Jahaanoon

Manorma Jafa

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9788188466955

कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

"क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

"अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

"पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

"मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

"भूल गई होगी।"

"तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

"क्या मतलब?"

"मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

"नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
—इसी उपन्यास से

Manorma Jafa

मनोरमा जफा
श्रीमती मनोरमा जफा एक सुप्रसिधद्ध लेखिका हैं। आपकी कहानियाँ 'धर्मयुग', 'कादम्बिनी' व 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' में प्रकाशित हुई हैं। एक कहानी-संग्रह 'परिचित्ता तथा अन्य कहानियाँ' तथा एक उपन्यास 'देविका' 'किताबघर प्रकाशन' से प्रकाशित हुए हैं। 'देविका' को हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा साहित्य कृति सम्मान से सम्मानित किया गया है। आपकी कृतियों में संवेदनशील भावनाओं तथा समाज के बंधनों से बंधी, परिस्थितियों से जूझती हुई स्त्री के मर्मभेदी वर्णन हैं, जो पाठकों को पुन: विचार करने के लिए बाध्य कर देते हैं। आपका बाल-साहित्य में बड़ा योगदान रहा है। आप बाल-साहित्य विशेषज्ञ हैं  और तीन दशक से बल-साहित्य लेखन कार्यशाला का संचालन कर आपने भारत में बाल-साहित्य को एक नई दिशा दी है। आप हिन्दी व अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में लिखती हैं। आपकी अनेक बाल-पुस्तकों का विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है व पुरस्कृत हुई हैं।

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