Tinke-Tinke

Nisha Bhargva

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Vandana Book Agency

  • ISBN No: 9788189424336

निशा भार्गव के लघु कथा संग्रह, 'तिनके-तिनके' में परिवर्तित जीवन मूल्यों के छोटे-छोटे सच हैं, स्त्री प्रश्न, परिवारिक-सामाजिक वैषम्य और संबंधों की आइरनी दर्शाती छोटी-छोटी घटनायें हैं, जिन्हें अर्थकेंद्रित जीवन की आपाधापी में रोज़मर्रा की बाते समझकर, 'यह सब तो होता ही रहता है', वाले खाने में डालकर अदेखा किया जाता है ।
हमारी आसपास की दुनिया में आए दिन काफी कुछ घटता रहता है। चौतरफ हेर फेर, अनाचार, स्कैम्स, आतंकी हमलों से लेकर, स्त्रियों से दुराचार, वृद्धों की अवमानना एवं आत्महत्याओं से टीवी और समाचार पत्र भरे रहते है । ऐसे में देखने सुनते में साधारण और औसत, पर चीन्हने में अर्थगर्भित ये बातें महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि गुट्ठिल होते जीवन में हमारा दिलोदिमाग, जो अशुभ और अनाचार सुनने का आदी हो गया है उसे हुन रोज़मर्रा के सुख-दु:ख, राग-विराग, प्रेम, ईषर्या और ईमानदारी की छोटी-छोटी घटनाओं से रू-ब-रू करा कर, उसकी संवेदनशीलता को टहोका जाय । शायद नज़र अंदाज होती ये छोटी-छोटी घटनाएं उन्हें अपने भीतर झांकने को प्रेरित करें । इनमें उन्हें खुशहाल जिन्दगी के कुछ छोटे-बड़े नुस्खे मिल जाये, जिनसे आए दिन के तनावों और घरेलू कलहों से कुछ तो मुक्ति मिले ।
निशा नाउम्मीदी में भी संस्कारशील व्यक्ति और स्वस्थ समाज की उम्मीद नहीं छोड़ती । उसे अच्छाई पर भरोसा है यह भरोसा वह अपने पाठकों को सौंपना चाहती है । सीधी-सादी बोलचाल की भाषा में निशा बडे प्रश्न उठाती है । कैंसर की मरीज चारु, मौत के  इंतजार में सजना-संवरना क्यों छोडे? पचपन की उम्र में अकेली पडी शशि का पुनर्विवाह उसका गुनाह क्यों साबित किया जाय ? इस छोटे से जीवन को बयों भरपूर न जिया जाय ?
बिना किसी भाषायी करिश्मे और दावे के निशा इस तिनके-तिनके  संग्रह में, स्मृतियों में अटके , यादों-स्थितियों के कुछ तिनके संजोकर बतकहियों और किस्सों के माध्यम से पाठकों से संवाद करती है, देखे जिए क्षणों को, छोटे-छोटे अनुभवों को सहज संवेदना से रेखांकित कर संधि पाठक तक पहुंचती है । इनकी सादगी ही इनकी खूबी हैं ।

Nisha Bhargva

अजमेर (राजस्थान) में पली बढी निशा भार्गव ने अर्थशास्त्र में एस.ए. किया । राजस्थान विश्वविद्यालय से स्वर्णपदक जीत कर अपने विद्यालय व महाविद्यालय की सर्वश्रेष्ठ छात्रा कहलाने का गौरव प्राप्त किया । अपने महाविद्यालय से स्वर्ण एवं रजतपदक प्राप्त किये तथा आठ वर्षों तक राष्ट्रीय छात्रवृत्ति प्राप्त की ।
भूतपूर्व प्राध्यापिका एवं सदैव प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाली निशा भार्गव ने अनेक पुरस्कार प्राप्त किए। विविध मंचों पर काव्यपाठ के साथ-साथ निशा भार्गव ने 1996 में राष्ट्रपति पवन में भी काव्यपाठ किया तथा भारत की प्रथम महिला श्रीमती विमला रगर्मा द्वारा सम्मानित हुई ।
'अनकहे पल' आपका सम्मिलित काव्य संग्रह है । 'उधार की मुस्कान' (2000), 'अच्छे फंसे' ( 2003) , 'चिकने घडे' (2006), 'बंटाधार' (2010) , 'घनचक्कर' (2012) हास्य व्यंग्य काव्य संग्रह हैं । 'तिनके-तिनके' (लघु कथा संग्रह) 2012 तथा 'बसंत बयार' 2012 (कहानी संग्रह) प्रस्तुत है। 
कल्पतरु संस्था दिल्ली द्वारा 1999 में 'कविता विदुषी' पुरस्कार मक्खनलाल शांतिदेवी ट्रस्ट द्वारा 2002 में हास्य-व्यंग्य लेखन हेतु सम्मानित , भारतीय साहित्यकार संसद बिहार द्वारा 2005 में 'हरिशंकर परसाई राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान', अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा विकास संगठन एवं यू.एस.एम. पत्रिका गाजियाबाद द्वारा 2006 में सुभद्रा कुमारी चौहान स्मृति सम्मान, महिला मंगल संस्था दिल्ली द्वारा 'साहित्य प्रतिभा सामान' 2006, भारतीय साहित्यकार संसद बिहार द्वारा 2007 में काका हाथरसी साहित्य सम्मान, कवितायन संस्था द्वारा 'साहित्य सृजन सम्मान' 2011 प्राप्त हुए।
आकाशवाणी व दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों से लगातार जुडाव । कविता, कहानी, वार्ता, समीक्षा तथा साक्षात्कार का प्रसारण । टेलीविजन के 'वाह-वाह" कार्यक्रम (SAB), 'अर्ज किया है' (NDTV), "उठो जागो’ (प्रज्ञा टीवी) तथा दूरदर्शन की काव्यगोष्टियो में काव्य पाठ करने का अवसर मिला

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