेरे लिए यह है कि मेरी वृन्दा 'गीता' पढ़ने का ढ़ोंग करती रही । जब युद्ध का सामना हुआ तो टिक न सकी । मुझें दु:ख है कि तुमने 'गीता' पढ़कर भी न पढी। वृन्दा ! 'गीता' सुनकर तो अर्जुन ने गांडीव उठा लिया था और तुम हमें छोड़कर, उस विद्यालय के उन नन्हे-मुन्ने बच्चों को छोड़कर यों भाग रहीं हो मुझे तुम पर इतना प्रबल विश्वास था ।  आज सारा चकनाचूर हो गया । ठीक है, तुम जाओ... जहाँ भी रहो, सुखी रहो...  सोच लूँगा, एक सपना था जो टूट गया ।"

(इसी उपन्यास से)

Shanta Kumar

शान्ता कुमार
प्रबुद्ध लेखक, विचारक, राजनेता व पूर्व मुख्यमंत्री तथा निवर्तमान केंद्रीय खाद्य मंत्री शान्ता कुमार का जन्म हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गांव गढ़जमूला में 12 सितंबर, 1934 को हुआ था। उनका जीवन आरंभ से ही काफी संघर्षपूर्ण रहा। गांव में परिवार की आर्थिक कठिनाइयां उच्च शिक्षा पाने में बाधक बनीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आकर मात्र 17 वर्ष की आयु में प्रचारक बन गए। तत्पश्चात् प्रभाकर व अध्यापक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
दिल्ली में अध्यापन-कार्य के साथ-साथ बी.ए., एल-एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् दो वर्ष तक पंजाब में संघ के  प्रचारक रहे। फिर पालमपुर में वकालत की। 1964 में अमृतसर में जन्मी संतोष कुमारी शैलजा से विवाह हुआ, जो महिला साहित्यकारों में प्रमुख हैं। 1953 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में ‘जम्मू-कश्मीर बचाओ’ आंदोलन में कूद पड़े। इसमें उन्हें आठ मास हिसार जेल में रहना पड़ा।
शान्ता कुमार ने राजनीति के क्षेत्र में शुरुआत अपने गांव में पंच के रूप में की। उसके बाद पंचायत समिति के सदस्य, जिला परिषद् कांगड़ा के उपाध्यक्ष एवं अध्यक्ष, फिर विधायक, दो बार मुख्यमंत्री, फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री तक पहुंचे।
शान्ता कुमार में देश-प्रदेश के अन्य राजनेताओं से हटकर कुछ विशेष बात है। आज भी प्रदेशवासी उन्हें ‘अंत्योदय पुरुष’ और ‘पानी वाले मुख्यमंत्री’ के रूप में जानते हैं।
प्रकाशित पुस्तकें: मृगतृष्णा, मन के मीत, कैदी, लाजो, वृंदा (उपन्यास); ज्योतिर्मयी (कहानी-संग्रह); मैं विवश बंदी (कविता-संग्रह); हिमाचल पर लाल छाया (भारत-चीन युद्ध), धरती है बलिदान की (क्रांतिकारी इतिहास); दीवार के उस पार (जेल-संस्मरण); राजनीति की शतरंज (राजनीति के अनुभव); बदलता युग--बदलते चिंतन (वैचारिक साहित्य), विश्व-विजेता विवेकानंद (जीवनी); क्रांति अभी अधूरी है (निबंध); शान्ता कुमार: समग्र साहित्य (तीन खंड) तथा कर्तव्य (अनुवाद)

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