Dhoop Dhalne Ke Baad

Mahip Singh

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789385054426

सूरज उगता हैमध्याह्न होता है और फिर ढलना प्रारंभ हो जाता है। मनुष्य जीवनपर्यंत इन स्थितियों से गुजरता रहता है।विभिन्न प्रवृत्तियांपरिवर्तित होती मान्यताएं और अनुभव संपन्नताउसे बहुआयामी बनाती रहती हैं। कभी वह संन्यासी हो जाता हैकभी गृहस्थ।

संन्यास में महत्त्वाकांक्षा सम्मिलित हो जाती है चुपके से और उसे सामान्य संसारी मनुष्य के स्तर से नीचे खींचती हुई पतन की अतल गहराइयों में ले जाती है। जहां संन्यासी अपराधी बन जाताहै।

गृहस्थ जीवन में जब सबके सुख एवं हित की भावना जुड़ती है तो सामान्य व्यक्ति सारे सांसारिक कार्यकलाप के बीच भी संत ही होता है। और वे लोग जो सदियों से किसी विशेष जाति में पैदाहोने के कारण मनुष्य से निम्नतर माने जाते रहे हैंजब अपने स्व को पहचानने लगते हैंकैसी छटपटाहट भर जाती है उनमें और कैसे हिंसक परिणाम झेलने पड़ते हैं उन्हें।

मानव जाति का आधा हिस्सा यानी स्त्री जो अभी तक मनुष्य नहीं मानी जातीअब अपना स्थान और अधिकार पहचानने लगी है और उसके लिए आग्रहशील हो गई है तो कैसे-कैसे उद्वेलनों सेगुजरना पड़ता है उसे।

इन सब बिंदुओं को समेटता और अपने परिचित परिवेश को एक नए कोण से प्रस्तुत करता है उपन्यास। प्रख्यात कथाकार महीप सिंह की त्रयी का तीसरा उपन्यास है-धूप ढलने के बाद'

Mahip Singh

महीप सिंह जन्म : 15 अगस्त, 1950 जन्म-स्थान : जिला उन्नाव (उत्तर प्रदेश) शिक्षा : एम०ए० (हिंदी), डी०ए०वी० कॉलेज, कानपुर (1951), पी-एच०डी०, आगरा विश्वविद्यालय, आगरा (1963) व्यवसाय प्राध्यापक-खालसा कॉलेज, मुंबई (1955-63), श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज, दिल्ली (1963-93), विदेश अध्ययन की कन्साई यूनिवर्सिटी, हीराकाता जापान में एक वर्ष तक अतिथि प्राध्यापक (1975-76) रचनाएँ कहानी-संग्रह : 'सुबह के फूल', 'उजाले के उल्लू', 'घिराव', 'कुछ और कितना', 'कितने संबंध', 'धूप की अंगुलियों के निशान', 'सहमे हुए', 'इक्यावन कहानियाँ', 'चर्चित कहानियाँ' तथा तीन खंडों में 'समग्र कहानियाँ' । उपन्यास : 'यह भी नहीं' (हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी, पंजाबी, मलयालम में भी प्रकाशित) संपादन : 25 पुस्तकों का संपादन पुरस्कार : उ०प्र० हिंदी संस्थान पुरस्कार, भाषा विभाग (पंजाब), शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय पुरस्कार, हिंदी अकादमी (दिल्ली) पुरस्कार, छठे हिंदी सम्मेलन (सितंबर, 1999 लंदन) में साहित्यिक सेवाओं के लिए विशिष्ट सामान स्मृति-शेष : 24 नवम्बर, 2015

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