Goonj Uthin Thaliyan

Dr. Kusum Meghwal

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  • Year: 2019

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788194004042

मेरी लगभग 60 पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद मेरे जीवन का यह पहला उपन्यास है–‘गूँज उठीं थालियाँ’, जो कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि पूरी तरह सत्य घटना पर आधारित है। इतना ही नहीं, इससे जुड़ी हुई अन्य सभी घटनाएँ भी सत्य पर आधारित हैं। केवल पात्रों के नाम, स्थानों के नामों में परिवर्तन अवश्य किया गया है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मेरी हर पुस्तक का जन्म किसी घटना के आधार पर ही हुआ है और यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।

इस उपन्यास का जन्म जिस घटना के आधार पर हुआ है, उसके पात्र ने तो आसमान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है। वर्षों पूर्व उसे जिदा जमीन में गाड़ देने का फोटो तो मैं नहीं ले पाई, किंतु उसी घटना को पुनः दोहराने वाला फोटो मुझे उपलब्ध हो गया और तब से ही मेरे मस्तिष्क के गर्भ में पल रहे संबंधित विचारों को, उसके चित्रों को कोरे कागज पर उकेरने के लिए मेरी कलम उतावली हो गई तो उस घटना ने इस उपन्यास के रूप में जन्म लेकर अपने पाठकों तक पहुँचने का पक्का इरादा कर लिया।

कोई भी काम अकारण नहीं होता। उसके करने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इस पुरुषप्रधान अन्यायपरक, असमानतापरक समाज व्यवस्था के विरोध का कीड़ा तो मेरे दिमाग में बचपन से ही कुलबुलाने लग गया था, कितु उसे निकालने का काम अब कई वर्षों बाद अर्थात् मेरे जीवन के उत्तरार्द्ध में हो रहा है।

वैसे तो अपनी खुद की समझ आने के बाद से अर्थात् लगभग पाँच वर्ष की उम्र से लड़की के पैदा होने से लेकर मरने तक के पूरे जीवन में कदम-कदम पर उसके साथ होने वाले भेदभाव, अन्याय, अत्याचार, उसके हर कदम पर लगाए गए प्रतिबंधों को मैंने न केवल पढ़ा और सुना है वरन् स्वयं भोगा भी है और वे सभी कष्ट, पीड़ाएँ एवं दर्द मेरी कहानियों, कविताओं के माध्यम से बह निकले, जिन्होंने हिंदी साहित्य के विशाल समुद्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

यह उपन्यास भी नारी व्यथाओं तथा उसके कष्ट, दर्द, पीड़ाओं को अभिव्यक्ति देता हुआ नारी को क्रांतिकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली मेरी कहानियों, कविताओं की श्रृंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है, जो मेरे पाठकों को मेरी पूर्व की पुस्तकों की तरह ही पसंद आएगा, ऐसी मेरी उम्मीद है।

वैसे तो लेखक की हर रचना की सफलता-असफलता का निर्णायक पाठक वर्ग ही होता है, कितु अपने पाठक वर्ग की मानसिकता को पहचानते हुए मुझे यह लिखने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती कि यह भी उन्हें पसंद ही आएगा।

मेरे जीवन का यह प्रथम उपन्यास हिंदी उपन्यास जगत् में लाते हुए, अपने पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है।

मुझे यहाँ यह लिखने में भी कोई आपत्ति नहीं है कि हिंदी साहित्य जगत् के ठेकेदार, आलोचक व समालोचक इसे चाहे किसी भी दृष्टि से लें, किंतु अपने लेखकीय दायित्व को मैंने पूरी ईमानदारी से निभाया है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। वैसे भी खरा-सच्चा लेखक, समाज की खरी-सच्ची बातें लिखने वाला लेखक किसी की आलोचना की परवाह नहीं करता। वह अपने जीवन के महान् लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है और मैं भी अपने जीवन के महान् लक्ष्य पुरुषों द्वारा नारी को भी एक इनसान मान लेने के लक्ष्य को पूरा करने में लगी हुई हूँ और आजीवन लगी रहूँगी। मुझे अपने इस दृढ़ निश्चय से कोई हटा नहीं सकता।

मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अपने आपको इनसान के तराजू में तौलने और उस पर खरे उतरने वाले इनसानी पुरुषों की भागीदारी, उनका स्नेह, सहकार तथा प्रोत्साहन मुझे अवश्य मिलेगा।

इसी उम्मीद के साथ---

डॉ. कुसुम मेघवाल

Dr. Kusum Meghwal

डॉ. कुसुम मेघवाल

जन्म 29 अप्रैल, 1948 राजस्थान के उदयपुर नगर में। सन् 1964 में हायर सेकेंड्री उत्तीर्ण की। इसी वर्ष चित्तौड़गढ़ जिले के छोटी सादड़ी में विवाह। 1965 में प्रथम पुत्र, 1968 में द्वितीय पुत्र का जन्म। दस वर्षों तक खेती एवं घर-गृहस्थी का कार्य।

विवाह के दस वर्षों बाद पुनः पढ़ाई प्रारंभ। 1973 में बान्सी गाँव में अध्यापिका के पद पर प्रथम नियुक्ति। 1975 में सुखाडि़या विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी में नियुक्ति। वर्ष 1977 में राजस्थान विश्वविद्यालय से स्वयंपाठी के रूप में विभिन्न कठिनाइयों के साथ बी.ए. तथा 1979 में हिंदी में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। वर्ष 1985 में सुखाडि़या विश्वविद्यालय से ‘हिंदी उपन्यासों में दलित वर्गनामक शोध-ग्रंथ पर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

वर्ष 1980 में भारत सरकार के उपक्रम हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के उदयपुर स्थित मुख्य कार्यालय में राजभाषा अधिकारी के पद पर नियुक्ति। लगातार 20 वर्षों तक वहाँ कार्यरत।

हि.जि. अ.जा., अ.ज.जा. कर्मचारी संघ का गठन। अन्य कल्याणकारी संस्थाओं का गठन एवं राष्ट्रीय संस्थाओं में सक्रिय भूमिका, जिनका मुख्य कार्य बाबासाहेब डॉ- अंबेडकर के विचारों का प्रचार-प्रसार और लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना।

दिल्ली एवं जयपुर दूरदर्शन पर साक्षात्कार एवं वार्ताएँ प्रसारित। राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 60 लेख एवं कहानियाँ प्रकाशित। आकाशवाणी बीकानेर, उदयपुर एवं जयपुर से भी अनेक कहानियाँ एवं वार्ताएँ प्रसारित। एक कहानी पर फिल्म भी निर्माणाधीन है।

55 पुस्तकों का प्रकाशन एवं दो फिल्में ‘मैं भी एक इनसान हूँ तथा ‘राष्ट्रव्यापी संविधान संरक्षण जागृति यात्रका निर्माण। बाबासाहेब के विचारों के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से वर्ष 1991 से निरंतर 25 वर्षों से भीम डायरी का प्रकाशन।

अब तक तीन अंतर्राष्ट्रीय, नौ राष्ट्रीय एवं अनेक राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त।

वर्तमान में पूर्ण रूप से सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन के लिए बाबासाहेब डॉ- अंबेडकर मिशन एवं विचारधारा के प्रचार-प्रसार हेतु राष्ट्रीय बौद्ध महापरिषद तथा अखिल भारतीय संवैधानिक अधिकार संरक्षण मंच का गठन कर राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत। ‘परिवर्तन प्रभाकरसमाचार पत्र पिछले 23 वर्षों से एवं ‘अस्मितात्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन पिछले सात वर्षों से निरंतर जारी।

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