Safed Parde Par

Ramesh Chandra Shah

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170167679

सफेद परदे पर
उफ कैसे भंवर में आ फंसा हूँ मैं, अपनी ही करनी से ! किसने कहा था यह बखेडा मोल लेने को  बहुत शौक चढा था ना अकेले रहने का? फँसावट नग रही थी बेटा-बहू की गिरस्ती और पोते की माया? अच्छा वानप्रस्थ है यह तुम्हारा, जिससे तुम्हें एक ओर दत्ता-दंपति का सहारा चाहिए और दूसरी ओर रामरतिया का । उधर बेटा-बहू परेशान, इधर बेटी अलग परेशान । क्या अधिकार था तुम्हें उन बेचारों को इस तरह सारी दुनिया के सामने अकारण अपराधी बना देने का?
० 
उन्हें पता भी नहीं चला, कब वह योगिनी महामाया अपनी जगह से उठकर उनके पास आकर खडी हो गई और उनके सिर को, सिर के बालों की जडों को हौले-हौले सहलाने लगी ।… उनकी आँखे पूरी तरह मुँद गई । एक अदभुत शीतल करेंट-सी उनके मस्तक को भेदकर बूँद-बूँद रिसती हुई पोर-पोर में पसर रही है... क्या वे सचमुच होश में है? हैं, तभी न ऐसे अनिर्वचनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं, जैसा सुख उनकी स्नायुओं ने अब तक कभी नहीं जाना...

तुमने कहा था आप क्यों पूछ रहे हैं बाबूजी? क्या मेरी कहानी की किताब लिखना चाहते हैं ? मैं बुरी तरह चौक गया था तुम्हारे मुँह से यह सुनकर । तुम्हें कैसे लगा रामरती, कि मैं  तुम्हारी कहानी लिख सकता हूँ? पहली बार मुझे इलहाम जैसा हुआ कि हर आदमी की यह सबसे बड़ी, सबसे गहरी चाहत होती होगी कि कोई उसे सचमुच पूरा-पूरा समझे और न्याय करे ऐसा न्याय, जो और कोई नहीं कर सकता। सिर्फ लेखक नाम का प्राणी कर सकता है । लेखक, जो भगवान् की तरह लंबा इंतजार भी नहीं कराता । इसी जनम में, इसी शरीर और मन से निवास करने वाली जीवात्मा का एक्स-रे निकाल के रख सकता है ।
(इसी उपन्यास से)

Ramesh Chandra Shah

रमेशचन्द्र शाह
जन्म: वैशाखी त्रयोदशी, 1937, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
शिक्षा: बी.एस-सी., एम.ए., पी-एच.डी.। 1997 में भोपाल के शासकीय हमीदिया कॉलेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त। तत्पश्चात् सन् 2000 तक भोपाल में निराला सृजनपीठ के निदेशक रहे। फिलहाल केंद्रीय हैदराबाद विश्वविद्यालय में एस. राधाकृष्णन् चेयर प्रोफेसर।
प्रकाशित कृतियाँ: नदी भागती आई, हरिश्चन्द्र आओ, प्यारे मुचकुंद को, देखते हैं शब्द भी अपना समय, अनागरिक तथा समग्र काव्य-संकलन (2009), कछुए की पीठ पर (पहचान सीरीज-3, 1974) इनका पहला संग्रह था। हिंदी साहित्य सम्मेलन की ‘आधुनिक कवि-माला’ के 24वें पुष्प के रूप में संकलन प्रकाशित (2008) (कविता-संग्रह) ०  गोबरगणेश, किस्सा गुलाम, पूर्वापर, पुनर्वास, आखिरी दिन, आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू (उपन्यास) ०  जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, थियेटर, मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ, मेरी प्रिय कहानियाँ तथा गेटकीपर (कहानी-संग्रह) ०  सबद निरंतर, स्वधर्म और कालगति, नेपथ्य से, देहरी की बात (2009) तथा अगुन  सगुन बिच (2010) (वैचारिक निबंध-संग्रह) ०  रचना के बदले, आड़ू का पेड़, पढ़ते-पढ़ते, शैतान के बहाने (ललित निबंध-संग्रह) ०  छायावाद की प्रासंगिकता, समानांतर, वागर्थ, आलोचना का पक्ष, समय-संवादी, वागर्थ का वैभव, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय (साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ़) (साहित्यालोचन) ०  मारा जाई खुसरो, मटियाबुर्ज (राशोमन का अनुवाद) (नाटक) ०  अज्ञेय काव्य स्तबक, प्रसाद रचना-संचयन (साहित्य अकादेमी, दिल्ली) जड़ की बात (जैनेन्द्र के निबंध) (संपादन) ०  Ancestral Voices, Yeats & Eliot : Perspectives On India : Jaishankar Prasad: Thus Spoke Bhartrihari (भर्तृहरि का अंग्रेजी में पद्यानुवाद) (अंग्रेजी) ०  एक लंबी छाँह (यात्रावृत्त) ०  अकेला मेला (2009), इस खिड़की से (2010) (डायरी)।
सम्मान: म.प्र. शासन का शिखर सम्मान (1987-88), के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान (2001), पद्मश्री अलंकरण (2004), म.प्र. साहित्य परिषद का भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार ‘पूर्वापर’ उपन्यास के लिए, केंद्रीय भाषा संस्थान, आगरा का महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार यात्रावृत्त ‘एक लंबी छाँह’ के लिए, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (2009) इत्यादि।

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