Naye Sire Se

Govind Mishra

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-81467-28-2

नये सिरे से
गोविन्द मिश्र की पहली कहानी ‘नये पुराने मां-बाप' ‘माध्यम' (इलाहाबाद : संपादक बालकृष्ण राव), 1965 में प्रकाशित हुई थी। लिख वे इसके पहले से रहे थे। इस तरह कहानियां लिखते हुए गोविन्द मिश्र को लगभग पचास वर्ष होने को आ रहे हैं। प्रस्तुत संग्रह में उनकी 2010 तक की नई कहानियां हैं, जो पिछले किसी संग्रह में नहीं आई हैं। यहां वे जैसे कहानी को नये सिरे से पकड़ने चले हैं। पहले जो लेखक कभी कोई जीवन-स्थिति, व्यक्ति की भीतरी जटिलता, समाज के नासूर, जीवन के खूबसूरत रंग जैसी चीजों से कहानी पकड़ता दिखा था, वह यहां बिलकुल फर्क ढंग से चला है। पिछले इतने सारे वर्षों में अर्जित परिपक्वता में, जैसे-कला, शिल्प, भाषायी सौष्ठव जैसी चीजें ही घुलकर खो गई हैं। कहा भी जाता है कि सर्वोच्च कला वह है जहां कला ही तिरोहित हो जाती है। रह जाती है तो सिर्फ स्वाभाविकता, जिसके रास्ते जीवन कला में सरक जाता है; कलाकृति जीवन की आकृति नहीं, साक्षात् जीवन दीखती है।
करीब-करीब इन सभी कहानियों में दर्द की एक खिड़की है, जिसके पार जीवन है, अपनी गति से पल-पल सरकता हुआ।...उस खिड़की से उदासीन जिसके रास्ते जीवन दिखाई देता है। जीवन जो है, वह बदलता नहीं...लेकिन दर्द से उठतीं कुलबुलाहटें हैं उसे बदलने की। और तेज आवाज है स्त्रियों की, जिनमें कछ नया कर गुज़रने, कोई रास्ता ढूंढ़ने और दिखाने की बेचैनी है चाहे वह ‘तुम हो' कि सुषमा हो या ‘छाया', ‘मोहलत’ और ‘प्रेमसंतान' की ‘वह'। गोविन्द मिश्र जो अकसर अपने पात्रों को ‘यह' या ‘वह' कहकर अनाम छोड़ देते हैं तो शायद इस आशय से कि भले ही दर्द की वह दास्तान खास हो, पर वह है आम ही...और यह तार फिर उसी स्वाभाविकता से जुड़ता है, जहां कलाहीनता ही सर्वोच्च कला है।

Govind Mishra

गोविन्द मिश्र 1965 से लगातार और उत्तरोत्तर स्तरीय लेखन के लिए सुविख्यात गोविन्द मिश्र इसका श्रेय अपने खुलेपन को देते हैं । समकालीन कथा-साहित्य में उनकी उपस्थिति जो एक संपूर्ण साहित्यकार का बोध कराती है, जिसकी वरीयताओं में लेखन सर्वोपरि है, जिसकी चिंताएं समकालीन समाज से उठकर 'पृथ्वी पर मनुष्य' के रहने के संदर्भ तक जाती हैं और जिसका लेखन-फलक 'लाल पीली ज़मीन' के खुरदरे यथार्थ, 'तुम्हारी रोशनी में' की कोमलता और काव्यात्मकता, 'धीरसमीरे' की भारतीय परंपरा की खोज, 'हुजूर दरबार' और 'पाँच आँगनोंवाला घर’ की इतिहास और अतीत के संदर्भ में आज के प्रश्नों की पड़ताल-इन्हें एक साथ समेटे हुए है। इनकी कहानियों में एक तरफ 'कचकौंध' के गंवई गांव के मास्टर साहब हैं तो 'मायकल लोबो' जैसा आधुनिक पात्र या 'खाक इतिहास' की विदेशी मारिया भी । गोविन्द मिश्र बुंदेलखंड के हैं तो बुंदेली उनका भाषायी आधार है, लेकिन वे उतनी ही आसानी से 'धीरसमीरे' में ब्रजभाषा और 'पाँच आंगनोंवाला घर' और 'पगला बाबा' में बनारसी-भोजपुरी से भी सरक जाते हैं । प्राप्त कई पुरस्कारों/सम्मानों में 'पांच आंगनोंवाला घर' के लिए 1998 का व्यास सम्मान और 'कोहरे से कैद रंग' के लिए 2008 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 2011 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का भारत भारती पुरस्कार एवं 2013 का सरस्वती सम्मान विशेष उल्लेखनीय है । इन्हें राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है । प्रकाशित रचनाएँ : उपन्यास : 'अरण्य-तंत्र', 'वह/अपना चेहरा', 'उतरती हुई धूप', 'लाल पीली जमीना', 'हुजूर दरबार', 'तुम्हारी रोशनी में', 'धीरसमीरे', 'पांच आँगनोंवाला घर', 'फूल...इमारतें और बंदर', 'कोहरे में कैद रंग' , 'धूल पौधों पर' । कहानी-संग्रह : दस से अधिक । अंतिम पाँच-'पगला बाबा', 'आसमान...कितना नीला', 'हवाबाज़', 'मुझे बाहर निकालो', 'नए सिरे से' । संपूर्ण कहानियाँ : 'निर्झरिणी' (दो खंड)। यात्रा-वृत्त : 'धुंध-भरी सुर्खी' 'दरख्तों के पार...शाम', 'झूलती जड़ें', ‘परतों के बीच', 'और यात्राएँ' । यात्रा-वृत्त : 'रंगों की गंध' (दो खंड) । निबंध : 'साहित्य का संदर्भ, 'कथाभूमि', 'संवाद अनायास', 'समय और सर्जना' । कविता : 'ओ प्रकृति माँ' । चुनी हुईं रचनाएँ (तीन खंड) ।

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