Bimla

Jagnnath Prabhakar

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  • Year: 1988

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Himachal Pustak Bhandar

  • ISBN No: 8859472365118

राजा समरसिंह को उनके दीवान सतीशचन्द्र ने अपने एक विश्वस्त नौकर के उकसाने पर मरवा डाला । उनकी रानी ने उसके विरुद्ध अति भयंकर व्रत धारण किया । वह व्रत क्या था ? इन्द्रनाथ को महाश्वेता की बेटी सरला से प्रेम हो गया, पर ब्याह महाश्वेता का व्रत पूरा हुए बिना नहीं हो सकता था । इस व्रत को पूरा करने के लिये इन्द्रनाथ घर से चल पडा । महेश्वर मन्दिर में एक अद्वितीय सुन्दरी उस पर मोहित हो गयी । सुन्दरी ने अपना नाम भिखारिन बताया ।  उसने एक भिक्षा इन्द्रनाथ से सतीशचन्द्र का वध न करने की माँग ली और सतीशचन्द्र के नौकर को हत्यारा बताया । इन्द्रनाथ मुंगेर पहुँच कर राजा टोडरमल की सेना में भरती हो गया । संध्या समय वह गंगा-तट पर शत्रुओं से लड़ता हुआ बेहोश हो कर गंगा से गिर पड़ा । एक युवक! अपनी नाव से कूदा, उसे उठाकर अपनी नाव में डाल लिया । होश आने पर उसने देखा, इस युवक के भेस में वही भिखारिन थी । उधर दीवान के उसी शबित-सम्पन्न नौकर ने महाश्वेता को सरला सहित चतुर्वेष्ठित दुर्ग में कैद कर लिया था । भिखारिन उन्हें काल कोठरी से निकालकर अपने मकान में ले आयी । इधर टोडरमल ने पठानों के दुर्ग पर हमला किया । गुड़सवार नायक इन्द्रनाथ लड़ाई में घायल व बेहोश होकर गिर पडा । शात्रुओं ने उसे उठा कर दुर्ग में कैद कर लिया । भिखारिन ने वहाँ पहुँच कर उसे दुर्ग से कैसे बाहर भेज दिया और स्वय इन्द्रनाथ बन कर कैद हो गयी ? भेद खुलने पर भिखारिन को मृत्यु दण्ड देने के लिये वृक्ष के साथ बांध दिया गया । परन्तु इन्द्रनाथ ने किस प्रकार उसे बचा लिया ? इतने में दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली गयी ।  इसके बाद सतीशचन्द्र के उसी नौकर ने उन्हें मार डाला । विजेता इन्द्रनाथ अपने वचन के अनुसार निश्चित दिन सरला के पास पहुँच गया ।
राजा टोडरमल की सभा लगी थी । सतीशचन्द्र का हत्यारा कैदी के रूप में राजा के सामने पेश किया गया । उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया । कैदी ने कहा, "मैं ब्राह्मण हूँ । ब्राह्यण को मृत्यु दण्ड देना शास्त्र-विरुद्ध है । धार्मिक टोडरमल सोच में पड़ गये । इतने में एक निहत्थी महिला तेजी से सभा मण्डल में घुसी और छुरी से सतीशचन्द्र के हत्यारे कैदी की हत्या कर डाली । वह महिला कौन थी और उसने छुरी कैसे प्राप्त कर ली ?
अपने ब्याह के निश्चित दिन इन्द्रनाथ भिखारिन के पास गया और कहा, "भिखारिन । तुमने मुझे चार बार मौत से बचाया, जिसका बदला मैं चुका नहीं सकता । मेरी प्रार्थना है, तुम मेरे पास पटरानी की तरह रहो । सरला तुम्हारी सेवा करेगी ।" इस प्रकार जाने क्या-क्या स्नेह-भरी बाते कह रहा था, परन्तु वास्तव में भिखारिन वहाँ नहीं थी, था उस का प्राणहीन पार्थिव शरीर । वह इन्द्रनाथ के प्रति शाश्वत प्रेम रखती थी, उसी प्रेम की ज्वाला में वह आत्म- बलिदान कर चुकी थी । हाँ तो यह भिखारिन वास्तव में थी कौन?
उपर्युक्त समस्त रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर विविध रोमांचकारी विवरणों सहित यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है ।

Jagnnath Prabhakar

श्री  जगन्नाथ प्रभाकर
जगन्नाथ प्रभाकर का  जन्म, जिला लायलपुर (वर्तमान पाकिस्तानस्थ, फैसलाबाद) के एक कस्बा के समृद्ध व्यापारी ब्राह्मण परिवार में हुआ, शिक्षा लायलपुर में ग्रहण  की । माता-पिता चाहते थे कि यह लड़का कॉलेज में न जाकर मंडी के कपड़ा व्यापार में अपने बडे भाई का साथ दे । परन्तु इन्हें इस काम में रुचि न थी । ये प्राय: सारा समय सामाजिक कार्यों और विशेषता कांग्रेस कमेटी के, जिसके यह सचिव थे, कार्यों में खपा देते थे । यह हालत देखकर इन्हें नहर के विभाग में एक अच्छी सरकारी नौकरी में लगवा दिया गया । परन्तु कुछ ही महीनों के बाद यह नौकरी भी छोड़ दी । इसके बाद लिखने-पढ़ने का शौक इन्हें लाहौर ले आया । जहाँ ये हिन्दी के साप्ताहिक पत्र "विश्वबन्धु" के मैनेजर नियुक्त हो गये और जब यह पत्र दैनिक हुआ, तो इन्हें समाचार विभाग और साप्ताहिक संस्करण का इंचार्ज बना दिया गया । इसके अतिरिक्त यह एक उर्दू साप्ताहिक 'ब्रह्म संदेश' का और विख्यात उर्दू धार्मिक पत्रिका "ओम" के विशेषांकों का सम्पादन भी करते रहे । पाकिस्तान बनने के बाद इन्हीं ने दिल्ली से उर्दू मासिक पत्रिका 'विज्ञान' का प्रकाशन आरभ किया । बालोपयोगी साहित्य का भी निर्माण किया है । इन्हें भारत सरकार के शिक्षा विभाग की ओर से नवसाक्षरों के उपयोगी साहित्य की सातवी प्रतियोगिता से पुरस्कृत किया गया ।  यह बहुत वर्षों तक उर्दू दैनिक 'मिलाप' के विशेष धार्मिक कालम लिखते रहे ।

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