Pratidaan

Virendra Jain

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  • Year: 1996

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 1111111111111

प्रतिदान

सुरेखा-पर्व की विद्या का विवाह माँ ने तय किया था । अच्छा घर-वर खोज़कर ।

प्रतिदान को प्रभा को ससुराल के तमाम संबंधियों ने देख-परखकर पसंद किया था ।

उसके हिस्से का विश्वास की कविता ने कबीर को स्वयं चुना था ।

तीनों के पति अलग-अलग स्थान, परिवेश, पेशे से जूड़े थे । अलग-अलग प्रवृति के थे । फिर भी तीनों स्त्रियों  का दुख एक-सा क्योंकर हुआ?

साथ न सहकर भी साथ सहे गए दुख का बयान करती वीरेन्द्र की तीन उपन्यासिकाएँ ।

स्त्रियाँ ही स्त्रियों की कथा-व्यथा को संजीदगी से बयान कर सकती हैं, इस अवधारणा को झुठलाती तीन व्यथा-कथाएँ ।

थोड़े में बहुत कह देने में समर्थ युवा कथाकार के आकार में लघु और कथ्य में बृहद् तीन लघु उपन्यास-सुरेखा-पर्व, प्रतिदान, उसके हिस्से का विश्वास ।

Virendra Jain

वीरेन्द्र जैन 
शिक्षक दिवस 1955 को मध्यप्रदेश के गुना जिलांतर्गत सिरसौर गाँव में जन्म ।
प्रमुख कृतियाँ : डूब, सबसे बडा सिपहिया, शब्द-बध (तीनों पुरस्कृत उपन्यास), तलाश और प्रतिदान (लघु उपन्यास), मैं वही हूँ (कहानी-संग्रह), पटकथा की कथा (व्यंग्य-संग्रह), तीन चित्रकथाएँ, तुम भी हँसो और बात में बात में बात (किशोर साहित्य), अब तक छह उपन्यास, छह लघु उपन्यास, तीन व्यंग्य-संग्रह, दो कहानी-संग्रह, छह किशोरोपयोगी पुस्तकें और एक संपादित ग्रंथ प्रकाशित । उपन्यासों और बाल साहित्य के लिए विभिन्न पुरस्कारों से पुरस्कृत ।

कई प्रतिनिधि संकलनों में रचनाएँ संकलित ।

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