Aranya-Tantra

Govind Mishra

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789382114581

”भारत का वह एक प्रान्त था, प्रान्त की वह राजधानी थी, राजधानी का वह क्लब था। देखें तो पूरा देश ही था... क्योंकि अफसर जो यहाँ आते थे, वे देश के कोने-कोने से थे।“...
”ये जो खेल रहे हैं...आला सर्विस के हैं, बाहर और यहाँ खेल में भी वे स्टार हैं। यहाँ से जाकर कुर्सी पर बैठ जायेंगे, सरकार हो जायेंगे। सरकारी खाल ओढ़े बैठे। उस खोल के भीतर सब छिपा रहता है, जो यहाँ खेल में झलक जाता है क्योंकि खेल में भीतर की प्रवृत्तियाँ बाहर आये बिना नहीं रहतीं।
स्टार...जो ये खुद को लगाते हैं, या जंगल चर रहे जानवर, किसिम-किसिम के जानवर...ये क्या हैं...गधा सोच रहा था।“
प्रशासन के इस जंगल में हाथी, हिरन, ऊँट, घोड़ा, खच्चर, तेंदुआ, रीछ, बायसन, बन्दर तो हैं ही, बारहसींगा, नीलगाय और शिपांजी भी हैं। सबसे ऊपर है शेर-सीनियर। वह जाल भी खूब दिखाई देता है जो उनकी उछलकूद अनायास ही बुनती होती है। यह है ‘अरण्य-तंत्र’, गोविन्द मिश्र का ग्यारहवाँ उपन्यास, जिसमें वे जैसे अपनी रूढ़ि (अगर उसे रूढ़ि कहा जा सकता है तो)-संवेदनात्मक गाम्भीर्य-को तोड़ व्यंग्य और खिलंदड़ेपन पर उतर आये दिखते हैं। यहाँ यथार्थ को देखा गया है तो हास्य की खिड़की से। फिर भी ‘अरण्य-तंत्र’ न व्यंग्य है, न व्यंग्यात्मक उपन्यास। अपनी मंशा में यह लेखक के दूसरे उपन्यासों की तरह ही बेहद गम्भीर है।
”बायीं तरफ़ की सिन्थैटिक कोर्ट-कोर्ट नं. 2 के ठीक ऊपर लॉन के किनारे कभी दो बड़े पेड़ थे, जिनमें से एक पहली कोर्ट बनाने के लिए जो खुदाई हुई थी उसके दौरान बलि चढ़ गया। दायीं तरफ़ की कोर्ट-कोर्ट नं. 1 के आखिरी छोर पर भी दो बड़े पेड़ थे-जुड़वाँ, एक हल्के गुलाबी रंग के फूलों वाला, एक हल्के बैगनी रंग के फूलों वाला। उनमें से एक कोर्ट नं. 1 के तैयार होने के बाद शेर-सीनियर की सनक और सियार-पाँड़े की चापलूसी में ढेर हो गया। तो बड़े पेड़ अब दो ही बचे थे...एक इस तरफ़, एक उस तरफ़...
दो वे पेड़ अलग-थलग पड़े, अकेले थे, उदास...भयभीत भी।“ 

Govind Mishra

गोविन्द मिश्र 1965 से लगातार और उत्तरोत्तर स्तरीय लेखन के लिए सुविख्यात गोविन्द मिश्र इसका श्रेय अपने खुलेपन को देते हैं । समकालीन कथा-साहित्य में उनकी उपस्थिति जो एक संपूर्ण साहित्यकार का बोध कराती है, जिसकी वरीयताओं में लेखन सर्वोपरि है, जिसकी चिंताएं समकालीन समाज से उठकर 'पृथ्वी पर मनुष्य' के रहने के संदर्भ तक जाती हैं और जिसका लेखन-फलक 'लाल पीली ज़मीन' के खुरदरे यथार्थ, 'तुम्हारी रोशनी में' की कोमलता और काव्यात्मकता, 'धीरसमीरे' की भारतीय परंपरा की खोज, 'हुजूर दरबार' और 'पाँच आँगनोंवाला घर’ की इतिहास और अतीत के संदर्भ में आज के प्रश्नों की पड़ताल-इन्हें एक साथ समेटे हुए है। इनकी कहानियों में एक तरफ 'कचकौंध' के गंवई गांव के मास्टर साहब हैं तो 'मायकल लोबो' जैसा आधुनिक पात्र या 'खाक इतिहास' की विदेशी मारिया भी । गोविन्द मिश्र बुंदेलखंड के हैं तो बुंदेली उनका भाषायी आधार है, लेकिन वे उतनी ही आसानी से 'धीरसमीरे' में ब्रजभाषा और 'पाँच आंगनोंवाला घर' और 'पगला बाबा' में बनारसी-भोजपुरी से भी सरक जाते हैं । प्राप्त कई पुरस्कारों/सम्मानों में 'पांच आंगनोंवाला घर' के लिए 1998 का व्यास सम्मान और 'कोहरे से कैद रंग' के लिए 2008 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 2011 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का भारत भारती पुरस्कार एवं 2013 का सरस्वती सम्मान विशेष उल्लेखनीय है । इन्हें राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है । प्रकाशित रचनाएँ : उपन्यास : 'अरण्य-तंत्र', 'वह/अपना चेहरा', 'उतरती हुई धूप', 'लाल पीली जमीना', 'हुजूर दरबार', 'तुम्हारी रोशनी में', 'धीरसमीरे', 'पांच आँगनोंवाला घर', 'फूल...इमारतें और बंदर', 'कोहरे में कैद रंग' , 'धूल पौधों पर' । कहानी-संग्रह : दस से अधिक । अंतिम पाँच-'पगला बाबा', 'आसमान...कितना नीला', 'हवाबाज़', 'मुझे बाहर निकालो', 'नए सिरे से' । संपूर्ण कहानियाँ : 'निर्झरिणी' (दो खंड)। यात्रा-वृत्त : 'धुंध-भरी सुर्खी' 'दरख्तों के पार...शाम', 'झूलती जड़ें', ‘परतों के बीच', 'और यात्राएँ' । यात्रा-वृत्त : 'रंगों की गंध' (दो खंड) । निबंध : 'साहित्य का संदर्भ, 'कथाभूमि', 'संवाद अनायास', 'समय और सर्जना' । कविता : 'ओ प्रकृति माँ' । चुनी हुईं रचनाएँ (तीन खंड) ।

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