Aapki Pratiksha

Shyam Vimal

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 9788189982669

आपकी प्रतीक्षा
सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’

Shyam Vimal

श्याम विमल
जन्म नाम: श्याम सुंदर शर्मा। सिरायकी (पंजाबी रूप) भाषी।
जन्म: शुजाबाद (ज़िला मुलतान, पाकिस्तान) में 19 फरवरी, 1931(सर्टिफिकेट में--3 मार्च, 1931)
संस्कृत-हिंदी-अंग्रेज़ी में डिग्रियों के अतिरिक्त मराठी भाषा- प्रशिक्षण में पश्चिम क्षेत्रीय भाषा केंद्र, डेक्कन कालेज, पुणे से डिप्लोमा।
सात वर्ष पत्रकारिता (नवभारत टाइम्स में)। लगभग पैंतीस वर्ष सरकारी विद्यालयों में अध्यापन। अब स्वतंत्र लेखन। 
प्रकाशित कृतियाँ: इसे मिलाकर छह उपन्यास। एक कहानी-संग्रह। तीन कविता-संग्रह। दो व्यंग्य-संग्रह। दो पुस्तकें आत्मीय एवं साहित्यिक संस्मरण की। एक पाकिस्तान-यात्रा पर ‘पाँचवाँ धाम’। मराठी में दो अपने उपन्यासों तथा संस्कृत में अपने हिंदी उपन्यास का अनुवाद। हिंदी के आठ कवियों की अस्सी कविताओं का मराठी में अनुवाद तथा संपादन। कालिदासकृत ‘ऋतुसंहार’ का हिंदी रूपांतरण (द्वैभाषिक) और सैकड़ों फुटकर लेखादि।
सम्मान-पुरस्कार: साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा ‘व्यामोहः’ पर संस्कृत में राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार (1997) ०  मराठी कविताओं की पांडुलिपि ‘उन्हाचे तुकडे’ पर शिक्षा-संस्कृति मंत्रालय का प्रतिस्पद्र्धा पुरस्कार (1982) ०  अ० भा०  साहित्य परिषद्, दिल्ली, तृतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन, गाजियाबाद तथा लायंस क्लब, नोएडा-दिल्ली द्वारा सम्मानित।

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